गर्ग संहिता — पृष्ठ 91–100
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100
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अध्याय ८ ] ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णके सर्वव्यापी विश्वात्मा स्वरूपका दर्शन ८५ निहारकर आनन्द देनेवाले, करोड़ों कामदेवोंकी शोभासे सम्पन्न, नासिकास्थित मुक्ताभरणसे अलंकृत, शिखा - भूषणसे युक्त, दोनों हाथोंमें आभूषण धारण किये हुए, पीला वस्त्र धारण किये हुए, मेखला, कड़े और नूपुरसे शोभित, करोड़ों बाल - रवियोंकी प्रभासे युक्त और मनोहर देखा । बलरामजीने गोवर्धनसे उत्तरकी ओर एवं यमुनाजीसे दक्षिणकी ओर स्थित वृन्दावनमें सब कुछ कृष्णमय श्रीकृष्णका किया वत्सपालोंका दर्शन अनन्त, धर्म, इन्द्र तुम्हारी सेवा किया परमेश्वर हो । तुम करनेमें समर्थ हो ' श्रीनारदजीने देखा । वे इस कार्यको ब्रह्माजी और हुआ जानकर पुनः गोवत्सों एवं करते हुए श्रीकृष्णसे बोले - ' ब्रह्मा, और शंकर भक्तियुक्त होकर सदा करते हैं । तुम आत्माराम, पूर्णकाम, शून्यमें करोड़ों ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि * ॥ १ ९ –३० ॥ कहा – जिस समय बलरामजी यों कह रहे थे, उसी समय ब्रह्माजी वहाँ आये और उन्होंने गोवत्सों एवं गोप - बालकोंके साथ बलरामजी एवं श्रीकृष्णके दर्शन किये । ' ओहो! मैं जिस स्थानपर गोवत्स तथा गोप - बालकोंको रख आया था, वहाँसे श्रीकृष्ण उनको ले आये हैं । ' - यों कहते हुए ब्रह्माजी उस स्थानपर गये और वहाँपर उन सबको पहलेकी तरह ही पाया । ब्रह्माजी उनको निद्रित देखकर पुनः व्रजमें आये और गोप - बालकोंके साथ श्रीहरिके दर्शन करके विस्मित हो गये । वे मन - ही - मन कहने लगे-' ओहो, कैसी विचित्रता है! ये लोग कहाँसे यहाँ आये और पहलेकी ही भाँति श्रीकृष्णके साथ खेल रहे हैं? यह सब खेल करनेमें मुझे एक त्रुटि ( क्षण ) जितना काल लगा, परंतु इतनेमें इस भूलोकमें एक वर्ष पूरा हो गया । तथापि सभी प्रसन्न हैं, कहीं किसीको इस घटनाका पता भी नहीं चला । ' इस प्रकारसे ब्रह्माजी मोहातीत विश्वमोहनको मोहित करने गये । परंतु अपनी मायाके अन्धकारमें वे स्वयं अपने शरीरको भी नहीं देख सके । गोप - बालकोंके हरणसे जगत्पतिकी तो कुछ हानि हुई नहीं, अपितु श्रीकृष्णरूप सूर्यके सम्मुख ब्रह्माजी ही जुगनू से दीखने लगे । ब्रह्माके इस प्रकार * ' ब्रह्मानन्तो धर्म इन्द्रः शिवश्च सेवन्ते त्वां भक्तियुक्ताः सदैते । मोहित एवं जडीभूत हो जानेपर श्रीकृष्णने कृपापूर्वक अपनी मायाको हटाकर उनको अपने स्वरूपका दर्शन कराया । भक्तिके द्वारा ब्रह्माजीको ज्ञाननेत्र प्राप्त हुए । उन्होंने एक बार गोवत्स एवं गोप - बालक — सबको श्रीकृष्णरूप देखा । राजन्! ब्रह्माजीने शरीरके भीतर और बाहर अपने सहित सम्पूर्ण जगत्को विष्णुमय देखा ॥ ३१-४० ॥ इस प्रकार दर्शन करके ब्रह्माजी तो जडताको प्राप्त होकर निश्चेष्ट हो गये । ब्रह्माजीको वृन्दादेवी द्वारा अधिष्ठित वृन्दावनमें जहाँ - तहाँ दीखनेवाली भगवान्-की महिमा देखनेमें असमर्थ जानकर श्रीहरिने मायाका पर्दा हटा लिया । तब ब्रह्माजी नेत्र पाकर, निद्रासे जगे हुएकी भाँति उठकर, अत्यन्त कष्टसे नेत्र खोलकर अपनेसहित वृन्दावनको देखनेमें समर्थ हुए । वहाँपर वे उसी समय एकाग्र होकर दसों दिशाओंमें देखने लगे और वसन्तकालीन सुन्दर लताओंसे युक्त रमणीय श्रीवृन्दावनका उन्होंने दर्शन किया । वहाँ बाघके बच्चोंके साथ मृग- शावक खेल रहे थे । बाज और कबूतरमें, नेवला और साँपमें वहाँ जन्मजात वैरभाव नहीं था । ब्रह्माजीने देखा कि एकमात्र श्रीकृष्ण ही हाथमें भोजनका कौर लिये हुए प्यारे गोवत्सोंको वृन्दावनमें ढूँढ़ रहे हैं । गोलोकपति साक्षात् श्रीहरिको गोपाल - वेषमें अपनेको छिपाये हुए देखकर तथा ये साक्षात् श्रीहरि हैं - यह पहचानकर ब्रह्माजी अपनी करतूतको स्मरण करके भयभीत हो गये । राजन्! उन चारों ओर प्रज्वलित दीखनेवाले श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये ब्रह्माजी अपने वाहनसे उतरे और लज्जाके कारण उन्होंने सिर नीचा कर लिया । वे भगवान्को प्रणाम करते हुए और ' प्रसन्न हों ' – यह कहते हुए धीरे - धीरे उनके निकट पहुँचे । यों भगवान्-को अपनी आँखोंसे झरते हुए हर्षके आँसुओंका अर्घ्य देकर दण्डकी भाँति वे भूमिपर गिर पड़े । भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको उठाकर आश्वस्त किया और उनका इस प्रकार स्पर्श किया, जैसे कोई प्यारा अपने प्यारेका स्पर्श करे । तत्पश्चात् वे सुधासिक्त दृष्टिसे आत्मारामः पूर्णकामः परेशः स्रष्टुं शक्तः कोटिशोऽण्डानि यः खे ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ० ८ । ३० )
