गर्ग संहिता — पृष्ठ 11–20

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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( ९ ) अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ४०- यज्ञ सम्बन्धी अश्वका व्रजमण्डलमें वृन्दावनके भीतर प्रवेश; श्रीदामाका उसे बाँधकर नन्दजीके पास ले जाना; नन्दजीका समस्त यादवों और श्रीकृष्णसे सानन्द मिलना; यादव- सेनाका वृन्दावनमें और श्रीकृष्णका नन्दपत्तनमें निवास. ५०६ ४१ - श्रीराधा और श्रीकृष्णका मिलन................. ५०८ ४२ रासक्रीडाके प्रसङ्गमें श्रीवृन्दावन, यमुना- पुलिन, वंशीवट, निकुञ्जभवन आदिकी शोभाका वर्णन; गोपसुन्दरियों श्यामसुन्दर तथा श्रीराधाकी छबिका चिन्तन.................... ५० ९ ४३- श्रीकृष्णका श्रीराधा और गोपियोंके साथ विहार तथा मानवती गोपियोंके अभिमानपूर्ण वचन सुनकर श्रीराधाके साथ उनका अन्तर्धान होना. ५१४ ४४- गोपियोंका श्रीकृष्णको खोजते हुए वंशीवटके निकट आना और श्रीकृष्णका मानवती राधाको त्यागकर अन्तर्धान होना.. ५१५ ४५- गोपाङ्गनाओंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए उनका आह्वान और श्रीकृष्णका उनके बीचमें आविर्भाव ५१७ ४६- श्रीकृष्णके आगमनसे गोपियोंको उल्लास; श्रीहरिके वेणुगीतकी चर्चासे श्रीराधाकी मूर्च्छा-का निवारण श्रीहरिका श्रीराधा आदि गोप-सुन्दरियोंके साथ वनविहार, स्थलविहार, जल-विहार, पर्वत - विहार और रासक्रीडा....... ५२० ४७- श्रीकृष्णसहित यादवका व्रजवासियोंको आश्वासन देकर वहाँसे प्रस्थान ५२२ ४८ - अश्वका हस्तिनापुरीमें जाना; उसके भालपत्र-को पढ़कर दुर्योधन आदिका रोषपूर्वक अश्वको पकड़ लेना तथा यादव सैनिकोंका कौरवोंको घायल करना.................. ५२३ ४ ९- यादवों और कौरवोंका घोर युद्ध. ५२५ ५०- कौरवोंकी पराजय और उसका भगवान् श्रीकृष्णसे मिलकर भेंटसहित अथको लौटा देना.................... ५२७ ५१ यादवोंका द्वैतवनमें राजा युधिष्ठिरसे मिलकर घोड़ेके पीछे - पीछे अन्यान्य देशोंमें जाना तथा अश्वका कौन्तलपुरमें प्रवेश ५३० अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ५२ - श्यामकर्ण अश्वका कौन्तलपुरमें जाना और भक्तराज चन्द्रहासका बहुत - सी भेंट - सामग्रीके साथ अश्वको अनिरुद्धकी सेवामें अर्पित करना और वहाँसे उन सबका प्रस्थान............. ५३२ ५३ - उद्धवकी सलाहसे समस्त यादवोंका द्वारकापुरी-की ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्धकी प्रेरणासे उद्धवका पहले द्वारकापुरीमें पहुँचकर यात्राका वृत्तान्त सुनाना... ५३३ ५४ - वसुदेव आदिके द्वारा अनिरुद्धकी अगवानी; सेना और अश्वसहित यादवका द्वारकापुरीमें लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदिके द्वारा समागत नरेशोंका सत्कार ५३५ ५५ - व्यासजीका मुनि दम्पति तथा राज- दम्पतियों-को गोमतीका जल लानेके लिये आदेश देना; नारदजीका मोह और भगवान्द्वारा उस मोहका भञ्जनः श्रीकृष्णकी कृपासे रानियोंका कलशमें जल भरकर लाना................ ५३७ ५६ - राजाद्वारा यज्ञमें विभिन्न बन्धुबान्धवको भिन्न - भिन्न कार्यों में लगाना; श्रीकृष्णका ब्राह्मणोंके चरण चरण पखारना; घीकी आहुतिसे अग्रिदेवको अजीर्ण होना यज्ञपशुके तेजका श्रीकृष्णमें प्रवेश; उसके शरीरका कर्पूरके रूपमें परिवर्तन उसकी आहुति और यज्ञकी समाप्तिपर अवभृथस्नान ५३ ९ ५७- ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा दान, पुरस्कार वितरण, सम्बन्धियों का सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने - अपने निवास स्थानको प्रस्थान......... ५४१ ५८ - श्रीकृष्णद्वारा कंस आदिका आवाहन और उनका श्रीकृष्णको ही परमपिता बताकर इस लोकके माता - पितासे मिले बिना ही वैकुण्ठ-लोकको प्रस्थान ५४३ ५ ९ - गर्गाचार्य द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके सहस्रनामोंका वर्णन................ ५४४ ६०- कौरवोंक संहार पाण्डवोंके स्वर्गगमन तथा " यादवोंके संहार आदिका संक्षिप्त वृत्तान्तः श्रीराधा तथा व्रजवासियोंसहित भगवान् श्रीकृष्णका गोलोकधाममें गमन.............. ५६०

