गर्ग संहिता — पृष्ठ 221–230
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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अध्याय १४ ] उद्धवका श्रीकृष्ण - सखाओंको नन्दराजने भी शय्यापर स्थित हो गद्गद वाणीमें कहा ॥ ६-८ ॥ नन्द बोले – महामते उद्धव! क्या मेरे मित्र वसुदेव मथुरापुरीमें अपने पुत्रोंके साथ सकुशल हैं? सखे! कंसके मर जानेपर यादव - शिरोमणियोंको इस भूतलपर परम सुख - सुविधाकी प्राप्ति हुई है । क्या कभी बलरामसहित माधव अपनी माता यशोदाको भी याद करते हैं? यहाँके ग्वाल, गोवर्धन पर्वत, गौओंके समुदाय और व्रज, वृन्दावन, यमुना- पुलिन अथवा यमुना नदीका भी कभी स्मरण करते हैं? हा दैव! अब मैं किस समय बिम्बफलके समान लाल ओठ वाले अपने पुत्र कमल नयन श्यामसुन्दरको बलराम और ग्वाल - बालोंके साथ बार - बार घरके आँगन और चबूतरोंपर लोटते देखूँगा? कुञ्ज, निकुञ्ज, महानदी यमुना, गिरिराज गोवर्धन, यह वृन्दावन तथा दूसरे दूसरे वन, गृह, लता, वृक्ष और गौओंके समुदाय तथा इनके साथ ही यह सारा संसार मुकुन्दके बिना विषतुल्य प्रतीत हो रहा है । कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीकृष्णके बिना मेरे जीवन, शयन और भोजनको भी धिक्कार है । इस भूतलपर चन्द्रमासे बिछुड़े हुए चकोरकी भाँति मैं उनके आगमनकी बहुत अधिक आशासे ही जीवन धारण कर रहा हूँ । महामते! मैं श्रीकृष्ण और बलरामको परात्पर परमेश्वर ही मानता हूँ । देवताओंके अत्यन्त प्रार्थना करनेपर वे पूर्णतम भगवान् भूमिका भार उतारनेके लिये स्वेच्छासे अवतीर्ण हुए हैं और अब संतोंकी रक्षामें तत्पर हैं ॥ ९ -१४ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! परमेश्वर श्रीहरिका बार - बार स्मरण करके नवनन्दराज तकियेपर सिर रखकर चुप हो गये । उनका अङ्ग अङ्ग उत्कण्ठाके कारण रोमाञ्चयुक्त और विह्वल हो रहा था । राजन्! उस समय श्रीकृष्णसखा उद्धवके देखते - देखते श्रीनन्दराजके नेत्र - कमलोंसे निकलती हुई अश्रुधारा बिस्तर और तकियेसहित शय्याको भिगोकर आँगनमें बह चली ॥ १५-१६ ॥ मथुरापुरीसे उद्धवजीका आना सुनकर सती यशोदा तुरंत दरवाजेके किवाड़ोंके पास चली आयीं और आश्वासन; नन्द और यशोदासे बातचीत २१५ अपने पुत्रकी चर्चा सुनने लगीं । उस समय स्नेहवश उनके स्तनोंसे दूध झरने लगा और नेत्र - कमलोंसे आँसुओंकी धारा बह चली । फिर वे लाज छोड़कर पुत्रस्नेहसे उद्धवके पास चली आयीं और सारा कुशल-मङ्गल स्वयं पूछने लगीं । नेत्रोंसे बहती हुई अश्रुधाराको आँचलसे पोंछकर, हरिकी भावनासे विह्वल नन्दजीकी उपस्थितिमें वे बोलीं ॥ १७-१८ ॥ यशोदाने कहा - उद्धव! क्या कन्हैया कभी मुझको अथवा अपने बाबा नन्दराजको याद करता है? इनके भाई सन्नन्द उसे देखनेके लिये बहुत उत्सुक रहते हैं, क्या वह इनका भी स्मरण करता है? इस व्रजमें नौ नन्द, नौ उपनन्द और छः वृषभानु रहते हैं । क्या कन्हैया इन सबको याद करता है? जिनकी गोदीमें बैठकर उसने वन - वनमें बालकेलि की थी, जिनके साथ नन्दनन्दन सानन्द गेंद खेला करता था, उन अपने स्नेही गोपोंका वह कभी स्वतः स्मरण करता है? मुझे मेरे जीवनमें एक ही यह बेटा मिला था, मेरे बहुत - से पुत्र नहीं हैं; फिर भी वह एक ही पुत्र मुझ दीन - दुःखी माँको छोड़कर दूसरी दिशाको चला गया । महामते! स्नेह करनेवालोंके लिये कष्ट होना अनिवार्य है, यह कैसी आश्चर्यकी बात है । मानद! बताओ – मैं पुत्रके बिना क्या करूँ, कैसे जीवित रहूँ? ' मैया मुझे दही दे, या मुझे ताजा माखन दे ' – इस प्रकार मधुर वाणीमें बोलकर वह घरमें सदा हठ किया करता था । वही कन्हैया अब दोपहरमें कैसे भोजन करता होगा? यह मेरा लाला कन्हैया व्रजवासियोंका जीवन है, व्रजका धन है, इस कुलका दीपक है तथा अपनी बाल लीलासे सबके मनको मोह लेनेवाला है । उसके लालन - पालनमें मेरे इतने वर्षोंके दिन एक क्षणकी भाँति बीत गये । अहो! आज नन्दनन्दनके बिना वही दिन एक कल्पके समान भारी हो गया है । जिस कन्हैयाको ग्वाल - बालोंके साथ बछड़े चरानेके लिये मैं गाँवकी सीमापर और नदीके किनारे भी नहीं जाने देती थी, हाय! वही अब मथुरा चला गया! ' ओ मोहन! ' - यों दूरसे पुकारकर जो उसे गोदमें लेते और लाड़ - प्यार करते थे, वे ही नन्दराज उसके बिना खेद और विषादमें डूबे रहते हैं । अहो! एक दिन
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२१६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड दहीका भाँड़ फोड़ देनेपर मुझ निर्मोहिनीने उस बच्चेको रस्सीसे बाँध दिया था । आज वह करतूत याद करके मैं शोकमें डूब रही हूँ । यह आँगन, सारा सभामण्डप, मकान, सरोवर, गली, व्रज, महलोंकी छतें सब सूनी हो गयी हैं । मुकुन्दके बिना यह सारा जगत् विषके तुल्य प्रतीत होता है । कन्हैयाके बिना मेरे इस जीवनको धिक्कार है ॥ १ ९ -३० ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! यशोदा और नन्दमें उच्चकोटिके प्रेमका लक्षण प्रकट हुआ देख उद्धव अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये । उनका अपना सारा ज्ञानाभिमान गल गया ॥ ३१ ॥
