चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 71–80

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५३ - सिन्धुवारहरिद्रा- लेष्मातकामजिष्ठा इतिसुहादशेमानिसूक्ष्मैला-विषघ्नानिपालिन्दीभवन्ति -चन्दन-कतक-॥ ( १६शिरीष-) ॥ इति षट्कः कषायवर्गः ॥ [ ३ ॥ हरिद्रा ( हल्दी ), मंजिष्ठा ( मंजीर ) सुबहा (निशोथ ), सूक्ष्मैला ( छोटी इलायची ), पालिन्दी ( काली निशांथ), चन्दन (लाल चन्दन ), कतक ( निर्मली का जल को शोधन करने वाला फल ), शिरीप ( सिरस ), सिन्धुवार ( सम्भालु, निर्गुण्डी ), इलेष्मातक ( लिसाड़ा ), ये दस 'विपन्न' अर्थात् विषनाशक हैं । यह छ' से बना हुआ कपायवर्ग है । वीरण-शालि-पष्टिकेक्षुवालिका -दर्भ-कुश काश गुन्द्रेत्कट-कतृण-मूला- नीति दशेमानि स्तन्यजननानि भवन्ति ॥ ( १७ ) ॥ पष्टिक (साठी( चावलख ) ), शालिबालिका( हेमन्त( ऋतुख में), दर्भपकने( दामवाले)धान्य, कुशका(चावलकुशा )),, काश ( सरकण्डा ), गुन्द्रा ( होगला ) इत्कट, ( तृण विशेष ) कत्तृण ( रोहिष तृण ) ये दस ' स्तन्य- जनन' अर्थात् दूध बढ़ाने वाले हैं । इन में गिलोय को छोड़कर सब के मूल काम में लाने चाहिये ॥ पाठा महौषध- सुरदारु -मुस्त-मूर्वा गुडूची- वत्सक-फल-किराततिक्त- क-कटुरोहिणी-सारिवा इति दशेमानि स्तन्यशोधनानि भवन्ति ॥ ( १८ ) || पाठा ( पाल ), महौषध ( सोंट, नुरदारु ( देवदारु ), मुस्त ( नागर- मोथा ), मूर्वा ( मर बेल ), गुड़ची ( निलोय ), वत्सक फल ( इन्द्र जी ), किराततिक्तक ( चिरायता ), कटुरोहिणी ( कटुकी ), सारिवा ( अनन्त मूल) ये दस 'स्तन्यशोधन ' दूध को शुद्ध करने वाले हैं ॥ जीवकर्षभक काकोली- क्षीरकाकाली मुद्गपर्णी-मापपर्णी-मेदा-वृद्ध-रुहा-जटिला-कुलिङ्गा इति दर्शमानि शुक्रजननानि भवन्ति ॥ ( १६ )॥ जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीर काकाली, मुद्गपर्णी ( मूंगपर्णी ) माघ-पण ( उड़दपण ); मेदा, वृद्धरुहा ( शतावरी ), जटिला ( जटामांसी ), कुलिंग ( उटंगण ) ये दस 'शुक्रजनन' अर्थात् वीर्य खातु के वर्धक होते हैं । १. ( क ) जीवक ऋषभक, मेदा महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि वृद्धि इन के स्थान पर परिभाषा आदेश से, शतावरी, विदारीकन्द अश्वगन्धा और वाराही कन्द प्रयोग करने चाहियें । ( ख ) कुलिंगशब्द धन्व न्तरि निघन्टु में,' विष्किर' पक्षियों के लिये और सप्तार्थकों में दूर्वा के लिये आया है ।

