गर्ग संहिता — पृष्ठ 171–180

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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अध्याय १७ ] श्रीयमुनाका स्तोत्र १६५ यह श्रीयमुनाका परम अद्भुत कवच है । जो है । जो तीन महीनेकी अवधितक प्रतिदिन भक्तिभावसे भक्तिभावसे दस बार इसका पाठ करता है, वह निर्धन शुद्धचित्त हो इसका एक सौ दस बार पाठ करेगा, भी धनवान् हो जाता है । जो बुद्धिमान् मनुष्य ब्रह्मचर्यके उसको क्या - क्या नहीं मिल जायगा? जो प्रातःकाल पालनपूर्वक परिमित आहारका सेवन करते हुए तीन उठकर इसका पाठ करेगा, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका मासतक इसका पाठ करेगा, वह सम्पूर्ण राज्योंका फल मिल जायगा तथा अन्तमें वह योगिदुर्लभ आधिपत्य प्राप्त कर लेगा, इसमें संशय नहीं परमधाम गोलोकमें चला जायगा ॥ * ११ – १४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्ग संहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत श्रीसौभरि - मांधाताके संवादमें ' यमुना - कवच ' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥

सत्रहवाँ अध्याय श्रीयमुनाका स्तोत्र मांधाता बोले – मुनिश्रेष्ठ सौभरे! सम्पूर्ण सिद्धिप्रदान करनेवाला जो यमुनाजीका दिव्य उत्तम स्तोत्र है, उसका कृपापूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

श्रीसौभरिमुनिने कहा – महामते! अब तुम सूर्यकन्या यमुनाका स्तोत्र सुनो, जो इस भूतलपर समस्त सिद्धियोंको देनेवाला तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है । श्रीकृष्णके बायें कंधेसे प्रकट हुई ' कृष्णा ' को सदा मेरा नमस्कार है । कृष्णे! तुम श्रीकृष्णस्वरूपिणी हो; तुम्हें बारंबार नमस्कार है । जो पापरूपी पङ्कजलके कलङ्कसे कुत्सित कामी कुबुद्धि मनुष्य सत्पुरुषोंके साथ कलह करता है, उसे भी गूँजते हुए भ्रमर और जलपक्षियोंसे युक्त कलिन्दनन्दिनी यमुना वृन्दावनधाम प्रदान करती हैं । कृष्णे! तुम्हीं साक्षात् श्रीकृष्णस्वरूपा हो । तुम्हीं प्रलयसिन्धुके वेगयुक्त भँवरमें महामत्स्यरूप धारण करके विराजती हो । तुम्हारी ऊर्मि ऊर्मिमें भगवान् कूर्मरूपसे वास करते हैं तथा तुम्हारे बिन्दु - बिन्दुमें श्रीगोविन्ददेवकी आभाका दर्शन होता है । तटिनि! तुम लीलावती हो, मैं तुम्हारी वन्दना करता हूँ । तुम * इदं श्रीयमुनायाश्च कवचं परमाद्भुतम् । त्रिभिर्मासैः पठेद् धीमान् ब्रह्मचारी मिताशनः । दशोत्तरशतं नित्यं त्रिमासावधि भक्तितः । यः पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वतीर्थफलं लभेत् । घनी भूत मेघके समान श्याम कान्ति धारण करती हो । श्रीकृष्णके बायें कंधेसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ है । सम्पूर्ण जलोंकी राशिरूप जो विरजा नदीका वेग है, उसको भी अपने बलसे खण्डित करती हुई, ब्रह्माण्ड-को छेदकर देवनगर, पर्वत, गण्डशैल आदि दुर्गम वस्तुओंका भेदन करके तुम इस भूमिखण्डके मध्यभागमें अपनी तरङ्गमालाओंको स्थापित करके प्रवाहित होती हो । यमुने! पृथ्वीपर तुम्हारा नाम दिव्य है । वह श्रवणपथमें आकर पर्वताकार पापसमूहको भी दण्डित एवं खण्डित कर देता है । तुम्हारा वह अखण्ड नाम मेरे वाङ्मण्डल - वचनसमूहमें क्षणभर भी स्थित हो जाय । यदि वह एक बार भी वाणीद्वारा गृहीत हो जाय तो समस्त पापोंका खण्डन हो जाता है । उसके स्मरणसे दण्डनीय पापी भी अदण्डनीय हो जाते हैं । तुम्हारे भाई सूर्यपुत्र यमराजके नगरमें तुम्हारा ' प्रचण्डा ' यह नाम सुदृढ़ अतिदण्ड बनकर विचरता है । तुम विषयरूपी अन्धकूपसे पार जानेके लिये रस्सी हो; अथवा पापरूपी चूहोंको निगल जानेवाली काली नागिन हो; अथवा विराट् पुरुषकी मूर्तिकी वेणीको दशवारं पठेद् भक्त्या निर्धनो धनवान् भवेत् ॥ सर्वराज्याधिपत्यत्वं प्राप्यते नात्र संशयः ॥ यः पठेत् प्रयतो भूत्वा तस्य किं किं न जायते ॥ अन्ते व्रजेत् परं धाम गोलोकं योगिदुर्लभम् ॥ ( गर्ग ०, माधुर्य ० १६ । ११–१४ )

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१६६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं अलंकृत करनेवाला नीले पुष्पोंका गजरा हो या उनके मस्तकपर सुशोभित होनेवाली सुन्दर नीलमणिकी माला हो । जहाँ आदिकर्ता भगवान् श्रीकृष्णकी वल्लभा, गोलोकमें भी अतिदुर्लभा, अति सौभाग्यवती अद्वितीया नदी श्रीयमुना प्रवाहित होती हैं, उस भूतलके मनुष्यों का भाग्य इसी कारणसे धन्य है । गौओंके समुदाय तथा गोप - गोपियोंकी क्रीडासे कलित कलिन्दनन्दिनी यमुने! कृष्णप्रभे! तुम्हारे तटपर जो जलकी गोलाकार, चपल एवं उत्ताल तरङ्गोंका कोलाहल ( कल - कल रव ) होता है, वह सदा मेरी रक्षा करे । तुम्हारे दुर्गम कुञ्जोंके प्रति कौतूहल रखनेवाले भ्रमरसमुदायके गुञ्जारव, मयूरोंकी केका तथा कूजते हुए कोकिलोंकी काकलीका शब्द भी उस इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड कोलाहलमें मिला रहता है तथा वह व्रजलताओंके अलंकारको धारण करनेवाला है । शरीरमें जितने रोम हैं, उतनी ही जिह्वाएँ हो जायँ, धरतीपर जितने सिकताकण हैं, उतनी ही वाग्देवियाँ आ जायँ और उनके साथ संत-महात्मा भी शेषनागके समान सहस्रों जिह्वाओंसे युक्त होकर गुणगान करने लग जायँ, तथापि तुम्हारे गुणका अन्त कभी नहीं हो सकता । कलिन्दगिरिनन्दिनी यमुनाका यह उत्तम स्तोत्र यदि उष: कालमें ब्राह्मणके मुखसे सुना जाय अथवा स्वयं पढ़ा जाय तो भूतलपर परम मङ्गलका विस्तार करता है । जो कोई मनुष्य भी यदि नित्यशः इसका धारण ( चिन्तन ) करे तो वह भगवान्‌की निज निकुञ्जलीलाके द्वारा वरण किये गये परमपदको प्राप्त होता है * ॥२-११ ॥ श्रीसौभरि - मांधाताके संवादमें ' श्रीयमुनास्तोत्र ' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