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८६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड उसी सुन्दर भूमिपर दूर खड़े देवताओंकी ओर गये । ब्रह्माजीने भगवान्को उस स्थानपर देखकर देखने लगे । तब वे सभी उच्चस्वरसे जय - जयकार भक्तियुक्त मनसे हाथ जोड़कर प्रणाम किया और करते हुए उनका स्तवन करने लगे । साथ - साथ रोमाञ्चित होकर दण्डकी भाँति वे भूमिपर गिर पड़े । प्रणाम भी करने लगे । श्रीकृष्णकी दयादृष्टि पाकर पुनः वे गद्गद वाणीसे भगवान्का स्तवन करने सभी आनन्दित हुए और उनके प्रति आदरसे भर लगे ॥ ४१ – ५२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णके सर्वव्यापी विश्वात्मा स्वरूपका दर्शन ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय ब्रह्माजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति ब्रह्मोवाच कृष्णाय मेघवपुषे चपलाम्बराय पीयूषमिष्टवचनाय परात्पराय । वंशीधराय शिखिचन्द्रकयान्विताय देवाय भ्रातृसहिताय नमोऽस्तु तस्मै ॥ ब्रह्माजी बोले – ' मेघकी - सी कान्तिसे युक्त विद्युत् - वर्णका वस्त्र धारण करनेवाले, अमृत तुल्य मीठी वाणी बोलनेवाले, परात्पर, वंशीधारी, मयूर -पिच्छको धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको उनके भ्राता बलरामसहित नमस्कार है । श्रीकृष्ण ( आप ) साक्षात् स्वयं पुरुषोत्तम, पूर्ण परमेश्वर, प्रकृतिसे अतीत श्रीहरि हैं । हम देवता जिनके अंश और कलावतार हैं, जिनकी शक्तिसे हमलोग क्रमशः विश्वकी सृष्टि, पालन एवं संहार करते हैं, उन्हीं आपने साक्षात् कृष्णचन्द्रके रूपमें अवतीर्ण होकर धराधामपर नन्दका पुत्र होना स्वीकार किया है । आप प्रधान - प्रधान गोप - बालकोंके साथ गोपवेषसे वृन्दावनमें गोचारण करते हुए विराज रहे हैं । करोड़ों कामदेवके समान रमणीय, तेजोमय, कौस्तुभधारी, श्यामवर्ण, पीतवस्त्रधारी, वंशीधर, व्रजेश, राधिकापति, निकुञ्जविहारी परमसुन्दर श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ । जो मेघसे निर्लिप्त आकाशके समान प्राणियोंकी देहमें क्षेत्रज्ञ रूपसे स्थित हैं, जो अधियज्ञ एवं चैत्यस्वरूप हैं, जो मायारहित हैं और जो निर्मल भक्ति तथा प्रबल वैराग्य आदि भावोंसे प्राप्त होते हैं, उन आदिदेव हरिकी मैं वन्दना करता हूँ । सर्वज्ञ! जिस समय मनमें प्रबल रजोगुणका उदय होता है, उसी समय मन संकल्प - विकल्प करने लगता है । संकल्प - विकल्पके वशीभूत मनमें ही अभिमानकी उत्पत्ति होती है और वही अभिमान धीरे - धीरे बुद्धिको विकृत कर देता है । क्षणस्थायी बिजलीके समान, बदलते हुए ऋतुगुणोंके समान, जलपर खींची गयी रेखाके समान, पिशाचके द्वारा उत्पन्न किये हुए अंगारोंके समान और कपटी यात्रीकी प्रीतिके समान जगत्के सुख मिथ्या हैं । विषय - सुख दुःखोंसे घिरे हुए हैं एवं अलातचक्रवत् ( जलते हुए अंगारको वेगसे चक्राकार घुमानेपर जो क्षणस्थायी वृत्त बनता है, उसके समान ) हैं । जैसे वृक्ष न चलते हुए भी, जलके चलनेके कारण चलते हुए - से दीखते हैं, नेत्रोंको वेगसे घुमानेपर अचल पृथ्वी भी चलती हुई - सी दीखती है, कृष्ण! उसी प्रकार प्रकृतिसे उत्पन्न गुणोंके वशमें होकर भ्रान्त जीव उस प्रकृतिजन्य सुखको सत्य मान लेता है । सुख एवं दुःख मनसे उत्पन्न होते हैं, निद्रावस्थामें वे लुप्त हो जाते हैं और जागनेपर पुनः उनका अनुभव होने लगता है । जिनको इस प्रकारका विवेक प्राप्त उनके लिये यह जगत् निरन्तर स्वप्नावस्थाके भ्रमके समान ही है । ज्ञानी पुरुष ममता एवं अभिमानका त्याग करके सदा वैराग्यसे प्रीति करनेवाले तथा शान्त होते हैं । जैसे एक दियेसे सैकड़ों दिये उत्पन्न होते हैं, वैसे ही एक परमात्मासे सब कुछ उत्पन्न हुआ है— ऐसी तात्त्विक दृष्टि उनकी रहती है ॥ १–१० ॥
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अध्याय ९ ] ब्रह्माजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति ८७ " भक्त निर्धूम अग्निशिखाकी भाँति गुणमुक्त एवं आत्मनिष्ठ होकर हृदयमें ब्रह्माके भी स्वामी भगवान् वासुदेवका भजन करते हैं । जिस प्रकार हम एक ही चन्द्रबिम्बको अनेकों घड़ोंके जलमें देखते हैं, उसी प्रकार आत्माके एकत्वका दर्शन करके श्रेष्ठ परमहंस भी कृतार्थ होते हैं । निरन्तर स्तवन करते रहनेपर भी वेद जिनके माहात्म्यके षोडशांशका भी कभी ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके, तब त्रिलोकीमें उन श्रीहरिके गुणोंका वर्णन भला, दूसरा कौन कर सकता है? मैं चार मुखोंसे, देवाधिदेव महादेवजी पाँच मुखोंसे तथा हजार मुखवाले शेषजी अपने सहस्र मुखोंसे जिनकी स्तुति -सेवा करते हैं; वैकुण्ठनिवासी विष्णु क्षीरोदशायी साक्षात् हरि और धर्मसुत नारायण ऋषि उन गोलोकपति आपकी सेवा किया करते हैं । अहा! मुरारे! आपकी महिमा धन्य है । भूतलपर उस महिमाको न मुनिगण जानते हैं न मनुष्य ही । सुर - असुर तथा चौदहों मनु भी उसे जाननेमें असमर्थ हैं । ये सब स्वप्नमें भी आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेमें असमर्थ हैं । गुणोंके सागर, मुक्तिदाता, परात्पर, रमापति, गुणेश, व्रजेश्वर श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ । ताम्बूल - रागरञ्जित सुन्दर मुखसे सुशोभित, मधुरभाषी, पके हुए बिम्बफलके समान लाल - लाल अधरोंवाले, स्मितहास्ययुक्त, कुन्दकलीके समान शुभ्र दन्तपंक्तिसे जगमगाते हुए, नील अलकोंसे आवृत्त कपोलोंवाले, मनोहर - कान्ति तथा झूलते हुए स्वर्ण - कुण्डलोंसे मण्डित श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ । आपका परम सुन्दर रूप मन्मथके मनको भी हरनेवाला है । मेरे नेत्रोंमें सर्वदा मकरकुण्डलधारी श्यामकलेवर श्रीकृष्णके उस रूपका प्रकाश होता रहे । जिनकी लीला वैकुण्ठ - लीलाकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ है और जिनके परम श्रेष्ठ मनोहर रूपको देवगण भी नमस्कार करते हैं, उन गोपलीलाकारी गोलोकनाथको मैं मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ । वसन्तकालीन सुन्दर कण्ठवाले कोकिलादि पक्षियोंसे युक्त, सुगन्धित, नवीन पल्लवयुक्त वृक्षोंसे अलंकृत, सुधाके समान शीतल, धीर ( मन्द ) पवनकी क्रीड़ासे सुशोभित वृन्दावनमें विचरण करनेवाले श्रीकृष्णकी जय हो! वे सदा भक्तोंकी रक्षा करें ॥ ११–२० ॥ " आपके विशाल नेत्र तथा उनकी तिरछी चितवन कमलपुष्पोंका मान और झूलते हुए मोतियोंका अभिमान दूर करनेवाली है, भूतलके समस्त रसिकों-को रसका दान करती है तथा कामदेवके बाणोंके समान पैनी एवं प्रीतिदानमें निपुण है । जिनकी नखमणियाँ शरत्कालीन चन्द्रमाके समान सुखकर, सुरक्त, हृदयग्राहिणी, गाढ़ अन्धकारका नाश करनेवाली और जगत्के समस्त प्राणियोंके पापका ध्वंस करनेवाली हैं तथा स्वर्गमें देवमण्डली जिनका श्रीविष्णु एवं हरिकी नखावलीके रूपमें स्तवन करती है, मैं उनकी आराधना करता हूँ । आपके पादपद्मोंकी सर्वदा बजनेवाली, श्रीहरिके सैकड़ों किरणोंसे युक्त ( सुदर्शन ) चक्रके समान आकारवाली पैजनियाँ ऐसी हैं, जिनसे गोल घेरेकी भाँति किरणें इस प्रकार निकलती हैं, जैसे सूर्यके प्रकाशयुक्त रथचक्रकी परिधि हो, अथवा जो आपके पादपद्मोंकी परिधिके समान सुशोभित हैं । आपकी कमरमें छोटी - छोटी घंटियोंसे युक्त दिव्य पीताम्बर जगमगा रहा है । मैं अक्लिष्टकर्मा भगवान् श्रीकृष्ण ( आप ) के उस मनोहर रूपकी आराधना करता हूँ । जिनके कान्तिमान् कसौटीसदृश एवं भृगुपद - अङ्कित विशाल वक्षःस्थलपर लक्ष्मी विलास करती हैं, जिनके गलेमें स्वर्णमणि एवं मोतियोंकी लड़ियोंसे युक्त तथा तारोंके समान झिलमिल प्रकाश करनेवाले तथा भ्रमरोंकी ध्वनिसे युक्त हीरोंके हार हैं, जो सिन्दूरवर्णकी सुन्दर अँगुलियोंसे वंशी बजा रहे हैं, जिनकी अँगुलियोंमें सोनेकी अँगूठियाँ सुशोभित हैं, जिनके दोनों हाथ द्विजोंको दान देनेवाले, चन्द्रमाके समान नखोंसे युक्त एवं कामदेवके वनके कदम्बवृक्षोंके पुष्पकी सुगन्धसे सुवासित हैं, जिनकी मन्दगति राजहंसकी भाँति सुन्दर है, जिनके कंधे गलेतक ऊँचे उठे हुए हैं, उन श्रीहरिकी मेघमालाका मान हरण करनेवाली मनोहर काकुलका मैं स्मरण करता हूँ । जो स्वच्छ दर्पणकी भाँति निर्मल, सुखद, नवयौवनकी कान्तिसे युक्त, मनुष्योंके रक्षक तथा मणि - कुण्डलों एवं सुन्दर घुँघराले बालोंसे सुशोभित हैं, श्रीहरिके सूर्य तथा
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८८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड चन्द्रमाकी भाँति प्रभासे युक्त उन दोनों कपोलोंका मैं स्मरण करता हूँ । जो सुवर्ण तथा मुक्ता एवं वैदूर्यमणिसे जटित लाल वस्त्रका बना हुआ है, जो कामदेवके मुखपर क्रीड़ा करनेवाले सम्पूर्ण सौन्दर्यसे विलसित है— जो अरुण - कान्ति तथा चन्द्र एवं करोड़ों सूर्योके समान प्रभा - सम्पन्न है और मयूरपिच्छसे अलंकृत है, श्रीकृष्णके उस मुकुटको मैं नमस्कार करता हूँ । जिनके द्वारदेशपर स्वामिकार्तिकेय, गणेश, इन्द्र, चन्द्र एवं सूर्यकी भी गति नहीं है; जिनकी आज्ञाके बिना कोई निकुञ्जमें प्रवेश नहीं कर सकता, उन जगदीश्वर
श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं आराधना करता हूँ । " ॥ २१ - ३० ॥
ब्रह्माजी इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन करके पुनः हाथ जोड़कर कहने लगे - ' जगत् के स्वामी! मैं आपके नाभि - कमलसे उत्पन्न हूँ; अतएव जिस प्रकार माता अपने पुत्रके अपराधोंको क्षमा कर देती है, उसी प्रकार आप भी मेरे अपराधोंको क्षमा कर दें । व्रजपते! कहाँ तो मैं एक लोकका अधिपति और कहाँ आप करोड़ों ब्रह्माण्डोंके नायक! अतएव व्रजेश, मधुसूदन! देव! आप मेरी रक्षा करें । जिनकी मायासे देवता, दैत्य एवं मनुष्य - सभी मोहित हैं, मैं मूर्ख उनको अपनी मायासे मोहित करने चला था! गोविन्द आप नारायण हैं, मैं नारायण नहीं हूँ । हरि! आप कल्पके आदिमें ब्रह्माण्डकी रचना करके नारायणरूपसे शेषशायी हो गये । आपके जिस ब्रह्मरूप तेजमें योगी प्राण त्याग करके जाते हैं, बालघातिनी पूतना भी अपने कुलसहित आपके उसी तेजमें समा गयी । माधव! मेरे ही अपराधसे आपने गोवत्स एवं गोप- बालकोंका रूप धारण करके वनोंमें विचरण किया । अतएव भो! आप मुझको क्षमा करें । गोविन्द! पिता जैसे पुत्रका अपराध नहीं देखता, वैसे ही आप भी मेरे अपराधकी उपेक्षा करके मेरे ऊपर प्रसन्न हों । जो लोग आपके भक्त न होकर ज्ञानमें रति करते हैं, उनको क्लेश ही हाथ लगता है, जैसे भूसेके लिये परिश्रमपूर्वक खेत जोतनेवालोंको भूसामात्र प्राप्त होता है । आपके भक्तिभावमें ही नितरां रत रहनेवाले अनेकों योगी, मुनि एवं व्रजवासी आपको प्राप्त हो चुके हैं । दर्शन और श्रवण- दो प्रकारसे उनकी आपमें रति होती है, किंतु अहो! श्रीहरिकी मायाके कारण उनके प्रति मेरी रति नहीं हुई ' ॥ ३१–४१ ॥ ब्रह्माजीने यों कहकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए उनके ( श्रीकृष्णके ) पादपद्मोंमें प्रणाम किया एवं सारे अपराधोंको क्षमा करानेके लिये भक्तिभावसे श्रीकृष्णसे वे फिर निवेदन करने लगे - " मैं गोपकुलमें जन्म लेकर आपके पादपद्मोंकी आराधना करता हुआ सुगति प्राप्त कर सकूँ, इसका व्यतिरेक न हो । भगवान् शंकर आदि हम ( इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ) देवगणने भारतवासी इन गोपोंकी देहमें स्थित होकर एक बार भी श्रीकृष्णका दर्शन कर लिया, अतः हम धन्य हो गये । श्रीकृष्ण! आपके माता - पिता एवं गोप - गोपियोंका तो कितना अनिर्वचनीय सौभाग्य है, जो व्रजमें आपके पूर्णरूपका दर्शन कर रहे हैं । सम्पूर्ण विश्वका उपकार करनेवाले, मुक्ताहार धारण करनेवाले, विश्वके रचयिता, सर्वाधार, लीलाके धाम, रवितनया यमुनामें विहार करनेवाले, क्रीडापरायण, श्रीकृष्णचन्द्रका अवतार ग्रहण करनेवाले प्रभु मेरी रक्षा करें । वृष्णिकुलरूप सरोवरके कमलस्वरूप नन्दनन्दन, राधापति, देव - देव, मदनमोहन, व्रजपति, गोकुलपति, गोविन्द मुझ मायासे मोहितकी रक्षा करें । जो व्यक्ति श्रीकृष्णकी प्रदक्षिणा करता है, उसको जगत् के सम्पूर्ण तीर्थोंकी यात्राका फल प्राप्त होता है । वह आपके सुखदायक परात्पर ' गोलोक ' नामक
लोकको जाता है । " ॥ ४२ - ४८ ॥
नारदजी कहने लगे - लोकपति लोक - पितामह ब्रह्माने इस प्रकार सुन्दर वृन्दावनके अधिपति गोविन्दका स्तवन करके प्रणाम करते हुए उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और कुछ देरके लिये अदृश्य होकर गोवत्स तथा गोप - बालकोंको वरदान देकर लौट जानेके लिये अनुमतिकी प्रार्थना की ॥ ४ ९ -५० ॥ तदनन्तर श्रीहरिने नेत्रोंके संकेतसे उनको जानेका आदेश दिया । लोकपितामह ब्रह्मा भी पुनः प्रणाम करके अपने लोकको चले गये । राजन्! इसके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्ण वनसे शीघ्रतापूर्वक गोवत्स एवं गोप-बालकोंको ले आये और यमुनातटपर जिस स्थानपर गोपमण्डली विराजित थी, उन लोगोंको लेकर उसी
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अध्याय १० ] यशोदाजीकी चिन्ता; स्थानपर पहुँचे । गोवत्सोंके साथ लौटे हुए श्रीकृष्णको देखकर उनकी मायासे विमोहित गोपोंने उतने समयको आधे क्षण - जैसा समझा । वे लोग गोवत्सोंके साथ आये हुए श्रीकृष्णसे कहने लगे- ' आप शीघ्रतासे आकर भोजन करें । प्रभो! आपके चले जानेके कारण किसीने भी भोजन नहीं किया । ' इसके उपरान्त श्रीकृष्णने हँसकर बालकोंके साथ भोजन किया और बालकोंको अजगरका चमड़ा दिखाया । तदनन्तर बलरामजीके साथ गोपोंसे घिरे हुए श्रीकृष्ण वत्सवृन्दको आगे करके धीरे - धीरे व्रजको लौट आये । इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके नन्दद्वारा आश्वासन ८ ९ सफेद, चितकबरे, लाल, पीले, धूम्र एवं हरे आदि अनेक रंग और स्वभाववाले गोवत्सोंको आगे करके धीरे - धीरे सुखद वनसे गोष्ठमें लौटते हुए गोपमण्डली-के बीच स्थित नन्दनन्दनकी मैं वन्दना करता हूँ । राजन्! श्रीकृष्णके विरहमें जिनको क्षणभरका समय युगके समान लगता था, उन्हींके दर्शनसे उन गोपियोंको आनन्द प्राप्त हुआ । बालकोंने अपने - अपने घर जाकर गोष्ठोंमें अलग - अलग बछड़ोंको बाँधकर अघासुर - वध एवं श्रीहरिद्वारा हुई आत्मरक्षाके वृत्तान्तका वर्णन किया ॥ ५१ – ५ ९ ॥ अन्तर्गत ' ब्रह्माजीद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति ' नामक नवम अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय यशोदाजीकी चिन्ता; नन्दद्वारा आश्वासन तथा ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान देना; श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णका गोचारण नारदजी कहते हैं— अष्टावक्रके शापसे सर्प होकर अघासुर उन्हींके वरदान - बलसे उस परम मोक्षको प्राप्त हुआ, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है । वत्सासुर, वकासुर और फिर अघासुरके मुखसे श्रीकृष्ण किसी तरह बच गये हैं और कुछ ही दिनोंमें उनके ऊपर ये सारे संकट आये हैं- यह सुनकर यशोदाजी भयसे व्याकुल हो उठीं । उन्होंने कलावती, रोहिणी, बड़े - बूढ़े गोप, वृषभानुवर, व्रजेश्वर नन्दराज, नौ नन्द, नौ उपनन्द तथा प्रजाजनोंके स्वामी छः वृषभानुओंको बुलाकर उन सबके सामने यह बात कही ॥ १-४ ॥ यशोदा बोलीं- आप सब लोग बतायें - मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और कैसे मेरा कल्याण हो? मेरे पुत्रपर तो यहाँ क्षण - क्षणमें बहुत - से अरिष्ट आ रहे हैं । पहले महावन छोड़कर हमलोग वृन्दावनमें आये और अब इसे भी छोड़कर दूसरे किस निर्भय देशमें मैं चली जाऊँ, यह बतानेकी कृपा करें । मेरा यह बालक स्वभावसे ही चपल है । खेलते - खेलते दूरतक चला जाता है । व्रजके दूसरे बालक भी बड़े चञ्चल हैं । वे सब मेरी बात मानते ही नहीं । तीखी चोंचवाला बलवान् वकासुर पहले मेरे बालकको निगल गया था । उससे छूटा तो इस बेचारेको अघासुरने समस्त ग्वाल - बालोंके साथ अपना ग्रास बना लिया । भगवान्की कृपासे किसी तरह उससे भी इसकी रक्षा हुई । इन सबसे पहले वत्सासुर इसकी घातमें लगा था, किंतु वह भी दैवके हाथों मारा गया । अब मैं बछड़े चरानेके लिये अपने बच्चेको घरसे बाहर नहीं जाने दूँगी ॥ ५ – ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - इस तरह कहती तथा निरन्तर रोती हुई यशोदाकी ओर देखकर नन्दजी कुछ कहनेको उद्यत हुए । पहले तो धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नन्दने गर्गजीके वचनोंकी याद दिलाकर उन्हें धीरज बँधाया, फिर इस प्रकार कहा ॥ १० ॥
