चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 81–90

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ६३ भेपज चतुष्क कहने के अनन्तर 'मात्राशितीय अध्याय की व्याख्या करेंगे । इस प्रकार भगवानात्रेय ने कहा है ॥१-२॥ मात्राशी स्यात् । आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी । यावद्धपस्या-शनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं यथाकालं जरां गच्छति तावदस्य मात्रा-प्रमाणं वेदितव्यं भवति || ३ || मात्रा में आहार करने वाला होना चाहिये । आहार की मात्रा जाटर अग्नि के बल की अपेक्षा करती है । जितना स्वाया हुआ भोजन मनुष्य की

प्रकृति, स्वास्थ्य को नुक्सान न पहुंचा कर ठीक समय में जीर्ण हो जाता है ।

भोजन की उतनी मात्रा जाननी चाहिये ॥ ३ ॥

तत्र शालि-पटक मुद्गलावपिखलेग- शश-दारभास्वरादीन्या-हार-द्रव्याणि प्रकृतिलघून्याप मात्रापेक्षाणि भवन्ति, तथा वि -क्षीर-विकृति-तिल-मापानूपादक पिशितादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिगुरूण्यणि मात्रामेवापेक्षन्ते ॥ ४ ॥

क्योंकि ( शाल ), हैमन्तिक धान्य, ( पटिक) गाठीचावल ( मुद्ग ), मूंग, ( लाव ) चटेर, ( कपिल ) तांतर ( एण ) काला मृग, ( शश ) खरगोश, १. आहार चार प्रकार का है । यथा मध्य चाप्य, टेल और पेय । भक्ष्य रोटी आदि, चोप्य चूसने योग्य, लेहा चाटने योग्य और पेय पानी आदि द्रव । एक ही मनुष्य की शांक्त सदा एक समान नहीं रहती । योवनावस्था में जितनी जाराग्नि समर्थ होती है, उतनी बाल्यावस्था या वृद्धावस्था मे नहीं होती । इसी प्रकार हेमन्त ऋतु में जितना अग्नि प्रबल रहती है उतनी वर्षा में नहीं रहती । इस लिये प्रत्येक समय के लिये एक मात्रा एक व्यक्ति के लिये भी निश्चित करना असम्भव है, फिर सब के लिये सामान्य रूप से मात्रा निश्चित करना तो और भी असम्भव है । इसलिये 'मात्रा' का निर्णय प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर ही छोड़ दिया है! २ (क)-'यथाकालं -प्रातःकाल का भोजन सायंकाल तक और सायंकाल का भोजन प्रातः कालतक जीर्ण हो जाये । क्योंकि हमारे यहां दो ही समय

भोजन का विधान है । यथा- "सायं प्रातर्मनुष्याणां भोजनं विधिनिर्मितम् ।

नान्तरे भोजनं कुर्य्याद् अग्निहोत्रसमा विधिः ॥” सर्वांगसुन्दरी टीका ॥

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६४ चरकसंहिता [अ०५ ( शरभ ) बड़े सींगों वाला पाढ़ा हरिण, ( शम्बर ) हरिण साबर आदि आहार द्रव्य स्वभाव से लघु होने पर भी मात्रा की अपेक्षा करते हैं । इसी प्रकार ( पिष्ट ) पिट्टी से बनी हुई वस्तुएं ( इक्षु ) गुड़ खांद आदिसे बनी; ( क्षीर विकृति ) दूध, मावे आदि से बनी तिल, ( मात्र ) उड़द, (आनूपौदक पिशित ) अर्थात् जल प्रदेश में या जल के अन्दर रहने वाले प्राणियों का मांस आदि आहार द्रव्य स्वभाव से ही भारी हैं । ये सब भी मात्रा की ही अपेक्षा करते हैं ॥ ४ ॥