पृष्ठ 12

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( १० ) अध्याय विषय पृष्ठ ६१ - भगवान्‌के श्यामवर्ण होनेका रहस्य; कलियुग-की पापमयी प्रवृत्ति उससे बचनेके लिये श्रीकृष्णकी समाराधना तथा एकादशी व्रतका माहात्म्य.............. ६२- गुरु और गङ्गाकी महिमा श्रीवज्रनाभद्वारा कृतज्ञता - प्रकाशन और गुरुदेवका पूजन तथा श्रीकृष्णके भजन- चिन्तन एवं गर्गसंहिताका माहात्म्य गर्गसंहिता माहात्म्य १- गर्गसंहिताके प्राकट्यका उपक्रम......... संख्या अध्याय विषय पृष्ठ संख्या २ -५६२ ३-४-५६५ ५६ ९ नारदजीकी प्रेरणासे गर्गद्वारा संहिताकी रचना; संतानके लिये दु: खी राजा प्रतिबाहुके पास महर्षि शाण्डिल्यका आगमन........ ५७० राजा प्रतिबाहुके प्रति महर्षि शाण्डिल्यद्वारा गर्गसंहिताके माहात्म्य और श्रवण - विधिका वर्णन ५७१ शाण्डिल्य मुनिका राजा प्रतिबाहुको गर्गसंहिता सुनाना; श्रीकृष्णका प्रकट होकर राजा आदिको वरदान देना; राजाको पुत्रकी प्राप्ति और संहिता-का माहात्म्य.. ५७३

पृष्ठ 13

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( ११ ) श्रीगोविन्दस्तोत्रम् चिन्तामणिप्रकारसद्मसु कल्पवृक्ष-लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम् । लक्ष्मी सहस्त्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १ ॥

मैं आदिपुरुष भगवान् गोविन्द ( श्रीकृष्ण ) - की शरण लेता हूँ, जिनकी लाखों कल्पवृक्षोंसे आवृत एवं चिन्तामणिसमूहसे निर्मित भवनोंसे लाखों लक्ष्मी - सदृश युवतियोंके द्वारा निरन्तर सेवा होती रहती है और जो स्वयं वन - वनमें घूम - घूमकर गौओंकी सेवा करते हैं । वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षं बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम् 1 कंदर्पकोटिकमनीयविशेषशोभं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २ ॥

