चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 611–620

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

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विमानस्थानम ५६३STO = ] ३८ होता है । पित्त के उष्ण होने से पित्त प्रकृति के मनुष्य उष्णिमा को न सहने वाले, शुष्क, कठोर, पीले शरीर वाले, बहुत पिल्लु ( फुंन्सियों ), व्यंग ( मुख व्यंग ) और तिपड़िका वाले, अधिक भूख और प्यास वाले होते हैं, इनके बाल शीघ्र ही पक जाते, गिर जाते हैं, तथा मुंह पर झुर्रियां आजाती हैं । ये प्रायः कोमल, थोड़ी एवं धूसर वर्ण दाढ़ी-मूंछ वाले, अल्प होम तथा अलाकेध वाले होते हैं । तोक्षण गुण के कारण तीक्ष्ण पराक्रम वाले, तीक्ष्ण अभि वाले, बहुत खाने पीने वाले, क्लेश को न सहन करने वाले, दन्दशूक अर्थात् बार-बार खाने वाले होते हैं । द्रव होने से शिथिल एवं मृदु सन्धिबन्ध तथा मांस वाले होते हैं । इनको स्वेद- मूत्र और मल बहुत अधिक मात्रा में आता है । पित्त के अति दुर्गन्धयुक्त होने से इनके बाल, मुख, शिर और शरीर से बहुत दुर्गव आती है । कटु अल्प होने से थोड़े शुक्र, मैथुन और न्यून संतान वाले होते हैं । इन गुणों के कारण पित्त प्रकृति का मनुष्य मध्यम चल, मध्यम आयु, मध्यम ज्ञान विज्ञान, मध्यम विश और मध्यम उपकरणों वाले होते हैं ॥६६॥

बातस्तु रूक्ष- लघु - चल- बहुशीघ्र- शीत-परुष -विशदः । तस्य रौक्ष्याद्वावळा रूक्षापचिताल्पशरीराः, प्रततरूक्ष-क्षाम -भिन्न मन्द -सक्त- जर्जर-स्वराः, जागरूकाश्च भवन्ति । लघुत्वाच लघु-चपल -गति चेष्टाहारव्यवहाराः चलत्वादनवस्थित - सन्ध्यस्थि- हन्वोष्ठ-जिह्वा-शिरः स्कन्ध -पाणि -पादाः बहुत्वाद् बहुप्रलाप कण्डरा-सिरा -वितानाः । शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भ- क्षोभविकाराः, शीघ्रोत्रासरागविरागाः श्रुतमाहिणोऽल्पस्मृतयश्च । शैत्याच्छीतासहिष्णवः, प्रततशीतकोपकस्तम्भाः । पारुष्यात्परुष-केश- श्मश्रु -रोम -नस्त्र -वशन-बदन- पाणि-पादाङ्गाः । वैशद्यात्स्फुटिताङ्गावयवाः, सततसंधिशब्दगामिनश्च भवन्ति । त एवंगुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्प- बलाश्चाल्पायुषचाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाधन्याश्च भवन्ति ॥ १०० ॥

वायु - रूक्ष, लघु, चल, प्रमाणादि मेद से अनेक प्रकार की, शीघ्रकारी, शीत, परुष, विशद ( अपच्छिल ) होती है । वायु के रूक्ष होने से वात प्रकृति के मनुष्य भी रूक्ष, कृश, एवं छोटे शरीर वाले, निरन्तररूक्ष, क्षीण, फटे बांस के समान जर्जर, असंहत स्वर वाले, जागरणशीक ( थोड़ी नींद वाले ) होते हैं । लघु होने से शीघ्रकारी, अस्थिर गति, चेष्टा, आहार, व्यवहार वाले होते हैं । बात के चल होने से उनके भी सन्धि आँख भौं, इनु, जबाड़ा, ओठ, जीम, कंधा, हाथ-पाँव अस्थिर होते हैं । बहुत प्रकार का होने से, बहुत बोलने वाले, बहुत सिराओं के जाल वाले घीघ्रगामा होने से सब कामों में जल्दी करने वाले,

पृष्ठ 612

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५६४ चरकसंहिता [ अ० क्षोभ और मन के विकार वाले, जल्दी ही डरने वाले, स्नेह और द्वेष करने वाले, सुनते ही ग्रहण करने वाले, परन्तु स्मृति ( याददास्त ) के कच्चे होते हैं । शीतल होने से शीत को न सहन करने वाले, निरन्तर शीत, कम्प और उद्वेग तथा स्तम्भवृत्ति ( जड़ ) बने रहते हैं । कठोरता से कठिन केश, श्मश्रु, स्लोम, नख, दाँत, मुख, हाथ, पांव वाले होते हैं । वायु के विशद होने से उनके हाथ- पाँव फटते हैं, सन्धि बन्धनों में से निरन्तर शब्द निकला करता है, सन्धियाँ चलती रहती हैं, चैन से नहीं बैठते, कुछ न कुछ करते ही रहते हैं 1 इन गुणों के कारण वात प्रकृति के मनुष्य प्रायः अल्प बल, एल्प आयु, अल्पसंतान, अल्प साधन और अल्प धन वाले होते हैं ॥ १०० ॥