उद्धव बोले- अहो! महाप्रभु नन्द और यशोदाजी! मेरे शरीरमें जितने रोम हैं, वे सब यदि जिह्वाएँ हो जायँ तो उन जिह्वाओंद्वारा भी मैं आप दोनोंकी महत्ताका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ । आप दोनोंने साक्षात् परिपूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके प्रति ऐसी प्रेमलक्षणा - भक्ति की है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है । आप दोनोंको जो सनातन प्रेमलक्षणाभक्ति प्राप्त हुई है, वह तीर्थाटन, तपस्या, दान, सांख्य और योगसे भी सुलभ नहीं है । हे नन्द और हे व्रजेश्वरी यशोदे! आप दोनों शोक न करें । ये दो पत्र आपलोग शीघ्र ही अपने हाथमें लें । इन पत्रोंको निस्संदेह श्रीकृष्णने ही दिया है । अपने बड़े भाई बलरामजीके साथ नन्दनन्दन श्रीकृष्ण यदुपुरीमें कुशलपूर्वक हैं । यादवका महान् कार्य सिद्ध करके बलरामसहित श्रीभगवान् यहाँ भी थोड़े ही समयमें आयेंगे ॥ ३२-३६ ॥ तुम नन्दनन्दन श्रीकृष्णको परिपूर्णतम परमात्मा समझो । वे कंस आदि दैत्योंका वध और भक्तोंकी रक्षा करनेके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे आपके घरमें अवतीर्ण हुए हैं । बलरामसहित श्रीहरिने जन्मदानसे ही अद्भुत लीला आरम्भ कर दी थी । पूतनाके प्राणोंका अपहरण, शकटका भञ्जन, तृणावर्तको मार गिराना, यमलार्जुन वृक्षोंको तोड़ गिराना और अपने मुखमें यशोदाजीको विश्वरूपका दर्शन कराना आदि उनकी उन प्रभावशाली भगवान्ने गोपोंके देखते - देखते बकासुर और वत्सासुरका वध किया, अघासुरको मारा, धेनुकासुरको कुचल डाला, कालियनागको रौंद डाला, दावानलको पी लिया तथा तत्पश्चात् बलदेवजीने प्रलम्बासुरका वध किया । आप सब लोगोंके देखते हुए जैसे गजराज अपनी सूँड़में कमल धारण करता है, उसी प्रकार श्रीहरिने एक ही हाथसे लीलापूर्वक गोवर्धन पर्वतको उखाड़कर उठा लिया । उन जगदीश्वरने शङ्खचूड़से उसकी चूडामणि ले ली और अरिष्टासुरका वध करके केशीको भी कालके गालमें भेज दिया । व्योमासुर बड़ा भारी दैत्य था, किंतु भगवान्ने उसे मुक्केसे ही मसल डाला ॥ ३७ – ४४ ॥ महामते! इसी प्रकार मथुरामें भी उन्होंने विचित्र पराक्रम प्रकट किया । कंसका रजक बड़ा डींग हाँकता था, किंतु श्रीहरिने एक ही हाथकी चोटसे उसका काम तमाम कर दिया । सब लोगोंके देखते - देखते कंसके प्रचण्ड धनुर्दण्डको बीचसे ही खण्डित कर दिया- ठीक उसी तरह, जैसे हाथी ईखके डंडेको तोड़ डालता है । कुवलयापीड नामक हाथी बलमें दस हजार हाथियोंकी समानता करता था, किंतु भगवान्ने उसकी सूँड़ पकड़कर उसे भूतलपर दे मारा । चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशलको माधवने मल्लयुद्ध करके भूपृष्ठपर मार गिराया । मदमत्त दैत्य कंस एक लाख हाथियोंके समान बलशाली था; परंतु उसे श्रीकृष्णने मञ्चसे उठाकर भुजाओंके वेगसे घुमाते हुए पृथ्वीपर उसी तरह पटक दिया, जैसे कोई बालक कमण्डलुको गिरा दे । फिर जैसे हाथीपर सिंह कूदे, उसी प्रकार वे कंसपर कूद पड़े । कंसके कङ्क आदि छोटे भाइयोंका महाबली बलदेवने मुद्गरसे ही तुरंत उसी प्रकार कचूमर निकाल दिया, जैसे किसी सिंहने बहुत - से मृगोंको मौतके घाट उतार दिया हो । अपने गुरुको दक्षिणा देनेके लिये महासागरमें कूदकर स्वयं श्रीहरिने शङ्खरूपधारी पञ्चजन नामक असुरका संहार कर डाला । महानन्द! ये अद्भुत चरित्र भगवान् श्रीकृष्णके बिना कौन कर सकता है? अलौकिक लीलाएँ हैं । वृन्दावनमें बछड़े चराते हुए उन श्रीहरिको नमस्कार है ॥ ४५ - ५३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' नन्दराज और उद्धवका मिलन ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
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पंद्रहवाँ गोपाङ्गनाओंके साथ उद्धवका कदली करके श्रीकृष्णद्वारा भेजे नारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार श्रीहरिकी चर्चा करते हुए नन्द और उद्धवकी वह रात एक क्षण समान व्यतीत हो गयी, उनके हर्षको बढ़ानेवाली होनेके कारण उसका ‘ क्षणदा ' ( आनन्ददायिनी ) नाम चरितार्थ हो गया । जब ब्राह्ममुहूर्त आया, तब सारी गोपाङ्गनाओंने उठकर अपने - अपने द्वारकी देहली एवं आँगन लीपकर वहाँ प्रज्वलित दीप रख दिये । फिर हाथ - पैर धोकर मथानीसे रस्सी लगाकर वे स्नेहयुक्त दहीको सब ओरसे मथने लगीं । मथानीकी रस्सी खींचनेसे चञ्चल हुए हार और हाथोंके कंगन बज रहे थे । उनकी वेणियोंसे फूल झर - झरकर गिर रहे थे और चमकते हुए कुण्डल उनके कानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे । वे सब की सब चन्द्रमुखी, कमलनयनी तथा विचित्र वर्णोंके वस्त्र धारण करनेके कारण अत्यन्त मनोहर थीं । श्रीकृष्ण और बलदेवके मङ्गलमय चरित्रोंका घर - घरमें जहाँ - तहाँ प्रेमपूर्वक गान कर रही थीं । प्रत्येक गोष्ठमें सुन्दर गौएँ इधर - उधर रँभा रही थीं । गली - गलीमें सर्वत्र दही मथनेके शब्दसे मिश्रित गोपाङ्गनाओंका गीत सुनकर विस्मित हुए उद्धव इस प्रकार बोल उठे – ' अहो! इस नन्द - नगरमें तो भक्तिदेवी यत्र - तत्र - सर्वत्र नृत्य कर रही हैं । ' यों कहते हुए वे गाँव-से बाहर यमुना नदीमें स्नान करनेके लिये गये ॥ १-८ ॥ उस समय उद्धवके रथको देखकर गोपियाँ बोलीं – सखियो! आज यहाँ किसका रथ आ पहुँचा है? अथवा वह क्रूर अक्रूर ही तो फिर नहीं आया है, जो नूतन - कमल - दल- लोचन श्रीनन्दनन्दनको महापुरी मथुरा लिवा ले गया था? जैसे कद्रूने जगत् के लोगोंको मारने या डँसवानेके लिये ही इधर - उधर विषधर नागको उत्पन्न किया है, उसी प्रकार स्नेही सत्पुरुषोंको तीव्र ताप देनेके लिये ही न जाने उसकी माताने उसे किस कुसमयमें जन्म दिया था? जो कंसका स्वार्थसाधक तथा कंसका ही अत्यन्त निर्दय सखा है, वह इस व्रजमण्डलमें फिर क्यों आया है? अपने मरे हुए स्वामीकी पारलौकिक क्रिया क्या आज वह अध्याय - वनमें जाना और वहाँ उनकी स्तुति गये पत्र अर्पित करना हमलोगोंके प्राणोंसे ही सम्पन्न करेगा? ॥ ९ –११ ॥ नारदजी कहते हैं — राजन्! इस प्रकार बातचीत करती हुई व्रजकी गोपाङ्गनाएँ सारथिके मुखको दो अङ्गुलियोंसे ठोककर निकटसे पूछने लगीं - ' जल्दी बताओ, यह किसका रथ है? ' बेचारा सारथि आर्त-भावसे हक्का - बक्का - सा होकर देखने लगा । इतनेमें उन्हें उद्धवजी आते दिखायी दिये । उनकी कान्ति मेघके समान श्याम थी । नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल थे । आकार भी श्रीकृष्णसे मिलता-जुलता था । वे करोड़ों कामदेवोंको मोह लेनेवाले जान पड़ते थे । उनके शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था । उन्होंने गलेमें नूतन वैजयन्ती माला धारण कर रखी थी, जिसपर झुंड के झुंड भ्रमर टूटे पड़ते थे । उनके हाथमें सहस्रदल कमल सुशोभित था । उन्होंने हाथोंमें बाँसुरी और बेंतकी छड़ी ले रखी थी । उनका वेष बड़ा मनोहर था । करोड़ों बालरवियोंकी कान्तिसे युक्त मुकुट उनके मस्तकको मण्डित कर रहा था । वक्षःस्थलमें कौस्तुभ नामक महामणि प्रकाशमान थी और रत्नमय कुण्डल उनके कपोलमण्डलकी कान्ति बढ़ा रहे थे । नरेश्वर! चाल-ढाल, आकृति, शोभा, शरीर, हास और मधुरस्वर - सभी दृष्टियोंसे श्रीकृष्णका सारूप्य धारण करनेवाले उन उद्धवको देखकर समस्त गोपियाँ चकित हो गयीं और उन्हें गोविन्दका सखा जानकर उनके सामने आयीं ॥ १२–१५ ॥ यह जानकर कि ये भगवान् श्रीहरिका संदेश लेकर आये हैं, वे नीतियुक्त सुन्दर वचन बोलकर उनके प्रति आदर दिखाने लगीं तथा संतोंके स्वामी गोविन्दकी गूढ़ कुशल पूछनेके लिये उन उद्धवजीको साथ लेकर वे कदलीवनमें गयीं, जहाँ वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा यमुनाके तटपर मनोहर निकुञ्जमन्दिरमें भगवान्के विरहसे आतुर होकर बैठी थीं और उन श्रीहरिके बिना सारे जगत्को सर्वथा सूना मानती थीं । जो पहले केलोंके पत्तोंसे और घिसे हुए चन्दनके पङ्कसे शीतल मेघमन्दिर - सा प्रतीत होता था तथा यमुनाकी
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२१८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड चञ्चल चारु तरंगोंकी फुहार पड़नेसे जहाँ ऐसा प्रतीत होता था कि साक्षात् सुधाकिरण चन्द्रमाकी सुधाराशि स्वतः गल रही है, ऐसा कदली - वन सारा का सारा श्रीराधाकी वियोगाग्निके तेजसे अत्यन्त झुलस गया था । केवल श्रीकृष्णके शुभागमनकी आशासे श्रीराधा अपने शरीरकी रक्षा कर रही थीं । श्रीकृष्णके सखा उद्धवका आगमन सुनकर श्रीराधाने अपनी सखियोंके द्वारा अन्न, पान और मधुपर्क आदि माङ्गलिक वस्तुएँ अर्पितकर उनका बड़ा आदर - सत्कार किया । उस समय वे बारंबार ' श्रीकृष्ण - कृष्ण ' का उच्चारण करती थीं । गोविन्दके वियोगसे खिन्न हुई राधा अमावास्यामें प्रविष्ट चन्द्रकलाकी भाँति क्षीण हो रही थीं । उस समय उद्धवने नताङ्गी एवं कृशाङ्गी राधाको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वे हर्षपूर्वक बोले ॥ १६–२१ ॥ उद्धवने कहा— श्रीराधे! श्रीकृष्ण सदा परि पूर्णतम भगवान् हैं और आप सदा परिपूर्णतमा भगवती हैं । श्रीकृष्णचन्द्र नित्यलीलापरायण हैं और आप नित्यलीलाका सम्पादन करनेवाली नित्यलीलावती हैं । श्रीकृष्ण भूमा हैं और आप इन्दिरा हैं । श्रीकृष्ण नित्य सनातन ब्रह्मा हैं और आप सदा उनकी शक्ति सरस्वती हैं । श्रीकृष्ण शिव हैं और आप कल्याणस्वरूपा शिवा हैं । भगवान् श्रीकृष्ण विष्णु हैं और आप निश्चय ही उनकी पराशक्ति वैष्णवी हैं । आदिदेवता श्रीहरि कौमारसर्गी - सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार हैं तथा आप ज्ञानमयी शुभा स्मृति हैं । श्रीहरि प्रलयकालके जलमें क्रीड़ा करनेवाले यज्ञवराह हैं और आप ही वसुधा हैं । श्रीहरि मनसे जब देवर्षिवर्य नारद बनते हैं, तब साक्षात् आप ही उनके हाथकी वीणा होती हैं । श्रीहरि जब धर्मनन्दन नर और नारायण होते हैं, तब आप ही जगत्में शान्ति स्थापित करनेवाली साक्षात् शान्तिरूपिणी होती हैं । श्रीकृष्ण ही साक्षात् महाप्रभु कपिल हैं और आप ही सिद्धसेविता सिद्धि । राधे! श्रीकृष्ण महामुनीश्वर दत्तात्रेय हैं और आप ही नित्यज्ञानमयी सिद्धि । श्रीहरि यज्ञ हैं और आप दक्षिणा । वे उरुक्रम वामन हैं तो आप सदा उनकी शक्ति जयन्ती हैं । श्रीहरि जब समस्त राजाओंके अधिराज पृथु होते हैं, तब आप उन महाराजकी पटरानी अर्चिर्देवीके रूपमें प्रकट होती हैं । शङ्खासुरका वध करनेके लिये जब श्रीहरिने मत्स्यावतार ग्रहण किया, तब आप श्रुतिरूपा हुईं । मन्दराचलद्वारा समुद्र-मन्थनके समय श्रीहरि कच्छपरूपमें प्रकट हुए, तब आप वासुकिनागमें शुभदायिनी