जो वंशीमें स्वर फूँक रहे हैं, कमलकी पँखुड़ियोंके समान बड़े - बड़े जिनके नेत्र हैं, जो मोरपंखका मुकुट धारण किये रहते हैं, मेघके समान श्यामसुन्दर जिनके श्रीअङ्ग हैं, जिनकी विशेष शोभा करोड़ों कामदेवोंके द्वारा भी स्पृहणीय है, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं भजन करता हूँ । आलोलचन्द्रकलसद्वनमाल्यवंशी-रत्नाङ्गदं प्रणयकेलिकलाविलासम् । श्यामं त्रिभङ्गललितं नियतप्रकाशं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ३ ॥

जो हवासे अठखेलयाँ करते हुए मोरपंख, सुन्दर वनमाला, वंशी एवं रत्नमयं बाजूबंदसे सुशोभित हैं, जो प्रणयकेलि - कला-विलासमें दक्ष हैं, जिनका त्रिभङ्गललित श्यामसुन्दर विग्रह है और जिनका प्रकाश कभी फीका नहीं होता - सदा स्थिर रहता है, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मै आश्रय लेता हूँ । अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति । आनन्दचिन्मय सदुज्ज्वलविग्रहस्य गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ४ ॥

जिनका सच्चिदानन्दमय प्रकाशयुक्त श्रीविग्रह है तथा सम्पूर्ण इन्द्रिय - वृत्तियोंसे युक्त जिनके श्रीअङ्ग दीर्घ कालतक विभिन्न लोकोंपर दृष्टि रखते हैं, उनकी रक्षा करते हैं तथा उनका ध्यान रखते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूप-माद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च । वेदेषु दुर्लभमदुर्लभमात्मभक्तौ गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ५ ॥

जो द्वैतसे रहित हैं, अपने स्वरूपसे कभी च्युत नही होते जो सबके आदि हैं, परंतु जिनका कहीं आदि नहीं है और जो अनन्त रूपोंमें प्रकाशित हैं, जो पुराण ( सनातन ) पुरुष होते हुए भी नित्य नवयुवक हैं, जिनका स्वरूप वेदोंमें भी प्राप्त नहीं होता ( निषेधमुखसे ही वेद जिनका वर्णन करते हैं, ) किंतु अपनी भक्ति प्राप्त हो जानेपर जो दुर्लभ नहीं रह जाते - अपने भक्तोंके लिये जो सुलभ हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ । पन्थास्तु कोटिशतवत्सरसम्प्रगम्यो वायोरथापि मनसो मुनिपुंगवानाम् । सोऽप्यस्ति यत्प्रपदसीम्न्यविचिन्त्यतत्त्वे गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ६ ॥

( भगवत्प्राप्ति ) जिस मार्गको बड़े - बड़े मुनि प्राणायाम तथा चित्तनिरोधके द्वारा अरबों वर्षोंमें प्राप्त करते हैं, वही मार्ग जिनके अचिन्त्य महात्म्ययुक्त चरणोंके अग्रभागकी सीमामें स्थित रहता है, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । एकोऽप्यसौ रचयितुं जगदण्डकोटिं यच्छक्तिरस्ति जगदण्डचया यदन्तः । अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ७ ॥

जो यद्यपि सर्वथा एक हैं - उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है, फिर भी जो ( अपनी महिमासे ) करोड़ों ब्रह्माण्डोंको रचनेकी शक्ति रखते हैं - यही नहीं, ब्रह्माण्डोंके समूह जिनके भीतर रहते हैं; साथ ही जो ब्रह्माण्डोंके भीतर रहनेवाले परमाणु समूहके भी भीतर स्थित रहते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दको मैं भजता हूँ । यद्भावभावितधियो मनुजास्तथैव सम्प्राप्य रूपमहिमासनयानभूषाः । सूक्तैर्यमेव निगमप्रथितैः स्तुवन्ति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ८ ॥