अठारहवाँ अध्याय यमुनाजीके जप और पूजनके लिये पटल और पद्धतिका वर्णन मांधाता बोले- मुनिश्रेष्ठ! यमुनाजीके काम-पूरक पवित्र पटल तथा पद्धतिका जैसा स्वरूप है, वह मुझे बताइये; क्योंकि आप साक्षात् ज्ञानकी निधि हैं ॥ १ ॥

* मार्तण्डकन्यकायास्तु स्तवं णु महामते । कृष्णवामांसभूतायै कृष्णायै सततं नमः । यः पापपङ्काम्बुक्लङ्ककुत्सितः कामी कुधीः सत्सु कलिं करोति हि । " कृष्णे साक्षात् कृष्णरूपा त्वमेव वेगावर्ते वर्तते मत्स्यरूपी । सौभरिने कहा – महामते! अब मैं यमुनाजीके पटल तथा पद्धतिका भी वर्णन करता हूँ, जिसका अनुष्ठान, श्रवण अथवा जप करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है । पहले प्रणव ( ॐ ) का उच्चारण करके सर्वसिद्धिकरं भूमौ चातुर्वर्ग्यफलप्रदम् ॥ नमः श्रीकृष्णरूपिण्यै कृष्णे तुभ्यं नमो नमः ॥ वृन्दावनं धाम ददाति तस्मै - नन्दन्मिलिन्दादि कलिन्दनन्दिनी ॥ उर्मावूम कूर्मरूपी सदा ते बिन्दौ बिन्दौ भाति गोविन्ददेवः ॥ वन्दे लीलावतीं त्वां सघनघननिभां कृष्णवामांसभूतां वेगं वै वैरजाख्यं सकलजलचयं खण्डयन्तीं बलात् स्वात् । छित्त्वा ब्रह्माण्डमारात् सुरनगरनगान् गण्डशैलादिदुर्गान् भित्त्वा भूखण्डमध्ये तटिनि धृतवतीमूर्मिमालां प्रयान्तीम् ॥ दिव्यं कौ नामधेयं श्रुतपथ यमुने दण्डयत्यद्रितुल्यं पापव्यूहं त्वखण्डं वसतु मम गिरामण्डले तु क्षणं तत् । दण्ड्यांश्चाकार्यदण्ड्यान् सकृदपि वचसा खण्डितं यद् गृहीतं भ्रातुर्मार्तण्डसूनो रटति पुरि दृढस्ते प्रचण्डेति दण्डः ॥ रज्जुर्वा विषयान्धकूपतरणे पापाखुदर्वीकरी वेण्युष्णिक्क विराजमूर्तिशिरसो मालास्ति वा सुन्दरी । धन्यं भाग्यमतः परं भुवि नृणां यत्रादिकृद्वल्लभा गोलोकेऽप्यतिदुर्लभातिसुभगा भात्यद्वितीया नदी ॥ गोपीगोकुलगोपकेलिकलिते कालिन्दि कृष्णप्रभे त्वत्कूले जललोलगोलविचलत्कल्लोलकोलाहलः । त्वत्कान्तारकुतूहलालिकुलकृज्झंकारकेकाकुलः कूजत्कोकिलसंकुलो व्रजलतालंकारभृत् पातु माम् ॥ भवन्ति जिह्वास्तनुरोमतुल्या गिरो यदा भूसिकता इवाशु । तदप्यलं यान्ति न ते गुणान्तं सन्तो महान्तः किल शेषतुल्याः ॥ कलिन्दगिरिनन्दिनीस्तव उषस्ययं वापरः । श्रुतश्च यदि पाठितो भुवि तनोति सन्मङ्गलम् ॥

जनोऽपि यदि धारयेत् किल पठेच्च यो नित्यशः । स याति परमं पदं निजनिकुञ्जलीलावृतम् ॥

( गर्ग ०, माधुर्य ० १७ । २–११ )

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्त्रनाम १६७ फिर मायाबीज ( ह्रीं ) का उच्चारण करे । तत्पश्चात् लक्ष्मीबीज ( श्रीं ) को रखकर उसके बाद कामबीज ( क्लीं ) का विधिवत् प्रयोग करे । इसके अनन्तर ' कालिन्दी ' शब्दका चतुर्थ्यन्त रूप ( कालिन्यै ) रखे । फिर ' देवी ' शब्दके चतुर्थ्यन्तरूप ( देव्यै ) का प्रयोग करके अन्तमें ' नमः ' पद जोड़ दे । ( इस प्रकार ' ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिन्यै देव्यै नमः । ' यह मन्त्र बनेगा । ) इस मन्त्रका मनुष्य विधिवत् जप करे । इस ग्यारह अक्षरवाले मन्त्रका ग्यारह लाख जप करनेसे इस पृथ्वीपर सिद्धि प्राप्त हो सकती है । मनुष्योंद्वारा जिन -जिन काम्य - पदार्थोंके लिये प्रार्थना की जाती है, वे सब स्वतः सुलभ हो जाते हैं॥२-४ ॥ सुन्दर सिंहासनपर षोडशदल कमल अङ्कित करके उसकी कर्णिकामें श्रीकृष्णसहित कालिन्दीका न्यास ( स्थापन ) करे । कमलके सोलह दलोंमें अलग-अलग विधिपूर्वक नाम ले - लेकर मानवश्रेष्ठ साधक क्रमशः गङ्गा, विरजा, कृष्णा, चन्द्रभागा, सरस्वती, गोमती, कौशिकी, वेणी, सिंधु, गोदावरी, वेदस्मृति, वेत्रवती, शतद्रू, सरयू, ऋषिकुल्या तथा ककुद्मिनीका पूजन करे । पूर्वादि चार दिशाओंमें क्रमशः वृन्दावन, गोवर्धन, वृन्दा तथा तुलसीका उनके नामोच्चारणपूर्वक क्रमशः पूजन करे । तत्पश्चात् ' ॐ नमो भगवत्यै कलिन्दनन्दिन्यै सूर्यकन्यायै यमभगिन्यै श्रीकृष्णप्रियायै यूथीभूतायै स्वाहा । ' इस मन्त्र आवाहन आदि सोलह उपचारोंको एकाग्रचित्त हो अर्पित करे॥५–१० ॥ इस प्रकार यमुनाका पटल जानो । अब पद्धति बताऊँगा । जबतक पुरश्चरण पूरा न हो जाय, तबतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए मौनावलम्बनपूर्वक द्विजको जप करना चाहिये । पुरश्चरणकालमें जौका आटा खाय, पृथ्वीपर शयन करे, पत्तलपर भोजन करे और मनको वशमें रखे । राजन्! आचार्यको चाहिये कि काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा द्वेषको त्यागकर परम भक्तिभावसे जपमें प्रवृत्त रहे । ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर कालिन्दी देवीका ध्यान करे और अरुणोदयकी बेलामें नदीमें स्नान करे । मध्याह्नकालमें और दोनों संध्याओंके समय संध्या-वन्दन अवश्य किया करे । राजन्! जब अनुष्ठान समाप्त हो, तब यमुनाके तटपर जाकर पुत्रों सहित दस लाख महात्मा ब्राह्मणोंका गन्ध - पुष्पसे पूजन करके उन्हें उत्तम भोजन दे । तदनन्तर वस्त्र, आभूषण और सुवर्णमय चमकीले पात्र तथा उत्तम दक्षिणाएँ दे । इससे निश्चय ही सिद्धि होती है ॥११–१७ ॥ महामते! नरेश! इस प्रकार मैंने तुमसे यमुनाजीके जप और पूजनकी पद्धति बतायी है । तुम सारा नियम पूर्ण करो । बताओ! अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत मांधाता और सौभरिके संवादमें ' पटल और पद्धतिका वर्णन ' नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

