गर्ग संहिता — पृष्ठ 201–210

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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अध्याय ५ ] अक्रूरको भगवान् श्रीकृष्णके परब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार १ ९ ५ ओरसे मेरे प्रति प्रेम ही करना चाहिये । इस भूतलपर प्रेमके समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है । राधे! जैसे भाण्डीर - वनमें तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ था, उसी प्रकार फिर होगा । सत्पुरुषोंद्वारा जिस हेतुरहित प्रेमका आश्रय लिया जाता है, उसे भी संत महात्मा निर्गुण ही मानते हैं । जो लोग तुझ राधिका और मुझ केशवमें उसी प्रकार भेदकी कल्पना नहीं करते, जिस प्रकार दुग्ध और उसकी धवलतामें भेद सम्भव नहीं है, वे निष्काम भावके कारण उद्दीप्त हुई भक्तिसे युक्त महात्मा पुरुष ही मेरे उस ब्रह्मपदको प्राप्त होते हैं । रम्भोरु! जो कुबुद्धि मनुष्य इस भूतलपर तुझ राधिका और मुझ केशवमें भेद - दृष्टि रखते हैं, वे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक कालसूत्र नरकमें पड़कर दुःख भोगते हैं ॥ १८ –२५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार श्रीराधा तथा समस्त गोपीगणोंको आश्वासन दे नीतिकुशल भगवान् गोविन्द नन्दभवनमें लौट आये । तदनन्तर सूर्योदय होनेपर नन्द आदि गोप छकड़ों द्वारा भेंट - सामग्री भेजकर, स्वयं रथारूढ़ हो, वे सब - के-सब श्रीमथुरापुरीको गये । राजन्! बलराम और श्रीकृष्णके साथ अपने रथपर आरूढ़ हो, गान्दिनीपुत्र अक्रूरने मथुरापुरीके दर्शनके लिये उद्यत हो वहाँसे प्रस्थान किया । मार्गमें कोटि - कोटि गोपाङ्गनाएँ खड़ी हो, क्रोध और मोहसे विह्वल होकर श्रीकृष्णका व्रजसे प्रस्थान देख रही थीं । वे अक्रूरको ' क्रूर - क्रूर ' कहकर पुकारती हुई कटु वचन सुनाने लगीं और जैसे बादल सूर्यको आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार गोपियोंके समुदायने अक्रूरके रथको चारों ओरसे घेर लिया । राजन्! भगवान्‌ के विरहसे व्याकुल हुई गोपियोंने अक्रूरके रथको, उनके घोड़ोंको और सारथिको भी लाठियोंद्वारा जोर - जोरसे पीटना आरम्भ किया । लाठियोंके प्रहारसे घोड़े वहाँ इधर - उधर उछलने लगे । गोपियोंकी दो अँगुलियोंकी चोटसे सारथि उस रथसे नीचे जा गिरा । लोक - लज्जाको तिलाञ्जलि दे, गोपियोंने बलराम और श्रीकृष्णके देखते - देखते अक्रूरको बल-पूर्वक रथसे नीचे खींच लिया और अपने कंगनोंसे उनके ऊपर चोट करना आरम्भ किया । गोपी - समुदाय-की वह सेना देखकर बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्णने गान्दिनीनन्दन अक्रूरकी रक्षा करके गोपाङ्गनाओंको समझाया — ' व्रजाङ्गनाओ! चिन्ता न करो । मैं आज संध्याको ही लौट आऊँगा । इन अक्रूरजीके सामने व्रजवासी हमारी हँसी न उड़ावें, ऐसा प्रयत्न तुम्हें करना चाहिये ' ॥ २६–३५ ॥ यों कहकर बलदेवजी तथा अक्रूरके साथ श्रीकृष्ण सुन्दर वेगशाली अश्वोंकी सहायतासे रथसहित उस मथुरापुरीकी ओर चल दिये, जो यादवोंके समुदायसे सुशोभित थी । जबतक उन्हें रथ, उसकी ध्वजा अथवा घोड़ोंकी टापसे उड़ायी गयी धूल दिखायी देती रही, तबतक अत्यन्त मोहवश गोपियाँ पथपर ही चित्र-लिखित - सी खड़ी रहीं । श्रीहरिकी कही हुई बातको याद करके उनके मनमें पुनर्मिलनकी आशा बँध गयी थी ॥ ३६-३७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णका मथुरापुरीको प्रयाण ' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पाँचवाँ अध्याय अक्रूरको भगवान् श्रीकृष्णके परब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार तथा उनकी स्तुति; श्रीकृष्णका ग्वालबालोंके साथ पुरी - दर्शनके लिये जाना, नागरी स्त्रियोंका उनपर मोहित होना तथा भगवान्‌के हाथसे एक रजकका उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं — राजन्! अक्रूर और और यमुनाका जल पीकर पुनः रथपर आ गये । तब बलरामजीके साथ मथुराके उपवनके पास पहुँचकर उन दोनों भाइयोंकी आज्ञा ले अक्रूरजी यमुनाजीमें यमुनाके निकट रथ रोककर भगवान् श्रीकृष्ण उतर गये नहानेके लिये गये और नित्य नैमित्तिक कर्म करनेके

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१ ९ ६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड लिये यमुनाके निर्मल जलमें उतरे । यमुनाजीका जल अगाध था, उसमें बड़ी - बड़ी भँवरें उठ रही थीं । अक्रूरजीने देखा, उसी जलमें बलराम और श्रीकृष्ण -दोनों भाई खड़े - खड़े परस्पर बातें कर रहे हैं । नरेश्वर! यह देख अक्रूरजी चकित हो उठे और रथपर जाकर देखा तो वहाँ भी वे दोनों बैठे दिखायी दिये । फिर जलमें आकर देखा तो वहाँ भी उनके दर्शन हुए । बलरामजी नागराज शेषके रूपमें कुंडली मारकर बैठे थे और उनकी गोदमें लोकवन्दित परम प्रकाशमय गोलोक, गोवर्धन पर्वत, यमुना नदी, मनोहर वृन्दावन तथा असंख्य कोटि सूर्योंकी ज्योतियोंका प्रभावशाली मण्डल — ये क्रमशः परिलक्षित हुए । उसी ज्योति -मण्डलमें रासमण्डलके भीतर कोटि - कोटि कामदेवोंके सौन्दर्य- माधुर्यको तिरस्कृत करनेवाले साक्षात् परिपूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण श्रीराधारानीके साथ वहाँ अक्रूरके दृष्टिपथमें आये । तब श्रीकृष्णको परब्रह्म परमात्मा समझकर अक्रूरने बारंबार उन्हें नमस्कार किया और दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त हर्षके साथ उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ १-८ ॥ अक्रूर बोले- असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर तथा गोलोकधामके स्वामी परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार है । प्रभो! आप श्रीराधाके प्राणवल्लभ तथा व्रजके अधीश्वर हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । श्रीनन्दनन्दन तथा माता यशोदाको आमोद प्रदान करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है । देवकीपुत्र! गोविन्द! वासुदेव! जगदीश्वर! यदुकुलतिलक! जगन्नाथ! पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है । मेरी वाणी सदा आपके गुणोंके वर्णनमें लगी रहे । मेरे कान आपकी कथा सुनते रहें । मेरी भुजाएँ आपकी प्रसन्नताके लिये कर्म करनेमें तल्लीन रहें । मन सदा आपके चरणारविन्दोंका चिन्तन करे तथा दोनों नेत्र आपके प्रकाशमान एवं भव्य धामविशेषके * नमः श्रीकृष्णचन्द्राय परिपूर्णतमाय च । श्रीराधापतये तुभ्यं व्रजाधीशाय ते नमः देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते

वाणी सदा ते गुणवर्णने स्यात् कणौ कथायां समदोश्च कर्मणि ।

दर्शनमें संलग्न हों * ॥९ –१२ ॥

नारदजी कहते हैं - राजन्! जब इस प्रकार चकित होकर भगवान्‌का वैभव देखते हुए अक्रूरजी इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण अपने लोकसहित वहीं अन्तर्धान हो गये । तव उन्हें नमस्कार करके नैमित्तिक कर्म पूर्ण करनेके पश्चात् अक्रूर श्रीकृष्णको परब्रह्मस्वरूप जानकर विस्मयपूर्वक रथपर आये । घनवत् गम्भीर नाद करने-वाले उस वायुवेगशाली रथके द्वारा अक्रूरने बलराम और श्रीकृष्णको दिन डूबते - डूबते मथुरा पहुँचा दिया । वहाँ नगरके उपवनमें नन्दराजको देखकर यदूत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें अक्रूरजीसे बोले ॥ १३ – १६ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – मानद! अब आप अपने रथके द्वारा मथुरापुरीमें पधारें । मैं पीछे ग्वाल - बालोंके साथ आऊँगा ॥ १७ ॥

अक्रूरने कहा- देवदेव! जगन्नाथ! गोविन्द! पुरुषोत्तम! प्रभो! आप अपने बड़े भाई तथा ग्वालों-सहित मेरे घरपर चलें । जगत्पते! अपने चरणारविन्दों-की धूलसे आज मेरा घर पवित्र कीजिये । मैं आपको साथ लिये बिना अपने घर नहीं जाऊँगा ॥ १८-१९ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – अक्रूरजी! मैं यदु-वंशियोंके वैरी कंसको मारकर बलरामजी तथा गोप-बन्धुओंके साथ आपके भवनमें अवश्य आऊँगा और आपका प्रिय करूँगा ॥ २० ॥

नारदजी कहते हैं— राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण वहीं ठहर गये और अक्रूरने मथुरापुरीमें प्रवेश किया । वहाँ कंसको श्रीकृष्णके आगमनका समाचार देकर वे अपने घर चले गये । दूसरे दिन बलराम और गोप-बालकोंके साथ मथुरापुरीको देखनेके लिये उद्यत हुए गोविन्दकी ओर देखकर नन्दने यह बात कही॥२१-२२ ॥ असंख्याण्डाधिपतये गोलोकपतये नमः ॥ । नमः श्रीनन्दपुत्राय यशोदानन्दनाय च ॥ । यदूत्तम जगन्नाथ पाहि मां पुरुषोत्तम ॥ मनः सदा त्वच्चरणारविन्दयोर्दृशौ स्फुरद्धामविशेषदर्शने ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० ५। ९ –१२ )

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अध्याय ५ ] अक्रूरको भगवान् श्रीकृष्णके ' वत्स! सीधी तरहसे मथुरापुरीको देखकर तुम सब लोग लौट आना । इसे गोकुल न समझो; यहाँ कंसका महाभयंकर राज्य है । ' ' बहुत अच्छा ' - कहकर भगवान् श्रीकृष्ण नन्दद्वारा प्रेरित बड़े - बूढ़े ग्वालों और ग्वालबालोंके साथ पुरीमें गये । बलरामजी भी उनके साथ थे । दुर्गसे युक्त वह पुरी स्वर्ण एवं रत्नजटित सुन्दर गृहों तथा गगनचुम्बी महलोंसे देवताओंकी राजधानी अमरावतीके समान शोभा पाती थी । यमुनाके तटपर रत्नोंकी सीढ़ियाँ बनी थीं । वहाँ चञ्चल लहरोंका कौतूहल देखते ही बनता था । उन सबसे तथा दिव्य नर - नारियोंसे युक्त वह नगरी अलकापुरीके समान शोभा पा रही थी । मथुरापुरीकी शोभा निहारते और धनिकोंके भवनोंको देखते हुए श्रीकृष्ण ग्वाल - बालोंके साथ राजमार्ग ( मुख्य सड़क पर आ गये ॥ २३ – २७ ॥ वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके आगमनका समाचार सुनकर मथुरापुरीकी स्त्रियाँ, जो उनके विषयमें बहुत कुछ सुन चुकी थीं, सारे काम - काज और शिशुओंको भी छोड़कर उन्हें देखनेके लिये इस प्रकार दौड़ीं, मानो नदियाँ समुद्रकी ओर भागी जा रही हों । कुछ स्त्रियाँ महलोंकी छतसे, कुछ जालीदार झरोखोंके छेदसे, कोई - कोई दीवारोंकी ओटसे, कोई खिड़कियोंपर लगे हुए पर्दे हटाकर और कुछ नारियाँ दरवाजेके किवाड़ोंसे बाहर निकलकर घरके चबूतरोंपरसे उन्हें देखने लगीं । भगवान् श्रीकृष्णका एक चञ्चल कुन्तलभाग उनके मुखपर लटक रहा था मानो उन्होंने अपने सामनेवाले मनुष्योंके मनको हर लेनेके लिये उसे धारण किया था तथा दूसरा कुन्तलभाग उन्होंने मुकुटके नीचे दबाकर पीछे की ओर लटका दिया था, मानो पीछे से आनेवाले लोगोंके मनको मोहनेके लिये उसे उन्होंने पृष्ठभागकी ओर धारण किया था । उनका आधा पीताम्बर कमरमें बँधा हुआ चमक रहा था और आधा कंधेपर पड़ा नीलमेघमें विद्युत्की - सी शोभा धारण कर रहा था । राजन्! उन्होंने अपने एक हाथमें कमल और वक्षःस्थलमें वैजयन्ती माला धारण कर रखी थी । कानोंमें नवीन मकराकार कुण्डल पहने तथा बाल-सूर्यके समान कान्तिमान् सोनेके बाजूबंदसे विभूषित परब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार १ ९ ७ बाहुमण्डलवाले, असंख्य ब्रह्माण्डाधिपति परात्पर भगवान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको देखकर समस्त पुरवासिनी स्त्रियाँ मोहित हो गयीं ॥ २८ – ३२ ॥ नागरी स्त्रियाँ बोलीं- अहो! वह वृन्दावन कैसा रमणीय है, जहाँ ये नन्दनन्दन स्वयं निवास करते हैं । वे समस्त गोपगण भी धन्य हैं, जो प्रतिदिन इनके मनोहर रूपका दर्शन करते रहते हैं । वे गोपाङ्गनाएँ भी धन्य हैं- न जाने उन्होंने कौन - सा पुण्य किया है, जो रास - रङ्गमें वे बारंबार उनके अधरामृतका पान किया करती हैं ॥३३-३४ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! उस राजमार्गपर एक कपड़ा रँगनेवाला रजक जा रहा था । वह बड़ा घमंडी और उन्मत्त जान पड़ता था । ग्वालबालोंकी अनुमतिसे मधुसूदनने उससे कहा – ' मेरे महा-बुद्धिमान् मित्र! हमारे लिये सुन्दर वस्त्र दो; यदि दे दोगे तो तुम्हारा परम कल्याण होगा, इसमें संशय नहीं है । ' वह रजक कंसका सेवक और बड़ा भारी दुष्ट था । श्रीकृष्णकी बात सुनकर घृतसे अभिषिक्त अग्निकी भाँति वह अत्यन्त रोषसे प्रज्वलित हो उठा और उस राजमार्गपर माधवसे इस प्रकार बोला ॥ ३५-३७ ॥ रजकने कहा - अरे! तुम्हारे बाप - दादोंने ऐसे ही वस्त्र धारण किये हैं क्या? उदण्ड ग्वाल - बालो! क्या तुम्हारे पूर्वज कौपीनधारी नहीं थे? जंगलमें रहनेवाले गोपो! यदि जीवन चाहते हो तो तुम सब - के - सब नगरसे शीघ्र निकल जाओ; अन्यथा वस्त्रकी चोरी करनेवाले तुम सब लोगोंको मैं जेलमें बंद करा दूंगा ॥ ३८-३९ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! इस तरहकी बातें करनेवाले उस रजकके मस्तकको यदुकुल - तिलक श्रीकृष्णने खेल - खेलमें हाथके अग्रभागसे ही मरोड़ दिया । विदेहराज! उसके शरीरकी ज्योति घनश्याम श्रीकृष्णमें लीन हो गयी । राजन्! फिर तो उसके समस्त अनुगामी सेवक वस्त्रोंके गट्ठर वहीं छोड़कर उसी तरह सब ओर भाग गये, जैसे शरत्कालमें हवाके वेगसे बादल छिन्न - भिन्न हो जाते हैं । उन वस्त्रोंमेंसे बलराम और श्रीकृष्ण अपनी पसंदके कपड़े लेकर जब खड़े हो गये, तब शेष वस्त्रोंको ग्वालबालों

