गर्ग संहिता — पृष्ठ 191–200
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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अध्याय २३ ] अम्बिकावनमें अजगरसे नन्दराजकी और वनमालासे सुशोभित थे । असंख्य कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी स्वरूपसे वे शेषनागकी शय्यापर पौढ़े थे । चँवर डुलाये जानेसे उनकी आभा और भी दिव्य जान पड़ती थी । ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवामें लगे थे । उस समय भगवान्के गदाधारी पार्षदोंने उन गोपगणोंको सीधे करके उनसे प्रणाम करवाकर उन्हें प्रयत्नपूर्वक दूर खड़ा किया और उन्हें चकित - सा देख वे पार्षद बोले – ' अरे वनचरो! चुप हो जाओ । यहाँ वक्तृता न दो, भाषण न करो । क्या तुमने श्रीहरिकी सभा कभी नहीं देखी है? यहीं सबके प्रभु देवाधिदेव साक्षात् भगवान् स्थित होते हैं और वेद उनके गुण गाते हैं । ' इस प्रकार शिक्षा इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत रक्षा तथा सुदर्शन - नामक विद्याधरका उद्धार १८५ देनेपर वे गोप हर्षसे भर गये और चुपचाप खड़े हो गये । अब वे मन - ही - मन कहने लगे - ' अरे! यह ऊँचे सिंहासनपर बैठा हुआ हमारा श्रीकृष्ण ही तो है । हम समीप खड़े हैं, तो भी हमें नीचे खड़ा करके ऊँचे बैठ गया है और हमसे क्षणभरके लिये बाततक नहीं करता । इसलिये व्रजसे बढ़कर न कोई श्रेष्ठ लोक है और न उससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक लोक है; क्योंकि व्रजमें तो यह हमारा भाई रहा है और इसके साथ हमारी परस्पर बातचीत होती रही है । ' राजन्! इस प्रकार कहते हुए उन गोपोंके साथ परिपूर्णतम प्रभु भगवान् श्रीहरि व्रजमें लौट आये ॥ ८-१९ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' नन्द आदिका वैकुण्ठदर्शन ' नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
तेईसवाँ अम्बिकावनमें अजगरसे नन्दराजकी रक्षा नारदजी कहते हैं— नरेश्वर! एक समय वृषभानु और उपनन्द आदि गोपगण रत्नोंसे भरे हुए छकड़ोंपर सवार होकर अम्बिकावनमें आये । वहाँ भगवती भद्रकाली और भगवान् पशुपतिका विधिपूर्वक पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणोंको दान दिया और रातको वहीं नदीके तटपर सो गये । वहाँ रातमें एक सर्प निकला और उसने नन्दका पैर पकड़ लिया । नन्द अत्यन्त भयसे विह्वल हो ' कृष्ण - कृष्ण ' पुकारने लगे । नरेश्वर! उस समय ग्वाल - बालोंने जलती हुई लकड़ियाँ लेकर उसीसे उस अजगरको मारना शुरू किया, तो भी उसने नन्दका पाँव उसी तरह नहीं छोड़ा, जैसे मणिधर साँप अपनी मणिको नहीं छोड़ता । तब लोकपावन भगवान् -ने उस सर्पको तत्काल पैरसे मारा । पैरसे मारते ही वह सर्पका शरीर त्यागकर कृतकृत्य विद्याधर हो गया । उसने श्रीकृष्णको नमस्कार करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा॥१-५३ ॥ सुदर्शन बोला- प्रभो! मेरा नाम सुदर्शन है, मैं विद्याधरोंका मुखिया हूँ । मुझे अपने बलका बड़ा अध्याय तथा सुदर्शन - नामक विद्याधरका उद्धार घमंड था और मैंने अष्टावक्र मुनिको देखकर उनकी हँसी उड़ायी थी । तब उन्होंने मुझे शाप दे दिया-' दुर्मते! तू सर्प हो जा । ' माधव! उनके उस शापसे आज मैं आपकी कृपासे मुक्त हुआ हूँ । आपके चरण-कमलोंके मकरन्द एवं परागके कणोंका स्पर्श पाकर मैं सहसा दिव्य पदवीको प्राप्त हो गया । जो भूतलका भूरि- भार हरण करनेके लिये यहाँ अवतीर्ण हुए हैं, उन भगवान् भुवनेश्वरको बारंबार नमस्कार है ॥ ६-८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करके वह विद्याधर सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित वैष्णवलोकको चला गया । उस समय श्रीकृष्णको परमेश्वर जानकर नन्द आदि गोप बड़े विस्मित हुए । फिर वे शीघ्र ही अम्बिकावनसे व्रजमण्डलको चले गये । इस प्रकार मैंने तुमसे श्रीकृष्णके शुभ चरित्रका वर्णन किया, जो पुण्यप्रद तथा सर्वपापहारी है । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ९ - ११ ॥ बहुलाश्व बोले — अहो! श्रीकृष्णचन्द्रका चरित्र