नेती शक्तिरूपसे प्रकट हुईं । शुभे! परमेश्वर श्रीहरि जब पीड़ाहारी धन्वन्तरिके रूपमें आविर्भूत हुए, तब आप दिव्य सुधामयी ओषधिके रूपमें दृष्टिगोचर हुईं । श्रीकृष्णचन्द्र जब मोहिनीरूपमें सामने आये, तब आप उनके भीतर विश्व - विमोहिनी मोहिनीके रूपमें अभिव्यक्त हुईं । श्रीहरि जब नृसिंहरूप धारण करके नृसिंहलीला करने लगे, तब आप निज-भक्तवत्सला लीलाके रूपमें सामने आयीं । जब श्रीकृष्ण वामनरूप धारण किया, तब आप अपने भक्तजनोंद्वारा कीर्तित कीर्तिरूपिणी हुईं । जब श्रीहरि भृगुनन्दन परशुरामका रूप धारण करके सामने आये, तब आप ही उनके कुठारकी धारा बनीं । श्रीकृष्णचन्द्र जब रघुकुलचन्द्र श्रीराम हुए, तब आप ही उनकी धर्मपत्नी जनकनन्दिनी सीता थीं । जब शार्ङ्गधन्वा श्रीहरि बादरायणमुनि व्यासके रूपमें प्रकट होते हैं, तब आप वेदान्ततत्त्वको प्रकट करनेवाली देववाणीके रूपमें आविर्भूत होती हैं । वृष्णि-कुल - तिलक माधव ही जब संकर्षणरूप होते हैं, तब आप ही ब्रह्मभवा रेवतीके रूपमें उनकी सेवामें विराजमान होती हैं । श्रीहरि जब असुरोंको मोहित करनेवाले बुद्धके रूपमें प्रकट होते हैं, तब आप विश्वजनमोहिनी बुद्धि होती हैं । जब श्रीहरि धर्मपालक कल्किके रूपमें प्रकट होंगे, तब आप कृतिरूपिणी होंगी ॥ २२ –३३ ॥ चन्द्रमुखी राधे! चन्द्रमण्डलमें श्रीकृष्ण ही चन्द्र-रूप हैं और आप ही सदा चन्द्रिकारूपिणी हैं । आकाशगत सूर्यमण्डलमें श्रीकृष्ण ही सूर्य हैं और आप ही उनकी प्रभामयी परिधिके रूपमें प्रतिष्ठित हैं । राधे! निश्चय ही यादवेन्द्र श्रीहरि सदा देवराज इन्द्रके रूपमें विराजते हैं और आप वहीं शचीश्वरी शचीके रूपमें निवास करती हैं । परमेश्वर श्रीहरि ही हिरण्यरेता अग्नि हैं और आप ही सदा हिरण्मयी पराज्योति हैं । श्रीकृष्ण ही राजराज कुबेरके रूपमें विराजते हैं और
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अध्याय १६ ] उद्धवद्वारा श्रीराधा तथा गोपीजनोंको आश्वासन २१ ९ आप ही उनकी निधिमें निधीश्वरी होकर शोभा पाती हैं । साक्षात् श्रीहरि ही क्षीरसागर हैं और आप ही तरंगित होनेवाली श्वेत रेशमके समान शुक्लवर्णा तरङ्गमाला हैं । सर्वेश्वर श्रीहरि जब - जब कोई शरीर धारण करते हैं, तब - तब आप उनके अनुरूप शक्तिके रूपमें प्रसिद्ध होती हैं । स्वयं श्रीहरि जगत्स्वरूप तथा ब्रह्मरूप हैं और आप ही जगन्मयी एवं ब्रह्ममयी चैतन्यशक्ति हैं । राधे! आज भी वे ही ये श्रीहरि व्रजराजनन्दन हैं और आप उनकी प्रिया वृषभानुनन्दिनी हैं । आप दोनोंने जगत्में सुख - शान्तिकी स्थापनाके लिये नाना प्रकारके क्रीडामय चरित्रोंद्वारा ललित आदि लीलाओंके रूपमें सत्त्वमयी इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत लीला प्रकट की है । पुराण- पुरुष श्रीकृष्ण स्वयं परब्रह्म हैं और आप ही उनकी इच्छारूपिणी लीलाशक्ति हैं । आप दोनोंके श्रीविग्रह सदा परस्पर संयुक्त हैं । ऐसे आप दोनों श्रीराधा - कृष्णको मेरा नमस्कार है । राधिके! आप शोक न करें और अपने प्राणनाथका दिया हुआ यह पत्र लें । उन्होंने यह संदेश दिया है कि मैं कुछ दिनोंमें यहाँके कार्योंका सम्पादन करके वहाँ आऊँगा । गोपाङ्गनाओ! आज ही भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए ये परम मङ्गलमय सैकड़ों पत्र आपलोग ग्रहण करें । श्रीकृष्णकी प्रियतमा व्रजसुन्दरियोंके शत - शत यूथोंके लिये ये पत्र अर्पित किये गये हैं॥३४–४१ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' उद्धवद्वारा श्रीराधाका दर्शन ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ उद्धवद्वारा श्रीराधा तथा श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीराधाने पत्र लेकर उसे अपने मस्तकपर रखा, फिर नेत्रों और छाती से लगाया । तदनन्तर उसे पढ़कर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका स्मरण करके, अत्यन्त प्रेमातुर हो नेत्रोंसे अश्रुधारा बहाती हुई वे उद्धवके सामने ही मूर्च्छाकी पराकाष्ठाको पहुँच गयीं । तब सखियोंने उनके ऊपर केसर, अगुरु और चन्दनसे मिश्रित जल तथा पुष्परस छिड़ककर चँवर डुलाना आरम्भ किया । इससे पुनः उनकी चेतना लौटी । कमललोचना श्रीराधाको वियोग - दुःखके सागरमें डूबी हुई देख उद्धव तथा गोपियाँ नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहाने लगीं । राजन्! उन सबके आँसुओंके प्रवाहसे तत्काल वृन्दावनमें कहा- पुष्पोंसे सुशोभित लीला - सरोवर प्रकट हो गया । नरेश्वर! जो मनुष्य उस सरोवरका दर्शन, उसके जलका पान तथा उसमें भलीभाँति स्नान करके इस कथाको सुनता है, वह कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो श्रीकृष्णको प्राप्त कर लेता है । तदनन्तर उद्धवके मुखसे श्रीकृष्णके पुनरागमनका समाचार सुनकर वे सब गोपाङ्गनाएँ महात्मा गोविन्दका सम्पूर्ण कुशलमङ्गल पूछने लगीं ॥ १-७ ॥ अध्याय गोपीजनोंको आश्वासन श्रीराधा बोलीं- उद्धव! वह समय कब आयेगा, जब मैं घनके समान श्यामकान्तिवाले आनन्दप्रद श्रीव्रजराजनन्दनका दर्शन करूँगी? जैसे मयूरी मेघमालाके और चकोरी चन्द्रमाके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित रहती है, उसी प्रकार मैं भी उनका दर्शन पानेके लिये उत्सुक हूँ । किस कुसमयमें मेरा उनसे वियोग हुआ, जिससे इस पृथ्वीपर एक- एक क्षण मेरे लिये एक कल्पके समान हो गया है! गोविन्दके युगलचरणोंके बिना यह विरहकी रात इतनी बड़ी हो गयी है कि ब्रह्माजीकी आयुके द्विपरार्ध कालको भी तिरस्कृत कर रही है । उद्धव! क्या कभी श्यामसुन्दर इस व्रजके मार्गपर भी पदार्पण करेंगे? आप मुझे शीघ्र बताइये, वे वहाँ कौन - सा कार्य कर रहे हैं? आजतक बड़े प्रयाससे मैंने इन प्राणोंको धारण किया है । उनके झूठे वादेसे आतुर हुए ये प्राण हठात् निकले जा रहे हैं । आज तुम्हें देखकर क्षणभरके लिये मेरा हृदय शीतल हुआ है । तुम्हारे आनेसे आज मैं उसी तरह प्रसन्न हुई हूँ, जैसे पूर्वकालमें पवनपुत्र हनुमान्के लङ्कामें आनेसे जनकनन्दिनी सीता प्रसन्न हुई थीं । मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ उद्धव! जो आशा देकर अपने
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२२० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड छोह - मोहरूपी धनको त्यागकर और अपनी ही कही हुई बातको भुलाकर मथुरा चले गये, उनके लिखे हुए इस पत्रके वाक्यांशको भी मैं सत्य नहीं मानती । तुम स्वयं उनको यहाँ ले आओ ॥ ८- १२ ॥ उद्धव बोले- श्रीराधे! मैं मथुरापुरी लौटकर आपके इस महान् विरहजनित दुःखको उन्हें सुनाऊँगा और अपने आँसुओंके जलसे उनके चरण पखारूँगा । जैसे भी होगा, श्रीहरिको मथुरापुरीसे लेकर पुनः यहाँ आऊँगा – यह बात मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ । अतः अब आप शोक न करें ॥ १३ ॥
नारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर प्रसन्न हुई श्रीराधाने रास - रङ्गस्थलमें चन्द्रमाद्वारा दी गयी दो सुन्दर चन्द्रकान्त मणियाँ श्यामसुन्दरको देनेके लिये उद्धवके हाथमें दीं । पूर्वकालमें चन्द्रमाने जो दो सहस्रदल कमल भेंट किये थे, उन्हें भी प्रसन्न हुई भक्तवत्सला श्रीराधाने उद्धवको अर्पित किया । हरिप्रिया श्रीराधाने प्राणवल्लभके लिये छत्र, दिव्य सिंहासन तथा दो मनोहर चँवर, जो श्रीकृष्णके संकल्पसे प्रकट हुए थे, उद्धवके हाथमें दिये । साथ ही यह वरदान भी दिया कि ' उद्धव! तुम ऐश्वर्यज्ञानसे सम्पन्न, समस्त उपदेशक गुरुओंके भी उपदेशक तथा श्रीकृष्णके साथ रहनेवाले होओगे । ' श्रीराधाने उन्हें निर्गुण- भावसे सम्पन्न प्रेम-लक्षणा - भक्ति तथा ज्ञान - विज्ञान सहित वैराग्य भी प्रदान किया । विदेहराज! श्रीहरि शङ्खचूड़ यक्षसे जो उसकी चूड़ामणि छीन लाये थे, वह सुन्दर चूड़ामणि चन्द्रानना गोपीने उद्धवके हाथमें दी । राजन्! इसी प्रकार अन्य गोपाङ्गनाओंने भी महात्मा उद्धवके हाथमें सुन्दर आभूषणोंकी राशि समर्पित की ॥ १४-२० ॥ नारदजी कहते हैं - उद्धवजीकी शुभार्थक वाणी सुनकर जब श्रीराधिकाजी अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं, तब सभामण्डपमें स्थित हुए श्रीकृष्ण - सखा उद्धवके पास बैठकर व्रजगोप- वधूटियोंने पृथक् - पृथक् उनसे पूछा ॥ २१ ॥
गोपाङ्गनाएँ बोलीं- उद्धवजी! हमें शीघ्र बताइये, जिन - जिनके लिये श्रीहरिने पत्र लिखा है, उनके लिये कोई अद्भुत संदेश भी कहा है क्या? आप परावरवेत्ताओंमें उत्तम, साक्षात् श्रीकृष्णके सखा, उनके ही समान आकृतिवाले और महान् हैं ( अतः उनकी कही हुई बात हमसे अवश्य कहिये ) ॥ २२ ॥
उद्धवने कहा – गोपाङ्गनाओ! जैसे तुमलोग देवेश्वर श्रीकृष्णका निरन्तर स्मरण करती रहती हो, उसी प्रकार वे भी प्रतिक्षण तुम्हारा स्मरण करते हैं । निस्संदेह मेरे सामने ही वे तुम्हें याद करते रहते हैं । मैं श्रीहरिका एकान्त सेवक हूँ । एक दिन तुमलोगों को स्मरण करके नन्दनन्दन श्रीहरिने मुझे बुलाया और तुमसे कहनेके लिये अपने मनका संदेश इस प्रकार कहा ॥ २३-२४ ॥ श्रीभगवान् बोले- विषयोंमें आसक्त हुआ मन बन्धनकारक होता है; वही यदि मुझ परमपुरुषमें आसक्त हो जाय तो मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला होता है । अतः ज्ञानीजन मनको बन्धन और मोक्ष- दोनों-का कारण बताते हैं । अतः मनुष्यको चाहिये कि वह मनको जीतकर इस पृथ्वीपर असङ्ग ( आसक्तिशून्य ) होकर विचरे । जब विवेकी पुरुष निर्मल अध्यात्म-योगके द्वारा मुझ साक्षात् परात्पर ब्रह्मको सर्वत्र व्यापक जान लेता है, तब वह मनके कषाय ( राग या आसक्ति ) को त्याग देता है । यद्यपि मेघ सूर्यसे ही उत्पन्न हुआ उसका कार्यरूप है, तथापि जबतक वह सूर्य और दर्शककी दृष्टिके बीचमें स्थित है, तबतक दृष्टि सूर्यको नहीं देख पाती । ( उसी प्रकार जबतक अन्तःकरण - आत्माके बीचमें कषायरूप आवरण है, तबतक मुझ परमात्माका दर्शन नहीं हो पाता । ) व्रजाङ्गनाओ! मैं स्थूल भावसे दूर हूँ, परंतु तत्त्वदृष्टिसे तुममें और मुझमें कोई दूरी नहीं है । अतः यहाँके वियोगको तुम मेरी प्राप्तिका साधन बना लो । सांख्य-भावसे जिस पदकी प्राप्ति होती है, अवश्य ही वह योगभाव ( योग - साधना या वियोगकी अनुभूति ) से भी स्वतः प्राप्त हो जाता है ॥ २५–२७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' उद्धवद्वारा श्रीराधा तथा गोपियोंको आश्वासन ' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
