गर्ग संहिता — पृष्ठ 211–220
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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अध्याय ८ ] चाणूरमुष्टिक आदि मल्लोंका तथा कंस और उसके भाइयोंका वध २०५ भी वज्रतुल्य अङ्गोंवाला कंस मन - ही - मन किंचित् व्याकुल होकर सहसा उठ गया और महात्मा श्रीकृष्ण-के साथ युद्ध करने लगा । भगवान् गोविन्दने पुनः उसे बाहुदण्डों द्वारा उठाकर मञ्चपर फेंक दिया और उसकी छातीपर चढ़कर माधवने उसका मुकुट उतार लिया । फिर तुरंत उसके केश पकड़कर स्वयं श्रीहरिने उसे मञ्चसे रङ्गभूमिमें उसी प्रकार पटक दिया, जैसे किसीने शैल - शिखरसे किसी भारी शिलाखण्डको नीचे गिरा दिया हो । फिर सबके आधारभूत, अनन्त - पराक्रमी, आदि - अन्तरहित, सनातन भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं भी उसके ऊपर वेगसे कूद पड़े ॥ २५-३२ ॥ राजन्! इस प्रकार उन दोनोंके गिरनेसे वहाँका भूमण्डल सहसा थालीकी भाँति गहरा हो गया और दो घड़ीतक धरती काँपती रही । नरेश्वर! श्रीकृष्णने उस मरे हुए भोजराजके शवको सबके देखते - देखते वहाँकी भूमिपर उसी प्रकार घसीटा, जैसे सिंहने मरे हुए गजराजको खींचा हो । नरेश्वर! उस समय इधर - उधर दौड़ते हुए भूपालोंका हाहाकार सुनायी देने लगा । महाबली कंसने वैर - भावसे देवेश्वर श्रीकृष्णका भजन करके उसी प्रकार उनका सारूप्य प्राप्त कर लिया, जैसे कीड़ा भृङ्गीके चिन्तनसे उसीका रूप ग्रहण कर लेता है ॥ ३३ - ३५ ॥ कंसको धराशायी हुआ देख उसके आठ महाबली भाई सुहुत, सृष्टि, न्यग्रोध, तुष्टिमान्, राष्ट्रपालक, सुनामा, कङ्क और शङ्कु - - क्रोधसे ओष्ठ फड़फड़ाते हुए ढाल और तलवार ले युद्ध करनेके लिये श्रीकृष्णपर टूट पड़े । उन्हें आते देख रोहिणीनन्दन बलरामने मुद्गर हाथमें लेकर उसी प्रकार उनके निकट हुंकार किया, जैसे सिंह मृगोंको देखकर दहाड़ता है । मिथिलेश्वर! उस हुंकारसे ही उनपर इतना भय छा गया कि उनके हाथोंसे शस्त्र उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे डंडा मारनेसे आमके फल गिरते हैं । निःशस्त्र होनेपर भी उन महावीरोंने बलरामको चारों ओरसे मुक्कोंद्वारा मारना आरम्भ किया- ठीक उसी तरह जैसे हाथी किसी पर्वतको अपनी सूँड़से इधर - उधरसे पीटते हों । बलरामजीने सृष्टि और सुनामाको मुद्गरसे मार डाला, न्यग्रोधको भुजाओंके वेगसे धराशायी कर दिया और कङ्कको बायें हाथसे मार गिराया । माधवने शङ्कु, सुहुत और तुष्टिमान्को बायें पैरसे कुचल दिया तथा राष्ट्रपालको दाहिने पैरके आघातसे कालके गालमें भेज दिया । इस प्रकार आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंकी भाँति वे आठों वीर सहसा धराशायी हो गये । विदेहराज! उन सबकी ज्योति भगवान्में लीन हो गयी ॥ ३६-४३ ॥ देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं । उस समय चारों ओर जय - जयकार होने लगी । देवतालोग उसी क्षण नन्दनवनके फूलोंकी वर्षा करने लगे । विद्याधरियाँ और गन्धर्वाङ्गनाएँ हर्षसे विह्वल हो नृत्य करने लगीं । विद्याधर, गन्धर्व और किंनर भगवान्का यश गाने लगे । ब्रह्मा आदि देवता, मुनि और सिद्ध विमानों-द्वारा भगवान्का दर्शन करनेके लिये आये । वे वैदिक मन्त्रोंका पाठ करते हुए दिव्य वाणीद्वारा बलराम और श्रीकृष्ण - दोनों भाइयोंकी स्तुति करने लगे ॥४४–४६ ॥ तदनन्तर कंसकी अस्ति - प्राप्ति आदि रानियाँ हाथोंसे छाती पीटती हुई महलसे बाहर निकलीं और प्राप्त हुए वैधव्यके दुःखसे दुःखी हो विलाप करने लगीं ॥४७ ॥
स्त्रियाँ बोलीं- हा नाथ! हे युद्धपते! हे महाबली वीर! तुम कहाँ चले गये? तुम तो त्रिभुवन-विजयी तथा साक्षात् देवताओंके लिये भी दुर्जय वीर थे । तुमने निर्दय होकर अपनी बहिनके नवजात बच्चों-की हत्या की थी और दस दिनसे कम और अधिक उम्रवाले दूसरे - दूसरे बालकोंका भी बलपूर्वक वध कर डाला; उसी घोर पापके कारण तुम ऐसी दशाको प्राप्त हुए हो ॥ ४८ - ५० ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार अश्रुसे भीगे मुखवाली दीन - दुःखी राजपत्नियोंको धीरज बँधाकर लोक - भावन भगवान्ने यमुनाके तटपर श्रीखण्ड - चन्दनसे युक्त चिताएँ बनवायीं और मारे गये मामाओंकी पारलौकिक क्रियाएँ करवाकर सबको समझाया ॥ ५१-५२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कंसका वध ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