संसर्गात्संसृष्टलक्षणाः । सर्वगुणसमुदितास्तु समघातवः । इत्येवं प्रकृतितः परीक्षेत ॥ १०१ ॥

दोषों के मिश्रित होने से लक्षण भी मिले जुले होते हैं । सब गुणों के मिटने से समधातुप्रवृति के होते हैं । इस प्रकार प्रकृति से परीक्षा करनी चाहिये । १०१ । विकृतितश्चेति — विकृतिरुच्यते विकारः । तत्र विकारं हेतुदोष-- दूष्य- प्रकृति-देश-काल-बल-विशेषैलिंङ्गतश्च परीक्षेत न हान्तरेण हेत्वा-दीनां बलविशेषं व्याधिबलविशेषोपलब्धिः । यस्य हि व्याधेर्दोष- दूष्य- प्रकृति -देश -काल -बल-साम्यं भवति, महच्च हेतुलिङ्गबलं स व्याधिर्बल-वान भवति । तद्विपर्ययाच्चाल्पबलः, मध्यबलस्तु दोषादीनामन्यतम-सामान्याद्धेतुलिङ्ग मध्यबलत्वाच्चोपलभ्यते ॥ १०२ ॥

विकृति से परीक्षा करनी चाहिये । विकृति का अर्थ विकार है । धातुओं की विषमता का नाम 'विकार है । इसकी हेतु, दूष्य, (रक्त आदि), दोष ( बात आदि ), प्रकृति ( बात प्रकृति आदि ), देश, काल के बल तथा पूर्वरूप से परीक्षा करनी चाहिये । हेतु आदि के बल विशेष को जाने बिना रोग के विशेष बल का ज्ञान नहीं होता । जिस रोग में दोष, दूष्य, प्रकृति, देश, काल, समान होतथा हेतु और पूर्वरूप के लक्षण भी बलवान् हों, उस रोग को बलवान् समझना चाहिये । इस लिये यह असाध्य है । इनसे विपरीत हो तो निर्बल सम- झना चाहिये । जिस रोग में दोष दृष्य आदि में से कोई एक असमान हो, तथा हेतु और पूर्वरूप के लक्षण भी मध्यम बल हो तो उस रोग को मध्यम बल समझना चाहिये ॥ १०२॥

सारतचेति- साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुप- दिश्यन्ते । तथथा - त्वक्त- मांस - मेदोस्थि मज्ज-शुक्र- सरवानि ॥ १०३॥।

पृष्ठ 613

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अ०८] विमानस्थानम् ५६५ सार द्वारा परीक्षा करनी चाहिये - बल परिमाण को विशेष रूस से जानने के लिये पुरुषों में आठ प्रकार के सारों का उपदेश किया है, जैसे - त्वग्, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा, शुक्र और सरव ॥१०३॥

तत्रस्निग्ध- ण-मृदु- प्रसन्न -सूक्ष्माल्प- गम्भीर सुकुमार-लोमा सप्र- भेव च त्वक् त्वक्साराणाम्। सा सारता सुख- सौभाग्यैश्वर्योपभोग- बुद्धि- विद्यारोग्य - प्रहर्षणान्यायुश्चानित्वरमाचष्टे ॥ १०४ ॥

इनमें व सार वाले पुरुष की त्वचा स्निग्ध, चिकनी, मृदु, प्रसन्न, सूक्ष्म, अल्प, गम्भीर, कोमल लोमवाली और प्रभा ( कान्ति ) से युक्त होती है । इस प्रकार की सारता, सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य उपभंग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, प्रहर्ष और दीर्घ आयुष्य को बतलाती है ॥ १०४ ॥

