गर्ग संहिता — पृष्ठ 21–30
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
पृष्ठ 21
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
h ब्रह्माजीद्वारा श्रीराधा - कृष्णका विवाह
पृष्ठ 22
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मिलन कृष्णका -श्रीराधा वियोगव्यथि वनमें कदली भगवान
पृष्ठ 23
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २ ] ब्रह्मादि देवोंद्वारा गोलोकधामका दर्शन १७ हर्षमें भर गये । उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया । वे प्रेमसे विह्वल हो गये और अश्रुपूर्ण नेत्रोंको पोंछकर नारदजीसे यों बोले ॥ १६-२८ ॥ राजा बहुलाश्वने पूछा - महर्षे! साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र सर्वव्यापी चिन्मय गोलोकधामसे उतरकर जो भारतवर्षके अन्तर्गत द्वारकापुरीमें विराज रहे हैं - इसका क्या कारण है? ब्रह्मन्! उन भगवान् श्रीकृष्णके सुन्दर बृहत् ( विशाल या ब्रह्मस्वरूप ) गोलोकधामका वर्णन कीजिये । महामुने! साथ ही उनके अपरिमेय कार्योंको भी कहने की कृपा । मनुष्य जब तीर्थयात्रा तथा सौ जन्मोंतक उत्तम तपस्या करके उसके फलस्वरूप सत्सङ्गका सुअवसर पाता है, तब वह भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको शीघ्र प्राप्त कर लेता है । कब मैं भक्तिरससे आर्द्रचित्त हो मनसे भगवान् श्रीकृष्णके दासका भी दासानुदास होऊँगा? जो सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी दुर्लभ हैं, वे परब्रह्म परमात्मा आदिदेव भगवान् श्रीकृष्ण मेरे नेत्रोंके समक्ष कैसे होंगे? १ ॥ २ ९ –३२ ॥ श्रीनारदजी बोले – नृपश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके अभीष्ट जन हो और उन श्रीहरिके परम प्रिय भक्त हो । तुम्हें दर्शन देनेके लिये ही वे भक्तवत्सल भगवान् यहाँ अवश्य पधारेंगे । ब्रह्मण्यदेव भगवान् जनार्दन द्वारकामें रहते हुए भी तुम्हें और ब्राह्मण श्रुतदेवको याद करते रहते हैं । अहो! इस लोकमें संतोंका कैसा सौभाग्य है! ॥ ३३–३४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णमाहात्म्यका वर्णन ' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय ब्रह्मादि देवोंद्वारा गोलोकधामका दर्शन श्रीनारदजी कहते हैं— जो जीभ पाकर भी कीर्तनीय भगवान् श्रीकृष्णका कीर्तन नहीं करता, वह दुर्बुद्धि मनुष्य मोक्षकी सीढ़ी पाकर भी उसपर चढ़नेकी चेष्टा नहीं करता । राजन्! अब इस वाराहकल्पमें धराधामपर जो भगवान् श्रीकृष्णका पदार्पण हुआ है और यहाँ उनकी जो - जो लीलाएँ हुई हैं, वह सब मैं तुमसे कहता हूँ; सुनो । बहुत पहलेकी बात है— दानव, दैत्य, आसुर - स्वभावके मनुष्य और दुष्ट राजाओंके भारी भारसे अत्यन्त पीड़ित हो, पृथ्वी गौका येषामन्तर्गतो विष्णुः कार्यं कृत्वा विनिर्गतः धर्मं विज्ञाय कृत्वा यः पुनरन्तरधीयत चतुर्व्यूहो भवेद्यत्र दृश्यन्ते च रसा नव यस्मिन् सर्वाणि तेजांसि विलीयन्ते स्वतेजसि पूर्णस्य लक्षणे यत्र यं पश्यन्ति पृथक् पृथक् परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो नान्य एव हि पूर्णः पुराणः पुरुषोत्तमोत्तमः परात्परो यः पुरुषः परेश्वरः १. श्रीकृष्णदासस्य च दासदासः कदा भवेयं मनसाऽऽर्द्रचितः रूप धारण करके, अनाथकी भाँति रोती - बिलखती हुई अपनी आन्तरिक व्यथा निवेदन करनेके लिये ब्रह्माजीकी शरणमें गयी । उस समय उसका शरीर काँप रहा था । वहाँ उसकी कष्टकथा सुनकर ब्रह्माजीने उसे धीरज बँधाया और तत्काल समस्त देवताओं तथा शिवजीको साथ लेकर वे भगवान् नारायणके वैकुण्ठ-धाममें गये । वहाँ जाकर ब्रह्माजीने चतुर्भुज भगवान् विष्णुको प्रणाम करके अपना सारा अभिप्राय निवेदन किया । तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु उन उद्विग्न । नानवेशावतारांश्च विद्धि राजन् महामते ॥ । युगे युगे वर्तमानः सोऽवतारः कला हरेः ॥ । अतः परं च वीर्याणि स तु पूर्णः प्रकथ्यते ॥ । तं वदन्ति परे साक्षात् परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ । भावेनापि जनाः सोऽयं परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ । एक कार्यार्थमागत्य कोटिकार्यं चकार ह ॥ । स्वयं सदाऽऽनन्दमयं कृपाकरं गुणाकरं तं शरणं व्रजाम्यहम् ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १ । १६–२७ ) । यो दुर्लभो देववरैः परात्मा स मे कथं गोचर आदिदेवः ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १ । ३२ ) २. जिह्वां लब्ध्वापि यः कृष्णं कीर्तनीयं न कीर्तयेत् । लब्ध्वापि मोक्षनिःश्रेणीं स नारोहति दुर्मतिः ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० २ । १ )