उन्नीसवाँ अध्याय यमुना - सहस्त्रनाम मांधाता बोले - मनुष्य श्रेष्ठ! यमुनाजीका सहस्रनाम समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला उत्तम साधन है, आप मुझे उसका उपदेश कीजिये; क्योंकि आप सर्वज्ञ और निरामय ( रोग - शोकसे रहित ) हैं ॥१ ॥

सौभरिने कहा – मांधाता नरेश! मैं तुमसे ' कालिन्दी सहस्रनाम ' का वर्णन करता हूँ । वह समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला, दिव्य तथा श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाला है ॥ २ ॥

विनियोग ॐ अस्य श्रीकालिन्दीसहस्त्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य सौभरिऋषिः, श्रीयमुना देवता, अनुष्टुप्छन्दः, माया-बीजमिति कीलकम्, रमाबीजमिति शक्तिः, श्रीकलिन्दनन्दिनीप्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।

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१६८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड — उक्त वाक्य पढ़कर सहस्रनाम पाठके लिये विनियोगका जल छोड़े । ध्यान श्यामामम्भोजनेत्रां सघनघनरुचिं रत्नमञ्जीरकूजत् काञ्चीकेयूरयुक्तां कनकमणिमये बिभ्रतिं कुण्डले द्वे । भ्राजच्छ्रीनीलवस्त्रस्फुरदिभजचलद्धारभारां मनोज्ञां ध्याये मार्तण्डपुत्रीं तनुकिरणचयोद्दीप्तदीपाभिरामाम् ॥३ ॥

जो श्यामा ( श्यामवर्णा एवं षोडश वर्षकी अवस्थावाली ) हैं, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमल - दलकी शोभाको छीने लेते हैं, घनीभूत मेघके समान जिनकी नील कान्ति है, जो रत्नोंद्वारा निर्मित बजते हुए नूपुर और झनकारती हुई करधनी एवं केयूर आदि आभूषणोंसे युक्त हैं तथा कानोंमें सुवर्ण एवं मणिनिर्मित दो कुण्डल धारण करती हैं, दीप्तिमती नीली साड़ीपर चमकते हुए गजमौक्तिकके चञ्चल हारका भार वहन करनेसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ती हैं, शरीरसे छिटकती हुई किरणोंकी राशिसे उद्दीप्त होनेके कारण जिनकी प्रज्वलित दीपमालाके समान शोभा हो रही है, उन सूर्यनन्दिनी यमुनाजीका मैं ध्यान करता हूँ ॥३ ॥

सहस्त्रनाम १. ॐ कालिन्दी - सच्चिदानन्दस्वरूपा कलिन्दगिरिनन्दिनी, २. यमुना = यमकी बहिन, ३. कृष्णा = कृष्णवर्णा, ४. कृष्णरूपा = कृष्णस्वरूपा अथवा कृष्णरूपवाली, ५. सनातनी - नित्या, ६. कृष्णवामांससम्भूता = श्रीकृष्णके बायें कंधेसे प्रकट हुई, ७. परमानन्दरूपिणी परमानन्दमयी ॥ ४ ॥

८. गोलोकवासिनी - गोलोकधाममें निवास करनेवाली, ९. श्यामा - श्यामवर्णा अथवा षोडश वर्षकी अवस्थावाली, १०. वृन्दावनविनोदिनी -वृन्दावनमें मनोरञ्जन करनेवाली, ११. राधासखी -श्रीराधाकी सहचरी, १२. रासलीला - रासमण्डलमें लीलापरायणा अथवा रासलीलास्वरूपा, १३. रास-मण्डलमण्डिनी - रासमण्डलको अलंकृत करनेवाली ॥ ५ ॥

१४. निकुञ्जवासिनी - निकुञ्जमें निवास करने-वाली, १५. वल्ली = लतास्वरूपा, १६. रङ्गवल्ली = रासरङ्गस्थलीमें वल्लीके समान शोभा पानेवाली अथवा रङ्गवल्ली नामकी राधा- सखी गोपीसे अभिन्नस्वरूपा, १७. मनोहरा = मनको हर लेनेवाली, १८. श्रीः = लक्ष्मीस्वरूपा, १ ९. रासमण्डलीभूता- रासमण्डल स्वरूपा अथवा मण्डलाकार होकर रासमण्डलको अलंकृत करनेवाली, २० यूथीभूता = अपनी सहचरियोंके यूथसे संयुक्त, २१. हरिप्रिया - श्रीकृष्णकी प्यारी ॥ ६ ॥

२२. गोलोकतटिनी - गोलोकधामकी नदी, २३. दिव्या दिव्यस्वरूपा, २४. निकुञ्जतलवासिनी = निकुञ्जके भीतर निवास करनेवाली, २५. दीर्घा = बहुत लंबे परिमाणकी, २६. ऊर्मिवेगगम्भीरा - तरंगोंके वेगसे युक्त एवं गहरी, २७ पुष्पपल्लववाहिनी = फूलों और पल्लवोंको बहानेवाली ॥ ७ ॥

२८. घनश्यामा = मेघके समान श्याम कान्ति-वाली, २ ९. मेघमाला = घनमालास्वरूपा, ३०. बलाका - बकपङ्क्ति स्वरूपा, ३१. पद्ममालिनी-कमलोंकी मालासे अलंकृत, ३२. परिपूर्णतमा = परिपूर्णतम भगवत्स्वरूपा, ३३. पूर्णा = पूर्णस्वरूपा, ३४. पूर्णब्रह्मप्रिया = पूर्णब्रह्म श्रीकृष्णकी प्रेयसी, ३५. परा - पराशक्तिस्वरूपा ॥ ८ ॥

३६. महावेगवती - बड़े वेगवाली, ३७. साक्षा-निकुञ्जद्वारनिर्गता साक्षात् निकुञ्जके द्वारसे निकली हुई, ३८. महानदी - विशाल सरिता, ३ ९. मन्दगति = मन्दगति से बहनेवाली, ४०. विरजावेगभेदिनी = गोलोकधामकी विरजा नदीके वेगका भेदन करने-वाली ॥ ९ ॥

४१. अनेक ब्रह्माण्डगता = अनेकानेक ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त, ४२. ब्रह्मद्रवसमाकुला = ब्रह्मद्रवस्वरूपा गङ्गाजीसे मिली हुई, ४३. गङ्गामिश्रा - गङ्गाके जलसे मिश्रित जलवाली, ४४. निर्मलाभा = निर्मल आभावाली, ४५. निर्मला - सब प्रकारके मलोंसे रहित, ४६. सरितांवरा = नदियोंमें श्रेष्ठ ॥ १० ॥

४७. रत्नबद्धोभयतटी दोनों किनारोंकी तट-भूमिमें रत्नसे आबद्ध, ४८. हंसपद्मादिसंकुला - हंसादि पक्षियों और कमल आदि पुष्पोंसे व्याप्त, ४ ९. नदी-अव्यक्त शब्द, कलकल नाद करनेवाली, ५०. निर्मल-पानीया - स्वच्छ जलवाली, ५१. सर्वब्रह्माण्डपावनी-

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्त्रनाम १६ ९ समस्त ब्रह्माण्डोंको पवित्र करनेवाली ॥ ११ ॥