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सत्रहवाँ अध्याय श्रीकृष्णको स्मरण करके श्रीराधा तथा गोपियोंके करुण उद्गार श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! श्रीकृष्णका यह संदेश सुनकर प्रसन्न हुई गोपाङ्गनाएँ आँसू बहाती हुई गद्रद कण्ठसे उद्धवसे बोलीं ॥ १ ॥
गोलोकवासिनी गोपियोंने कहा - उद्धव! पहलेके प्रियजनोंको त्यागकर श्रीकृष्ण परदेश चले
गये, उसपर भी वहाँसे उन्होंने योग लिख भेजा है ।
अहो! निर्मोहीपनका बल तो देखो ॥ २ ॥
द्वारपालिका गोपिकाएँ बोलीं – सखियो! देखो, चन्द्रमाकी चकोरपर, सूर्यकी कमलपर, कमलकी भ्रमरपर तथा मेघकी चातकपर जैसे कभी प्रीति नहीं होती, उसी प्रकार श्यामसुन्दरका हमलोगोंपर प्रेम नहीं है ॥ ३ ॥
शृङ्गार धारण करानेवाली गोपियोंने कहा— सखियो! चकोर चन्द्रमाका मित्र है, परंतु उसके भाग्यमें सदा आगकी चिनगारियाँ चबाना ही बदा है । विधाताने जिसके भाग्यमें जो कुछ लिख दिया है, वह कभी कम नहीं होता ॥ ४ ॥
शय्योपकारिका गोपियाँ बोलीं- वधिक भी मृगको बाण मारकर तुरंत आतुर हो उनकी सुध लेता है; किंतु कटाक्षोंसे अपने प्रियजनोंको घायल करके कोई निर्मोही उनका स्मरणतक न करे – यह कैसा आश्चर्य है? ॥ ५ ॥
पार्षदा गोपियोंने कहा – विरहजनित दुःखको कोई विरही ही जानता है, दूसरा कोई कभी उस दुःखको नहीं समझ सकता - जैसे जिसके अङ्गोंमें काँटा गड़ा है, उसकी पीड़ाको वही जानता है, जिसके पहले कभी काँटा गड़ चुका है; जिसके शरीरमें कभी काँटा गड़ा ही नहीं, वह उसके दर्दको क्या जानेगा? ॥ ६ ॥
वृन्दावन - पालिका गोपियाँ बोलीं- निष्काम प्रेमके सुखको निष्काम प्रेमी ही जानता है । जो किसी कारण या कामनाको लेकर प्रेम करता है, वह निष्काम प्रेम सुखको क्या जानेगा? क्या कभी कर्मेन्द्रियाँ रसका अनुभव कर सकती हैं ॥ ७ ॥
गोवर्धन - वासिनी गोपियोंने कहा— पुरवनिताओंसे प्रेम करनेवाला अब सैरन्ध्री ( कुब्जा ) का नायक बन बैठा है । उसे पर्वत एवं वनमें रहनेवाली स्त्रियोंसे क्या लेना है । इस विषयमें अधिक कहना व्यर्थ है ॥८ ॥
कुञ्जविधायिका गोपियाँ बोलीं- हाय! मतवाले भ्रमरोंके गुञ्जारवसे व्याप्त माधवी कुञ्ज - पुञ्जमें से जिनको हम सदा अपनी आँखोंमें बसाये रखती थीं, उनकी आज यह कथा सुनी जाती है॥९॥
निकुञ्जवासिनी गोपियोंने कहा – वृन्दावनमें मतवाले भ्रमरोंके समुदायसे युक्त यमुनातटवर्ती कदम्ब-कुञ्जमें धीरे - धीरे बलराम, ग्वाल - बाल और गोधनके साथ विचरते हुए नन्दनन्दनका हम भजन करती हैं ॥ १० ॥
यमुनाजीके यूथमें सम्मिलित गोपियाँ बोलीं-कब हमारा भी वैसा ही समय होगा, जैसा आज मथुरा-पुरवासिनी स्त्रियोंका देखा जाता है? व्रजाङ्गनाओ! शोक न करो । किसीकी कभी सदा जय या पराजय नहीं होती । विधाताके हृदयमें तनिक भी दया नहीं है; जैसे बालक खिलौनोंको अलग करता और मिलाता है, उसी प्रकार वह विधाता समस्त भूतोंको संयुक्त और वियुक्त करता रहता है । जो पहले कुबड़ी थी, वह आज सीधी और समान अङ्गवाली हो गयी; जो दासी थी, वह कुलीन हो गयी तथा जो कुरूपा थी, वह रूपवती होकर चमक उठी है । अहो! चार ही दिनोंमें वह अपनी विजयके नगारे पीटने लगी है ॥ ११ - १३ ॥ विरजा - यूथकी गोपियोंने कहा- किसीकी भी बाँह सदा प्रियके कंधेपर नहीं रहती, किसी भी वनमें सदा वसन्त नहीं होता, कोई भी सदा जवान नहीं रहता, ये देवराज इन्द्र भी सदा राज्य नहीं करते हैं । कोई चार दिनोंके लिये भले ही खूब मानकर ले ॥ १४ ॥
ललिता - यूथकी गोपियाँ बोलीं - मन्थरा भी कुबड़ी थी, जिसने अयोध्यापुरीमें श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकको रोकवाकर उसमें विघ्र उपस्थित कर
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२२२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड दिया । वह कुब्जा ही यह मथुरापुरीमें आ गयी है । गोपिकाओ! जो कुब्जा है, वह क्या - क्या नहीं कर सकती? ॥ १५ ॥
विशाखा यूथकी गोपियोंने कहा— जो गौएँ चरानेके लिये अनुगामी ग्वाल - बालोंके साथ वनमें जाते हैं और लौटते समय वंशीनादके द्वारा नगर-गाँवके लोगोंको अपने आगमनका बोध करा देते हैं तथा जो अपनी गतिसे मतवाले हाथीकी चालका अनुकरण करते हैं, उन नन्दनन्दनको हम भुला नहीं सकतीं ॥ १६ ॥
माया - यूथकी गोपियाँ बोलीं – साँकरी गलियोंमें हमारा आँचल पकड़कर, हठात् हमें अपनी भुजाओंमें भरकर और हृदयसे लगाकर परस्परकी खींचातानीसे हर्ष और भयका अनुभव करनेवाले उन श्रीहरिको हम कब अपने घरोंमें ले जायँगी? ॥ १७ ॥
अष्टसखियोंने कहा— उद्धव! उन सर्वाङ्ग-सुन्दर नन्दनन्दनको निहारकर हमारे नेत्र अब संसारकी ओर नहीं देखते - नहीं देखना चाहते । वे ही नन्द-राजकुमार मथुरापुरीमें विराज रहे हैं । शीघ्र बताओ, अब हमारा क्या होगा? ॥ १८ ॥
षोडश सखियाँ बोलीं- वनमें प्रेमपीड़ाको बढ़ानेवाली बाँसुरीकी मधुर तान सुनकर हमारे दोनों कान अब संसारी गीत नहीं सुनना चाहते, वे तो कौओंकी ' काँव - काँव ' के समान कड़वे लगते हैं ॥ १ ९ ॥ बत्तीस सखियोंने कहा - अपने मित्रको प्रीतिसे, शत्रुको नीतिसे, लोभीको धनसे, ब्राह्मणको आदरसे, गुरुको बारंबार प्रणामसे तथा रसिकको रससे वशमें किया जाता है; परंतु निर्मोहीको कोई कैसे वशमें कर सकता है? ॥ २० ॥