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५४ चरकसंहिता [अ० ४ कुष्ठैलवालुक -कट्फल-समुद्रफेन -कदम्ब-निर्यासेतु -काण्डेक्ष्विक्षुरक- वसुकोशीराणीति दशेमानि शुक्रशोधनानि भवन्ति ॥ ( २० ) ॥ इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [ ४ ] ॥ कुट ( कूठ ), एलवालुक, कट्फल ( कायफल ), समुद्रफेन, कदम्ब निर्यास, इक्षु ( गन्ना ) काण्डे ( मोटा गन्ना ), इत्तुरक ( तालमखाना ); वमुक (चक- पुष्प ), और उशीर ( खस की जड़ ) ये दस 'शुक्रशोधन' अर्थात् वीर्य धातु को शुद्ध करने वाले हैं । यह चार का बना हुआ कपाय वर्ग है । मृद्वीका मधुक-मधुपर्णी -मेदा-विदारी-काकोली-क्षीरकाकोली- जीवक-जीवन्ती-शालपर्ण्य इति दशेमानि स्नेहोपगानि भवन्ति ॥ ( २१ ) ॥ मृद्वीका ( बड़ी दाख ), मधुक ( मुहटी ), मधुपर्णी ( गिलोय ), मेदा, विदारी (विदारीकन्द), काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, जीवन्ती, शालपर्णी ये दस ' स्नेहोपग' अर्थात् शरीर में कोमलता और चिकनाई उत्पन्न करनेमें सहायक हैं ॥ शोभाञ्जनकैरण्डार्क-वृश्वीर- पुनर्नवा यव-तिल-कुलत्थ-माप- बदरा- नीति दशेमानि स्वेदोपगानि भवन्ति ॥ ( २२ ) ॥ शोभांजन ( सहजन ), एरण्ड अर्क ( आक ), वृश्वीर (श्वेत पुनर्नवा ), पुनर्नवा (रक्त पुनर्नवा ), यब ( जी ), तिल, कुलत्थ ( कुलत्थी ), माप ( उड़द ), बदर ( झाड़ी के बेर ) ये दस ओपधियां 'स्वेदोपग' अर्थात् शरीर में पसीना लाने में सहायक हैं । मधु -मधुक कोविदार कर्बुदार- नीप विदुल बिम्बी- शणपुष्पी- सदा-पुष्पी-प्रत्यक्पुष्य इति दशेमानि वमनोपगानि भवन्ति ॥ ( २३) || मधु ( शहद ), मधुक ( मुलहट्टी ), कोविदार ( लाल कचनार ), कर्बुदार ( श्वेत कचनार ), नीप ( कदम्ब ); बिदुल ( जल वेतन ) बिम्बी ( कन्दरी ), शृणपुष्पी ( झनझनिया ), सदापुष्पी ( आक ), प्रत्यक् पुष्पी ( अपामार्ग, चिर-चिटा ) ये दस ' वमनोपग' अर्थात् वमन में मदद देती हैं ॥ द्राक्षा-काश्मर्य-परूषकाभयामलक -बिभीतक कुवल-बदर-कर्कन्धू-पी- नीति दशेमानि विरेचनोपगानि भवन्ति ॥ ( २४ ) ॥ द्राक्षा ( किशमिश ), काश्मर्य ( गम्भारी ), पुरूषक ( फालसा ), अभया ( जंगी हरड़ ), आमलक ( आंवला ), विभीतक ( बहेड़ा ), कुवल (बड़ा बेर), बदर ( वृक्ष का बेर ), कर्कन्धू ( शाडी का बेर ), पीलू ये दस 'विरेचनोपग' अर्थात् विरेचन में सहायक हैं ।

पृष्ठ 73

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५५ त्रिवृद् -बिल्व -पिप्पली-कुष्ठ- सर्षप-वचा- वत्सकफल- शतपुष्पा- मधुक-मदनफलानीति दशेमान्यास्थापनोपगानि भवन्ति ॥ ( २५ ) || त्रिवृत् ( निशोथ ), बिल्व ( बेलगिरी ), पिप्पली, कुष्ठ ( कूठ ), सर्पप ( सरसों ), वच, वत्सक फल ( इन्द्र जी ), शतपुष्पा ( सौंफ ), मधुक ( मुले-हठी ) मदनफल ( मैनफल ) ये दस ' आस्थापनोपग' अर्थात् रूक्ष बस्ति के लिये उपयोगीहैं । रास्ना- सुरदारु -बिल्व-मदन- शतपुष्पा वृश्वीर- पुनर्नवा श्वदंष्ट्राग्नि-मन्थ- योनाका इति दशेमान्यनुवासनोपगानि भवन्ति ॥ ( २६ ) || रास्ना, सुरदारु ( देवदारु ) बिल्व ( बेलगिरी ), मदन ( मैनफल ), शतपुष्पा ( सौंफ ), पृश्वीर (श्वेत पुनर्नवा), पुनर्नवा ( रक्त पुनर्नवा ). श्वदंष्ट्रा 'गांव ), अग्निमन्थ ( अरणी कीछाल ), श्यांनाक ( टेटूकी छाल ) ये दस 'अनुवासनोपग' अर्थात् स्नेहवन्ति के लिये उपयोगी हैं । ज्योतिष्मती-क्षयक-मरिच पिप्पलीविडङ्ग-शिग्रु सर्षपापामार्गतण्डुल-श्वेता महाश्वेता इति दशेमानि शिरोविरेचनापगानि भवन्ति ॥ ( २७) ॥