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१ ९ ८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड तथा अन्य राहगीरोंने ले लिया । उन वस्त्रोंको कैसे बलदेवके दिव्य वेष बना दिये । राजन्! इसी तरह अन्य पहनना चाहिये, यह बात ग्वालबाल नहीं जानते थे; गोप - बालकोंको भी यथोचित वस्त्र पहनाकर उसने अतः बलराम और श्रीकृष्णके देखते - देखते वे उन बड़ी भक्तिसे श्रीकृष्णका पुनः दर्शन किया । उस सुन्दर वस्त्रोंको अस्त - व्यस्त ढंगसे पहनने लगे । इसी बालकपर प्रसन्न हो भगवान्ने उसे अपना सारूप्य प्रदान समय एक बालकने उन दोनों भाइयोंको देखकर किया तथा बलदेवजीने भी पुनः उसे बल, लक्ष्मी और विचित्र वर्णवाले वस्त्रोंको धारण कराकर श्रीकृष्ण और ऐश्वर्य प्रदान किया ॥ ४०–४६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमधुराखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णका मथुरामें प्रवेश ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

छठा अध्याय सुदामा माली और कुब्जापर कृपा; धनुर्भङ्ग तथा मथुराकी स्त्रियोंपर श्रीकृष्णके मधुर - मोहन रूपका प्रभाव श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर ग्वालबालोंसहित नन्दनन्दन श्रीकृष्ण और बलराम सुदामा नामवाले एक मालीके घर गये, जो फूलोंके गजरे बनाया करता था । उन दोनों भाइयोंको देखते ही माली उठकर खड़ा हो गया । उसने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और फूलके सिंहासनपर बिठाकर गद्गद वाणीमें कहा ॥ १-२ ॥ सुदामा बोला - देव! यहाँ आपके शुभागमनसे मेरा कुल तथा घर दोनों धन्य हो गये । मैं ऐसा समझता हूँ कि मेरी माता कुलकी सात पीढ़ियाँ, पिताके कुलकी सात पीढ़ियाँ तथा पत्नीके कुलकी भी सात पीढ़ियाँ वैकुण्ठलोकमें चली गयीं । आप दोनों परिपूर्णतम परमेश्वर हैं और भूतलका भार उतारनेके लिये इस यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं । मुझ दीनातिदीन

के घर आये हुए आप दोनों भाइयोंको नमस्कार है ।

आप परात्पर जगदीश्वर हैं * ॥ ३-४ ॥

नारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर मालीने पुष्पनिर्मित सुन्दर हार और भ्रमरोंकी गुंजारसे निनादित मकरन्द ( इत्र, फुलेल आदि ) निवेदन करके प्रणाम किया । बलरामसहित भगवान् श्रीहरिने उस पुष्प-* धन्यं कुलं मे भवनं च जन्म त्वय्यागते देव कुलानि सप्त । भूभारमाहर्तुमलं यदोः कुले जातौ युवां पूर्णतमौ परेश्वरौ । राशिको धारण करके निकटवर्ती गोपोंको भी दिया और हँसते हुए मुखसे उस मालीसे बोले — ' सुदामन्! मेरे चरणारविन्दोंमें सदा तुम्हारी गुरुतर भक्ति बनी रहे, मेरे भक्तोंका सङ्ग प्राप्त हो और इसी जन्ममें तुम्हें मेरे स्वरूपकी प्राप्ति हो जाय । ' तदनन्तर बलदेवजीने भी इसे उसके कुलमें निरन्तर बढ़नेवाली लक्ष्मी प्रदान की । राजन्! फिर वे दोनों भाई वहाँसे उठकर दूसरी गलीमें गये । वहाँ मार्गमें एक कमलनयनी कामिनी जा रही थी । उसके हाथोंमें चन्दनका अनुलेप- पात्र था । अवस्थामें वह युवती थी, किंतु शरीरसे कुबड़ी

दिखायी देती थी । माधवने उससे पूछा ॥५ - ९ ॥

श्रीभगवान् बोले- सुन्दरी! तुम कौन हो और किसकी प्रिया हो? किसके लिये यह चन्दन ले जा रही हो? हम दोनोंको भी यह चन्दन दो, इससे शीघ्र ही तुम्हारा कल्याण होगा ॥ १० ॥

