गर्ग संहिता — पृष्ठ 181–190

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्त्रनाम १७५ ४७३. सागरी, ४७४. कामवादिनी, ४७५. वैभासी, ४७६. मङ्गला - ये भी रागिनियोंके ही नाम हैं । ४७७. चान्द्री - रासपूर्णिमाकी चाँदनीस्वरूपा, ४७८. रासमण्डलमण्डना- रासमण्डलको मण्डित करनेवाली ॥ ६८ ॥

४७ ९. कामधेनुः = कामधेनुकी भाँति व्यक्तिकी मनोवाञ्छित कामनाको पूर्ण करनेवाली, ४८०. कामलता = कामना पूर्ण करनेवाली कल्पलतास्वरूपा, ४८१. कामदा = अभीष्ट मनोरथ देनेवाली, ४८२. कमनीयका = कमनीया, ४८३. कल्पवृक्षस्थली = कल्पवृक्षोंकी स्थानभूता, ४८४. स्थूला = स्थूल -रूपिणी, ४८५. क्षुधा = बुभुक्षास्वरूपिणी, ४८६. सौधनिवासिनी = महलमें रहनेवाली ॥ ६ ९ ॥ ४८७. गोलोकवासिनी = गोलोकधाममें निवास करनेवाली, ४८८. सुभ्रूः - सुन्दर भौंहोंवाली, ४८ ९. यष्टिभृत् = छड़ी धारण करनेवाली, ४ ९ ०. द्वार-पालिका = द्वाररक्षिका, ४ ९ १. शृङ्गारप्रकरा = शृङ्गार -साधन - सामग्री - समुदायरूपा, ४ ९ २. शृङ्गा - मन्मथो -द्भेदस्वरूपा, ४ ९ ३. स्वच्छा = विमलस्वरूपा, ४ ९ ४. शय्योपकारिका - प्रिया - प्रियतमके लिये शय्या सुसज्जित करनेमें उपकारिणी ॥ ७० ॥

४ ९ ५. पार्षदा = श्रीराधा - कृष्णकी पार्षदस्वरूपा, ४ ९ ६. सुसखीसेव्या = सुन्दर सखियोंद्वारा सेवनीया, ४ ९ ७. श्रीवृन्दावनपालिका = श्रीवृन्दावनकी रक्षा करनेवाली, ४ ९ ८. निकुञ्जभृत् = निकुञ्जका पोषण करनेवाली, ४ ९९. कुञ्जपुञ्जा = कुञ्जसमुदायस्वरूपा, ५००. गुञ्जाभरणभूषिता = गुञ्जा आभूषणोंसे विभूषित ॥ ७१ ॥

५०१. निकुञ्जवासिनी - निकुञ्जमें निवास करने-वाली, ५०२. प्रोष्या - प्रवासिनी, ५०३. गोवर्द्धन -तटीभवा - गोवर्धनकी उपत्यकामें मानसी गङ्गाके रूपमें प्रकट, ५०४. विशाखा - विशाखासखीस्वरूपा, ५०५. ललिता - ललिता - सखीस्वरूपा अथवा लालित्यशालिनी, ५०६. रामा = श्रीकृष्णरमणी, ५०७. नीरुजा = रोगरहित, ५०८. मधुमाधवी = मधुमासकी माधवी लतारूपिणी ॥ ७२ ॥

५० ९. एका अद्वितीया, ५१०. नैकसखी -अनेक सखियोंवाली, ५११. शुक्का - शुद्धस्वरूपा, ५१२. सखीमध्या - सखियोंके मध्यमें विराजमान, ५१३. महामनाः - विशालहृदया, ५१४. श्रुतिरूपा = गोपीरूपमें श्रुतिस्वरूपा, ५१५. ऋषिरूपा - ऋषि-स्वरूपा गोपी, ५१६. मैथिला: = गोपीरूपमें उत्पन्न मिथिलावासिनी स्त्रियाँ, ५१७. गोपीरूपमें उत्पन्न कौशलवासिनी ५१८. अयोध्यापुरवासिन्यः अयोध्या नगरकी स्त्रियाँ, ५१ सीतास्वरूपा गोपियाँ, ५२०. भावको प्राप्त पुलिन्द - कन्याएँ, वासिन्यः = लक्ष्मीजीके वैकुण्ठमें कौशलाः स्त्रियः = स्त्रियाँ ॥ ७३ ॥

= गोपीरूपमें उत्पन्न ९. यज्ञसीता: -यज्ञ-पुलिन्दकाः = गोपी-५२१. रमावैकुण्ठ-निवास करनेवाली स्त्रियाँ ( जो गोपीरूपको प्राप्त हुई थीं ), ५२२. श्वेत-द्वीपसखीजनाः = श्वेतद्वीप निवासिनी सखियाँ ॥ ७४ ॥

५२३. ऊर्ध्ववैकुण्ठवासिन्यः - ऊर्ध्ववैकुण्ठमें वास करनेवाली सखियाँ, ५२४. दिव्याजित-पदाश्रिताः = दिव्य अजित पदके आश्रित सखियाँ, ५२५. श्रीलोकाचलवासिन्यः- श्रीलोकाचलमें निवास करनेवाली सखियाँ, ५२६. सागरोद्भवाः श्रीसख्यः = समुद्रसे उत्पन्न श्रीलक्ष्मीजीकी सखियाँ ॥ ७५ ॥

५२७. दिव्याः = दिव्यरूपा गोपियाँ, ५२८. अदिव्याः = मानवरूपिणी गोपियाँ, ५२ ९. दिव्याङ्गाः = दिव्य अङ्गोंवाली, ५३०. व्याप्ताः - सर्वव्यापिनी, ५३१. त्रिगुणवृत्तयः = त्रिगुणात्मक वृत्तिस्वरूपा, ५३२. भूमिगोप्यः = भूतलपर उत्पन्न गोपियाँ, ५३३. देवनार्य: - देवाङ्गनास्वरूपा गोपियाँ, ५३४. लताः = लतारूपिणी गोपियाँ, ५३५. ओषधिवीरुधः = ओषधि एवं लता - झाड़ी आदिस्वरूपा गोपाङ्गनाएँ ॥ ७६ ॥

५३६. जालंधर्य: -गोपीभावको प्राप्त जालंधरी स्त्रियाँ, ५३७. सिन्धुसुताः - समुद्रकन्याएँ, ५३८. पृथुबर्हिष्मतीभवा: -राजा पृथुक बर्हिष्मतीपुरीमें होनेवाली स्त्रियाँ, जो गोपीभावको प्राप्त हुई थीं, ५३ ९. दिव्याम्बराः - दिव्यवस्त्रधारिणी गोपियाँ, ५४०. अप्सरसः = गोपीभावको प्राप्त अप्सराएँ, ५४१. सौतला: - सुतललोकवासिनी असुराङ्गनाएँ, जिन्हें गोपीभावकी प्राप्ति हुई थी, ५४२. नागकन्यकाः-नागकन्यास्वरूपा गोपियाँ ॥७७ ॥

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१७६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड ५४३. परं धाम = परमधामस्वरूपा, ५४४. परं ब्रह्म - परब्रह्मस्वरूपा, ५४५. पौरुषा - पुरुषार्थस्वरूपा, ५४६. प्रकृतिः परा = पराप्रकृतिस्वरूपा, ५४७. तटस्था - तटस्थाशक्तिस्वरूपा, ५४८. गुणभूः -गुणोंकी जन्मभूमि, ५४ ९. गीता = सबके द्वारा जिसका यशोगान होता हो, वह, अथवा भगवद्गीतास्वरूपा, ५५०. गुणागुणमयी = गुणागुणस्वरूपा, ५५१. गुणा - दिव्यगुणात्मिका ॥ ७८ ॥