कर्णा मुख-जिह्वा नासौ -पाणि -पादतल-नस ललाट मेहनंस्निग्ध रक्तं श्रीमत्भ्राजिष्णु रक्तसाराणाम् । सा सारता सुखमुद्यतां मेघां मनस्वि त्वं सौकुमार्यमनतिवलमक्ले शसहिष्णुत्व मुष्णासहिष्णुत्वं चाऽऽचप्रे १०५ रक्तसार वाले पुरुषों के कान, आंख, मुख, जिला, नाक, ओठ, हाथ, पांच के तलुवे, नख, मस्तक, लिंग स्निग्ध और रक्त वर्ण के, शोभा और दीति से युक्त होते हैं । इस प्रकार की रक्त-सारता, व्यक्ति के सुख, विपुल बुद्धि, भन-स्विता, सुकुमारता, मध्यम बल, क्लेश न सहन करने का स्वभाव और गर्मी न सह सकने की प्रकृति को बतलाता है ॥ १०५॥

शङ्ख- ललाट-कृकाटिकाक्षि-गण्ड-हनु प्रीवा-स्कन्धोदर -कक्ष-वक्षः-पाणि-पादसंघयः गुरुस्थिरमांसोपचिता मांससाराणाम् । सा सारता क्षमां धृति- मलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जवमारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे ॥ १०६॥

मांस-सार वाले पुरुषों में शंस ( कनवटी ), मस्तक, कूकाटिका ( घाट, गलपेंटी ), आंख, गण्डस्थल, टोड़ी, ग्रीवा, स्कन्ध, पेट, कांख, छाता, पत्र, हाथ तथा सन्धियां-स्थिर, गुरु और मांस से भरी होती हैं । यह मांस खारता क्षमा, धृति, निलमता, वित्त, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और दीर्घ आयु को बतलाती है ॥ १०६॥

वर्ण- स्वर- नेत्र -केश-लोम-नख- दन्तोष्ठ मूत्र- पुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदःसाराणाम | सासारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारो-पचारतां चाss चष्टे ॥ १०७ ॥

मेदःसार वाले पुरुषों में — वर्ण, स्वर, नेत्र, केश, लोभ, नख, दांत, ओठ, मूत्र, पुरीष और विशेष कर स्नेह ( चिकनाई ) होता है । यह सारता वित्त, ऐश्वर्य्य सुखकर उपभोग सरलता और सुकुमारता को बतलाती है ॥ १०७॥

पृष्ठ 614

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५६६ चरकसंहिता [ ro पार्किंग-गुल्फ-जान्वरनि-जत्रु-चिबुक- शिर: - पर्व-स्थूलाः स्थूलास्थि -नख- दन्ताश्चास्थिसाराः । ते महोत्साहाः क्रियावन्तः केशसदाः सार-स्थिर- शरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च ॥ १६८ ॥

अस्थिसार वाले पुरुषों में एडी, टखना, घुटना, कलाई, हंसली, चिबुक ( ठोड़ी ), शिर, पोरू ( पर्व ) मोटे होते हैं; नख, दांत और अस्थियां मोटी होती हैं । अस्थिसार वाले मनुष्य बड़े उत्साह वाले, क्रियावान्, क्लेश सहने वाले, सार के कारण स्थिर शरीर वाले और आयुष्मान् होते हैं ॥ १६८ ॥

तन्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूल- दीर्घ वृत्त-संघयश्च मज्ज-साराः । ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुत- वित्त- विज्ञानापत्य-संमान- भोजश्च भवन्ति ॥ १६६ ॥

मजाखारवाले पुरुष छोटे या मृदु अंगवाले बलवान्, स्निग्ध वर्ण और स्वर वाले, स्थूल, लम्बी, गोल सन्धिवाले होते हैं । ये पुरुष दीर्घायु, बलवान्, श्रुत-वान्, विज्ञानवान्, वित्तवान्, अपत्यवान् और संमानवान्, होते हैं ॥ १६६ ॥

सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणश्च क्षीरपूर्णलोचना इव प्रहर्षबहुलाः स्निग्ध- वृत्त- सार- समसंहत- शिखरि-दशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो महास्फिचश्च शुक्रसाराः । ते स्त्रीप्रियाः प्रियोपभोगा बलवन्तः सुखैश्वर्या- रोग्य-वित्त-संमानापत्य-भाजश्च भवन्ति ॥ ११० ॥

शुक्रसार वाले पुरुष सौम्यमूर्ति, सौम्य दृष्टि, देखने से ही तृप्त करने वाले, दूध से पूर्ण आंख वाले, अत्यन्त कामोत्तेजना वाले, स्निग्ध वृत्त वाले, सार- वान्, एक समान मिले अंगों और उन्नत दांतों वाले, प्रसन्नस्निग्ध वर्ण स्वर वाले; दीप्तिमान्, बड़े नितम्ब प्रदेश वाले होते हैं । ये पुरुष स्त्रियों के प्रिय, उपभोग को चाहने वाले, बलवान्, सुख, ऐश्वर्य, आरोग्यता, धन और संतान वाले होते हैं ॥ ११० ॥

