गर्ग संहिता — पृष्ठ 31–40
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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अध्याय ४ ] नन्द आदिके लक्षण; करेंगी? कारण, आपका वह स्थान तो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है ॥ १८ ॥
श्रीभगवान् बोले – पूर्वकालमें श्रुतियोंने श्वेतद्वीपमें जाकर वहाँ मेरे स्वरूपभूत भूमा - ( विराट् पुरुष या परब्रह्म ) का मधुर वाणीमें स्तवन किया । तब सहस्रपाद विराट् पुरुष प्रसन्न हो गये और बोले ॥ १ ९ ॥ श्रीहरिने कहा— श्रुतियो! तुम्हें जो भी पानेकी इच्छा हो, वह वर माँग लो । जिनके ऊपर स्वयं प्रसन्न हो गया, उनके लिये कौन - सी वस्तु दुर्लभ है? ॥ २० ॥
श्रुतियाँ बोलीं- भगवन्! आप मन - वाणीसे नहीं जाने जा सकते; अतः हम आपको जाननेमें असमर्थ हैं । पुराणवेत्ता ज्ञानीपुरुष यहाँ जिसे केवल ' आनन्दमात्र ' बताते हैं, अपने उसी रूपका हमें दर्शन कराइये । प्रभो! यदि आप हमें वर देना चाहते हों तो यही दीजिये ॥ २१३ ॥
श्रुतियोंकी ऐसी बात सुनकर भगवान्ने उन्हें अपने दिव्य गोलोकधामका दर्शन कराया, जो प्रकृतिसे परे है । वह लोक ज्ञानानन्दस्वरूप, अविनाशी तथा निर्विकार है । वहाँ ' वृन्दावन ' नामक वन है, जो कामपूरक कल्पवृक्षोंसे सुशोभित है । मनोहर निकुञ्जोंसे सम्पन्न वह वृन्दावन सभी ऋतुओंमें सुखदायी है । वहाँ सुन्दर झरनों और गुफाओंसे सुशोभित ' गोवर्धन ' नामक गिरि है । रत्न एवं धातुओंसे भरा हुआ वह श्रीमान् पर्वत सुन्दर पक्षियोंसे आवृत है । वहाँ स्वच्छ जलवाली श्रेष्ठ नदी ' यमुना ' भी लहराती है । उसके दोनों तट रत्नोंसे बँधे हैं । हंस और कमल आदिसे वह सदा व्याप्त रहती है । वहाँ विविध रास - रङ्गसे उन्मत्त गोपियोंका समुदाय शोभा पाता है । उसी गोपी-समुदायके मध्यभागमें किशोर वयसे सुशोभित भगवान् श्रीकृष्ण विराजते हैं । उन श्रुतियोंको इस प्रकार अपना लोक दिखाकर भगवान् बोले- ' कहो, तुम्हारे लिये अब क्या करूँ? तुमने मेरा यह लोक तो देख ही लिया, इससे उत्तम दूसरा कोई वर नहीं है ' ॥ २२-२७ ॥ श्रुतियोंने कहा – प्रभो! आपके करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर श्रीविग्रहको देखकर हममें कामिनी- भाव आ गया है और हमें आपसे मिलनेकी गोपीयूथका परिचय २५ उत्कट इच्छा हो रही है! हम विरह - ताप- संतप्त हैं-इसमें संदेह नहीं है । अतः आपके लोकमें रहनेवाली गोपियाँ आपका सङ्ग पानेके लिये जैसे आपकी सेवा करती हैं, हमारी भी वैसी ही अभिलाषा है ॥२८-२९ ॥ श्रीहरि बोले - श्रुतियो! तुमलोगोंका यह मनोरथ दुर्लभ एवं दुर्घट है; फिर भी मैं इसका भलीभाँति अनुमोदन कर चुका हूँ, अतः वह सत्य होकर रहेगा । आगे होनेवाली सृष्टिमें जब ब्रह्मा जगत्की रचनामें संलग्न होंगे, उस समय सारस्वत - कल्प बीतनेपर तुम सभी श्रुतियाँ व्रजमें गोपियाँ होओगी । भूमण्डलपर भारतवर्षमें मेरे माथुरमण्डलके अन्तर्गत वृन्दावनमें रासमण्डलके भीतर मैं तुम्हारा प्रियतम बनूँगा । तुम्हारा मेरे प्रति सुदृढ़ प्रेम होगा, जो सब प्रेमोंसे बढ़कर है 1 तब तुम सब श्रुतियाँ मुझे पाकर सफल - मनोरथ होओगी ॥ ३० – ३३ ॥ श्रीभगवान् कहते हैं— ब्रह्माजी! पूर्व कल्पमें मैंने वर दे दिया है, उसीके प्रभावसे वे श्रुतियाँ व्रजमें गोपियाँ होंगी । अब अन्य गोपियोंके लक्षण सुनो ॥ ३४ ॥
त्रेतायुगमें देवताओंकी रक्षा और राक्षसोंका संहार करनेके लिये मेरे स्वरूपभूत महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी अवतीर्ण हुए थे । कमललोचन श्रीरामने सीताके स्वयंवरमें जाकर धनुष तोड़ा और उन जनकनन्दिनी श्रीसीताजीके साथ विवाह किया । ब्रह्माजी! उस अवसरपर जनकपुरकी स्त्रियाँ श्रीरामको देखकर प्रेमविह्वल हो गयीं । उन्होंने एकान्तमें उन महाभागसे अपना अभिप्राय प्रकट किया- ' राघव! आप हमारे परम प्रियतम बन जायँ । ' तब श्रीरामने कहा— ' सुन्दरियो! तुम शोक मत करो । द्वापरके अन्तमें मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा । तुमलोग परम श्रद्धा और भक्तिके साथ तीर्थ, दान, तप, शौच एवं सदाचारका भलीभाँति पालन करती रहो । तुम्हें व्रजमें गोपी होनेका सुअवसर प्राप्त होगा । ' इस प्रकार वर देकर धनुर्धारी करुणानिधि श्रीरामने अयोध्याके लिये प्रस्थान कर दिया । उस समय मार्गमें अपने प्रतापसे उन्होंने भृगुकुलनन्दन परशुरामजीको परास्त कर दिया था । कोसल - जनपदकी स्त्रियोंने भी राजपथसे जाते हुए