जिनकी भक्तिसे भावित बुद्धिवाले मनुष्य उनके रूप, महिमा, आसन, यान ( वाहन ) अथवा भूषणोंकी झाँकी प्राप्त करके वेदप्रसिद्ध सूक्तों ( मन्त्रों ) द्वारा स्तुति करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं भजन करता हूँ । आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि-स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः । गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ९ ॥

जो सर्वात्मा होकर भी आनन्दचिन्मयरसप्रतिभावित अपनी ही स्वरूपभूता उन प्रसिद्ध कलाओं ( गोप, गोपी एवं गौओं ) के साथ गोलोकमें ही निवास करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ।

पृष्ठ 14

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( १२ ) प्रेमाञ्चनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेऽपि विलोकयन्ति । यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १० ॥

संतजन प्रेमरूपी अञ्जनसे सुशोभित भक्तिरूपी नेत्रोंसे सदा - सर्वदा जिनका अपने हृदयमें ही दर्शन करते रहते हैं, जिनका श्यामसुन्दर विग्रह है तथा जिनके स्वरूप एवं गुणोंका यथार्थरूपसे चिन्तन भी नहीं हो सकता, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । रामादिमूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन् नानावतारमकरोद्भुवनेषु किंतु । कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ११ ॥

जिन्होंने श्रीरामादि - विग्रहोंमें नियत संख्याकी कलारूपसे स्थित रहकर भिन्न - भिन्न भुवनोंमें अवतार ग्रहण किया, परंतु जो परात्पर पुरुष भगवान् श्रीकृष्णके रूपमें स्वयं प्रकट हुए, उन आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ । यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि-कोटिष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम् । तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १२ ॥

जो कोटि - कोटि ब्रह्माण्डोंमें पृथवी आदि समस्त विभूतियोंके रूपमें भिन्न - भिन्न दिखायी देता है, वह निष्कल ( अखण्ड ), अनन्त एवं अशेष ब्रह्म जिन सर्वसमर्थ प्रभुकी प्रभा है, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दको मैं भजता हूँ । माया हि यस्य जगदण्डशतानि सूते त्रैगुण्यतद्विषयवेदवितायमाना 1 सत्त्वावलम्बिपरसत्त्वविशुद्धसत्त्वं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १३ ॥

सत्त्व, रज एवं तमके रूपमें उन्हीं तीनों गुणोंका प्रतिपादन करनेवाले वेदोंके द्वारा विस्तारित जिनकी माया सैकड़ों ब्रह्माण्डोंको सर्जन करती है, उन सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले, सत्त्वसे परे एवं विशुद्धसत्त्वस्वरूप आदिपुत्र भगवान् गोविन्दकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ । आनन्दचिन्मयरसात्मतया मनस्सु यः प्राणिनां प्रतिफलन् स्मरतामुपेत्य । लीलायितेन भुवनानि जयत्यजस्त्रं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १४ ॥

जो स्मरण करनेसवाले प्राणियोंके मनोंमें अपने आनन्द-चिन्मयरसात्मक - स्वरूपसे प्रतिबिम्बित होते हैं तथा अपने लीलाचरित्रके द्वारा निरन्तर समस्त भुवनोंको वशीभूत करते रहते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । गोलोकनाम्नि निजधानि तले च तस्य देवीमहेशहरिधामसु तेषु तेषु च । ते ते प्रभावनिचया विहिताश्च येन गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १५ ॥

जिन्होंने गोलोक नामक अपने धाममें तथा उसके नीचे स्थित देवीलोक, कैलास तथा वैकुण्ठ नामक विभिन्न धामोंमें विभिन्न ऐश्वर्योंकी सृष्टि की, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दको मैं भजता हूँ । सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा । इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १६ ॥

सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयकारिणी शक्तिरूपा भगवती दुर्गा, जिनकी छायाकी भाँति समस्त लोकोंका धारण - पोषण करती हैं और जिनकी इच्छाके अनुसार चेष्टा करती हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं भजन करता हूँ । क्षीरं यथा दधिविकारविशेषयोगात् संजायते नहि ततः पृथगस्ति हेतोः । यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद् गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १७ ॥

जावन आदि विशेष प्रकारके विकारोंके संयोगसे दूध जैसे दहीके रूपमें परिवर्तित हो जाता है, किंतु अपने कारण ( दूध ) से फिर भी विजातीय नहीं बन जाता, उसी प्रकार जो ( संहाररूप ) प्रयोजनको लेकर भगवान् शंकरके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ । दीपार्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपाय विवृतहेतुसमानधर्मा । यस्तादृगेव च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १८ ॥

जैसे एक दीपककी लौ दूसरी बत्तीका संयोग पाकर दूसरा दीपक बन जाती है, जिसमें अपने कारण ( पहले दीपक ) के गुण प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार जो अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही विष्णुरूपमें दिखायी देने लगते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । यः कारणार्णवजले भजति स्म योग-निद्रामनन्तजगदण्डसरोमकूपः आधारशक्तिमवलम्ब्य परां स्वमूर्ति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १ ९ ॥ आधारशक्तिरूपा अपनी ( नारायणरूप ) श्रेष्ठ मूर्तिको धारण करके जो कारणार्णव जलमें योगनिन्द्राके वशीभूत होकर स्थित रहते हैं और उस समय उनके एक - एक रोमकूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड समाये रहते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दको मैं भजता हूँ ।

पृष्ठ 15

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( यस्यैकनिश्श्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः । विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २० ॥

जिनके रोमकूपोंसे प्रकट हुए विभिन्न ब्रह्माण्डोंके स्वामी ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश ) जिनके एक श्वास- जितने कालतक ही जीवन धारण करते हैं तथा सर्वविदित महान् विष्णु जिनकी एक विशिष्ट कलामात्र हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं भजन करता हूँ । भास्वान् यथाश्मसकलेषु निजेषु तेजः स्वीयं कियत् प्रकटयत्यपि तद्वदत्र । ब्रह्मा य एष जगदण्डविधानकर्ता गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २१ ॥

जैसे सूर्य सूर्यकान्त नामक सम्पूर्ण मणियोंमें अपने तेजका किंचित् अंश प्रकट करते हैं, उसी प्रकार एक ब्रह्माण्डका शासन करनेवाले ब्रह्मा भी अपने अंदर जिनके तेजका किंचित् अंश प्रकट करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ । यत्पादपल्लवयुगं विनिधाय कुम्भ-द्वन्द्वे प्रणामसमये स गणाधिराजः । विघ्नान् निहन्तुमलमस्य जगत्त्रयस्य गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २२ ॥

प्रणाम करते समय जिनके चरणयुगलको अपने मस्तकके दोनों भागोंपर रखकर सर्वसिद्धि भगवान् गणपति इन तीनों लोकोंके विघ्नोंका विनाश करनेमें समर्थ होते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ । अग्निर्महीगगनमम्बुमरुद्दिशश्च कालस्तथाऽऽत्ममनसीति जगत्त्रयाणि । यस्माद् भवन्ति विभवन्ति विशन्ति यं च गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २३ ॥

अग्नि, पृथिवी, आकाश, जल, वायु एवं चारों दिशाएँ; काल, बुद्धि, मन, पृथिवी, अन्तरिक्ष एवं स्वर्गरूप तीनों लोक जिनसे उत्पन्न होते हैं, समृद्ध ( पुष्ट ) होते हैं तथा जिनमें पुनः लीन हो जाते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दको मैं भजता हूँ । १३ ) यच्चक्षुरेव सविता सकलग्रहाणां राजा समस्तसुरमूर्तिरशेषतेजाः । यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृतकालचक्री गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २४ ॥