इति सप्तकः कषायवर्गः ॥ । [ ५ ] ॥

ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), क्षवक ( नकछिकनी ),मरिच, पिप्पली, विडंग ( वायविडंग ), शित्रु ( सहजन ), सर्पप ( सरसों ), अपामार्गतण्डुल ( चिरचिटे के चावल ), श्वेता ( अपराजिता श्वेत कोयला ), और महाश्वेता ( श्वेता का भेद ) ये दस 'शिरोविरेचनोपग' अर्थात् शिरोविरेचन के लिये उपयोगी हैं । यह सात का एक ' कषायवर्ग' हुआ । जम्बाम्रपल्लव- मातुलुङ्गाम्लबदर - दाडिम -यव -यष्टिकोशीर-मृल्लाजा इति दशेमानि छर्दिनिग्रहणानि भवन्ति ॥ ( २८ ) ॥ जम्बु ( जामुन ); और आम्र ( आम ), इनके पह्नव ( पत्ते ); मातुलुंग ( बिजोरिया-नींबू ), अम्ल बदर ( खट्टे बेर ), दाडिम ( अनार ), यव (जौ), यष्टिका ( मुलैठी ), उशीर ( खस ), मृत् ( सौराष्ट्र देश की मिट्टी ), और लाजा ( खीलें ) ये दस 'छर्दिनिग्रहण ' वमन को रोकती हैं । नागर- धन्वयासक मुस्त-पर्पटक चन्दन-किराततिक्तक- गुडूची -हीबे-रधान्यक-पटोलानीति दशेमानि-तृष्णानिग्रहणानि भवन्ति ॥ ( २६ ) । नागर ( सोंठ ), धन्वयांसक ( धमासा ), मुस्त ( नागरमोथा ), पर्पटक ( पित्तपापड़ा ), चन्दन ( लाल चन्दन ), किराततिक्तक ( चिरायता ), गुडूची

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५६ चरकसंहिता [ अ० ४ ( गिलोय ), हीबेर ( नेत्रवाला ), धान्यक ( धनिया ), पटोल ( परबल ) ये दस औषधियां ' तृष्णानिग्रहण' अर्थात् प्यास को रोकने वाली हैं । टी-पुष्करमूल-बदरबीज कण्टकारिका-बृहती- क्षरुहाभया-पिप्पली- दुरालभा- कुलीरशृङ्गच इति दशेमानि हिक्कानिग्रह्णानि भवन्ति ॥ ( ३० ) || इति त्रिकः कषायवर्गः ॥ [ ६ ] ॥ शटी ( कचूर ), पुष्करमूल ( पोहकरमूल ), बदरबीज ( वेर के बीज, गुठली ), कण्टकारिका ( छोटी कंटेरी ), बृहती ( बड़ी कंटेरी ), वृक्षरूहा ( बन्दा, यह एक पेड़ पर ही पौधा उत्पन्न हो जाता है ) अभया ( जंगी हरड़ ), पिप्पली, दुरालभा ( धमासा ), कुलीरशृंगी ( काकड़ा सींगी ) ये दस 'हिक्का- निग्रहण' अर्थात् हिचकी को शमन करती हैं | यह तीन से बना हुआ कषाय वर्ग है । प्रियङ्ग्वनन्ताम्रास्थि- कट्वङ्ग- लोध्र-मोचरस समङ्गा-घातकीपुष्प-पद्मा पद्मकेशराणीति दशेमानि पुरीपसंग्रहणीयानि भवन्ति ॥ ( ३१) || प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ), अनन्ता ( अनन्तमूल ), आम्रास्थि ( आम की गुठली ), कट्वेंग ( श्यांनाक की छाल ), लोध्र (पटानी लोध), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), समंगा ( मंजोट ) घातकी पुप्प ( धाय के फूल ), पद्मा ( भाग ), पद्मकेशर ( कमल का केशर),यह दस ' पुरीपसंग्रहण ' अर्थात् मलको रोकनेवाले हैं ॥ जम्बु-शल्लकीत्वकच्छुरा मधुक -शाल्मली श्रीवेष्टक-शृष्टमृत्पयस्योत्पल-तिलकणा इति दशेमानि पुरीषविरजनीयानि भवन्ति ॥ ( ३२ ) ॥ जम्बु ( जामुन ), शल्लकीत्वक् ( कुन्दुरु की छाल ), कच्छुरा ( कीच या धमासा ), मधुक (मुलेठी ), शाल्मली (सिम्बल का गोंद ), श्रीवेष्टक (विरौजा) भृष्टमृत् ( अग्नि के जलाने से जली हुई मिट्टी, चूल्हे की मिट्टी ), पयस्या ( बिदारी कन्द ), उत्पल ( नील कमल ), तिल कण ये दस 'पुरीषविरजनीय' अर्थात् मल के दूषित रंग को बदलने वाले हैं ॥ जम्ब्वाम्र- प्लक्ष- वट-कपीतनोदुम्बराश्वत्थ- भल्लातकाइमन्तक- सोम-amar इति दशेमानि मूत्रसंग्रहणीयानि भवन्ति । ( ३३ ) ॥ जम्बु ( जामुन ), आम्र (आम), प्लक्ष ( पिलखन ), वट ( बड़ ), कपीतन (पारस पीपल), उदुम्बर ( गूलर ), अश्वत्थ (पीपल), भल्लातक (भिलावा ), अश्म-न्तक, सोमवल्क (खैर सफेद ) ये दस ' मूत्र -संग्रहण' अर्थात् मूत्र को कम करते हैं । पद्मोत्पल-नलिन- कुमुद सौगन्धिक-पुण्डरीक-शतपत्र मधुक- प्रियङ्ग-धातकीपुष्पाणीति दशेमानि मूत्रविरजनीयानि भवन्ति ॥ ( ३४ ) ।