सैरन्ध्री बोली - सुन्दर - शिरोमणे! मैं कंसकी दासी हूँ । महामते! मेरा नाम कुब्जा है । मेरे हाथका घिसा हुआ चन्दन भोजराज कंसको बहुत प्रिय है । अबतक तो मैं कंसकी ही दासी रही हूँ, किंतु इस समय आपके सामने उपस्थित हूँ । हाथीके शुण्डदण्डकी मातुः पितुः सप्त तथा प्रियाया वैकुण्ठलोकं गतवन्ति मन्ये ॥ नमो युवाभ्यां मम दीनदीनं गृहं गताभ्यां जगदीश्वरौ परौ ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० ६ । ३-४ )

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अध्याय ६ ] सुदामा माली और कुब्जापर कृपा १ ९९ भाँति जो आपके ये बलिष्ठ भुजदण्ड हैं, इनमें मेरा मन लग गया है । आप दोनों भाइयोंको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस चन्दनानुलेपके योग्य हो । आप दोनों भाइयोंके समान सुन्दर रूप तो त्रिभुवनमें कहीं नहीं है ॥ ११–१३ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! हर्षसे भरी हुई कुब्जाने उन दोनों भाइयोंके लिये स्निग्ध अनुलेपन प्रदान किया । उस अङ्गरागसे वे दोनों बन्धु - बलराम और श्रीकृष्ण बड़ी शोभा पाने लगे । व्रजके अन्य बालकोंने भी थोड़ा - थोड़ा वह दिव्य चन्दन ग्रहण किया । कुब्जा तीन जगहसे टेढ़ी थी । श्रीकृष्णने उसे तत्काल सीधी करनेका विचार किया । उन सर्वव्यापी परमेश्वरने अपने चरणोंद्वारा उसके पैरोंके अग्रभागको दबाकर उत्तान हाथकी दो अङ्गुलियोंसे उसकी ठोढ़ी पकड़ ली और लोगोंके देखते - देखते उसके तीन जगहसे टेढ़े शरीरको उचका दिया । फिर तो वह उसी समय छड़ीके समान देहवाली, अत्यन्त रूप - सौन्दर्यसे सम्पन्न तन्वङ्गी तरुणी हो गयी और अपनी दीप्तिसे रम्भाको भी तिरस्कृत - सी करने लगी । उसके हृदयमें कामभावका उदय हुआ और उससे विह्वल हो उस पवित्र मुस्कानवाली सैरन्ध्रीने श्रीहरिका वस्त्र पकड़कर इस प्रकार कहा ॥ १४- १७ ॥ सैरन्ध्री बोली - सुन्दरप्रवर! अब तुम शीघ्र ही मेरे घर चलो; निश्चय ही मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकूँगी । तुम तो सबके मनकी जाननेवाले हो; मुझपर कृपा करो । रसिकशेखर! मानद! तुमने मेरे मनको बड़े वेगसे मथ डाला है ॥ १८ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तब सब गोप ' अहो! यह क्या! ' – परस्पर यों कहते हुए ताली पीट - पीटकर हँसने लगे । बलरामजी भी बड़े गौरसे यह सब देख रहे थे । उस सुन्दरीके अपने घर चलने -के लिये प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीहरिने यह उत्तम बात कही ॥१ ९ ॥ श्रीभगवान् बोले- अहो! यह मथुरापुरी अत्यन्त धन्य है, जहाँ बड़े सौम्य स्वभावके लोग निवास करते हैं, जो अपरिचित राहगीरोंको भी अपने घर बुला ले जाते हैं । सुन्दरी! मैं घूम - फिरकर मथुरा-पुरीका दर्शन करके तुम्हारे घर आऊँगा ॥२० ॥

नारदजी कहते हैं- राजन्! स्नेहमयी वाणीद्वारा यों कहकर श्रीकृष्णने उसके हाथसे अपने दुपट्टेका छोर खींच लिया और राजमार्गपर आगे बढ़ते हुए उन्हें कुछ धनी वैश्य दिखायी दिये । उन उत्तम बुद्धिवाले वैश्योंने पान, फूल, इत्र, दूध और फल आदिद्वारा श्रीहरिका पूजन करके उन्हें उत्तम आसनपर बिठाया और उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २१-२२ ॥ वैश्य बोले - देव! यदि यहाँ आपका राज्य स्थापित हो जाय तो आप हम आत्मीयजनोंका सदा ध्यान रखें; हम आपकी प्रजा हैं । प्रायः राज्य मिल जानेपर कोई किसीका स्मरण नहीं करता ॥ २३ ॥

नारदजी कहते हैं— राजन्! तब अच्युतने सुन्दर मन्द मुस्कराहटके साथ उन वैश्योंसे पूछा - ' धनुषका स्थान कौन है? ' किंतु वे वैश्य बड़े चालाक थे । उन्हें धनुषके तोड़ दिये जानेकी आशङ्का हुई, इसलिये वे भगवान्‌को उसका स्थान नहीं बता रहे थे । किंतु उनके रूप, गुण और माधुर्यसे मोहित जो अन्य मथुरावासी थे, वे उन्हें धनुष दिखानेकी इच्छासे बोले-' कुमार! आइये, देखिये वह धनुष ' ॥ २४-२५ ॥ तब उनके दिखाये हुए मार्गसे श्रीकृष्णने धनुष-शालामें प्रवेश किया । वे मथुरावासी समवयस्क पुर-बालकोंके साथ मैत्रीभावकी स्थापना भी करते जाते थे । वह धनुष सुनहरे बेल - बूटोंसे चित्रित था । उसकी लंबाई सात ताड़के बराबर थी । वह देखनेमें इन्द्रधनुष-सा जान पड़ता था । वह इतना अधिक भारी था कि पाँच हजार मनुष्य एक साथ मिलकर ही उसे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जा सकते थे । उसका निर्माण आठ धातुओंसे हुआ था । वह कठोर धनुष एक लाख भारके समान भारी था और चतुर्दशी तिथि-को पुरवासियोंद्वारा पूजित हो यज्ञमण्डपमें स्थापित किया गया था । पूर्वकालमें भृगुकुलनन्दन परशुरामजी -ने राजा यदुको वह धनुष दिया था । माधव श्रीकृष्णने उसे देखा; वह कुंडली मारकर बैठे हुए शेषनागके समान प्रतीत होता था । लोग मना करते रह गये, किंतु श्रीकृष्णने हठपूर्वक उस धनुषको उठा लिया और पुरवासियोंके देखते - देखते खेल खेलमें उसके ऊपर

