गर्ग संहिता — पृष्ठ 241–250
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250
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अध्याय २३ ] श्रीकृष्णका व्रजसे लौटकर मथुरामें आगमन २३५ करनेवाले हो और तुम्हीं व्रजवासियोंके जीवन हो । प्रभो! तुम्हीं इस व्रजके धन हो, गोपकुलके दीपक हो और महापुरुषोंके भी मनको मोहनेवाले हो । जैसे निदाघसे जले हुए प्राणीको शीतल जल प्राप्त हो जाय, सर्दीसे पीड़ित मनुष्यको जैसे आग मिल जाय, ज्वरसे आर्त पुरुषको उपयुक्त औषध प्राप्त हो जाय और मरे हुए मानवको भी जैसे मङ्गलमय अमृत मिल जाय, तो वे जी उठते हैं, उसी प्रकार समस्त व्रजके लिये तुम्हारा दर्शन ही जीवन है; इसलिये तुम यहीं निवास करो । इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ । हमारे इस जन्म अथवा पूर्वजन्ममें जो कुछ भी पुण्य हुआ हो, उसके फलस्वरूप हमारा चित्त सदा तुम्हारे चरणारविन्दोंमें लगा रहे । जिनका चित्त तुम्हारे चरण-कमलमें लगा हुआ है, वे भक्तजन तुम्हें सदा ही प्रिय हैं । तुम प्रकृतिसे परे निर्गुण हो, तथापि अपने भक्तों-के लिये सगुण हो जाते हो । तुम्हें अपने भक्तसे अधिक प्रिय शिव, ब्रह्मा और लक्ष्मी भी नहीं हैं । जो ब्रह्मपद आदिकी अभिलाषाको छोड़कर तुझ भगवान्का निष्कामभावसे भजन करते हैं, वे युक्तचित्त पुरुष ही शान्त एवं निरपेक्ष सुखका अनुभव करते हैं * ॥ ८-१५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर वे सब गोप प्रेमसे विह्वल हो श्रीकृष्णके देखते - देखते आनन्दके आँसू बहाते हुए रोने लगे । भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णके मुखपर भी अश्रुकी धारा बह चली । वे प्रसन्नचेता परमेश्वर उन विरह - विह्वल गोपोंसे बोले ॥ १६-१७ ॥ श्रीभगवान् ने कहा - व्रजवासियो! तुम सब मेरे प्राण हो और मेरे परम प्रिय हो । मेरा हृदय तुमलोगोंमें ही स्थित है, केवल शरीर अन्यत्र दिखायी देता है । मैं प्रतिमास तुम सबको देखने और दर्शन देनेके लिये आऊँगा, यह वचन देता हूँ । मनसे मैं दूर नहीं हूँ । मन ही सबका कारण है । हे गोपगण! यादवोंसे युद्ध करनेके लिये जरासंध आया है, अतः यदुवंशियोंकी सहायताके लिये मैं जाता हूँ, तुम्हें शोक नहीं होना चाहिये ॥ १८ - २० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार उन गोपोंको बार - बार आश्वासन दे, फिर लौटकर यशोदा-सहित नन्दराजको दूसरे रथपर बिठाया और श्रीदामा आदि सखाओंको साथ ले, उद्धवसहित रथपर आरूढ़ हो, वे सर्वकारण- कारण भगवान् मथुराको गये । वीर! जबतक रथ, उसमें जुते हुए सौ वेगशाली घोड़े और फहराती पताकासे युक्त तिरंगा ध्वज तथा उड़ती हुई धूल दिखायी देती रही, तबतक अन्य व्रजवासी वहीं खड़े रहे । फिर वे अपने घरको लौट आये ॥ २१–२३ ॥ श्रीकृष्णचन्द्रका यह परम उत्तम विचित्र चरित्र मनुष्योंके महान् पापको हर लेनेवाला है । जो भक्तप्रवर पृथ्वीपर इस चरित्रको सुनता है, वह उत्तमोत्तम गोलोकधाममें जाता है ॥२४ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें व्रजयात्राके प्रसङ्गमें ' श्रीकृष्णका आगमन ' नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