श्रुतिरूपा गोपियाँ बोलीं- जो जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें व्याप्त होकर भी उनसे परे हैं तथा इस जगत् हेतु होते हुए भी वास्तवमें अहेतु हैं, ये समस्त गुण जिनसे ही प्रेरित होकर अपने - अपने विषयोंकी ओर प्रवाहित होते हैं; तथा जैसे आगसे निकली हुई चिनगारियाँ पुनः उसमें प्रविष्ट नहीं होतीं, उसी प्रकार महत्तत्त्व, इन्द्रियसमुदाय तथा इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देव - समुदाय जिनमें प्रवेश नहीं पाते, उन परमात्माको नमस्कार है ॥ २१ ॥
ऋषिरूपा गोपियोंने कहा - बलवानोंमें भी अत्यन्त बलिष्ठ यह काल जिनपर अपना शासन चलानेमें समर्थ नहीं है, माया भी जिनको वशीभूत नहीं कर पाती तथा वेद भी जिन्हें अपने विधिवाक्योंका विषय नहीं बना पाता, उस अमृतस्वरूप, परम प्रशान्त, शुद्ध, परात्पर पूर्णब्रह्मकी हम शरण लेती हैं ॥२२ ॥
देवाङ्गनास्वरूपा गोपियाँ बोलीं- जिन परमेश्वरके अंशांश, अंश, कला, आवेश तथा पूर्ण आदि अवतार होते हैं, और जिनसे ही इस जगत्की सृष्टि, पालन एवं संहार होते हैं, उन पूर्णसे भी परे परिपूर्णतम श्रीकृष्णको हम प्रणाम करती हैं ॥ २३ ॥
यज्ञसीतारूपा गोपियोंने कहा- ये श्याम-सुन्दर निकुञ्ज - लतिकाओंके लिये कुसुमाकर ( वसन्त ) हैं, श्रीराधाके हृदय तथा कण्ठको विभूषित करनेवाले हार हैं, श्रीरासमण्डलके अधिपति हैं, व्रजमण्डलके ईश्वर हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके महीमण्डलका परिपालन करनेवाले हैं ॥ २४ ॥
रमावैकुण्ठवासिनी गोपियाँ बोलीं- जिन्होंने समस्त गोपीयूथको अलंकृत किया, अपनी चरण-रजसे वृन्दावन तथा गिरिराज गोवर्धनको विभूषित किया तथा जो सम्पूर्ण लोकोंके अभ्युदयके लिये इस भूमण्डलपर आविर्भूत हुए, उन नागराजके समान परिपुष्ट भुजावाले अनन्त लीला - विलासशाली श्रीश्यामसुन्दरका हम भजन करती हैं ॥ २५ ॥
श्वेतद्वीपकी सखियोंने कहा- जैसे बालक कुकुरमुत्तेको बिना श्रमके उठा लेता है और जैसे गजराज अपनी सूँडसे अनायास ही कमलको उठा लेता है, उसी प्रकार जिन्होंने खिलवाड़में ही पर्वतको एक हाथसे उठाकर अद्भुत शोभा प्राप्त की, वे कृपानिधान श्रीव्रजराजनन्दन हमें कभी विस्मृत नहीं होते ॥२६ ॥
ऊर्ध्ववैकुण्ठवासिनी गोपियाँ बोलीं- हमारी श्यामवर्णमयी आँखें सारे जगत्को श्याममय ही देखती हैं, इन्हें द्वैत तो दीखता ही नहीं; फिर ये योगका सेवन क्या करेंगी? ॥ २७ ॥
लोकाचलवासिनी गोपियोंने कहा- स्नेहका पाश दृढ़ होता है । वह कभी टूटने - कटनेवाला नहीं
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अध्याय १८ ] गोपियोंके उद्गार तथा उनसे विदा लेकर उद्धवका मथुराको लौटना २२३ है । हम उसे नहीं काट सकतीं । श्रीहरिके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं कर सकता । एकमात्र वे ही ऐसे हैं, जो नागपाशको काटनेवाले गरुड़की भाँति इस स्नेहपाश -को काटकर मथुरा चले गये ॥२८ ॥
अजितपदाश्रिता गोपियाँ बोलीं- हमारे दोनों नेत्र श्रीकृष्णमें लग गये हैं, वे दसों दिशाओंमें दौड़ लगानेपर भी अन्यत्र कहीं उसी प्रकार नहीं टिक पाते, जैसे कमलसे जिसकी लगन लगी है, वह भ्रमर अन्य फूलोंपर कदापि नहीं जाता ॥ २ ९ ॥ श्रीसखियोंने कहा- लोग अपनी कृपणतासे यशको, क्रोधसे गुणसमूहके उदयको, दुर्व्यसनोंसे धनको तथा कपटपूर्ण बर्तावसे मैत्रीको नष्ट कर देते हैँ ॥३० ॥
मिथिलावासिनी स्त्रियाँ बोलीं- धन देकर तनकी रक्षा करे, तन देकर लाज बचाये तथा मित्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये आवश्यकता पड़ जाय तो धन, तन और लाज – तीनोंका उत्सर्ग कर दे ॥ ३१ ॥
कोसलप्रान्तवासिनी गोपियोंने कहा-वियोगजनित दुःखकी दशाको जीवात्माके बिना दूसरा कोई नहीं जानता है, परंतु वह उसे बतानेमें असमर्थ है । ( बताती है वाणी, किंतु उसे उस दुःखका अनुभव नहीं है । ) भले ही बाणोंके आघातसे हृदय विदीर्ण हो जाय, किंतु कभी किसीको प्रिय - वियोगका कष्ट न प्राप्त हो ॥ ३२ ॥
अयोध्यापुरवासिनी गोपियाँ बोलीं- पहले निराश करके फिर आशा दे दी और अपने मथुराकी इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत वचन ' नामक सत्रहवाँ आशा ( दिशा ) में चले गये? उसके ऊपर हमारे लिये योग लिखा है । अहो! निर्मोही जनोंका चित्र ( या चित्त ) विचित्र होता है ॥३३ ॥
पुलिन्दी गोपियोंने कहा- पूर्वकालकी बात है, दण्डकवनमें शूर्पणखा अत्यन्त विह्वल होकर इन्हें अपना पति बनानेके लिये इनके पास आयी; किंतु इन्होंने सुमित्राकुमारको प्रेरणा देकर बलपूर्वक उसे कुरूप बना दिया । ऐसे पुरुषसे आप सबको कृपाकी आशा कैसे हो रही है? ॥ ३४ ॥
सुतलवासिनी गोपियाँ बोलीं- राजा बलि भगवद्भक्त, सत्यपरायण और बहुत अधिक दान करने-वाले थे, परंतु उनसे भेंट - पूजा लेकर जिन्होंने कुपित हो उन्हें बन्धनमें डाल दिया था, उस वामनरूपधारी कपट- ब्रह्मचारी बने हुए श्रीहरिकी न जाने लक्ष्मीजी या अन्य भक्तजन कैसे सेवा करते हैं? ॥ ३५ ॥
जालंधरी गोपियोंने कहा— पूर्वकालमें असुर-श्रेष्ठ भक्तप्रवर कयाधूकुमार प्रह्लादको बहुत अधिक कष्ट सहन करना पड़ा, तब कहीं नृसिंहरूप धारण करके इन्होंने उनकी सहायता की । अहो! इनमें निष्ठुरताकी पराकाष्ठा प्रत्यक्ष देखी जाती है ॥ ३६ ॥