पृष्ठ 24
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड देवताओं तथा ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले ॥१–६ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – ब्रह्मन्! साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण ही अगणित ब्रह्माण्डोंके स्वामी, परमेश्वर, अखण्डस्वरूप तथा देवातीत हैं । उनकी लीलाएँ अनन्त एवं अनिर्वचनीय हैं । उनकी कृपाके बिना यह कार्य कदापि सिद्ध नहीं होगा, अतः तुम उन्हींके अविनाशी एवं परम उज्ज्वल धाममें शीघ्र जाओ * ॥ ७ ॥
श्रीब्रह्माजी बोले- प्रभो! आपके अतिरिक्त कोई दूसरा भी परिपूर्णतम तत्त्व है, यह मैं नहीं जानता । यदि कोई दूसरा भी आपसे उत्कृष्ट परमेश्वर है, तो उसके लोकका मुझे दर्शन कराइये ॥ ८ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर परिपूर्णतम भगवान् विष्णुने सम्पूर्ण देवताओं सहित ब्रह्माजीको ब्रह्माण्ड - शिखरपर विराजमान गोलोकधामका मार्ग दिखलाया । वामनजीके पैरके बायें अँगूठेसे ब्रह्माण्डके शिरोभागका भेदन हो जानेपर जो छिद्र हुआ, वह ' ब्रह्मद्रव ' ( नित्य अक्षय नीर ) से परिपूर्ण था । सब देवता उसी मार्गसे वहाँके लिये नियत जलयानद्वारा बाहर निकले । वहाँ ब्रह्माण्डके ऊपर पहुँचकर उन सबने नीचेकी ओर उस ब्रह्माण्डको कलिङ्गबिम्ब ( तूंबे ) की भाँति देखा । इसके अतिरिक्त अन्य भी बहुत - से ब्रह्माण्ड उसी जलमें इन्द्रायण - फलके सदृश इधर - उधर लहरोंमें लुढ़क रहे थे । यह देखकर सब देवताओंको विस्मय हुआ । वे चकित हो गये । वहाँसे करोड़ों योजन ऊपर आठ नगर मिले, जिनके चारों ओर दिव्य चहारदीवारी शोभा बढ़ा रही थी और झुंड के झुंड रत्नादिमय वृक्षोंसे उन पुरियोंकी मनोरमता बढ़ गयी थी । वहीं ऊपर देवताओंने विरजानदीका सुन्दर तट देखा, जिससे विरजाकी तरंगें टकरा रही थीं । वह तटप्रदेश उज्ज्वल रेशमी वस्त्रके समान शुभ्र दिखायी देता था । दिव्य मणिमय सोपानोंसे वह अत्यन्त उद्भासित हो रहा था । तटकी शोभा देखते और आगे बढ़ते हुए वे देवता उस उत्तम नगरमें पहुँचे, जो अनन्तकोटि सूर्योकी ज्योतिका महान् पुञ्ज जान पड़ता था । उसे देखकर देवताओंकी आँखें चौंधिया गयीं । वे उस तेजसे पराभूत हो जहाँ - के - तहाँ खड़े रह गये । तब भगवान् विष्णुकी आज्ञाके अनुसार उस तेजको प्रणाम करके ब्रह्माजी उसका ध्यान करने लगे । उसी ज्योतिके भीतर उन्होंने एक परम शान्तिमय साकार धाम देखा । उसमें परम अद्भुत, कमलनालके समान धवल - वर्ण हजार मुखवाले शेषनागका दर्शन करके सभी देवताओंने उन्हें प्रणाम किया । राजन्! उन शेषनागकी गोदमें महान् आलोकमय लोकवन्दित गोलोकधामका दर्शन हुआ, जहाँ धामाभिमानी देवताओंके ईश्वर तथा गणनाशीलोंमें प्रधान कालका भी कोई वश नहीं चलता । वहाँ माया भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकती । मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, सोलह विकार तथा महत्तत्त्व भी वहाँ प्रवेश नहीं कर सकते हैं; फिर तीनों गुणोंके विषयमें तो कहना ही क्या है! वहाँ कामदेवके समान मनोहर रूप - लावण्य-शालिनी, श्यामसुन्दरविग्रहा श्रीकृष्णपार्षदा द्वारपालका कार्य करती थीं । देवताओंको द्वारके भीतर जानेके लिये उद्यत देख उन्होंने मना किया ॥ ९ – २० ॥ तब देवता बोले- हम सभी ब्रह्मा, विष्णु,
शंकर नामके लोकपाल और इन्द्र आदि देवता हैं ।
भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनार्थ यहाँ आये हैं ॥ २१ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— देवताओंकी बात सुनकर उन सखियोंने, जो श्रीकृष्णकी द्वारपालिकाएँ थीं, अन्तःपुरमें जाकर देवताओंकी बात कह सुनायीं । तब एक सखी, जो शतचन्द्रानना नामसे विख्यात थी, जिसके वस्त्र पीले थे और जो हाथमें बेंतकी छड़ी लिये थी, बाहर आयी और उनसे उनका अभीष्ट प्रयोजन पूछा ॥ २२-२३ ॥