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अ० ४ सूत्रस्थानम् ५७ पद्म ( कमल ), उत्पल ( नीला कमल ), नलिन, कुमुद, सौगन्धिक (कमल का एक भेद), पुण्डरीक ( श्वेत कमल ), शतपत्र, मधुक ( मुलैहटी ), प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ) धातकीपुष्प ( धाय के फूल ) ये दस 'मूत्र-विरजनीय' अर्थात् मूत्र में रंग लाते हैं, और दूषित रंग की प्राकृत रूप में लाते हैं ॥ वृक्षादनीश्वावसुकवशिर-पाणणभेद -दर्भ-कुश काश- गुन्द्रेत्कट- मूलानीति दशेमानि मूत्रविरेचनीयानि भवन्ति ॥ ( ३५ ) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ ७ ] ॥ वृक्षादनी ( बन्दार्क ), श्वदंष्ट्रा ( गोखरू ), वसुक ( पुनर्नवा ), वशिर (चिरचिटा), पाषाणभेद. दर्भमूलानि (दान ), कुश ( कुशा), काश (सरकन्डा ), गुन्द्रा ( दोगला ), इत्कट ( ईकड़ी ), इकड का मूल ' मूत्र-विरेचनीय ' अर्थात् मूत्र बढ़ाने वाले हैं । यह पांच से बना कपाच वर्ग है । द्राक्षाभयामलक-पिप्पली-दुरालभा-शृङ्गी-कण्टकारिका-वृवीर पुनर्न- वा तामलक्य इति दशमानि का सहराणि भवन्ति । ( ३६ ) ॥ द्राक्षा ( किशमिश ), अनया ( जंगी हरड़, आमलक (आंवला), दिपली, दुरालभा ( धमासा ), श्रृङ्गी ( काकड़ासिंगी, कण्टकारिका ( छोटी कंटेरी ), वृश्वीर ( श्वेत पुनर्नवा ), पुनर्नवा (रक्त पुनर्नवा ), तामलकी, ( भूई उरांवता ) ये दस 'कासहर' अर्थात् खांसी को शान्त करते हैं ॥ टी- पुष्कर मूलाम्लवेतसैला-हिङ्ग्वगुरु-सुरसा तामलकी-जीवन्ती- चण्डा इति दशेमानि श्वासहराणि भवन्ति ॥ ( ३७ ) शो ( कचूर ), पुष्करमूल ( पोहकरमूल ), अम्लवेतस, एला (छोटी इला- यची ), हिंगु ( हींग ), अगुरु ( अगर ), सुरसा ( तुलसी ), तामलकी ( भूम्यामलकी ), जीवन्ती, चण्डा ( चोख ) ये दस 'श्वासहर' अर्थात् श्वास रोग के नाशक हैं । पाटलाग्निमन्थ-बिल्व -इयोनाक- काश्मर्य- कण्टकारिका-बृहती शालप- -पृश्निपर्णीगोक्षुरका इति दशेमानि शोथहरराणि भवन्ति ॥ ( ३८ ) | पाटला ( पाढ़ल ), अग्निमन्थ ( अरणी ), बिल्व ( बेलगिरी ), श्योनाक ( टेंटु ), काश्मर्य ( गम्भारी ), कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ), शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गांतुरक ( गोखरू ), ये दस 'शोथहर' अर्थात् सूजन कम करते हैं ॥