५२. वैकुण्ठपरिखीभूता - वैकुण्ठधामको चारों ओरसे घेरकर परिखा ( खाईं ) के समान सुशोभित, ५३. परिखा - खाईस्वरूपा, ५४. पापहारिणी = पापका नाश करनेवाली, ५५. ब्रह्मलोकगता - ब्रह्म-लोकमें पहुँची हुई, ५६. ब्राह्मी - ब्रह्मशक्तिस्वरूपा, ५७. स्वर्गा = स्वर्गलोकमें ५ ९. उठनेवाली, वाली, ६१. अलंकृत प्रकाशमाना, स्वर्गलोकस्वरूपा, ५८. स्वर्गनिवासिनी = वास करनेवाली ॥ १२ ॥

उल्लसन्ती = तरङ्गोंद्वारा ऊपरकी ओर ६० प्रोत्पतन्ती - जोर - जोरसे उछलने-मेरुमाला - मेरुपर्वतको मालाकी भाँति करनेवाली, ६२.महोज्ज्वला = अत्यन्त ६३. श्रीगङ्गाम्भः शिखरिणी - गङ्गाजीके जलको शिखरका रूप देनेवाली, ६४. गण्डशैल-विभेदिनी = गण्डशैलोंका भेदन करनेवाली ॥ १३ ॥

६५. देशान् पुनन्ती = देशोंको पवित्र करनेवाली, ६६. गच्छन्ती - गतिशीला, ६७. वहन्ती - प्रवहमाना, ६८. भूमिमध्यगा = धरतीके भीतर प्रवेश करनेवाली, ६ ९. मार्तण्डतनूजा = सूर्यपूत्री, ७०. पुण्या = पुण्य -प्रदा, ७१. कलिन्दगिरिनन्दिनी - कलिन्द पर्वतसे निकली हुई ॥१४ ॥

७२. यमस्वसा - यमराजकी बहन, ७३. मन्द-हासा- मन्द - मन्द मुसकरानेवाली, ७४. सुद्विजा = सुन्दर दाँतोंवाली, ७५. रचिताम्बरा = धरतीके लिये आच्छादनवस्त्र के रूपमें निर्मित, ७६. नीलाम्बरा -नील वस्त्र धारण करनेवाली, ७७. पद्ममुखी = कमलवदना, ७८. चरन्ती- विचरनेवाली, ७ ९. चारुदर्शना = मनोहर दृष्टिवाली अथवा देखनेमें मनोहर ॥ १५ ॥

८०. रम्भोरू = कदलीके खंभे - जैसे ऊरुद्वय धारण करनेवाली, ८१. पद्मनयना = कमललोचना, ८२. माधवी - माधवप्रिया, ८३. प्रमदा = यौवनशालिनी, ८४. उत्तमा - उत्तम, ८५. तपश्चरन्ती = श्रीकृष्ण-प्राप्तिके लिये तपस्या करनेवाली, ८६. सुश्रोणी - सुन्दर नितम्बको धारण करनेवाली, ८७. कूजन्नूपुरमेखला = बजते हुए नूपुरों और करधनीसे सुशोभित ॥ १६ ॥

८८. जलस्थिता - पानीमें निवास करनेवाली, ८ ९. श्यामलाङ्गी - श्यामल अङ्गवाली, ९ ०. खाण्डवाभा = खाण्डववनकी शोभा, ९ १. विहारिणी - विहारशीला, ९ २. गाण्डीविभाषिणी = अपनी तपस्याका उद्देश्य बतानेके लिये गाण्डीवधारी अर्जुनसे वार्तालाप करने-वाली, ९ ३. वन्या = बढ़े हुए प्रवाहवाली, ९ ४. श्रीकृष्णं वरमिच्छती = श्रीकृष्णको पति बनानेकी इच्छावाली ॥ १७ ॥

९ ५. द्वारकागमना - द्वारकामें आगमन करने-वाली, ९ ६. राज्ञी - रानी, ९ ७. पट्टराज्ञी पटरानी, ९ ८. परंगता = परमात्माको प्राप्त, ९९. महाराज्ञी - महारानी, १००. रत्नभूषा - रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित, १०१. गोमती - गौओंके समुदायसे युक्त अथवा गोमती नदीस्वरूपा, १०२. तीरचारिणी = तटपर विचरनेवाली ॥ १८ ॥

१०३. स्वकीया = श्रीकृष्णकी अपनी विवाहिता पत्नी, १०४. सुखा - सुखस्वरूपा, १०५. स्वार्था = अपने अभीष्ट अर्थको प्राप्त, १०६. स्वभक्तकार्य-साधिनी = अपने भक्तोंका कार्य सिद्ध करनेवाली, १०७. नवलाङ्गा - नूतन अङ्गवाली, १०८. अबला = स्त्रीरूपा, १० ९. मुग्धा - भोली - भाली अथवा मुग्धा नायिका, ११०. वराङ्गा = सुन्दर अङ्गवाली, १११. वामलोचना = बाँके नयनोंवाली ॥ १ ९ ॥ ११२. अजातयौवना = अप्राप्त यौवना, ११३. अदीना दीनतारहित एवं उदारस्वरूपा, ११४. प्रभा-प्रभास्वरूपा, ११५. कान्तिः = कान्तिस्वरूपा, ११६. द्युतिः - द्युतिस्वरूपा, ११७. छविः - छविस्वरूपा, ११८. सुशोभा = सुन्दर शोभावाली, ११ ९. परमा = उत्कृष्टस्वरूपा, १२०. कीर्तिः = कीर्तिस्वरूपा, १२१. कुशला - चतुरा, १२२. अज्ञातयौवना = अपने यौवनके आरम्भको न जाननेवाली ॥ २० ॥

१२३. नवोढा = नवविवाहिता नायिका, १२४. मध्यगा -मुग्धा और प्रगल्भाके बीचकी अवस्थावाली, १२५. मध्या = मध्या नायिका, १२६. प्रौढिः - प्रौढतासे युक्त, १२७. प्रौढा - प्रौढस्वरूपा, १२८. प्रगल्भका-प्रगल्भानायिका, १२ ९. धीरा = धीरस्वभावा, १३०. अधीरा- भगवद्दर्शनके लिये अधीर रहनेवाली, १३१. धैर्यधरा - धैर्यधारिणी, १३२. ज्येष्ठा - ज्येष्ठ

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१७० गोलोकधामाधिपतिं परेशं अवस्थावाली, १३३. श्रेष्ठा = गुणोंसे श्रेष्ठ, १३४. कुलाङ्गना = कुलवधू ॥ २१ ॥

१३५. क्षणप्रभा = विद्युत् के समान कान्तिमती, १३६. चञ्चला वेगशालिनी, १३७. अर्च्या = पूजनीया, १३८. विद्युत् = विद्योतमाना, १३ ९. सौदामनी - विद्युत्स्वरूपा, १४०. तडित् = घनश्यामके अङ्क विद्युल्लेखा -सी शोभमाना, १४१. स्वाधीन -पतिका = स्नेह और सद्व्यवहारसे पतिको वशमें रखने-वाली, १४२. लक्ष्मी - लक्ष्मीस्वरूपा, १४३. पुष्टा = पुष्ट अङ्गवाली अथवा अनुग्रहमयी, १४४. स्वाधीनभर्तृका = स्वाधीनपतिका ॥ २२ ॥