* श्रीभगवानुवाच-कृष्णं स्वयं विगणिताण्डपतिं परेशं साक्षादखण्डमतिदेवमतीवलीलम् ।
कार्य कदापि न भविष्यति यं विना हि गच्छाशु तस्य विशदं पदमव्ययं त्वम् ॥
( गर्ग ०, गोलोक ० २ । ७ )
पृष्ठ 25
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २ ] ब्रह्मादि देवोंद्वारा गोलोकधामका दर्शन १ ९ शतचन्द्रानना बोली — यहाँ पधारे हुए आप सब देवता किस ब्रह्माण्डके निवासी हैं, यह शीघ्र बताइये । तब मैं भगवान् श्रीकृष्णको सूचित करनेके लिये उनके पास जाऊँगी ॥ २४ ॥
देवताओंने कहा - अहो! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है, क्या अन्यान्य ब्रह्माण्ड भी हैं? हमने तो उन्हें कभी नहीं देखा । शुभे! हम तो यही जानते हैं कि एक ही ब्रह्माण्ड है, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं ॥ २५ ॥
शतचन्द्रानना बोली- ब्रह्मदेव! यहाँ तो विरजा नदीमें करोड़ों ब्रह्माण्ड इधर - उधर लुढ़क रहे हैं । उनमें भी आप - जैसे ही पृथक् - पृथक् देवता वास करते हैं । अरे! क्या आपलोग अपना नाम - गाँवतक नहीं जानते? जान पड़ता है— कभी यहाँ आये नहीं हैं; अपनी थोड़ी - सी जानकारीमें ही हर्षसे फूल उठे हैं । जान पड़ता है, कभी घरसे बाहर निकले ही नहीं । जैसे गूलरके फलोंमें रहनेवाले कीड़े जिस फलमें रहते हैं, उसके सिवा दूसरेको नहीं जानते, उसी प्रकार आप - जैसे साधारण जन जिसमें उत्पन्न होते हैं, एकमात्र उसीको ' ब्रह्माण्ड ' समझते हैं ॥२६–२८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार उपहासके पात्र बने हुए सब देवता चुपचाप खड़े रहे, कुछ बोल न सके | उन्हें चकित - से देखकर भगवान् विष्णुने कहा ॥ २ ९ ॥ श्रीविष्णु बोले – जिस ब्रह्माण्डमें भगवान् पृश्निगर्भका सनातन अवतार हुआ है तथा त्रिविक्रम ( विराट् - रूपधारी वामन ) के नखसे जिस ब्रह्माण्डमें विवर बन गया है, वहीं हम निवास करते हैं ॥ ३० ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- भगवान् विष्णुकी यह बात सुनकर शतचन्द्राननाने उनकी भूरि - भूरि प्रशंसा की और स्वयं भीतर चली गयी । फिर शीघ्र ही आयी और सबको अन्तःपुरमें पधारनेकी आज्ञा देकर वापस चली गयी । तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओंने परमसुन्दर धाम गोलोकका दर्शन किया । वहाँ ' गोवर्धन ' नामक गिरिराज शोभा पा रहे थे । गिरिराजका वह प्रदेश उस समय वसन्तका उत्सव मनानेवाली गोपियों और गौओंके समूहसे घिरा था, कल्पवृक्षों तथा कल्पलताओंके समुदायसे सुशोभित था और रास-मण्डल उसे मण्डित ( अलंकृत ) कर रहा था । वहाँ श्यामवर्णवाली उत्तम यमुना नदी स्वच्छन्द गतिसे बह रही है । तटपर बने हुए करोड़ों प्रासाद उसकी शोभा बढ़ाते हैं तथा उस नदीमें उतरनेके लिये वैदूर्यमणिकी सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हैं । वहाँ दिव्य वृक्षों और लताओंसे भरा हुआ ' वृन्दावन ' अत्यन्त शोभा पा रहा है; भाँति-भाँतिके विचित्र पक्षियों, भ्रमरों तथा वंशीवटके कारण वहाँकी सुषमा और बढ़ रही है । वहाँ सहस्रदल कमलोंके सुगन्धित परागको चारों ओर पुनः - पुनः बिखेरती हुई शीतल वायु मन्द गतिसे बह रही है । वृन्दावनके मध्यभागमें बत्तीस वनोंसे युक्त एक ' निज निकुञ्ज ' है । चहारदीवारियाँ और खाइयाँ उसे सुशोभित कर रही हैं । उसके आँगनका भाग लाल वर्णवाले अक्षयवटोंसे अलंकृत है । पद्मरागादि सात प्रकारकी मणियोंसे बनी दीवारें तथा आँगनके फर्श बड़ी शोभा पाते हैं । करोड़ों चन्द्रमाओंके मण्डलकी छवि धारण करनेवाले चँदोवे उसे अलंकृत कर रहे हैं तथा उनमें चमकीले गोले लटक रहे हैं । फहराती हुई दिव्य पताकाएँ एवं खिले हुए फूल मन्दिरों एवं मार्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं । वहाँ भ्रमरोंके गुञ्जारव संगीतकी सृष्टि करते हैं । तथा मत्त मयूरों और कोकिलोंके कलरव सदा श्रवणगोचर होते हैं । वहाँ बालसूर्यके सदृश कान्तिमान् अरुण पीत कुण्डल धारण करनेवाली ललनाएँ शत-शत चन्द्रमाओंके समान गौरवर्णसे उद्भासित होती हैं । स्वच्छन्द गति से चलनेवाली वे