स्मृतिमन्तो भक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्य तविषादाः स्ववस्थित गति गम्भीर-बुद्धि- चेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सरवसाराः । तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः ॥ १११ ॥

( ज) सार बाळे पुरुष-स्मृतिमान्, भक्तिमान्, कृतश, प्राश, शुचिस्वभाव, महोत्साही, दक्ष, धीर, लड़ाई में पराक्रम पूर्वक छड़ने वाले, शोकरहित, सुब्यवस्थित गति वाले, गम्भीर बुद्धि एवं चेशशीक शुभ कार्यों में

ध्यान लगाने वाले होते हैं । इनके लक्षणों से ही इनके गुण कह दिये है ॥ १११ ॥

पृष्ठ 615

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विमानस्थानम् ५६७ तत्र सर्वैः सारैरुपेताः पुरुषा भवन्त्यतिबलाः परमगौरवयुक्ताले-स्थिर-शसहा सर्वारम्भेष्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः समाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनाद-स्निग्ध -गम्भीर-महास्वराःप्रायस्तु-सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसंमानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः ल्यगुणविस्तीर्णापत्याश्चिरजीविनश्च भवन्ति ॥ ११२ ॥

[ इनमें सब सारों की विशेषता से बल प्रमाण तीन प्रकारआठों प्रकारका हैके। यथा— उत्तम, मध्यम और अधम । ] इनमें जो पुरुष उपरोक्तसुख से युक्त, क्लेशउत्तम सारों से युक्त होते हैं, वे अति बलवान्, अत्यन्त मन लगाने सहनेवाले, वालेस्थिर, सबऔर कार्योंसंहत मेंशरीरसमर्थवालेहोने, सुधीरसे प्रयत्नवानगतिवाले,, प्रतिध्वनिशुभ कार्योंसे मेंयुक्तकरनेस्निग्धवाले,, गम्भीर एव महान् स्वर वाले, सुख- ऐश्वर्य, विध, संमान का भोग बहुत अल्प जरा वाले, थोड़े रोग वाले, प्रायः अपने ही समान तुल्य गुण वाले, से चिरंजीवी वाले होते हैं ॥ ११२ ॥

ral विपरीतास्त्वसाराः ॥ ११३ ॥

इन उपरोक्त लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाले पुरुष सारहीन होते हैं ॥ ११३ ॥

मध्यानां मध्यैः सारविशेषैर्गुणविशेषा व्याख्याता भवन्ति इति।

साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलप्रमाणविशेषज्ञानार्थान्युपदिष्टानि भवन्ति॥ ११४

प्रवर और अवर के मध्यस्थ सार विशेषों से मध्यमसार के पुरुषसे बल-होते हैं । इस मध्यम सार से ही इनके गुण समझ लेने चाहियें । इस प्रकार प्रमाण को विशेष रूप में जानने के लिये इन सारों की व्याख्या कर दी है ॥ ११४॥

कथं नु शरीरमात्रदर्शनादेव भिषङ मुह्येदयमुपचितत्वाद् बलवान्, अयमल्पबलः कृशत्वात्, महाबलवानयं महाशरीरत्वात्, अयमल्पशरीर-, तत्र पिपी- त्वादल्पबल इति; दृश्यन्ते ह्यल्पशरीराः कृशाश्चैके बलवन्तः

लिकाभारहरणवत्सिद्धिः । अतश्च सारतः परीक्षेवेत्युक्तम् ॥११५ ॥

वैद्य केवळ शरीरमात्र के दर्शन से घोखा भी खा जाता है, भरा पूरा शरीर होने से यह बलवान् है, यह मनुष्य कृश होने से अल्पबलवाला है, इसका शरीर बड़ा है, इससे यह मनुष्य बड़ा भारी बलवान है । यह अल्प शरीर होने से अलाबलवाला है इत्यादि । परन्तु देखा जाता है कि अल्ल शरीर वाले और पतले दुबले व्यक्ति भी बलवान् होते हैं । जिस प्रकार चिउंटी अपने से तिगुने चौगुने बोझ को भी उठा लेती है, उसी प्रकार पतले व्यक्ति भी सार के कारण बलवान् होते हैं और वे अनेक कार्य कर लेते हैं । इस कारण सार से परीक्षा करनी चाहिये यह कहा है ॥ ११५॥