५५२. चिद्घना = चिदानन्दघनस्वरूपा, ५५३. सदसन्माला - सदसत् - समूहात्मिका, ५५४. दृष्टि: -ज्ञानस्वरूपा अथवा दर्शनस्वरूपा, ५५५. दृश्या = दृश्यस्वरूपा, ५५६. गुणाकरी - गुणोंकी निधिरूपा, ५५७. महत्तत्त्वम् = समष्टि बुद्धिरूपा, ५५८. अहंकारः - अहंकारस्वरूपा, ५५ ९. मनः - मनः-स्वरूपा, ५६०. बुद्धिः = बुद्धिरूपा, ५६१. प्रचेतना = प्रकृष्ट चेतनास्वरूपा ॥ ७ ९ ॥ ५६२. चेतो: - चित्तरूपा, ५६३. वृत्तिः = व्यवहार-स्वरूपा, ५६४. स्वान्तरात्मा = निजान्तरात्मस्वरूपा, ५६५. चतुर्थी = जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिसे अतीत तुरीयावस्थारूपा, ५६६. चतुरक्षरा = प्रणवके चार अक्षर – अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रा – ये जिसके स्वरूप हैं, वह, ५६७. चतुर्व्यूहा - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – ये चार व्यूह जिसके स्वरूप हैं, वह, ५६८. चतुर्मूर्तिः = एकपदी, द्विपदी, त्रिपदी और चतुष्पदी - इन चार मूर्तियोंवाली गायत्री अथवा चतुर्व्यूहस्वरूपा, ५६ ९. व्योम = आकाशरूपा, ५७०. वायुः = वायुरूपा, ५७१. अदः - दृश्य प्रपञ्चके रूपमें स्थित, ५७२. जलम् - जलस्वरूपा ॥ ८० ॥

५७३. मही- पृथ्वीरूपा, ५७४. शब्दः - शब्द-स्वरूपा, ५७५. रस: - रसस्वरूपा, ५७६. गन्धः = गन्धस्वरूपा, ५७७. स्पर्श: - स्पर्शस्वरूपा, ५७८. रूपम् - रूपस्वरूपा, ५७ ९. अनेकधा = नाना रूप-वाली, ५८०. कर्मेन्द्रियम् - कर्मेन्द्रियस्वरूपा, ५८१. कर्ममयी - कर्मस्वरूपा, ५८२. ज्ञानम् - ज्ञानमयी, ५८३. ज्ञानेन्द्रियम् = ज्ञानेन्द्रियस्वरूपा, ५८४. द्विधा -प्रकृति - पुरुषरूप दो शरीरवाली अथवा ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय - भेदसे द्विविध इन्द्रियरूपा ॥ ८१ ॥

५८५. त्रिधा = क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम-त्रिविध रूपवाली अथवा अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव - भेदसे त्रिविध रूपवाली, ५८६. अधि-भूतम् = भौतिक सृष्टिमें व्याप्त, ५८७. अध्यात्मम् = अध्यात्मस्वरूपा, ५८८. अधिदैवम् = आधिदैविक-रूपवाली, ५८ ९. अधिष्ठितम् - सर्वरूपोंमें अधिष्ठित, ५ ९ ०. ज्ञानशक्ति: - ज्ञानशक्ति, ५ ९ १. क्रियाशक्ति: -क्रियाशक्ति, ५ ९ २. सर्वदेवाधिदेवता = समस्त देवताओंकी अधिदेवी ॥ ८२ ॥

५ ९ ३. तत्त्वसंघा = तत्त्वसमूहरूपा, ५ ९ ४. विराण-मूर्तिः = विराट्स्वरूपा, ५ ९ ५. धारणा = धारणाशक्ति, ५ ९ ६. धारणामयी - धारणाशक्तिरूपा, ५ ९ ७. श्रुतिः = वेदरूपा, ५ ९ ८. स्मृतिः = धर्मशास्त्ररूपा, ५ ९९. वेदमूर्तिः = वेदात्मिका, ६००. संहिता = संहितास्वरूपा, ६०१. गर्गसंहिता गर्गसंहितारूपा ॥ ८३ ॥

६०२. पाराशरी - पाराशरसंहिता ( विष्णुपुराण ) रूपा, ६०३. सृष्टिः = सृष्टिरूपा अथवा पाराशरी-रचनारूपा, ६०४.पारहंसी = परमहंस - विद्यारूपा अथवा परमहंससंहिता, ६०५. विधातृका - विधातृ-स्वरूपा अथवा ब्रह्मसंहिता, ६०६. याज्ञवल्की-याज्ञवल्क्यस्मृतिरूपा, ६०७. भागवती = भगवान्‌की शक्ति अथवा वैष्णवागमरूपा, ६०८. श्रीमद्भाग-वतार्चिता- श्रीमद्भागवतके द्वारा पूजित -प्रशंसित ॥ ८४ ॥

६० ९. रामायणमयी - वाल्मीकि रामायण अथवा प्राचेतससंहिता अथवा रामचरितस्वरूपा, ६१०. रम्या = रमणीया, ६११. पुराणपुरुषप्रिया - पुराणपुरुष श्रीकृष्णकी प्रिया, ६१२. पुराणमूर्त्तिः = पुराणस्वरूपा, ६१३. पुण्याङ्गा- पुण्यशरीरवाली, ६१४. शास्त्र-मूर्तिः = शास्त्रस्वरूपा, ६१५. महोन्नता = परम उन्नत ॥ ८५ ॥

६१६. मनीषा - बुद्धिरूपा, ६१७. धिषणा = प्रज्ञा-रूपा, ६१८. बुद्धिः - मेधारूपा, ६१ ९. वाणी = वाग्देवता, ६२०. धीः - बुद्धिरूपा, ६२१. शेमुषी = बुद्धिरूपा, ६२२. मतिः -निश्चयरूपा, ६२३. गायत्री-गायत्रीमन्त्रस्वरूपा, ६२४. वेदसावित्री - वेदोक्त गायत्री, ६२५. ब्रह्माणी - ब्रह्मशक्ति, ६२६. ब्रह्म-

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्रनाम १७७ लक्षणा - वेदमन्त्रोंद्वारा लक्षित होनेवाली ॥ ८६ ॥

६२७. दुर्गा = दुर्गम्या अथवा दुर्गादेवी, ६२८. अपर्णा - तपस्विनी पार्वती, ६२ ९. सती = दक्षकन्या सती, ६३०. सत्या - सत्यस्वरूपा अथवा सत्यभामा, ६३१. पार्वती - गिरिराज हिमालयकी पुत्री, ६३२. चण्डिका = असुरसंहारिणी शक्ति, ६३३. अम्बिका = जगन्माता, ६३४. आर्या - श्रेष्ठस्वरूपा, ६३५. दाक्षायणी - दक्षप्रजापतिकी कन्या, ६३६. दाक्षी = दक्षपुत्री, ६३७. दक्षयज्ञविघातिनी- दक्ष यज्ञ -विध्वंसमें कारणभूता ॥ ८७ ॥

६३८. पुलोमजा = पुलोम दानवकी पुत्री शची-स्वरूपा, ६३ ९. शची - इन्द्रपत्नी, ६४० इन्द्राणी = शची, ६४१. देवी = प्रकाशमाना, ६४२. देववरार्पिता = देवेश्वर इन्द्रको अर्पित, ६४३.वायुना धारिणी = वायुके द्वारा धारण करनेवाली अथवा वयुना = ज्ञानस्वरूपा और धारिणी धारणशक्ति, ६४४. धन्या = धन्यवादके योग्य, ६४५. वायवी - वायुशक्ति, ६४६. वायुवेगगा = वायुवेगसे चलनेवाली ॥ ८८ ॥