सुन्दरियाँ मणिरत्नमय भित्तियोंमें अपना मनोहर मुख देखती हुई वहाँके रत्नजटित आँगनोंमें भागती फिरती हैं । उनके गलेमें हार और बाँहोंमें केयूर शोभा देते हैं । नूपूरों तथा करधनीकी मधुर झनकार वहाँ गूँजती रहती है । वे गोपाङ्गनाएँ मस्तकपर चूड़ामणि धारण किये रहती हैं । वहाँ द्वार-द्वारपर कोटि - कोटि मनोहर गौओंके दर्शन होते हैं । वे गौएँ दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं और श्वेत पर्वत समान प्रतीत होती हैं । सब की सब दूध देनेवाली तथा नयी अवस्थाकी हैं । सुशीला, सुरुचा तथा सद्गुणवती हैं । सभी सवत्सा और पीली पूँछकी हैं । ऐसी भव्य
पृष्ठ 26
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड रूपवाली गौएँ वहाँ सब ओर विचर रही हैं । उनके घंटों तथा मञ्जीरोंसे मधुर ध्वनि होती रहती है । किङ्किणीजालोंसे विभूषित उन गौओंके सींगोंमें सोना मढ़ा गया है । वे सुवर्ण - तुल्य हार एवं मालाएँ धारण करती हैं । उनके अङ्गोंसे प्रभा छिटकती रहती है । सभी गौएँ भिन्न - भिन्न रंगवाली हैं- कोई उजली, कोई काली, कोई पीली, कोई लाल, कोई हरी, कोई ताँबेके रंगकी और कोई चितकबरे रंगकी हैं । किन्हीं - किन्हींका वर्ण धुँए - जैसा है । बहुत - सी कोयलके समान रंगवाली हैं । दूध देनेमें समुद्रकी तुलना करनेवाली उन गायोंके शरीरपर तरुणियोंके करचिह्न शोभित हैं, अर्थात् युवतियोंके हाथोंके रंगीन छापे दिये गये हैं । हिरनके समान छलाँग भरनेवाले बछड़ोंसे उनकी अधिक शोभा बढ़ गयी है । गायके झुंडमें विशाल शरीरवाले साँड़ भी इधर - उधर घूम रहे हैं । उनकी लंबी गर्दन और बड़े-बड़े सींग हैं । उन साँड़ोंको साक्षात् धर्मधुरंधर कहा जाता है । गौओंकी रक्षा करनेवाले चरवाहे भी अनेक हैं । उनमेंसे कुछ तो हाथमें बेंतकी छड़ी लिये हुए हैं । और दूसरोंके हाथमें सुन्दर बाँसुरी शोभा पाती है । उन सबके शरीरका रंग श्यामल है । वे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी लीलाएँ ऐसे मधुर स्वरोंमें गाते हैं कि उसे सुनकर कामदेव भी मोहित हो जाता है ॥ ३१-४८ ॥ इस ' दिव्य निज निकुञ्ज ' को सम्पूर्ण देवताओंने प्रणाम किया और भीतर चले गये । वहाँ उन्हें हजार दलवाला एक बहुत बड़ा कमल दिखायी पड़ा । वह ऐसा सुशोभित था, मानो प्रकाशका पुञ्ज हो । उसके ऊपर एक सोलह दलका कमल है तथा उसके ऊपर भी एक आठ दलवाला कमल है । उसके ऊपर चमचमाता हुआ एक ऊँचा सिंहासन है । तीन सीढ़ियोंसे सम्पन्न वह परम दिव्य सिंहासन कौस्तुभ -इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत मणियोंसे जटित होकर अनुपम शोभा पाता है । उसीपर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र श्रीराधिकाजीके साथ विराजमान हैं । ऐसी झाँकी उन समस्त देवताओंको मिली । वे युगलरूप भगवान् मोहिनी आदि आठ दिव्य सखियोंसे समन्वित तथा श्रीदामा प्रभृति आठ गोपालोंके द्वारा सेवित हैं । उनके ऊपर हंसके समान सफेद रंगवाले पंखे झले जा रहे हैं और हीरोंसे बनी मूँठवाले चँवर डुलाये जा रहे हैं । भगवान्की सेवामें करोंड़ों ऐसे छत्र प्रस्तुत हैं, जो कोटि चन्द्रमाओंकी प्रभासे तुलित हो सकते हैं । भगवान् श्रीकृष्णके वामभागमें विराजित श्रीराधिकाजीसे उनकी बायीं भुजा सुशोभित है । भगवान्ने स्वेच्छापूर्वक अपने दाहिने पैरको टेढ़ा कर रखा है । वे हाथमें बाँसुरी धारण किये हुए । उन्होंने मनोहर मुसकानसे भरे मुखमण्डल और भ्रुकुटि-विलाससे अनेक कामदेवोंको मोहित कर रखा है । उन श्रीहरिकी मेघके समान श्यामल कान्ति है । कमल-दलकी भाँति बड़ी विशाल उनकी आँखें हैं । घुटनोंतक लंबी बड़ी भुजाओंवाले वे प्रभु अत्यन्त पीले वस्त्र पहने हुए हैं । भगवान् गलेमें सुन्दर वनमाला धारण किये हुए हैं, जिसपर वृन्दावनमें विचरण करनेवाले मतवाले भ्रमरोंकी गुंजार हो रही है । पैरोंमें घुंघरू और हाथोंमें कङ्कणकी छटा छिटका रहे हैं । अति सुन्दर मुसकान मनको मोहित कर रही है । श्रीवत्सका चिह्न, बहुमूल्य रत्नोंसे बने हुए किरीट, कुण्डल, बाजूबंद और हार यथास्थान भगवान्की शोभा बढ़ा रहे हैं । * भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे दिव्य दर्शन प्राप्तकर सम्पूर्ण देवता आनन्दके समुद्रमें गोता खाने लगे । अत्यन्त हर्षके कारण उनकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह चली । तब सम्पूर्ण देवताओंने हाथ जोड़कर विनीत - भावसे उन परम पुरुष श्रीकृष्णचन्द्रको प्रणाम किया ॥ ४ ९ –५७ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीगोलोकधामका वर्णन ' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