पृष्ठ 616

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चरकसंहिता [ अ० ८ wwwwwww... संहननतश्चेति -- संहननं संघातः संयोजनमित्ये कोऽर्थः । तत्र सम सुविभकास्थि -सुबद्धसंधि- सुनिविष्ट-मांस शोणितं सुसंहतं शरीरमित्युच्यते । तत्र सुसंहतशरीराः पुरुषा बलवन्तो विपर्ययेणाल्पबलाः, प्रबराबर- मध्यत्वात्संहननस्य मध्यबला भवन्ति ॥ ११६ ॥

संहनन अर्थात् शरीर की बनावट से भी परीक्षा करनी चाहिये । संहनन, संघात और संयोजन ये सब शब्द समानार्थक हैं । जिसकी अस्थियां सम अनुपात में विभक्त हों, सन्धियां खूब बंधी, मांस और रक्त अच्छी प्रकार से शरीर में भरा हो, उसको भी प्रकार से संहत शरीरवाला कहते हैं । सुसंहत शरीर वाले पुरुष बलवान् होते हैं । इसके विपरीत शरीर वाले पुरुष अहस बल, मध्य शरीर वाले पुरुष मध्यम बल होते हैं ॥ ११६ ॥

प्रमाणतश्चेति – शरीरप्रमाणं पुनर्यथास्वेनाङ्गुलिप्रमाणेनोपदेक्ष्यते उत्सेधविस्तारायामैर्यथाक्रमम् । तत्र पादौ चत्वारि षट् चतुर्दश चाङ्गुलानि, जंघे त्वष्टादशाङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, जानुनी चतुर- ङगुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, त्रिंशदङ्गुलपरिक्षेपात्रष्टादशाङ्गुलावूरू, गुदी वृषणावांगुलपरिणाहौ, शेकः पडंगुलदीर्घ पञ्चांगुल- परिणाहं, द्वादशांगुलपरिमितो भगः, षोडशांगुळविस्तारा कटी, दशांगु बस्तिशिरः, दशांगुलविस्तारं द्वादशांगुळमुदरं, दशांगुलविस्तीर्णे द्वादशां- गुलाया पार्श्वे, द्वादशांगुलविस्तारं स्वनान्तरं द्वथंगुलं स्तनपर्यन्तं, चतुर्विंशत्यंगुलविशालं द्वादशांगुलोत्सेधमुरः, द्वयंगुलं हृदयं, अष्टांगुलौ स्कन्धौ, षडंगुलावंसी, षोडशांगुली प्रवाहू, पञ्चदशांगुळे प्रपाणी, हस्तौ दशांगुली, कागुली, त्रिकं द्वादशांगुलोत्सेधं, अष्टादशांगुलो- त्वं पृष्ठं, चतुरंगुळा सेवा द्वाविंशत्यंगुलपरिणाहा शिरोधरा, द्वादश- गुलोत्सेधं चतुर्विंशत्यंगुलपरिणाहमाननं पञ्चांगुलमास्यं, चिबुकोष्ठ- कर्णाक्षिमध्यनासिका ललाटं चतुरंगुलं, षोडशांगुलोत्सेधं द्वात्रिंशदंगुल- परिणाहं शिरः - इति पृथक्त्वेनाङ्गावयवानां मानमुक्तम् । केवलं पुनः शरीरमंगुलिपर्वाणि चतुरशीतिस्तदायामविस्तारसमं समुच्यते । तत्राss- युबेलमोजः सुखमैश्वर्य वित्तमिष्टाश्चापरं भावा भवन्त्यायत्ताः प्रमाण- पति शरीरे, विपर्ययस्त्वतो होनेऽधिके वा ॥ ११७ ॥

प्रमाण द्वारा शरीर की परीक्षा करनी चाहिये । शरीर का प्रमाण प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंगुलियों से माप कर जानना चाहिये । उत्सेध ( ऊंचाई ), विस्तार ( व्यास, चोदाई ), आयाम लम्बाई ये क्रमानुसार कहेंगे । इनमें पांव