६४७. यमानुजा - यमकी छोटी बहिन ६४८. संयमनी - संयमनशक्ति अथवा संयमनीपुरी, ६४ ९. संज्ञा = सूर्यप्रिया संज्ञास्वरूपा, ६५०. छाया = संज्ञाकी छायाभूता सवर्णा, ६५१. स्फुरद्युतिः- उद्दीप्त कान्तिवाली, ६५२. रत्नवेदी = रत्नवेदिकारूपा, ६५३. रत्नवृन्दा - रत्नसमूहरूपा, ६५४. तारा = तारामण्डलरूपा, ६५५. तरणिमण्डला - सूर्यमण्डल स्वरूपा ॥ ८ ९ ॥ ६५६. रुचिः = प्रभा, ६५७. शान्तिः = शान्ति-रूपा, ६५८. क्षमा = तितिक्षामयी अथवा पृथ्वी, ६५ ९. शोभा = छविमयी, ६६०. दया करुणामयी, ६६१. दक्षा = कुशला या चतुरा, ६६२. द्युतिः = कान्तिमयी, ६६३. त्रपा = लज्जा, ६६४. तलतुष्टिः = ताली बजानेसे तुष्ट होनेवाली, ६६५. विभा = प्रभा, ६६६. पुष्टि: - पुष्टिरूपा, ६६७ संतुष्टि: - संतोषमयी, ६६८. पुष्टभावना = सुदृढ़ भावनावाली ॥ ९ ० ॥ ६६ ९. चतुर्भुजा = चार भुजाएँ धारण करनेवाली ( लक्ष्मी ), ६७०. चारुनेत्रा - सुन्दर नेत्रवाली, ६७१. द्विभुजा = दो बाहुवाली ( कालिन्दी या श्रीराधा ), ६७२. अष्टभुजा = आठ भुजावाली ( सरस्वती ), ६७३. अबला - बलका प्रदर्शन न करनेवाली, ६७४. शङ्खहस्ता - हाथमें शङ्ख धारण करनेवाली ( वैष्णवी मूर्ति ), ६७५. पद्महस्ता = हाथमें कमल धारण करनेवाली ( लक्ष्मी ), ६७६. चक्रहस्ता - हाथमें चक्र धारण करनेवाली वैष्णवी मूर्ति, ६७७. गदाधरा = गदा धारण करनेवाली ॥ ९ १ ॥ ६७८. निषङ्गधारिणी - तरकस धारण करनेवाली, ६७ ९. चर्मखड्गपाणिः = हाथमें ढाल - तलवार लेने-वाली, ६८०. धनुर्धरा = धनुष धारण करनेवाली, ६८१. धनुष्टंकारिणी = ( दुर्गाके रूपमें ) धनुषका टंकार करनेवाली, ६८२. योद्धी - युद्ध करनेवाली, ६८३. दैत्योद्भटविनाशिनी = दैत्यसेनाके उद्भट योद्धाओंका विनाश करनेवाली ॥९ २ ॥ ६८४. रथस्था = रथपर बैठनेवाली, ६८५. गरुडा-रूढा - गरुडपर आरूढ़ होनेवाली, ६८६. श्रीकृष्ण-हृदयस्थिता - श्रीकृष्णके हृदयरूपी सिंहासनपर आसीन, ६८७. वंशीधरा = कृष्णरूपसे वंशी धारण करनेवाली, ६८८. कृष्णवेषा = श्रीकृष्णका वेष धारण करनेवाली, ६८ ९. स्रग्विणी = पुष्पोंके हारोंसे अलंकृत, ६ ९ ०. वनमालिनी- वनमाला धारण करनेवाली ॥९ ३ ॥ ६ ९ १. किरीटधारिणी = मस्तकपर किरीट धारण करनेवाली, ६ ९ २. याना = यानस्वरूपा, ६ ९ ३. मन्द-मन्दगतिः = धीरे - धीरे चलनेवाली, ६ ९ ४. गति: -सद्गतिस्वरूपा अथवा गमनशक्तिरूपा ६ ९ ५. चन्द्र-कोटिप्रतीकाशा = कोटिचन्द्रतुल्या, ६ ९ ६. तन्वी-कृशाङ्गी, ६ ९ ७. कोमलविग्रहा = मृदुल शरीर-वाली ॥ ९ ४ ॥ ६ ९ ८. भैष्मी - भीष्मपुत्री रुक्मिणीरूपा, ६ ९९. भीष्मसुता राजा भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी, ७००. अभीमा = अभयंकर - सौम्यरूपवाली, ७०१. रुक्मिणी- श्रीकृष्णकी प्रमुख पटरानी, ७०२. रुक्मरूपिणी- सुनहले रूपवाली, ७०३. सत्यभामा-सत्राजित्की पुत्री, श्रीकृष्णप्रिया, ७०४. जाम्बवती-जाम्बवान्द्वारा पोषित एवं उन्हींसे प्राप्त दिव्यरूपा पटरानी, ७०५. सत्या- ' सत्या ' नामवाली श्रीकृष्णकी

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१७८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड पटरानी, ७०६. भद्रा ' भद्रा ' नामवाली पटरानी, ७०७. सुदक्षिणा = परम उदारस्वरूपा श्रीकृष्णकी पटरानी ॥ ९ ५ ॥ ७०८. मित्रविन्दा- ' मित्रविन्दा ' नामवाली पटरानी, ७० ९. सखी - राधारानीकी सखी, ७१०. वृन्दा - वृन्दावनकी अधिदेवी, ७११. वृन्दारण्यध्वजोर्ध्वगा = वृन्दावनकी ध्वजतुल्या - ऊर्ध्वगामिनी, ७१२. शृङ्गारकारिणी = शृङ्गार करनेवाली, ७१३. शृङ्गा - शृङ्गस्वरूपा, ७१४. शृङ्गभूः = शिखरभूमि, ७१५. शृङ्गदा - शिखरपर स्थान देनेवाली, ७१६. खगा - आकाशचारिणी ॥ ९ ६ ॥ ७१७. तितिक्षा = क्षमा, ७१८. ईक्षा - ईक्षणस्वरूपा, ७१ ९. स्मृतिः = स्मरण शक्ति, ७२०. स्पर्धा - स्पर्धा-रूपा, ७२१. स्पृहा = अभिलाषा, ७२२. श्रद्धा = आस्तिक्य - बुद्धिस्वरूपा, ७२३. स्वनिर्वृति: = निजानन्दस्वरूपा, ७२४. ईशा - ईशनकर्त्री, ७२५. तृष्णा = कामना, ७२६. भिदा - भेदस्वरूपा, ७२७. प्रीतिः - प्रेम या प्रसन्नता, ७२८. हिंसा -हिंसावृत्तिरूपा, ७२ ९. याञ्चा = याचनारूपा, ७३० क्लमा = क्लान्तिरूपा अथवा अक्कुमा— क्लमरहिता, ७३१. कृषिः = कृषि ( वार्ताका एक भेद ) ॥ ९ ७ ॥ ७३२. आशा = आशारूपिणी, ७३३. निद्रा = निद्राकी अधिष्ठात्री या निद्रारूपा, ७३४. योगनिद्रा = योगनिद्रा, जिसका आश्रय लेकर भगवान् विष्णु चार मासतक शयन करते हैं, ७३५. योगिनी = योगिनीरूपा, ७३६. योगदा = योगदायिनी, ७३७. युगा - युग - स्वरूपा, ७३८. निष्ठा = परमगति, आश्रयशक्ति अथवा आधारस्वरूपा, ७३ ९. प्रतिष्ठा = प्रतिष्ठास्वरूपा, आश्रय अथवा अवलम्ब, ७४०. शमिति: = शमन - स्वरूपा, ७४१. सत्त्वप्रकृतिः- सत्त्वगुणमयी प्रकृतिवाली, ७४२. उत्तमा- उत्कृष्टस्वरूपा ॥ ९ ८ ॥ ७४३. तमः प्रकृतिदुर्मर्षी = तमोगुणमय स्वभावको दुःखसे सहन करनेवाली, ७४४. रजः प्रकृतिः = रजोगुणप्रधान प्रकृतिरूपा, ७४५. आनतिः - सब ओरसे नमनशीला, ७४६. क्रिया- क्रियाशक्ति, ७४७. अक्रिया - निष्क्रिय, ७४८. कृतिः = प्रयत्नरूपा, ७४ ९. ग्लानिः - ग्लानिरूपिणी, ७५०. सात्त्विकी - सत्त्व-प्रधाना शक्ति, ७५१. आध्यात्मिकी = आध्यात्मिक शक्ति, ७५२. वृषा = धर्मस्वरूपा ॥९९ ॥