* ज्योतिषां मण्डलं पद्मं सहस्रदलशोभितम् ॥
तदूर्ध्वं षोडशदलं ततोऽष्टदलपङ्कजम् । तस्योपरि स्फुरद्दीर्घं सोपानत्रयमण्डितम् ॥
सिंहासनं परं दिव्यं कौस्तुभैः खचितं शुभम् । ददृशुर्देवतास्तत्र श्रीकृष्णं राधया युतम् ॥
पृष्ठ 27
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तीसरा अध्याय भगवान् श्रीकृष्णके श्रीविग्रहमें श्रीविष्णु आदिका प्रवेश; देवताओं द्वारा भगवान्की स्तुति; भगवान्का अवतार लेनेका निश्चय; श्रीराधाकी चिन्ता और भगवान्का उन्हें सान्त्वना प्रदान श्रीजनकजीने पूछा – मुने! परात्पर महात्मा भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन प्राप्तकर सम्पूर्ण देवताओंने आगे क्या किया, मुझे यह बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! उस समय सबके देखते - देखते अष्ट भुजाधारी वैकुण्ठाधिपति भगवान् श्रीहरि उठे और साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके श्रीविग्रहमें लीन हो गये । उसी समय कोटि सूर्योके समान तेजस्वी, प्रचण्ड पराक्रमी पूर्णस्वरूप भगवान् नृसिंहजी पधारे और भगवान् श्रीकृष्णके तेजमें वे भी समा गये । इसके बाद सहस्र भुजाओंसे सुशोभित, श्वेतद्वीपके स्वामी विराट् पुरुष, जिनके शुभ्र रथमें सफेद रंगके लाख घोड़े जुते हुए थे, उस रथपर आरूढ़ होकर वहाँ आये । उनके साथ श्रीलक्ष्मीजी भी थीं । वे अनेक प्रकारके अपने आयुधोंसे सम्पन्न थे । पार्षदगण चारों ओरसे उनकी सेवामें उपस्थित थे । वे भगवान् भी उसी समय श्रीकृष्णके श्रीविग्रहमें सहसा प्रविष्ट हो गये । फिर वे पूर्णस्वरूप कमललोचन भगवान् श्रीराम स्वयं वहाँ पधारे । उनके हाथमें धनुष और बाण थे तथा साथमें श्रीसीताजी और भरत आदि तीनों भाई भी थे । उनका दिव्य रथ दस करोड़ सूर्योंके समान प्रकाशमान था । उसपर निरन्तर चँवर डुलाये जा रहे थे । असंख्य वानरयूथपति उनकी रक्षाके दिव्यैरष्टसखीसंघैर्मोहिन्यादिभिरन्वितम् हंसाभैर्व्यजनान्दोलचामरैर्वज्रमुष्टिभिः कार्यमें संलग्न थे । उस रथके एक लाख चक्कोंसे मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि निकल रही थी । उसपर लाख ध्वजाएँ फहरा रही थीं । उस रथमें लाख घोड़े जुते हुए थे । वह रथ सुवर्णमय था । उसीपर बैठकर भगवान् श्रीराम वहाँ पधारे थे । वे भी श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य विग्रहमें लीन हो गये । फिर उसी समय साक्षात् यज्ञनारायण श्रीहरि वहाँ पधारे, जो प्रलयकालकी जाज्वल्यमान अग्निशिखाके समान उद्भासित हो रहे थे । देवेश्वर यज्ञ अपनी धर्मपत्नी दक्षिणाके साथ ज्योतिर्मय रथपर बैठे दिखायी देते थे । वे भी उस समय श्यामविग्रह भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रमें लीन हो गये । तत्पश्चात् साक्षात् भगवान् नर - नारायण वहाँ पधारे । उनके शरीरकी कान्ति मेघके समान श्याम थी । उनके चार भुजाएँ थीं, नेत्र विशाल थे और वे मुनिके वेषमें थे । उनके सिरका जटा - जूट कौंधती हुई करोड़ों बिजलियोंके समान दीप्तिमान् था । उनका दीप्तिमण्डल सब ओर उद्भासित हो रहा था । दिव्य मुनीन्द्रमण्डलोंसे मण्डित वे भगवान् नारायण अपने अखण्डित ब्रह्मचर्यसे शोभा पाते थे । राजन्! सभी देवता आश्चर्ययुक्त मनसे उनकी ओर देख रहे थे । किंतु वे भी श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णमें तत्काल लीन हो गये । इस प्रकारके विलक्षण दिव्य दर्शन प्राप्तकर सम्पूर्ण देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ । उन । श्रीदामाद्यैः सेव्यमानमष्टगोपालसेवितम् ॥ । कोटिचन्द्रप्रतीकाशैः सेवितं छत्रकोटिभिः ॥
श्रीराधिकालंकृतवामबाहुं स्वच्छन्दवक्रीकृतदक्षिणाङ्घ्रिम् ।
वंशीधरं सुन्दरमन्दहासं भ्रूमण्डलामोहितकामराशिम् ॥
घनप्रभं पद्मदलायतेक्षणं प्रलम्बबाहुं बहुपीतवाससम् ।