न चैवमुक्ते द्रव्ये गुरुलाघवमकारणं मन्येत । लघूनि हि द्रव्याणि वाय्वग्नि -गुण-बहुलानि भवन्ति, पृथिवी- सोम -गुण-बहुलानीतराणि; तस्मात्स्वगुणादपि लघून्यग्नि-संधुक्षण-स्वभावान्यल्प-दोषाणि चोच्य न्तेऽपि सौहित्योपयुक्तानि, गुरूणि पुनर्नाग्नि-संधुक्षण-स्वभावान्यसामा- न्यात्, अतश्चातिमात्रं दोषवन्ति सौहित्योपयुक्तान्यन्यत्र व्यायामाग्नि- बलान्; संषा भवत्यग्निबलापेक्षिणी मात्रा || ५ || शालि, सांठी आदि पदार्थ बिना मात्रा में खाने मे अहितकर हैं और पीडी गुड़ आदि से बने पदार्थ मात्रा में खाने से हितकर होते हैं. यदि मात्रा की ही अपेक्षा से ये हितकर या अहितकर होते हो, तो द्रव्यों का गुरु एवं लघुगुण- (ख) - मनुष्य की प्रकृति के ऊपर मात्रा का निर्णय रखने से विषम और तीक्ष्ण अग्निवाले व्यक्ति भी अपनी भोजन की मात्रा स्वयं निश्चय कर सकते हैं । तीक्ष्ण अग्नि वाले को इतना भोजन करना चाहिन जो कि ठीक समय ने जीर्ण हो जाये, इसी प्रकार विषम अग्नि वाले भी ठीक समय में जीर्ण हो सके ऐसा भजन करें, यही उनकी मात्रा है । (ग )-'प्रकृतिमनुपहत्य' -भांजन से कुक्षि का पीड़न न होना, हृदय का न रुकना, पाश्वों का न फूलना, पेट का न तनना या भारी न होना, श्वास में कठिनाई का न होना. भूख प्यास की शान्ति, उठने बैठने, चलने फिरने, लेटने या बात- चीत में हल्कापन अथवा नुख की प्रतीति होना ही प्रकृति है । देखिये विमानस्थान अध्याय २ । १. एक पदार्थ लघु होता हुआ भी अधिक मात्रा में खाने से 'गुरु' हो जाता है । इसी प्रकार गुरु पदार्थ थोड़ा खाने से 'लघु' हो जाता है । २. मात्रा के साथ ' संस्कार' रांधने की विधि से भी लघु पदार्थ गुरु और गुरु पदार्थ लघु बन जाते हैं ।

पृष्ठ 83

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अ० ५ ] ५ सूत्रस्थानम् ६५ सम्बन्धी ज्ञान करना व्यर्थ है? ऐसा नहीं, क्योंकि द्रव्यों का गुरु या लघु होना भी अकारण या निष्प्रयोजन नहीं है । वायु और अग्नि के गुणों की अधिकता वाले पदार्थ लघुगुण वाले होते हैं । [ आकाश गुण वाले बहुतसे द्रव्य लघु होते हुए भी अग्नि का बढ़ाने वाले नहीं होते, इसलिए इनका ग्रहण नहीं किया ] [ पृथ्वी, साम ( जल ) गुणों की अधिकता वाले पदार्थ गुरु होते हैं । इसलिये लघु पदार्थ वायु एवं अग्नि से बने होने के कारण; और अपने गुणों के कारण से - जैसे वायु रूक्ष लघु, सूक्ष्म, चल, विशद, खर गुण वाला है, इससे भी लघु पदार्थ जाठराग्नि को संदीपन करने वाले एवं तृप्ति पूर्वक मात्रा का व्यतिक्रम करके खाने पर भी थोड़े दाष वाले होते हैं; ये अधिक दोप नहीं करते । गुरु द्रव्य अग्नि को संदीपन करने वाले नहीं होते । क्योंकि असमान होने से अग्नि से विपरीत गुण वाले हैं अर्थात् पृथ्वी आर जल के गुण वाले होते हैं । अतः तृप्ति पूर्वक पेट भर के खाने से बहुत अधिक दोष कारक होते हैं । व्यायाम अग्निबल और हेमन्त ऋतु आदि में स्वभावतः अग्नि वृद्धि होने के कारण ये विकार नहीं करत; अन्य अवस्थाओं में विकार उत्पन्न करते हैं । इसलिये 'मात्रा ' अग्नि बल की अपेक्षा करती है गुरु लघु द्रव्य की अपेक्षा नहीं करती ||५ || न च नापेक्षते द्रव्यम् । द्रव्यापेक्षया च त्रिभागसौहित्यमर्धसौहित्यं वा गुरूणामुपदिश्यते; लघूनामपि च नातिसौहित्यमग्नेयुक्त्यर्थम् । मात्रा द्रव्य की अपेक्षा नहीं करतो, ऐसा भी नहीं क्योंकि मात्रा की अपेक्षा से गुरु द्रव्यों का तीन हिस्सा या आधे पेट, जिससे कि कुक्षि मे प्रपीड़न, भारी-पन प्रतीत न हो, इतना खाना बताया है । परिमाण या मात्रा से नहीं बताया । इसी प्रकार लघु गुण वाले पदार्थों का भी पेट भर के खाने का आदेश नहीं १. अग्नि भी रूक्ष, लघु, सूक्ष्म चल, विशद, खर है, इसलिये इस गुणवाले पदार्थ अग्नि को बढ़ायेंगे । समान गुण वाले समान गुणों को बढ़ाते हैं । अतः अधिक मात्रा में खाने पर भी लघु पदार्थ अग्नि को बढायेंगे ही । २. व्यायाम करने वाले मनुष्य को विरुद्ध वा अविरुद्ध सब प्रकार का भोजन पच जाता है । क्योंकि व्यायाम से अग्नि बढ़ती है । हेमन्त में अग्नि स्वभावतः प्रबल होती है, अतः गुरु पदार्थ खाने का आदेश दिया है ।