नन्दराज बोले- यशोदे! क्या तुम गर्गकी कही हुई सारी बातें भूल गयीं? ब्राह्मणोंकी कही हुई बात सदा सत्य होती है, वह कभी असत्य नहीं होती । इसलिये समस्त अरिष्टोंका निवारण करनेके लिये
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९ ० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड तुम्हें दान करते रहना चाहिये । दानसे बढ़कर रहते थे । किन्हीं गौओं और बैलोंके सींग छोटे, किन्हींके कल्याणकारी कृत्य न तो पहले हुआ है और न आगे होगा ही ॥ ११-१२ ॥ नारदजी कहते हैं— नरेश्वर! तब यशोदाने बलराम और श्रीकृष्णके मङ्गलके लिये ब्राह्मणोंको बहुमूल्य नवरत्न और अपने अलंकार दिये । नन्दजीने उस समय दस हजार बैल, एक लाख मनोहर गायें तथा दो लाख भार अन्न दान दिये ॥ १३-१४ ॥ श्रीनारदजी पुनः कहते हैं- राजन्! अब गोपोंकी इच्छासे बलराम और श्रीकृष्ण गोपालक हो गये । अपने गोपाल मित्रोंके साथ गाय चराते हुए वे दोनों भाई वनमें विचरण करने लगे । उस समय श्रीकृष्ण और बलरामका सुन्दर मुँह निहारती हुई गौएँ उनके आगे - पीछे और अगल - बगलमें विचरती रहती थीं । उनके गलेमें क्षुद्रघण्टिकाओंकी माला पहिनायी गयी थी । सोनेकी मालाएँ भी उनके कण्ठकी शोभा बढ़ाती थीं । उनके पैरोंमें घुँघुरू बँधे थे । उनकी पूँछोंके स्वच्छ बालोंमें लगे हुए मोरपंख और मोतियोंके गुच्छे शोभा दे रहे थे । वे घंटों और नूपुरोंके मधुर झंकारको फैलाती हुई इधर - उधर चरती थीं । चमकते हुए नूतन रत्नोंकी मालाओंके समूहसे उन समस्त गौओंकी बड़ी शोभा होती थी । राजन्! उन गौओंके दोनों सींगोंके बीचमें सिरपर मणिमय अलंकार धारण कराये गये थे, जिनसे उनकी मनोहरता बढ़ गयी थी । सुवर्ण - रश्मियोंकी प्रभासे उनके सींग तथा पार्श्व-प्रवेष्टन ( पीठपरकी झूल ) चमकते रहते थे । कुछ गौओंके भालमें किञ्चित् रक्तवर्णके तिलक लगे थे । उनकी पूँछें पीले रंगसे रँगी गयी थीं और पैरोंके खुर अरुणरागसे खथे । बहुत - सी गौएँ कैलास पर्वतके समान श्वेतवर्णवाली, सुशीला, सुरूपा तथा अत्यन्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थीं । मिथिलेश्वर! बछड़ेवाली गौएँ अपने स्तनोंके भारसे धीरे-धीरे चलती थीं । कितनोंके थन घड़ोंके बराबर थे । बहुत - सी गौएँ लाल रंगकी थीं । वे सब - की - सब भव्य-मूर्ति दिखायी देती थीं । कोई पीली, कोई चितकबरी, कोई श्यामा, कोई हरी, कोई ताँबेके समान रंगवाली, कोई धूमिलवर्णकी और कोई मेघोंकी घटा - जैसी नीली थीं । उन सबके नेत्र घनश्याम श्रीकृष्णकी ओर लगे बड़े तथा किन्हींके ऊँचे थे । कितनोंके सींग हिरनोंके-से थे और कितनोंके टेढ़े - मेढ़े । वे सब गौएँ कपिला तथा मङ्गलकी धाम थीं । वन - वनमें कोमल कमनीय घास खोज - खोजकर चरती हुई कोटि - कोटि गौएँ श्रीकृष्णके उभय पार्श्वोमें विचरती थीं ॥ १५-२४ ॥ यमुनाका पुण्य - पुलिन तथा उसके निकट श्याम तमालोंसे सुशोभित वृन्दावन नीप, कदम्ब, नीम, अशोक, प्रवाल, कटहल, कदली, कचनार, आम, मनोहर जामुन, बेल, पीपल और कैथ आदि वृक्षों तथा माधवी लताओंसे मण्डित था । वसन्त ऋतुके शुभागमनसे मनोहर वृन्दावनकी दिव्य शोभा हो रही थी । वह देवताओंके नन्दनवन - सा आनन्दप्रद और सर्वतोभद्र वन - सा सब ओरसे मङ्गलकारी जान पड़ता था । उसने ( कुबेरके ) चैत्ररथ वनकी शोभाको तिरस्कृत कर दिया था । वहाँ झरनों और कंदराओंसे संयुक्त रत्नधातुमय श्रीमान् गोवर्धन पर्वत शोभा पाता था । वहाँका वन पारिजात या मन्दारके वृक्षोंसे व्याप्त था । वह चन्दन, बेर, कदली, देवदार, बरगद, पलास, पाकर, अशोक, अरिष्ट ( रीठा ), अर्जुन, कदम्ब, पारिजात, पाटल तथा चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित था । श्याम वर्णवाले इन्द्रयव नामक वृक्षोंसे घिरा हुआ वह वन करञ्ज - जालसे विलसित कुञ्जोंसे सम्पन्न था । वहाँ मधुर कण्ठवाले नर - कोकिल और मयूर कलरव कर रहे थे । उस वनमें गौएँ चराते हुए श्रीकृष्ण एक वनसे दूसरे वनमें विचरा करते थे । नरेश्वर! वृन्दावन और मधुवनमें, तालवनके आस - पास कुमुदवन, बहुला वन, कामवन, बृहत्सानु और नन्दीश्वर नामक पर्वतोंके पार्श्ववर्ती प्रदेशमें, कोकिलोंकी काकलीसे कूजित सुन्दर कोकिलावनमें, लताजाल - मण्डित सौम्य तथा रमणीय कुश - वनमें, परम पावन भद्रवन, भाण्डीर उपवन, लोहार्गल तीर्थ तथा यमुनाके प्रत्येक तट और तटवर्ती विपिनोंमें पीताम्बर धारण किये, बद्धपरिकर, नटवेषधारी मनोहर श्रीकृष्ण बेंत लिये, वंशी बजाते और गोपाङ्गनाओंकी प्रीति बढ़ाते हुए बड़ी शोभा पाते थे । उनके सिरपर शिखिपिच्छका सुन्दर मुकुट तथा गलेमें वैजयन्तीमाला सुशोभित थीं ॥ २५–३६ ॥