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नवाँ अध्याय श्रीकृष्णद्वारा वसुदेव - देवकीकी बन्धनसे मुक्ति; श्रीकृष्ण और बलरामका गुरुकुलमें विद्याध्ययन तथा गुरुदक्षिणाके रूपमें गुरुके मरे हुए पुत्रको यमलोकसे लाकर लौटाना; श्रीअक्रूरको हस्तिनापुर भेजना तथा कुब्जाका मनोरथ पूर्ण करना श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम साक्षात् वृष्णिवंशियोंसे घिरे हुए देवकी और वसुदेवके समीप गये । नरेश्वर । अपने दोनों पुत्रोंको देखकर उन दोनोंके बन्धन उसी प्रकार स्वतः ढीले पड़ गये, जैसे गरुडको आया देख नागपाशके बन्धन स्वतः खुल जाते हैं ॥ १-२ ॥ बलरामसहित श्रीहरिने माता- पिताको अपने प्रभावके ज्ञानसे सम्पन्न देख तत्काल अपनी माया फैला दी, जो बलपूर्वक जगत्को मोह लेनेवाली है । बलराम और कृष्ण मेरे पुत्र हैं, यह जानकर वसुदेवजी मोहसे व्याकुल हो गये और आँसू बहाते हुए देवकीके साथ सहसा उठकर उन्होंने दोनों पुत्रोंको हृदयसे लगा लिया । तब वृष्णिवंशियोंसे घिरे हुए श्रीहरिने उन दोनोंको आश्वासन दे अपने नाना उग्रसेनको मथुराका राजा बना दिया । कंसके भयसे दूसरे देशोंमें भगे हुए यादवोंको बुलाकर भगवान्ने प्रेमपूर्वक उन्हें यदुपुरीमें कुटुम्बसहित रहनेके लिये स्थान दिया । गोपगणोंके साथ अपने घरको जानेके लिये उद्यत नन्दराजको प्रणाम करके बलरामसहित श्रीकृष्णने उन्हें अपनी मायासे मोहित - सा करते हुए कहा - ' तात! अब आप इसी मथुरापुरीमें निवास कीजिये । यदि आपके मनमें यहाँसे जानेकी इच्छा उठ खड़ी हुई हो, तो जाइये । मैं भी यदुवंशियोंकी व्यवस्था करके भैया बलरामके साथ आपके पास आ जाऊँगा ' ॥ ३८ ॥
नारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार बलराम और श्रीकृष्णके द्वारा पूजित एवं सम्मानित नन्दराज वसुदेवजीको हृदयसे लगाकर प्रेमातुर हो व्रजको चले गये । वसुदेवजीने श्रीकृष्णके जन्म नक्षत्रपर जो पहले दस लाख गोदान करनेका संकल्प किया था, उसे पूरा करनेके लिये उतनी गौओंको वस्त्र और मालाओंसे अलंकृत करके ब्राह्मणोंको दे दिया । फिर धर्मज्ञ वसुदेवने गर्गाचार्यको बुलाकर श्रीकृष्ण और बलभद्रका विधिवत् यज्ञोपवीत संस्कार करवाया । तदनन्तर समस्त विद्याओंका अध्ययन करनेके लिये उद्यत हो परमेश्वर बलराम और श्रीकृष्ण साधारण जनोंकी भाँति गुरु सांदीपनिके पास आये । गुरुकी उत्तम सेवा करके दोनों माधवोंने थोड़े ही समयमें सारी विद्याएँ पढ़ लीं और वे दोनों समस्त विद्वानोंके शिरोमणि हो गये । तत्पश्चात् वे दोनों भाई हाथ जोड़कर गुरुजीको दक्षिणा देनेके लिये उद्यत हुए । उस समय उन ब्राह्मण गुरुने उन दोनोंसे दक्षिणामें अपने मरे हुए पुत्रको माँगा । तब वे दोनों भाई सुनहरे साज - सामानोंसे युक्त रथपर आरूढ़ हो, मन-इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए प्रभास तीर्थमें समुद्रके निकट गये । दोनों ही भयानक पराक्रमी थे । उन्हें आया जान समुद्र तत्काल काँप उठा और रत्नोंकी उत्तम भेंट ले आकर, दोनों हाथ जोड़ उनके चरणप्रान्तमें पड़ गया । उससे भगवान्ने कहा- ' तुम मेरे गुरुदेवके पुत्रको शीघ्र ही लौटा दो । तुमने अपनी प्रचण्ड लहरोंके घटाटोपसे उस ब्राह्मण - बालकका अपहरण कर लिया था ' ॥९ –१७ ॥ समुद्र बोला- भगवन्! देवदेवेश्वर! मैंने उस ब्राह्मण - बालकका अपहरण नहीं किया है । उसका हरण तो शङ्खरूपधारी असुर पञ्चजनने किया है । वह बलिष्ठ दैत्यराज सदा मेरे उदरमें निवास करता है । देव! वह देवताओंके लिये भी भयकारक है, अतः आपको उसे जीत लेना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ नारदजी कहते हैं - समुद्रके यों कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपनी कमरमें दृढ़तापूर्वक वस्त्र बाँध लिया और वे भयंकर शब्द करनेवाले उस समुद्रमें बड़े वेग से कूद पड़े । विदेहराज! त्रिलोकीका भार धारण करनेवाले श्रीकृष्णके कूदनेसे वह समुद्र इस प्रकार अत्यन्त काँपने लगा, मानो वज्रकूट गिरिके द्वारा उसे मथ डाला गया हो । तब वीर पञ्चजन दैत्य युद्ध करनेके लिये सहसा श्रीकृष्णके सामने आया । उसने माधवपर अपना शूल चला दिया, किंतु उस शूलको हाथमें लेकर श्रीकृष्णने उसीके द्वारा उसपर आघात
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अध्याय ९ ] श्रीकृष्णद्वारा वसुदेव - देवकीकी बन्धनसे मुक्ति २०७ किया । उस आघातसे मूर्च्छित हो वह समुद्रमें गिर पड़ा । फिर सहसा उठकर कुछ व्याकुलचित्त हुए पञ्चजनने देवेश्वर श्रीहरिको इस प्रकार अपने मस्तक्से मारा, मानो किसी सर्पने पक्षिराज गरुडपर अपने फनसे प्रहार किया हो । तब साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीहरिने कुपित होकर बड़े वेगसे उसके मस्तकपर मुक्का मारा । श्रीकृष्णके मुक्केकी मारसे तत्काल उसके प्राणपखेरू उड़ गये । विदेहराज! उसके शरीरसे निकली हुई ज्योति घनश्याम श्रीकृष्णमें लीन हो गयी । इस प्रकार पञ्चजनको मारकर और उसके शरीरसे उत्पन्न शङ्खको साथ ले, वे श्रीकृष्ण सहसा महासागरसे निकले और रथपर आ बैठे ॥२० - २७ ॥ तदनन्तर मनोहर बलराम और श्रीकृष्ण वायुके समान वेगशाली रथके द्वारा यमराजकी विशाल पुरी संयमनीमें गये । वहाँ उन्होंने मेघ गर्जनाके समान भयंकर लोक - प्रचण्ड पाञ्चजन्यकी ध्वनि सब ओर फैला दी । उसे सुनकर सभासदोंसहित यमराज काँप उठे । यमपुरीके चौरासी लाख नरकोंमें पड़े हुए पापियोंमेंसे जिन - जिनके कानोंमें वह ध्वनि पड़ी, वे सब - के - सब मोक्ष पा गये । यमराज उसी क्षण पूजा और उपहारकी सामग्री लेकर श्रीकृष्ण - बलरामके चरणप्रान्तमें आ गिरे । वे उनके तेजसे पराभूत हो गये थे, अतः हाथ जोड़कर बोले ॥ २८-३१ ॥ यमराजने कहा – हे हरे! हे कृपासिन्धो! हे महाबली बलराम! आप दोनों असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति तथा परिपूर्णतम परमेश्वर हैं । आप दोनों देवता पुराण - पुरुष, सबसे महान्, सर्वेश्वर तथा सम्पूर्ण जगत्के लोगोंके अधीश्वर हैं । आज भी आप दोनों सबके ऊपर विराजमान हैं । परमेश्वरो! आप अपनी वाणीद्वारा हमें आज्ञा दें कि हमें क्या सेवा करनी है ॥ ३२-३३ ॥ १. हे हरे हे कृपासिन्धो राम राम महाबल । देवौ पुराणौ पुरुषौ महान्तौ सर्वेश्वरौ सर्वजगज्जनेशौ । २. युवाभ्यां रामकृष्णाभ्यां ताभ्यां नित्यं नमो नमः । लोकाभिरामौ जनभूषणोत्तमौ चान्तर्बहिः सर्वजगत्प्रदीपकौ । कंसादिदैत्येन्द्रविनाशहेतवे गोलोकलोकात् परिपूर्ण तेजसौ । श्रीभगवान् बोले - महामते लोकपाल यम! मेरे गुरुपुत्रको ले आओ और मेरी वाणीका आदर करते हुए कहीं भी न्यायोचित रीतिसे राज्य करो ॥३४ ॥