पृष्ठ 84

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६६ चरकसंहिता [ अ०५ दिया । इतना खाना चाहिये जिससे कि अग्नि समान रूप से स्थिर रह सके । जीवन के लिये खाना खाने के लिये जीना नहीं" । मात्रा में खाने के फल- मात्रावद्धय शनमःशितमनुपहत्य प्रकृतिं बल- वर्ण- सुखायुषा योजयत्युप- योक्तारमवश्यमिति ॥ ६ ॥

क्योंकि मात्रा में खाया हुआ आहार प्रकृति और स्वास्थ्य को न बिगाड़ कर उपयोग करने वाले मनुष्य को बल, वर्ण ( कान्ति ), सुख, आयु से युक्त करता है, इसलिये मात्रानुसार भोजन करना चाहिये ॥ ६ ॥

भवन्ति चात्र- गुरुपिष्टमयं तस्मात्तण्डुलान् पृथुकानपि ।

न जातु भुक्तवान्खादेन्मात्रां खादेद् बुभुक्षितः ॥ ७ ॥

वल्लूरं शुष्कशाकानि शालूकानि बिसानि च ।

नाभ्यसेद् गौरवान्मांसं कृशं नैवोपयोजयेत् ॥ ८ ॥

कूचिकांच किलाटांश्च शौकरं गव्यमाहिषे ।

मत्स्यान्दधि च माषश्च यवकांश्च न शीलयेत् ॥ ६ ॥

इसलिये भोजन कर चुकने पर भारी पिट्टी से बने चावल, चिवड़ा इनको कभी भी नहीं खाये । मात्रा में भी भोजन करने के बाद इनको नहीं खाना चाहिये । भूखे होने पर इन पदार्थों को मात्रामें ही खाना चाहिये अधिक नहीं । बल्लूर ( सूखा हुआ मांस ); सूखे हुए शाक- कचरी आदि शालूक ( कमल का कन्द ) और बिस मृणाल इनका निरन्तर उपयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि ये पदार्थ गुरु हैं । इसी प्रकार दुर्बल, रुग्ण पशु का मांस भी नहीं खाना चाहिये । ( कूर्चिक ) छाछ के साथ पकाया हुआ दूध, ( किलाट ) छाछ के साथ पकाये हुए दूध का घन ठोस भाग, सुअर का मांस, गाय और भैंस का मांस, मच्छलियों का मांस, दही, उड़द और शूक धान्य, जई इनको निरन्तर लगातार नहीं खाना चाहिये ॥ ७-६ ॥