७५३. सेवा - सेवारूपिणी, ७५४. शिखा - नदियोंकी शिखाभूता, ७५५. मणि: = मणि - रत्न - स्वरूपा, ७५६. वृद्धिः - अभ्युदयकी हेतुभूता, ७५७. आहूतिः = आह्वानस्वरूपा, ७५८. सुमतिः = सद्बुद्धिस्वरूपिणी, ७५ ९. द्युः = द्युलोकरूपिणी, ७६०. भूः = पृथ्वीरूपा, ७६१. रज्जुर्द्विदाम्नी = दो तटोंवाली, ७६२. षड्वर्गा = षड्वर्गरूपिणी, ७६३. संहिता - वेदरूपिणी, ७६४. सौख्यदायिनी = सर्वसुखदा ॥१०० ॥

७६५. मुक्ति: = मुक्तिरूपा, ७६६. प्रोक्तिः = श्रेष्ठवाणी-रूपा, ७६७. देशभाषा = देशीयभाषा, ७६८. प्रकृतिः = प्रकृतिरूपा, ७६ ९. पिङ्गलोद्भवा = पिङ्गला नाड़ीसे उत्पन्न, ७७०. नागभाषा = नागोंकी भाषाको जाननेवाली अथवा नागसे भाषण करनेवाली, ७७१. नागभूषा = नागोंसे भूषित, ७७२. नागरी = नागरी अर्थात् चतुरा, ७७३. नगरी = नगरस्वरूपा, ७७४. नगा = वृक्ष अथवा गिरिरूपा ॥१०१ ॥

७७५. नौ: - नाव, ७७६. नौका = नाव, ७७७. भवनौः = संसारसागरसे पार उतारनेवाली नौका, ७७८. भाव्या = मनमें भावना ( ध्यान ) करनेयोग्य, ७७ ९. भवसागरसेतुका = भवसागरसे पार जानेके लिये सेतुरूपा, ७८०. मनोमयी = मनः स्वरूपा, ७८१ दारुमयी = काष्ठकी बनी, ७८२. सैकती = सिकतासे पूर्ण, ७८३, सिकतामयी = वालुकासे परिपूर्ण या वालुकामयी ॥ १०२ ॥

७८४. लेख्या = चित्रमयी, ७८५. लेप्या = मिट्टीकी प्रतिमा, ७८६. मणिमयी - मणिनिर्मित प्रतिमा, ७८७. प्रतिमा हेमनिर्मिता = सोनेकी बनी प्रतिमा, ७८८. शैली - शिलामयी प्रतिमा, ७८ ९. शैलभवा = पर्वतसे प्रकट प्रतिमा, ७ ९ ०, शीला = शीलयुक्ता अथवा शीलस्वरूपा, ७ ९ १. शीकराभा - जलकणों अथवा जलकी फुहारोंसे शोभित, ७ ९ २. चला = चलस्वरूपा, ७ ९ ३. अचला- अचलस्वरूपा ॥१०३ ॥

७ ९ ४. अस्थिता - अस्थिर, ७ ९ ५. सुस्थिता = सुस्थिर, ७ ९ ६. तूली = तूलिका, ७ ९ ७. वैदिकी = वेदोक्त पद्धति, ७ ९ ८. तान्त्रिकी - तन्त्रोक्त पद्धति, ७ ९९. विधिः - विधिवाक्यस्वरूपा, ८००. संध्या = रात और दिनकी संधिवेला, ८०१. संध्याभ्रवसना - संध्या-कालिक बादल या आकाशकी भाँति लाल वस्त्रवाली, ८०२. वेदसंधि: - वेदमन्त्रोंमें संधि ( संहिता ) स्वरूपा, ८०३. सुधामयी - अमृतमयी ॥ १०४ ॥

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अध्याय १ ९ ] यमुना - सहस्त्रनाम १७ ९ ८०४. सायंतनी सायंकालिकी शोभा, ८०५. शिखा = ज्वालामयी, ८०६. अवेध्या = अभेदनीया, ८०७. सूक्ष्मा = सूक्ष्मस्वरूपा, ८०८. जीवकला = जीवरूप भगवत्कला, ८० ९. कृति: = कृतिरूपा, ८१०. आत्मभूता = सबकी आत्मस्वरूपा, ८११. भाविता = ध्यान या भावनाकी विषयभूता, ८१२. अण्वी = सूक्ष्मस्वरूपा, ८१३. प्रह्वी - विनयशीला, ८१४. कमलकर्णिका = हृदय-कमलकी कर्णिकामें ध्येया ॥ १०५ ॥

८१५. नीराजनी = आरती, ८१६. महाविद्या = तत्त्वसाक्षात्कार करानेवाली महावाक्यबोधात्मिका महाविद्या, अथवा ब्रह्मविद्यारूपा महाविद्या, ८१७. कंदली = सुखकी अङ्कुरस्वरूपा, ८१८. कार्यसाधनी = भक्तजनोंके अभीष्ट कार्यको सिद्ध करनेवाली, ८१ ९. पूजा = अर्चना, ८२०. प्रतिष्ठा = स्थापना, ८२१. विपुला = विपुलस्वरूपा, ८२२. पुनन्ती = पवित्र करनेवाली, ८२३. पारलौकिकी- परलोकके लिये हितकारिणी ॥ १०६ ॥

८२४. शुक्लशुक्तिः = श्वेत सीपी या सितुहीकी उपलब्धिका स्थान, ८२५. मौक्तिका - मुक्तास्वरूपा, ८२६. प्रतीतिः = प्रतीतिस्वरूपा, ८२७. परमेश्वरी = परमेश्वरप्रिया, ८२८. विरजा = निर्मला, ८२ ९. उष्णिक् = वैदिक छन्द - विशेष, ८३०. विराड् - विराट् - रूपा, ८३१. वेणी = त्रिवेणीरूपा, ८३२. वेणुका = वंशीरूपिणी, ८३३. वेणुनादिनी = वेणुनाद करनेवाली - बाँसुरीकी तान छेड़नेवाली ॥ १०७ ॥

८३४. आवर्तिनी = भँवरोंसे युक्ता, ८३५. वार्तिकदा = वार्तिकदायिनी, ८३६. वार्ता = कृषि, गोरक्षा और वाणिज्यके भेदसे त्रिविध वार्ता, ८३७. वृत्तिः = जीविकारूपा, ८३८. विमानगा = विमानपर यात्रा करने-वाली, ८३ ९. रासाढ्या - रासजनित सुखसे सम्पन्न, ८४०. रासिनी = रासपरायणा, ८४१. रासा = रासस्वरूपा, ८४२. रासमण्डलवर्तिनी - रासमण्डलमें वर्तमान ॥ १०८ ॥