नारदजी कहते हैं - राजन्! उसी समय यमराजने गुरुपुत्रको ले आकर श्रीकृष्णके हाथमें साँप दिया । फिर साक्षात् श्रीहरि उसे लेकर अवन्तिकापुरीमें आये और उन्होंने श्रीगुरुको उनका वह शिशुपुत्र समर्पित कर दिया । फिर गुरुके आशीर्वादसे सम्भावित हो, उन दोनों भाइयोंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और वे रथपर चढ़कर मथुरापुरीमें आ गये । वहाँ यदुवंशियोंने उनका बड़ा सम्मान किया ॥३५-३६ ॥ एक दिन समस्त कारणोंके भी कारण श्रीकृष्ण अपने भक्त पाण्डवोंका स्मरण करते हुए बलरामजीके साथ अक्रूरके घर गये । नरेश्वर! अक्रूर सहसा उठकर खड़े हो गये और बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें हृदयसे लगाकर षोडश उपचारोंद्वारा उनका पूजन करके हाथ जोड़ सामने खड़े हो गये । उनका मनोरथ पूर्ण हो चुका था । उन्होंने प्रेमानन्दके आँसू बहाते हुए उनसे कहा ॥ ३७–३९ ॥ अक्रूर बोले- प्रभुओ! जिन्होंने मार्गमें, मैंने जो कुछ कहा या सोचा था, वह सब पूर्ण कर दिया, उन्हीं आप दोनों - बलराम और श्रीकृष्णको मेरा नित्य बारंबार नमस्कार है । आप दोनों समस्त लोकोंमें सर्वाधिक सुन्दर हैं । जन - भूषणोंमें भी उत्तम हैं । सम्पूर्ण जगत्को बाहर और भीतरसे भी प्रकाशित करनेवाले हैं । इस समय गौ, ब्राह्मण, साधु, वेद, धर्म तथा देवताओंकी रक्षाके लिये आप दोनों यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं । परिपूर्ण तेजस्वी आप दोनों परमेश्वर कंसादि दैत्योंका विनाश करनेके लिये गोलोकधामसे भारतवर्षके भूमण्डलमें पधारे हैं । मैं नित्य-निरन्तर आप दोनोंको प्रणाम करता ' ॥ ४०-४२ ॥ असंख्यब्रह्माण्डपती परिपूर्णतम युवाम् ॥ अद्यैव सर्वोपरिवर्तमानौ गिरा निजाज्ञां वदतं परेशौ ॥ ( गर्ग ० मथुरा ० ९ । ३२-३३ ) याभ्यां मार्गे यदुक्तं मे पूर्ण तच्च कृतं प्रभू ॥ गोविप्रसाधु श्रुतिधर्मदेवतारक्षार्थमद्यैव यदोः कुले गतौ ॥ समागतौ भारतभूमिमण्डले युवां परेशौ सततं नतोऽस्म्यहम् ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० ९।४०-४२ )
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२०८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड श्रीभगवान् बोले- आप हमारे बड़े - बूढ़े गुरुजन और धैर्यवान् हैं । मैं आपके आगे बालक हूँ । महामते! संत पुरुष कभी अपनी बड़ाई नहीं करते । दानपते! पाण्डवोंका कुशल- समाचार जाननेके लिये आप शीघ्र हस्तिनापुर जाइये और वहाँ उन सबसे मिल - जुलकर लौट आइये ॥४३-४४ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! उस समय अक्रूरसे यों कहकर समस्त कार्योंका सम्पादन करनेवाले भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वसुदेवजीके भवनमें लौट आये । उधर अक्रूर कौरवेन्द्रपुरी हस्तिनापुरमें जाकर पाण्डवोंसे मिले और पुनः वहाँसे लौटकर उन्होंने श्रीकृष्णसे सारा समाचार कह सुनाया ॥ ४५-४६ ॥ अक्रूरने कहा - भगवन्! पाण्डव लोग कौरवोंके दिये हुए दुःख भोग रहे हैं । आप दोनोंके सिवा दूसरा कोई भी उनकी सहायता करनेवाला नहीं है । पाण्डुके मर जानेपर पृथाके सभी पुत्र आप दोनोंके चरणारविन्दोंमें ही चित्त लगाये बैठे हैं ॥ ४७ ॥
नारदजी कहते हैं- राजन्! अक्रूरजीके मुखसे यह समाचार सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कौरवोंका इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके आधा राज्य बलपूर्वक पाण्डवोंको दे दिया । तदनन्तर अपनी कही हुई बातको याद करके भगवान् श्रीकृष्ण उद्धवको साथ ले कुब्जाके महामङ्गलसंयुक्त भवनमें गये । श्रीहरिको आया देख परमरूपवती कुब्जाने तुरंत ही भक्तिभावसे पाद्य आदि उपचार समर्पित करके अपने प्राणवल्लभका पूजन किया । कुब्जाके उत्तम भवनकी दीवारोंमें सोने और रत्न जड़े गये थे । उस रूपवती रमणीके साथ श्रीहरि उसी प्रकार शोभित हुए, जैसे वैकुण्ठधाममें रमाके साथ रमापति विष्णु शोभा पाते हैं । राजन्! साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं जिस सैरन्ध्रीके पति हो गये, उसका महान् तप कैसा आश्चर्यजनक है । विदेहराज! वहाँ लीलासे मानव-शरीर धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरि आठ दिनोंतक टिके रहकर नवें दिन वसुदेवजीके भवनमें लौट आये । विदेहनरेश! मथुरामें इस प्रकार जो श्रीकृष्णका चरित्र है, वह समस्त पापको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा आयुकी वृद्धिका उत्तम साधन है । वह मनुष्योंको चारों पदार्थ देनेवाला तथा श्रीकृष्णको भी वशमें कर लेनेवाला है । तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुमसे कह सुनाया । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ४८–५५ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' यदुसौख्य ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय धोबी, दर्जी और सुदामा मालीके पूर्वजन्मका परिचय बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! आपके मुखसे मैंने भगवान् श्रीकृष्णके पावन चरित्रका श्रवण किया, किंतु पुनः अधिकाधिक सुननेकी इच्छा हो रही है । जैसे प्यासा प्राणी जलकी इच्छा करता है, उसी तरह मेरा मन आज श्रीकृष्ण चरित्रको सुनना चाहता है । आपने कंसके जन्म - कर्मोंका वर्णन किया और मैंने सुना । केशी आदि बड़े - बड़े दैत्योंके पूर्वजन्मकी बातें भी मैंने सुनीं । अब यह जानना चाहता हूँ कि अहो! जिसकी महती ज्योति श्रीकृष्णमें लीन हुई, वह धोबी पूर्वजन्ममें कौन था? और श्रीहरिने उसका वध क्यों किया? ॥ १-३ ॥ नारदजीने कहा- विदेहराज! त्रेतायुगकी बात है, अयोध्यापुरीमें श्रीरामचन्द्रजी राज्य करते थे । उनके राज्यकालमें प्रजाकी मनोवृत्ति एवं दुःख - सुख जाननेके लिये गुप्तचर घूमा करते थे । एक दिन उन गुप्तचरोंके सुनते हुए किसी धोबीने अपनी भार्यासे कहा — ' तू दुष्टा है और दूसरेके घरमें रहकर आयी है; इसलिये अब तुझे मैं नहीं रखूँगा । स्त्रीके लोभी राजा राम भले
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अध्याय १० ] धोबी, दर्जी और सुदामा ही सीताको रख लें, किंतु मैं तुझे नहीं स्वीकार करूँगा । ' इस प्रकार बहुत - से लोगोंके मुखसे आक्षेपयुक्त बात सुनकर श्रीराघवेन्द्रने लोकापवादके भयसे सहसा सीताको वनमें त्याग दिया । रघुकुल -तिलक श्रीरामने उस धोबीको दण्ड देनेकी इच्छा नहीं की । वही द्वापरके अन्तमें मथुरापुरीमें फिर धोबी ही हुआ । उसने सीताके प्रति जो कुवाच्य कहा था, उस दोषकी शान्तिके लिये श्रीहरिने स्वयं ही उसका वध किया, तथापि उन श्रीकरुणानिधिने उस धोबीको मोक्ष प्रदान किया । राजन्! दयालु श्रीकृष्णचन्द्रका यह परम अद्भुत चरित्र मैंने तुमसे कहा । अब पुनः क्या सुनना चाहते हो? ॥ ४ - ९ ॥ बहुलाश्वने पूछा — मुनिश्रेष्ठ! पूर्वजन्ममें वह दर्जी कौन था, जिसे भगवान् श्रीकृष्णने अपना सारूप्य प्रदान किया? ॥ १० ॥
श्रीनारदजीने कहा- राजन्! पहले मिथिला-पुरीमें एक दर्जी था, जो भगवान् श्रीहरिके प्रति भक्तिभाव रखता था । उसने श्रीरामके विवाहके समय राजा सीरध्वज जनककी आज्ञासे श्रीराम और लक्ष्मणके दूलह - वेषके लिये महीन डोरोंसे कपड़े सीये थे । वह वस्त्र सीनेकी कलामें अत्यन्त कुशल था । राजन्! करोड़ों कामदेवोंके समान लावण्यवाले सुन्दर श्रीराम और लक्ष्मणको देखकर वह महामनस्वी दर्जी मोहित हो गया था । उसने मन - ही - मन यह इच्छा की कि मैं कभी अपने हाथोंसे इनके अङ्गोंमें वस्त्र पहिनाऊँ । श्रीरघुनाथजी सर्वज्ञ हैं । उन्होंने मन - ही - मन उसे वर दे दिया कि ' द्वापरके अन्तमें भारतीय व्रज-मण्डलमें तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा । ' श्रीरामचन्द्रजीके वरदानसे वही यह दर्जी मथुरामें प्रकट हुआ था, जिसने उन दोनों बन्धुओंकी वेष- रचना करके उनका सारूप्य प्राप्त कर लिया ॥ ११–१६ ॥ मालीके पूर्वजन्मका परिचय २० ९ बहुलाश्वने पूछा — ब्रह्मन्! सुदामा मालीने, जिसके घरमें परम मनोहर बलराम और श्रीकृष्ण स्वयं पधारे थे, कौन - सा पुण्य किया था? बताइये ॥ १७ ॥
नारदजीने कहा- राजन्! राजराज कुबेरका एक परम रमणीय सुन्दर वन है, जो चैत्ररथ - वनके नामसे प्रसिद्ध है । उसमें फूल लगानेवाला एक माली था, जो हेममालीके नामसे पुकारा जाता था । वह भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर, शान्त, दानशील तथा महान् सत्सङ्गी था । उसने भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये देवताओंकी पूजा की । पाँच हजार वर्षोंतक प्रतिदिन तीन सौ कमल - पुष्प लेकर वह भगवान् शंकरके आगे रखता और उन्हें प्रणाम करता था । एक समय करुणानिधि त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर उसके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न हो बोले – ' परम बुद्धिमान् मालाकार! तुम इच्छानुसार वर माँगो । ' तब हेम-मालीने हाथ जोड़कर महादेवजीको नमस्कार किया और परिक्रमा करके उनके सामने खड़ा हो मस्तक झुकाकर कहा ॥ १८-२२ ॥ हेममाली बोला – भगवन्! परिपूर्णतम प्रभु श्रीकृष्ण कभी मेरे घर पधारें और मैं इन नेत्रोंसे उनका प्रत्यक्ष दर्शन करूँ - ऐसी मेरी इच्छा है । आपके वरदानसे मेरी यह अभिलाषा पूर्ण हो ॥ २३ ॥
श्रीमहादेवजीने कहा – महामते! द्वापरके अन्तमें भारतवर्षकी मथुरापुरीमें तुम्हारा यह मनोरथ सफल होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