पृष्ठ 76

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५८ चरकसंहिता [ अ० ४ सारिवा शर्करा- पाठा -मञ्जिष्ठाद्राक्षा-पील-5 परूषकाभयामलक-बिभी-तकानीति दशेमानि ज्वरहराणि भवन्ति ॥ ( ३ ९ ) ॥ सारिवा ( अनन्तमूल ), शर्करा ( मिश्री ), पाठा ( पाल ), मंजिष्ठा ( मजीठ ), द्राक्षा ( किशमिश ), पीलु, परूपक ( फालसा ), अभया ( बड़ी हरड़ ), आमलकी ( आंवला ), चिमांतक ( बहेड़ा ) ये दस 'ज्वरहर' अर्थात् ज्वर नाशक हैं ॥ द्राक्षा-खर्जूर- पियाल- बदर- दाडिम फल्गु-परूपकेक्षु - यव -यष्टिका इति दशेमानि श्रमहराणि भवन्ति ॥ ( ४० ) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ ८ ] ॥ द्राक्षा ( किशमिश ), खजूर ( पिण्डखजूर ), पियाल (प्याल चिरौंजी फल), बदर ( वेर ), दाडिम ( अनार ), फल्गु ( अंजीर ), पल्पक ( फालसा ), इक्षु ( ख ), यत्र (जौ ), यष्टिक ( साठीचावल ) ये दस 'श्रमहर' अर्थात् थका-वट को मिटाते हैं । यह पांच में बना 'कपायवर्ग' है । लाजा-चन्दन- काश्मर्यफल- मधुक-शर्करा नीलोत्पलशीर-सारिवा-गु- ची-हीराणीति दर्शनानि दाहप्रशमनानि भवन्ति ॥( ४१ ) ॥ लाजा ( खील ), चन्दन ( श्वेत चन्दन ), काश्मर्य-फल ( गम्भारी फल ) मधुक ( मुलहठी ), शर्करा ( मिश्री ), नीलोत्पल (नीला कमल), उशीर (खस) सारिवा ( अनन्तमूल ), गुडूची ( गिलोय ), हीबेर ( नेत्रत्राला ) ये दस 'दाह- प्रशमन' अर्थात्जलन कम करते हैं । तगरागुरु-धान्यक- शृङ्गवेर-भूतीक-वचा-कण्टकारिकाग्निमन्थ -इयो-नाक-पिप्पल्य इति दशेमानि शीतप्रशमनानि भवन्ति 3 ( ४२) || तगर, अगुरु ( अगर ), धान्यक ( धनिया ), शृङ्गवेर ( सोंठ ), भूतीक ( अजवायन ), वचा, कण्टकारिका (छोटी कटेरी) अग्निमन्थ ( अरणी), श्यांनाक ( टेंटु ), और, पिप्पली, ये दस 'शीत शप्रशमन ' अर्थात् शांतनाशक हैं ॥ तिन्दुक- पियाल -बदर-खदिर- कदर- सप्तपर्णाश्वकर्णार्जनासनारिमेदा इति दशेमान्युदर्दप्रशमनानि भवन्ति ॥ ( ४३ ) ॥ तिन्दुक ( तेंदू), पियाल ( चिरौंजी का फल ), बदर (बेर), खदिर (खैर), कदर ( सफेद खैर ' ), सप्तपर्ण ( सातवन ) अश्वकर्ण ( साल ), अर्जुन, असन १. कदर-— 'सोमवल्कस्तु रोठायांकदरे कृष्णगर्भके ' । घ ० निघण्टु ।