जिनके नेत्ररूप सूर्य, जो समस्त ग्रहोंके अधिपति, सम्पूर्ण देवताओंके प्रतीक एवं सम्पूर्ण तेज: स्वरूप तथा कालचक्रके प्रवर्तक होते हुए भी जिनकी आज्ञासे लोकोंमें चक्कर लगाते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दको मैं भजता हूँ । धर्मोऽथ पापनिचयः श्रुतयस्तपांसि ब्रह्मादिकीटपतगावधयश्च जीवाः । यद्दत्तमात्रविभवप्रकटप्रभावा गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २५ ॥

धर्म एवं पाप - समूह, वेदकी ऋचाएँ, नाना प्रकारके तप तथा ब्रह्मासे लेकर कीट - पतङ्गतक सम्पूर्ण जीव जिनकी दी हुई शक्तिके द्वारा ही अपना - अपना प्रभाव प्रकट करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दका मैं भजन करता हूँ । यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म-बद्धानुरूपफलभाजनमातनोति 1 कर्माणि निर्दहति किंतु च भक्तिभाजां गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २६ ॥

जो एक वीरबहूटीको एवं देवराज इन्द्रको भी अपने - अपने कर्म - बन्धनके अनुरूप फल प्रदान करते हैं, किंतु जो अपने भक्तोंके कर्मोंको निःशेषरूपसे जला डालते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ । यं क्रोधकामसहजप्रणयादिभीति-वात्सल्यमोहगुरुगौरवसेव्यभावैः 1 संचिन्त्य तस्य सदृशीं तनुमापुरेते गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २७ ॥

क्रोध, काम, सहज स्नेह आदि, भय, वात्सल्य, मोह ( सर्वविस्मृति ), गुण - गौरव ( बड़ोंके प्रति होनेवाली गौरव-बुद्धिके सदृश महान् सम्मान ) तथा सेव्य - बुद्धिसे ( अपनेको दास मानकर ) जिनका चिन्तन करके लोग उन्हींके समान रूपको प्राप्त हो गये, उन आदिपुरुष भगवान् गोवन्दिका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ ।

पृष्ठ 16

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नटवर

पृष्ठ 17

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॥ श्रीहरिः ॥ ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते श्रीगर्ग संहिता ( गोलोकखण्ड ) पहला अध्याय शौनक - गर्ग - संवाद; राजा बहुलाश्वके पूछनेपर नारदजीके द्वारा अवतार - भेदका निरूपण