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१८६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड अत्यन्त अद्भुत है, उसे सुनकर मेरा मन पुनः उसे श्रीहरिने व्रज - मण्डलमें आगे चलकर कौन - सी सुनना चाहता है । देवर्षिसत्तम! व्रजेश्वर परमात्मा लीला की? ॥ १२-१३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत ' सुदर्शनोपाख्यान ' नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
चौबीसवाँ अध्याय अरिष्टासुर और व्योमासुरका वध तथा माधुर्यखण्डका उपसंहार श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! एक दिन गोवर्धनके आस - पास बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्ण आँखमिचौनीका खेल खेलने लगे - जिसमें कोई चोर बनता है और कोई रक्षक । वहाँ व्योमासुर नामक दैत्य आया । उस खेलमें कुछ लड़के भेड़ बनते थे और कोई चोर बनकर उन भेड़ोंको ले जाकर कहीं छिपाता था । व्योमासुरने भेड़ बने हुए बहुत - से गोप- बालकोंको बारी - बारीसे ले जाकर पर्वतकी कन्दरामें रखा और एक शिलासे उसका द्वार बंद कर दिया । वह मयासुरका महान् बलवान् पुत्र था । यह तो सचमुच चोर निकला, यह जानकर भगवान् मधुसूदनने उसे दोनों भुजाओंद्वारा पकड़ लिया और पृथ्वीपर दे मारा । उस समय दैत्य मृत्युको प्राप्त हो गया और उसके शरीरसे निकला हुआ प्रकाशमान तेज दसों दिशाओंमें घूमकर श्रीकृष्णमें लीन हो गया । उस समय स्वर्गमें और पृथ्वीपर जय -जयकारकी ध्वनि होने लगी । देवता लोग परम आनन्दमें मग्न होकर फूल बरसाने लगे॥१-६ ॥ बहुलाश्वने पूछा – मुने! यह व्योम नामक असुर पूर्वजन्ममें कौन - सा पुण्यात्मा मनुष्य था, जिसने श्याम घनमें बिजलीकी भाँति श्रीकृष्णमें विलय प्राप्त किया ॥ ७ ॥
नारदजी बोले - राजन्! काशीमें भीमरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जो सदा दान - पुण्यमें लगे रहते थे । वे यज्ञकर्ता, दूसरोंको मान देनेवाले, धनुर्धर तथा विष्णु - भक्तिपरायण थे । वे राज्यपर अपने पुत्रको बिठाकर स्वयं मलयाचलपर चले गये और वहाँ तपस्या आरम्भ करके एक लाख वर्षतक उसीमें लगे रहे । उनके आश्रममें एक समय महर्षि पुलस्त्य शिष्योंके साथ आये । उनको देखकर भी वे मानी राजर्षि न तो उठकर खड़े हुए और न उनके सामने प्रणत ही हुए । तब पुलस्त्यने उन्हें शाप दे दिया- ' ओ महादुष्ट भूपाल! तू दैत्य हो जा । ' तदनन्तर राजा जब उनके चरणोंमें पड़कर शरणागत हो गये, तब दीनवत्सल मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यने उनसे कहा — ‘ द्वापरके अन्तमें मथुरा जनपदके पवित्र व्रजमण्डलमें साक्षात् यदुवंशराज श्रीकृष्णके बाहुबलसे तुम्हें ऐसी मुक्ति प्राप्त होगी, जिसकी योगीलोग अभिलाषा रखते हैं — इसमें संशय नहीं है ' ॥८–१३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं — विदेहराज! वही यह राजा भीमरथ मय दैत्यका पुत्र हुआ और श्रीकृष्णके बाहुबेगसे मोक्षको प्राप्त हुआ । एक दिन गोपबालकोंके बीचमें महाबली दैत्य अरिष्ट आया । वह अपने सिंहनादसे पृथ्वी और आकाशको गुँजा रहा था और सींगोंसे पर्वतीय तटोंको विदीर्ण कर रहा था । उसे देखते ही गोपियाँ, गोप तथा गौओंके समुदाय भयसे इधर-उधर भागने लगे । दैत्योंके नाशक भगवान् श्रीकृष्णने उन सबको अभय देते हुए कहा - ' डरो मत । ' माधवने उसके सींग पकड़ लिये और उसे पीछे ढकेल दिया । उस राक्षसने भी श्रीकृष्णको ढकेलकर दो योजन पीछे कर दिया । तब श्रीकृष्णने उसकी पूँछ पकड़ ली और बाहुवेगसे घुमाते हुए उसे उसी प्रकार पृथ्वीपर पटक दिया, जैसे छोटा बालक कमण्डलुको फेंक दे । अरिष्ट फिर उठा । क्रोधसे उसके नेत्र लाल हो रहे थे । उस महादुष्ट वीरने सींगोंसे लाल पत्थर उखाड़कर मेघकी भाँति गर्जना करते हुए श्रीकृष्णके ऊपर फेंका । श्रीकृष्णने उस प्रस्तरको पकड़कर उलटे उसीपर दे मारा । उस शिलाखण्डके प्रहारसे वह मन - ही - मन कुछ व्याकुल हो उठा । उसने अपने सींगोंके अग्रभागको