पृष्ठ 77

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५६ ( पीतसाल ), अरिमेद ( विट्खदिर इरिमेद ), ये दस 'उदर्द' अर्थात् शीतपित्त रोगको शान्त करते हैं ॥ विदारीगन्धा-पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिकैरण्ड -काकोली-चन्दनो-शीरैला-मधुकानीति दशेमान्यङ्गमर्दप्रशमनानि भवन्ति ॥ ( ४४ ) । विदारीगन्धा ( शालपर्णी ), पृश्निपर्णी ( पिठवन ), बृहती ( बड़ी कंटेरी ) कण्टकारिका ( छोटी कंटेरी ) एरण्ड, काकोली, चन्दन ( लाल चन्दन ), उशीर ( खस ), एला, ( छोटी इलायची ), मधुक ( मुलहठी ), ये दस 'अंगमर्द-प्रश मन' अर्थात् अंगों के टूटने की बेचैनी को मिटाते हैं ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूल- चव्य-चित्रक- शृङ्गवेर- मरिचाजमोदाजगन्धाजा-जी-गण्डीराणीति दर्शनानि शूलप्रशमनानि भवन्ति ॥ ( ४५) || इति पञ्चकः कपयः ॥ [ [ ] ॥ पिप्पली, पिप्पली-मूल, चव्य ( चविका ), चित्रक ( चातामूल ), शृंङ्कबेर (सांट), मरिच, अजमोदा (अजवायन), अजगन्धा (इकु), अजाजी ( जीरा ), गंडीर ये दस ‘ शूळप्रशमन' अर्थात् तीव्र पीड़ा के नाशक हैं | यह पांच का एक 'कपाय वर्ग' होता है । मधु-मधुक-रुधिर- मोचरस-मृत्कपाल-लोध-गैरिक-प्रियङ्गु-शर्करा-लाजा इति दशेमानि शोणित-स्थापनानि भवन्ति ॥ (४१) ॥ मधु ( शहद ), मधुक ( मुलैहटी ), रुधिर ( केशर ), मोचरस ( सिम्बल का गोद ), पृत्कपाल ( मिट्टी का ठीकरा ), लोध्र ( पठानी लोध ),गैरिक (गेरू), प्रियंगु (फूल प्रियंगु ), शर्करा ( मिश्री), लाजा ( खीलें ) ये दश 'शोणित -स्थापन' अर्थात् रक्तरोधक वा बहते खून को रोकने वाले हैं ॥ शाल-कट्फल-कदम्ब -पद्मक तुङ्ग -मोचरस -शिरीष व जुलैलवालुका-शोका इति दशेमानि वेदनास्थापनानि भवन्ति ॥ ( ४७ ) ॥ शाल ( साल ), कट्फल ( कायफल ), कदम्ब, पद्मक (पद्माख ), तुंग (नाग केशर ) मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), शिरष ( >सिरस ), वंजुल ( जलवेतस ), एलवालुक, अशोक ये दस ' वेदनास्थापन' अर्थात् तीव्र वेदना को कम करते हैं । हिङ्गु- कैडर्यारिमेद- वचा-चोरक-वयःस्था-गोलामी- जटिला-पलङ्कषाशो-करोहिण्य इति दशेमानि संज्ञास्थापनानि भवन्ति ॥ ( ४८) ॥ हिंगु ( हींग ), कैडर्य ( नीम ). अरिमेद ( रेवां ), वच, चोरक, वयस्था १. विट्खदिर- इस खैर से बदबू आती है । २ तुझ के स्थान पर तुम्ब पाठ होने पर तेजवल लेना चाहिये!