षष्टिकान्छालिमुद्गांव सैन्धवामलके यवान् ।

आन्तरीक्ष पयः सर्पिर्जाङ्गलं मधु चाभ्यसेत् ॥ १० ॥

१. लघु भोजन अधिक मात्रा में खाने से अग्नि को सन्दीपन करने का गुण रखते हुये भी शरीर के लिये हानिकारक होंगे, क्योंकि शस्त्र पत्थर पर ही तेज होता है, और पत्थर पर अधिक पैनाने से वह खुम्डा भी बन जाता है । आंख तेजोमय है, वही आंख तेज की अधिकता से बिगड़ भी जाती है ।

पृष्ठ 85

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० ५ ] सूत्रस्थानम् ६७ A षष्टिक ( साठी चावल ), शालि ( हेमन्त ऋतु में पकने वाले धान्य ), मुद्ग ( मूंग ), सैन्धव ( सैंधा नमक ), आमलक ( आंवले ), यव ( जौ ), आन्तरिक्ष अर्थात् बरसात का जल, दूध, घी, जंगल में होने वाले मृग आदि का मांस और शहद इनका निरन्तर ( अग्नि बल को देखते हुए उचित मात्रा में ) उपयोग करना चाहिये ॥ १० ॥

तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते ।

अज्ञातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ ११ ॥

जो विशुद्ध क्षीण होते हुए शरीर को पोषण दे और जो न उत्पन्न हुए विकारों वा रोगों को न उत्पन्न करे ऐसा आहार का स्वास्थ्य के लिये नित्यप्रति उपयोग करे । रोगों की उत्पत्ति में 'प्रज्ञापराध' 'परिणाम' और 'असात्म्येन्द्रियार्थ' संयोग ये तीन ही कारण है । अतः इनको छोड़कर और सब करना चाहिये, इनका सेवन नहीं करना चाहिये, इनसे बचना चाहिये । ऐसा करने से भावी में रोग उत्पन्न नहीं होंगे ॥ ११ ॥

स्वस्थवृत्त- अत ऊर्ध्वं शरीरस्य कार्यमक्ष्यञ्जनादिकम् ।

स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य गुणतः संप्रवक्ष्यते ॥ १२ ॥

स्वास्थ्य के लिये आहार विधि को कह कर इस के आगे शारीरिक काय्यों का उपदेश करते हैं । स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वास्थ्य की दृष्टि से अञ्जन आदि एवं शारीरिक कार्य उनके गुणों सहित कहते हैं ॥ १२ ॥

tarai नित्यं हितमक्ष्णोः प्रयोजयेत् ।

पचरात्रेऽष्टरात्रे वा स्रावणार्थे रसाञ्जनम् ॥ १३ ॥

आँख तेजोमय ( अग्नि रूप है ) इसलिये आँख को शरीर के दोष वात, पित्त और कफ इनसे भय बना रहता है । इनमें भी विशेष कर कफ से । इस-लिये श्लेष्मा के जय के लिये पांचवें, छठे दिन तीक्ष्ण अंजन ( रसांजन ) रात्रि में लगाना चाहिये । सौवीराञ्जनको प्रतिदिन आँखों में लगाना चाहिये, क्योंकि यह आँखों के लिये हितकारी है । इससे आँख के तेज की रक्षा होती है, इससे आँखों के दोष दूर नहीं होते । आँखों के दोष दूर करने और आँखों से पानी का दोष निकालने के लिये पांचवें या आठवें दिन दोष के बलाबल की अपेक्षा से रसा अन को रात्रि में प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥

पृष्ठ 86

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चरकसंहिता [अ० ५ I

चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषाच्छ्रलेमतो भयम् ।

दिवा तन्न प्रयोक्तव्यं नेत्रयोस्तीक्ष्णमञ्जनम् ॥ १४ ॥

विरेकदुर्बला दृष्टिरादित्यं प्राप्य सीदति ।

तस्मात्त्रान्यं निशायां तु धवमञ्जनमिष्यते ॥ १५ ॥

ततः श्लेष्महरं कर्म हितं दृष्टः प्रसादनम् ।

यथा हि कनकादीनां मणीनां विविधात्मनाम् ॥ १६ ॥

धौतानां निर्मला शुद्धिस्तैल-चेल -कचादिभिः ।

एवं नेत्रेषु मर्त्यानामञ्जनाश्च्योतनादिभिः ॥ १७ ॥

दृष्टिनिराकुला भाति निर्मले नभसीन्दुवत् । आँख तेजामय है, उसे खास करके कफ से भय है । इसलिये विशेषतः दिन में तीक्ष्ण अंजन आँखों में नहीं करना चाहिये । क्योंकि दृष्टि तीक्ष्णांजन के लगाने से एवं दीप के कारण निर्बल होती है, इसलिये सूर्य को नहीं सहती, और यदि सूर्य के सामने अञ्जन दिन में लगाया जाय तो आँख पीड़ित होती है । इसलिए स्रावण अजन को रात्रि में ही लगाना चाहिये ' । श्लेष्मा के निकलने के बाद श्लेष्मा को घटाने वाला और आंख को स्वच्छ करने वाला प्रयोग करना चाहिये ।जिस प्रकार की धूल आदि से मैले हुए नाना प्रकार के स्वर्णादि की तेल, ( वस्त्र ), बाल आदि से घिसने पर स्वच्छता होती है इसी प्रकार मनुष्यों की आँख सांताञ्जन, निर्मल, ( वातादि दोषों से रहित ) होकर स्वच्छ आकाश में चन्द्रमा के समान चमकता हूँ ॥ १४-१७ ॥ अञ्जन के पीछे दृष्टि के प्रसादन के लिये लेप्महर कर्म करने का विधान

है । इसलिये अञ्जन के पीछे धूम्रपान कहते हैं ।

धूम्रप्रयोग की विधि- हरेक प्रिय च पृथ्वीको केशरं नखम् ॥ १८ ॥

ह्रीवेरं चन्दनं पत्रं त्वगेलोशीरपद्मकम् ।

ध्यामकं मधुकं मांसीं गुग्गुल्वगुरुशर्करम् ॥ १६ ॥

१. कुछ विद्वान् 'सीदति' का अर्थ ' अवजयति ' करते हैं । इस प्रकार अर्थ करने से दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि आँख तेजोमय हैं, इसलिये विरेचन ( रात्रि में स्रावण अंजन लगाने ) से निर्बलहुआ व कफ के निकलने से कमजोर पड़ा हुआ दोष श्लेष्मा, प्रातः सूर्य की किरणों में बाकी बच्चा निकल जाता है । इसलिये वमन की भांति पूवाह में सूर्य की किरणों में आँखों का सावण करना चाहिये और अंजन रात्रि में ही ।

पृष्ठ 87

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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ६६ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थ -लक्ष-लोध्र- त्वचः शुभाः वन्यं सर्जरसं मुस्तं शैलेयं कमलोत्पले ॥ २० ॥