पृष्ठ 617

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अ० ८ ] विमानस्थानम् xεE की ऊंचाई ४, चौड़ाई ६ और लम्बाई चौदह अंगुल हो । टांगें ( घुटने से नीचे टखने तक का भाग ) लम्बाई में अट्ठारह अंगुल, घेर में १६ अंगु, घुटने लम्बाई में ४ अंगुल और घेर में १६ अंगूल, जांयें घेर में ३० अंतुर, लम्बाई १८ अंगुल, वृषण ६ अंगुल लम्बे और गोलाई में आठ अंगुरु, शिश्न ( लिंग ) छ अंगुल खम्बा ओर गोलाई में पांच अंगुल ( सुश्रुत में चार अंगुल ), भग ( स्त्रीगुह्यांग ) १२ अंगुर, कटो १६ अंगुरु चौड़ो, बस्ति का शिर ( मेंदू को जड़ से नाभि प्रदेश तक पंडू ) १० अंतुर लम्बा, नाभि से ऊपर और छाती से नांचे लम्बाई में पेट १२ अंगुल लम्बा और १० अगुरु चौड़ा, पार्श्व ( दोनों पार्श्व ) १० अंगुरु चौड़े और १२ अगुरु लम्बे, स्तनों के बीच का अन्तर १२ अंगुल चौड़ा, स्तनपान्त दो अंगुरु छाती १२ अंगुल ऊंची, २४ अंगुल चौड़ी, ( सुश्रुत में १८ अंगुल चोड़ों छाता कहो है, यहस्त्री की समझनी चाहिये ), हृदय दो अंगुरु, स्कन्ध में अंगुरु, भुजःसा ( अंस ) ६ अंगुल, प्रबाहू ( कंधे से नोचे कोनो तक का भाग ) १६ अंकुर, प्रमाणि ( कलाई से कोनो तक का भाग, प्रकोष्ठ ) १५ अंगुल, हाथ १० अंगुल ( उसमें भी मध्यम अंगुलि ५ अंक, प्रदेशिनी और अनामिका अंगुल, कनिष्ठा और अंगुष्ठ ३॥ अंगुरु ), दानों कक्षा अंगुल, त्रिक १२ अंगुल ऊंचा, पोठ १८ अंगुल ऊंच, ग्रावा ४ अंगुरु ऊंचा और घेरा २४ अंगुल, मुख ( मस्तक से ठोड़ी तक ) १२ अंगुल और २४ अंगुल घेर वाला, खुश मुख ५ अंगुल, चित्रक, ( दादा ) कान, आष्ठ, आंखों के बीच का मध्य भाग, नासिका और ललाट ये प्रत्येक चार अंगुल शिर १६ अंगुल लम्बा, ऊंचा आर -३२ अंगुल घेर वाला होता है । इस प्रकार से पृथक पृथक् अंगों का माप कह दिया है । सम्पूर्ण शरीर पांव से आरम्भ करके शिर तक सारा ८४ अंगुल होता है ( सुश्रुत में एक सो बीम अंगुल लम्बाई कहो है । यह परिमाण पांव की अप्र- अस्थि से लेकर हाथों को ऊंचे उठाये हुए पुत्र का समझना चाहिये ।) प्रमाण तीन प्रकार का है, सम, दीन और अधिक । इनमें जो शरीर लम्बाई और विस्तार में उपरोक्त कहे हुए प्रमाण के समान हो वह ' समप्रमाण' समझना चाहिये । इस प्रकार के समप्रमाण वाले शरीर में आयु, बल, ओज, सुख, ऐश्वर्य, धन और अन्य शुभ भाव रहते हैं । इस समपरिमाण से होन वा अधिक में ये गुण ( आयु आदि ) नहीं रहते ॥ ११७ ॥

सात्म्यतश्चेति सात्म्यं नाम तद्यत्सातत्येनोपयुज्यमानमुपशेते । -तत्र ये घृतश्वीर- तैल-मांस रस-सात्म्या सर्व रस खात्म्याश्च ते बलवन्तः

पृष्ठ 618

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६०० चरकसंहिता [ अ० = केशसाचिरजीविनश्च भवन्ति । रूक्षसात्म्याः पुनरेक -रस-सात्म्याश्च ये ते प्रायेणाल्पबलाक्ति शसहा अल्पायुषोऽल्पसाघनाश्च । व्यामिश्रसा म्यास्तु ये, ते मध्यबलाः सात्म्यनिमित्ततो भवन्ति ॥ ११८ ॥

सात्म्य से परीक्षा करनी चाहिये । जिसके निरन्तर अभ्यास से सुख मिलता है, उसको 'सात्म्य' कहते हैं । इसमें जो पुरुष घी, तेल, दूध, मांस रस का सेवन निरन्तर करते हैं तथा जिनको सब सात्म्य है, वे बलवान् क्लेश सहने वाले और दीर्घायु होते हैं । जिन पुरुषों की रूक्ष पदार्थ सात्म्य हैं और जो एक ही रस का अभ्यास करते हैं, वे पुरुष प्राय: करके अल्प-बल, थोड़ा कष्ट उठाने वाले, अल्पायु, अल्पक्रिया से गुजारा करने वाले होते है । प्रवर और अवर इस मिश्रित साम्य वाले पुरुष मध्य सारत्म्य के कारण मध्यम बल होते हैं । इसलिये मध्य क्लेश सहन करने वाले, मध्यमायु होते हैं ॥ ११८ ॥