पृष्ठ 78

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६० चरकसंहिता [अ० ४ ( ब्राह्मी ), गोलोमी ( वच या दूर्वा ), जटिला (जटामांसी ), पलंकपा (गुग्गुलु), अशोकरोहिणी (कुटकी) ये दस ' संज्ञा स्थापन' अर्थात् संज्ञा उत्पन्न करते हैं । ऐन्द्री ब्राह्मी-शतवीर्या -सहस्रवीर्यामोघान्यथा- शिवारिष्टा वाट्यपुष्पी- विष्वक्सेनकान्ता इति दशेमानि प्रजास्थापनानि भवन्ति ॥ ( ४६ )॥ ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या ((शतावरी1)),, सहस्रवीय ( महाशतावरी ),अमोघा ( आंवला ), अव्यथा ( गिलोय ), शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कुटकी ), वाट्यपुष्पी ( खरैटी ), विष्वक्सेनकान्ता ( प्रियंगु ) ये दस 'प्रजास्थापन' अर्थात् संतति जनक हैं । अमृताभया-धात्रीमुक्ता श्वेता- जीवन्त्यतिरसा-मण्डूकपर्णी-स्थिरा- पुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति ॥ ( ५० ) || इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ १० ] ॥ अमृता ( गिलोय ), अभया ( हरड़ ), धात्री ( आंवला ), नुक्ता ( रास्ना ), श्वेता ( अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी, मण्डूकपर्णी स्थिरा ( शालपर्णी ), और पुनर्नवा ये दस औषधि ' वयः स्थापन' अर्थात् वय को टिकाती है । यह पाँच से बना हुआ कपाय वर्ग है । इति पञ्चकपायशतान्यभिसमस्य पञ्चाशन्महाकषायाः, महतां च कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थं व्याख्याता भवन्ति ॥ १४॥

इस प्रकार से ( प्रत्येक द्रव्य के गिनने से ) पांचसौ ( ५०० ) कपाय पूर्ण हो जाते हैं, एवं पचास ( ५० ) 'महाकषाय' भी हो जाते हैं । इन कपायों के लक्षण उदाहरण भी कह दिये गये हैं ॥ १४ ॥

न हि विस्तरस्य प्रमाणमस्ति न चाप्यतिसंक्षेपोऽल्पबुद्धीनां साम- र्थ्यायोपकल्पते,तस्मादनति संक्षेपेणानतिविस्तरेण चोपदिष्टाः । एतावन्तो मल्पबुद्धीनां व्यवहाराय बुद्धिमतां च स्वालक्षण्यानुमानयुक्तिकुश- लानामनुक्तार्थज्ञानायेति ॥ १५ ॥

फैलाव की सीमा नहीं है और बहुत थोड़े में कहे हुए अर्थ को थोड़ी बुद्धि वाले नहीं समझ सकते । इसलिये न तो बहुत संक्षेप में और न बहुत विस्तार से यहाँ कहा है । यहां पर जितना भी कहा है वह थोड़ी बुद्धिवालों के व्यवहार चलाने के लिये है ओर जो लक्षण अनुमान, युक्ति में निपुण हैं, उन बुद्धिमानों के लिये न कहे हुए अर्थ को जानने के लिये सहायक होगा ॥ १५॥

एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच -नैतानि भगवन्!

पृष्ठ 79

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अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ६१ पचकषायशतानि पूर्यन्ते तानि तानि वाङ्गानि संप्रवन्ते तेषु तेषु

महापाविति । १६ ॥

इस प्रकार से कहते हुए ' भगवान् आत्रेय' के प्रति अग्निवेश बांदे भगवन्! ये पांच सौ कपाय पूरे नहीं होते । क्योंकि वे ही द्रव्य उन उन महा कषायों में बार-बार आते हैं । अर्थात् एक द्रव्य भिन्न २ कषायों में बार-बार आता है । इस प्रकार से ५०० कपाय पूरे नहीं हो सकते ॥ १६ ॥

तमुवाच भगवानात्रेयः -नैतदेवं बुद्धिमता द्रष्टव्यमग्निवेश! एकोऽपि नेकां संज्ञां लभते कार्यान्तराणि कुर्वन् । तद्यथा-पुरुषो बहूनां कर्मणां करणे समर्थो भवति । स यद्यत्कर्म करोति तस्य तस्य कर्मणः कर्तृकरणकार्य संप्रयुक्तं तत्तद्गौणं नामविशेषं प्राप्नोति तद्व-दौषधद्रव्यमपि द्रष्टव्यम् । यदि त्वेकमेव किंचिद् द्रव्यमासाद्यामस्तथा- गुणयुक्तं यत्सर्वकर्मणां करणे समर्थं स्यात् कस्ततोऽन्यदिच्छेदुपधारयि- तुमुपदेष्टुं वा शिष्येभ्य इति ॥ १७ । नवेश के प्रति भगवान् आत्रेय बोले हे अग्निवेश! बुद्धिमान् व्यक्ति को इस प्रकार से नहीं देखना चाहिये । एक द्रव्य भी दूसरे २ काम करता हुआ भिन्न २ संज्ञा वाला हो जाता है । जिस प्रकार एक पुरुष बहुत से काम करने में समर्थ होता है । वह जो जो भी काम करता है, वह उस कर्म के वह कत्ता, करण (साधन) और कार्य के अनुसार वह गुणवाले नाम विशेष को प्राप्त होता है । इस प्रकार से औषध द्रव्य को भी कार्य साधन और कत्तो आदि दृष्टि से देखना चाहिये । और यदि किसी ऐसे एक ही द्रव्य की प्राप्त करलें, जो द्रव्य सब काम करने में समर्थ हो,तो फिर कौन दूसरी औषध को पास में रखने अथवा शिष्यों को उपदेश करनेके लिये झंझट करे, इसलिये काम करने में समर्थ शक्ति वाला ऐसा कोई एक द्रव्य नहीं है ॥ १७॥