श्रीवेष्टकं शल्लकीं च शुकवमथापि च ।

पिष्ट्वा लिम्पेच्छरेपीकां तां वर्ति यवसन्निभाम्॥ २१ ॥

अङ्गुष्टसंमितां कुर्यादष्टाङ्गुलसमां भिषक् ।

शुष्क निगर्भा तांव घूमनेत्रापिंतां नरः ॥ २२ ॥

स्नेहाक्तामग्निसंप्लुष्टां पिबेत्प्रायोगिकीं सुखाम् । हरेणुका ( मेहन्दी के बीज ), प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ), पृथ्वीका ( काला जी ), केशर ( नागकेशर ), नत्र ( नखी, एक सुगन्धित द्रव्य है ), 'हीवेर' ( नेत्रवाला ), चन्दन ( श्वेतचन्दन ), पत्र ( तेज पात ) त्वग् ( दालचीनी ), एला ( छोटी इलायची ), उशीर ( खस ), पद्माक ( पद्माख ), ध्यामक ( गन्ध तृण, सुगन्धित तृण ), मधुक ( मुलैहटी ), मांसी ( जटामांसी ), गुग्गुलु ( गूगल ), अगुरु ( अगर ), शर्करा ( शर्करा ), न्यग्रोध ( बड़ की छाल ), उदु-म्वर ( गूलर की उत्तम छाल ), अश्वत्थ ( पोरल की उत्तम छाल ), प्लक्ष ( पिलखन की छाल ) और लोध्र ( लोध वृक्ष की उत्तम छाल ), वन्य ( कैवर्त्त मुस्तक, जल मुस्त ), सर्ज रस ( राल ), मुस्त (नागर मोथा), शैलेय (शिलाहा कमल- उत्पल ( कमल और नील कमल इनका केशर ), श्रीवे:क ( धूपविशेष ), शल्लकी ( कुन्दरू धूप विशेष, अथव शिलारस ); और शुकवई ( स्थौणेयक ) इन सब को जल के साथ पीसकर 'शंपिका' ( सरकण्डा ) के ऊपर, जौ के समान बीच में से मोटी और पासों पर पतली एवं अंगूठे के बराबर मोटी, आठ अंगुल लम्बी बत्ती बना लेनी चाहिये, उसे सूख जाने पर सरकण्डे पर से बीच से खोखली खींच कर उतारनी चाहिये, बत्ती को घी से स्निग्ध करके सुख

पूर्वक नित्य प्रति पान करे । यह प्रायोगिक नित्य पीने योग्य धूम्र है ॥ १८-२२॥

स्नैक धूम- वमा घृत -मधूच्छिष्टेयुक्ति-युक्तेर्वरौषधैः ॥ २३ ॥

वर्त मधुरकैः कृत्वा स्नैहिकीं धूममाचरेत् । बसा ( चर्बी ), घृत ( घी ), मधूच्छिष्ट ( मोम ), इनको जीवनीय गण के साथ वर्त्ती बनने योग्य मात्रा में मिलाकर वर्त्ती बना ले । रूक्ष व्यक्ति स्नेहन करने वाले इस स्नैहिक धूम का पान करे; इस धूम का नित्य व्यवहार नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥

पृष्ठ 88

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चरकसंहिता [अ०५8 शिर में अवरुद्ध कफ को निकालने के लिये स्वस्थ पुरुष के लिये वैरेच निक धूम- "श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला ॥ २४ ॥

गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमः शीर्षविरेचनम् । श्वेता ( अपराजिता ), ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), हरिताल ( हरताल ), मनःशिला ( मैनसिल ), 'गन्ध अगुरु पत्रादि' ( ज्वर चिकित्सा में 'अगरुआदि तेल' में कहे हुए अगरू, कुष्ठ, तगर, पत्रज आदि [ इनमें कुष्ठ और तगर को

छोड़कर अन्य] द्रव्य लेकर पीसकर पूर्व को भांति बत्ती बना कर पीना चाहिये ।

यह धूम शिरोविरेचन के लिये वैरेचनिक धूम है ॥ २४ ॥

धूमपान के गुण- गौरव शिरसः शूलं पीनसाधवभेदको ॥ २५ ॥

कर्णाक्षिशूलं कासश्च हिक्काश्वासौ गलग्रहः ।

दन्तदौर्बल्यमास्रावः श्रोत्रप्राणाक्षिदोषजः ॥ २६ ॥

पूतिर्घाणास्यगन्धश्च दन्तशूलमरोचकः ।

हनुमन्याग्रहः कण्डूः क्रिमयः पाण्डुता मुखे ॥ २७ ॥

प्रसेको वैस्वयं गलशुण्ड पजिह्विका ।

खालित्यं पिञ्जरत्वं च केशानां पतनं तथा ॥ २८ ॥

क्षवथुश्चातितन्द्रा च बुद्धेर्मोहोऽतिनिद्रता ।

धूमपानात्प्रशाम्यन्ति बलं भवति चाधिकम् ॥ २६ ॥

शिरोरुहकपालानामिन्द्रियाणां स्वरस्य च ।

न च वातकफात्मानो बलिनोऽप्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ३० ॥