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

शरद्विकचपङ्कजश्रियमतीवविद्वेषकं मिलिन्दमुनिसेवितं कुलिशकंजचिह्नावृतम् । स्फुरत्कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं चलद्युतिपदद्वयं हृदि दधामि राधापतेः ॥ वदनकमलनिर्यद् यस्य पीयूषमाद्यं पिबति जनवरोऽयं पातु सोऽयं गिरं मे । बदरवनविहारः सत्यवत्याः कुमारः प्रणतदुरितहार: शार्ङ्गधन्वावतारः ॥ ‘ भगवान नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि व्यासको नमस्कार करनेके पश्चात् जय ( श्रीहरि-की विजय - गाथासे पूर्ण इतिहास - पुराण ) का उच्चारण करना चाहिये । मैं भगवान् श्रीराधाकान्तके उन युगल-चरणकमलोंको अपने हृदयमें धारण करता हूँ, जो शरदऋतुके प्रफुल्लित कमलोंकी शोभाको अत्यन्त नीचा दिखानेवाले हैं, मुनिरूपी भ्रमरोंके द्वारा जिनका निरन्तर सेवन होता रहता हैं, जो वज्र और कमल आदिके चिह्नोंसे विभूषित हैं, जिनमें सोनेके नूपुर चमक रहे हैं और जिन्होंने भक्तोंके त्रिविध तापका सदा ही नाश किया तथा जिनसे दिव्य ज्योति छिटक रही है । जिनके मुख कमलसे निकली हुई आदि कथारूपी सुधाका बड़भागी मनुष्य सदा पान करता रहता है, वे बदरीवनमें विहार करनेवाले, प्रणतजनोंका ताप हरनेमें समर्थ, भगवान् विष्णुके अवतार सत्यवती-कुमार श्रीव्यासजी मेरी वाणीकी रक्षा करें – उसे दोषमुक्त करें ॥ १- ३ ॥ एक समयकी बात है, ज्ञानिशिरोमणि परमतेजस्वी मुनिवर गर्गजी, जो योगशास्त्रके सूर्य हैं, शौनकजीसे मिलनेके लिये नैमिषारण्यमें आये । उन्हें आया देख मुनियोंसहित शौनकजी सहसा उठकर खड़े हो गये और उन्होंने पाद्य आदि उपचारोंसे विधिवत् उनकी पूजा की ॥ ४-५ ॥ शौनकजीने कहा- साधुपुरुषोंका सब ओर विचरण धन्य है; क्योंकि वह गृहस्थ - जनोंको शान्ति प्रदान करनेका हेतु कहा गया है । मनुष्योंके भीतरी अन्धकारका नाश महात्मा ही करते हैं, न कि सूर्य । भगवन्! मेरे मनमें यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई है कि भगवान्‌के अवतार कितने प्रकारके हैं । आप कृपया इसका निवारण कीजिये ॥ ६-७ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - ब्रह्मन्! भगवान्‌के गुणानुवादसे सम्बन्ध रखनेवाला आपका यह प्रश्न बहुत ही उत्तम है । यह कहने, सुनने और पूछने-वाले - तीनोंके कल्याणका विस्तार करनेवाला है । इसी प्रसङ्गमें एक प्राचीन इतिहासका कथन किया जाता है, जिसके श्रवणमात्रसे बड़े - बड़े पाप नष्ट हो जाते । पहलेकी बात है, मिथिलापुरीमें बहुलाश्व नामसे विख्यात एक प्रतापी राजा राज्य करते थे । वे भगवान् श्रीकृष्णके परम भक्त, शान्तचित्त एवं अहंकारसे रहित थे । एक दिन मुनिवर नारदजी

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१६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड आकाशमार्गसे उतरकर उनके यहाँ पधारे । उन्हें उपस्थित देखकर राजाने आसनपर बिठाया और भलीभाँति उनकी पूजा करके हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार पूछा ॥ ८-११ ॥ श्रीजनकजी बोले – महामते! जो भगवान् अनादि, प्रकृतिसे परे और सबके अन्तर्यामी ही नहीं, आत्मा हैं, वे शरीर कैसे धारण करते हैं? ( जो सर्वत्र व्यापक है, वह शरीरसे परिच्छिन्न कैसे हो सकता है? ) यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १२ ॥

नारदजीने कहा- गौ, साधु, देवता, ब्राह्मण और वेदोंकी रक्षाके लिये साक्षात् भगवान् श्रीहरि अपनी लीलासे शरीर धारण करते हैं । [ अपनी अचिन्त्य लीलाशक्तिसे ही वे देहधारी होकर भी व्यापक बने रहते हैं । उनका वह शरीर प्राकृत नहीं, चिन्मय है । ] जैसे नट अपनी मायासे मोहित नहीं होता और दूसरे लोग मोहमें पड़ जाते हैं, वैसे ही अन्य प्राणी भगवान्‌की माया देखकर मोहित हो जाते हैं, किंतु परमात्मा मोहसे परे रहते हैं— इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥ १३-१४ ॥ श्रीजनकजीने पूछा— मुनिवर! संतोंकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुके कितने प्रकारके अवतार होते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १५ ॥