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२०० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड प्रत्यञ्चा चढ़ा दी ॥ २६-३० ॥ राजन्! फिर श्रीहरिने अपने भुजदण्डोंसे उस धनुषको कानतक खींचा और जैसे हाथी ईखके डंडेको तोड़ डालता है, उसी प्रकार उसको बीचसे खण्डित कर दिया । टूटते हुए उस धनुषकी टंकार बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान प्रतीत हुई । इससे ' भूः ' आदि सात लोकों तथा सातों पातालोंसहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा, दिग्गज विचलित हो गये, तारे टूटने लगे, भूखण्ड - मण्डल काँप उठा, पृथ्वीपर रहनेवाले लोगोंके कान तत्काल बहरे - से हो गये । वह शब्द दो घड़ीतक कंसके हृदयको विदीर्ण करता रहा । उस धनुषकी रक्षा करनेवाले आततायी असुर अत्यन्त कुपित होकर उठे और श्रीकृष्णको पकड़ लेनेकी इच्छासे परस्पर कहने लगे – ' बाँध लो इसे । ' उन्हें सशस्त्र आक्रमण करते देख बलराम और श्रीकृष्णने धनुषके दोनों टुकड़े लेकर उन दुर्मद दैत्योंको बड़े वेगसे पीटना आरम्भ किया । धनुष - खण्डोंके अत्यन्त प्रबल प्रहारसे कितने ही वीर तत्काल मूर्च्छित हो गये, किन्हींके पाँव टूटे, किन्हींके नख फूटे और कितनोंहीके कंधे एवं बाहुदण्ड खण्डित हो गये । इस प्रकार पाँच हजार दैत्यवीर भूमिपर प्राणशून्य होकर सो गये । समस्त मथुरा-वासियोंमें हलचल मच गयी । बहुत से लोग उस घटनाको देखनेके लिये दौड़े आये । नगरीमें सब ओर कोलाहल होने लगा और वहाँके लोगोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया । भोजराज कंसके सभामण्डपका छत्र अकस्मात् टूटकर गिर पड़ा ॥ ३१ - ३८ ॥ नरेश्वर! ग्वाल - बालों तथा बलरामजीके साथ श्रीकृष्ण संध्याके समय धनुषशालासे नन्दराजके निकट आ गये, मानो वे अत्यन्त डर गये हों । गोविन्दका इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके वह अद्भुत सुन्दर रूप देखकर मथुरापुरीकी वनिताएँ विशेषरूपसे मोहित हो गयीं । उनके वस्त्र खिसक गये, गूँथी हुई चोटियाँ ढीली पड़ गयीं, हृदयमें प्रेमजनित पीड़ा जाग उठी और वे अपनी सखियोंसे परस्पर इस प्रकार कहने लगीं ॥ ३ ९ -४० ॥ पुरस्त्रियाँ बोलीं- सखियो! करोड़ों कामदेवों-की कान्ति धारण किये श्रीहरि बड़ी उतावलीके साथ मथुरापुरीमें स्वच्छन्द विचरने लगे हैं और जिन किन्हीं युवतियोंने उन्हें देखा है, उन हम जैसी सभी स्त्रियोंके समस्त अङ्गोंमें वे अनङ्ग बनकर समाविष्ट हो गये हैं ॥ ४१ ॥

कुछ चतुरा स्त्रियोंने कहा- क्या इस पुरीमें ऐसी क्रूर स्त्रियाँ नहीं हैं, जो अनङ्गमोहन श्रीकृष्णके सारे अङ्गोंको घूर घूरकर देखती हैं? हम सब उन परमानन्दमय सर्वाङ्गसुन्दर श्रीकृष्णको भर आँख नहीं निहारतीं? सखी! किसीके किसी एक ही अङ्गमें सौन्दर्य- माधुर्य दिखायी देता है और वहीं हमारे नेत्र पतंगके समान टूट पड़ते हैं; परंतु जो सर्वाङ्गसुन्दर एवं मनोहर हैं, उन्हें केवल नेत्रसे पूर्णतया कैसे देखा जा सकता है? नन्दनन्दनका अङ्ग अङ्ग सुन्दर है; उसमें जहाँ - जहाँ भी दृष्टि पड़ती है, वहीं - वहीं परम सुख पाकर वहाँ - वहाँसे लौटनेका नाम नहीं लेती । वे लावण्यके महासागर हैं । उनमें हमारा चित्त किस तरह लगा है, मानो उसीमें डूब गया हो ॥ ४२ – ४४ ॥ मिथिलेश्वर! नगरकी जिन स्त्रियोंने दिनमें व्रजराजनन्दनको देखा, उन्होंने स्वप्नमें भी उन्हींका दर्शन किया । फिर जिन्होंने रासमण्डलमें उनके साथ रासलीला की, वे गोपाङ्गनाएँ उनके मधुर मनोहर रूपका कैसे निरन्तर स्मरण न करें ॥ ४५ ॥

अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' मथुरादर्शन ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