नारदजी कहते हैं - राजन्! महादेवजीके वरदानसे वह महामना हेममाली ही द्वापरके अन्तमें सुदामा माली हुआ था । इसीलिये साक्षात् बलराम और श्रीकृष्ण भगवान् शिवकी वाणी सत्य करनेके लिये उसके घर पधारे थे । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' धोबी, दर्जी और सुदामा मालीका उपाख्यान ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
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ग्यारहवाँ कुब्जा और कुवलयापीडके श्रीबहुलाश्वने पूछा— देवर्षे! सैरन्ध्रीने पूर्व -कालमें कौन - सा परम दुष्कर तप किया था, जिससे देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ भगवान् श्रीकृष्ण उसपर रीझ गये? ॥ १ ॥
नारदजीने कहा— राजन्! करोड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर श्रीरामचन्द्रजी जब पञ्चवटीमें रहते थे, उस समय शूर्पणखा नामक राक्षसी उन्हें देखकर अत्यन्त मोहित हो गयी । ' श्रीरघुनाथजी एकपत्नीव्रतके पालनमें तत्पर हैं, अतः इनके मनमें दूसरी किसी स्त्रीके प्रति मोह नहीं है ' – यह विचारकर रावणकी बहिन क्रोधसे सीताको खा जानेके लिये दौड़ी । उस समय श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मणने रुष्ट होकर तीखी धार-वाली तलवारसे तत्काल उसकी नाक और कान काट लिये । नाक कट जानेपर उसने लङ्कामें जाकर रावणको यह सब समाचार बता दिया और स्वयं अत्यन्त खिन्न -चित्त होकर वह पुष्कर - तीर्थमें चली गयी । वहाँ जलमें खड़ी हो भगवान् शंकरका ध्यान तथा श्रीरामको पति-रूपमें पानेकी कामना करती हुई शूर्पणखाने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की । इससे प्रसन्न हो देवाधिदेव भगवान् उमापति पुष्कर तीर्थमें आकर बोले- ' तुम वर माँगो ' ॥ २ – ७ ॥ शूर्पणखाने कहा - परम देवदेव! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ हैं; अतः मुझे यह वर दीजिये कि सत्पुरुषोंके प्रिय श्रीरामचन्द्रजी मेरे पति हों ॥ ८ ॥
शिवने कहा- राक्षसी! सुनो । यह वर तुम्हारे लिये अभी सफल नहीं होगा । द्वापरके अन्तमें मथुरा -पुरीमें तुम्हारी यह कामना पूरी होगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥
नारदजी कहते हैं- राजन्! महामते! वही इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली शूर्पणखा नामक राक्षसी श्रीमथुरापुरीमें ' कुब्जा ' नामसे प्रसिद्ध हुई थी । महादेवजीके वरसे ही वह श्रीकृष्णकी प्रिया हुई । अध्याय पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें बताया । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥१०-११ ॥ बहुलाश्व बोले- नारदजी! यह कुवलयापीड पूर्वजन्ममें कौन था? कैसे हाथीकी योनिको प्राप्त हुआ? और किस पुण्यसे भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हुआ? ॥१२ ॥
नारदजीने कहा- राजा बलिके एक विशालकाय एवं बलवान् पुत्र था, जिसका नाम था —मन्दगति । वह समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा एक लाख हाथियोंके समान बलशाली था । एक समय श्रीरङ्गनाथकी यात्रा-के लिये वह घरसे निकला और जन - समुदायमें सम्मिलित हो गया । मन्दगति मतवाले हाथीके समान वेगसे भुजाएँ हिलाहिलाकर लोगोंको कुचलता जा रहा था । रास्तेमें उसकी भुजाओंके वेगसे बूढ़े त्रित मुनि गिर पड़े । उन्होंने कुपित होकर उस मतवाले बलिष्ठ बलिकुमारको शाप दे दिया ॥ १३–१५ ॥ त्रितने कहा – ' दुर्मते! तू हाथीके समान मदोन्मत्त होकर रङ्ग - यात्रामें लोगोंको कुचलता जा रहा है, अतः हाथी हो जा । ' इस प्रकार शाप मिलनेपर वह बलवान् दैत्य मन्दगति तत्काल और उसका शरीर केंचुलकी भाँति गिरा । मुनिके प्रभावको जाननेवाले ही हाथ जोड़ प्रणाम और परिक्रमा कहा ॥ १६–१८ ॥ मन्दगति बोला- हे मुने! द्विजोंमें श्रेष्ठ योगीन्द्र हैं । इस तेजोभ्रष्ट हो गया छूटकर नीचे जा उस दैत्यने तुरंत करके त्रित मुनिसे कृपासिन्धो! आप गज- योनिसे मुझे कब छुटकारा मिलेगा, यह मुझे शीघ्र बताइये । मुने! आजसे आप जैसे महात्माओंकी अवहेलना मेरे द्वारा कभी नहीं होगी । ब्रह्मन्! आप - जैसे मुनि वर और शाप - दोनोंको देनेमें समर्थ हैं ॥१ ९ -२० ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! उस दैत्यद्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जानेपर महामुनि त्रितका क्रोध दूर हो गया । फिर उन कृपालु ब्राह्मण - शिरोमणिने उस
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अध्याय १२ ] चार आदि मल्ल तथा पञ्चजन दैत्यके पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन २११ दैत्यसे कहा ॥ २१ ॥
