गर्ग संहिता — पृष्ठ 231–240
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
पृष्ठ 231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय १ ९ ] श्रीकृष्णका उद्धवके साथ व्रजमें प्रत्यागमन २२५ लेखनीसे संयुक्त किया, वह वह उनके नेत्र - कमलोंके नीरसे भीग गया । श्रीकृष्णदर्शनकी लालसासे अश्रु-धारा बहाती हुई कमलनयनी राधासे विस्मित हुए उद्भवने कहा ॥ १ ९ –२१ ॥ उद्धव बोले- श्रीराधे! आप कैसे लिखती हैं और कैसे दुःख प्रकट करती हैं, यह सब कथा आपके लिखे बिना ही मैं उनसे निवेदित करूँगा ॥ २२ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! उद्धवकी वाणी सुनकर राधाने बाधारहित हो समस्त गोपियोंके साथ उस समय उद्धवका पूजन किया । तत्पश्चात् परादेवी रासेश्वरी श्रीराधाको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके, गोपीगणोंसे विदा ले, सबको बार- बार मस्तक झुकाकर उद्धव रत्नभूषणभूषित उस दिव्याकार रथपर आरूढ़ हुए । उनको अपनी बुद्धि और ज्ञानपर जो बड़ा अभिमान था, वह दूर हो गया । वे संध्याके समय नन्दजीके पास लौट आये । सबेरे सूर्योदय होने-पर गोपी यशोदाको नमस्कार करके, उद्धव नन्दराजकी आज्ञा ले क्रमशः नौ नन्दों, वृषभानुओं, उपनन्दों, अन्य लोगों तथा कृष्णके सम्पूर्ण सखाओंसे अलग-अलग मिले और उनसे विदा ले, रथपर आरूढ़ हो वहाँसे चल दिये । समस्त गोप और गोपियोंके समुदाय उनके पीछे - पीछे दूरतक पहुँचानेके लिये गये । उद्धव सबको स्नेहपूर्वक लौटाकर मथुराको चले गये । श्रीकृष्ण यमुनाके मनोहर तटपर अक्षयवटके नीचे एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे । वहाँ उनको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उद्धव नेत्र - कमलोंसे आँसू बहाते हुए प्रेमगद्गद वाणीमें बोले ॥ २३–२९ ॥ उद्धवने कहा- देव! आप तो सबके साक्षी हैं, आपको मुझे क्या बताना है । आप राधिका और गोपियोंका कल्याण कीजिये, कल्याण कीजिये; उन्हें दर्शन दीजिये । ' मैं देवदेवेश्वर श्रीकृष्णको तुम्हारे पास ले आऊँगा । ' ऐसी बात मैंने उनसे कही है । कृपानिधे! मेरे इस वचनकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । भक्तोंके परमेश्वर! जैसे आपने प्रह्लाद और रुक्माङ्गदकी, बलि और खट्वाङ्गकी तथा अम्बरीष और ध्रुवकी प्रतिज्ञा रखी है, उसी प्रकार मेरी की हुई प्रतिज्ञाकी भी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥३०-३२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' गोपियोंके वचन तथा उद्धवका मथुरा लौट जाना ' नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णका उद्धवके साथ व्रजमें प्रत्यागमन और यमुना - तटपर गौओंका उनके रथको चारों ओरसे घेर लेना; गोपोंके साथ उनकी भेंट; नन्दगाँवसे नन्दरायजी एवं यशोदा-का गोपों एवं गोपियोंको लेकर गाजे - बाजेके साथ उनकी अगवानीके लिये निकलना तथा सबके साथ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार भक्तका वचन सुनकर भक्तवत्सल अच्युतने अपने कहे हुए वचनको याद करके व्रजमें जानेका विचार किया । समस्त कार्यभारोंपर दृष्टि रखनेके लिये बलदेवजीको मथुरामें ही छोड़कर चञ्चल घोड़ोंसे जुते हुए किङ्किणीजालमण्डित सुवर्णजटित सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर उद्धवके साथ आरूढ़ हो भगवान् श्रीकृष्णका नन्दनगरमें प्रवेश श्रीकृष्ण भक्तोंको दर्शन देनेके लिये नन्दगाँवको गये । गोवर्द्धन, गोकुल और वृन्दावनको देखते हुए श्रीकृष्ण यमुनाके मनोहर तटपर पहुँचे । व्रजेश्वर श्रीकृष्णको देखते ही कोटि - कोटि गौएँ चारों ओरसे दौड़ती हुई उनके पास आ गयीं । उन सबके स्तनोंसे स्नेहके कारण दूध झर रहा था । वे कान और पूँछ उठाकर रँभा रही थीं । उनके साथ बछड़े भी थे । मुखमें घासके ग्रास
पृष्ठ 232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड लिये खड़ी हुई गौएँ नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहा रही थीं । उनकी व्यथा - वेदना दूर हो गयी थी । राजन्! जैसे बादल रथ, अरुण और अश्वोंसहित शरत्कालके सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार उद्धवके देखते - देखते गौओंने उस रथको सब ओरसे घेर लिया । गोपाल श्रीहरि उन सब गौओंके अलग - अलग नाम बोलकर अपने श्रीहस्तसे उनके अङ्गोंको सहलाते हुए बड़े हर्षको प्राप्त हुए । गौओंके समुदायको उनके समीप गया देख श्रीदामा आदि व्रज - बालक विस्मित हो परस्पर कहने लगे ॥१ - ९ ॥ गोप बोले - सखाओ! उस वायुके समान वेगशाली तथा कांस्यपत्र ( झाँझ ) की ध्वनिके समान शब्द करनेवाले, कलश और ध्वजसहित रथको, जिसमें सैकड़ों अश्व जुते हैं तथा जो शत सूर्योके समान शोभाशाली है, गौओंने कैसे घेर लिया है? गौओंके इस हर्षसे यह सूचित होता है कि इस रथपर दूसरा कोई नहीं, साक्षात् व्रजराजनन्दन ही आ रहे हैं; क्योंकि हमारे दाहिने अङ्ग भी फड़क रहे हैं और नीलकण्ठ पक्षी हमारे ऊपर उठकर बंदनवारका - सा विस्तार करते हैं ॥ १०-११ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! मन - ही - मन ऐसा विचार करके वे सब गोप वहाँ आ गये । आनेपर उन लोगोंने अपने मित्र माधवको उसी प्रकार देखा, जैसे साधारण जन अपनी खोयी हुई वस्तुके मिल जानेपर उसे देखते हैं । उनपर दृष्टि पड़ते ही साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण रथसे कूद पड़े और उन सबको आगे करके, प्रेमविह्वल हो अपनी दोनों भुजाओंसे भेंटने लगे । नेत्र कमलोंसे अश्रुधारा बहाते हुए उन्होंने पृथक् - पृथक् सबको हृदयसे लगाया । अहो! इस भूतलपर भक्तिके माहात्म्यका वर्णन कौन कर सकता है! मिथिलेश्वर! वे सब गोप नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए फूट - फूटकर रोने लगे । श्रीकृष्णके वियोगसे वे इतने विह्वल हो गये थे कि मिल जानेपर भी सहसा उनसे कुछ कहने में समर्थ न हो सके । तब साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीहरिने उन प्रेमानन्दसे विह्वल सखाओंको मधुर वाणीसे आश्वासन दिया । श्रीकृष्णने ग्वाल - बालोंके साथ उद्धवको अपने आनेका समाचार देनेके लिये भेजा । उद्धवने नन्द- नगरमें जाकर बताया कि ' श्रीकृष्ण पधारे हैं'॥१२–१७ ॥ गोपवल्लभ नन्दनन्दन श्रीकृष्णका आगमन सुन-कर समस्त गोप परिपूर्णमनोरथ होकर उन्हें लिवा लानेके लिये निकले । भेरी, मृदङ्ग, पटह आदि बाजे मधुरस्वरमें बजने लगे । भरे हुए कलश लिये ब्राह्मण-लोग वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे । लाजा ( खील ) आदि माङ्गलिक वस्तुओंसे मिश्रित गन्ध और अक्षत साथ ले यशोदाके साथ श्रीनन्दराज अगवानीके लिये गये । तत्पश्चात् सिन्दूर- रञ्जित सूँडमें सोनेकी साँकल धारण किये मदोन्मत्त हाथीको आगे रखकर भानुतुल्य तेजस्वी श्रीवृषभानुवर अपनी रानी कलावतीके साथ वहाँ आये । नन्द, उपनन्द, वृषभानु, बूढ़े, जवान और बालक गोप पूर्णमनोरथ हो, फूलोंके हार, बाँसुरी, गुञ्जा और मोरपंख लिये नगरसे बाहर निकले । नरेश्वर! गोप - बालक श्रीकृष्णके दर्शनकी बड़ी भारी लालसा लिये, हाथोंमें वंशी, बेंत और विषाण ( सींग ) धारण किये, बड़े हर्षके साथ नन्दनन्दनके गुण गाते और पीले वस्त्र हिला हिलाकर नाचते थे ॥ १८–२२ ॥ सखियोंके मुखसे श्रीहरिके शुभागमनका शुभ संवाद सुनकर श्रीराधा शयनसे उठ खड़ी हुईं और महान् हर्षसे युक्त हो उन्होंने उन सबको अपने भूषण उसी प्रकार लुटा दिये, जैसे प्रसन्न हुई नूतन पद्मिनी अपनी सुगन्ध लुटाया करती है । मिथिलेश्वर! गोपाङ्गनाओंके आठ, सोलह, बत्तीस और दो यूथोंके साथ श्रीराधा मनोहर शिविकापर आरूढ़ हो श्रीधरके दर्शनके लिये आयीं । नृपेश्वर! इसी प्रकार करोड़ों गोपियाँ अपने घरका सारा काम - काज छोड़कर, उलटे - सीधे वस्त्र और आभूषण धारण किये वहाँ आयीं । प्रेमके कारण वे मनके समान तीव्र गतिसे चल रही थीं । ऐसा लगता था कि वृक्ष, गौ, मृग और पक्षियोंसहित सारा व्रजमण्डल श्रीकृष्णको आया हुआ देख प्रेमसे आतुर हो उठा है ॥ ॥ २३–२५३ ॥ श्रीकृष्णने मस्तकपर अञ्जलि बाँधे पिता श्रीनन्द -राजको और मैया यशोदाको प्रणाम किया । बहुत दिनोंके बाद आये हुए अपने पुत्रको दोनों भुजाओं में भरकर और हृदयसे लगाकर श्रीनन्दराजने अपने नेत्र-
पृष्ठ 233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २० ] श्रीकृष्णका कदली- वनमें श्रीराधा और गोपियोंके साथ मिलन २२७ जलसे उनको नहला दिया । यशोदासहित श्रीनन्दका मनोरथ आज चिरकालके बाद पूर्ण हुआ था । नन्द, उपनन्द और वृषभानु आदि सम्पूर्ण बड़े - बूढ़े गोपोंको प्रणाम करके, उनके आशीर्वाद ले श्रीकृष्ण समवयस्क मित्रोंसे परस्पर गले मिले और अपनेसे छोटे सखाओं -का हाथ पकड़कर उनके साथ बैठे ॥ २६–२८ ॥ तदनन्तर श्रीहरि यशोदासहित नन्दको हाथीपर चढ़ाकर स्वयं रथपर बैठे और नन्द- उपनन्द तथा गो-समुदायके साथ श्रीनन्दराजके नगरमें प्रविष्ट हुए । उसी समय देवताओंने उनपर फूलोंकी वर्षा की और पुरवासिनी गोपाङ्गनाओंने आचार प्राप्त लावा ( खील ) बिखेरे । श्रीहरिके घर पधारनेपर गोपोंने वहाँ ' जय हो, जय हो ' – ऐसे माङ्गलिक शब्दका बारंबार उच्चारण किया । उस समय आर्त हुए गोपगण गद्गद वाणीमें कहने लगे - ' लाला! तुम्हारा यह सखा उद्धव परम धन्य है; क्योंकि इसने गोपजनोंके जीवनभूत साक्षात् तुम्हारा दर्शन करा दिया ' ॥ २ ९ –३१ ॥ नृपेश्वर! इस प्रकार मैंने श्रीहरिके व्रजमें पुनरागमनका वृत्तान्त तुमसे कह सुनाया, अब और क्या सुनना चाहते हो? श्रीहरिका यह विचित्र चरित्र देवताओं और असुरोंके लिये भी परम कल्याणप्रद है ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णका व्रजमें आगमनोत्सव ' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ बीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णका कदली - वनमें श्रीराधा और गोपियोंके साथ मिलन; रासोत्सव तथा उसी प्रसङ्गमें रोहिताचलपर महामुनि ऋभुका मोक्ष बहुलाश्वने पूछा – मुने! साक्षात् भगवान्ने व्रजमण्डलमें पधारकर आगे कौन - सा कार्य किया? श्रीराधा तथा गोपाङ्गनाओंको किस प्रकार दर्शन दिया! गोपियोंके मनोरथ पूर्ण करके वे पुनः मथुरामें कैसे आये? विप्रेन्द्र! आप परापरवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, अतः ये सब बातें मुझे बताइये? ॥१-२ ॥ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! संध्याकालमें श्रीराधाका बुलावा पाकर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण सदा-शीतल कदली - वनके एकान्त प्रदेशमें गये । वहाँ, जिसमें फुहारे चलते थे, ऐसा मेघमहल था, रम्भाद्वारा चन्दन छिड़का जाता था, यमुनाजीको छूकर प्रवाहित होनेवाली मन्द वायु ठंडे जलके कण बिखेरती थी और सुधाकर चन्द्रमाकी रश्मियोंसे निरन्तर अमृत झरता रहता था । ऐसा शीतल कदली - वन भी श्रीराधाके विरहानलकी आँचसे भस्मीभूत हो गया था । श्रीकृष्णसे मिलनकी आशा ही श्रीराधाकी निरन्तर रक्षा कर रही थी । वहीं गोपियोंके सारे - के - सारे यूथ आ जुटे, जो सैकड़ोंकी संख्यामें थे । उन्होंने श्रीराधासे निवेदन किया कि ' माधव पधारे हैं । ' यह सुनकर साक्षात् वृषभानुवरकी पुत्री श्रीराधा सहसा उठीं और सखियोंसे घिरी हुई वे श्रीकृष्णको लिवा लानेके लिये आयीं । उन्होंने श्रीहरिको आसन दिया । पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि मनोहर उपचार प्रस्तुत किये । साथ ही कुशल पूछनेमें अत्यन्त चतुर श्रीराधा श्रीहरिसे आदरपूर्वक कुशल भी पूछती जा रही थीं । कोटि - कोटि तरुण कंदपके माधुर्यको हर लेनेवाले श्रीहरिका दर्शन करके राधाने सम्पूर्ण दुःखको उसी प्रकार त्याग दिया, जैसे ब्रह्मका बोध प्राप्त होनेपर ज्ञानी गुणोंके प्रति तादात्म्यका भाव छोड़ देता है । कीर्तिकुमारीने प्रसन्न होकर शृङ्गार धारण किया । श्रीकृष्ण जब परदेशके पथिक होकर गये थे, तबसे उन्होंने अपने शरीरपर शृङ्गार धारण नहीं किया था । न कभी चन्दन लगाया, न पान खाया, न सुधासदृश स्वादिष्ट भोजन ही ग्रहण किया । न दिव्य सेजकी रचना की और न कभी किसीके साथ हास-परिहास ही किया । परिपूर्णतम भगवान्की प्रियतमा आनन्दके आँसू बहाती हुई अपने परिपूर्णतम प्रियतम
पृष्ठ 234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२२८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड श्रीकृष्णसे गद्गद वाणीमें बोलीं ॥३–१२ ॥ श्रीराधाने कहा - प्यारे! यादवपुरी मथुरा कितनी दूर है, जो अबतक नहीं आये? वहाँ तुम क्या करते रहे? मैं अपने एकान्त दुःखको कैसे बताऊँ? तुम तो सबके साक्षी हो, अतः सब जानते हो । राजा सौदासकी रानी मदयन्ती, नलकी प्यारी रानी दमयन्ती तथा मिथिलेशनन्दिनी सीता - इन तीनोंमेंसे कोई यहाँ नहीं है । फिर किसको सामने रखकर इस वैरी विरहके दुःखका मैं वर्णन करूँ? ये गोपाङ्गनाएँ भी मेरी - जैसी परिस्थितिमें ही हैं, अतः वे भी कभी इस दुःखका निरूपण करनेमें समर्थ नहीं हैं । जैसे चकोरी शरत्कालके चन्द्रमाको और मयूरी नूतन मेघको देखना चाहती है, उसी प्रकार मैं तुम श्रीवृन्दावनचन्द्र तथा घनश्यामको देखनेके लिये उत्कण्ठित रहती हूँ । तुम्हारे सखा उद्भव धन्य हैं, जिन्होंने शीघ्र ही तुम्हारा दर्शन करा दिया । इस व्रजमें दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जिसके प्रेमसे तुम यहाँ आते ॥ १३ – १६ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार कहती और निरन्तर रोती हुई श्रेष्ठ लक्ष्मीरूपा श्रीराधाको देखकर श्यामसुन्दरका अङ्ग अङ्ग करुणासे विह्वल हो गया । उनके नेत्रोंसे भी अश्रु झरने लगे । उन्होंने तत्काल दोनों हाथोंसे खींचकर प्रियतमाको हृदयसे लगा लिया और नीतियुक्त वचनोंसे उन्हें धीरज बँधाया ॥ १७ ॥
श्रीभगवान् बोले- राधे! शोक न करो, मैं तुम्हारे प्रेमसे ही यहाँ आया हूँ । हम दोनोंका तेज भेदरहित एवं एक है । लोगोंने इसे दो मान रखा है । शुभे! जैसे दूध और उसकी धवलता एक है, उसी प्रकार सदा हम दोनों एक हैं । जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम सदा विराजमान हो । हम दोनोंका वियोग कभी होता ही नहीं । मैं पूर्ण परब्रह्म. और तुम जगन्माता तटस्था शक्ति हो । हम दोनोंके बीचमें वियोगकी कल्पना मिथ्या ज्ञानके कारण है, तुम इसे समझो । वरानने! जैसे आकाशमें नित्य विराजमान महान् वायु सर्वत्र व्यापक है, जैसे जल सूक्ष्मरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, जैसे काष्ठमें अग्नि व्याप्त रहती है और जैसे भीतर और बाहर स्थित यह पृथग्भूता पृथ्वी परमाणुरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, उसी प्रकार मैं निर्विकारभावसे सर्वत्र विद्यमान हूँ । जैसे जल विविध रंगोंसे युक्त होनेपर भी उनसे पृथक् है, उसी प्रकार मैं त्रिगुणात्मक भावोंके सम्पर्कमें रहकर भी उनसे सर्वथा असम्पृक्त हूँ । इसी प्रकार तुम मेरे स्वरूपको देखो और समझो; इससे सदा आनन्द बना रहेगा । सुमुखि! ' मैं ' और ' मेरा ' – इन दो भावोंके कारण द्वैतकी कल्पना होती है । जबतक सूर्यसे ही उत्पन्न हुआ मेघ सूर्य और दृष्टिके बीचमें विद्यमान है, तबतक दृष्टि अपने ही स्वरूपभूत सूर्यका दर्शन नहीं कर पाती । इसी प्रकार जबतक प्राकृत गुण व्यवधान बनकर खड़े हैं, तबतक जीवात्मा अपने ही स्वरूपभूत परमात्माको नहीं देख पाता । इन तीनों गुणोंका आवरण दूर होनेपर ही वह परमात्माका साक्षात्कार कर पाता है । यदि मन गुणों ( विषयों ) में आसक्त है तो वह बन्धनकारक होता है, और यदि परम पुरुष परमात्मामें संलग्न है तो मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला हो जाता है । इस प्रकार मनको बन्धन और मोक्ष - दोनोंका कारण बताया गया है । उस मनको जीतकर पृथ्वीपर असङ्ग होकर विचरे । भामिनि! लोकमें मनका सम्पूर्णभाव ( सम्बन्ध ) दोनों ओरसे परस्परकी अपेक्षा रखकर होता है, एक ओरसे नहीं होता । किंतु प्रेम स्वयं ही किया जाता है, अतः मुझमें अपनी ओरसे ही प्रेम करना चाहिये । प्रेमके समान इस भूतलपर दूसरा कोई भी मेरी प्राप्तिका साधन नहीं है ॥ १८-२६ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीहरिका यह वचन सुनकर कीर्तिनन्दिनी श्रीराधाने गोपियोंके साथ उन माधव श्रीकृष्णका पूजन किया । तदनन्तर कार्तिक पूर्णिमाकी रातमें गोपियों और श्रीराधिकाके साथ रासमण्डलमें उपस्थित हो साक्षात् श्रीहरिने मुरली बजायी । राजन्! यमुनाके निकट रासकी रङ्गभूमिमें श्रीराधा तथा अन्य सुन्दरी व्रजरमणियोंके साथ राधावल्लभ श्रीकृष्ण शोभा पाने लगे । रासमें जितनी गोपाङ्गनाएँ थीं, उतने ही रूप धारण करके वृन्दावन-अधीश्वर श्रीहरि दिव्य वृन्दावनमें विहार करने लगे । उनके चरणोंके नूपुर और मञ्जीर बज रहे थे । वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी । पीताम्बर पहिने, एक हाथमें कमल लिये, प्रातः कालिक सूर्यके समान कान्तिमान् मुकुट धारण किये, विद्युल्लताके तुल्य
पृष्ठ 235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २० ] श्रीकृष्णका कदली- वनमें श्रीराधा और गोपियोंके साथ मिलन २२ ९ जगमगाते हुए सुवर्णमय कुण्डलोंसे मण्डित हो, बेंतकी छड़ी लिये, वंशी बजाते हुए, मेघकी - सी कान्तिवाले श्रीहरि नटवर - वेषमें सुशोभित हुए । अत्यन्त प्रकाशमान कौस्तुभरत्न उनके वक्षःस्थलपर दिव्य प्रभा बिखेर रहा था । कानोंमें चिकने और चमकीले कुण्डल हिल रहे थे । रासमण्डलमें श्रीराधाके साथ वे उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे रतिके साथ रतिपति । जैसे स्वर्गमें शचीके साथ इन्द्र तथा आकाशमें चपलाके साथ मेघ शोभा पाते हैं, वृन्दावनमें वृन्दाके साथ वृन्दावनेश्वरकी वैसी ही शोभा हो रही थी । वे वृन्दावन, यमुना - पुलिन, वन और उपवनकी शोभा निहारते हुए गोपी- समुदाय के साथ गोवर्धन पर्वतपर गये । भगवान् व्रजेश्वरने देखा सौ यूथवाली गोपाङ्गनाओंको अपने सौभाग्यपर अभिमान हो उठा है, तब वे श्रीराधाके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २७–३६ ॥ अब वे गोवर्धनसे तीन योजन दूर चन्दनकी गन्धसे सुवासित सुन्दर रोहिताचलको चले गये । श्रीराधाके साथ वहाँके लता - कुओं और निकुञ्जोंको देखते तथा वार्तालाप करते हुए सुनहरी लताओंके आश्रयभूत उस पर्वतपर विचरने लगे । वहाँ बदरीनाथके द्वारा निर्मित रमणीय देवसरोवर है, जो बड़े - बड़े मत्स्यों, कछुओं और मगर आदि जल - जन्तुओं तथा हंस - सारस आदि पक्षियोंसे व्याप्त था । सहस्रदल कमल उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । इधर - उधर मँडराते हुए भ्रमरोंकी मधुर ध्वनिसे युक्त नर- कोकिलोंकी काकली वहाँ सब ओर व्याप्त थी । उसके तटपर मन्द मन्द वायु चल रही थी और प्रफुल्ल कमलोंकी सुगन्ध छायी हुई थी । रमास्वरूपा राधाके साथ माधव उस सरोवरके किनारे बैठ गये । उसी सरोवरके कूलपर महामुनि ऋभु एक पैरसे खड़े होकर तपस्या कर रहे थे और निरन्तर श्रीकृष्णके चिन्तनमें तत्पर थे । साठ हजार साठ सौ वर्षोंसे वे निराहार और निर्जल रहकर शान्तभावसे * नमः कृष्णाय कृष्णायै राधायै माधवाय च । घनश्यामाय देवाय श्यामायै सततं नमः । गोलोकातीतलीलाय लीलावत्यै नमो नमः । भूभारहाराय भुवंगताभ्यां मच्छान्तये चात्र समागताभ्याम् । तपस्यामें लगे थे । श्रीकृष्णने उन्हें देखा । राधाने उन्हें देखकर मुस्कराते हुए पूछा - ' ये कौन हैं? ' माधव बोले – ' प्रिये! इनका माहात्म्य बढ़ाओ । ये भक्त हैं । इन महामुनिकी भक्ति देखो । ' - कहकर श्रीकृष्णने ' हे ऋभो! ' यह नाम लेकर उच्चस्वरसे पुकारा । किंतु उन्होंने उनका वह शुभ वचन नहीं सुना; क्योंकि वे ध्यानकी चरमावस्था ( समाधि ) में पहुँच गये थे । तब श्रीहरि उस समय मुनिके हृदयसे तत्काल तिरोहित हो गये । श्रीहरिको ध्यानसे निर्गत होनेके कारण न देखकर मुनीन्द्र ऋभु अत्यन्त विस्मित हो गये । फिर तो उन्होंने आँखें खोल दीं और अपने सामने चपलाके साथ मेघकी भाँति राधाके साथ श्रीकृष्णको देखा, जो अपनी प्रभावसे दसों दिशाओंको अनुरञ्जित-प्रकाशित कर रहे थे । यह देख वे हरिभक्तिपरायण महात्मा शीघ्र उठे और राधासहित श्रीहरिकी परिक्रमा करके, मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हुए उनके चरणोंमें गिर पड़े । फिर अत्यन्त गद्गद वाणीमें श्रीकृष्णसे बोले ॥ ३७–४८ ॥ श्रीऋभुने कहा- -श्रीकृष्ण और कृष्णाको नमस्कार । श्रीराधा और माधवको नमस्कार । परिपूर्णतमा और परिपूर्णतमको नमस्कार । देव घनश्याम और श्यामाको सदा नमस्कार है । रासेश्वर तथा रासेश्वरीको नित्य-निरन्तर बारंबार नमस्कार है । गोलोकातीत लीलावाले श्रीकृष्णको तथा लीलावती श्रीराधाको बारंबार नमस्कार है । असंख्य ब्रह्माण्डोंकी अधिदेवी तथा असंख्य ब्रह्माण्डोंकी निधिको नमस्कार है । आप दोनों भूभार हरण करनेके लिये इस भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं और मुझे शान्ति प्रदान करनेके लिये यहाँ पधारे हैं । परस्पर संयुक्त विग्रहवाले आप दोनों श्रीराधा और श्रीहरिको मेरा नमस्कार है * ॥ ४ ९ –५२ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें नेत्रोंसे प्रेमाश्रुकी वर्षा करते परिपूर्णतमायै च परिपूर्णतमाय च ॥ रासेश्वराय सततं रासेश्वर्यै नमो नमः ॥ असंख्याण्डाधिदेव्यै चासंख्याण्डनिधये नमः ॥ परस्परं संवितविग्रहाभ्यां नमो युवाभ्यां हरिराधिकाभ्याम् ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० २० । ४ ९ –५२ )