वृन्दावनोन्मत्तमिलिन्दशब्दैर्विराजितं श्रीवनमालया हरिम् ॥
काञ्चीकलाकङ्कणनूपुरद्युतिं लसन्मनोहारिमहोज्ज्वलस्मितम् ।
श्रीवत्सरत्नोत्तमकुन्तलप्रियं किरीटहाराङ्गदकुण्डलत्विषम् ॥
( गर्ग ०, गोलोक ० ४ ९ –५६ )
पृष्ठ 28
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड सबको यह भलीभाँति ज्ञात हो गया कि परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र स्वयं परिपूर्णतम भगवान् हैं । तब वे उन परमप्रभुकी स्तुति करने लगे ॥२- १४ ॥ देवता बोले- जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र पूर्णपुरुष, परसे भी पर, यज्ञोंके स्वामी, कारणके भी परम कारण, परिपूर्णतम परमात्मा और साक्षात् गोलोकधामके अधिवासी हैं, इन परम पुरुष श्रीराधावरको हम सादर नमस्कार करते हैं । योगेश्वर लोग कहते हैं कि आप परम तेजःपुञ्ज हैं; शुद्ध अन्तःकरणवाले भक्तजन ऐसा मानते हैं कि आप लीलाविग्रह धारण करनेवाले अवतारी पुरुष हैं; परंतु हमलोगोंने आज आपके जिस स्वरूपको जाना है, वह अद्वैत - सबसे अभिन्न एक अद्वितीय है; अतः आप महत्तम तत्त्वों एवं महात्माओंके भी अधिपति हैं; आप परब्रह्म परमेश्वरको हमारा नमस्कार है । कितने विद्वानोंने व्यञ्जना, लक्षणा और स्फोटद्वारा आपको जानना चाहा; किंतु फिर भी वे आपको पहचान न सके; क्योंकि आप निर्दिष्ट भावसे रहित हैं । अतः मायासे निर्लेप आप निर्गुण ब्रह्मकी हम शरण ग्रहण करते हैं । किन्होंने आपको ' ब्रह्म ' माना है, कुछ दूसरे लोग आपके लिये ' काल ' शब्दका व्यवहार करते हैं । कितनोंकी ऐसी धारणा है कि आप शुद्ध ' प्रशान्त ' स्वरूप हैं तथा कतिपय मीमांसक लोगोंने तो यह मान रखा है कि पृथ्वीपर आप ' कर्म ' रूपसे विराजमान हैं । कुछ प्राचीनोंने ' योग ' नामसे तथा कुछने ' कर्ता ' के रूपमें आपको स्वीकार किया है । इस प्रकार सबकी परस्पर विभिन्न ही उक्तियाँ हैं । अतएव कोई भी आपको * श्रीदेवा ऊचुः-कृष्णाय पूर्णपुरुषाय परात्पराय यज्ञेश्वराय परकारणकारणाय योगेश्वराः किल वदन्ति महः परं त्वं तत्रैव सात्वतजनाः कृतविग्रहं च व्यङ्गयेन वा न न हि लक्षणया कदापि स्फोटेन निर्देश्यभावरहितं प्रकृतेः परं वस्तुतः नहीं जान सका । ( कोई भी यह नहीं कह सकता कि आप यही हैं, ' ऐसे ही ' हैं । ) अतः आप ( अनिर्देश्य, अचिन्त्य, अनिर्वचनीय ) भगवान्की हमने शरण ग्रहण की है । भगवन्! आपके चरणोंकी सेवा अनेक कल्याणोंको देनेवाली है । उसे छोड़कर जो तीर्थ, यज्ञ और तपका आचरण करते हैं, अथवा ज्ञानके द्वारा जो प्रसिद्ध हो गये हैं; उन्हें बहुत - से विघ्नोंका सामना करना पड़ता है; वे सफलता प्राप्त नहीं कर सकते । भगवन्! अब हम आपसे क्या निवेदन करें, आपसे तो कोई भी बात छिपी नहीं है; क्योंकि आप चराचरमात्रके भीतर विद्यमान हैं । जो शुद्ध अन्तःकरणवाले एवं देहबन्धनसे मुक्त हैं, वे ( हम विष्णु आदि ) देवता भी आपको नमस्कार ही करते हैं । ऐसे आप पुरुषोत्तम भगवान्को हमारा प्रणाम है । जो श्रीराधिकाजीके हृदयको सुशोभित करनेवाले चन्द्रहार गोपियोंके नेत्र और जीवनके मूल आधार हैं तथा ध्वजाकी भाँति गोलोकधामको अलंकृत कर रहे हैं, वे आदिदेव भगवान् आप संकटमें पड़े हुए हम देवताओंकी रक्षा करें, रक्षा करें । भगवन्! आप वृन्दावनके स्वामी हैं, गिरिराजपति भी कहलाते हैं । आप व्रजके अधिनायक हैं, गोपालके रूपमें अवतार धारण करके अनेक प्रकारकी नित्य विहार- लीलाएँ करते हैं । श्रीराधिकाजीके प्राणवल्लभ एवं श्रुतिधरोंके भी आप स्वामी हैं । आप ही गोवर्धनधारी हैं, अब आप धर्मके भारको धारण करनेवाली इस पृथ्वीका उद्धार करनेकी कृपा करें * ॥ १५–२२ ॥ नारदजी कहते हैं - इस प्रकार स्तुति करनेपर । राधावराय परिपूर्णतमाय साक्षाद् गोलोकधामधिषणाय नमः परस्मै ॥ । अस्माभिरद्य विदितं यददोऽद्वयं ते तस्मै नमोऽस्तु महतां पतये परस्मै ॥
यच्च कवयो न विशन्ति मुख्याः ।
च त्वां ब्रह्म निर्गुणमलं शरणं व्रजामः ॥
त्वां ब्रह्म केचिदवयन्ति परे च कालं केचित् प्रशान्तमपरे भूवि कर्मरूपम् ।
पूर्वे च योगमपरे किल कर्तृभावमन्योक्तिभिर्न विदितं शरणं गताः स्मः ॥
श्रेयस्करीं भगवतस्तव पादसेवां हित्वाथ तीर्थयजनादि तपश्चरन्ति ।