धूमवक्त्रकपानस्य व्याधयः स्युः शिरोगताः । (गौरव ) शिर का भारीपन, शिर का दुखना, शिरोवेदना ( पीनस ) नाक की श्लैष्मिक कला का सूजन, ( अर्द्धावभेदक ) आधा सीसी ( कर्णशूल ) कान की पीड़ा, ( अक्षिशूल ) आंख का दुःखना, ( कास ) खांसी, (हिक्का) हिचकी, ( श्वास ) दमा, ( गलग्रह ) स्वर भंग, ( दन्तदौर्बल्य ) दान्तों की निर्बलता, ( आसाव ) कान नाक और आंख के रोग स्राव का आना, ( पूतिघ्राण ) नाक से दुर्गन्ध आना, ( आस्यगन्ध ) मुख की बदबू, ( दन्तशूल ) दाँत की पीड़ा, ( अरोचक ) भोजन में अरुचि, अनिच्छा, ( हनुग्रह ) जवाड़ो भिचना, (मन्या- ग्रह ) गर्दन का जकड़ जाना, इधर- उधर न हिलना, ( कण्डू ) खाज, कृमि, ( मुखपाण्डुता ) चेहरे का पीलापन, ( श्लेष्मप्रसेक ) मुख से पानी का बहना

पृष्ठ 89

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अ० ५ । सूत्रस्थानम् ७१ अर्थात् लाला स्राव, ( वैस्वर्थ्य ) स्वर का साफ न होना गलशुण्डी, उपजिह्निका ( खालित्य ) बालों का गिरना, ( पिंजरत्व ) बालों का धूसर रंग होना, (केराप- तन ) बालों का झड़ जाना, ( क्षवथु ) छींक आना, ( अतितन्द्रा ) आलस्य की अधिकता, (बुद्धिमोह) बुद्धिका जड बनना मूर्च्छा, (अतिनिद्रता ) नींदका अधिक आना ये रोग धूम्र पीने से अच्छे होते हैं और बाल, शिर की अस्थि, आँख कान आदि इन्द्रियों का, स्वर, और गले का बल अधिक होता है । बलवान् कारण से भी बात कफ से उत्पन्न गले से ऊपर होने वाले आँख, कान, नाक, मुख, गले के रोग खास कर शिर सम्बन्धी रोग मुख से धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को नहीं होते । मुख से धुंआ लेकर नाक से निकाल देना चाहिये ॥ २५-३० ॥ धूम्रपानके आठ काल- प्रयोगपाने तस्याष्टौ कालाः संपरिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥

वात- श्लेष्म-समुत्क्लेशः कालेष्वेषु हि लक्ष्यते ।

स्नात्वा भुक्त्वा समुल्लिख्य क्षुत्वा दन्तान्निघृष्य च ॥ ३२ ॥

नावनाञ्जननिद्रान्ते चात्मवान् धूमपो भवेत् ।

तथा वातकफात्मानो न भवन्त्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ३३ ॥

रोगास्तस्य तु पेयाः स्युरापानास्त्रित्रयस्त्रयः । के से पीने के आठ समय ब्रह्मा आदि ने कहे हैं, प्रायोगिक धूम्र मुख क्योंकि इन आठ समयों में वात और कफ का प्रकोप देखा जाता है अन्य समयों में इतना कोप नहीं दिखाई देता । स्नान करके, भोजन करके, वमन करके, छीकें लेकर दांत जीभ साफ करके नाक से नस्य लेकर, आंख में अंजन करके, सो के उठकर, प्रसन्न मन हो तब धूम्र को पीना चाहिये । इसी प्रकार से वातजन्य और कफजन्य, ग्रीवा से ऊपर के रोग नहीं होते हैं । शीत गुण ' के कारण यदि वायु प्रकुपित हुई है, तो वातजन्य रोग होते हैं । ऐसी अवस्था में स्नैहिक धूम लेना चाहिये । जब पुरुष रूक्ष हो, रूक्ष हर 'स्नैहिक धूम' पीना चाहिये । कफ जन्य रोग तब होते हैं, जब कि पुरुष में स्निग्धता ( रूक्षता का अभाव ) होता है । इसलिये कफ के नाथ के लिये 'वैरेचनिक धूम' लेना चाहिये । तीन प्रकार के धूम्रपान की घंटों की सीमा ९ ( नौ) है । अर्थात् धूम्र पीने के समय में किसी भी प्रकार का धूम्र ६ घूंट से अधिक नहीं पीना चाहिये ॥ ३१-३३ ॥