८४३. गोपगोपीश्वरी = गोपों तथा गोपाङ्गनाओंकी आराध्या ईश्वरी, ८४४. गोपी - गोपीरूपा, ८४५. गोपी-गोपालवन्दिता = गोपियों और ग्वालोंसे वन्दित, ८४६. गोचारिणी = अपने तटपर गौओंको चरनेके लिये स्थान और सुविधा देनेवाली, ८४७. गोपनदी - गोपोंकी नदी, ८४८. गोपानन्दप्रदायिनी = गोपोंको आनन्द प्रदान करनेवाली ॥ १० ९ ॥ ८४ ९. पशव्यदा = पशुओंके लिये हितकर घास प्रदान करनेवाली, ८५०. गोपसेव्या = गोपोंके द्वारा सेवनीया, ८५१. कोटिशो गोगणावृता = करोड़ों गौओंके समुदायसे घिरी हुई, ८५२. गोपानुगा = गोपगण जिनका अनुगमन करते हैं या गोप जिनके सेवक हैं, ऐसी, ८५३. गोपवती = गोपोंसे युक्त, ८५४. गोविन्दपदपादुका = गोविन्द - चरणोंकी पादुकास्वरूपा ॥ ११० ॥

८५५. वृषभानुसुता = वृषभानुनन्दिनी राधासे अभिन्न, ८५६. राधा = श्रीकृष्णकी आराध्या राधा - स्वरूपा, ८५७. श्रीकृष्णवशकारिणी - श्रीकृष्णको वशमें कर लेनेवाली, ८५८. कृष्णप्राणाधिका = श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय, ८५ ९. शश्वद्रसिका - नित्यरसिका, ८६०. रसिकेश्वरी = रसिकोंकी ईश्वरी ॥ १११ ॥

८६१. अवटोदा- अवटोदा नामकी नदी, ८६२. ताम्रपर्णी = ताम्रपर्णी नामकी नदी, ८६३. कृतमाला = इसी नामवाली नदी, ८६४. विहायसी - विहायसी नदी, ८६५. कृष्णा - कृष्णा नदी, ८६६. वेणी - वेणी नामकी नदी, ८६७. भीमरथी = भीमा नामकी नदी, ८६८. तापी - तपती नामकी नदी ८६ ९. रेवा नर्मदा, ८७०. महापगा - विशाल नदी, अथवा महानदी नामकी नदी ॥ ११२ ॥

८७१. वैयासकी = वैयासकी ( व्यास ) नदी, ८७२. कावेरी = कावेरी नदी, ८७३. तुङ्गभद्रा = तुङ्गभद्रा नामकी नदी, ८७४. सरस्वती = सरस्वती नदी, ८७५. चन्द्रभागा = चिनाब नदी, ८७६. वेत्रवती बेतवा नदी, ८७७. ऋषिकुल्या = इसी नामकी नदी, ८७८. ककुद्मिनी = ककुद्मिनी नदी ॥ ११३ ॥

८७ ९. गौतमी- गोदावरी, ८८०. कौशिकी - कोसी नदी, ८८ ९. सिन्धुः = सिन्धु नदी, ८८२. बाण-गङ्गा = अर्जुनके बाणसे प्रकट हुई पातालगङ्गा, ८८३. अतिसिद्धिदा = अत्यन्त सिद्धि प्रदान करनेवाली, ८८४. गोदावरी = गौतमी, ८८५. रत्नमाला = नदी, ८८६. गङ्गा गङ्गा नदी, ८८७ मन्दाकिनी - आकाश - गङ्गा, ८८८. बला = बला नामकी नदी ॥ ११४ ॥

८८ ९. स्वर्णदी - स्वर्गलोककी नदी गङ्गा, ८ ९ ०. जाह्नवी- जह्नुनन्दिनी गङ्गा, ८ ९ १. वेला - वेला नदी, ८ ९ २. वैष्णवी - विष्णुकुल्या, ८ ९ ३. मङ्गलालया - मङ्गलका आवास, ८ ९ ४. बाला - बाला नदी, ८ ९ ५. विष्णुपदी-

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१८० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड गङ्गा, ८ ९ ६. सिन्धुसागरसंगता = गङ्गासागर - संगम-स्वरूपा ॥ ११४ ॥

८ ९ ७. गङ्गासागरशोभाढ्या = गङ्गा और सागरके संगमकी शोभासे सम्पन्न, ८ ९ ८. सामुद्री - समुद्रप्रिया, ८ ९९. रत्नदा = रत्न प्रदान करनेवाली, ९ ००. धुनी = नदीरूपा, ९ ०१. भागीरथी = राजा भगीरथके द्वारा लायी गयी गङ्गा, ९ ०२. स्वर्धुनीभूः = गङ्गाके प्राकट्य -की भूमि, ९ ०३. श्रीवामनपदच्युता = श्रीवामनके चरणोंसे च्युत हुई ॥ ११६ ॥

९ ०४. लक्ष्मीः = लक्ष्मीस्वरूपा, ९ ०५. रमा = पद्मा, ९ ०६. रमणीया - रमणीयतासे युक्त, ९ ०७. भार्गवी = भृगुपुत्री, ९ ०८. विष्णुवल्लभा भगवान् विष्णुकी प्रिया, ९ ० ९. सीता = सीतास्वरूपा, ९ १०. अर्चि: = अग्नि ज्वालारूपिणी, ९ ११. जानकी = जनक - नन्दिनी, ९ १२. माता = जगज्जननी, ९ १३. कलङ्क - रहिता = निष्कलङ्का, ९ १४. कला = भगवत्कला - स्वरूपा ॥ ११७ ॥

९ १५. कृष्णपादाब्जसम्भूता = श्रीकृष्णके चरणारविन्दों-से प्रकट हुई, ९ १६. सर्वा = सर्वस्वरूपा, ९ १७. त्रिपथगामिनी = त्रिपथगा गङ्गा, ९९ ८. धरा = धरणी-स्वरूपा, ९ १ ९. विश्वम्भरा = विश्वका भरण - पोषण करनेवाली, ९ २०. अनन्ता = अन्तरहिता, ९ २१. भूमिः = आधारभूमिस्वरूपा, ९ २२. धात्री = धाय, ९ २३. क्षमामयी क्षमास्वरूपा ॥ ११८ ॥

९ २४. स्थिरा = स्थिरस्वरूपा, ९ २५. धरित्री = धारण करनेवाली, ९ २६. धरणी लोकधारणी पृथ्वी, ९ २७. उर्वी = भूमि, ९ २८. शेषफणस्थिता = शेषनागके फणोंपर रहनेवाली, ९ २ ९. अयोध्या - जिसके साथ युद्ध न किया जा सके, ऐसी अजेय पुरी, ९ ३०. राघवपुरी - राघवेन्द्रकी नगरी, ९ ३१. कौशिकी - कुशिकवंशजा, ९ ३२. रघुवंशजा - रघुकुलमें उत्पन्न होनेवाली ॥ ११ ९ ॥ ९ ३३. मथुरा - मथुरा - नगरी, ९ ३४. माथुरी - मथुरा-मण्डलमें प्रकट, ९ ३५. पन्था = मार्गस्वरूपा, ९ ३६. यादवी - यदुवंशियोंकी नगरी ९ ३७. ध्रुवपूजिता - ध्रुवसे प्रशंसित, ९ ३८. मयायुः = मयासुरको आयु प्रदान करने-वाली, ९ ३ ९. बिल्वनीलोदा- बिल्वके समान नील रंगके जलवाली, ९ ४०. गङ्गाद्वारविनिर्गता = हरद्वारसे निकली हुई ॥ १२० ॥

९ ४१. कुशावर्तमयी - कुशावर्तनामक तीर्थस्वरूपा, ९ ४२. ध्रौव्या = ध्रुवत्वसे युक्त, ९ ४३. ध्रुवमण्डलमध्यगा = ध्रुवमण्डलके बीचसे निकली हुई, ९ ४४. काशी - वाराणसी, ९ ४५. शिवपुरी = शिवकी नगरी, ९ ४६. शेषा - शेषस्वरूपा, ९ ४७. विन्ध्या-विन्ध्यस्वरूपा, ९ ४८. वाराणसी- काशी, ९ ४ ९. शिवा - शिवास्वरूपा ॥१२१ ॥