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अध्याय ११ ] धेनुकासुरका उद्धार ९ १ संध्याके समय गोवृन्दको आगे किये अनेकानेक रागोंमें बाँसुरी बजाते साक्षात् श्रीहरि कृष्ण नन्दव्रजमें आये । आकाशको गोरजसे व्याप्त देख श्रीवंशीवटके मार्गसे आती हुई वंशी - ध्वनिसे आकुल हुई गोपियाँ श्यामसुन्दरके दर्शनके लिये घरोंसे बाहर निकल आयीं । अपनी मानसिक पीड़ा दूर करने और उत्तम सुखको पानेके लिये वे गोपसुन्दरियाँ श्रीकृष्णदर्शनके हेतु घरसे बाहर आ गयी थीं । उनमें श्रीकृष्णको भुला देनेकी शक्ति नहीं थी । श्रीनन्दनन्दन सिंहकी भाँति पीछे घूमकर देखते थे । वे गजकिशोरकी भाँति लीलापूर्वक मन्दगतिसे चलते थे । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पाते थे । गो - समुदायसे व्याप्त संकीर्ण गलियोंमें मन्द मन्द गतिसे आते हुए श्यामसुन्दरको उस समय गोपवधूटियाँ अच्छी तरहसे देख नहीं पाती थीं । मिथिलेश्वर! गोधूलिसे धूसरित उत्तम नील केशकलाप धारण किये, सुवर्णनिर्मित बाजूबंदसे विभूषित, मुकुटमण्डित तथा कानतक खींचकर वक्र भावसे दृष्टिबाणका प्रहार करनेवाले, गोरज - समलंकृत, कुन्दमालासे अलंकृत, कानोंमें खोंसे हुए पुष्पोंकी आभासे उद्दीप्त, पीताम्बरधारी, वेणुवादनशील तथा भूतलका भूरि- भार हरण करनेवाले प्रभु श्रीकृष्ण आप सबकी रक्षा करें ॥३७–४२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' यशोदाजीकी चिन्ता, नन्दद्वारा आश्वासन तथा दान, श्रीकृष्णकी गोचारण- लीलाका वर्णन ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
ग्यारहवाँ अध्याय धेनुकासुरका उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! एक दिन श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ मनोहर गौएँ चराते हुए नूतन तालवनके पास चले गये । उस समय समस्त गोपाल उनके साथ थे । वहाँ धेनुकासुर रहा करता था । उसके भयसे गोपगण वनके भीतर नहीं गये । श्रीकृष्ण भी नहीं गये । अकेले बलरामजीने उसमें प्रवेश किया । अपने नीले वस्त्रको कमरमें बाँधकर महाबली बलदेव परिपक्व फल लेनेके लिये उस वनमें विचरने लगे । बलरामजी साक्षात् अनन्तदेवके अवतार हैं । उनका पराक्रम भी अनन्त है । अतः दोनों हाथोंसे ताड़के वृक्षोंको हिलाते और फल - समूहोंको गिराते हुए वहाँ निर्भय गर्जना करने लगे । गिरते हुए फलोंकी आवाज सुनकर वह गर्दभाकार असुर रोषसे आग-बबूला हो गया । वह दोपहरमें सोया करता था, किंतु आज विघ्न पड़ जानेसे वह दुष्ट क्रोधसे भयंकर हो उठा । धेनुकासुर कंसका सखा होनेके साथ ही बड़ा बलवान् था । वह बलदेवजीके सम्मुख युद्ध करनेके लिये आया और उसने अपने पिछले पैरोंसे उनकी छातीमें तुरंत आघात किया । आघात करके वह बारंबार दौड़ लगाता हुआ गधेकी भाँति रेंकने लगा । तब बलरामजीने धेनुकके दोनों पिछले पैर पकड़कर शीघ्र ही उसे ताड़के वृक्षपर दे मारा । यह कार्य उन्होंने एक ही हाथसे खेल - खेलमें कर डाला । इससे वह तालवृक्ष स्वयं तो टूट ही गया, गिरते - गिरते उसने अपने पार्श्ववर्ती दूसरे बहुत - से ताड़ोंको भी धराशायी कर दिया । राजेन्द्र! वह एक अद्भुत - सी बात हुई । दैत्यराज धेनुकने पुनः उठकर रोषपूर्वक बलरामजीको पकड़ लिया और जैसे एक हाथी अपना सामना करनेवाले दूसरे हाथीको दूरतक ठेल ले जाता उसी प्रकार उन्हें धक्का देकर एक योजन पीछे हटा दिया । तब बलरामजीने तत्काल धेनुकको पकड़कर घुमाना आरम्भ किया और घुमाकर उसे धरतीकी पीठपर दे मारा । तब उसे मूर्च्छा आ गयी और उसका मस्तक फट गया । तो भी वह क्षणभरमें उठकर खड़ा हो गया । उसके शरीरसे भयानक क्रोध टपक रहा था । इसके बाद उस दैत्यने अपने मस्तकमें चार सींग प्रकट करके, भयानक रूप धारण कर उन तीखे और भयंकर सींगोंसे गोपोंको खदेड़ना आरम्भ किया । गोपोंको
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९ २ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड आगे - आगे भागते देख वह मदमत्त असुर तुरंत ही प्रहार किया । उस प्रहारसे धेनुकासुरकी तत्काल मृत्यु उनके पीछे दौड़ा॥१–१२३ ॥ हो गयी । उसी समय देवताओंने वहाँ नन्दनवनके फूल उस समय श्रीदामाने उसपर डंडेसे प्रहार किया, बरसाये ॥ १३–२६ ॥ सुबलने उसको मुक्केसे मारा, स्तोककृष्णने उस देहसे पृथक् होकर धेनुक श्यामसुन्दर - विग्रह महाबली दैत्यपर पाशसे प्रहार किया, अर्जुनने क्षेपणसे और अंशुने उस गर्दभाकार दैत्यपर लातसे आघात किया । इसके बाद विशालर्षभने आकर शीघ्रतापूर्वक अपने पैरसे और बलसे भी उस दैत्यको दबाया । तेजस्वीने अर्द्धचन्द्र ( गर्दनियाँ ) देकर उसे पीछे हटाया और देवप्रस्थने उस असुरके कई तमाचे जड़ दिये । वरूथपने उस विशालकाय गधेको गेंदसे मारा । तदनन्तर श्रीकृष्णने भी धेनुकासुरको दोनों हाथोंसे उठाकर घुमाया और तुरंत ही गोवर्धन पर्वतके ऊपर फेंक दिया । श्रीकृष्णके उस प्रहारसे धेनुक दो घड़ीतक मूच्छित पड़ा रहा । फिर उठकर अपने शरीरको कँपाता हुआ मुँह फाड़कर आगे बढ़ा और दोनों सींगोंसे श्रीहरिको उठाकर वह दैत्य दौड़कर आकाशमें चला गया । आकाशमें एक लाख योजन ऊँचे जाकर उनके साथ युद्ध करने लगा । भगवान् श्रीकृष्णने धेनुकासुर -को पकड़कर नीचे भूमिकी ओर फेंका । इससे उसकी हड्डियाँ चूर - चूर हो गयीं और वह