सत्त्वतश्चेति सन्त्वमुच्यते मनः तच्छरीरस्य तन्त्रकमात्मसंयो-गात् । तत् त्रिविधं बलभेदेन -प्रवरं मध्यमवरं चेति । अतश्च प्रवर- मयावरश्वाश्च भवन्ति पुरुषाः । तत्र प्रवरसत्त्वाः स्वल्पाः, ते सारे- धूपदिष्टाः स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडा-स्वव्यमा दृश्यन्ते, सत्त्वगुणवैशेष्यात् । मध्यसत्त्वास्त्वपानात्मन्युपनि-घाय संस्तम्भयन्त्यात्मनाऽऽत्मानं परैर्वाऽपि संस्तभ्यन्ते; हीनसत्वास्तु नाऽऽत्मना, न च परैः सत्त्वबलं प्रति शक्यन्तं उपस्तम्भयितुं महाशरीरा हापि ते स्वल्पानामपि वेदनानामसहा दृश्यन्ते, संनिहित - भय -शोक- लोभ- मोह -माना रौद्र-भैरव - द्विष्ट -बीभत्स - विकृत - संकथास्वपि च पशुपुरुषमां- सशोणितानि चावेक्ष्य विषाद- वैवर्ण्य मूर्च्छन्माद-भ्रम- प्रपतनानामन्यत ममाप्नुवन्त्यथवा मरणमिति ॥ ११६ ॥

सव से परीक्षा करनी चाहिये । सत्व का अर्थ मन है । यह मन आत्मा के साथ मिलकर इस शरीर को ( इन्द्रियों को ) प्रेरित करता है । यह सत्व- संज्ञा वाला मन बल के भेद से प्रवर मध्य और अवर यह तीन प्रकार का है । इसलिये प्रवर सस्य ( शुद्ध ) मध्यम सत्त्व ( राजस ) और अवर सत्स्व (तामस) प्रकृति के मनुष्य होते हैं । इनमें प्रवर सत्त्वों का वर्णन 'सवसार' ओज के वर्णन में ( स्मृतिमान् आदि से ) कह दिया है । ये प्रवर सत्त्व वाले व्यक्ति छोटे शरीर के होने पर भी शारीरिक एवं आगन्तुज, बड़े रोगों में भी(तीव्र दर्दों में भी ) व्यथारहित दीखते हैं, बड़ी पीड़ा को भी कुछ नहीं मानते । इसका कारण सत्वगुण की अधिकता है । ये अपने आत्मा से ही अपने को सम्भाल

पृष्ठ 619

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अ०८ ] विमानस्थानम् ६०१ देते हैं । मध्यम खस्व पुरुष तीव्र वेदना को असहा देख कर वेदना में अपने को अपने आप रोकते हैं, अथवा दूसरे पुरुष इनको सम्भालते हैं । होन सत्व वाले पुरुष स्वयं अपने को सम्मान नहीं सकते और नहीं दूसरे इनको सम्भाल सकते हैं । ये हीनसत्त्व पुरुष बढ़े शरीर वाले होकर भी थोड़ी सी पीड़ा को भी सहन नहीं कर सकते । ये पुरुष भय, शोक, लोभ, मोह, अपमान, रौद्र, भैरव, द्विष्ट, बीन्स और विकृत कथाओं में, और पशु मनुष्य के मांस-रक्त आदि को देख कर विषाद, विवर्ण, मूर्च्छा, उन्माद, भ्रम, पतन इनमें से किसी एक के वश हो जाते हैं, अथवा मर जाते हैं ॥ ११६ ॥

आहारशक्तितश्चेति- आहारशक्तिरभ्यवहरणशक्त्या जरणशक्त्या च परीक्ष्या, बलायुषी ह्याहारायते ॥ १२० ॥

आहार शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये- आहार शक्ति की परीक्षा भोजन करने और उसको पचा लेने की शक्ति से करनी चाहिये । क्योंकि बल और आयु आहर के ही अधीन हैं ॥१२० ॥

व्यायामशक्तितश्चेति- व्यायामशक्तिरपि कर्मशक्तया परीक्ष्या कर्मशक्त्या धनुमीयते बलत्रैविध्यम् ॥ १२१ ॥

व्यायाम शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये व्यायाम शक्ति की परीक्षा शरीर में परिभ्रम उत्पन्न करने वाले कर्म से करनी चाहिये । कर्म शक्ति से तीनों प्रकार का प्रवर, मध्यम और अवर बल जाना जाता है ॥१२१ ॥