१४५. कलहान्तरिता = प्रेम - कलहके कारण कभी - कभी प्रियतमके वियोगका कष्ट सहन करनेवाली नायिका, १४६. भीरुः = भीरु स्वभाववाली, १४७. इच्छा = प्रियतमकी कामनाका विषय अथवा अभिलाषारूपिणी, १४८. प्रोत्कण्ठिता - प्रियके दर्शन या मिलनके लिये उत्सुक रहनेवाली १४ ९. आकुला - प्रेम - परिपूर्ण अथवा प्रियतमकी सेवाके कार्यमें व्यस्त, १५०. कशिपुस्था = शय्यापर विराजित रहनेवाली, १५१. दिव्यशय्या = श्यामसुन्दरके लिये परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड झणत्कार या सिञ्जन- ध्वनि करनेवाली, १६७. रणन्मञ्जीरनूपुरा = बजते हुए नूपुर और मञ्जीर धारण करनेवाली ॥ २५ ॥

१६८. मेखला = वृन्दावनकी नीलमणिमयी करधनीके समान सुशोभित, १६ ९. अमेखला = साधारण अवस्थामें मेखलासे रहित, १७०. काञ्ची-' काञ्ची ' नामक आभूषणस्वरूपा, १७१. अकाञ्चनी = काञ्चनरहित, १७२. काञ्चनामयी - सुवर्णस्वरूपा, १७३. कञ्चुकी = कञ्चुकधारिणी, १७४. कञ्चुकमणिः = कञ्चुकमणिस्वरूपा, १७५. श्रीकण्ठा = शोभायुक्त कण्ठवाली, १७६. आढ्या = ( श्रीकृष्ण-रूप ) सम्पत्तिशालिनी, १७७. महामणि: = महामणिस्वरूपा अथवा बहुमूल्य मणि धारण करनेवाली ॥ २६ ॥

१७८. श्रीहारिणी - श्रीहारधारिणी, १७ ९. पद्महारा = कमलोंकी मालासे अलंकृत, १८०. मुक्ता = नित्यमुक्त, १८१. मुक्तफलार्चिता = मुक्ताफलोंसे पूजित, १८२. रत्नकङ्कणकेयूरा = रत्ननिर्मित कंगन और केयूर ( भुजबंद ) धारण करनेवाली, १८३. स्फुरदङ्गुलिभूषणा - जिनकी अङ्गुलियों के भूषण दिव्य शय्या प्रस्तुत करनेवाली, १५२. गोविन्दहृत- उद्भासित हो रहे हैं, ऐसी ॥२७ ॥

मानसा = गोविन्दने जिनके मनको हर लिया है, ऐसी ॥ २३ ॥

१५३. खण्डिता = खण्डिता - नायिकास्वरूपा, १५४. अखण्डशोभाढ्या = अविकल शोभासे सम्पन्न, १५५. विप्रलब्धा विप्रलब्धा - नायिका - स्वरूपा, १५६. अभिसारिका - प्रियतम श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये संकेत - स्थानपर जानेवाली, १५७. विरहार्ता -प्रियतमके विरहकी अनुभूतिसे पीड़ित, १५८. विरहिणी = वियोगिनी, १५ ९. नारी - नरावतार श्रीकृष्णकी भार्या, १६०. प्रोषितभर्तृका - जिसका पति परदेशमें गया हो, ऐसी नायिका - स्वरूपा ॥ २४ ॥

१६१. मानिनी = मानवती, १६२. मानदा - मान देनेवाली, १६३. प्राज्ञा - विदुषी, १६४. मन्दारवन-वासिनी - कल्पवृक्षके काननमें निवास करनेवाली, १६५. झंकारिणी - चलते - फिरते या नृत्य करते समय आभूषणोंकी झंकार फैलानेवाली, १६६. झणत्कारी = १८४. दर्पणा = दर्पणस्वरूपा, १८५. दर्पणी-भूता = अपने जलकी निर्मलताके कारण दर्पणका काम देनेवाली, १८६. दुष्टदर्पविनाशिनी = दुष्टोंके घमंडको चूर करनेवाली, १८७. कम्बुग्रीवा - शङ्खके समान सुन्दर कण्ठवाली, १८८. कम्बुधरा = शङ्खनिर्मित आभूषण धारण करनेवाली, १८ ९. ग्रैवेयकविराजिता = कण्ठभूषणसे सुशोभित ॥ २८ ॥

१ ९ ०. ताटङ्किनी = ' ताटङ्क ( तरकी ) ' नामक आभूषणविशेषको धारण करनेवाली, १ ९९. दन्तधरा = दन्तधारिणी, १ ९ २. हेमकुण्डलमण्डिता - काञ्चन-निर्मित कुण्डलोंसे अलंकृत, १ ९ ३. शिखाभूषा-अपनी चोटीको विभूषित करनेवाली, १ ९ ४. भाल-पुष्पा = ललाट देशमें पुष्पमय शृङ्गार धारण करनेवाली, १ ९ ५. नासामौक्तिकशोभिता = नाकमें मोतीकी बुलाकसे शोभित ॥ २ ९ ॥ १ ९ ६. मणिभूमिगता - मणिमयी भूमिपर विचरने -

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्त्रनाम १७१ वाली, १ ९ ७. देवी = दिव्यस्वरूपा, १ ९ ८. रैवताद्रि-विहारिणी - श्रीकृष्णकी पटरानीके रूपमें रैवतक पर्वतपर विहार करनेवाली, १ ९९. वृन्दावनगता = वृन्दावनमें विद्यमाना, २००. वृन्दा = वृन्दावनकी अधिष्ठातृदेवी - स्वरूपा, २०१. वृन्दारण्यनिवासिनी = वृन्दावनमें निवास करनेवाली ॥३० ॥

२०२. वृन्दावनलता = वृन्दावनकी लताओंके साथ तादात्म्यको प्राप्त हुई, २०३. माध्वी- मकरन्द-स्वरूपा, २०४. वृन्दारण्यविभूषणा = वृन्दावनको विभूषित करनेवाली, २०५. सौन्दर्यलहरी लक्ष्मीः = सुन्दरताकी तरङ्गोंसे युक्त लक्ष्मीस्वरूपा, २०६. मथुरातीर्थवासिनी = मथुरापुरीरूप तीर्थ निवास करनेवाली ॥ ३१ ॥

२०७. विश्रान्तवासिनी = ' विश्रान्त ' तीर्थ ( विश्रामघाट ) में वास करनेवाली, २०८. काम्या = कमनीया, २० ९. रम्या = रमणीया, २१०. गोकुल -वासिनी = गोकुलमें निवास करनेवाली, २११. रमणस्थलशोभाढ्या - रमणस्थलीकी शोभा बढ़ाने-वाली, २१२. महावनमहानदी - ' महावन ' नामक वनमें प्रवाहित होनेवाली महती नदी ॥ ३२ ॥

२१३. प्रणता = भक्तजनोंद्वारा वन्दिता, २१४. प्रोन्नता = अत्यन्त उत्कृष्ट गोलोकधाममें स्थित अथवा ऊँची लहरोंके कारण उन्नत, २१५. पुष्टा = प्रेमानुग्रहसे परिपुष्ट, २१६. भारती = भारतवर्षकी नदी, २१७. भरतार्चिता- भरतके द्वारा पूजित, २१८. तीर्थ -२२८. काञ्चनी = स्वर्णमयी, २२ ९. काञ्चनी-भूमिः = गोलोककी स्वर्णमयी भूमिपर प्रवाहित होनेवाली, २३०. काञ्चनीभूमिभाविता = स्वर्णमयी भूमिपर प्रकट, २३१. लोकदृष्टि = जगत्‌को दिव्य-दृष्टि प्रदान करनेवाली, २३२. लोकलीला - लोकमें लीला करनेवाली, २३३. लोकालोकाचलार्चिता = लोकालोकपर्वतपर पूजित होनेवाली ॥ ३५ ॥