मूच्छित हो गया । तथापि पुनः उठकर अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करते हुए उसने दोनों सींगोंसे गोवर्धन पर्वतको उखाड़ लिया और श्रीकृष्णके ऊपर चलाया । श्रीकृष्णने पर्वतको हाथसे पकड़कर पुनः उसीके मस्तकपर दे मारा । तदनन्तर उस बलवान् दैत्यने फिर पर्वतको हाथमें ले लिया और श्रीकृष्णके ऊपर फेंका । किंतु श्रीकृष्णने गोवर्धनको ले जाकर उसके पूर्व स्थानपर रख दिया । तदनन्तर फिर धावा करके महादैत्य धेनुकने दोनों सींगोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर दिया और पिछले पैरोंसे पुनः बलरामपर प्रहार करके बड़े जोरसे गर्जना की । उसकी उस गर्जनासे समस्त ब्रह्माण्ड गूँज उठा और भूमण्डल काँपने लगा । तब महाबली बलदेवने दोनों हाथोंसे उसको पकड़ लिया और उसे पृथ्वीपर दे मारा । इससे उसका मस्तक फूट गया और होश- हवास जाता रहा । इसके बाद श्रीकृष्णके बड़े भाईने पुनः उस दैत्यपर मुक्केसे धारणकर पुष्पमाला, पीताम्बर तथा वनमालासे समलंकृत देवता हो गया । लाख - लाख पार्षद उसकी सेवामें जुट आये । सहस्त्रों ध्वज उसके रथकी शोभा बढ़ाने लगे । सहस्त्रों पहियोंकी घर्घरध्वनिसे युक्त उस रथमें दस हजार घोड़े जुते थे । लाखों चँवरोंकी वहाँ शोभा हो रही थी । वह रथ अरुणवर्णका था और अत्यधिक रत्नोंसे जटित था । उसका विस्तार एक दिव्य योजनका था । वह मनके समान तीव्रगति से चलनेवाला विमान या रथ बड़ा ही मनोहर था । राजन्! उसमें घुँघुरुओंकी जाली लगी थी । घंटे और मञ्जीर बजते थे । दिव्यरूपधारी दैत्य धेनुक बलरामसहित श्रीकृष्णकी परिक्रमा करके, उक्त दिव्य रथपर आरूढ़ हो, दिशामण्डलको देदीप्यमान करता हुआ, प्रकृतिसे परे विद्यमान गोलोकधाममें चला गया । इस प्रकार धेनुकका वध करके बलरामसहित श्रीकृष्ण अपना यशोगान करते हुए ग्वाल - बालोंके साथ व्रजको लौटे । उनके साथ गौओंका समुदाय भी था ॥२७–३२ ॥ राजाने पूछा- मुने! धेनुकासुर पूर्वजन्ममें कौन था? उसे मुक्ति कैसे प्राप्त हुई? तथा उसे गधेका शरीर क्यों मिला? यह सब मुझे ठीक - ठीक बताइये ॥३३ ॥
श्रीनारदजीने कहा- विरोचनकुमार बलिका एक बलवान् पुत्र था, जिसका नाम था - साहसिक । वह दस हजार स्त्रियोंके साथ गन्धमादन पर्वतपर विहार कर रहा था । वहाँ वनमें नाना प्रकारके वाद्यों तथा रमणियोंके नूपुरोंका महान् शब्द होने लगा, जिससे उस पर्वतकी कन्दरामें रहकर श्रीकृष्णका चिन्तन करनेवाले दुर्वासा मुनिका ध्यान भङ्ग हो गया । वे खड़ाऊँ पहनकर बाहर निकले । उस समय मुनिवर दुर्वासाका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था । दाढ़ी - मूँछ बहुत बढ़ गयी थीं । वे लाठीके सहारे चलते थे । क्रोधकी तो वे मूर्तिमान् राशि ही थे और अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ते थे । दुर्वासा उन ऋषियोंमेंसे हैं, जिनके शापके भयसे यह
सारा विश्व काँपता रहता है । वे बोले ॥३४–३७ ॥
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अध्याय १२ ] श्रीकृष्णद्वारा कालियदमन तथा दावानल- पान ९ ३ दुर्वासाने कहा – दुर्बुद्धि असुर! तू गदहेके नारदजी कहते हैं- राजन्! उस शापके कारण समान भोगासक्त है, इसलिये गदहा हो जा । आजसे ही भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके हाथसे उसका चार लाख वर्ष बीतनेपर भारतमें दिव्य माथुर- वध करवाया; क्योंकि उन्होंने प्रह्लादजीको यह वर दे मण्डलके अन्तर्गत पवित्र तालवनमें बलदेवजीके रखा है कि तुम्हारे वंशका कोई दैत्य मेरे हाथसे नहीं हाथसे तेरी मुक्ति होगी ॥ ३८-३९ ॥ मारा जायगा ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' धेनुकासुरका उद्धार ' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११ ॥
बारहवाँ अध्याय श्रीकृष्णद्वारा कालियदमन तथा दावानल - पान श्रीनारदजी कहते हैं— मिथिलेश्वर! एक दिन बलरामजीको साथमें लिये बिना ही श्रीहरि स्वयं ग्वाल-बालोंके साथ गाय चराने चले आये । यमुनाके तटपर आकर उन्होंने उस विषाक्त जलको पी लिया, जिसे नागराज कालियने अपने विषसे दूषित कर दिया था । उस जलको पीकर बहुत - सी गायें और गोपगण प्राणहीन होकर पानीके निकट ही गिर पड़े । यह देख सर्वपापहारी साक्षात् भगवान् श्रीहरिका चित्त दयासे द्रवित हो उठा । उन्होंने अपनी पीयूषपूर्ण दृष्टिसे देखकर उन सबको जीवित कर दिया । इसके बाद पीताम्बरको कमर कसकर बाँध लिया । फिर वे माधव तटवर्ती कदम्ब वृक्षपर चढ़ गये और उसकी ऊँची डालसे उस विष- दूषित जलमें कूद पड़े । भगवान् श्रीकृष्णके कूदनेसे वह दूषितजल चक्कर काटकर ऊपरको उछला । यमुनाके उस भागमें कालियनाग रहता था । भँवर उठनेसे उस सर्पका भवन इस तरह चक्कर काटने लगा, जैसे जलमें पानी भरे घूमते हैं । नरेश्वर! उस समय सौ फणसे युक्त फणिराज कालिय क्रुद्ध हो उठा और माधवको दाँतोंसे हँसते हुए उसने अपने शरीरसे उन्हें आच्छादित कर लिया । तब श्रीकृष्ण अपने शरीरको बड़ा करके उसके बन्धनसे छूट गये और उस सर्पराजकी पूँछ पकड़कर उसे इधर - उधर घुमाने लगे । घुमाते - घुमाते उन्होंने उसे पानीमें गिराकर पुनः दोनों हाथोंसे उठा लिया और तुरंत उसे सौ धनुष दूर फेंक दिया । उस भयानक