९ ५०. अवन्तिका = मालव प्रदेशकी राजधानी और महाकालकी नगरी, ९ ५१. देवपुरी = देवनगरी, ९ ५२. प्रोज्ज्वला = प्रकृष्ट शोभासे सम्पन्न, ९ ५३. उज्जयिनी = उज्जैन, ९ ५४. जिता = जितस्वरूपा, ९ ५५. द्वारावती = द्वारकापुरी, ९ ५६. द्वारकामा- द्वारकी कामनावाली, ९ ५७. कुशभूता = कुशके प्रकट होनेका स्थान, ९ ५८. कुशस्थली - कुशोंकी उत्पत्ति - स्थली द्वारका ॥१२२ ॥

९ ५ ९. महापुरी - महानगरी, ९ ६०. सप्तपुरी - सप्त-पुरीस्वरूपा, ९ ६१. नन्दिग्रामस्थलस्थिता - नन्दिग्रामके स्थलमें स्थित सरयू अथवा यमुना ९ ६२. शालग्राम-शिलादित्या - शालग्रामशिलाकी उत्पत्तिका स्थान गण्डकी नदी, ९ ६३. सम्भलग्राममध्यगा -सम्भल ग्राम मध्यमें गयी हुई ॥ १२३ ॥

९ ६४. वंशगोपालिनी = वंशगोपाल - मन्त्रसे युक्त, ९ ६५. क्षिप्ता- क्षिप्तस्वरूपा, ९ ६६. हरिमन्दिरवर्तिनी -भगवान्‌के मन्दिरमें विद्यमान, ९ ६७. बर्हिष्मती = बर्हिष्मती नामकी नगरी, ९ ६८. हस्तिपुरी = हस्तिनापुरनगरी, ९ ६ ९. शक्रप्रस्थनिवासिनी - इन्द्रप्रस्थ ( देहली ) में निवास करनेवाली ॥ १२४ ॥

९ ७०. दाडिमी - दाड़िमफलस्वरूपा, ९ ७१. सैन्धवी - सिन्धुप्रिया, ९ ७२. जम्बूः = जम्बूनदीरूपा, ९ ७३. पौष्करी - पुष्करद्वीपसे सम्बन्ध रखनेवाली, ९ ७४. पुष्करप्रसूः- पुष्करकी उत्पत्तिका स्थान, ९ ७५. उत्पलावर्तगमना - उत्पलावर्त तीर्थ में जानेवाली, ९ ७६. नैमिषी - नैमिषारण्यवासिनी ॥ १२५ ॥

९ ७७. अनिमिषादृता = देवपूजिता, ९ ७८. कुरुजाङ्गलभूः -कुरुजाङ्गलदेशमें प्रकट, ९ ७ ९. काली = कृष्णवर्णा अथवा काली गङ्गा, ९ ८०. हैमवती - हिमालयसे उत्पन्न, ९ ८१ ९. आर्बुदी = आबूमें प्रकट, ९ ८२. बुधा - विदुषी, ९ ८३. शूकरक्षेत्र-

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अध्याय २० ] बलदेवजीके हाथसे प्रलम्बासुरका विदिता - शूकरक्षेत्रमें प्रसिद्ध, ९ ८४. श्वेतवाराह -धारिता = श्वेतवाराहके द्वारा धारित ॥ १२६ ॥

९ ८५. सर्वतीर्थमयी = सर्वतीर्थस्वरूपा, ९ ८६. तीर्था = तीर्थभूता, ९ ८७. तीर्थानां तीर्थकारिणी = तीर्थोंको तीर्थ बनानेवाली, ९ ८८. हारिणी सर्वदोषाणाम् - सब दोषोंको हर लेनेवाली, ९ ८ ९. दायिनी सर्वसम्पदाम् = सब सम्पत्तियोंको देनेवाली ॥ १२७ ॥

९९ ०. वर्धिनी तेजसाम् - तेजको बढ़ानेवाली, ९९९. साक्षात् प्रत्यक्ष प्रकट, ९९ २. गर्भवास निकृन्तनी = माताके गर्भमें वास करनेके कष्टका उच्छेद करनेवाली, ९९ ३. गोलोकधाम = गोलोककी प्रकाश - रूपा, ९९ ४. धनिनी = धनसे सम्पन्न, ९९ ५. निकुञ्ज - निजमञ्जरी -निकुञ्जमें अपनी मञ्जरियोंके साथ रहनेवाली ॥ १२८ ॥

९९ ६. सर्वोत्तमा = सबसे उत्तम, ९९ ७. सर्वपुण्या = सर्वाधिक पुण्यशालिनी, ९९ ८. सर्वसौन्दर्यशृङ्खला = सम्पूर्ण सुन्दरताको बाँध रखनेवाली, ९९९, सर्वतीर्थोपरिगता = सब तीर्थों ऊपर पहुँची हुई, १०००. सर्वतीर्थाधिदेवता - सम्पूर्ण तीर्थोंकी अधिदेवी ॥ १२ ९ ॥ कालिन्दीके सहस्रनामका वर्णन कीर्ति देनेवाला तथा उत्तम कामपूरकहै । यह बड़े - बड़े पापोंको हर लेता, पुण्य देता और आयुको बढ़ानेवाला श्रेष्ठ साधन है । रातमें एक बार इसका पाठ कर ले तो चोरोंसे भय नहीं होता । रास्तेमें दो बार पढ़ ले तो डाकू और लुटेरोंसे कहीं भय नहीं होता । द्विजको चाहिये कि वह द्वितीयासे पूर्णिमातक प्रतिदिन कालिन्दी देवीका ध्यान करके भक्तिभावसे दस वध तथा उसके पूर्वजन्मका परिचय १८१ बार इस सहस्रनामका पाठ करे; ऐसा करनेसे यदि रोगी हो तो रोगसे छूट जाता है, कैदमें पड़ा हो तो वहाँके बन्धन से मुक्त हो जाता है, गर्भिणी नारी हो तो वह पुत्र पैदा करती है और विद्यार्थी हो तो वह पण्डित होता है । मोहन, स्तम्भन, वशीकरण, उच्चाटन, मारण, शोषण, दीपन, उन्मादन, तापन, निधिदर्शन आदि जो - जो वस्तु मनुष्य मनमें चाहता है, उस उसको वह प्राप्त कर लेता है ॥ १३० - १३५ ॥ इसके पाठसे ब्राह्मण ब्रह्मतेजसे सम्पन्न होता है, क्षत्रिय पृथ्वीका आधिपत्य प्राप्त करता है, वैश्य खजानेका मालिक होता है और शूद्र इसको सुनकर निर्मल - शुद्ध हो जाता है ॥१३६ ॥

जो पूजाकालमें प्रतिदिन भक्तिभावसे इसका पाठ करता है, वह जलसे अलिप्त रहनेवाले कमलपत्रकी भाँति पापोंसे कभी लिप्त नहीं होता ॥ १३७ ॥

जो लोग एक वर्षतक पटल और पद्धतिकी विधिका पालन करके प्रतिदिन इस सहस्रनामका सौ बार पाठ करते हैं और उसके बाद स्तोत्र और कवच पढ़ते हैं, वे सातों द्वीपोंसे युक्त पृथिवीका राज्य प्राप्त कर लेंगे, इसमें संशय नहीं है । जो यमुनाजीमें भक्तिभाव रखकर निष्कामभावसे इसका पाठ करता है, वह पुण्यात्मा धर्म - अर्थ - काम- इस त्रिवर्गको पाकर इस जीवनमें ही जीवन्मुक्त हो जाता है । जो इस प्रसङ्गका पाठ करता है, वह निकुञ्जलीलासे ललित, मनोहर तथा कालिन्दीतटके लता - समुदायोंसे विलसित वृन्दावनके मतवाले भ्रमरोंसे अनुनादित गोलोकधाममें पहुँच जाता है ॥ १३८ – १४१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत श्रीसौभरि और मांधाताके संवादमें ' यमुना - सहस्रनामका वर्णन ' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ बीसवाँ अध्याय बलदेवजीके हाथसे प्रलम्बासुरका वध तथा उसके पूर्वजन्मका परिचय श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार चले गये । यह मैंने तुमसे गोपियोंके शुभ चरित्रका वर्णन यमुनाजीका सहस्रनामस्तोत्र सुनकर वीरभूप - शिरोमणि किया, जो महान् पापोंको हर लेनेवाला और पुण्यप्रद मांधाता सौभरिमुनिको नमस्कार करके अयोध्यापुरीको है । बताओ और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १-२ ॥