२३४. शैलोद्गता = कलिन्दपर्वत से निकली हुई, २३५. स्वर्गगता - मन्दाकिनीरूपसे स्वर्गमें गयी हुई, २३६. स्वर्गार्चा स्वर्गमें अर्चित होनेवाली, २३७. स्वर्गपूजिता = स्वर्गलोकमें पूजित, २३८. वृन्दावनी-वृन्दावनकी अधिष्ठातृस्वरूपा देवी, २३ ९. वनाध्यक्षा = वनकी स्वामिनी, २४० रक्षा = रक्षिता या रक्षारूपा २४१. कक्षा - वृन्दावनके लिये मेखलारूपा, २४२. तटीपटी = तटभूमिको वस्त्रकी भाँति ढकने-वाली ॥ ३६ ॥

२४३. असिकुण्डगता = असिकुण्डमें प्राप्त, २४४. कच्छा कछारकी भूमिस्वरूपा, २४५. स्वच्छन्दा-स्वच्छन्दगामिनी, २४६. उच्छलिता - ( वेगसे ) उछलने वाली, २४७. आदिजा - आदिभूत श्रीकृष्णके वामांससे उद्भूत ( अथवा ' अद्रिजा ' पाठ माना जाय तो पर्वतसे उत्पन्न हुई ), २४८. कुहरस्था- सरस्वती-रूपसे भूछिद्रमें अथवा भोगवतीरूपसे पाताल - विवरमें स्थित, २४ ९. रथ - प्रस्था - श्रीकृष्णकी पटरानीके रूपमें रथपर यात्रा करनेवाली, २५०. प्रस्था - प्रस्थानशीला, राजगतिः - तीर्थराज प्रयागकी आश्रयभूता, २१ ९.२५१. शान्ततरा = परम शान्तिमयी, २५२. गोत्रा = गौओंका त्राण करनेवाली अथवा गिरिस्वरूपा, २२०. गङ्गासागरसंगमा = गङ्गा तथा सागरसे संगत ॥ ३३ ॥

२२१. सप्ताब्धिभेदिनी सात समुद्रोंका भेदन करनेवाली, २२२. लोला - लोल लहरोंवाली, २२३. बलात्सप्तद्वीपगता = बलपूर्वक सातों द्वीपोंमें जाने-वाली, २२४. लुठन्ती - धरतीपर लोटनेवाली, २२५. शैलभिद्यन्ती = पर्वतों का भेदन करनेवाली, २२६. स्फुरन्ती = स्फुरणशीला अथवा अपनी दिव्य प्रभा बिखेरनेवाली, २२७. वेगवत्तरा - अतिशय वेग-शालिनी ॥ ३४ ॥

आतुरा - श्रीकृष्णदर्शनके लिये आतुर रहने-वाली ॥ ३७ ॥

२५३. अम्बुच्छटा - जलकी छटासे शोभित, २५४. शीकराभा = कुहरोंसे सुशोभित होनेवाली, २५५. दर्दुरा - मेढकोंका आश्रय, अथवा बादलके समान श्याम कान्तिवाली, २५६. दार्दुरीधरा = अपने जलके कल - कल नादसे दादुरोंकी - सी ध्वनि धारण करनेवाली, २५७. पापाङ्कुशा = पापोंको नष्ट करनेके लिये अङ्कुशस्वरूपा, २५८. पापसिंही- पापरूपी गजराजको नष्ट करने लिये सिंहीके तुल्य, २५ ९. पापद्रुमकुठारिणी- पापरूपी वृक्षका उच्छेद करने

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१७२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं लिये कुठाररूपा ॥ ३८ ॥

२६०. पुण्यसंघा = पुण्यसमुदायरूपा, २६१. पुण्यकीर्तिः = पवित्र कीर्तिवाली अथवा जिनका कीर्तन पुण्य प्रदान करनेवाला है, ऐसी, २६२. पुण्यदा = पुण्यदायिनी, २६३. पुण्यवर्द्धिनी - अपने दर्शनसे पुण्यकी वृद्धि करनेवाली, २६४. मधुवननदी = मधुवनमें बहनेवाली नदी, २६५. मुख्या = एक प्रधान नदी, २६६. अतुला = तुलनारहित, २६७. ताल-वनस्थिता - तालवनमें स्थित रहनेवाली ॥ ३ ९ ॥ २६८. कुमुद्वननदी - कुमुदवनकी नदी, २६ ९. कुब्जा = टेढ़ी - मेढ़ी, २७०. कुमुदा = भगवती दुर्गा-स्वरूपा, २७१. अम्भोजवर्द्धिनी - अपने जलमें कमलोंको बढ़ानेवाली, २७२. लवरूपा = संसार-सागर से पार होनेके लिये नौकास्वरूपा, २७३. वेगवती = वेगशालिनी, २७४. सिंहसर्पादिवाहिनी = अपने जलकी धारामें सिंहों तथा सर्पादि जन्तुओंको बहा ले जानेवाली ॥ ४० ॥

२७५. बहुली = बहुलरूपवाली, २७६. बहुदा = बहुत देनेवाली, २७७. बह्वी = भूम ( ब्रह्म ) स्वरूपा, २७८. बहुला - गोरूपा, २७ ९. वनवन्दिता = वनों-द्वारा वन्दित, २८०. राधाकुण्डकला = अपनी कलासे राधाकुण्डमें स्थित, २८१. आराध्या = आराधनके योग्य, २८२. कृष्णकुण्डजलाश्रिता = कृष्णकुण्डके जलमें निवास करनेवाली ॥ ४१ ॥

२८३. ललिताकुण्डगा - ललिताकुण्डमें व्याप्त, परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड सम्पन्न, २ ९ ४. मयूरवरवर्णिनी = मोरोंके समान सुन्दर वर्णवाली ॥ ४३ ॥

२ ९ ५. सारसी - सरोवरोंकी जल - सम्पत्ति अथवा सारस पक्षियोंकी आश्रयभूता, २ ९ ६. नीलकण्ठाभा = नीलकण्ठ या मयूरकी - सी आभावाली, २ ९ ७. कूजत्कोकिलपोतकी - जहाँ कोकिलकुमारियोंके कल- कूजन होते रहते हैं, ऐसी, २ ९ ८. गिरिराज-प्रसूः = गिरिराज हिमालयके कलिन्दपर्वतसे प्रकट, २ ९९. भूरिः = बहुवैभवशालिनी, ३००. आतपत्रा = तटपर रहनेवाले लोगोंकी धूपके कष्टसे रक्षा करने-वाली, ३०१. आतपत्रिणी - पटरानीके रूपमें छत्र धारण करनेवाली ॥ ४४ ॥

३०२. गोवर्द्धनाङ्कगा = गोवर्धनगिरिकी गोदमें विराजमान, ३०३. गोदन्ती - हरतालके समान रंगवाले केसर आदिसे आमोदित, ३०४. दिव्यौषधिनिधिः = दिव्य ओषधियोंकी निधि, ३०५. सृतिः = सद्गतिकी राह, ३०६. पारदी - भवसागरसे पार कर देनेवाली दिव्य शक्ति, ३०७. पारदमयी - पारदस्वरूपा, ३०८. नारदी = नार अर्थात् जल प्रदान करनेवाली, ३० ९. शारदी- शरत्कालीन शोभारूपा, ३१०. भृतिः = भरण पोषणका साधन बनी हुई ॥ ४५ ॥