पृष्ठ 90

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७२ चरकसंहिता [ अ०५ परं द्विकालपायी स्यादहः कालेषु बुद्धिमान् ॥ ३४ ॥

प्रयोगे, स्नैहिके त्वेकं वैरेच्यं त्रिश्वतुः पिबेत् । यद्यपि धूम्रपान के आठ समय बताये हैं, तथापि बुद्धिमान् को अपने शरीर के दोष वृद्धि, क्षय आदि का विचार करके दिन में आठ समयों में दो समय 'प्रायोगिक धूम' का पान करना चाहिये । स्नैहिक धूम का दिनभर में एक बार, और 'वैरेचनिक' धूम तीन चार बार पीना चाहिये, इससे अधिक नहीं ॥ ३४॥

ठीक प्रकार से पीये हुए धूमपान के लक्षण- हृत्कण्ठेन्द्रियसंशुद्धिर्लघुत्वं शिरसः शमः ॥ ३५ ॥

यथेरितानां दोषाणां सम्यक् पीतस्य लक्षणम् । हृदय ( छाती, उरःस्थल ), गला, उरःस्थल का ऊर्ध्वभाग, इन्द्रियाँ --आँख कान नासिका आदि, इनकी स्वच्छता का प्रतीत होना, शिर का हल्कापन दोप- वात, पित्त, कफ, दोषों की शान्ति ये सम्यक् प्रकार से पीये हुए धूम्र के लक्षण हैं ॥ ३५ ॥

अधिक धूम्रपान के लक्षण - बाधिर्य्यमान्ध्यं मूकत्वं रक्तपित्तं शिरोभ्रमम् ॥ ३६ ॥

अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान् । ( बाधिर्य ), बहरापन, ( आन्ध्य ), आँखों से कम या सर्वथा न दीखना, ( मूकत्व ), गूंगापन, जीभ से बाला न जाना (रक्तपित्त ) पित्त प्रकोप से रक्त विकार होना ( शिरोभ्रम ) सिर में चक्कर आना, ये रोग अकाल अर्थात् ठीक समय पर धूम न पीने से अथवा अधिक पीने से होते हैं ॥ ३६ ॥

धूम्रपान से उत्पन्न उपद्रवों की - अधिकतत्रष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम्चिकित्सा-|| ३७ ||

नैहिकं धूमजे दोषे वायुः पित्तानुगो यदि ।

शीतं तु रक्तपित्ते स्याच्छ्लेष्मपित्ते विरूक्षणम् ॥ ३८ ॥

अधिक धूम्रपान करने पर घी का पिलाना अच्छा है । नस्य, आँखों में अंजन करना और संतर्पण करने वाले स्निग्ध कर्म करने चाहियें । पित्त के कारण जहाँ रक्त दूषित हो वहाँ पर शीतल चिकित्सा, शीतस्पर्श शीत वीर्य वाले द्रव्यों से बनी औषध नस्य, अंजन आदि कार्य में बरतनी चाहिये, श्लेष्मप्रधान पित्त की अवस्था में 'विरूक्षण' अर्थात् रूक्ष गुण वाले द्रव्यों से नावन अञ्जन कर्म करने चाहिये ॥ ३७-३८ ॥

परं त्वतः प्रवक्ष्यामि धूमो येषां विगर्हितः ।

न विरिक्तः पिबेद् धूमं न कृते बस्तिकर्मणि ॥ ३६ ॥