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सातवाँ अध्याय मल्ल - क्रीड़ा - महोत्सवकी तैयारी; रङ्गद्वारपर कुवलयापीड़का वध तथा श्रीकृष्ण और बलरामका चाणूर और मुष्टिकके साथ मल्लयुद्धमें प्रवृत्त होना नारदजी कहते हैं- राजन्! रजकके मस्तका छेदन, धनुषका भञ्जन तथा रक्षकोंके वधका समाचार सुनकर कंसको बड़ा भय हुआ । तत्काल उसके सामने अपशकुन प्रकट हुए । उसके बायें अङ्ग फड़कने लगे, उसे स्वप्न में अपना अङ्ग भङ्ग दिखायी देने लगा । इससे दैत्योंके राजा कंसको रातभर नींद नहीं आयी । उसने स्वप्नमें यह भी देखा था कि वह प्रेतोंसे घिरा हुआ है । उसके सारे शरीरमें तेल मला गया है तथा वह नंगधड़ंग जपाकुसुमकी माला पहिने भैंसेपर चढ़कर दक्षिण दिशाकी ओर जा रहा है ॥ १-३ ॥ प्रात: काल उठकर उसने कार्यकर्ताओंको बुलवाया और उन्हें मल्लक्रीड़ा - महोत्सव प्रारम्भ करनेकी आज्ञा दी । सभामण्डपके सामने ही विशाल प्राङ्गणसे युक्त स्थानपर रङ्गभूमिकी रचना की गयी । वहाँ सोनेके खंभे लगाये गये, सुनहरे चँदोवे ताने गये और उनमें मोतियोंकी लड़ियाँ लटका दी गयीं । नरेश्वर! सुन्दर सोपानों और सुवर्णमय मचोंसे वह रङ्गभूमि बड़ी शोभा पाने लगी । राजाके लिये रत्नमय सुन्दर मञ्च स्थापित किया गया । उसपर इत्र लगाया गया । उस मञ्चपर इन्द्रका सिंहासन लगा दिया गया । उसके ऊपर सुन्दर बिछावन और तकिये सुसज्जित कर दिये गये । चन्द्रमण्डलके समान मनोहर दिव्य छत्र तथा हीरेकी बनी हुई मूठवाले हंसकी - सी आभासे युक्त व्यजन और चामरोंसे सुशोभित विश्वकर्माद्वारा रचित वह दस हाथ ऊँचा सिंहासन बड़ा ही चित्ताकर्षक था । उसपर आरूढ़ हो राजा कंस पर्वत शिखरपर बैठे हुए सिंहके समान शोभा पा रहा था । वहाँ गायकद्वारा गीत गाये जाने लगे, वाराङ्गनाएँ नृत्य करने लगीं और मृदङ्ग, पटह, ताल, भेरी तथा आनक आदि बाजे बजने लगे ॥ ४ – १० ॥ राजन्! छोटे - छोटे मण्डलोंके शासक नरेश तथा नगर और जनपदके निवासी बड़े लोग पृथक् - पृथक् मञ्चपर बैठकर मल्लयुद्ध देख रहे थे । चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल आदि पहलवान व्यायामोपयोगी मुद्गरोंसे युक्त हो परस्पर युद्धका अभ्यास कर रहे थे । कंसके द्वारा बुलाये गये नन्दराज आदि गोप मस्तक झुकाये राजाको उत्तम भेंट अर्पित करके एक - एक मञ्चका आश्रय ले बैठ गये । नरेश्वर! वहाँ यदुराज कंसके लिये बाणासुर, जरासंध और नरकासुरके नगरसे भी उपहार आये । अन्य जो शम्बर आदि भूपाल थे, उनके पाससे भी बहुत - सी भेंट - सामग्रियाँ आयीं॥११–१४३ ॥ तदनन्तर मायासे बालकरूप धारण किये बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई मल्लोंके खेल देखनेके लिये उस रङ्गशालामें आये । रङ्गमण्डपके द्वारपर कुवलयापीड़ नामक हाथी खड़ा था, जिसके कुम्भस्थलपर गोमूत्रमें सने हुए सिन्दूर और कस्तूरीसे पत्र - रचना की गयी थी । रत्नमय कुण्डलोंसे मण्डित उस महामत्त गजराजके गण्डस्थलसे मद झर रहा था । द्वारपर हाथीको खड़ा देख श्रीकृष्णने महावतसे गम्भीर वाणीमें कहा – ' अरे! इस गजराजको दूर हटा ले और मेरी इच्छाके अनुसार मार्ग दे दे । नहीं तो तुझको और तेरे हाथीको अभी भूतलपर मार गिराऊँगा ' ॥ १५–१८ ॥ तब कुपित हुए महावतने सम्पूर्ण दिशाओंमें जोर - जोरसे चिग्घाड़ते हुए उस मतवाले हाथीको नन्दनन्दनपर आक्रमण करनेके लिये आगे बढ़ाया । गजराजने तत्काल ही श्रीहरिको सूँड़से पकड़कर उठा लिया । परंतु अपना भार अधिक बढ़ाकर श्रीहरि उसकी पकड़से बाहर निकल गये । जैसे वृन्दावनके निकुओंमें श्रीहरि इधर - उधर लुकते - छिपते थे, उसी प्रकार इधर - उधर घूमकर वे कुवलयापीड़के पैरोंके बीचमें छिप गये । हाथीने अपनी सूँड़ बढ़ाकर उन्हें पकड़ लिया, किंतु उसकी सूँड़को दोनों हाथोंसे दबाकर श्रीहरि पीछेकी ओरसे निकल गये । तब हाथीने

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२०२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड बगलकी दिशामें घूमकर उन्हें पकड़नेकी चेष्टा की, किंतु माधव उसके मस्तकपर मुक्केसे प्रहार करके आगेकी ओर भागे । विदेहराज! उस गजराजने भागते हुए श्रीहरिका पीछा किया । उस समय मथुरापुरीमें कोहराम मच गया । फिर श्रीहरि चक्कर देकर इधर पीछेकी ओर निकल आये । उधर महाबली बलदेवने, जैसे गरुड सर्पको पकड़ते हैं, उसी प्रकार अपने बाहुदण्डोंसे उसकी पूँछ पकड़कर उसे पीछेकी ओर खींचा । तब हँसते हुए भगवान् श्रीकृष्णने अपने दोनों हाथोंसे बलपूर्वक उसकी सूँड़ पकड़कर उसी तरह आगेकी ओर खींचना आरम्भ किया, जैसे मनुष्य कूएँसे रस्सीको खींचता है । नृपेश्वर! उन दोनों भाइयोंके आकर्षणसे वह हाथी व्याकुल हो उठा । तब सात महावत बलपूर्वक उस हाथीपर चढ़ गये । साथ ही दूसरे महावत भी श्रीकृष्णका वध करनेके लिये तीन सौ हाथी वहाँ ले आये । महावतोंके अङ्कुशकी चोट करनेसे कुपित हुआ वह मतवाला हाथी पुनः श्रीकृष्णकी ओर झपटा । तब बलदेवजीके देखते - देखते साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने उसकी सूँड़ पकड़ ली और इधर - उधर घुमाकर उसे उसी प्रकार पृथ्वीपर दे मारा, जैसे कोई बालक कमण्डलु पटक दे । उसपर चढ़े हुए सातों महावत इधर - उधर दूर जा गिरे और वहाँ जुटे हुए साधु-पुरुषोंके देखते - देखते वह हाथी प्राणशून्य हो गया । विदेहराज! उसके शरीरसे एक ज्योति निकली और श्रीघनश्याममें विलीन हो गयी ॥ १ ९ – ३१३ ॥ महाबली बलराम और श्रीकृष्णने उस हाथीके दोनों दाँत उखाड़ लिये और जैसे दो सिंहके बच्चे बहुत - से मृगोंका संहार कर डालें, उसी प्रकार समस्त महावतोंको मौतके घाट उतार दिया । हाथीके मारे जानेपर जो अन्य महावत बचे भागकर उसी प्रकार छिप गये, हो जानेपर बादल जहाँ - के - तहाँ प्रकार कुवलयापीड़का वध और हाथीके मदसे अङ्कित हुए दोनों बन्धु गोपों तथा शेष अपनी जय - जयकार सुनते हुए थे, वे सब इधर - उधर जैसे वर्षाकाल व्यतीत विलीन हो जाते हैं । इस करके पसीनेकी बूँदों बलराम और श्रीकृष्ण, दर्शनार्थियोंके मुखसे बड़ी उतावलीके साथ रङ्गशालामें प्रविष्ट हुए । उस समय उन दोनोंके मुख अधिक परिश्रमके कारण लाल हो गये थे, उनके हाथोंमें हाथीके दाँत थे । वे दोनों दिशाओंमें एक साथ चलनेवाले अनिल और अनलकी भाँति बड़े वेगसे रङ्गभूमिमें पहुँचे । उस समय मल्लोंने उन्हें महामल्ल समझा और नरोंने नरेन्द्र । नारियोंने उन्हें कामदेव माना और गोपगणोंने व्रजका स्वामी । पिताकी दृष्टिमें वे पुत्र जान पड़े और दुष्टोंको दण्डधारी यमराजके समान प्रतीत हुए । कंसने उनको अपनी मृत्यु समझा और ज्ञानी पुरुषोंने उन्हें विराट् ब्रह्मके रूपमें देखा । उस समय बलरामके साथ रङ्गशालामें गये हुए श्रीकृष्णको योगिशिरोमणि महात्मा पुरुषोंने परमतत्त्वके रूपमें अनुभव किया । सभी तरहके लोगोंने अपनी पृथक्-पृथक् भावनाके अनुसार उन परिपूर्णदेव श्रीहरिको विभिन्न रूपोंमें देखा और समझा ॥ ३२ - ३७ ॥ हाथीको मारा गया सुनकर और उन महाबली बन्धुओंको देखकर मनस्वी कंस मन - ही - मन भयभीत हो उठा तथा मञ्चोंपर बैठे हुए दूसरे दूसरे लोग मन-ही मन हर्षसे उल्लसित हो उठे और जैसे चन्द्रमाको देखकर चकोर सुखी होते हैं, उसी प्रकार वे उन्हें देखकर परमानन्दमें निमग्न हो गये । नगरके लोग अत्यन्त उत्सुक हो एक - दूसरेके कान - से - कान सटाकर परस्पर कहने लगे- ' ये दोनों वसुदेवनन्दन साक्षात् परमपुरुष परमेश्वर हैं । अहो! व्रजमण्डल अत्यन्त रमणीय एवं श्रेष्ठ है, जहाँ ये साक्षात् माधव विचरते रहे हैं और जिनका आज दुर्लभ दर्शन पाकर हम सर्वतो -भावसे कृतार्थ हो रहे हैं ॥ ३८–४० ॥ नारदजी कहते हैं— मैथिल! जब पुरवासी लोग इस प्रकार बात कर रहे थे और भाँति - भाँतिके बाजे बज रहे थे, उस समय चाणूरने बलराम और श्रीकृष्ण-दोनोंके पास जाकर कहा ॥४१ ॥