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१८२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड बहुलाश्व बोले- ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे गोपियोंके चरित्रका उत्तम वर्णन सुना । साथ ही यमुनाके पञ्चाङ्गका भी श्रवण किया, जो बड़े - बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है । साक्षात् गोलोकके अधिपति भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ व्रजमण्डलमें आगे कौन - कौन - सी मनोहर लीलाएँ कीं, यह बताइये ॥ ३-४ ॥ श्रीनारदजीने कहा — राजन्! एक दिन श्री बलराम और ग्वाल - बालोंके साथ अपनी गौएँ चराते हुए श्रीकृष्ण भाण्डीरवनमें यमुनाजीके तटपर बालोचित खेल खेलने लगे । बालकोंसे वाह्य-वाहनका खेल करवाते हुए श्रीकृष्ण मनोहर गौओंकी देख - भाल करते हुए वनमें विहार करते थे । ( इस खेलमें कुछ लड़के वाहन - घोड़ा आदि बनते और कुछ उनकी पीठपर सवारी करते थे । ) उस समय वहाँ कंसका भेजा हुआ असुर प्रलम्ब गोपरूप धारण करके आया । दूसरे ग्वाल - बाल तो उसे न पहचान सके, किंतु भगवान् श्रीकृष्णसे उसकी माया छिपी न रही । खेलमें हारनेवाला बालक जीतनेवालेको पीठपर चढ़ाता था; किंतु जब बलरामजी जीत गये, तब उन्हें कोई भी पीठपर चढ़ानेको तैयार नहीं हुआ । उस समय प्रलम्बासुर ही उन्हें भाण्डीरवनसे यमुनातटतक अपनी पीठपर चढ़ाकर ले जाने लगा । एक निश्चित स्थान था, जहाँ ढोकर ले जानेवाला बालक अपनी पीठपर चढ़े हुए बालकको उतार देता था; परंतु प्रलम्बासुर उतारनेके स्थानपर पहुँचकर भी उन्हें उतारे बिना ही मथुरातकले जानेको उद्यत हो गया । उसने बादलोंकी घोर घटाकी भाँति भयानक रूप धारण कर लिया और विशाल पर्वतके समान दुर्गम हो गया । उस दैत्यकी पीठपर बैठे हुए सुन्दर बलरामजीके कानोंमें कान्तिमान् कुण्डल हिल रहे थे । ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमें पूर्ण चन्द्रमा उदित हुए हों अथवा मेघोंकी घटामें बिजली चमक रही हो । उस भयानक दैत्यको देखकर महाबली बलदेवजीको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने उसके मस्तकपर कसके एक मुक्का मारा, मानो इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्रका प्रहार किया हो । उस दैत्यका मस्तक वज्रसे आहत पहाड़की तरह फट गया और वह सहसा पृथ्वीको कम्पित करता हुआ धराशायी हो गया । उसके शरीरसे एक विशाल ज्योति निकली और बलरामजीमें विलीन हो गयी । उस समय देवता बलरामजीके ऊपर नन्दनवनके फूलोंकी वर्षा करने लगे । नृपेश्वर! पृथ्वीपर और आकाशमें भी जय - जयकार होने लगी । राजन्! इस प्रकार श्रीबलदेवजीके परम अद्भुत चरित्रका मैंने तुम्हारे समक्ष वर्णन किया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ५ – १४३ ॥ बहुलाश्वने पूछा – मुने! वह रण- दुर्मद दैत्य प्रलम्ब पूर्वजन्ममें कौन था? और बलदेवजीके हाथसे उसकी मुक्ति क्यों हुई? ॥ १५ ॥

श्रीनारदजीने कहा- राजन्! यक्षराज कुबेरने अपने सुन्दर वनमें भगवान् शिवकी पूजाके लिये फुलवारी लगा रखी थी और इधर - उधर यक्षोंको तैनात करके उन फूलोंकी रक्षाका प्रबन्ध करवाया था; तथापि उस पुष्पवाटिकाके सुन्दर एवं चमकीले फूल लोग तोड़ लिया करते थे । इससे कुपित हो बलवान् यक्षराज कुबेरने यह शाप दिया — ' जो यक्ष इस फुलवारीके फूल लेंगे अथवा दूसरे भी जो देवता और मनुष्य आदि फूल तोड़नेका अपराध करेंगे, वे सब सहसा मेरे शापसे भूतलपर असुर हो जायँगे । ' एक दिन हूहू नामक गन्धर्वका बेटा ' विजय ' तीर्थभूमियोंमें विचरता तथा मार्गमें भगवान् विष्णुके गुणोंको गाता हुआ चैत्ररथ वनमें आया । उसके हाथमें वीणा थी । बेचारा गन्धर्व शापकी बातको नहीं जानता था, अतः उसने वहाँसे कुछ फूल ले लिये । फूल लेते ही वह गन्धर्वरूपको त्यागकर असुर हो गया । फिर तो वह तत्काल महात्मा कुबेरकी शरणमें गया और नमस्कार करके दोनों हाथ जोड़कर धीरे - धीरे शापसे छूटनेके लिये प्रार्थना करने लगा । राजेन्द्र! तब उसपर प्रसन्न होकर कुबेरने भी वर दिया- ' मानद! तुम भगवान् विष्णुके भक्त तथा शान्त - चित्त महात्मा हो, इसलिये शोक न करो । द्वापरके अन्तमें भाण्डीर - वनमें यमुनाके तटपर बलदेवजीके हाथसे तुम्हारी मुक्ति होगी, इसमें संदेह नहीं है ' ॥ १६ – २३ ॥

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अध्याय २१ ] दावानलसे गौओं और ग्वालोंका छुटकारा तथा विप्रपत्त्रियोंको श्रीकृष्णका दर्शन १८३ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! हूहूका पुत्र हुआ और कुबेरके वरसे उसको परम मोक्षकी प्राप्ति वह विजयनामक गन्धर्व ही महान् असुर प्रलम्ब हुई ॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' प्रलम्ब - वध ' नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