३११. श्रीकृष्णचरणाङ्कस्था = भगवान् श्रीकृष्ण चरणोंके अङ्कमें विराजित, ३१२. अकामा लौकिक कामनाओंसे रहित ( अथवा ' कामा ' कामस्वरूपा ), ३१३. कामवनाञ्चिता = कामवनमें पूजित, ३१४. २८४. घण्टा घण्टा - ध्वनिके सदृश अनुरणनात्मक कामाटवी = कामवनरूपा, ३१५. नन्दिनी - सबको शब्द करनेवाली, २८५. विशाखा - विशाखा - सखी -स्वरूपा, २८६. कुण्डमण्डिता = कुण्डों ( हदों ) से सुशोभित, २८७. गोविन्दकुण्डनिलया - गोविन्द-कुण्ड निवास करनेवाली, २८८. गोपकुण्ड -तरंगिणी - गोपकुण्डमें तरंगित होनेवाली ॥ ४२ ॥

२८ ९. श्रीगङ्गा - श्रीगङ्गास्वरूपा, २ ९ ०. मानसी-गङ्गा - मानसी - गङ्गास्वरूपा, २ ९ १. कुसुमाम्बर-भाविनी - पुष्पमय वस्त्रसे सुशोभित अथवा कुसुम-सरोवरके अवकाशमें प्रकट होनेवाली, २ ९ २. गोवर्द्धिनी - गोवर्धननाथकी शक्ति अथवा गौओंकी वृद्धि करनेवाली, २ ९ ३. गोधनाढ्या - गोधनसे आनन्दित करनेवाली, ३१६. नन्दग्राममही- नन्द-ग्रामस्थित भूमिरूपा, ३१७. धरा = पृथ्वीरूपा ॥४६ ॥

३१८. बृहत्सानुद्युतिप्रोता- ' बृहत्सानु ' पर्वतके शिखरकी शोभासे संयुक्त, ३१ ९. नन्दीश्वरसमन्विता = नन्दीश्वरगिरिसे समन्विता, ३२०. काकली- कोयलोंकी कुहू ध्वनिरूपमें स्थित, ३२१. कोकिलमयी - कोयलसे व्याप्ता, ३२२. भाण्डीर-कुशकौशला = भाण्डीरवनमें कुशोत्पाटनके कौशलसे युक्त ॥ ४७ ॥

३२३. लोहार्गलप्रदा = श्रीकृष्णके लिये अपने प्रेमके द्वारा लोहकी अर्गला लगा देनेवाली, ३२४.

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्रनाम १७३ कारा = ( श्रीकृष्णको अपने प्रेमके द्वारा रोके रखनेके लिये ) कारारूपा, ३२५. काश्मीरवसना - केसरके रंगमें रँगे हुए वस्त्र धारण करनेवाली, ३२६. वृता = श्रीकृष्णके द्वारा स्वीकृता, ३२७. बर्हिषदी - बर्हिषदी-पुरीरूपा, ३२८. शोणपुरी = शोणपुरीरूपा, ३२ ९. शूरक्षेत्रपुराधिका - शूरक्षेत्रपुरसे भी अधिक माहात्म्य-वाली ॥ ४८ ॥

३३०. नानाभरणशोभाढ्या = विविध प्रकारके आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न, ३३१. नानावर्ण-समन्विता = नाना प्रकारके रंगोंसे युक्त, ३३२. नानानारीकदम्बाढ्या = नाना प्रकारकी स्त्रियोंके समुदायसे युक्त, ३३३.नानारङ्गमहीरुहा = तटवर्ती विविध रंगके वृक्षोंसे सुशोभित ॥ ४ ९ ॥ ३३४. नानालोकगता = नाना लोकोंमें पहुँची हुई, ३३५. अभ्यर्चिः - जिनकी तेजोराशि सब ओर फैली हुई है, ऐसी, ३३६. नानाजलसमन्विता = नाना नदियोंके मिले हुए जलसे युक्त, ३३७. स्त्रीरत्नम् = स्त्रियों में रत्नस्वरूपा, ३३८. रत्ननिलया - रत्ननिर्मित गृहमें निवास करनेवाली, ३३ ९. ललना = श्रीकृष्ण-कामिनी, ३४०. रत्नरञ्जिनी = रत्नोंके द्वारा विविध रंगोंका प्रकाश फैलानेवाली ॥ ५० ॥

३४१. रङ्गिणी = रङ्गस्थलमें रासके रंगमें रँगी रहनेवाली, ३४२. रङ्गभूमाढ्या = रंगके बाहुल्यसे युक्त, ३४३. रङ्गा - हर्षयुक्ता अथवा रङ्गानाम्नी नदीस्वरूपा, ३४४. रङ्गमहीरुहा - रंगीन वृक्षोंसे युक्त, ३४५. राजविद्या विद्याओंकी स्वामिनी, ३४६. राजगुह्या: - गुह्य वस्तुओंमें सबसे श्रेष्ठ, ३४७. जगत्कीर्ति = जगत्के लिये कीर्तिमयी अथवा कीर्तनीया, ३४८. घना = सघन प्रेमयुक्ता अथवा श्रीकृष्णके वंशीवादनके समय हिमवत् घनीभूत हो जानेवाली, ३४ ९. अघना = प्रवहणशीला ॥ ५१ ॥

३५०. विलोलघण्टा - चञ्चल घंटाके समान नाद करनेवाली, ३५१. कृष्णाङ्गा = कृष्णके समान अङ्ग-वाली अथवा श्यामाङ्गी, ३५२. कृष्णदेहसमुद्भवा = श्रीकृष्णके शरीरसे उत्पन्न, ३५३. नीलपङ्कजवर्णाभा = नील कमलके समान वर्ण एवं आभासे युक्त, ३५४. नीलपङ्कजहारिणी = नील कमलकी माला धारण करनेवाली ॥५२ ॥

३५५. नीलाभा = नील कान्तिमती, ३५६. नील-पद्माढ्या = नील कमलोंकी सम्पदासे भरी - पूरी, ३५७. नीलाम्भोरुहवासिनी - नील कमलमें निवास करने-वाली, ३५८. नागवल्ली = ताम्बूललतास्वरूपा, ३५ ९. नागपुरी - नागोंकी नगरी ( अर्थात् कालिय आदि नाग निवासभूमि ), ३६०. नागवल्ली-दलार्चिता = ताम्बूलपत्रसे पूजित ॥५३ ॥

३६१. ताम्बूलचर्चिता - ताम्बूलसे रञ्जित, ३६२. चर्चा - कस्तूरी - चन्दनादि आलेपमयी, ३६३. मकरन्द-मनोहरा = कमलादिके मकरन्दसे मनको हर लेनेवाली, ३६४. सकेशरा = केसरवती, ३६५. केशरिणी = सर धारण करनेवाली, ३६६. केशपाशाभि-शोभिता - केशपाशद्वारा सब ओरसे सुशोभित ॥ ५४ ॥

३६७. कज्जलाभा = काजलकी - सी काली आभावाली, ३६८. कज्जलाक्ता = नेत्रोंमें काजलकी शोभासे युक्त अथवा काजलकी रँगी हुई, ३६ ९. कज्जली - कजलीके समान काली, ३७०. कलिताञ्जना = नेत्रोंमें अञ्जन धारण करनेवाली, ३७१. अलक्तचरणा = चरणोंमें महावरका रंग लगानेवाली, ३७२. ताम्रा = ताम्रवर्णा, ३७३. लाला = लालनीया, ३७४. ताम्रीकृताम्बरा = ताँबेके समान लाल रंग वस्त्र धारण करनेवाली ॥ ५५ ॥