ज्ञानेन ये च विदिता बहुविघ्नसंधैः संताडिताः किल भवन्ति न ते कृतार्थाः ॥
विज्ञाप्यमद्य किमु देव अशेषसाक्षी यः सर्वभूतहृदयेषु विराजमानः ।
देवैर्नमद्भिरमलाशयमुक्तदेहैस्तस्मै नमो भगवते पुरुषोत्तमाय ॥
पृष्ठ 29
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ३ ] भगवान् श्रीकृष्णके श्रीविग्रहमें श्रीविष्णु आदिका प्रवेश २३ गोकुलेश्वर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र प्रणाम करते हुए देवताओंको सम्बोधित करके मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले - ॥ २३ ॥
श्रीकृष्णभगवान्ने कहा- ब्रह्मा, शंकर एवं ( अन्य ) देवताओ! तुम सब मेरी बात सुनो । मेरे आदेशानुसार तुमलोग अपने अंशोंसे देवियोंके साथ यदुकुलमें जन्म धारण करो । मैं भी अवतार लूँगा और मेरे द्वारा पृथ्वीका भार दूर होगा । मेरा वह अवतार यदुकुलमें होगा और मैं तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करूँगा । वेद मेरी वाणी, ब्राह्मण मुख और गौ शरीर है । सभी देवता मेरे अङ्ग हैं । साधुपुरुष तो हृदयमें वास करनेवाले मेरे प्राण ही हैं । अतः प्रत्येक युगमें जब दम्भपूर्ण दुष्टोंद्वारा इन्हें पीड़ा होती है और धर्म, यज्ञ तथा दयापर भी आघात पहुँचता है, तब मैं स्वयं अपने आपको भूतलपर प्रकट करता हूँ ॥ २४ – २७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- जिस समय जगत्पति भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी क्षण ' अब प्राणनाथसे मेरा वियोग हो जायगा ' यह समझकर श्रीराधिकाजी व्याकुल हो गयीं और दावानलसे दग्ध लताकी भाँति मूच्छित होकर गिर पड़ीं । उनके शरीरमें अश्रु, कम्प, रोमाञ्च आदि सात्त्विक भावोंका उदय हो गया ॥ २८ ॥
श्रीराधिकाजीने कहा- आप पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूमण्डलपर अवश्य पधारें; परंतु मेरी एक प्रतिज्ञा है, उसे भी सुन लें - प्राणनाथ! आपके चले जानेपर एक क्षण भी मैं यहाँ जीवन धारण नहीं कर सकूँगी । यदि आप मेरी इस प्रतिज्ञापर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो मैं दुबारा भी कह रही हूँ । अब मेरे प्राण अधरतक पहुँचनेको अत्यन्त विह्वल हैं । ये इस शरीरसे वैसे ही उड़ जायँगे, जैसे कपूरके धूलिकण ॥ २ ९ -३० ॥ श्रीभगवान् बोले— राधिके! तुम विषाद मत करो । मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और पृथ्वीका भार दूर करूँगा । मेरे द्वारा तुम्हारी बात अवश्य पूर्ण होगी ॥ ३१ ॥
श्रीराधिकाजीने कहा – ( परंतु ) प्रभो! जहाँ वृन्दावन नहीं है, यमुना नदी नहीं है और गोवर्धन पर्वत भी नहीं है, वहाँ मेरे मनको सुख नहीं मिलता ॥ ३२ ॥
नारदजी कहते हैं— ( श्रीराधिकाजीके इस प्रकार कहनेपर ) भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने अपने धामसे चौरासी कोस भूमि, गोवर्धन पर्वत एवं यमुना नदीको भूतलपर भेजा । उस समय सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माजीने परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णको बार - बार प्रणाम करके कहा ॥ ३३-३४ ॥ श्रीब्रह्माजीने पूछा – भगवन्! मेरे लिये कौन स्थान होगा? आप कहाँ पधारेंगे? तथा ये सम्पूर्ण देवता किन गृहोंमें रहेंगे और किन - किन नामोंसे इनकी प्रसिद्धि होगी? ॥ ३५ ॥
श्रीभगवान् ने कहा- मैं स्वयं वसुदेव और देवकीके यहाँ प्रकट होऊँगा । मेरे कलास्वरूप ये ' शेष ' रोहिणीके गर्भसे जन्म लेंगे - इसमें संशय नहीं है । साक्षात् ' लक्ष्मी ' राजा भीष्मकके घर पुत्रीरूपसे उत्पन्न होंगी । इनका नाम ' रुक्मिणी ' होगा और ' पार्वती ' ' जाम्बवती ' के नामसे प्रकट होंगी । यज्ञपुरुषकी पत्नी ' दक्षिणा देवी ' वहाँ ' लक्ष्मणा ' नाम धारण करेंगी । यहाँ जो ' विरजा ' नामकी नदी है, वही ' कालिन्दी ' नामसे विख्यात होगी । भगवती ' लज्जा ' का नाम ' भद्रा ' होगा । समस्त पापोंका प्रशमन करनेवाली ' गङ्गा ' ' मित्रविन्दा ' नाम धारण करेगी । जो इस समय ' कामदेव ' हैं, वे ही रुक्मिणीके गर्भसे ' प्रद्युम्न ' रूपमें उत्पन्न होंगे । प्रद्युम्नके घर तुम्हारा अवतार होगा । उस समय तुम्हें ' अनिरुद्ध ' कहा जायगा, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है । ये ' वसु ' जो ' द्रोण ' के नामसे प्रसिद्ध हैं, व्रजमें ' नन्द ' होंगे और