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अध्याय २४ ] अरिष्टासुर और व्योमासुरका पृथ्वीपर पीटना आरम्भ किया, इससे पृथ्वीके भीतरसे पानी निकल आया । तब श्रीकृष्णने उसके सींग पकड़कर बार - बार घुमाते हुए उसे पृथ्वीपर उसी प्रकार दे मारा, जैसे हवा कमलको उठाकर फेंक देती है । उसी समय वह वृषभका रूप त्यागकर ब्राह्मणशरीर-धारी हो गया और श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें प्रणाम करके गद्गद वाणीमें बोला ॥ १४ - २३ ॥ ब्राह्मणने कहा — भगवन्! मैं बृहस्पतिका शिष्य द्विजश्रेष्ठ वरतन्तु हूँ । मैं बृहस्पतिजीके समीप पढ़ने गया था । उस समय उनकी ओर पाँव फैलाकर उनके सामने बैठ गया था । इससे वे मुनि रोषपूर्वक बोले- ' तू मेरे आगे बैलकी भाँति बैठा है, इससे गुरुकी अवहेलना हुई है; अत: दुर्बुद्धे! तू बैल हो जा । ' माधव! उस शापसे मैं वङ्गदेशमें बैल हो गया । असुरोंके सङ्गमें वध तथा माधुर्यखण्डका उपसंहार १८७ रहनेसे मुझमें असुरभाव आ गया था । अब आपके प्रसादसे मैं शाप और असुरभावसे मुक्त हो गया । आप श्रीकृष्णको नमस्कार है । आप भगवान् वासुदेवको प्रणाम है । प्रणतजनोंके क्लेशका नाश करनेवाले आप गोविन्ददेवको बारंबार नमस्कार है ॥२४–२८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर श्रीहरिको नमस्कार करके बृहस्पतिके साक्षात् शिष्य वरतन्तु भुवनको प्रकाशित करते हुए विमानसे दिव्यलोकको चले गये । इस प्रकार मैंने अद्भुत माधुर्यखण्डका तुमसे वर्णन किया, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाला उत्तम साधन है । जो सदा इसका पाठ
करते हैं, उनकी समस्त कामनाओंको यह देनेवाला है ।
और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २ ९ - ३१ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' व्योमासुर और अरिष्टासुरका वध ' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
॥ माधुर्यखण्ड सम्पूर्ण ॥
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A. K. Mitra अक्रूरजी एवं बलराम - कृष्ण
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श्रीगणेशाय नमः श्रीमथुराखण्ड पहला अध्याय कंसका नारदजीके कथनानुसार बलराम और श्रीकृष्णको अपना शत्रु समझकर वसुदेव - देवकीको कैद करना, उन दोनों भाइयोंको मारनेकी व्यवस्थामें लगना तथा उन्हें मथुरा ले आनेके लिये अक्रूरजीको नन्दके व्रजमें जानेकी आज्ञा देना
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥
जो वसुदेवजीके यहाँ पुत्र - रूपसे प्रकट हुए हैं, जिन्होंने कंस एवं चाणूरका मर्दन किया देवकीको परमानन्द प्रदान करनेवाले हैं, भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ राजा बहुलाश्वने पूछा – मुने श्रीकृष्णने मथुरामें कौन - कौन - सी लीलाएँ कंसको क्यों और कैसे मारा? यह सब ठीक बताइये ॥ २ ॥
है तथा जो उन जगद्गुरु १ ॥ ! भगवान् कीं? उन्होंने मुझसे ठीक नारदजीने कहा— नृपेश्वर! एक दिन साक्षात् परमात्मा श्रीहरिके मनसे प्रेरित होकर मैं दैत्यवध -सम्बन्धी उद्यमको आगे बढ़ानेके लिये उत्कृष्ट पुरी मथुराके दर्शनार्थ वहाँ आया । आकर राजा कंसके दरबारमें गया । वहाँ कंस इन्द्रसे छीनकर लाये हुए सिंहासनके ऊपर, जहाँ श्वेत- छत्र तना हुआ था और सुन्दर चँवर डुलाये जा रहे थे, विराजमान था । वह बल, पराक्रम और क्रूरताके कारण नागराजके समान दुस्सह प्रतीत होता था । वहाँ पहुँचनेपर उसने मेरा पूजन - स्वागत - सत्कार किया । उस समय मैंने उससे जो कुछ कहा, वह सुनो- ' मथुरानरेश! जो कन्या तुम्हारे हाथसे छूटकर आकाशमें उड़ गयी थी, वह देवकीकी नहीं, यशोदाकी पुत्री थी । देवकीसे तो श्रीकृष्ण ही उत्पन्न हुए और रोहिणीके पुत्र बलराम हैं । दैत्यराज! वसुदेवने तुम्हारे शत्रुभूत अपने दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्णको अपने मित्र नन्दराजके यहाँ धरोहरके रूपमें रख दिया है – इसलिये कि तुम्हारे भयसे उनकी रक्षा हो सके । पूतनासे लेकर अरिष्टासुरतक जो - जो उत्कट बलशाली दैत्य नष्ट हुए हैं, वे सब वनमें उन्हीं दोनोंके द्वारा मारे गये हैं । कहा जाता है कि वे ही दोनों तुम्हारी मृत्यु हैं'॥३–७ ॥ मेरे यों कहनेपर भोजराज कंस क्रोधसे काँपने लगा । उसने शूरनन्दन वसुदेवको सभामें ही मार डालनेके लिये तीखी तलवार हाथमें ली, परंतु मैंने उसे रोक दिया; तथापि उसने सुदृढ़ और विशाल बेड़ियोंमें पत्नीसहित उन्हें बाँधकर कारागारमें बंद कर दिया । कंससे उक्त बात कहकर जब मैं चला गया, तब उस दैत्यराजने श्रीकृष्ण और बलरामका वध करनेके लिये दैत्यप्रवर केशीको भेजा । तदनन्तर बलवान् भोजराज कंसने चाणूर आदि मल्लों तथा कुवलयापीड नामक हाथीके महावतको बुलवाया और अपना कार्यभार सँभालनेवाले अन्य लोगोंको भी बुलवाकर उनसे इस प्रकार कहा ॥८–११ ॥ कंस बोला - हे कूट! हे तोशल! हे महाबली चाणूर! बलराम और कृष्ण- दोनों मेरी मृत्यु हैं, यह बात नारदजीने मुझे भलीभाँति समझा दी है । अतः वे दोनों जब यहाँ आ जायँ, तब तुम सब लोग मल्लोंके खेल ( कुश्तीके दाव पेच ) दिखाते हुए उन्हें मार डालना । अब शीघ्र ही मल्लभूमि ( अखाड़े ) को सुन्दर ढंगसे सुसज्जित कर दो । महावत! रङ्गशालाके द्वारपर मदमत्त हाथी कुवलयापीडको खड़ा रखो और मेरे शत्रु जब आ जायँ, तो उन्हें मरवा डालो । कार्यकर्ता जनो! आगामी चतुर्दशीको शान्तिके लिये धनुर्यज्ञ करना है और अमावास्याके दिन यहाँ मल्लयुद्ध होगा ॥ १२–१५ ॥
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१ ९ ० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड नारदजी कहते हैं— राजेन्द्र! आत्मीय जनोंसे इस प्रकार कहकर कंसने अक्रूरको तुरंत अपने पास बुलवाया और एकान्त स्थानमें मन्त्रिजनोंको प्रिय लगनेवाली मन्त्रणाकी बात कही ॥ १६ ॥
कंस बोला – दानपते! तुम मेरे माननीय मन्त्री हो, अतः मेरी यह उत्तम बात सुनो । महामते! कल प्रातःकाल होते ही तुम नन्दके व्रजमें जाओ और मेरा यह कार्य करो । लोग कहते हैं कि वसुदेवके दोनों बेटे वहीं रहते हैं । वे दोनों मेरे शत्रु हैं, यह बात देवर्षि नारदजीने मुझे अच्छी तरह समझा दी है । गोपगण नन्दराज आदिके साथ भेंट लेकर यहाँ आयें और उन्हींके साथ मथुरा नगरी दिखानेके बहाने उन दोनोंको रथपर बिठाकर शीघ्र यहाँ ले आओ । यहाँ आनेपर हाथीसे अथवा बड़े - बड़े पहलवानोंके द्वारा उन दोनों बालकोंको मरवा डालूँगा । उसके बाद वसुदेवकी सहायता करनेवाले नन्दराज, वृषभानुवर, नौ नन्दों और उपनन्दोंको मौतके घाट उतार दूँगा । तदनन्तर वसुदेव, उनके सहायक देवक तथा अपने बूढ़े पिता उग्रसेनको भी, जो राज्य लेनेके लिये उत्सुक रहता है, मार डालूँगा । यह सब हो जानेके बाद समस्त यादवों-का संहार कर डालूँगा, इसमें संशय नहीं है । मन्त्रिन्! ये सब - के - सब देवता हैं, जो मनुष्यके रूपमें प्रकट हुए हैं । चन्द्रावतीपति बलवान् शकुनि मेरा बहुत बड़ा मित्र है । भूतसंतापन, हृष्ट, वृक, संकर, कालनाभ, महानाभ तथा हरिश्मश्रु - ये सब मेरे मित्र हैं और बलपूर्वक मेरे लिये अपने प्राणतक दे सकते हैं । जरासंध तो मेरा श्वशुर ही है और द्विविद मेरा सखा । बाणासुर और नरकासुर भी मेरे प्रति ही सौहार्द रखते हैं । ये सब लोग इस पृथ्वीको जीतकर, इन्द्रसहित देवताओंको बाँधकर और द्रव्य - राशिके स्वामी बने हुए कुबेरको मेरुपर्वतकी दुर्गम कन्दरामें फेंककर सदा तीनों लोकोंका राज्य करेंगे, इसमें संशय नहीं है । दानपते! तुम कवियों ( नीतिज्ञ विद्वानों ) में शुक्राचार्यके समान हो और बातचीत करनेमें इस भूतलपर बृहस्पतिके तुल्य हो; अतः इस कार्यको तुरंत सम्पन्न करो ॥१७–२८ ॥ अक्रूर बोले- यदुपते! तुमने मनोरथका महा-सागर ही रच डाला है । यदि दैवकी इच्छा होगी तो यह सागर गोष्पद ( गायकी खुरी ) के समान हो जायगा और यदि दैव अनुकूल न हुआ, तब तो यह अपार महासागर है ही ॥ २ ९ ॥ कंस बोला - बलवान् पुरुष दैवका भरोसा छोड़कर कार्य करते हैं और निर्बल दैवका सहारा पकड़े बैठे रहते हैं । कर्मयोगी पुरुष कालस्वरूप श्रीहरिके प्रभावसे सदा निराकुल ( शान्त ) रहता है ॥३० ॥
नारदजी कहते हैं- मन्त्रिप्रवर अक्रूरसे यों कहकर कंस सभास्थलसे उठ गया और कुछ कुपित हो धीरेसे अन्तः पुरमें चला गया ॥३१ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कंसकी मन्त्रणा ' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं -बलवान् एवं मदोन्मत्त महादैत्य धारणकर रमणीय वृन्दावनमें गया गर्जना करने लगा । उसके पैरोंके भी टूटकर धराशायी हो जाते थे । दूसरा अध्याय केशीका वध मिथिलेश्वर! उधर मैथिलेन्द्र! केशी घोड़ेका रूप गोपियोंके और मेघकी भाँति श्रीकृष्णकी आघातसे सुदृढ़ वृक्ष पाप पूँछकी चोट खाकर मत ' - यह उसका वेग दुस्सह था । उसे देखकर गोप-समुदाय अत्यन्त भयसे व्याकुल हो भगवान् शरणमें गये॥१-३ ॥ और पापियोंको पीड़ा देनेवाले भगवान्ने ' डरो कहकर उन सबको अभयदान दिया और आकाशमें घने बादल भी छिन्न - भिन्न हो जाते थे । कमरमें पीताम्बर कसकर वे उस दैत्यको मार डालने की