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२६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड उन कमनीय - कान्ति रामको देखा । उनकी सुन्दरता कामदेवको मोहित कर रही थी । उन स्त्रियोंने श्रीरामको मन - ही - मन पतिके रूपमें वरण कर लिया । उस समय सर्वज्ञ श्रीरामने उन समस्त स्त्रियोंको मन - ही - मन वर दिया- ' तुम सभी व्रजमें गोपियाँ होओगी और उस समय मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा ॥ ३५ - ४२ ॥ फिर सीता और सैनिकोंके साथ रघुनाथजी अयोध्या पधारे । यह सुनकर अयोध्यामें रहनेवाली स्त्रियाँ उन्हें देखनेके लिये आयीं । श्रीरामको देखकर उनका मन मुग्ध हो गया । वे प्रेमसे विह्वल हो मूच्छित -सी हो गयीं । फिर वे श्रीरामके व्रतमें परायण होकर सरयूके तटपर तपस्या करने लगीं । तब उनके सामने आकाशवाणी हुई- ' द्वापरके अन्तमें यमुनाके किनारे वृन्दावनमें तुम्हारे मनोरथ पूर्ण होंगे, इसमें संदेह नहीं है ॥ ४३ – ४५ ॥ जिस समय श्रीरामने पिताकी आज्ञासे दण्डकवन-की यात्रा की, सीता तथा लक्ष्मण भी उनके साथ थे और वे हाथमें धनुष लेकर इधर - उधर विचर रहे थे । वहीं बहुत - से मुनि थे । उनकी गोपाल - वेषधारी भगवान्के स्वरूपमें निष्ठा थी । रासलीलाके निमित्त वे भगवान्का ध्यान करते थे । उस समय श्रीरामकी युवा अवस्था थी — वे हाथमें धनुष - बाण धारण किये हुए थे । जटाओंके मुकुटसे उनकी विचित्र शोभा थी । अपने आश्रमपर पधारे हुए श्रीराममें उन मुनियोंका ध्यान लग गया । ( वे ऋषिलोग गोपाल - वेषधारी भगवान्के उपासक थे ) अतः दूसरे ही स्वरूपमें आये हुए श्रीरामको देखकर सबके मनमें अत्यन्त आश्चर्य हो गया । उनकी समाधि टूट गयी और देखा तो करोड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर श्रीराम दृष्टिगोचर हुए । तब वे बोल उठे - ' अहो! आज हमारे गोपालजी वंशी एवं बेंतके बिना ही पधारे हैं ।'-इस प्रकार मन - ही - मन विचारकर सबने श्रीरामको प्रणाम किया और उनकी उत्तम स्तुति करने लगे ॥ ४६ – ५० ॥ तब श्रीरामने कहा – ' मुनियो! वर माँगो । ' यह सुनकर सभीने एक स्वरसे कहा - ' जिस भाँति सीता आपके प्रेमको प्राप्त हैं, वैसे ही हम भी चाहते हैं ' ॥५१ ॥
श्रीराम बोले- यदि तुम्हारी ऐसी प्रार्थना हो कि जैसे भाई लक्ष्मण हैं, वैसे ही हम भी आपके भाई बन जायँ, तब तो आज ही मेरेद्वारा तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है; किंतु तुमने तो ' सीता ' के समान होनेका वर माँगा है । अतः यह वर महान् कठिन और दुर्लभ है; क्योंकि इस समय मैंने एकपत्नी - व्रत धारण कर रखा है । मैं मर्यादाकी रक्षामें तत्पर रहकर ' मर्यादापुरुषोत्तम ' भी कहलाता हूँ । अतएव तुम्हें मेरे वरका आदर करके द्वापरके अन्तमें जन्म धारण करना होगा और वहीं मैं तुम्हारे इस उत्तम मनोरथको पूर्ण करूँगा ॥५२-५४ ॥ इस प्रकार वर देकर श्रीराम स्वयं पञ्चवटी पधारे । वहाँ पर्णकुटीमें रहकर वनवासकी अवधि पूरी करने लगे । उस समय भीलोंकी स्त्रियोंने उन्हें देखा । उनमें मिलनेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न होनेके कारण वे प्रेमसे विह्वल हो गयीं । यहाँतक कि श्रीरामके चरणोंकी धूल मस्तकपर रखकर अपने प्राण छोड़नेकी तैयारी करने लगीं । उस समय श्रीराम ब्रह्मचारीके वेषमें वहाँ आये और इस प्रकार बोले- ' स्त्रियो! तुम व्यर्थ ही प्राण त्यागना चाहती हो; ऐसा मत करो । द्वापरके शेष होनेपर वृन्दावनमें तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा । ' इस प्रकारका आदेश देकर श्रीरामका वह ब्रह्मचारी रूप वहीं अन्तर्हित हो गया ॥ ५५-५८ ॥ तत्पश्चात् श्रीराम सुग्रीव आदि प्रधान वानरोंकी सहायतासे लङ्कामें जाकर रावण - प्रभृति राक्षसोंको परास्त किया । फिर सीताको पाकर पुष्पक विमान- द्वारा अयोध्या चले गये । राजाधिराज श्रीरामने लोकापवाद कारण सीताको वनमें छोड़ दिया । अहो! भूमण्डलपर दुर्जनोंका होना बहुत ही दुःखदायी है । जब - जब कमललोचन श्रीराम यज्ञ करते थे, तब - तब विधिपूर्वक सुवर्णमयी सीताकी प्रतिमा बनायी जाती थी । इसलिये श्रीराम - भवनमें यज्ञ - सीताओंका एक समूह ही एकत्र हो गया । वे सभी दिव्य चैतन्य - घनस्वरूपा होकर श्रीराम पास गयीं । उस समय श्रीरामने उनसे कहा - ' प्रियाओ! मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता । ' वे सभी प्रेमपरायणा सीता - मूर्तियाँ दशरथनन्दन श्रीरामसे कहने लगीं— ' ऐसा
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अध्याय ५ ] भिन्न - भिन्न स्थानों तथा विभिन्न वर्गोंकी स्त्रियोंके गोपी होनेके कारण २७ क्यों? हम तो आपकी सेवा करनेवाली हैं । हमारा नाम भी मिथिलेशकुमारी सीता है और हम उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सतियाँ भी हैं; फिर हमें आप ग्रहण क्यों नहीं करते? यज्ञ करते समय हम आपकी अर्धाङ्गिनी बनकर निरन्तर कार्योंका संचालन करती रही हैं । आप धर्मात्मा और वेदके मार्गका अवलम्बन करनेवाले हैं, यह अधर्मपूर्ण बात आपके श्रीमुखसे कैसे निकल रही है? यदि आप स्त्रीका हाथ पकड़-कर उसे त्यागते हैं तो आपको पापका भागी होना पड़ेगा ' ॥ ५ ९ –६५ ॥ श्रीराम बोले- सतियो! तुमने मुझसे जो बात कही है, वह बहुत ही उचित और सत्य है । परंतु मैंने ' एकपत्नीव्रत धारण कर रखा है? सभी लोग मुझे ' राजर्षि ' कहते हैं । अतः नियमको छोड़ भी नहीं सकता । एकमात्र सीता ही मेरी सहधर्मिणी है । इसलिये तुम सभी द्वापरके अन्तमें श्रेष्ठ वृन्दावनमें पधारना, वहीं तुम्हारी मन: कामना पूर्ण करूँगा ॥ ६६-६७ ॥ भगवान् श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन्! वे यज्ञ - सीता ही व्रजमें गोपियाँ होंगी । अन्य गोपियोंका भी लक्षण सुनो ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत भगवद् ब्रह्म - संवादमें ' अवतारके उद्योगविषयक प्रश्नका वर्णन ' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पाँचवाँ अध्याय भिन्न - भिन्न स्थानों तथा विभिन्न वर्गोंकी स्त्रियोंके गोपी होनेके कारण एवं अवतार - व्यवस्थाका वर्णन भगवान् श्रीहरि कहते हैं - वैकुण्ठमें विराजने -वाली रमादेवीकी सहचरियाँ, श्वेतद्वीपकी सखियाँ, भगवान् अजित ( विष्णु ) के चरणोंके आश्रित ऊर्ध्व-वैकुण्ठ निवास करनेवाली देवियाँ तथा श्रीलोकाचलपर्वतपर रहनेवाली, समुद्रसे प्रकटित श्रीलक्ष्मीकी सखियाँ - ये सभी भगवान् कमलापति -के वरदानसे व्रजमें गोपियाँ होंगी । पूर्वकृत विविध पुण्योंके प्रभावसे कोई दिव्य, कोई अदिव्य और कोई सत्त्व, रज, तम - तीनों गुणोंसे युक्त देवियाँ व्रजमण्डलमें गोपियाँ होगीं ॥ १-३ ३३ ॥ ॥ रुचिके यहाँ पुत्ररूपसे अवतीर्ण, द्युलोकपति रुचिरविग्रह भगवान् यज्ञको देखकर देवाङ्गनाएँ प्रेम-रसमें निमग्न हो गयीं । तदनन्तर वे देवलजीके उपदेशसे हिमालय पर्वतपर जाकर परम भक्तिभावसे तपस्या करने लगीं । ब्रह्मन्! वे सब मेरे व्रजमें जाकर गोपियाँ होंगी ॥ ४-५ ॥ भगवान् धन्वन्तरि जब इस भूतलपर अन्तर्धान हुए, उस समय सम्पूर्ण ओषधियाँ अत्यन्त दुःखमें डूब गयीं और भारतवर्षमें अपनेको निष्फल मानने लगीं । फिर सबने सुन्दर स्त्रीका वेष धारण करके तपस्या आरम्भ की । चार युग व्यतीत होनेपर भगवान् श्रीहरि उनपर अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले - ' तुम सब वर माँगो । ' यह सुनकर स्त्रियोंने उस महान् वनमें जब आँखें खोलीं, तब उन श्रीहरिका दर्शन करके वे सब - की-सब मोहित हो गयीं और बोलीं- ' आप हमारे पतितुल्य आराध्यदेव होनेकी कृपा करें ' ॥ ६–८ ॥ भगवान् श्रीहरि बोले - ओषधिस्वरूपा स्त्रियो! द्वापरके अन्तमें तुम सभी लतारूपसे वृन्दावनमें रहोगी और वहाँ रासमें मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा ॥ ९ ॥
श्रीभगवान् कहते हैं— ब्रह्मन्! भक्तिभावसे परिपूर्ण वे बड़भागिनी वराङ्गनाएँ वृन्दावनमें ' लता-गोपी ' होंगी । इसी प्रकार जालंधर नगरकी स्त्रियाँ वृन्दापति भगवान् श्रीहरिका दर्शन करके मन - ही - मन संकल्प करने लगीं- ' ये साक्षात् श्रीहरि हम सबके स्वामी हों । ' उस समय उनके लिये आकाशवाणी हुई - ' तुम सब शीघ्र ही रमापतिकी आराधना करो; फिर वृन्दाकी ही भाँति तुम भी वृन्दावनमें भगवान्की प्रिया गोपी होओगी । ' मत्स्यावतारके समय मत्स्यविग्रह
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२८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड श्रीहरिको देखकर समुद्रकी कन्याएँ मुग्ध हो गयी थीं । श्रीमत्स्य भगवान्के वरदानसे वे भी व्रजमें गोपियाँ होंगी ॥ १०–१४ ॥ मेरे अंशभूत राजा पृथु बड़े प्रतापी थे । उन महाराजने सम्पूर्ण शत्रुओंको जीतकर पृथ्वीसे सारी अभीष्ट वस्तुओंका दोहन किया था । उस समय बर्हिष्मती नगरीमें रहनेवाली बहुत - सी स्त्रियाँ उन्हें देखकर मुग्ध हो गयीं और प्रेमसे विह्वल हो अत्रिजीके पास जाकर बोलीं- ' महामुने! समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ महाराजा पृथु बड़े ही पराक्रमी हैं । ये किस प्रकारसे हमारे पति होंगे? यह बतानेकी कृपा कीजिये ' ॥ १५ - १६ ॥ अत्रिजीने कहा- तुम सब शीघ्र ही आज इस गौको दुहो । यह सम्पूर्ण पदार्थोंको धारण करनेवाली धारणामयी धरणी देवी है । तुम्हारे सारे मनोरथोंको-चाहे वे समुद्रके समान अगाध, अपार एवं दुर्गम ही क्यों न हों - अवश्य पूर्ण कर देंगी ॥ १७ ॥
ब्रह्मन्! तब उन स्त्रियोंने मनको दोहन - पात्र बनाकर अपने मनोरथोंका दोहन किया । इसी कारणसे वे सब - की - सब वृन्दावनमें गोपियाँ होंगी । बहुत - सी श्रेष्ठ अप्सराएँ, जिनका रूप अत्यन्त मनोहर था और जो कामदेवकी सेनाएँ थीं, भगवान् नारायण ऋषिको मोहित करनेके लिये गन्धमादन पर्वतपर गयीं । परंतु उन्हें देखकर वे भी अपनी सुध - बुध खो बैठीं । उनके मनमें भगवान्को पति बनानेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी । तब सिद्धतपस्वी नारायण मुनिने कहा- ' तुम व्रजमें गोपियाँ होओगी और वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा ' ॥ १८ - २० ॥ ब्रह्मन्! सुतल देशकी स्त्रियाँ भगवान् वामनको देखकर उन्हें पानेके लिये उत्कट इच्छा प्रकट करने लगीं । फिर तो उन्होंने तपस्या आरम्भ कर दी । अतः वे भी वृन्दावनमें गोपियाँ होंगी । जिन नागराज-कन्याओंने शेषावतार भगवान्को देखकर उन्हें पति बनानेकी इच्छासे उनकी सेवा - समाराधना की हैं, वे सब बलदेवजीके साथ रासविहार करनेके लिये व्रजमें उत्पन्न होंगी ॥ २१ - २२ ॥ कश्यपजी वसुदेव होंगे । परम पूजनीया अदिति देवकीके रूपमें अवतार लेंगी । प्राण नामक वसु शूरसेन और ' ध्रुव ' नामक वसु देवक होंगे । ' वसु ' नामके जो वसु हैं, उनका उद्धवके रूपमें प्राकय होगा । दयापरायण दक्ष प्रजापति अक्रूरके रूप में अवतार लेंगे । कुबेर हृदीक नामसे और जलके स्वामी वरुण कृतवर्मा नामसे प्रसिद्ध होंगे । पुरातन राजा प्राचीनबर्हि गद एवं मरुत देवता उग्रसेन बनेंगे । उन उग्रसेनको मैं विधानतः राजा बनाऊँगा और उनकी भलीभाँति रक्षा करूँगा । भक्त राजा अम्बरीष युयुधान और भक्तप्रवर प्रह्लाद सात्यकिके नामसे प्रकट होंगे । क्षीरसागर शंतनु होगा । वसुओंमें श्रेष्ठ द्रोण साक्षात् भीष्मपितामहके रूपमें उत्पन्न होंगे । दिवोदास शलके रूपमें एवं भग नामके सूर्य धृतराष्ट्रके रूपमें अवतीर्ण होंगे । पूषा नामसे विख्यात देवता पाण्डु होंगे । सत्पुरुषोंमें आदर पानेवाले धर्मराज ही राजा युधिष्ठिरके रूपमें अवतार लेंगे । वायु देवता महान् पराक्रमी भीमसेनके तथा स्वायम्भुव मनु अर्जुनके वेषमें प्रकट होंगे । शतरूपाजी सुभद्रा होंगी और सूर्यनारायण कर्णके रूपसे अवतार लेंगे । अश्विनीकुमार नकुल एवं सहदेव होंगे । धाता महान् बलशाली बाह्लीक नामसे विख्यात होंगे । अग्निदेवता महान् प्रतापी द्रोणाचार्यके रूपमें अवतार लेंगे । कलिका अंश दुर्योधन होगा । चन्द्रमा अभिमन्युके रूपमें अवतार लेंगे । पृथ्वीपर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा साक्षात् भगवान् शंकरका रूप होगा । इस प्रकार तुम सब देवता मेरी आज्ञाके अनुसार अपने अंशों और स्त्रियोंके साथ यदुवंशी, कुरुवंशी तथा अन्यान्य वंशोंके राजाओंके कुलमें प्रकट होओ । पूर्व समयमें मेरे जितने अवतार हो चुके हैं, उनकी रानियाँ रमाका अंश रही हैं । वे भी मेरी रानियोंमें सोलह हजारकी संख्यामें प्रकट होंगी ॥ २३ - ३२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! कमलासन ब्रह्मासे यों कहकर भगवन् श्रीहरिने दिव्यरूपधारिणी भगवती योगमायासे कहा ॥३३ ॥
भगवान् श्रीहरि बोले - महामते! तुम देवकी-के सातवें गर्भको खींचकर उसे वसुदेवकी पत्नी रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दो । वे देवी कंसके
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अध्याय ६ ] कालनेमिके अंशसे उत्पन्न कंसके महान् बल - पराक्रम और दिग्विजयका वर्णन २ ९ डरसे व्रजमें नन्दके घर रहती हैं । साथ ही तुम भी ऐसे अलौकिक कार्य करके नन्दरानीके गर्भसे प्रकट हो जाना ॥ ३४-३५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- परम श्रेष्ठ राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके वचन सुनकर सम्पूर्ण देवताओं-के साथ ब्रह्माजीने परात्पर भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया और अपने वचनोंद्वारा पृथ्वीदेवीको धीरज दे, वे अपने धामको चले गये । मिथिलेश्वर जनक! तुम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको साक्षात् परिपूर्णतम इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत परमात्मा समझो । कंस आदि दुष्टोंका विनाश करनेके लिये ही ये इस धराधामपर पधारे हैं । शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतनी जिह्वाएँ हो जायँ, तब भी भगवान् श्रीकृष्णके असंख्य महान् गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता । महाराज! जिस प्रकार पक्षीगण अपनी शक्तिके अनुसार ही आकाशमें उड़ते हैं, वैसे ही ज्ञानीजन भी अपनी मति एवं शक्तिके अनुसार ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी दिव्य लीलाओंका गायन करते हैं ॥ ३६-३९ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' अवतार - व्यवस्थाका वर्णन ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
छठा अध्याय कालनेमिके अंशसे उत्पन्न कंसके महान् राजा बहुलाश्वने कहा- देवर्षिशिरोमणे! यह महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न कंस पहले किस दैत्यके नामसे विख्यात था? आप इसके पूर्वजन्मों और कर्मोंका विवरण मुझे सुनाइये ॥ १ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! पूर्वकालमें समुद्र - मन्थनके अवसरपर महान् असुर कालनेमिने भगवान् विष्णुके साथ युद्ध किया । उस युद्धमें भगवान् ने उसे बलपूर्वक मार डाला । उस समय शुक्राचार्यजीने अपनी संजीवनी - विद्याके बलसे उसे पुनः जीवित कर दिया । तब वह पुनः भगवान् विष्णुसे युद्ध करनेके लिये मन - ही - मन उद्योग करने लगा । उस समय वह दानव मन्दराचल पर्वतके समीप तपस्या करने लगा । प्रतिदिन दूबका रस पीकर उसने देवेश्वर ब्रह्माकी आराधना की । देवताओंके कालमानसे सौ वर्ष बीत जानेपर ब्रह्माजी उसके पास गये । उस समय कालनेमिके शरीरमें केवल हड्डियाँ रह गयी थीं और उसपर दीमकें चढ़ गयी थीं । ब्रह्माजीने उससे कहा— ' वर माँगो ' ॥२-५ ॥ कालनेमिने कहा – इस ब्रह्माण्डमें जो - जो महाबली देवता स्थित हैं, उन सबके मूल भगवान् विष्णु हैं । उन सम्पूर्ण देवताओंके हाथसे भी मेरी बल - पराक्रम और दिग्विजयका वर्णन मृत्यु न हो ॥ ६ ॥
ब्रह्माजीने कहा- दैत्य! तुमने जो यह उत्कृष्ट वर माँगा है, वह तो अत्यन्त दुर्लभ है; तथापि किसी दूसरे समय तुम्हें यह प्राप्त हो सकता है । मेरी वाणी कभी झूठी नहीं हो सकती ॥७ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! फिर वही कालनेमि नामक असुर पृथ्वीपर उग्रसेनकी स्त्री ( पद्मावती ) के गर्भसे उत्पन्न हुआ । कुमारावस्थामें ही वह बड़े - बड़े पहलवानोंके साथ कुश्ती लड़ा करता था । ( एक समयकी बात है - ) मगधराज जरासंध दिग्विजयके लिये निकला । यमुना नदीके निकट इधर - उधर उसकी छावनी पड़ गयी । उसके पास ' कुवलयापीड़ ' नामका एक हाथी था, जिसमें हजार हाथियोंके समान शक्ति थी । उसके गण्डस्थलसे मद चू रहा था । एक दिन उसने बहुत - सी साँकलोंको तोड़ डाला और शिविरसे बाहरकी ओर दौड़ चला । शिविरों, गृहों और पर्वतीय तटोंको तोड़ता - फोड़ता हुआ वह उस रङ्गभूमि ( अखाड़े ) में जा धमका, जहाँ कंस भी कुश्ती लड़ रहा था । उसके आनेपर सभी शूरवीर भाग चले । उसे आया देख कंसने उस हाथीकी सूँड़ पकड़ी और पृथ्वीपर गिरा दिया । इसके बाद