त्रित बोले- दैत्यराज! मेरी बात झूठी नहीं हो सकती, तथापि तुम्हारी भक्तिसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ । इसलिये तुम्हें ऐसा दिव्य वर प्रदान करूँगा, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है । दैत्येन्द्र! शोक न करो । श्रीहरिकी नगरी मथुरामें श्रीकृष्णके हाथसे तुम्हारी मुक्ति होगी, इसमें संशय नहीं है ॥ २२-२३ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! वही यह मन्दगति इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत दैत्य विन्ध्यपर्वतपर कुवलयापीड नामसे विख्यात हाथी हुआ, जो बलमें अकेला ही दस हजार हाथियोंके समान था । उसे मगधराज जरासंधने लाख हाथियोंके द्वारा वनमें पकड़ा । विदेहराज! फिर उसने कंसको दहेजमें वह हाथी दे दिया । त्रित मुनिके कथनानुसार उसका तेज श्रीकृष्णमें लीन हुआ । यह प्रसङ्ग मैंने तुमसे कहा, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २४–२६ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कुब्जा और कुवलयापीडके पूर्वजन्मका वर्णन ' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११ ॥
बारहवाँ अध्याय चाणूर आदि मल्ल, कंसके छोटे भाइयों तथा पञ्चजन दैत्यके पूर्वजन्मगत वृत्तान्तका वर्णन बहुलाश्व बोले – चाणूर आदि जो मल्ल थे, वे पूर्वजन्ममें कौन थे, जो यहाँ मथुरापुरीमें आये थे? अहो! उनका कैसा सौभाग्य है कि साक्षात् श्रीकृष्ण-चन्द्रके साथ उन्हें युद्धका अवसर मिला ॥ १ ॥
नारदजीने कहा- राजन्! पूर्वकालमें अमरावतीपुरीमें उतथ्य नामसे प्रसिद्ध महामुनि निवास करते थे । उनके पाँच पुत्र हुए, जो कामदेवके समान कान्तिमान् थे । उन लोगोंने विद्या, स्वाध्याय और जप छोड़कर मदसे उन्मत्त हो राजा बलिके यहाँ जाकर प्रतिदिन मल्लयुद्धकी शिक्षा लेनी आरम्भ की । अपने पुत्रोंको ब्राह्मणोचित कर्मसे सर्वथा भ्रष्ट, वेदाध्ययनसे रहित तथा मदमत्त हुआ देख मुनिश्रेष्ठ उतथ्यने रोषपूर्वक उनसे कहा ॥ २-४ ॥ उतथ्य बोले- शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान तथा आस्तिकता - ये ब्राह्मण-के स्वाभाविक कर्म हैं । शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्धभूमिमें पीठ न दिखाना, दान तथा ऐश्वर्य – ये क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं । कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य - ये वैश्यके स्वभावजकर्म हैं तथा सेवात्मक कर्म शूद्रके लिये भी स्वाभाविक है । दुर्जनो! तुमलोग ब्राह्मणके पुत्र होकर भी ब्राह्मणोचित कर्मसे दूर रहकर क्षत्रियोचित मल्लयुद्धका कार्य कैसे करते हो? अतः तुमलोग भारतभूमिपर मल्ल हो जाओ और असुरोंके सङ्गसे शीघ्र ही दुर्जन बन जाओ ॥ ५ - ९ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! वे उतथ्यके पुत्र ही पृथ्वीपर मल्लोंके रूपमें उत्पन्न हुए । नरेश्वर! उन्होंने श्रीकृष्णके शरीरका स्पर्श करनेमात्रसे परम मोक्ष प्राप्त कर लिया । इस प्रकार मैंने चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल - इन मल्लोंके पूर्वचरित्रका वर्णन किया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १०-११ ॥ बहुलाश्वने पूछा – मुने! कंसके छोटे भाई जो कङ्क, न्यग्रोध आदि आठ योद्धा थे, वे सब पूर्वजन्ममें कौन थे? जो कि परम मोक्षको प्राप्त हुए, यह बताइये! ॥ १२ ॥
नारदजीने कहा- राजन्! पूर्वकालकी बात है, कुबेरकी राजधानी अलकामें ' देवयक्ष ' नामसे प्रसिद्ध एक यक्ष रहता था । वह ज्ञानी, ज्ञानपरायण, शिव-भक्तिसे सम्मानित तथा महातेजस्वी था । उसके आठ पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं- देवकूट, महागिरि, गण्ड, दण्ड, प्रचण्ड, खण्ड, अखण्ड और पृथु । एक दिन शिवपूजाके निमित्त अरुणोदयकी वेलामें एक सहस्र पुण्डरीक - पुष्प लानेके लिये
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२१२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड देवयक्षकी आज्ञा पाकर वे सब गये । उन्होंने भ्रमरोंके गुञ्जारवसे युक्त सहस्र कमल - पुष्प मानसरोवरसे लाकर, उनकी गन्धको लोभसे सूँघकर पिताको अर्पित किये । फूलोंको उच्छिष्ट करनेके दोषसे शिवपूजासे तिरस्कृत हुए वे मूढ़ यक्ष तीन जन्मोंके लिये असुरयोनिको प्राप्त हुए । मिथिलेश्वर! विदेहराज! बलदेवजीके कल्याणकारी हाथोंसे मारे जाकर वे दोष -से मुक्त हो गये और परम मोक्षको प्राप्त हुए । नरेश्वर! कंसके छोटे भाइयोंके पूर्वजन्मका यह वृत्तान्त मैंने कहा, तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥१३ – १ ९ ॥ बहुलाश्वने पूछा — ब्रह्मन्! यह शङ्खरूपधारी दैत्य पञ्चजन पूर्वजन्ममें कौन था, जिसकी अस्थियों-का शङ्ख भगवान् श्रीकृष्णके करकमलमें सुशोभित हुआ? ॥२० ॥
नारदजी कहते हैं — विदेहराज! पूर्वकालसे ही ये चक्र आदि त्रिलोकीनाथ श्रीहरिके उपाङ्ग रहे हैं । वे सब - के - सब उनके तेजसे संगृहीत हुए थे । राजन्! उनमेंसे पाञ्चजन्य शङ्खको बड़ी ऊँची पदवी प्राप्त हुई । वह श्रीकृष्णके मुँहसे लगकर उनके अधरामृतका पान किया करता था ॥ २१-२२ ॥ एक दिन शङ्खराजने मन - ही - मन मानका अनुभव किया और इस प्रकार कहा – ' मेरी कान्ति राजहंसके समान श्वेत है । मुझे साक्षात् श्रीहरिने अपने हाथोंसे गृहीत किया है । मैं दक्षिणावर्त शङ्ख हूँ और युद्धमें विजय प्राप्त होनेपर श्रीकृष्ण मुझे बजाया करते हैं । भगवान् श्रीकृष्णका जो अधरामृत क्षीरसागर - कन्या लक्ष्मीके लिये भी दुर्लभ है, उसे मैं दिन - रात पीता रहता हूँ, अतः मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ । ' विदेहराज! इस प्रकार मान प्रकट करते हुए पाञ्चजन्य शङ्खको लक्ष्मीने क्रोधपूर्वक शाप दिया – ' दुर्मते! तू दैत्य हो जा । ' वही शङ्खराज समुद्रमें यह पञ्चजन नामक दैत्य हुआ था, जो वैरभावसे भजनके कारण पुनः देवेश्वर श्रीहरि -को प्राप्त हुआ । उसकी ज्योति देवेश्वर श्रीकृष्णमें लीन हो गयी और अब वह उन्हींके हाथमें शोभा पाता है । उस शङ्खराजका सौभाग्य अद्भुत है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २३-२७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' चाणूर आदि मल्लों, कंसके भाइयों तथा पञ्चजन दैत्यके पूर्वजन्मका उपाख्यान ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय श्रीकृष्णकी आज्ञासे उद्धवका व्रजमें जाना और श्रीदामा आदि सखाओंका उनसे श्रीकृष्ण - विरहके दुःखका निवेदन बहुलाश्वने पूछा – मुनिश्रेष्ठ! अपने कुटुम्बीजनों तथा जाति - भाइयोंको मथुरापुरीमें निवास देकर यदु-कुल - तिलक श्रीकृष्णने आगे चलकर कौन - कौन - सा कार्य किया? ॥ १ ॥
नारदजीने कहा- राजन्! साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् भक्तवत्सल श्रीकृष्णने गोपी और गोपगणोंसे भरे हुए दीन - दुःखी गोकुलका स्मरण किया । अतः एक दिन एकान्तमें अपने सखा भक्त उद्धवको बुलाकर भगवान्ने प्रेमगद्गद वाणीमें कहा ॥ २-३ ॥ श्रीभगवान् बोले – हे सखे! लता - कुओंके समुदाय आदिसे अलंकृत सुन्दर व्रजमण्डलमें शीघ्र ही जाओ । गोवर्धन और यमुनाकी शोभासे मनोहर वृन्दावनमें तथा गोप - गोपियोंसे भरे हुए गोकुलमें भी पधारो । मित्र! मेरा एक पत्र तो नन्दबाबाको देना और दूसरा यशोदा मैयाके हाथमें देना । सखे! तीसरा पत्र श्रीराधिकाको उनके सुन्दर मन्दिरमें जाकर देना और चौथा मेरे सखा ग्वालबालोंको मेरा शुभ कुशल-समाचार निवेदन करते हुए देना । इसी प्रकार अत्यन्त मोहित हुई गोपाङ्गनाओंके सैकड़ों यूथोंको पृथक्-पृथक् पत्र देने हैं । मेरे पिता नन्दराज बड़े दयालु हैं । उनका मन मुझमें ही लगा रहता है और मेरी मैया यशोदा शीघ्र ही अपने पास बुलानेके लिये मेरा स्मरण
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अध्याय १३ ] श्रीकृष्णकी आज्ञासे उद्धवका व्रजमें जाना २१३ करती हैं । तुम तो नीतिशास्त्रके विद्वान् हो; सुन्दर सुन्दर बातें सुनाकर उन दोनोंके हृदयमें मेरी परम प्रीति धारण कराना । मेरी प्राणवटल्लभा राधिका मेरे वियोगसे आतुर है और मेरे बिना मोहवश सारे जगत्को सूना समझती है । उन सबको मेरे वियोगके कारण जो मानसिक व्यथा हो रही है, उसे मेरे संदेश - वचनोंद्वारा शान्त करो; क्योंकि तुम बातचीत करनेमें बड़े कुशल हो । सुदामा आदि ग्वाल - बाल मेरे प्रिय सखा हैं । मुझ अपने मित्रके बिना वे भी मोहसे आतुर हैं, तुम उन्हें भी मित्रकी तरह सुख देना । मैं थोड़े ही समयमें श्रीव्रज -धाममें आऊँगा । गोपाङ्गनाएँ मेरे वियोगकी व्यथाके व्याकुल हैं । उनका मन मुझमें ही लगा हुआ है । उनके शरीर और प्राण भी मुझमें ही स्थित हैं । मन्त्रि-प्रवर! जिन्होंने मेरे लिये अपने लोक - परलोक सब त्याग दिये हैं, उन अबलाओंका भरण - पोषण मैं स्वतः कैसे नहीं करूँगा । उद्धव! वे मेरे आते समय प्राण त्याग देनेको उद्यत थीं । वे आज भी बड़ी कठिनाईसे प्राण धारण करती हैं । मेरे वियोगसे उत्पन्न उनकी मानसिक व्यथाको तुम मेरे संदेश - वचनोंके द्वारा शान्त करो; क्योंकि वार्तालापकी कलामें तुम परम कुशल हो । सखे! मैं पहले जिस रथपर आरूढ़ होकर व्रजसे आया था, उसी रथको, उन्हीं घोड़ों, सारथि और बजती हुई घण्टिकाओंसे सुसज्जित करके अपने साथ ले जाओ । मेरे समान ही रूप बना लो । अभी पीताम्बर, वैजयन्ती माला, सहस्रदल कमल, दिव्य रत्नोंकी प्रभासे मण्डित कुण्डल तथा कोटि बालरवियोंके समान उद्दीप्त कौस्तुभमणि भी धारण कर लो । मेरी उच्चस्वरसे बजनेवाली मनोहर बाँसुरी तथा फूलोंसे सजी हुई जगन्मोहिनी यष्टि ( छड़ी ) भी ले लो । उद्धव! मेरे ही समान दिव्य सुगन्धसे आवृत सुन्दर चन्दन, मोरपंख और बजते हुए नूपुरोंसे युक्त नटवर वेष धारण कर लो । इसी तरह मेरा ही मोरपंखका मुकुट तथा दोनों बाजूबंद धारण करके मेरे आदेशसे अभी यथासम्भव शीघ्र जाओ, जाओ ॥४–१४ ॥ नारदजी कहते हैं—- राजन्! श्रीकृष्णके यों कहनेपर उद्धवने शीघ्र ही हाथ जोड़कर उनको नमस्कार किया और उनकी परिक्रमा करके रथपर आरूढ़ हो वे व्रजकी ओर चल दिये, जहाँ कोटि - कोटि मनोहर गौएँ दिव्य भूषणोंसे विभूषित हो श्वेत पर्वतके समान दिखायी देती थीं । वे सब - की - सब दूध देनेवाली तरुणी ( कलोर ), सुशीला, सुरूपा और सद्गुणवती थीं । उनके साथ बछड़े भी थे । उनकी पूँछके बाल पीले थे । चलते समय उनकी मूर्तियाँ बड़ी भव्य दिखायी देती थीं । गलेके घंटों और पैरोंके मञ्जीरोंका झंकार होता रहता था । वे किङ्किणियों ( क्षुद्र - घण्टिकाओं ) के जालसे मण्डित थे । कितनी ही गौएँ सुवर्णके समान रंगवाली थीं । उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था तथा नाना प्रकारके हारों और मालाओंसे अलंकृत हुई उन गौओंकी प्रभा सब ओर छिटक रही थी । कोई लाल, कोई हरी, कोई ताँबेके रंगवाली, कोई पीली, कोई श्यामा और कोई