तत्र श्लोकाः ।

यतो यावन्ति द्रव्येविरेचनशतानि षट्।

उक्तानि संग्रहेणेह तथवेषां षडाश्रयाः ॥ १८ ॥

रसा लवणवर्ज्याश्च कषाय इति संज्ञिताः ।

तस्मात्पञ्चविधा योनिः कषायाणामुदाहृता ॥ १६ ॥

तथा कल्पनमप्येषामुक्तं पञ्चविधं पुनः ।

महतां च कषायाणां पञ्चात्परिकीर्तिताः ॥ २० ॥

पञ्च चापि कषायाणां शतान्युक्तानि भागशः ।

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
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६२ चरकसंहिता [अ०५ लक्षणार्थं, प्रमाणं हि विस्तरस्य न विद्यते ॥ २१ ॥

न चालमतिसंक्षेपः सामर्थ्यायोपकल्पते ।

अल्पबुद्धेरयं तस्मान्नातिसंक्षेपविस्तरः ॥ २२ ॥

मन्दानां व्यवहाराय बुधानां बुद्धिवृद्धये ।

पञ्चाशत्को ह्ययं वर्गः कषायाणामुद्दाहृतः ॥ २३ ॥

तेषां कर्मसु बाह्येषु योगमाभ्यन्तरेषु च ।

संयोगं च प्रयोगं च यो वेद स भिपग्वरः ॥ २४ ॥

इस विषय में श्लोक हैं- जिन द्रव्यों में से (छः सौ) विरेचन योग होते हैं वे एवं विरेचन योगों के छः आश्रय भी संक्षेप से कह दिये हैं । लवण ( नमक ) को छोड़कर शेष पांच रसांकी 'कपाय' संज्ञा है । इसलिये कषायों की पांच प्रकार की योनि कही है । एवं इन पांच कपायों की पांच प्रकार की कल्पना ( बनावट ) भी कह दी है और पचास प्रकार के 'महाकपाय' कहे हैं । कषायों के पांच सौ प्रकार भी दिग्दर्शन के लिये, नतो बहुत विस्तार से और न बहुत संक्षेप में कहे हैं । वे थोड़ी बुद्धि वालों को काम देने के लिये पर्याप्त हैं । इसलिये न विस्तार किया है और न बहुत संक्षेप मन्द बुद्धिवाले व्यवहार का, चला सकें, और बुद्धिमान् की प्रतिमा बढ़ाने के लिये पांच सौ कषायों का वर्ग कह दिया । इन कपायों का बाह्य कम था आभ्यन्तर प्रयोगमं संयोग, और प्रयोग (योजना) कोओ जानता है यह उत्तम वंद्य है । १८-२४॥ इत्यग्निवेशकृतं तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्कं विरंचनशताश्रितयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

इति भेषजचतुष्कः ॥ १ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः ।

अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

१-बाह्य प्रयोग प्रलेप आदि में, अन्तःप्रयोग वमन आदि कार्यों में स्वस्थ एवं आतुर दोनों व्यक्तियों के लिये करने में समर्थ एवं संयोग मिश्रण अयोगिक, हानिकारक अनुचित औषधियों को योग में से निकाल देना एवं उचित को न कहने पर भी मिश्रण करना, प्रयोग देश, काल, प्रकृति, व्याधि, रोगी, बल आदि की देख कर योजना करना जो जानता है, वही उत्तम वैद्य है ।