यो राधिकाहृदयसुन्दरचन्द्रहारः श्रीगोपिकानयनजीवनमूलहारः ।
गोलोकधामधिषणध्वज आदिदेवः स त्वं विपत्सु विबुधान् परिपाहि पाहि ॥
वृन्दावनेश गिरिराजपते व्रजेश गोपालवेषकृत नित्यविहारलील ।
राधापते श्रुतिधराधिपते धरां त्वं गोवर्द्धनोद्धरण उद्धर धर्मधाराम् ॥
( गर्ग ०, गोलोक ० ३ । १५–२२ )
पृष्ठ 30
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड स्वयं इनकी प्राणप्रिया ' धरा देवी ' ' यशोदा ' नाम धारण प्रसिद्ध होंगी । फिर उन्हींके यहाँ इन श्रीराधिकाजीका करेंगी । ' सुचन्द्र ' ' वृषभानु ' बनेंगे तथा इनकी प्राकट्य होगा । मैं व्रजमण्डलमें गोपियोंके साथ सदा सहधर्मिणी ' कलावती ' धराधामपर ' कीर्ति ' के नामसे रासविहार करूँगा ॥ ३६ – ४१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' भूतलपर अवतीर्ण होनेके उद्योगका वर्णन ' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय नन्द आदिके लक्षण; गोपीयूथका परिचय; श्रुति आदिके गोपीभावकी प्राप्तिमें कारणभूत पूर्वप्राप्त वरदानोंका विवरण भगवान् ने कहा- ब्रह्मन्! ' सुबल ' और ' श्रीदामा ' नामके मेरे सखा नन्द तथा उपनन्दके घरपर जन्म धारण करेंगे । इसी प्रकार और भी मेरे सखा हैं, जिनके नाम ' स्तोककृष्ण ', ' अर्जुन ' एवं ' अंशु ' आदि हैं, वे सभी नौ नन्दोंके यहाँ प्रकट होंगे । व्रजमण्डलमें जो छः वृषभानु हैं, उनके गृहमें विशाल, ऋषभ, तेजस्वी, देवप्रस्थ और वरूथप अवतीर्ण होंगे ॥ १-२ ॥ श्रीब्रह्माजीने पूछा— देवेश्वर जाता है और किसे ' उपनन्द ' तथा लक्षण हैं? ॥ ३ ॥
श्रीभगवान् कहते हैं— जो गौओंका पालन करते रहते हैं एवं नामके मेरे सखा ! किसे ' नन्द ' कहा ' वृषभानु ' के क्या गोशालाओंमें सदा गो - सेवा ही जिनकी जीविका है, उन्हें मैंने ' गोपाल ' संज्ञा दी है । अब तुम उनके लक्षण सुनो । गोपालोंके साथ नौ लाख गायोंके स्वामीको ' नन्द ' कहा जाता है । पाँच लाख गौओंका स्वामी ' उपनन्द ' पदको प्राप्त करता है । ' वृषभानु ' नाम उसका पड़ता है, जिसके अधिकारमें दस लाख गौएँ रहती हैं, ऐसे ही जिसके यहाँ एक करोड़ गौओंकी रक्षा होती है, वह ' नन्दराज ' कहलाता है । पचास लाख गौओंके अध्यक्षकी ' वृषभानुवर ' संज्ञा है । ' सुचन्द्र ' बन्धु और जगत् के कारण ( प्रकृति ) के भी कारण हैं । प्रभो! अब आप मेरे समक्ष यूथके सम्पूर्ण लक्षणोंका वर्णन कीजिये ॥ ९ ॥
श्रीभगवान् बोले— ब्रह्माजी! मुनियोंने दस कोटिको एक ' अर्बुद ' कहा है । जहाँ दस अर्बुद होते हैं । उसे ' यूथ ' कहा जाता है । यहाँकी गोपियोंमें कुछ गोलोकवासिनी हैं, कुछ द्वारपालिका हैं, कुछ शृङ्गार-साधनोंकी व्यवस्था करनेवाली हैं और कुछ शय्या सँवारनेमें संलग्न रहती हैं । कई तो पार्षदकोटिमें आती हैं और कुछ गोपियाँ श्रीवृन्दावनकी देख - रेख किया करती हैं । कुछ गोपियोंका गोवर्धन गिरिपर निवास है । कई गोपियाँ कुञ्जवनको सजाती - सँवारती हैं तथा बहुतेरी गोपियाँ मेरे निकुञ्जमें रहती हैं । इन सबको मेरे व्रजमें पधारना होगा । ऐसे ही यमुना- गङ्गाके भी यूथ हैं । इसी प्रकार रमा, मधुमाधवी, विरजा, ललिता, विशाखा एवं मायाके यूथ होंगे । ब्रह्माजी! इसी प्रकार मेरे व्रजमें आठ, सोलह और बत्तीस सखियोंके भी यूथ होंगे । पूर्वके अनेक युगोंमें जो श्रुतियाँ, मुनियोंकी पत्नियाँ, अयोध्याकी महिलाएँ, यज्ञमें स्थापित की हुई सीता, जनकपुर एवं कोसलदेशकी निवासिनी सुन्दरियाँ तथा पुलिन्दकन्याएँ थीं तथा जिनको मैं पूर्ववर्ती युग - युगमें और ' द्रोण ' – ये दो ही व्रजमें इस प्रकारके सम्पूर्ण वर दे चुका हूँ, वे सब मेरे पुण्यमय व्रजमें गोपीरूपमें लक्षणोंसे सम्पन्न गोपराज बनेंगे और मेरे दिव्य व्रजमें पधारेंगी और उनके भी यूथ होंगे ॥ १०–१७ ॥ सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाली शतचन्द्रानना गोप- श्रीब्रह्माजीने पूछा – पुरुषोत्तम! इन स्त्रियोंने सुन्दरियोंके सौ यूथ होंगे ॥४-८ ॥ कौन - सा पुण्य - कार्य किया है तथा इन्हें कौन - कौन - से श्रीब्रह्माजीने कहा- भगवन्! आप दीनजनोंके वर मिल चुके हैं, जिनके फलस्वरूप ये व्रजमें निवास