३७५. सिन्दूरिता = सीमन्तमें सिन्दूर धारण करने-वाली, ३७६. अलिप्तवाणी - जिसकी वाणी किसी दोषसे लिप्त नहीं होती, ऐसी, ३७७. सुश्री - उत्तम शोभासे युक्त, ३७८. श्रीखण्डमण्डिता - चन्दनसे अलंकृत, ३७ ९. पाटीरपङ्कवसना - चन्दन- पङ्कमय वस्त्र धारण करनेवाली, ३८०. जटामांसी- जटा-मांसीके रूपमें स्थित, ३८१. स्त्रगम्बरा = पुष्प-मालाओंको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली ॥ ५६ ॥

३८२. आगरी = आगर ( अमावास्या ) के समान ( कृष्ण ) वर्णवाली, ३८३. अगुरुगन्धाक्ता - अगुरुकी गन्धसे अभिषिक्त, ३८४. तगराश्रितमारुता = जिसकी हवामें तगरकी सुगन्ध समायी हुई है, ऐसी, ३८५. सुगन्धितैलरुचिरा - सुगन्धित तैल ( इत्र आदि ) से मनोहर, ३८६. कुन्तलालिः - जिनकी अलकों पर

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१७४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड ( सुगन्धसे आकृष्ट ) भ्रमर मँडराते रहते हैं, ऐसी, ३८७. सकुन्तला- कुन्तल - राशिसे युक्त ॥ ५७ ॥

३८८. शकुन्तला - शकुन्तों – पक्षियोंका स्वागत करनेवाली, ३८ ९. अपांसुला = पतिव्रता, ३ ९ ०. पातिव्रत्यपरायणा- पातिव्रतधर्मके पालनमें तत्पर, ३ ९ १. सूर्यप्रभा = सूर्यके समान उद्भासित होनेवाली, ३ ९ २. सूर्यकन्या = सूर्यकी पुत्री, ३ ९ ३. सूर्यदेह-समुद्भवा = सूर्यके शरीरसे उत्पन्ना ॥ ५८ ॥

३ ९ ४. कोटिसूर्यप्रतीकाशा - करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्विनी, ३ ९ ५. सूर्यजा = सूर्यपुत्री, ३ ९ ६. सूर्यनन्दिनी = सूर्यदेवको आनन्द प्रदान करनेवाली, ३ ९ ७. संज्ञा = सम्यक् ज्ञानस्वरूपा, ३ ९ ८. संज्ञासुता = संज्ञाकी पुत्री, ३ ९९. स्वेच्छा - स्वाधीना, ४००. असंज्ञा = ( प्रियतमके प्रेममें ) बेसुध हो जानेवाली, ४०१. संज्ञा - चेतनारूपा, ४०२. मोदप्रदायिनी = आनन्द प्रदान करनेवाली ॥ ५ ९ ॥ ४०३. संज्ञापुत्री - संज्ञाकी बेटी, ४०४. स्फुरच्छाया - उद्भासित कान्तिवाली, ४०५. तपती-तापकारिणी = ( सौतेली बहिन ) तपतीको ताप देने-वाली, ४०६. सावर्ण्यानुभवा = श्रीकृष्णके साथ वर्ण-सादृश्यका अनुभव करनेवाली, ४०७. देवी - देव-कन्या, ४०८. वडवा = वडवारूपा, ४० ९. सौख्य-दायिनी - सौख्य प्रदान करनेवाली ॥ ६० ॥

४१०. शनैश्चरानुजा - शनैश्चरकी छोटी बहिन ४११. कीला - ज्वालामयी, ४१२. चन्द्रवंश -विवर्द्धिनी - चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाली, ४१३. चन्द्रवंशवधूः = चन्द्रवंशकी बहू, ४१४. चन्द्रा-आह्लाद प्रदान करनेवाली, ४१५. चन्द्रावलि -सहायिनी - चन्द्रावली सखीकी सहायता करने -वाली ॥ ६१ ॥

४१६. चन्द्रावती - चन्द्रावतीस्वरूपा, ४१७. चन्द्रलेखा - चन्द्रलेखास्वरूपा, ४१८. चन्द्रकान्ता = चन्द्रमाके समान कान्तिमती, ४१ ९. अनुगा = ( सदा ) प्रियतमका अनुगमन करनेवाली, ४२० अंशुका = उज्ज्वल - वस्त्रधारिणी, ४२१. भैरवी = भैरवप्रिया, ४२२. पिङ्गलाशङ्की = सूर्यके पारिपार्श्वक पिङ्गलसे होनेवाली, ४२३. लीलावती - भाँति-आशङ्कित भाँतिकी लीला करनेवाली, ४२४. आगरीमयी-अगरकी सुगन्धसे व्याप्त ॥ ६२ ॥

४२५. धनश्री = धनलक्ष्मी या रागिनीविशेष, ४२६. देवगान्धारी - रागिनीविशेष, ४२७. स्वर्मणिः = स्वर्गलोककी मणि, ४२८. गुणवर्द्धिनी - गुणोंकी वृद्धि करनेवाली, ४२ ९. व्रजमल्ला = व्रजमण्डलमें मल्ल-स्वरूपा, ४३०. बन्धकारी = विरोधियोंको बन्धनमें डालनेवाली, ४३१. विचित्रा = विचित्र रूप और शक्तिसे सम्पन्न, ४३२. जयकारिणी - विजय प्राप्त करानेवाली ॥६३ ॥

४३३. गान्धारी, ४३४. मञ्जरी, ४३५. टोडी, ४३६. गुर्जरी, ४३७. आशावरी, ४३८. जया, ४३ ९. कर्णाटी गान्धारीसे लेकर कर्णाटीतक विशेष रागिनियोंके नाम हैं । ये समस्त रागिनियाँ यमुनाजीसे अभिन्न हैं, ४४०. रागिणी = रागिनीस्वरूपा, ४४१. गौरी - गौरी नामकी रागिनी, ४४२. वैराटी = रागिनीविशेष, ४४३. गौरवाटिका - रागिनी - विशेष अथवा गौरतेज: - स्वरूपा श्रीराधाके लिये उद्यानरूपिणी ॥ ६४ ॥

४४४. चतुश्चन्द्रा, ४४५. कलाहेरी, ४४६. तैलङ्गी, ४४७. विजयावती, ४४८. ताली = चतुश्चन्द्रासे लेकर तालीतक राग - रागिनियाँ और तालके नाम हैं, ४४ ९. तलस्वरा ताली बजाकर स्वरकी सूचना देनेवाली, ४५० गाना = गानस्वरूपा, ४५१ क्रियामात्रप्रकाशिनी = तालके क्रियामात्रको प्रकाशित करनेवाली ॥ ६५ ॥

४५२. वैशाखी, ४५३. चञ्चला ४५४. चारुः, ४५५. माचारी, ४५६. घूघटी, ४५७. घटा, ४५८. वैरागरी, ४५ ९. सोरटी, ४६०. ईशा, ४६१. कैदारी, ४६२. जलधारिका - वैशाखीसे लेकर जलधारिकापर्यन्त सभी नामविशेष रागिनी आदिके सूचक हैं ॥ ६६ ॥

४६३. कामाकरश्री, ४६४. कल्याणी, ४६५. गौडकल्याणमिश्रिता, ४६६. रामसंजीविनी, ४६७. हेला, ४६८. मन्दारी, ४६ ९. कामरूपिणी- ये सब भी विशेष प्रकारकी रागिनियाँ हैं ॥६७ ॥

४७०. सारङ्गी, ४७१. मारुती, ४७२. होढा,