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अध्याय २ ] केशीका वध १ ९ १ चेष्टामें लग गये । राजन्! उस महान् असुरने अपने पिछले पैरोंसे श्रीहरिके ऊपर आघात किया और पृथ्वीको कँपाता हुआ वह आकाशमण्डलको अपनी गर्जनासे गुँजाने लगा । तब, जैसे हवा कमलको उखाड़कर फेंक देती है, उसी प्रकार श्रीकृष्णने उस दैत्यके दोनों पैर पकड़कर बाहुबलसे घुमाते हुए उसे एक योजन दूर फेंक दिया । उसने भी क्रोधसे भरे हुए वहाँ आकर व्रजके प्राङ्गणमें भगवान् श्रीहरिके ऊपर अपनी पूँछसे प्रहार किया । राजन्! तब श्रीकृष्णने उसकी पूँछ पकड़ ली और बाहुवेगसे बलपूर्वक घुमाते हुए उसे आकाशमें सौ योजन दूर फेंक दिया । आकाशसे नीचे गिरनेपर उसे मन - ही - मन कुछ व्याकुलताका अनुभव हुआ, किंतु पुनः उठकर वह बलवान् दैत्य मेघके समान गर्जना करने लगा । अपनी गर्दनके अयालोंको कँपाता और पूँछके बालोंको आकाशमें बार - बार हिलाता हुआ वह दैत्य अपने पैरोंसे पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ श्रीहरिके सामने उछलकर आया । तब भगवान् मधुसूदनने केशीको एक मुक्का मारा । उनके मुक्केकी मारसे वह दो घड़ीतक बेहोश पड़ा रहा । तब उस अश्वरूपधारी असुरने श्रीहरिके गलेको अपने मुँहसे पकड़ लिया और उन्हें उठाकर वह भूमण्डलसे लाख योजन दूर आकाशमें उठ गया । वहाँ आकाशमें उन घोर युद्ध हुआ । राजन्! वह गर्दनके अयालोंसे, पूँछ और श्रीहरिपर आघात करने लगा । हाथोंसे पकड़कर इधर - उधर और जैसे बालक कमण्डलु उन्होंने आकाशसे उस दैत्यको भगवान् श्रीहरिने उसके मुँहमें दोनोंके बीच दो पहरतक अपने पैरोंसे, दाँतोंसे, तीखी खुरोंसे बार - बार तब श्रीहरिने उसे दोनों घुमाना आरम्भ किया फेंक दे, उसी प्रकार नीचे गिरा दिया । फिर अपनी बाँह डाल दी । वह बाँह उसके उदरतक जा पहुँची और असाध्य रोगकी भाँति बड़े जोरसे बढ़ने लगी । इससे उस महान् असुरकी प्राणवायु अवरुद्ध हो गयी और वह मल त्यागने लगा । उसका पेट फट गया और वह अश्वरूपधारी असुर तत्काल प्राणोंसे हाथ धो बैठा । शरीरसे पृथक् होनेपर उसने तत्काल दिव्य रूप धारण कर लिया और मुकुट तथा कुण्डलोंसे मण्डित हो भगवान् श्रीकृष्णको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥ ४ – १७ ॥ कुमुद बोला - माधव! मैं इन्द्रका अनुचर हूँ । मेरा नाम कुमुद है । मैं बड़ा तेजस्वी, रूपवान् और वीर था तथा देवराज इन्द्रपर छत्र लगाया करता था । पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध हो जानेपर प्राप्त हुई ब्रह्म-हत्याकी शान्तिके लिये स्वर्गलोकके स्वामीने अश्वमेध नामक उत्तम यज्ञका अनुष्ठान किया । अश्वमेधका घोड़ा श्वेत वर्णका था । उसके कान श्याम रंगके थे और वह मनके समान तीव्र वेगसे चलनेवाला था । मेरे मनमें उसपर चढ़नेकी इच्छा हुई । इस कामनासे मैं प्रसन्न हो उठा और उस घोड़ेको चुराकर अतललोकमें चला गया । तब मरुद्गणोंने मुझ महादुष्टको पाशमें बाँधकर देवराज इन्द्रके पास पहुँचाया । देवेन्द्रने मुझे शाप देते हुए कहा - ' दुर्बुद्धे! तू राक्षस हो जा । भूतलपर दो मन्वन्तरोंतक तेरी घोड़ेकी - सी आकृति रहे । ' प्रभो! आज आपका स्पर्श पाकर मैं उस शापसे तत्काल मुक्त हो गया हूँ । देव! अब मुझे अपना किंकर बना लीजिये । मेरा मन आपके चरणकमलमें लग गया है । आप समस्त लोकोंके एकमात्र साक्षी हैं, आप भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है ॥ १८–२३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! मिथिलेश्वर! यों कहकर, परमेश्वर श्रीकृष्णकी परिक्रमा करके, कुमुद अत्यन्त प्रकाशमान उत्तम विमानपर आरूढ़ हो, दिशामण्डलको उद्दीप्त करता हुआ वैकुण्ठलोकको चला गया ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' केशीका वध ' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