चितकबरी थी । उस व्रजमें धूम्रवर्ण और कोयलके-से काले रंगकी भी गौएँ दृष्टिगोचर होती थीं । तात्पर्य यह कि उस व्रजभूमिमें अनेकानेक रंगवाली गौएँ परिलक्षित होती थीं । वे समुद्रकी तरह अथाह दूध देनेवाली थीं । उनके अङ्गोंपर तरुणी स्त्रियोंके हाथोंके छापे लगे हुए थे । हिरनकी भाँति चौकड़ी भरनेवाले बछड़े उन सुन्दर गौओंकी शोभा बढ़ा रहे थे । उन गौओंके झुंडमें बड़े - बड़े साँड़ इधर - उधर चलते दिखायी देते थे, उनके कंधे और सींग बड़े - बड़े थे । वे सब - के - सब धर्मधुरंधर थे । गोपगण हाथोंमें बेंतकी छड़ी और बाँसुरी लिये हुए थे । उनकी अङ्गकान्ति श्याम दिखायी देती थी । वे कामदेवोंको भी मोहित करनेवाली रागोंमें श्रीकृष्ण - लीलाओंका उच्चस्वरसे गान कर रहे थे । उद्धवको दूरसे आते देख उन्हें कृष्ण समझकर व्रजके बालक श्रीकृष्णदर्शनकी लालसासे परस्पर इस प्रकार कहने लगे ॥ १५ - २३ ॥ गोप बोले- मित्र! ये नन्दनन्दन आ रहे हैं, जो हमारे प्रिय सखा हैं; निस्संदेह वे ही हैं । मेघके समान श्यामकान्ति, शरीरपर पीताम्बर, गलेमें वैजयन्ती माला तथा कानोंमें रत्नमय कुण्डल इनकी शोभा बढ़ाते हैं । वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि, हाथोंमें गोल - गोल कड़े शोभा दे रहे हैं । हाथमें सहस्रदल कमल धारण करके माथेपर वही मुकुट पहने हुए हैं,
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२१४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड जो करोड़ों मार्तण्डोंके तेजको तिरस्कृत कर देता है । वे ही घोड़े और वही किङ्किणीजालसे मण्डित रथ है । इस रथपर बलदेवजी नहीं हैं, अकेले नन्दनन्दन ही
दिखायी देते हैं । २४–२६ ॥
नारदजी कहते हैं— विदेहराज! इस प्रकार बातें करते हुए श्रीदामा आदि गोपाल कृष्णकी ही आकृति धारण करनेवाले कृष्ण- सखा उद्धवके पास रथके चारों ओरसे आ गये । निकट आनेपर वे बोले-• ' श्रीकृष्ण तो नहीं हैं; किंतु साक्षात् उनके ही समान आकृतिवाला यह पुरुष कौन है? ' इस तरह बोलते हुए उन गो - पालोंको नमस्कार करके उद्धवने उन सबको हृदयसे लगाया और की चर्चा आरम्भ की ॥ उद्धव बोले-श्रीकृष्णका दिया हुआ तुम इसे ग्रहण करो न करो । साक्षात् श्रीहरि का महान् कार्य सिद्ध अपने स्वामी श्यामसुन्दर -२७-२८ ॥ श्रीदामन्! यह तुम्हारे सखा पत्र है, इसमें संशय नहीं है; । ग्वाल - बालोंसहित तुम शोक सकुशल हैं । वे भगवान् यादवों-करके बलरामजीके साथ थोड़े ही दिनोंमें यहाँ आयेंगे ॥ २ ९ -३० ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! उनके हाथके दिये हुए पत्रको पढ़कर श्रीदामा आदि व्रजके बालक बहुत आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले ॥ ३१ ॥
गोपोंने कहा- हे पथिक! निर्मोही नन्दनन्दन-में ही हमारा तन, वैभव, धन, बल और समस्त अन्तः-करण लगा हुआ है । श्रीकृष्णके बिना हमारा व्रज ही नहीं शून्य हुआ है, हमारे लिये सारा संसार सूना हो गया है । महामते! श्रीहरिके बिना उनके वियोगके दुःखसे हम व्रजवासियोंके लिये एक - एक क्षण युगके समान, एक - एक घड़ी मन्वन्तरके तुल्य, एक - एक प्रहर कल्पके समान तथा एक - एक दिन द्विपरार्धके सदृश हो गया है । उद्धव! हम दिन रात उसे भुला नहीं पाते । हमारे जीवनमें वह कैसी दुष्ट घड़ी आयी थी, जिसमें श्यामसुन्दर यहाँसे चले गये । यद्यपि हम मित्रताके नाते सदा उनका अपराध करते रहे हैं, तथापि हम वनवासियोंके मनको उन्होंने सदाके लिये हर लिया ॥ ३२ –३४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' उद्धवका आगमन ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय उद्धवका श्रीकृष्ण - सखाओंको आश्वासन; नन्द और यशोदासे बातचीत तथा उनकी प्रेम - लक्षणा - भक्तिसे चकित होकर उद्धवका उन्हें श्रीकृष्णके चरित्र सुनाना श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार प्रेमभरे गोपोंसे, जो श्रीकृष्णके विरहसे व्याकुल थे, प्रेमी भक्त उद्धवने विस्मयरहित होकर कहा ॥ १ ॥
उद्धव बोले- व्रजवासियो! मैं श्रीकृष्णका दास हूँ – उनका प्रेमपात्र तथा एकान्त सेवक हूँ । श्रीहरिने बड़ी उतावलीके साथ आपलोगोंका कुशल- मङ्गल जाननेके लिये मुझे यहाँ भेजा है । यहाँसे मथुरापुरीको लौटकर श्रीहरिसे आपलोगोंकी विरह - वेदना निवेदित करके अपने नेत्रोंके जलसे उनके चरण पखारकर उन्हें प्रसन्न करूँगा और उन्हें साथ लेकर शीघ्र ही आपलोगोंके समीप आऊँगा - यह मेरी प्रतिज्ञा है, यह कभी झूठी नहीं होगी । गोपालगण! आपलोग प्रसन्न हों, शोक न करें । आप इस व्रजमें शीघ्र ही श्रीवल्लभ श्रीहरिका दर्शन करेंगे ॥२-५ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार ग्वालोंको आश्वासन दे, रथपर बैठे हुए यदुनन्दन उद्धव श्रीदामा आदि गोपके साथ हर्षसे भरकर नन्दगाँवमें प्रविष्ट हुए । उस समय सूर्य समुद्रमें डूब चुके थे । उद्धवका आगमन सुनकर परम बुद्धिमान् नन्दराजने शीघ्र आकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े हर्षसे उनका पूजन - स्वागत - सत्कार किया । जब उद्धवजी भोजन करके शान्तभावसे शय्यापर आसीन हुए, तब