श्रीनारदजी बोले – राजन्! व्यास आदि मुनियोंने अंशांश, अंश, आवेश, कला, पूर्ण और परिपूर्णतम-ये छः प्रकारके अवतार बताये हैं । इनमेंसे छठा -परिपूर्णतम अवतार साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं । मरीचि आदि ' अंशांशावतार ', ब्रह्मा आदि ' अंशावतार ', कपिल एवं कूर्म प्रभृति ' कलावतार ' और परशुराम आदि ' आवेशावतार ' कहे गये हैं । नृसिंह, राम, श्वेतद्वीपाधिपति हरि, वैकुण्ठ, यज्ञ और नर - नारायण - ये ' पूर्णावतार ' हैं एवं साक्षात् ' श्रीनारद उवाच अंशांशोंऽशस्तथाऽऽवेशः कला पूर्णः प्रकथ्यते । अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा । पूर्णो नृसिंहो रामश्च श्वेतद्वीपाधिपो हरिः । परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम् । कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकीर्तिताः । भगवान् श्रीकृष्ण ही ' परिपूर्णतम ' अवतार हैं । असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति वे प्रभु गोलोकधाममें विराजते हैं । जो भगवान्‌के दिये सृष्टि आदि कार्यमात्रके अधिकारका पालन करते हैं, वे ब्रह्मा आदि ' सत् ' ( सत्स्वरूप भगवान् ) के अंश हैं । जो उन अंशोंके कार्यभारमें हाथ बटाते हैं, वे ' अंशांशावतार ' के नामसे विख्यात हैं । परम बुद्धिमान् नरेश! भगवान् विष्णु स्वयं जिनके अन्तःकरणमें आविष्ट हो, अभीष्ट कार्यका सम्पादन करके फिर अलग हो जाते हैं, राजन्! ऐसे नानाविध अवतारोंको ' आवेशावतार ' समझो । जो प्रत्येक युगमें प्रकट हो, युगधर्मको जानकर, उसकी स्थापना करके, पुनः अन्तर्धान हो जाते हैं, भगवान्के उन अवतारोंको ' कलावतार ' कहा गया है । जहाँ चार व्यूह प्रकट हों— जैसे श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्र एवं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, तथा जहाँ नौ रसोंकी अभिव्यक्ति देखी जाती हो एवं जहाँ बल - पराक्रमकी भी पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती हो, भगवान्‌के उस अवतारको ' पूर्णावतार ' कहा गया है । जिसके अपने तेजमें अन्य सम्पूर्ण तेज विलीन हो जाते हैं, भगवान्‌के उस अवतारको श्रेष्ठ विद्वान् पुरुष साक्षात् ‘ परिपूर्णतम ' बताते हैं । जिस अवतारमें पूर्णका पूर्ण लक्षण दृष्टिगोचर होता है और मनुष्य जिसे पृथक् पृथक् भावके अनुसार अपने परम प्रिय रूपमें देखते हैं, वही यह साक्षात् ' परिपूर्णतम ' अवतार है । [ इन सभी लक्षणोंसे सम्पन्न ] स्वयं परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, दूसरा नहीं; क्योंकि श्रीकृष्णने एक कार्यके उद्देश्यसे अवतार लेकर अन्यान्य करोड़ों कार्योंका सम्पादन किया है । जो पूर्ण, पुराण पुरुषोत्तमोत्तम एवं परात्पर पुरुष परमेश्वर हैं, उन साक्षात् सदानन्दमय, कृपानिधि, गुणोंके आकर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं शरण लेता हूँ । * यह सुनकर राजा व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ॥ वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः ॥ असंख्यब्रह्माण्डपतिर्गोलोके धानि राजते ॥ तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेऽशांशा विदिताः प्रभोः ॥

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सौन्दर्य- माधुर्य - निधि भगवान् श्रीकृष्ण

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दर्शन श्रीकृष्णका अष्टभुज शेषशायी साथ राधाके लक्ष्मीरूपिणी क्षीरसागरमें