इक्कीसवाँ अध्याय दावानलसे गौओं और ग्वालोंका छुटकारा तथा विप्रपत्नियोंको श्रीकृष्णका दर्शन श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर श्रीबलरामसहित समस्त ग्वाल - बाल खेलमें आसक्त हो गये । उधर सारी गौएँ घासके लोभसे विशाल वनमें प्रवेश कर गयीं । उनको लौटा लानेके लिये ग्वाल-बाल बहुत बड़े मूँजके वनमें जा पहुँचे । वहाँ प्रलयाग्निके समान महान् दावानल प्रकट हो गया । उस समय गौओंसहित समस्त ग्वाल - बाल एकत्र हो बलरामसहित श्रीकृष्णको पुकारने लगे और भयसे आर्त हो, उनकी शरण ग्रहण कर ' बचाओ, बचाओ! ' यों कहने लगे । अपने सखाओंके ऊपर अग्निका महान् भय देखकर योगेश्वरेश्वर श्रीकृष्णने कहा - ' डरो मत; अपनी आँखें बंद कर लो । ' नरेश्वर! जब गोपोंने ऐसा कर लिया, तब देवताओंके देखते - देखते भगवान् गोविन्ददेव उस भयकारक अग्निको पी गये । इस प्रकार उस महान् अग्निको पीकर ग्वालों और गौओंको साथ ले श्रीहरि यमुनाके उस पार अशोकवनमें जा पहुँचे । वहाँ भूखसे पीड़ित ग्वाल- बाल बलरामसहित श्रीकृष्णसे हाथ जोड़कर बोले – ' प्रभो! हमें बहुत भूख सता रही है । ' तब भगवान्ने उनको आङ्गिरस-यज्ञमें भेजा । वे उस श्रेष्ठ यज्ञमें जाकर नमस्कार करके निर्मल वचन बोले ॥१–८ ॥ गोपोंने कहा - ब्राह्मणो! ग्वाल - बालों और बलरामजीके साथ व्रजराजनन्दन श्रीकृष्ण गौएँ चराते हुए इधर आ निकले हैं, उन सबको भूख लगी है । अतः आप सखाओंसहित उन मदनमोहन श्रीकृष्णके लिये शीघ्र ही अन्न प्रदान करें ॥ ९ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! ग्वाल - बालोंकी वह बात सुनकर वे ब्राह्मण कुछ नहीं बोले । तब ग्वाल - बाल निराश लौट गये और आकर बलराम-सहित श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले ॥१० ॥

गोपोंने कहा- सखे! तुम व्रजमण्डलमें ही अधीश बने हुए हो । गोकुलमें ही तुम्हारा बल चलता है और नन्दबाबाके आगे ही तुम कठोर दण्डधारी बने हुए हो । प्रचण्ड सूर्यके समान तेजस्वी तुम्हारा प्रकाशमान दण्ड निश्चय ही मथुरापुरीमें अपना प्रभाव नहीं प्रकट करता ॥११ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तब श्रीहरिने उन ग्वाल - बालोंको पुनः यज्ञकर्ता ब्राह्मणोंकी पत्नियोंके पास भेजा । तब वे पुनः यज्ञशालामें गये और उन ब्राह्मण - पत्नियोंको नमस्कार करके वे श्रीकृष्णके भेजे हुए ग्वाल हाथ जोड़कर बोले ॥ १२ ॥

गोपोंने कहा- ब्राह्मणी देवियो! ग्वाल - बालों और बलरामजीके साथ गाय चराते हुए श्रीव्रजराज-नन्दन कृष्ण इधर आ गये हैं, उन्हें भूख लगी है । सखाओंसहित उन मदनमोहनके लिये आपलोग शीघ्र ही अन्न प्रदान करें ॥ १३ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! श्रीकृष्णका शुभागमन सुनकर उन समस्त विप्रपत्नियोंके मनमें उनके दर्शनकी लालसा जाग उठी । उन्होंने विभिन्न पात्रोंमें भोजनकी सामग्री रख लीं और तत्काल लोक - लाज छोड़कर वे श्रीकृष्णके पास चली गयीं । रमणीय अशोकवनमें यमुनाके मनोरम तटपर विप्र-पत्त्रियोंने श्रीहरिका अद्भुत रूप जैसा सुना था, वैसा ही देखा । दर्शन पाकर वे सब परमानन्दमें उसी प्रकार निमग्न हो गयीं, जैसे योगीजन तुरीय ब्रह्मका साक्षात्कार करके आनन्दित हो उठते हैं॥१४–१६ ॥

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१८४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड श्रीभगवान् बोले - विप्रपत्त्रियो! तुमलोग धन्य हो, जो मेरे दर्शनके लिये यहाँतक चली आयीं; अब शीघ्र ही घर लौट जाओ । ब्राह्मणलोग तुमपर कोई संदेह नहीं करेंगे । तुम्हारे ही प्रभावसे तुम्हारे पतिदेवता ब्राह्मणलोग तत्काल यज्ञका फल पाकर निर्मल हो, तुम्हारे साथ प्रकृतिसे परे विद्यमान परमधाम गोलोकको चले जायँगे ॥ १७-१८३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - तब श्रीहरिको नमस्कार करके वे सब स्त्रियाँ यज्ञशालामें चली आयीं, उन्हें देखकर सब ब्राह्मणोंने अपने - आपको धिक्कारा । वे कंसके डरसे स्वयं श्रीकृष्णको देखनेके लिये नहीं जा सके थे ॥ १ ९ -२० ॥ मैथिल! ग्वाल - बालों और बलरामजीके साथ वह अन्न खाकर श्रीकृष्ण गौओंको चराते हुए मनोहर वृन्दावनमें चले गये ॥२१ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' दावानलसे गौओं और ग्वालोंका छुटकारा तथा विप्रपत्त्रियोंको श्रीकृष्णका दर्शन ' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥

बाईसवाँ अध्याय श्रीकृष्णका नन्दराजको वरुणलोकसे आना और गोप - गोपियोंको वैकुण्ठधामका श्रीनारदजी कहते हैं - एक दिनकी बात है, नन्दराज एकादशीका व्रत करके द्वादशीको निशीथ कालमें ही ग्वालोंके साथ यमुना - स्नानके लिये गये और जलमें उतरे । वहाँ वरुणका एक सेवक उन्हें पकड़कर वरुण - लोकमें ले गया । मैथिलेश्वर! उस समय ग्वालों में कुहराम मच गया; तब उन सबको आश्वासन दे भगवान् श्रीहरि वरुणपुरीमें पधारे और उन्होंने सहसा उस पुरीके दुर्गको भस्म कर दिया । करोड़ों सूर्योके समान तेजस्वी श्रीहरिको अत्यन्त कुपित हुआ देख वरुणने तिरस्कृत होकर उन्हें नमस्कार किया और उनकी परिक्रमा करके हाथ जोड़कर कहा ॥१–४ ॥ वरुण बोले- श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार है । परिपूर्णतम परमात्मा तथा असंख्य ब्रह्माण्डोंका भरण पोषण करनेवाले गोलोकपतिको नमस्कार है । चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट तेजोमय श्रीहरिको नमस्कार है । सर्वतेजःस्वरूप आप परमेश्वरको नमस्कार है । सर्वस्वरूप आप परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है । मेरे * नमः श्रीकृष्णचद्राय परिपूर्णतमाय च । चतुर्व्यूहाय महसे नमस्ते सर्वतेजसे । केनापि मूढेन ममानुगेन कृतं परं हेलनमाद्यमेव । दर्शन कराना किसी मूर्ख सेवकने यह पहली बार आपकी अवहेलना की है; उसके लिये आप मुझे क्षमा करें । परेश! भूमन्! मैं आपकी शरणमें आया हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये * ॥५–७ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर प्रसन्न हुए भगवान् श्रीकृष्ण नन्दजीको जीवित लेकर अपने बन्धुजनोंको सुख प्रदान करते हुए व्रजमण्डलमें लौट आये । नन्दराजके मुखसे श्रीहरिके उस प्रभावको सुनकर गोपी और गोप- समुदाय नन्दनन्दन श्रीकृष्णसे बोले - ' प्रभो! यदि आप लोकपालोंसे पूजित साक्षात् भगवान् हैं तो हमें शीघ्र ही उत्तम वैकुण्ठ-लोकका दर्शन कराइये । ' तब उन सबको लेकर श्रीकृष्ण वैकुण्ठधाममें गये और वहाँ उन्होंने ज्योतिर्मण्डलके मध्यमें विराजमान अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराया । उनके सहस्र भुजाएँ थीं, किरीट और कटक आदि आभूषणोंसे उनका स्वरूप और भी भव्य दिखायी देता था । वे शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म असंख्यब्रह्माण्डभृते गोलोकपतये नमः ॥ नमस्ते सर्वभावाय परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥ तत् क्षम्यतां भोः शरणं गतं मां परेश भूमन् परिपाहि पाहि ॥ ( गर्ग ०, माधुर्य ० २२ । ५–७ )