* शीघ्रमागच्छ हे कृष्ण सर्वान्नो व्रजवासिनः त्वमेव सर्वदा देव यशोदानन्ददायकः व्रजे धनं कुले दीपो मोहनो महतामपि शीतार्तस्य यथा वह्निर्ज्वरार्त्तस्य यथौषधम् तथा व्रजस्य सर्वस्य जीवनं तव दर्शनम् यन्नोऽस्ति किंचित्सुकृतमस्मिन् वा पूर्वजन्मनि येषां चेतस्त्वत्पदाब्जे ते भक्तास्त्वत्प्रियाः सदा तव भक्तात्प्रियो नास्ति विसृज्य पारमेष्ठ्यादि निष्कामास्त्वां भजन्ति ये + मत्प्राणा मत्प्रिया यूयं सर्वे वै व्रजवासिनः । मासं प्रत्यागमिष्यामि युष्मान् द्रष्टुं वचो मम ॥ पाहि संदर्शनं देहि देवेभ्यो ह्यमृतं यथा ॥ । श्रीनन्दनन्दनस्त्वं वै जीवनं व्रजवासिनाम् ॥ । यथा निदाघदग्धस्य प्राप्तं वै शीतलं जलम् ॥ । मृतस्य मानवस्यापि पीयूषं मङ्गलं यथा ॥ । तस्मादत्र स्थितिं कुर्याद् बहुना कथितेन किम् ॥ । तत्फलेन सदा चेतो भूयात् त्वत्पादपङ्कजे ॥ । भक्तार्थं सगुणोऽसि त्वं निर्गुणः प्रकृतेः परः ॥ शिवो ब्रह्मा न चेन्दिरा ॥ नैरपेक्ष्यं सुखं शान्तं ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ( गर्ग ०, हृदयं मेऽस्ति युष्मासु देहोऽन्यत्र विलक्ष्यते ॥ मनसा नहि दूरोऽस्मि मनः सर्वस्य कारणम् ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० २३ । ८–१५ ) मथुरा ० २३ । १८-१९ )
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चौबीसवाँ अध्याय बलदेवजीके द्वारा कोल दैत्यका वध; उनकी गङ्गातटवर्ती तीर्थोंमें यात्रा; माण्डूकदेवको वरदान और भावी वृत्तान्तकी सूचना देना; फिर गङ्गाके अन्यान्य तीर्थोंमें स्नान - दान करके मथुरामें लौट जाना बहुलाश्वने पूछा – मुने! गोपाङ्गनाओं और गोपको उत्तम दर्शन देकर मथुरामें लौटनेके पश्चात् श्रीकृष्ण तथा बलरामने क्या किया? श्रीकृष्ण और बलदेवका चरित्र बड़ा मधुर है । यह समस्त पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यप्रद तथा चतुर्वर्गरूप फल प्रदान करनेवाला है ॥ १-२ ॥ श्रीनारदजीने कहा— राजन्! अब श्रीकृष्ण और बलदेवजीका दूसरा चरित्र सुनो, जो सर्वपापहारी, पुण्यदायक तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देने-वाला है । नरेश्वर! कोल नामक दैत्यसे पीड़ित हुए बहुत - से लोग दीनचित्त हो ब्राह्मणोंके साथ कौशारविपुरसे मथुरामें आये । उस समय रोहिणीनन्दन बलराम शीघ्रगामी अश्वपर आरूढ़ हो थोड़े - से अग्रगामी लोगोंके साथ शिकार खेलनेके लिये मथुरासे निकले थे । मार्गमें ही उन्हें प्रणाम करके उनकी विधिवत् पूजा करनेके पश्चात् सब लोग उनके चरणोंमें प्रणत हो गये और हाथ जोड़ हर्ष - गद्गद वाणीमें बोले ॥ ३–६ ॥ प्रजाजनोंने कहा- राम! महाबाहु राम! महाबली देवदेव! हम सब लोग कोल नामक दैत्यसे पीड़ित हो आपकी शरणमें आये हैं । कोल दैत्य कंसका सखा है । वह महाबली दैत्य राजा कौशारविको जीतकर उन्हींके नगरमें राज्य करता है । राजा कौशारवि उसके भयसे गङ्गातटपर चले गये हैं और वहाँ पुनः अपने राज्यकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त जितेन्द्रिय हो आपके चरण - कमलोंका भजन कर रहे हैं । विभो! आप उनकी सहायता कीजिये । हम उन्हींकी शुभ प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्रकी भाँति पालन किया है । उनके संरक्षणमें हमलोग बड़े सुखी थे । प्रभो! अब दुष्ट कोल हमें निरन्तर पीड़ा दे रहा है । यद्यपि आपने त्रिभुवनविजयी वीर कंसको मार डाला है, तथापि देवेन्द्र! जबतक कोल जीवित है, तबतक कंसको भी मरा हुआ नहीं मानना चाहिये । आप प्रकृतिसे परे होकर भी भक्तोंकी रक्षाके लिये ही सगुणरूपसे अवतीर्ण हुए हैं ॥७–१२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! उनका वचन सुनकर भक्तवत्सल श्रीबलराम गङ्गा - यमुनाके बीचमें बसी कौशाम्बीनगरीको गये । बलरामजीको युद्धके लिये आया हुआ सुनकर प्रचण्ड - पराक्रमी कोल भी दस अक्षौहिणी सेनासे सुसज्जित हो कौशाम्बीसे बाहर निकला । प्रलय कालके समुद्रकी भाँति गर्जना करनेवाली वह सेना एक नदीके समान आयी । चञ्चल घोड़े उसकी उठती हुई तरङ्गमाला थे । रथ और हाथी आदि उसमें तिमिङ्गिल ( मगर - मत्स्य ) के समान प्रतीत होते थे । वीर योद्धारूपी भँवर उठ रहे थे । उसे देखकर बलरामजीने हलका सेतु बाँध दिया और हलाग्रभागसे उस सेनाको खींच - खींचकर मुसलके सुदृढ़ प्रहार मारना आरम्भ किया । उनके प्रहारसे एक साथ ही पैदल वीर, घोड़े, रथ और हाथी रणभूमिमें फलोंकी भाँति पिस उठे और करोड़ोंकी संख्यामें सब ओर धराशायी हो गये । शेष योद्धा भयसे पीड़ित हो युद्ध-मण्डलसे भाग निकले । शस्त्रधारी दैत्य कोल बलरामजीके साथ अकेला ही युद्ध करने लगा ॥१३–१८ ॥ उस दैत्यराजने बलदेवजीकी ओर अपना हाथी बढ़ाया । उस हाथीके कुम्भस्थलपर गोमूत्रमें घोले हुए सिन्दूर और कस्तूरीके द्वारा पत्र- रचना की गयी थी । सोनेकी साँकलसे युक्त कटिबन्ध रत्नखचित था । उसके गण्डस्थलसे मद झर रहा था । उसके चार दाँत थे । घंटेकी ध्वनिसे वह और भीषण प्रतीत होता था । उसका कद ऊँचा था और वह दिग्गजके समान चिग्घाड़ता था । उसके शरीरका रंग प्रलयकालके मेघके समान काला था । कोल तीखा अङ्कुश लेकर
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अध्याय २४ ] बलदेवजीके द्वारा कोल दैत्यका वध; उनकी गङ्गातटवर्ती तीर्थोंमें यात्रा २३७ उसके कानकी ओरसे उस हाथीपर चढ़ गया था । कोलके द्वारा प्रेरित उस मतवाले हाथीको अपनी ओर आता देख बलदेवजीने उसके ऊपर मुसलसे उसी प्रकार प्रहार किया, जैसे इन्द्रने वज्रसे किसी पर्वतपर आघात किया हो । मिथिलेश्वर! मुसलकी मारसे उस महान् गजराजका मस्तक उसी प्रकार छिन्न - भिन्न हो गया, जैसे डंडेकी मारसे कोई मिट्टीका घड़ा टूक - टूक हो गया हो ॥ १ ९ –२३ ॥ कोलका मुँह सूअरके समान था । लाल नेत्रोंवाला वह दैत्य हाथीसे गिर पड़ा । उसने महात्मा माधव -बलदेवके ऊपर तीखा शूल चलाया । विदेहराज! तब बलरामने मुसलसे मारकर उसके शूलके उसी प्रकार सैकड़ों टुकड़े कर दिये, जैसे किसी बालकने लाठीके प्रहारसे काँचके बर्तन तोड़ डाले हों । तब उस दुष्टने सहस्र भार ( लगभग ३००० मन ) लोहेकी बनी हुई एक भारी गदा हाथमें लेकर बलरामजीकी छातीपर चोट की और वह मेघके समान गर्ज उठा । उस गदाके प्रहारको सहकर महाबली बलदेवने काजलके समान काले शरीरवाले कोलके मस्तकपर मुसलसे प्रहार किया । मुसलके प्रहारसे उसका सिर फट गया और वह रणभूमिमें गिर पड़ा; तो भी उठकर बलदेवजीको मुक्के से भारी चोट पहुँचाकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया । फिर उस मायावी दैत्यने अत्यन्त भयंकर दैत्य-सम्बन्धिनी माया प्रकट की । तुरंत ही बड़ी भारी आँधीसे प्रेरित प्रलय- कालके मेघोंसे, जो अन्धकार फैला रहे थे, आकाश आच्छादित हो गया । जपाके पुष्पोंके समान रक्तके बिन्दुओंकी निरन्तर वर्षा होने गी । उसके बाद घनीभूत काले मेघोंने घृणित वस्तुओंकी वर्षा प्रारम्भ की । पीब, मेद, विष्ठा, मूत्र, मदिरा और मांससे युक्त अमेध्य जलकी वर्षा होने लगी । उस वृष्टिसे सब ओर हाहाकार होने लगा । दैत्यद्वारा रची गयी मायाको जानकर महाप्रभु बलदेवने शत्रुसेनाको विदीर्ण करनेवाले विशाल मुसलको चलाया । वह समस्त अस्त्रोंका घातक, स्वच्छ और सुदृढ़ अस्त्र अष्टधातुओंका बना हुआ था । उसकी लंबाई सौ योजनकी थी तथा वह प्रलयाग्रिके समान प्रज्वलित हो रहा था । बलदेवजीका अस्त्र मुसल दसों दिशाओंमें घूमता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था । उसने आकाशके बादलोंको उसी प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे सूर्य कुहरेको मिटा देता है । उस मुसलको आकाशमें गया हुआ देख भगवान् बलभद्रने स्वतः ' हल ' नामक अस्त्र उठाया और अपने वैभवसे सबको खींच - खींचकर बलपूर्वक बीचमें ही विदीर्ण कर दिया ॥ २४-३६ ॥ उस दैत्यकी मायाका नाश हो जानेपर महाबली बलदेवने अपने बाहुदण्डोंसे उसके मदोत्कट भुजदण्ड पकड़ लिये और जैसे बालक रुईकी राशिको घुमाये, उसी प्रकार इधर - उधर घुमाते हुए उसे पृथ्वी पर इस प्रकार दे मारा, मानो किसी बालकने कमण्डलु पटक दिया हो । उस दैत्यके पतनसे पर्वत, समुद्र और वनके साथ सारा भूमण्डल एक नाड़ी ( घड़ी ) - तक काँपता रहा । दैत्यके दाँत टूट गये, नेत्र बाहर निकल आये और वह मूच्छित होकर मृत्युका ग्रास बन गया । इस प्रकार महादैत्य कोल वज्रके मारे हुए वृत्रासुरकी भाँति प्राणशून्य हो गया । उस समय स्वर्गमें और धरतीपर जय - जयकार होने लगा । देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और वे फूलोंकी वर्षा करने लगे । इस प्रकार कोलका वध करके श्रीकृष्णके बड़े भाई बलदेवने कौशाम्बीपुरी राजा कौशारविको दे दी और स्वयं गर्गाचार्य आदिके साथ वे भागीरथीमें स्नान करनेके लिये गये । उनका यह कार्य समस्त दोषोंके निवारण एवं लोकसंग्रहके लिये था ॥ ३७–४३ ॥ गर्ग आदि ब्राह्मण - आचार्योंने मङ्गलमय वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए माधव - बलरामको गङ्गामें स्नान करवाया । विदेहराज! बलरामजी ब्राह्मणोंको एक लाख हाथी, दो लाख रथ, एक करोड़ घोड़े, दस अरब दुधारू गायें, सौ अरब रत्न और जाम्बूनद सुवर्णके भार दानमें देकर मथुरापुरीको चले गये । मिथिलेश्वर! बलरामने गङ्गाजीमें जहाँ स्नान किया, उस महापुण्यमय तीर्थको विद्वान्लोग ' रामतीर्थ ' के नामसे जानते हैं । जो मनुष्य कार्तिकी पूर्णिमा एवं कार्तिकमासमें रामतीर्थकी गङ्गामें स्नान करता है, वह हरिद्वारकी अपेक्षा सौगुने पुण्यका भागी होता है ॥ ४४ - ४८ ॥