चाणूर बोला- हे राम! हे कृष्ण! आप दोनों बड़े बलवान् हैं, अतः महाराजके सामने अपने बलका प्रदर्शन करते हुए युद्ध कीजिये । यदुकुलतिलक महाराज कंस यदि इस युद्धसे प्रसन्न हो गये तो आपलोगोंकी और हमारी कौन - कौन - सी भलाई नहीं होगी? ( अर्थात् सब होगी ) ॥ ४२ ॥

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अध्याय ८ ] चाणूरमुष्टिक आदि मल्लोंका तथा कंस और उसके भाइयोंका वध २०३ श्रीभगवान्ने कहा- राजाके कृपा प्रसादसे तो हमारी पहलेसे ही बहुत भलाई हो रही है । किंतु इतना ध्यान रखो कि हमलोग बालक हैं; अतः समान बलवाले बालकोंके साथ ही हमारा युद्ध होगा, किसी बलवान्‌के साथ नहीं । इसकी यथोचित व्यवस्था होनी चाहिये, यहाँ अधर्म - युद्ध कदापि न होने पाये ॥ ४३ ॥

चाणूरने कहा- न तो आप बालक हैं और न बलरामजी ही किशोर हैं । आप साक्षात् बलवानोंमें भी बलिष्ठ हैं; क्योंकि सहस्र मतवाले हाथियोंका बल धारण करनेवाले कुवलयापीड़को आप दोनोंने खिलवाड़में ही मार डाला है ॥ ४४ ॥

नारदजी कहते हैं— राजन्! चाणूरकी ऐसी बात सुनकर अघमर्दन भगवान् श्रीकृष्ण चाणूरके साथ और बलवान् बलरामजी मुष्टिकके साथ मल्लयुद्ध करने लगे । वे एक - दूसरेके भुजदण्डोंको दोनों भुजाओंसे पकड़कर अपनी ओर खींचते और पीछे ढकेलते थे । लोगोंके देखते - देखते वे दोनों भाई विजयकी इच्छासे लड़नेवाले दो हाथियोंकी भाँति अपने शत्रुओंसे भिड़ गये । साक्षात् श्रीहरिने चाणूरके शरीरको दोनों हाथोंसे उठाकर उसके देहभारको उसी प्रकार तौला, जैसे ब्रह्माजी पुण्यात्माओंके पुण्यभारको तौला करते हैं । फिर महावीर चाणूरने भगवान् श्रीहरिको एक ही हाथसे उसी प्रकार लीलापूर्वक उठा लिया, जैसे इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके वर्णन नामक सातवाँ नागराज शेष भूमण्डलको अपने एक ही फनपर धारण करते हैं । माधवने अपनी भुजाओंके वेगसे चाणूरकी गर्दन और कमरमें हाथ लगाकर उसे उठा लिया और सहसा पृथ्वीपर दे मारा । एक ओर श्रीकृष्ण और चाणूर तथा दूसरी ओर बलराम और मुष्टिक एक दूसरेको हाथों, घुटनों, पैरों, भुजाओं, छातियों, अङ्गुलियों और मुक्कोंसे मारने लगे । बलराम और श्रीकृष्णके मुखोंपर परिश्रमजनित पसीनेकी बूँदें देखकर दयासे द्रवित हो उस समय महलकी खिड़कियोंके पास बैठी हुई राजरानियाँ आपसमें कहने लगीं ॥ ४५–५१ ॥ स्त्रियाँ बोलीं- अहो! राजाके मौजूद रहते उनके सामने सभामें यह बहुत बड़ा अधर्म हो रहा है! कहाँ तो वज्रके समान सुदृढ़ शरीरवाले वे दोनों पहलवान और कहाँ फूलके सदृश सुकुमार बलराम और कृष्ण । अहो! हम मथुरापुरवासियोंका कैसा अभाग्य है कि हमें आज इतने दिनों बाद इनका दर्शन भी हुआ तो युद्धके अवसरपर । वनवासी गोपका महान् सौभाग्य अत्यन्त धन्यवादके योग्य है, जिन्हें रास - रसके साथ श्रीकृष्ण-बलरामका दर्शन होता आ रहा है । सखियो! आश्चर्यकी बात तो यह है कि इस दुष्ट चित्त राजाके रहते हुए कोई भी कुछ कहनेको समर्थ नहीं हो सकता । इसलिये हमारे पुण्यके बलसे ये दोनों बन्धु शीघ्र ही अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त करें॥५२–५४ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' मल्लयुद्धका अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

आठवाँ अध्याय चाणूरमुष्टिक आदि मल्लोंका तथा कंस और उसके भाइयोंका वध श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! नन्दराजका चित्त करुणासे द्रवित हो रहा था । उनकी ओर ध्यान देकर तथा वनिताओंके मनोरथको याद करके श्रीहरिने शत्रुओंको मार डालनेका संकल्प मनमें लेकर बलपूर्वक युद्ध आरम्भ किया ॥१ ॥