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३० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड कंसने कुवलयापीड़को पुनः दोनों हाथोंसे पकड़कर घुमाया और जरासंधकी सेनामें, जो वहाँसे बहुत दूर थी, फेंक दिया । मगधनरेश जरासंध कंसके इस अद्भुत बलको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने ' अस्ति ' तथा ' प्राप्ति ' नामकी अपनी दो परमसुन्दरी कन्याओंका विवाह उसके साथ कर दिया । उस जरापुत्रने एक अरब घोड़े, एक लाख हाथी, तीन लाख रथ और दस हजार दासियाँ कंसको दहेजमें दीं ॥ ८-१५ ॥ कंस द्वन्द्वयुद्धका प्रेमी था । अपने बाहुबलके मदसे अकेला ही द्वन्द्वयुद्धके लिये उन्मत्त रहता था । वह प्रचण्डपराक्रमी वीर माहिष्मतीपुरीमें गया । माहिष्मतीनरेशके पाँच पुत्र प्रख्यात मल्ल थे और मल्लयुद्धमें विजय पानेका हौंसला रखते थे । उनके नाम थे - चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल । कंसने सामनीतिका आश्रय ले प्रेमपूर्वक उनसे कहा-' तुमलोग मेरे साथ मल्लयुद्ध करो । यदि तुम्हारी विजय हो जायगी तो मैं तुम्हारा सेवक होकर रहूँगा; और कदाचित् मेरी विजय हो गयी तो तुम सबको भी मैं अपना सेवक बना लूंगा । ' वहाँ जितने भी नागरिक महान् पुरुष थे, उन सबके सामने कंसने इस प्रकारकी प्रतिज्ञा की और विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले उन वीरोंके साथ मल्लयुद्ध आरम्भ कर दिया । ज्यों ही चाणूर आया, यादवेश्वर कंसने उच्चस्वरसे गर्जना करते हुए उसे पकड़कर पृथ्वीपर दे मारा । उसी क्षण मुष्टिक भी वहाँ आ गया । वह रोषसे मुक्का ताने हुए था । कंसने उसे भी एक ही मुक्केसे धराशायी कर दिया । अब कूट आया, कंसने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और जमीनपर दे मारा । फिर ताल ठोंकता हुआ शल भी दौड़कर आ पहुँचा । कंसने उसे एक ही हाथसे पकड़ा और जमीनपर पटककर घसीटने लगा । इसके बाद कंसने तोशलके दोनों हाथ बलपूर्वक पकड़ लिये और जमीनपर पटक दिया । फिर तत्काल उठाकर दस योजनकी दूरीपर फेंक दिया । इस प्रकार यादवेश्वर कंस उन सभी वीरोंको अपना सेवक बनाकर, मेरे ( नारदजीके ) कहनेसे उन योद्धाओंके साथ उसी क्षण श्रेष्ठ पर्वत प्रवर्षणगिरिपर जा पहुँचा । वहाँ वह वानर द्विविदको अपना अभिप्राय बताकर उसके साथ बीस दिनोंतक अविराम युद्ध करता रहा । द्विविदने पर्वतकी चट्टान उठाकर उसे कंसके मस्तकपर फेंका, किंतु कंसने उस शिलाखण्डको पकड़कर उसीके ऊपर चला दिया । तब द्विविद कंसपर मुक्केसे प्रहार करके आकाशमें उड़ गया । कंसने भी उसका पीछा करके उसे पकड़ लिया और लाकर जमीनपर पटक दिया । कंसके प्रहारसे द्विविदको मूर्च्छा आ गयी । उसकी सारी उत्साह शक्ति जाती रही । हड्डियाँ चूर - चूर हो गयीं । फिर तो वह भी कंसका सेवक बन गया ॥ १६–२९ ॥ तदनन्तर कंस द्विविदके साथ वहाँसे ऋष्यमूक-वनमें गया । वहाँ ' केशी ' नामसे विख्यात एक महादैत्य रहता था, जिसकी घोड़ेके समान आकृति थी । वह बादलके समान गर्जता था । उसे मुक्कोंकी मारसे अपने वशमें करके कंस उसपर सवार हो गया । इस प्रकार वह महान् पराक्रमी कंस महेन्द्रगिरिपर जा पहुँचा । दानवराज कंसने उस पर्वतको सौ बार उखाड़कर ऊपरको उठा लिया । फिर वहाँ रहनेवाले मुनिवर परशुरामजीके, जिनके नेत्र क्रोधसे लाल थे और जो प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी थे, चरणोंमें मस्तक झुकाया और बार - बार उनकी प्रदक्षिणा की । फिर उनके दोनों चरणोंमें वह लेट गया । तब अत्यन्त उग्र दृष्टिवाले परशुरामजीकी क्रोधनि शान्त हो गयी । वे बोले - ' रे कीट! रे बँदरियाके बच्चे! तू मच्छरके समान तुच्छ है । । तू बलके घमंडमें चूर रहनेवाला दुष्ट क्षत्रिय है । मैं आज ही तुझे मौतके मुखमें भेजता हूँ । देख, मेरे पास यह महान् धनुष है । इसकी गुरुता लाख भार ( लगभग तीन लाख मन ) के बराबर है । त्रिपुरासुरसे युद्धके समय भगवान् विष्णुने यह धनुष भगवान् शंकरको दिया था । फिर क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये यह शंकरजीके हाथसे मुझे प्राप्त हुआ । यदि तू इसे चढ़ा सका, तब तो कुशल है; यदि नहीं चढ़ा सका तो तेरे सारे बलका विनाश कर दूँगा । ' परशुरामजीकी बात सुनकर कंसने उस धनुषको, जो सात ताड़के बराबर लंबा था, उठा लिया और परशुरामजीके देखते - देखते उसे लीलापूर्वक चढ़ा दिया । फिर कानतक
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अध्याय ६ ] कालनेमिके अंशसे उत्पन्न कंसके महान् बल - पराक्रम और दिग्विजयका वर्णन ३१ खींच - खींचकर उसे सौ बार फैलाया । उसकी प्रत्यञ्चाके खींचनेसे बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान टंकार शब्द होने लगा । उसकी भीषण ध्वनिसे सातों लोकों और पातालोंके साथ पूरा ब्रह्माण्ड गूँज उठा, दिग्गज विचलित हो गये और तारागण टूट - टूटकर जमीनपर गिरने लगे । फिर कंसने धनुषको नीचे रख दिया और परशुरामजीको बारंबार प्रणाम करके कहा- ' भगवन्! मैं क्षत्रिय नहीं हूँ । मैं आपका सेवक दैत्य हूँ । आपके दासोंका दास हूँ । पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिये । '
कंसकी ऐसी प्रार्थना सुनकर परशुरामजी प्रसन्न हो गये ।
फिर वह धनुष उन्होंने कंसको ही दे दिया ॥ ३० – ४२ ॥
परशुरामजीने कहा – यह धनुष भगवान् विष्णुका है । इसे जो तोड़ देगा, वही यहाँ साक्षात् परिपूर्णतम पुरुष है । उसीके हाथसे तुम्हारी मृत्यु होगी ॥ ४३ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर बलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला कंस मुनिवर परशुरामजीको प्रणाम करके भूतलपर विचरने लगा । किन्हीं राजाओंने उसके साथ युद्ध नहीं किया - सबने उसे कर देना स्वीकार कर लिया । अब कंस समुद्रके तटपर गया । वहाँ ' अघासुर ' नामक एक दानव रहता था, जो सर्पके आकारका था । वह फुफकारता और लपलपाती जीभ से चाटता - सा दिखायी देता था । वह आकर कंसको डँसने लगा । यह देख पराक्रमी दैत्यराजने निर्भयतापूर्वक उसे पकड़ा और धरतीपर पटक दिया । फिर उसे अपने गलेकी माला बना लिया । उन दिनों पूर्वदिशावर्ती बंगदेशमें ' अरिष्ट ' नामक दैत्य रहता था, जिसकी आकृति बैलके समान थी । उस दैत्यके साथ कंस इस प्रकार जा भिड़ा जैसे एक हाथीके साथ दूसरा हाथी लड़ता है । वह दानव अपनी सींगोंसे बड़े - बड़े पर्वतोंको उठाता और कंसके मस्तकपर पटक देता था । कंस भी उसी पर्वतको हाथमें लेकर अरिष्टासुरपर दे मारता था । उस युद्धमें दैत्यराज कंसने मुक्केसे अरिष्टासुरपर प्रहार किया, जिससे वह दानव मूच्छित हो गया । इस प्रकार उस अरिष्टासुरको पराजित करके उसके साथ ही कंस उत्तर दिशाकी ओर चल दिया । प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी महाबली भूमिपुत्र ' नरक ' के पास जाकर युद्धार्थी कंसने उससे कहा – ' दैत्येश्वर! तुम मुझे युद्ध करनेका अवसर दो । यदि संग्राममें तुम्हारी जीत हो गयी तो मैं तुम्हारा सेवक बन जाऊँगा । साथ ही मुझे विजय प्राप्त होनेपर तुम सबको मेरा भृत्य बनना पड़ेगा ॥ ४४–५१ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! प्राग्ज्योतिषपुरमें सर्वप्रथम महापराक्रमी प्रलम्बासुर कंसके साथ इस प्रकार युद्ध करने लगा, जैसे किसी पर्वतपर एक उद्भट सिंहके साथ दूसरा उद्भट सिंह लड़ता हो । कंसने उस मल्लयुद्धमें प्रलम्बासुरको पकड़ा और पृथ्वीपर दे मारा । फिर उसे उठाकर प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी भौमासुरके पास फेंक दिया । तदनन्तर ' धेनुक ' नामसे विख्यात दानवने आकर कंसको रोषपूर्वक पकड़ लिया । उसने दारुण बलका प्रयोग करके कंसको दूरतक पीछे हटा दिया । तब कंसने भी धेनुकासुरको बहुत दूर पीछे ढकेल दिया और सुदृढ़ घूँसोंसे मारकर उसके शरीरको चूर - चूर कर दिया । तदनन्तर भौमासुरकी आज्ञासे ' तृणावर्त ' कंसको पकड़कर लाख योजन ऊपर आकाशमें ले गया और वहीं युद्ध करने लगा । कंसने अपनी अनन्तशक्ति लगाकर बलपूर्वक उस दैत्यको आकाशसे खींचकर पृथ्वीपर पटक दिया । उस समय तृणावर्तके मुँहसे खूनकी धार बह चली । इसके बाद महाबली ' बकासुर ' आकर अपनी चोंचसे कंसको निगल जानेकी चेष्टा करने लगा । कंसने वज्रके समान कठोर मुक्केसे प्रहार करके उसे भी धराशायी कर दिया । बलवान् बकासुर फिर उठ गया । उसके पंख सफेद थे । वह मेघके समान गम्भीर गर्जना करता था । क्रोधपूर्वक उड़कर तीखी चोंचवाले उस बकासुरने कंसको निगल लिया । कंसका शरीर वज्रकी भाँति कठोर था । निगले जानेपर उसने उस दानवके गलेकी नलीको रूँध दिया । फिर महान् बली बकासुरने कण्ठ छिद जानेके कारण कंसको मुँहसे बाहर उगल दिया । तदनन्तर कंसने उस दैत्यको पकड़कर जमीनपर पटका और दोनों हाथोंसे घुमाता हुआ उसे वह युद्धभूमिमें घसीटने लगा । बकासुरकी एक बहन थी । उसका नाम था - ' पूतना ' । वह भी युद्ध करनेके
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३२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड लिये उद्यत हो गयी । उसे उपस्थित देखकर कंसने तदनन्तर महान् पराक्रमी कंसको देखकर भौमासुरने भी हँसते हुए कहा - ' पूतने! मेरी बात सुन लो । तुम स्त्री पराजय स्वीकार कर ली । फिर देवताओंसे युद्ध हो, मैं तुम्हारे साथ कभी भी लड़ नहीं सकता । अब करनेके समय सहायता प्रदान करनेके लिये वह यह बकासुर मेरा भाई और तुम बहन होकर रहो । ' कंसके साथ सौहार्दपूर्ण बर्ताव करने लगा ॥ ५२–६४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कंसके बलका वर्णन ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय कंसकी दिग्विजय - शम्बर, व्योमासुर, बाणासुर, वत्सासुर, कालयवन तथा देवताओंकी पराजय श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर कंस पहले जीते हुए प्रलम्ब आदि अन्य दैत्योंके साथ शम्बरासुरके नगरमें गया । वहाँ उसने अपना युद्ध -विषयक अभिप्राय कह सुनाया । शम्बरासुरने अत्यन्त पराक्रमी होनेपर भी कंसके साथ युद्ध नहीं किया । कंसने उन सभी अत्यन्त बलशाली असुरोंके साथ मैत्री स्थापित कर ली । त्रिकूट पर्वतके शिखरपर व्योमनामक एक बलवान् असुर सो रहा था । कंसने वहाँ पहुँचकर उसके ऊपर लात चलायी । उसके प्रहारसे व्योमासुरकी निद्रा टूट गयी और उसने उठकर सुदृढ़ बँधे हुए जोरदार मुक्कोंसे कंसपर आघात किया । उस समय उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे । कंस और व्योमासुरमें भयंकर युद्ध छिड़ गया । वे दोनों एक - दूसरेको मुक्कोंसे मारने लगे । कंसके मुक्कोंकी मारसे व्योमासुर अपनी शक्ति और उत्साह खो बैठा । उसको चक्कर आने लगा । यह देख कंसने उसको अपना सेवक बना लिया । उसी समय मैं ( नारद ) वहाँ जा पहुँचा । कंसने मुझे प्रणाम किया और पूछा - ' हे देव! मेरी युद्धविषयक आकाङ्क्षा अभी पूरी नहीं हुई है । मुझे शीघ्र बताइये, अब मैं कहाँ, किसके पास जाऊँ? ' तब मैंने उससे कहा - ' तुम महाबली दैत्य बाणासुरके पास जाओ । ' मुझे तो युद्ध देखनेका चाव रहता ही है । मेरी इस प्रकारकी प्रेरणासे प्रेरित हो बाहुबलके मदसे उन्मत्त रहनेवाला कंस शोणितपुर गया ॥ १-७ ॥ कंसकी युद्धविषयक प्रतिज्ञाको सुनकर महाबली बाणासुर अत्यन्त कुपित हो उठा । उसने मेघके समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वीपर बड़े जोरसे लात मारी । उसका वह पैर घुटनेतक धरतीमें धँस गया और पातालके निकटतक जा पहुँचा । ऐसा करके बाणने कंससे कहा - ' पहले मेरे इस पैरको तो उठाओ! ' उसकी यह बात सुनकर मदोन्मत्त कंसने दोनों हाथसे उसके पैरको उखाड़कर ऊपर कर दिया । उसका पराक्रम बड़ा प्रचण्ड था । जैसे हाथी गड़े हुए कठोर दण्ड या खंभेको अनायास ही उखाड़ लेता है, उसी प्रकार कंसने बाणासुरके पैरको खींचकर ऊपर कर दिया । उसके पैरके उखड़ते ही पृथ्वीतलके लोक और सातों पाताल हिल उठे, अनेक पर्वत धराशायी हो गये और सुदृढ़ दिग्गज भी अपने स्थानसे विचलित हो उठे । अब बाणासुरको युद्धके लिये उद्यत हुआ देख भगवान् शंकर स्वयं वहाँ आ गये और सबको समझा - बुझाकर युद्धसे रोक दिया । फिर उन्होंने बलिनन्दन बाणसे कहा - ' दैत्यराज! भगवान् श्रीकृष्णको छोड़कर भूतलपर दूसरा कोई ऐसा वीर नहीं है, जो युद्धमें इसे जीत सकेगा । परशुरामजीने इसे ऐसा ही वर दिया है और अपना वैष्णव धनुष भी अर्पित कर दिया है ॥ ८- १३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यों कहकर साक्षात् महेश्वर शिवने कंस और बाणासुरमें तत्काल बड़ी शान्तिके साथ मनोरम सौहार्द स्थापित कर दिया ।
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अध्याय ७ ] कंसकी दिग्विजय - शम्बर, व्योमासुर, बाणासुर तथा देवताओंकी पराजय ३३ तदनन्तर पश्चिम दिशामें महासुर वत्सका नाम सुनकर कंस वहाँ गया । उस दैत्यराजने बछड़ेका रूप धारण करके कंसके साथ युद्ध छेड़ दिया । कंसने उस बछड़ेकी पूँछ पकड़ ली और उसे पृथ्वीपर दे मारा । इसके बाद उसके निवासभूत पर्वतको अपने अधिकारमें करके कंसने म्लेच्छ - देशोंपर धावा किया । मेरे मुखसे महाबली दैत्य कंसके आक्रमणका समाचार सुनकर कालयवन उसका सामना करनेके लिये निकला । उसकी दाढ़ी - मूँछका रंग लाल था और उसने हाथमें गदा ले रखी थी । कंसने भी लाख भार लोहेकी बनी हुई अपनी गदा लेकर यवनराजपर चलायी और सिंहके समान गर्जना की । उस समय कंस और कालयवनमें बड़ा भयानक गदा - युद्ध हुआ । दोनोंकी गदाओंसे आगकी चिनगारियाँ बरस रही थीं । वे दोनों गदाएँ परस्पर टकराकर चूर - चूर हो गयीं । तब कंसने कालयवनको पकड़कर उसे धरतीपर दे मारा और पुनः उठाकर उसे पटक दिया । इस तरह उसने उस यवनको मृतक - तुल्य बना दिया । यह देख कालयवनकी सेना कंसपर बाणोंकी वर्षा करने लगी । तब बलवान् दैत्यराज कंसने गदाकी मारसे उस सेनाका कचूमर निकाल दिया । बहुत - से हाथियों, घोड़ों, उत्तम रथों और वीरोंको धराशायी करके गदा- युद्ध करनेवाला वीर कंस समराङ्गणमें मेघके समान गर्जना करने लगा ॥ १४–२२ ॥ फिर तो सारे म्लेच्छ सैनिक रणभूमि छोड़कर भाग निकले । कंस बड़ा नीतिज्ञ था; उसने भयभीत होकर भागते हुए म्लेच्छोंपर आघात नहीं किया । कंसके पैर ऊँचे थे, दोनों घुटने बड़े थे, जाँघें खंभोंके समान जान पड़ती थीं । उसका कटिप्रदेश पतला, वक्षःस्थल किवाड़ोंके समान चौड़ा और कंधे मोटे थे । उसका शरीर हृष्ट - पुष्ट, कद ऊँचा और भुजाएँ विशाल थीं । नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान प्रतीत होते थे । सिरके बाल बड़े - बड़े थे, देहकी कान्ति अरुण थी । उसके अङ्गपर काले रंगका वस्त्र सुशोभित था । मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल, गलेमें हार और वक्षपर कमलोंकी माला शोभा दे रही थी । वह प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी जान पड़ता था । खड्ग, तूणीर, कवच और मुद्गर आदिसे सम्पन्न धनुर्धर एवं मदमत्त वीर कंस देवताओंको जीतनेके लिये अमरावती पुरीपर जा चढ़ा । चाणूर, मुष्टिक, अरिष्ट, शल, तोशल, केशी, प्रलम्ब, वक, द्विविद, तृणावर्त, अघासुर, कूट, भौम, बाण, शम्बर, व्योम, धेनुक और वत्स नामक असुरोंके साथ कंसने अमरावतीपुरीपर चारों ओरसे घेरा डाल दिया॥२३–२८ ॥ कंस आदि असुरोंको आया देख, त्रिभुवन सम्राट् देवराज इन्द्र समस्त देवताओंको साथ ले रोषपूर्वक युद्धके लिये निकले । उन दोनों दलोंमें भयंकर एवं रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध होने लगा । दिव्य शस्त्रोंके समूह तथा चमकीले तीखे बाण छूटने लगे । इस प्रकार शस्त्रोंकी बौछारसे वहाँ अन्धकार - सा छा गया । उस समय रथपर बैठे हुए सुरेश्वर इन्द्रने कंसपर विद्युत् के समान कान्तिमान् सौ धारोंवाला वज्र छोड़ा । किंतु उस महान् असुरने इन्द्रके वज्रपर मुद्गरसे प्रहार किया । इससे वज्रकी धारें टूट गयीं और वह युद्ध - भूमिमें गिर पड़ा । तब वज्रधारीने वज्र छोड़कर बड़े रोषके साथ तलवार हाथमें ली और भयंकर सिंहनाद करके तत्काल कंसके मस्तकपर प्रहार किया । परंतु जैसे हाथीको फूलकी मालासे मारा जाय और उसको कुछ पता न लगे, उसी प्रकार खड्गसे आहत होनेपर भी कंसके सिरपर खरोंचतक नहीं आयी । उस दैत्यराजने अष्टधातुमयी मजबूत गदा, जो लाख भार लोहेके बराबर भारी थी, लेकर इन्द्रपर चलायी । उस गदाको अपने ऊपर आती देख नमुचिसूदन वीर देवेन्द्रने तत्काल हाथसे पकड़ लिया और उसे उस दैत्यपर ही दे मारा । इन्द्रके रथका संचालन मातलि कर रहे थे और देवेन्द्र शत्रुदलका दलन करते हुए युद्धभूमिमें विचर रहे थे । कंसने परिघ लेकर असुरद्रोही इन्द्रके कंधेपर प्रहार किया । उस प्रहारसे देवराज क्षणभरके लिये मूच्छित हो गये ॥ २ ९ –३७ ॥ उस समय समस्त मरुद्रणोंने गीधके पंखवाले चमकीले बाणसमूहोंसे कंसको उसी तरह ढक दिया, जैसे वर्षाकालके सूर्यको मेघमालाएँ आच्छादित कर देती हैं । यह देख एक हजार भुजाओंसे युक्त बलवान् वीर बाणासुरने बारंबार धनुषकी टंकार करते हुए अपने
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३४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड बाण - समूहोंसे उन मरुद्गणोंको घायल करना आरम्भ किया । बाणासुरपर भी वसु, रुद्र, आदित्य तथा अन्यान्य देवता एवं ऋषि चारों ओरसे टूट पड़े और नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा उसपर प्रहार करने लगे । इतनेमें ही प्रलम्ब आदि असुरोंके साथ गर्जना करता हुआ भौमासुर आ पहुँचा । उसके उस भयानक सिंहनादसे देवतालोग मूच्छित होकर भूमिपर गिर पड़े । उस समय देवराज इन्द्र शीघ्र ही उठ गये और लाल आँखें किये ऐरावत हाथीपर आरूढ हो उस मदमत्त गजराजको कंसकी ओर उसे कुचल डालनेके लिये प्रेरित करने लगे । अङ्कुशकी मारसे कुपित हुआ वह गजराज शत्रुओंको अपने पैरोंसे मार - मारकर युद्धभूमिमें गिराने लगा । उसके गलेमें घंटे बँधे हुए थे, वह किङ्किणीजाल तथा रत्नमय कम्बलसे मण्डित था । गोरोचन, सिन्दूर और कस्तूरीसे उसके मुख - मण्डलपर पत्ररचना की गयी थी । कंसने निकट आनेपर उस महान् गजराजके ऊपर सुदृढ़ मुक्केसे प्रहार किया । साथ ही उसने समराङ्गणमें देवराज इन्द्रपर भी दूसरे मुक्केका प्रहार किया । उसके मुक्केकी मार खाकर इन्द्र ऐरावतसे दूर जागिरे । ऐरावत भी धरतीपर घुटने टेककर व्याकुल हो गया । फिर तुरंत ही उठकर गजराजने दैत्यराज कंसपर दाँतोंसे आघात किया और उसे सूँड़पर उठाकर कई योजन दूर फेंक दिया । कंसका शरीर वज्रके समान सुदृढ़ था । वह उतनी दूरसे गिरनेपर भी घायल नहीं हुआ । उसके मनमें किंचित् व्याकुलता हुई; किंतु रोषसे ओठ फड़फड़ाता अत्यन्त जोशमें भरकर वह पुनः युद्धभूमिमें जा पहुँचा॥३८–४९ ॥ कंसने नागराज ऐरावतको पकड़कर समराङ्गणमें धराशायी कर दिया और उसकी सूँड़ मरोड़कर उसके दाँतोंको चूर - चूर कर दिया । अब तो ऐरावत हाथी उस समराङ्गणसे तत्काल भाग चला । वह बड़े - बड़े वीरोंको गिराता हुआ देवताओंकी राजधानी अमरावती पुरीमें जा घुसा । तदनन्तर दैत्यराज कंसने वैष्णव धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर बाण - समूहों तथा धनुषकी टंकारोंसे देवताओंको खदेड़ना आरम्भ किया । कंसकी मार पड़नेसे देवताओंके होश उड़ गये और वे चारों दिशाओंमें भाग निकले । कुछ देवताओंने रणभूमिमें अपनी शिखाएँ खोल दीं और ' हम डरे हुए हैं ( हमें न मारो ) ' – इस प्रकार कहने लगे । कुछ लोग हाथ जोड़कर अत्यन्त दीनकी भाँति खड़े हो गये और अस्त्र - शस्त्र नीचे डालकर उन्होंने अपने अधोवस्त्रकी लाँग भी खोल डाली । कुछ लोग अत्यन्त व्याकुल हो युद्धस्थलमें राजा कंसके सम्मुख खड़े होनेतकका साहस न कर सके । इस प्रकार देवताओंको भगा हुआ देख वहाँके छत्र - युक्त सिंहासनको साथ लेकर नरेश्वर कंस समस्त दैत्योंके साथ अपनी राजधानी मथुराको लौट आया ॥ ५०–५५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कंसकी दिग्विजय ' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय सुचन्द्र और कलावतीके पूर्व - पुण्यका वर्णन, उन दोनोंका वृषभानु तथा कीर्तिके रूपमें अवतरण श्रीगर्गजी कहते हैं— शौनक! राजा बहुलाश्वका राजा बहुलाश्वने कहा- भगवन्! आपने अपने हृदय भक्तिभावसे परिपूर्ण था । हरिभक्तिमें उनकी आनन्दप्रद, नित्य वृद्धिशील, निर्मल यशसे मेरे कुलको अविचल निष्ठा थी । उन्होंने इस प्रसङ्गको सुनकर पृथ्वीपर अत्यन्त विशद ( उज्ज्वल ) बना दिया; ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ एवं महाविलक्षण स्वभाववाले देवर्षि क्योंकि श्रीकृष्णभक्तोंके क्षणभरके सङ्गसे साधारण नारदजीको प्रणाम किया और पुनः पूछा ॥ १ ॥ जन भी सत्पुरुष - महात्मा बन जाता है । इस विषयमें