नागराजने पुनः उठकर जीभ लपलपाते हुए रोषपूर्वक माधव श्रीहरिका बायाँ हाथ पकड़ लिया । तब श्रीहरिने उस महादुष्टको दाहिने हाथसे पकड़कर उस जलमें उसी प्रकार दबा दिया, जैसे गरुड किसी नागको रगड़ दे । फिर अपने सौ मुखोंको बहुत अधिक फैलाकर वह सर्प उनके पास आ गया । तब उसकी पूँछ पकड़कर श्रीकृष्ण उसे सौ धनुष दूर खींच ले गये । श्रीकृष्णके हाथसे सहसा निकलकर उसने पुनः उन्हें डँस लिया । यह देख अपनेमें त्रिभुवनका बल धारण करनेवाले श्रीहरिने उस सर्पको एक मुक्का मारा । श्रीकृष्णके मुक्केकी चोट खाकर वह सर्प मूर्च्छित हो अपनी सुध-बुध खो बैठा । तदनन्तर अपने सौ मुखको आनत करके वह श्रीकृष्णके सामने स्थित हुआ । उसके सौ फन सौ मणियोंके प्रकाशसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे । श्रीकृष्ण उन फनोंपर चढ़ गये और मनोहर नट-वेष धारण करके नटकी भाँति नृत्य करने लगे । साथ ही वे सातों स्वरोंसे किसी रागका अलाप करते हुए तालके साथ संगीत प्रस्तुत करने लगे । उस समय नटराजकी भाँति सुन्दर ताण्डव करनेवाले श्रीकृष्णके ऊपर देवतालोग फूल बरसाने लगे और प्रसन्नतापूर्वक वीणा, ढोल, नगारे तथा बाँसुरी बजाने लगे । तालके साथ पदविन्यास करनेसे श्रीकृष्णने लंबी साँस खींचते हुए महाकाय कालियके बहुत - से उज्ज्वल फनको भग्न कर दिया । उसी समय भयसे विह्वल हुई नागपत्नियाँ आ पहुँचीं और भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें नमस्कार करके गद्गद वाणीद्वारा इस प्रकार स्तुति करने लगीं ॥१–१७ ॥ नापपत्त्रियाँ बोलीं- भगवन्! आप परिपूर्णतम परमात्मा तथा असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति हैं । आप
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९ ४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं गोलोकनाथ श्रीकृष्णचन्द्रको हमारा बारंबार नमस्कार है । व्रजके अधीश्वर आप श्रीराधावल्लभको नमस्कार है । नन्दके लाला एवं यशोदानन्दनको नमस्कार है । परमदेव! आप इस नागकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । तीनों लोकोंमें आपके सिवा दूसरा कोई इसे शरण देनेवाला नहीं है । आप स्वयं साक्षात् परात्पर श्रीहरि हैं और लीलासे ही स्वच्छन्दतापूर्वक नाना प्रकारके श्रीविग्रहोंका विस्तार करते हैं * ॥ १८–२० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - अबतक कालियनागका गर्व चूर्ण हो गया था । नागपत्त्रियोंद्वारा किये गये इस स्तवनके पश्चात् वह श्रीकृष्णसे बोला- ' भगवन्! पूर्णकाम परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये । ' ' पाहि पाहि ' कहता हुआ कालियनाग भगवान् श्रीहरिके सम्मुख आकर उनके चरणोंमें गिर पड़ा । तब उन जनार्दनदेवने उससे कहा ॥ २१-२२ ॥ श्रीभगवान् बोले- तुम अपनी पत्नियों और सुहृदोंके साथ रमणकद्वीपमें चले जाओ । तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणोंके चिह्न बन गये हैं, इसलिये अब गरुड तुम्हें अपना आहार नहीं बनायेगा ॥ २३ ॥
नारदजी कहते हैं— राजन्! तब उस सर्पने श्रीकृष्णकी पूजा और परिक्रमा करके, उन्हें प्रणाम करनेके अनन्तर, स्त्री- पुत्रोंके साथ रमणकद्वीपको प्रस्थान किया । इधर ' नन्दनन्दनको कालियनागने अपना परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड ग्रास बना लिया है ' - यह समाचार सुनकर नन्द आदि समस्त गोपगण वहाँ आ गये थे । श्रीकृष्णको जलसे निकलते देख उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । अपने बेटेको छातीसे लगाकर नन्दजी परमानन्दमें निमग्न हो गये । यशोदाने अपने खोये हुए पुत्रको पाकर उसके कल्याणकी कामनासे ब्राह्मणोंको धनका दान किया । उस समय उनके स्तनोंसे स्नेहाधिक्यके कारण दूध झर रहा था । राजन्! उस दिन रातमें अधिक श्रमके कारण गोपाङ्गनाओं और ग्वाल - बालोंके साथ समस्त गोप यमुनाके निकट उसी स्थानपर सो गये । निशीथकालमें बाँसोंकी रगड़से प्रलयाग्रिके समान दावानल प्रकट हो गया, जो सब ओरसे मानो गोपोंको दग्ध करनेके लिये उधर फैलता आ रहा था । उस समय मित्रकोटिके गोप बलराम - सहित श्रीकृष्णकी शरणमें गये और भयसे कातर हो दोनों हाथ जोड़कर बोले ॥ २४ – ३० ॥ गोपोंने कहा- शरणागतवत्सल महाबाहु कृष्ण! कृष्ण! प्रभो! वनके भीतर दावाग्नि के कष्टमें पड़े हुए स्वजनोंको बचाओ! बचाओ!! ॥३१ ॥
नारदजी कहते हैं— तब योगेश्वरेश्वर देव माधव उनसे बोले - ' डरो मत । अपनी - अपनी आँखें मूँद लो । ' यों कहकर वे सारा दावानल स्वयं ही पी गये । फिर-प्रातः काल विस्मित हुए गोपगणों तथा गौओंके साथ नन्दनन्दन शोभाशाली व्रजमण्डलमें आये ॥३२-३३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' कालियदमन तथा दावानल - पान ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
* नागपल्य ऊचु: -नमः श्रीकृष्णचन्द्राय गोलोकपतये नमः । असंख्याण्डाधिपतये परिपूर्णतमा ते ॥
श्रीराधापतये तुभ्यं व्रजाधीशाय ते नमः । नमः श्रीनन्दपुत्राय यशोदानन्दनाय ते ॥
पाहि पाहि परदेव पन्नगं त्वत्परं न शरणं जगत्त्रये । त्वं परात्परतरो हरिः स्वयं लीलया किल तनोषि विग्रहम् ॥ ( गर्गसंहिता, वृन्दावन ० १२ । १८-२० )