चाणूरको भुजदण्डोंसे उठाकर श्रीकृष्णने बलपूर्वक अकस्मात् आकाशमें उसी प्रकार फेंक दिया, जैसे हवाने उखड़े हुए कमलको सहसा उड़ा दिया हो । आकाशसे नीचे मुँह किये वह पृथ्वीपर इतने वेगसे गिरा, मानो कोई तारा टूट पड़ा हो । फिर उठकर चाणूरने श्रीकृष्णको जोरसे एक मुक्का मारा । उसके मुक्केकी मारसे परात्पर भगवान् श्रीकृष्ण विचलित नहीं हुए । उन्होंने तत्काल चाणूरको उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया । चाणूरके दाँत टूट गये । वह मदोन्मत्त मल्ल

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२०४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड क्रोधसे तमतमा उठा । मैथिल! उसने श्रीकृष्णकी छातीपर दोनों हाथोंसे मुक्के मारे । नरेश्वर! तब दोनों हाथोंसे उसके दोनों हाथ पकड़कर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने कंसके आगे उसे घुमाना आरम्भ किया और सबके देखते - देखते पृथ्वीपर उसी प्रकार दे मारा, जैसे किसी बालकने कमण्डलु पटक दिया हो । श्रीकृष्णके इस प्रहारसे चाणूर मल्लका मस्तक फट गया । राजन्! वह रक्त वमन करता हुआ तत्काल मर गया ॥ २–७३ ॥ इसी प्रकार महाबली बलदेवने रणदुर्गम मल्ल मुष्टिकके पैरको मुट्ठीसे पकड़कर आकाशमें घुमाया और जैसे गरुड सर्पको पटक दे, उसी प्रकार उसे पृथ्वीपर दे मारा । फिर तो मुष्टिक मुँहसे खून उगलता हुआ कालके गालमें चला गया । तत्पश्चात् कूटको सामने आया देख महाबली बलदेवने एक ही मुक्केसे उसी प्रकार मार गिराया, जैसे देवराज इन्द्रने वज्रसे किसी पर्वतको धराशायी कर दिया हो । राजन्! जैसे गरुड अपनी तीखी चोंचसे नागको घायल कर देता है, उसी प्रकार सामने आये हुए शलको नन्दनन्दनने लातसे मार गिराया । फिर तोशलको पकड़कर श्रीकृष्णने उसे बीचसे ही चीर डाला और जैसे हाथी किसी पेड़की डालीको तोड़ फेंके, उसी प्रकार उसे कंसके मञ्चके सामने फेंक दिया । ये सब मल्ल अखाड़े में गिराये जाते ही मौतके मुखमें चले गये और उनके शरीरसे निकली हुई ज्योतियाँ सत्पुरुषोंके देखते - देखते भगवान् वैकुण्ठ ( श्रीकृष्ण ) में समा गयीं ॥८-१३ ॥ इस प्रकार बलराम और श्रीकृष्णके द्वारा अनेक मल्लोंके मारे जानेपर शेष मल्ल भयसे व्याकुल हो प्राण बचानेकी इच्छासे भाग खड़े हुए । तदनन्तर श्रीदामा आदि अपने मित्र गोपको खींचकर माधवने उनके साथ समस्त सज्जनोंके सामने मल्लयुद्धका खेल आरम्भ किया । किरीट और कुण्डलधारी बलराम तथा श्रीकृष्णको ग्वाल - बालोंके साथ रङ्गभूमिमें विहार करते देख समस्त पुरवासी विस्मयसे चकित हो उठे । कंसके सिवा अन्य सब लोगोंके मुँहसे ' जय हो! जय हो ' की बोली निकलने लगी । सब ओरसे साधुवाद सुनायी देने लगा और नगारे बज उठे । अपनी पराजय देख कंस अत्यन्त क्रोधसे भर गया और बाजे बंद करनेकी आज्ञा देकर फड़कते हुए अधरोंसे बोला॥१४–१८ ॥ कंसने कहा - वसुदेवके दोनों पुत्र खोटी बुद्धि और खोटे विचारवाले हैं । इन दोनोंको हठात् और शीघ्र मेरे नगरसे निकाल दो । व्रजवासियोंका सारा धन हर लो और दुर्बुद्धि नन्दको सहसा कैद कर लो । आज मेरे दुर्बुद्धि पिता शूरपुत्र उग्रसेनका भी मस्तक तुरंत काट लो, काट लो । पृथ्वीपर जहाँ - कहीं भी और यहाँ भी जो - जो वृष्णिवंशी यादव मिल जायँ, उन सबको देवताओंके अंशसे उत्पन्न समझकर मार डालो ॥ १ ९ - २० ॥ नारदजी कहते हैं— जब कंस इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें बना रहा था, उस समय यदुनन्दन श्रीकृष्ण सहसा क्रोधसे भर गये और उछलकर उसके मञ्चके ऊपर चढ़ गये । अपनी मूर्तिमान् मृत्युको आता देख कंस तुरंत उठकर खड़ा हो गया और उस मदमत्त नरेशने श्रीकृष्णको डाँट बताते हुए ढाल - तलवार हाथमें ले ली । श्रीकृष्णने ढाल - तलवार लिये हुए कंसको सहसा दोनों हाथोंसे उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे पक्षिराज गरुडने अपनी चोंचके दो भागोंद्वारा किसी विषधर सर्पको दबा लिया हो । कंसके हाथसे तलवार छूटकर गिर गयी । ढाल भी दूर जा पड़ी । वह बलवान् वीर बल लगाकर श्रीकृष्णकी भुजाओंके बन्धनसे उसी प्रकार निकल गया, जैसे पुण्डरीक नाग गरुडकी चोंचसे छूट निकला हो ॥ २१ - २४ ॥ वे दोनों बलवान् वीर उस मञ्चपर वेगसे एक-दूसरेको रौंदते हुए उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे पर्वतके शिखरपर दो सिंह परस्पर जूझते हुए शोभा पा रहे हों । कंस बलपूर्वक उछलकर सौ हाथ ऊपर आकाशमें चला गया । फिर श्रीकृष्णने भी उछलकर उसे इस प्रकार पकड़ लिया, मानो एक बाज पक्षीने दूसरे बाज पक्षीको आकाशमें धर दबोचा हो । उस प्रचण्ड दैत्यपुंगव कंसको भुजदण्डोंसे पकड़कर तीनों लोकोंका बल धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने चारों ओर घुमाना आरम्भ किया । फिर रोषसे भरकर उन्होंने कंसको आकाशसे उस मञ्चपर ही दे मारा । मञ्चके स्तम्भ - दण्ड उसी प्रकार टूट गये, जैसे बिजली गिरनेसे वृक्ष टूट जाता है । आकाशसे नीचे गिरनेपर