भूमिगोपियाँ बोलीं- अहो! अत्यन्त निर्मोही जनका चरित्र अत्यन्त विचित्र होता है, वह कहने-योग्य नहीं है । मुखसे और ही बात निकलेगी, किंतु हृदयमें कोई और ही विचार रहेगा । ऐसे लोगोंको देवता भी नहीं समझ पाते, फिर मनुष्य कैसे जान सकता है? ॥ ३७ ॥
नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णकी यादमें गोपियों के अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय गोपियोंके उद्गार तथा उनसे विदा लेकर उद्धवका मथुराको लौटना बर्हिष्मतीपुरीकी गोपियोंने कहा - अहो! दौड़े । दयालु होकर भी वे निर्दयताके लिये उद्यत हो प्रलयके समुद्रमें वाराहरूपधारी महात्मा श्रीहरिने गये [ अतः कभी कठोर होना और कभी कृपा करना कृपापूर्वक जिसका उद्धार किया था, उसी पृथ्वीको इन श्रीहरिका स्वभाव ही है ] )? ॥ १ ॥
मारनेके लिये आदिराज पृथुके रूपमें वे उसके पीछे लतारूपा गोपियाँ बोलीं- विश्वके वैद्य महात्मा
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२२४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड धन्वन्तरि पूर्वकालमें अमृत कलशके साथ समुद्रसे प्रकट हुए, किंतु उन्होंने वह अमृत अपने हाथसे नहीं बाँटा; परंतु जब उसके लिये देवता और असुर आपसमें वैर बाँधकर युद्धके लिये उद्यत हो गये, तब कलहप्रिय श्रीहरिने स्वयं मोहिनी नारीका रूप धारण करके वह सुधा केवल देवताओंको पिला दी ॥ २ ॥
नागेन्द्रकन्यारूपा गोपियोंने कहा — दण्डक नामक महावनमें इन श्रीहरिको श्रीरामरूपमें देखकर शूर्पणखा इन्हें अपना पति बनानेकी इच्छासे इनके पास आयी थी, किंतु लक्ष्मणसहित इन्होंने उस बेचारीके नाक - कान काटकर कुरूप बना दिया । यह कैसी निष्ठुरता है; उसने इनका क्या बिगाड़ा था? ॥३ ॥
समुद्रकन्यारूपा गोपियाँ बोलीं- जो प्रतिदिन सैकड़ों घरोंमें जाती और लोगोंको सुख - दुःख दिया करती है, वह चञ्चला लक्ष्मी इन श्रीहरिके पास न जाने स्वकीया और सुशीला बनकर कैसे टिकी हुई है? ॥ ४ ॥
अप्सरारूपा गोपियोंने कहा- सखियो! इनके प्रति प्रीति करनेसे रावणकी बहिनको अपनी नाक और कानोंसे हाथ धोना पड़ा था, अतः उनकी बात छोड़ो । इन्होंने तुम्हारे ऊपर उससे भी अधिक कृपा की है [ कि नाक - कान छोड़ दिये ] ॥५ ॥
दिव्यरूपा गोपियाँ बोलीं- ये राजा बलिसे बलि लेकर सर्वेश्वर हैं और उन्हें बाँधकर भी दयालु हैं; मुक्तिके नाथ होकर भी इन्होंने अपने भक्त बलिको नीचे सुतललोकमें फेंक दिया । इनकी कथासे आश्चर्य होता है ॥ ६ ॥
अदिव्या गोपियोंने कहा- पूर्वकालमें शत-रूपाके साथ मनु शान्तभावसे तपस्या करते थे । उस समय दैत्योंने उन्हें बहुत बाधा पहुँचायी । तत्पश्चात् उन दयानिधि श्रीहरिने आकर उनकी रक्षा की [ पहले दुःख देना और पीछे आँसू पोंछना इनका स्वभाव है । ] ॥ ७ ॥
सत्त्ववृत्तिरूपा गोपियाँ बोलीं- भक्त ध्रुव और प्रह्लादने पहले बहुत कष्ट पाया, तदनन्तर उन्होंने कृपापूर्वक उनकी रक्षा की; हमारे ये दीनवत्सल प्रभु पहले किसीकी रक्षा नहीं करते, कष्ट भुगतानेके बाद ही करते हैं ॥ ८ ॥
रजोगुणवृत्तिरूपा गोपियोंने कहा-रुक्माङ्गद, हरिश्चन्द्र और अम्बरीष - इन साधु-शिरोमणि नरेशोंके सत्यकी परीक्षा करके ही श्रीहरिने उन्हें पुनः भागवती - समृद्धि प्रदान की [ सम्भव है, हमारे भी प्रेमकी परीक्षा ली जाती हो । ] ॥ ९ ॥
तमोगुणवृत्तिरूपा गोपियाँ बोलीं- जिन छली - बली श्रीहरिने पूर्वकालमें वृन्दाको छला था, इन्हींको आज छलमयी और बलवती कुब्जाने छल लिया । [ जैसेको तैसा मिला । ] कटार या कृपाणिका एक ही ओरसे टेढ़ी होती है, तथापि बहुत - से लोगोंका घात करती है; इधर कुब्जा तो तीन जगहसे टेढ़ी है; उसे तीन जगह टेढ़े श्रीकृष्ण मिल गये, फिर वह कितनों-का घात करेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता । श्रीकृष्णकी राह देखते - देखते हमारी आँखें बहुत दुखने लगी हैं और उनके आनेकी अवधि वामनके पादविक्षेपकी तरह बढ़ती ही जाती है । इस माधवमासमें माधवके बिना हमारे शरीरका चमड़ा पीला पड़ गया, हमारी गतिमें शिथिलता आ गयी - पाँव थक गये और मन अत्यन्त उद्भ्रान्त हो गया है । हा दैव! किस समय हम सब उषःकालमें सौतके हारके चिह्नसे चिह्नित होकर आये हुए नन्दनन्दनको देखेंगी ॥ १०-१४ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार श्रीकृष्णका चिन्तन करती हुई प्रेमविह्वला गोपियाँ उत्कण्ठित हो रोने लगीं और मूच्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं । तब पृथक् - पृथक् सबको आश्वासन दे, नीति-निपुण वचनोंद्वारा सब गोपियोंको समझा - बुझाकर उद्धवने श्रीराधासे कहा॥१५-१६ ॥ उद्धव बोले- परिपूर्णतमे! कृष्णस्वरूपे! वृषभानुवर-नन्दिनि! मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये । व्रजेश्वरि! आपको नमस्कार है । शुभे! महात्मा श्रीकृष्णको उनके पत्रका उत्तर दीजिये । उसके द्वारा शीघ्र ही उनके चरणोंमें प्रणाम करके मैं उन्हें आपके पास ले आऊँगा॥१७-१८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर राधा तुरंत ही लेखनी और मसीपात्र लेकर समाचारका चिन्तन करने लगीं, तबतक उनके नेत्रोंसे अश्रुवर्षा होने लगी । श्रीराधाने जो - जो पत्र हाथमें लेकर उसे