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तीसरा अध्याय अक्रूरका नन्दग्राम - गमन, मार्गमें उनकी बलराम - श्रीकृष्णसे भेंट तथा उन्हींके साथ नन्द - भवनमें प्रवेश; श्रीकृष्णसे बातचीत और उनका मथुरा - गमनके लिये निश्चय, मथुरा - यात्राकी चर्चा सब ओर फैल जानेपर गोपियोंका विरहकी आशङ्कासे उद्विग्न हो उठना श्रीनारदजी कहते हैं— मैथिलेन्द्र! अक्रूरजी रथपर आरूढ़ हो राजा कंसका कार्य करनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नन्दगाँवको गये । पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके प्रति उनकी पराभक्ति थी । परम बुद्धिमान् अक्रूर यात्रा करते हुए मार्गमें अपनी बुद्धिसे इस प्रकार विचार करने लगे ॥१-२ ॥ अक्रूर बोले — मैंने भारतवर्षमें कौन - सा पुण्य किया, निस्स्वार्थभावसे कौन - सा दान दिया, कौन - सा उत्तम यज्ञ, तीर्थयात्रा अथवा ब्राह्मणोंकी शुभ सेवा की है, जिससे आज मैं भगवान् परमेश्वर श्रीहरिका दर्शन करूँगा? मैंने पूर्वजन्ममें कौन - सा उत्तम तप किया और भक्तिभावसे कब किस संत पुरुषका सेवन किया था, जिससे आज मुझे अपने सामने भगवान् श्रीकृष्ण-का दुर्लभ दर्शन होगा । भगवान् सुरेश्वर श्रीकृष्ण जिनके नेत्रोंके गोचर होते हैं, भूतलपर उन्हींका जन्म सफल है । आज उन भगवान्का दुर्लभ दर्शन करके मैं सर्वतोभावेन कृतार्थ हो जाऊँगा ॥ ३-५ ॥ नारदजी कहते हैं - इस प्रकार श्रीकृष्णका चिन्तन और उत्तम शकुनका दर्शन करते हुए गान्दिनी-नन्दन अक्रूर संध्याकालमें रथपर बैठे - बैठे नन्दगोकुलमें जा पहुँचे । यव और अङ्कुश आदिसे युक्त श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंके चिह्न तथा उनकी ललाईसे युक्त धूलिकण उन्हें पृथ्वीपर दिखायी दिये । उनके दर्शनकी उत्कण्ठा एवं भक्तिभावके आनन्दसे विह्वल हो अक्रूरजी रथसे कूद पड़े और उन धूलकणोंमें लोटते हुए नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे । मिथिलेश्वर! जिनके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्रकट हो जाती है, उनके लिये ब्रह्मलोकपर्यन्त जगत्के सारे सुख तिनकेके समान तुच्छ हो जाते हैं ॥ ६ - ९ ॥ तदनन्तर रथपर आरूढ़ हो अक्रूर क्षणभरमें नन्दगाँव जा पहुँचे । उन्होंने गोष्ठोंमें पहुँचकर देखा बलरामजीके साथ श्रीकृष्ण उधर ही आ रहे हैं । वे दोनों पुराणपुरुष श्यामल - गौरवर्ण परमेश्वर प्रफुल्ल कमल समान नेत्रवाले थे । रास्तेमें बलराम और श्रीकृष्ण ऐसे जान पड़ते थे, मानो इन्द्रनील और हीरकमणिके दो पर्वत एक दूसरेके सम्पर्कमें आ गये हों । उन दोनोंके मुकुट बालसूर्यके समान और वस्त्र विद्युत्के सदृश थे । उनकी अङ्गकान्ति वर्षाकालके मेघकी भाँति श्याम तथा शरदऋतुके बादलकी भाँति गौर थी । उन दोनोंको देखकर अक्रूर तुरंत ही रथसे नीचे उतर गये और भक्तिभावसे सम्पन्न हो उन दोनोंके चरणोंमें गिर पड़े । उनका मुख नेत्रोंसे झरते हुए आँसुओंकी धारासे व्याप्त तथा शरीर रोमाञ्चित था । उन्हें देख परमेश्वर श्रीहरिने दोनों हाथोंसे उठा लिया और वे माधव दयासे द्रवित हो भक्तको हृदयसे लगाकर अश्रुओंकी वर्षा करने लगे । इस प्रकार बलरामसहित श्रीहरि उनसे मिलकर शीघ्र ही उन्हें घर ले आये और वहाँ उन्होंने उनके लिये श्रेष्ठ आसन दिया । अतिथिसत्कारमें एक गाय देकर प्रेमपूर्वक सरस भोजन प्रस्तुत किया । नन्दने अक्रूरको दोनों हाथोंद्वारा हृदयसे लगाकर पूछा - ' अहो! तुम कंसके राज्यमें कैसे जी रहे हो? जिस निर्लज्जने अपनी बहिनके नन्हे - से शिशुओंको मार डाला, वह दूसरे लोगोंके प्रति दयालु कैसे होगा? ' नन्दजी जब घरमें चले गये, तब श्रीहरिने उनसे माता - पिता की सारी कुशल पूछी । इसी प्रकार अपने बन्धु - बान्धव यादवोंका समाचार पूछकर कंसकी सारी विपरीत बुद्धिके विषयमें भी जिज्ञासा की ॥ १०–१६ ॥ अक्रूर बोले- देव! परसोंकी बात है, भोजराज कंस हाथमें तलवार ले वसुदेवको मार डालनेके लिये उद्यत हो गया था; किंतु नारदजीने उसे रोक दिया था । समस्त यादव - बन्धु बान्धव भयसे विह्वल और दुःखी हैं । भूमन्! कितने ही कंसके भयसे कुटुम्बसहित दूसरे देशोंमें चले गये हैं । वह आज ही यादवोंको मार