पृष्ठ 236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड हुए प्रेमानन्दनिमग्न महामुनि ऋभुने अपने प्राण त्याग दिये । उसी समय उनके शरीरसे दस सूर्योंके समान दीप्तिमती ज्योति निकली और दसों दिशाओंमें घूमती हुई श्रीकृष्णमें लीन हो गयी । अपने भक्तकी यह प्रेमलक्षणा - भक्ति देखकर श्रीकृष्णने अपने नेत्रोंसे आनन्दके अश्रु बहाते हुए बड़े प्रेमसे उनका नाम लेकर पुकारा । तब श्रीकृष्णका - सा रूप धारण किये वे मुनि श्रीकृष्णके चरण - कमलसे पुनः प्रकट हुए । उस समय उनका सौन्दर्य कोटि - कोटि कंदर्पोको तिरस्कृत कर रहा था और वे विनयसे सिर झुकाये हुए खड़े थे । करुणा-इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत मोक्ष ' नामक बीसवाँ निधि श्रीकृष्णने उन्हें भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया और आश्वासन दे, अपना दिव्य कल्याणकारी हाथ उनके मस्तकपर रखा । मिथिलेश्वर! तत्पश्चात् श्रीकृष्ण और श्रीराधाकी परिक्रमा करके, उन्हें प्रणाम-कर, मुनिवर ऋभु एक मनोहर विमानपर आरूढ़ हो, अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए, गोलोकधामको चले गये । महामुनि ऋभुकी यह परा मुक्ति देखकर वृषभानुनन्दिनी श्रीराधिकाको बड़ा विस्मय हुआ । वे बहुत देरतक आनन्दके आँसू बहाती रहीं । फिर श्रीकृष्णसे बोलीं ॥ ५३-५९ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें रासोत्सवके प्रसङ्गमें ' ऋभुका अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
इक्कीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णकी द्रवरूपताके प्रसङ्गमें नारदजीका उपाख्यान राधाने कहा – माधव! ये मुनिश्रेष्ठ धन्य हैं, जो तुम्हारे इतने बड़े भक्त और महान् प्रेमी थे । इन्होंने तुम्हारा सारूप्य प्राप्त कर लिया और तुम भी इनके लिये आँसू बहाते रहे । पापनाशन! अब तुम्हें इनके शरीरका दाहसंस्कार भी करना चाहिये । इनका यह शरीर तपस्याके प्रभावसे अभीतक निर्मल आकारमें प्रकाशित हो रहा है ॥ १-२ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! वहाँ श्रीराधा इस प्रकार कह ही रही थीं कि मुनिका शरीर एक नदीके रूपमें परिणत हो गया । रोहिताचलपर बहती हुई वह पापनाशिनी नदी आज भी देखी जाती है । उनके शरीरको नदीके रूपमें परिणत देख राधाको और भी अधिक विस्मय हुआ । तब वे वृषभानुवरनन्दिनी नन्दराजकुमारसे इस प्रकार बोलीं ॥ ३-४ ॥ राधाने कहा – श्यामसुन्दर! इन महामुनिका यह शरीर जलरूपमें कैसे परिणत हो गया? देव! मेरे इस संशयको तुम पूर्णरूपसे मिटा दो ॥ ५ ॥
श्रीभगवान्ने कहा – रम्भोरु! ये मुनीश्वर प्रेम - लक्षणा - भक्तिसे संयुक्त थे, इसीलिये इनका यह शरीर द्रवभावको प्राप्त हुआ है । तुम्हारे साथ मुझे वर देनेके लिये आया देख महामुनि ऋभु अत्यन्त हर्षित हुए थे, इसीलिये इनका कलेवर उसी प्रकार जलरूपमें परिणत हो गया, जैसे मैं पहले द्रवभावको प्राप्त हुआ था॥६-७ ॥ श्रीराधाने पूछा – देवदेव! दयानिधे! तुम कैसे द्रवभावको प्राप्त हुए थे! यह बात मुझे बड़ी विचित्र लग रही है, तुम विस्तारसे सब बात बताओ ॥ ८ ॥
श्रीभगवान्ने कहा – इस विषयमें जानकार लोग इस प्राचीन इतिहासको सुनाया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पापका पूर्णतया नाश हो जाता है ॥९ ॥
पूर्वकालमें प्रजापति ब्रह्मा मेरे नाभि - कमलसे प्रकट हो प्राकृत जगत्की सृष्टि करने लगे । वे अपनी तपस्या और मेरे वरदानसे शक्तिशाली रहे । एक समय सृष्टिकर्ता ब्रह्माकी गोदसे सुन्दर पुत्र नारदजीका जन्म हुआ । वे मेरी भक्तिसे उन्मत्त होकर भूमण्डलपर भ्रमण करते हुए मेरे नाम- पदोंका कीर्तन करने लगे । एक दिन प्रजापति ब्रह्मदेवने नारदजीसे कहा - ' महामते! यह व्यर्थ घूमना छोड़ो और प्रजाकी सृष्टि करो । ' उनकी बात सुनकर ज्ञानमार्गपरायण नारदने इस प्रकार कहा- ' पिताजी! मैं सृष्टि नहीं करूँगा; क्योंकि वह
पृष्ठ 237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २१ ] श्रीकृष्णकी द्रवरूपताके शोक- मोह पैदा करनेवाली है । मैं तो श्रीहरिके नामोंका कीर्तन और उनकी भक्ति करूँगा । आप भी इस सृष्टि व्यापारमें लगकर दुःखसे अत्यन्त आतुर रहते हैं, अतः आप भी सृष्टि रचना छोड़ दीजिये ' ॥ १०-१४ ॥ यह सुनकर ब्रह्माजीके अधर क्रोधसे फड़कने लगे । उन्होंने कुपित हो शाप देते हुए कहा - ' दुर्मते! तुम एक कल्पतक सदा गाने - बजानेमें ही लगे रहने वाले गन्धर्व हो जाओ । ' श्रीराधे! इस प्रकार ब्रह्माके शापसे नारदजी उपबर्हण नामक गन्धर्व हो गये । वे एक कल्पतक देवलोकमें गन्धर्वराजके पदपर प्रतिष्ठित रहे । एक दिन स्त्रियोंसे घिरे हुए वे ब्रह्माजीके लोकमें गये । वहाँ सुन्दरियोंमें मन लगा रहनेके कारण उन्होंने बेताला गीत गाया । तब ब्रह्माने पुनः शाप दे दिया - ' दुर्मते! तू शूद्र हो जा । ' इस प्रकार ब्रह्माजीके शापसे वे दासीपुत्र हो गये । राधे! फिर सत्सङ्गके प्रभावसे नारदजी ब्रह्मपुत्रताको प्राप्त हुए । तदनन्तर पुनः भक्तिभावसे उन्मत्त हो भूतलपर विचरते हुए वे मेरे पदोंका गान एवं कीर्तन करने लगे । मुनीन्द्र नारद वैष्णवोंमें श्रेष्ठ, मेरे प्रिय तथा ज्ञानके सूर्य हैं । वे परम भागवत हैं और सदा मुझमें ही मन लगाये रहते हैं ॥ १५ - २० ॥ एक दिन विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गान-तत्पर नारद, जिनकी सर्वत्र गति है, इलावृतखण्डमें गये, जहाँ प्रिये! जम्बूफलके रससे प्रकट हुई श्यामवर्णा जम्बूनदी प्रवाहित होती है तथा जाम्बूनद नामक सुवर्ण उत्पन्न होता है । उस देशमें रत्नमय प्रासादोंसे युक्त तथा दिव्य नर - नारियोंसे भरा हुआ एक ' वेदनगर ' – नामक नगर है, जिसे योगी नारदने देखा । वहाँ कितने ही लोगोंके पैर नहीं थे, गुल्फ नहीं थे और घुटने भी नहीं थे । जङ्घा अथवा जघनभागका भी कितने ही लोगोंके पास अभाव था । वे विकलाङ्ग और कृशोदर थे और कितनोंके पीठके मध्यभागमें कूबर निकल आयी थी, दाँत गिर गये थे या ढीले हो गये थे, कंधे ऊँचे थे, मुख झुका हुआ था और कितनोंके गर्दन ही नहीं थी । इस प्रकार नारदजीने वहाँकी स्त्रियों और पुरुषोंका अङ्ग भङ्ग देखा । उन सबको देखकर मुनिने कहा — ' अहो! यह क्या बात प्रसङ्गमें नारदजीका उपाख्यान २३१ है? यह सब तो विचित्र ही दिखायी देता है । आप सब लोगोंके मुँह कमलके समान हैं, शरीर दिव्य हैं और वस्त्र भी अच्छे हैं । आपलोग देवता हैं या उपदेवता अथवा कोई ऋषिश्रेष्ठ हैं! आप सब लोग बाजोंके साथ हैं तथा रमणीय गीत गानेमें संलग्न हैं । आपके अङ्ग भङ्ग कैसे हो गये, यह बात शीघ्र मुझे बताइये । ' उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब दीनचित्त होकर बोले ॥ २१ - २८ ॥ रागोंने कहा - मुने! हमारे शरीरमें स्वतः बड़ा भारी दुःख पैदा हो गया है । परंतु यह सब उसके आगे कहना चाहिये, जो उसे दूर कर सके । महर्षे! हमलोग राग हैं और वेदपुरमें निवास करते हैं । मानद! हम अङ्ग भङ्ग कैसे हो गये, इसका कारण बताते हैं, सुनिये; हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीके एक पुत्र पैदा हुआ है, जिसका नाम है, नारद । वह महामुनि प्रेमसे उन्मत्त होकर बेसमय ध्रुवपद गाता हुआ इस पृथ्वीपर विचरा करता है । उसके ताल - स्वरसे रहित असामयिक गानों - विगानोंसे हम सबके अङ्ग भङ्ग हो गये हैं ॥ २ ९ -३२ ॥ उनकी यह बात सुनकर नारदजीको बड़ा विस्मय हुआ । उनका गर्व गल गया और वे रागोंसे हँसते हुए - से बोले ॥ ३३ ॥
मुनिने कहा - रागगण! मुझे शीघ्र बताओ । नारदमुनिको किस प्रकारसे काल और तालका ज्ञान हो सकता है, जिससे वे स्वरयुक्त गीत गा सकें ॥ ३४ ॥
रागोंने कहा - साक्षात् वैकुण्ठनाथकी प्रिय भार्याओंमें मुख्य सरस्वती देवी यदि नारदको संगीतकी शिक्षा दे सकें तो वे मुनि कौन - सा राग किस समय, किस तालस्वरसे गाना चाहिये, इसे जान सकते हैं ॥ ३५ ॥
उनकी यह बात सुनकर दीनवत्सल नारद सरस्वतीका कृपा प्रसाद प्राप्त करनेके लिये तुरंत ही शुभ्रगिरिपर चले गये । वहाँ उन्होंने सौ दिव्य वर्षोंतक निरन्तर अत्यन्त दुष्कर तपस्या की । व्रजेश्वरि! उन्होंने अन्न - जल छोड़कर केवल सरस्वतीके ध्यानमें मन लगा लिया था । नारदजीकी तपस्यासे वह पर्वत अपना ' शुभ्र ' नाम छोड़कर ' नारदगिरि ' के नामसे प्रख्यात हो गया । वह सारा पर्वत उनकी तपस्यासे पवित्र हो गया । तपस्याका पर्यवसान होनेपर साक्षात् वाग्देवता
पृष्ठ 238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड विष्णुप्रिया श्रीसरस्वती वहाँ आयीं । नारदजीने उन दिव्यवर्णा देवीको देखा । देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उन्हें नमस्कार करके परिक्रमापूर्वक नतमस्तक हो, वे मुनीश्वर सरस्वती देवीके रूप, गुण और माधुर्यकी स्तुति करने लगे॥३६–४० ॥ नारदजी बोले – नवीन सूर्यके बिम्बकी द्युतिको उगलने और हिलनेवाले रत्नमय कर्णफूल, केयूर, किरीट और कङ्कण जिनकी शोभा बढ़ाते हैं तथा जो चमकते और झनकारते हुए नूपुरोंके शिञ्जन - रवसे रञ्जित होती हैं, उन कोटि चन्द्रमाओंसे अधिक उज्ज्वल मुखवाली सरस्वती देवीको मैं नमस्कार करता हूँ । जो चञ्चल चरण और चञ्चपुटवाले उड़ते हुए कलहंसपर विराजमान होती तथा निर्मल मुक्ताफलोंके अनेक हार धारण करती हैं, उन सौभाग्यशालिनी सरस्वती देवीको मैं प्रणाम करता हूँ । जो अपने दोनों पार्श्वके दो - दो निर्मल हाथोंमें क्रमश: वर, अभय, पुस्तक और उत्तम वीणा धारण करती हैं, उन जगन्मयी, ब्रह्ममयी, शुभदा एवं मनोहरा सरस्वती देवीको मैं नमस्कार करता हूँ । श्वेतवर्णकी लहरदार रेशमी साड़ी पहननेवाली अतीव मङ्गलस्वरूपे सरस्वति! मुझे स्वर-तालका ज्ञान प्रदान कीजिये, जिससे मैं अविनाशी एवं सर्वोत्कृष्ट रासमण्डलमें सर्वोपरि और अद्वितीय संगीतज्ञ हो जाऊँ * ४१–४४ ॥ श्रीभगवान् कहते हैं— श्रीराधे! सरस्वतीका यह नारदोक्त दिव्य स्तोत्र जडताका नाश करनेवाला है । जो प्रातः काल उठकर इसका पाठ करेगा, वह इस लोकमें विद्यावान् होगा । तब प्रसन्न हुई वाग्देवताने महात्मा नारदको भगवत्प्रदत्त स्वरब्रह्मसे विभूषित एक वीणा प्रदान की । साथ ही राग - रागिनी, उनके पुत्र, देशकालादिकृत भेद तथा ताल, लय और स्वरोंका ज्ञान भी दिया । ग्रामोंके छप्पन कोटि भेद और असंख्य अवान्तर - भेद, नृत्य, वादित्र तथा सुन्दर मूर्च्छना – इन सबका ज्ञान नारदजीको प्राप्त हुआ । वैकुण्ठपतिकी प्रियाओंमें मुख्य सरस्वती देवीने स्वरगम्य सिद्धपदोंद्वारा नारदजीको संगीतकी शिक्षा दी । राधे! नारदको रासमण्डलके उपयुक्त अद्वितीय रागोद्भावक बनाकर विष्णुवल्लभा वाग्देवी वैकुण्ठधामको चली गयीं ॥ ४५ - ५० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' नारदोपाख्यान ' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय नारदका अनेक लोकोंमें होते हुए गोलोकमें पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णके समक्ष अपनी कलाका प्रदर्शन करना श्रीभगवान् कहते हैं— श्रीराधे! इस रागरूप मनोहर एवं गुह्य ज्ञानका उपदेश किसको देना चाहिये, इसका बुद्धिपूर्वक विचार करके नारदजी गन्धर्वनगरमें गये । वहाँ तुम्बुरु नामक गन्धर्वको अपना शिष्य बनाकर नारदजी मधुरस्वरसे वीणा बजाते हुए मेरे गुणोंका गान करने लगे । तदनन्तर उनके हृदयमें यह * नवार्कबिम्बद्युतिमुद्गलद्धलत्ताटङ्ककेयूरकिरीटकङ्कणाम् । वन्दे सदाहं कलहंस उद्गते चलत्पदे चञ्चलचसम्पुटे । वराभयं पुस्तकवल्लकीयुतं परं दधानां विमले करद्वये । तरङ्गितक्षौमसिताम्बरे परे देहि स्वरज्ञानमतीवमङ्गले । तथा श्रीकृष्णका द्रवरूप होना जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि ' किन लोगोंके सामने इस मनोहर रागरूप गीतका गान करना चाहिये? इसको सुननेका पात्र कौन है? ' इसकी खोज करते हुए नारद इन्द्रके पास आये । उनको इस विषयका आनन्द लेते न देख मुनिश्रेष्ठ नारद सखा तुम्बुरुके साथ राग-रागिनियोंका निरूपण करनेके लिये सूर्यलोकमें गये । स्फुरत्क्वणन्नूपुररावरञ्जितां नमामि कोटीन्दुमुखीं सरस्वतीम् ॥ निर्धौतमुक्ताफलहारसंचयं संधारयन्तीं सुभगां सरस्वतीम् ॥ नमाम्यहं त्वां शुभदां सरस्वतीं जगन्मयीं ब्रह्ममयीं मनोहराम् ॥ येनाद्वितीयो हि भवेयमक्षरे सर्वोपरि स्यां पररासमण्डले ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० २१।४१–४४ )
पृष्ठ 239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २२ ] नारदका अनेक लोकोंमें होते हुए श्रीकृष्णके समक्ष अपनी कलाका प्रदर्शन २३३ वहाँ सूर्यदेवको रथके द्वारा भागे जाते देख देवर्षि -शिरोमणि महामुनि नारद वहाँसे तत्काल शिवजीके पास चले गये । राधे! ज्ञानतत्त्वज्ञ भूतनाथ शिवके नेत्र ध्यानमें निश्चल हैं, यह देख नारदजी ब्रह्मलोकमें गये । सृष्टिकर्ता ब्रह्माको सृष्टि - रचनामें व्यग्र देख, वे वहाँ भी न ठहर सके; उस स्थानसे विष्णुके सर्वलोकवन्दित वैकुण्ठधाममें चले गये । भक्तोंके स्वामी भक्तवत्सल भगवान् विष्णुको किसी भक्तपर कृपा करनेके लिये कहीं जाते देख योगीन्द्र नारद तुम्बुरुके साथ अन्यत्र चल दिये ॥ १–८ ॥ वृषभानुनन्दिनि! योगीश्वर संतोंकी गति त्रिलोकीके भीतर और बाहर भी बतायी गयी है । जो केवल कर्मी हैं, उन्हें वैसी गति नहीं प्राप्त होती । मुनीश्वर नारद करोड़ों ब्रह्माण्ड - समूहोंको लाँघकर प्रकृतिसे परे गोलोकधाममें जा पहुँचे । उत्ताल तरंगोंसे सुशोभित विरजा नदीको पार करके वे शीघ्र ही भ्रमरोंकी ध्वनिसे निनादित रमणीय वृन्दावनमें गये, जो सदा वसन्त ऋतुसे युक्त है और जहाँ लताभवन मन्द मारुतके झोंकेसे कम्पायमान रहते हैं । वृन्दावनसे गोवर्धन पर्वतका दर्शन करते हुए नारदजी मेरे निकुञ्जमें आये । निकुञ्जद्वारपर सखियोंने पूछा - ' आप दोनों कौन हैं? कहाँसे आये हैं और यहाँ क्या कार्य है? ' ऐसा प्रश्न होनेपर मुनि और तुम्बुरु दोनों बोले-' सुन्दरियो! हम दोनों गान- विद्यामें कुशल गायक हैं और अपनी वीणाकी मधुर ध्वनि साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् राधावल्लभ श्रीकृष्णको सुनानेके लिये आये हैं । हम वन्दीजनोंमें उत्तम हैं । हमारी यह बात महात्मा श्रीकृष्णसे निवेदित कर देनी चाहिये ॥ ९ –१५ ॥ यह सुनकर सखियोंने उनका संदेश मेरे पास पहुँचाया और मेरी आज्ञासे लौटकर मधुरवाणीमें उन वन्दियोंको भीतर चलनेका आदेश दिया । करोड़ों सूर्योकी ज्योतिसे व्याप्त मेरे निकुञ्जके आँगनमें, जहाँ सब ओर कौस्तुभमणि जड़ी थी, मनोहर चँवर डुलाये जा रहे थे, हिलते हुए मोतियोंकी झालरोंसे युक्त छत्र तने थे और करोड़ों सखियाँ विराजमान थीं, आकर महापद्ममय आसनपर तुम्हारे साथ बैठे * ' गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि । दृष्ट्वा जन्मशतं पापं पीत्वा जन्मशतद्वयम् सफलं जन्म वै तेषां ये पश्यन्ति हि जाह्नवीम् । हुए मुझ श्रीकृष्णका उन दोनोंने दर्शन किया । फिर प्रणाम और परिक्रमा करके वे मेरी आज्ञासे वहाँ बैठे और मेरी स्तुति करके मेरे गुणोंका गान करनेके लिये उद्यत हुए । आतोद्य ( वाद्य विशेष ) को दबाते और देवदत्त स्वरामृतमयी वीणाको झंकृत करते हुए तुम्बुरुसहित नारदने वीणावादनकी अद्वितीय कलाको प्रस्तुत किया । मैं उससे बहुत संतुष्ट हुआ और सिर हिलाता हुआ उस वीणाकी प्रशंसनीय स्वर - लहरीकी सराहना करने लगा । अन्ततोगत्वा प्रेमके वशीभूत हो अपने - आपको देकर मैं जलरूप हो गया । मेरे दिव्य शरीरसे जो जल प्रकट हुआ, उसे ' ब्रह्मद्रव ' के नामसे लोग जानते हैं । उसके भीतर कोटि - कोटि ब्रह्माण्ड-राशियाँ लुढ़कती रहती हैं । उस उन्नत एवं शुभ जलराशिमें लुढ़कते हुए वे ब्रह्माण्ड इन्द्रायणके फलके समान प्रतीत होते हैं ॥ १६- २२३ ॥ राधे! यह ब्रह्माण्ड ' पृश्निगर्भ ' नामसे प्रसिद्ध है, जो मेरे त्रिविक्रम उसका भेदन करके आया, उसे इस पापहारिणी स्वर्धुनी गङ्गाको द्युलोकमें और अधोलोक -है । इस प्रकार एक रूपके पदाघातसे फूट गया था । जो साक्षात् ब्रह्मद्रवका जल यहाँ शुभ मन्वन्तरमें पूर्ववर्ती लोगोंने ' गङ्गा ' के नामसे जाना था । उस ' मन्दाकिनी ', पृथ्वीपर ' भागीरथी ' पातालमें ' भोगवती ' कहा गया ही गङ्गा त्रिपथगामिनी होकर तीन नामोंसे विख्यात हुईं । इसमें स्नान करनेके लिये प्रणतभावसे जाते हुए मनुष्यके लिये पग - पगपर राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंका फल दुर्लभ नहीं रह जाता । जो सैकड़ों योजन दूरसे भी ' गङ्गा - गङ्गा'का उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे छूट जाता और विष्णुलोकमें जाता है । कलियुगमें गङ्गाका दर्शन करनेसे सौ जन्मोंका, जल पीनेसे दौ सौ जन्मोंका और स्नान करनेसे एक सहस्र जन्मोंका पाप नष्ट कर देती हैं । जो जाह्नवी गङ्गाका दर्शन करते हैं, उनका जन्म सफल है । जो उनके दर्शनसे वञ्चित रह जाते हैं, उनका जन्म व्यर्थ चला गया * ॥ २३–२९ ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ । स्नात्वा जन्मसहस्रेण हन्ति गङ्गा कलौ युगे ॥ वृथा जन्मगतं तेषां ये न पश्यन्ति जाह्रवीम् ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० २२ । २७–२९ )
पृष्ठ 240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड रम्भोरु राधे! जैसे विरजा तुम्हारे भयसे द्रवरूपताको प्राप्त हो गयी, जैसे विरजाके सातों पुत्र सात समुद्रोंके रूपमें द्रवभावको प्राप्त हो गये, जैसे विष्णु ' कृष्णा ' नदी हुए, जैसे शिवदेव ' वेणी ' नदी हुए, जैसे ब्रह्मा ' ककुद्मिनी गङ्गा ' हुए और जैसे अप्सरा ‘ गण्डकी ' नदी हो गयी, उसी प्रकार ये ऋभु नामक मुनि भी ब्रह्मभावको प्राप्त हुए हैं । यह ऋभुकी प्रेमलक्षणा - भक्तिसे सम्भव हुआ है, इसमें संशय नहीं है । जो इस पापहारिणी पवित्र कथाका श्रवण करता है, वह मनुष्य सब लोकोंको लाँघकर मेरे गोलोकधाममें चला जाता है ॥ ३०–३३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार अपनी प्रिया श्रीराधासे कहकर श्रीहरि ऋभुके आश्रमसे श्रीराधाके साथ ही मालती - वनमें चले आये । फिर गोपियोंकी विरह व्यथाको जान भक्त -वत्सल भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ यमुनाके इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके मङ्गलमय पुलिनपर चले आये । उस समय समस्त गोपीगणोंका मान और व्यथा - भार दूर हो गया । उन्होंने, जैसे चपलाएँ मेघका आलिङ्गन करती हैं, उसी प्रकार घनश्यामको अपनी भुजाओंमें भर लिया । तब श्रीहरि वृन्दावनमें यमुनाके मनोहर तटपर गोपाङ्गनाओंके साथ मधुरस्वरमें वंशी बजाने लगे । भगवान्के उस मधुर रागसे गोपकन्याएँ मूच्छित हो गयीं, नदियोंका वेग रुक गया, पक्षी अचल हो गये । समस्त देवताओंने मौन धारण कर लिया, देवनायक स्तब्ध हो गये, वृक्षोंसे जल बहने लगा तथा सारा जगत् मानो निद्रामें निमग्न हो गया । रात्रिकालमें रास रचाकर श्रीराधिका और गोपियोंके मनोरथ पूर्ण करके ब्राह्ममुहूर्तमें भगवान् श्रीकृष्ण नन्दभवनको लौट आये । गोपिकाओंके साथ श्रीराधिका भी अपना आनन्दमय मनोरथ प्राप्त करके वृषभानुवरके सुन्दर मन्दिरमें चली गयीं ॥ ३४ - ४१ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' नारदोपाख्यान ' नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
तेईसवाँ अध्याय श्रीकृष्णका व्रजसे लौटकर मथुरामें आगमन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण व्रजमें कई दिनोंतक रहकर सबको अपना दर्शन दे मथुरा जानेको उद्यत हुए । नौ नन्दों, नौ उपनन्दों, छः वृषभानुओं तथा वृषभानुवर और व्रजेश्वर नन्दराजसे मिलकर, कलावती, यशोदा, अन्यान्य गोपियों तथा गौओंके गणोंसे भी भेंट करके, आश्वासन और ज्ञान दे, सबसे विदा लेकर माधव चञ्चल अश्वोंसे जुते हुए अपने दिव्य रथपर आरूढ़ हो मथुरा जानेकी इच्छासे नन्दगाँवसे बाहर निकले । उनके पीछे - पीछे समस्त मोहित व्रजवासी बहुत दूरतक गये । वे माधव-के अत्यन्त कष्टमय विरहको नहीं सह सके । जिन्हें भूमण्डलपर कभी एक बार भी श्रीविष्णुका दर्शन हुआ हो, उन्हें भी उनका विरह दुस्सह हो जाता है; फिर जिन्हें प्रतिदिन उनका दर्शन होता रहा हो, उनको उनके विरहसे कितना दुःख होता होगा, इसका वर्णन कैसे किया जा सकता है । नरेश्वर! अपलक नेत्रोंसे श्रीधरके मुँहकी ओर देखते हुए समस्त व्रजवासी गोप स्नेह-सम्बन्धके कारण प्रेमविह्वल उनसे बोले ॥ १-७ ॥ गोपोंने कहा – श्रीकृष्ण! तुम फिर जल्दी आना और हम समस्त व्रजवासियोंकी रक्षा करना । जैसे पूर्वकालमें तुमने देवताओंको अमृत प्रदान किया था, उसी प्रकार अब हमें अपने दर्शनकी सुधाका पान कराते रहना । देव! केवल तुम्हीं सदा यशोदाके आनन्ददायक हो, तुम्हीं श्रीनन्दराजको आनन्द प्रदान