वयस्तश्चेति, कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था वयोऽभि- ते । तद्वयो यथास्थूलभेदेन त्रिविधं - बालं मध्यं जीर्णमिति । तत्र बालमपरिपक्कधातुमजातव्यञ्जनं सुकुमारमक्लेशसह संपूर्णबलं श्लेष्म-धातुप्रायमाषोडशवर्षं विवर्धमानधातुगुणं पुनः प्रायेणानवस्थितसत्त्व-मात्रिंशद्वर्षमुपदिष्टं, मध्यं पुनः समत्वागत -बल-वीर्य -पौरुष- पराक्रम-ग्रहण-धारण- स्मरण-वचन - विज्ञान सर्वधातु-गुणं बल स्थितमवस्थितसवम विशीर्यमाण धातु -गुणं पित्त धातु- प्रायमाषष्टिवर्षमुपदिष्टं अतः परं परि-हीयमानधात्विन्द्रिय -बल- वीर्य -पौरुष पराक्रम- ग्रहण-धारणस्मरण -वचन-विज्ञानं भ्रश्यमानधातुगुणं वातधातुप्रायं क्रमेण जीर्णमुच्यते आब- शतं वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन्काले । सन्ति पुनरधिको- वर्षशतजीविनो मनुष्याः । तेषां विकृतिवर्षैः प्रकृत्यादिबलविशेषै- रायुषो लक्षणता प्रमाणमुपलभ्य वयसखित्वं विभजेत् ॥ १२२ ॥

आयु से परीक्षा करनी चाहिये - विशेष कालपरिमाण की अपेक्षा से शरीर

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 620 का मूल पृष्ठ
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६०२ चरकसंहिता [ अ० ८ की अवस्था का नाम 'वय' कहा जाता है । यह वय अवस्था मेद से तांन प्रकार का है । ( १ ) बाळ, ( २ ) मध्य ओर ( ३ ) जीर्ण, इनमें वाक वय तोख वर्ष तक है । इसमें भी १६ वर्ष तक रस, रक आदि धातु अररिपक्क रहते हैं, दाढ़ी- मूंछ आदि लक्षण स्पष्ट नहीं होते, शरीर सुकुमार, क्लेश न सहने वाला, असम्पूर्ण बल वाला होता है । इस अवश्था में कफ धातु अधिक होता है । प्रायः करके मन अस्थिर, धातु लगातार बढ़ रहे होते हैं । मध्यम वय-तीस से ऊपर और ६० से नीचे तक की आयु है । बल, वीर्य, विक्रम, पौरुष, पराक्रम, अर्थ का ग्रहण, शब्द आदि का धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान, तथा सब धातुओं के गुण, समान अवस्था में पहुंचे होते हैं । इस समय ब स्थिर रहता है मन निश्चल होजाता है, धातुओं के गुण नष्ट नहीं होते, पित्त प्रधान रहता है । जीर्ण वय - ६० वर्ष से ऊपर और १०० वर्ष के बीच के समय को जीर्ण वय कहते हैं । इस समय में धातु, इन्द्रिय, बल, वीर्य, पोरुष, पराक्रम, ग्रहण, धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान एवं धातुओं के गुण क्रमशः क्षीण होरहे होते हैं । शरीर में वायु की प्रधानता रहती है । इसलिये इस अवस्था को जीर्ण अवस्था कहते हैं । इस काल में सो वर्ष से अधिक या कम जोने वाले पुरुष भी हैं । इन पुरुषों में विकृति को छोड़ कर अन्य प्रकृति आदि बल विशेष से तथा इन्द्रिय स्थान में और शरीर स्थान में कहे हुए लक्षणों से आयु का प्रमाण जान कर आयु के तीन विभाग करने चाहियें ॥। १२२॥ एवं प्रकृत्यादीनां विकृतिवर्ज्यानां भावानां प्रवरमध्यावरविभागेन वळविशेषं विभजेत । विकृतियत्रेविध्येन तु दोषबलं त्रिविधमनु- मीयते । ततो भवज्यस्य तीक्ष्णमृदुमध्यविभागेत त्रित्वं विभज्य यथा- दोषं भेषजयमत्रचारयेदिति ॥ १२३ ॥

इस प्रकार से विकृति को छोड़ कर प्रकृति से आरम्भ करके वय के अन्त तक कहे हुए गुणों से प्रवर, अवर और मध्य विभाग करके इसके अनुसार रोग के बल का प्रवर, अवर और मध्य विभाग करना चाहिये । विकृति बल के भी तीन विभाग करके उनसे दोषों के तीन प्रकार के बलों का अनुमान किया * सुश्रुत ने आयु का विभाग दोषों के संचय काल की दृष्टि से किया है । चरक में धातुओं की वृद्धि, साम्य और क्षय की दृष्टि से किया है, यह ध्यान रखना चाहिये