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अध्याय ४ ] श्रीकृष्णका गोपियोंके घरोंमें जाकर उन्हें सान्त्वना देना १ ९ ३ डालने और देवताओंको जीत लेनेके लिये उद्योगशील है । इस पृथ्वीपर बलवान् दैत्यराज कंस कुछ और भी करना चाहता है । अतः आप दोनोंको जगत्का अक्षय कल्याण करनेके लिये वहाँ अवश्य चलना चाहिये । आप दोनों प्रभुओंके बिना सत्पुरुषोंका कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता ॥ १७–२० ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! अक्रूरजीकी बात सुनकर बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्णने नन्दराज -की सलाह लेकर कार्यकर्ता गोपोंसे इस प्रकार कहा ॥ २१ ॥
श्रीभगवान् बोले- बन्धुओ! बड़े - बूढ़े गोपोंके साथ बलरामसहित मैं तथा नन्दराज भी मथुरा जायँगे । नवों नन्द और उपनन्द तथा छहों वृषभानु सब लोग प्रातःकाल उठकर मथुराकी यात्रा करेंगे; अतः तुम सब लोग दही, दूध और घी आदि गोरस एकत्र करो । उसके साथ राजाको देनेके लिये अन्यान्य उपायन भी होंगे । छकड़ोंके साथ रथोंको भी ठीक - ठाक करके शीघ्र तैयार कर लो ॥२२-२४ ॥ नारदजी कहते हैं - यह सुनकर कार्य करने-वाले सब गोपोंने घर - घरमें जाकर गोपियोंके सुनते हुए वह सारा कथन ज्यों - का - त्यों दोहरा दिया । यह सुनकर गोपियोंका हृदय उद्विग्न हो उठा । वे भावी विरहकी आशङ्कासे विह्वल हो गयीं और घर - घरमें एकत्र हो, वे सब की सब परस्पर इसी विषयकी बातें करने लगीं । नृपेश्वर! महात्मा श्रीकृष्णके प्रस्थानकी यह बात वृषभानुवरके भी घरमें पहुँच गयी । ' प्रियतम चले जायेंगे ' – यह समाचार भरी सभामें अकस्मात् सुनकर वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त दुःखित हो गयीं । वे हवाकी मारी हुई कदलीकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ीं और मूच्छित हो गयीं । किन्हीं गोपियोंकी मुखश्री अत्यन्त मलिन हो गयी । हाथकी अँगूठियाँ कलाइयोंके कंगन बन गयीं । उनके केशोंके बन्धन ढीले हो गये और उनमें गुँथे हुए फूल शीघ्र ही शिथिल होकर गिर पड़े । वे गोपियाँ चित्र - लिखी - सी खड़ी रह गयीं । नृपेश्वर! कुछ गोपियाँ अपने घरमें ' श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे ' - यों कहती हुई अत्यन्त विह्वल हो गयीं और घरके सारे काम - काज छोड़कर योगीकी भाँति ध्यानानन्दमें मग्न हो गयीं । राजन्! कुछ गोपियाँ समर्थ रहीं, वे एकत्र हो, एक साथ आपसमें इस प्रकार बातें करने लगीं । बात करते समय उनके कण्ठ गद्गद हो गये थे और वाणी लड़खड़ा रही थी । उनके नेत्रोंसे स्वतः अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी ॥ २५–३१ ॥ गोपियाँ बोलीं- अहो! अत्यन्त निर्मोही जनका चरित्र बड़ा विचित्र होता है । वह कहनेयोग्य नहीं है । निर्मोही मनुष्य मुँहसे तो कुछ और कहता है, परंतु हृदयमें कुछ और ही भाव रखता है । उसके मनकी बात तो देवता भी नहीं जानता, फिर मनुष्य कैसे जान सकता है? रासमें इन्होंने जो - जो बात कही थी, उस सबको अधूरी ही छोड़कर वे चले जानेको उद्यत हो गये हैं । अहो! हमारे इन प्राणवल्लभके मथुरापुरी चले जानेपर हम सबको कौन - कौन - सा कष्ट नहीं होगा ॥ ३२-३३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' अक्रूरका आगमन ' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय श्रीकृष्णका गोपियोंके घरोंमें जाकर उन्हें सान्त्वना देना तथा मार्गमें रथ रोककर खड़ी हुई गोपाङ्गनाओंको समझाकर उनका मथुरापुरीकी ओर प्रस्थित होना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार मिथिलेश्वर! जितनी व्रजाङ्गनाएँ थीं, उतने ही रूप कहती हुई गोपाङ्गनाओंके अत्यन्त विरह - केशको धारण करके भगवान् श्रीहरिने स्वयं सबको पृथक्-जानकर भगवान् श्रीकृष्ण उन सबके घरोंमें गये । पृथक् समझाया । श्रीराधाके भवनमें जाकर देखा कि
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१ ९ ४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड वे सखियोंसे घिरी हुई एकान्त स्थानमें मूच्छित पड़ी हैं; तब उन्होंने मधुर स्वरमें मुरली बजायी । वंशीकी ध्वनि सुनकर श्रीराधा सहसा आतुर होकर उठीं । उन्होंने आँख खोलकर देखा तो श्रीगोविन्द सामने उपस्थित दिखायी दिये । जैसे पद्मिनी कमलिनी - कुल - वल्लभ सूर्यका दर्शन करके प्रसन्न हो जाती है, उसी प्रकार पद्मिनी नायिका श्रीराधा अपने प्राणवल्लभको सामने देखकर आनन्दमें मग्न हो गयीं और उन्होंने उठकर वहाँ पधारे हुए श्यामसुन्दरके लिये सादर आसन दिया । कमलनयनी श्रीराधाके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । वे अत्यन्त दीन होकर शोक कर रही थीं, अतः भगवान्ने मेघके समान गम्भीर वाणीमें उनसे कहा ॥ १-६ ॥ श्रीभगवान् बोले- भद्रे! राधिके! तुम्हारा मन उदास क्यों है? तुम इस तरह शोक न करो । अथवा मेरी मथुरा जानेकी इच्छा सुनकर तुम विरहसे व्याकुल हो उठी हो? देखो, ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैं इस पृथ्वीका भार उतारने और कंसादि असुरोंका संहार करनेके लिये तुम्हारे साथ इस भूतलपर अवतीर्ण हुआ हूँ । अतः अपने अवतारके उद्देश्यकी सिद्धिके लिये मैं मथुरा अवश्य जाऊँगा और भूमिका भार उतारूंगा । तत्पश्चात् शीघ्र यहाँ आऊँगा और तुम्हारा मङ्गल करूँगा ॥७ – ९ ॥ नारदजी कहते हैं- जगदीश्वर श्रीहरिके यों कहनेपर वियोगविह्वला श्रीराधा दावानलसे दग्ध लताकी भाँति मूच्छित हो गयीं और उनमें कम्प, रोमाञ्च आदि सात्त्विक भाव प्रकट हो गये । उस अवस्थामें वे अपने प्राणवल्लभसे बोलीं ॥ १० ॥
श्रीराधाने कहा - प्राणनाथ! तुम पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवश्य मथुरापुरीको जाओ, परंतु मेरी इस निश्चित प्रतिज्ञाको भी सुन लो । यहाँसे तुम्हारे चले जानेपर मैं शरीरको कदापि धारण नहीं करूँगी । यदि तुम मेरी इस प्रतिज्ञा या शपथपर ध्यान नहीं देते हो तो दूसरी बार पुनः अपने जानेकी बात कहकर देख लो । मैं तुरंत कथाशेष हो जाऊँगी । मेरे प्राण अधरोंकी राहसे निकल जानेको अत्यन्त आकुल हैं, ये कपूरकी धूलि - कणके समान शीघ्र ही उड़ जायँगे ॥११- १२ ॥ श्रीभगवान् बोले – राधिके! मैं वेदस्वरूपा अपनी वाणीको तो टाल देनेमें समर्थ हूँ, किंतु अपने भक्तोंके वचनकी अवहेलना करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है । पूर्वकालमें गोलोकमें जो कलह हुआ था, उस समय दिये गये श्रीदामाके शापसे मेरे साथ तुम्हारा सौ वर्षोंतक वियोग अवश्य होगा- इसमें संशय नहीं है । कल्याणि! राधिके! शोक न करो । मैंने तुम्हें जो वरदान दिया है, उसको स्मरण करो । प्रत्येक मासमें वियोग - दुःखकी शान्तिके लिये एक दिन मेरा दर्शन तुम्हें प्राप्त होगा ॥ १३–१५ ॥ श्रीराधाने कहा - हरे! प्रत्येक मासमें एक दिन मेरी वियोग - व्यथाको शान्त करनेके लिये यदि तुम दर्शन देने नहीं आओगे तो मैं असह्य दुःखके कारण अपने प्राणोंको अवश्य त्याग दूँगी । लोकाभिराम! जनभूषण! विश्वदीप! मदनमोहन! जगत्के पाप - तापको हर लेनेवाले! आनन्दकंद! यदुकुलनन्दन! नन्दकिशोर! आज मेरे सामने अपने आगमनके विषयमें शपथ खाओ ॥ १६-१७ ॥ श्रीभगवान् बोले — रम्भोरु राधे! यदि तुम्हारे वियोग- कालमें प्रतिमास एक दिन मैं तुम्हें दर्शन देनेके लिये न आऊँ तो मेरे लिये गौओंकी शपथ है । मैंने यहाँ जो कुछ कहा है, मेरे उस वचनको तुम संशय-रहित और निष्कपट समझो । जो बिना किसी हेतुके निश्छल भावसे मैत्रीको निभाता है, वही पुरुष धन्यतम है । जो मैत्री स्थापित करके कपट करता है, वह स्वार्थरूपी पटसे आच्छादित लम्पट नटमात्र है, उसे धिक्कार है । जैसे यहाँ कर्मेन्द्रियाँ रस, रूप, गन्ध, स्पर्श एवं शब्दको नहीं जान पातीं, उसी प्रकार जो सकाम भाव रखनेवाले मुनि हैं, वे उस निरपेक्षस्वरूप एवं निर्गुण गूढ़ परम सुखको किंचिन्मात्र भी नहीं जानते । जो लोग समदर्शी, जितेन्द्रिय, अपेक्षारहित एवं महान् संत हैं, वे ही उस कामनारहित मेरे परम सुखका अनुभव करते हैं - ठीक उसी तरह, जैसे ज्ञानेन्द्रियाँ ही रस आदि विषयोंको जान पाती हैं । भामिनि! मनके सारे भाव पारस्परिक हैं- एक - दूसरेकी अपेक्षा रखते हैं । इसलिये किसी एक ही तरफसे प्रीति नहीं होती; दोनों ही ओरसे हुआ करती है । अतः सबको अपनी