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२३८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड बहुलाश्वने पूछा— महामुने! कौशाम्बीसे कितनी दूर और किस स्थानपर महापुण्यमय ' रामतीर्थ ' विद्यमान है, यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ९ ॥ नारदजीने कहा- राजन्! राजेन्द्र! कौशाम्बीसे ईशानकोणमें चार योजनकी दूरीपर और वायव्यकोणमें शूकरक्षेत्रसे चार योजनकी दूरीपर, कर्णक्षेत्रसे छः कोस और नलक्षेत्रसे पाँच कोस आग्नेय दिशामें रामतीर्थकी स्थिति बताते हैं । वृद्धकेशी सिद्धपीठसे और बिल्वकेश - वनसे पूर्व दिशामें तीन कोसकी दूरीपर विद्वानोंने रामतीर्थकी स्थिति मानी है ॥ ५०–५२ ॥ वङ्गदेशमें दृढ़ाश्व नामक एक राजा थे । वे लोमश मुनिको कुरूप देखकर सदा उनकी हँसी उड़ाया करते थे । इससे उस महामुनिने उन्हें शाप दे दिया- ' ओ महादुष्ट! तू विकराल शूकरमुख असुर हो जा । ' इस प्रकार मुनिके शापसे राजा कोल नामक क्रोडमुख असुर हो गया । फिर बलदेवजीके प्रहारसे आसुर -शरीरको छोड़कर महादैत्य कोलने परम मोक्ष प्राप्त कर लिया । तब बलराम उद्धव आदि तीन मन्त्रियोंके साथ वहाँसे तत्काल ' जह्नुतीर्थ ' को चले गये, जहाँ जहुके दाहिने कानसे गङ्गाजीका प्रादुर्भाव हुआ था । उस ब्राह्मण - शिरोमणि जह्रुके नामपर ही गङ्गाको ' जाह्नवी ' कहा जाता है । वहाँ ब्राह्मणोंको दान दे रातभर सब लोग वहीं रहे । तदनन्तर वहाँसे पश्चिम भागमें पाण्डवोंका अत्यन्त प्रिय ' आहारस्थान ' नामक स्थान है, जहाँ पहुँचकर उन लोगोंने रात्रिमें निवास किया । वहाँ ब्राह्मणोंको दान तथा उत्तम गुणकारक भोजन देकर वे वहाँसे एक योजन दूर माण्डूकदेवके पास गये ॥ ५३–५९ ॥ माण्डूकदेवने अनन्तदेवकी कृपा प्राप्त करनेके लिये बड़ी भारी तपस्या की थी । उसीके लिये अपने समाजके साथ बलदेवजी वहाँ गये । वह मुँह ऊपर किये एक पैरके बलपर खड़ा था । उसके नेत्र ध्यानमें निश्चल थे । वह हृदयमें बलदेवजीके स्वरूपका दर्शन करते हुए उन्होंके साक्षात् दर्शनके लिये लोलुप था । बलदेवजीने उसके हृदयसे अपने उस स्वरूपको हटा लिया । तब उसने नेत्र खोलकर अपने आराध्यदेवको बाहर देखा । अनन्तदेवके उस परम सुन्दर रूपको उसने देखा । वे वनमालासे सुशोभित थे और एक कानमें कुण्डल धारण किये हुए थे । उनकी अङ्ग-कान्ति गौर थी तथा वे तालचिह्नसे अङ्कित ध्वजावाले रथपर बैठे थे । अनन्तदेवके उस परम सुन्दर रूपको देखकर उसने बड़ी भक्तिसे उनकी स्तुति की । फिर वह अपने आराध्यके चरणोंमें गिर पड़ा । बलदेवजीने उसके मस्तकपर हाथ रखा और कहा - ' वर माँगो । ' तब वह बोला- ' स्वामिन्! यदि आप साक्षात् भगवान् मुझपर प्रसन्न हैं, अथवा यदि मैं आपके अनुग्रहका पात्र हूँ, तो शुकदेवजीके मुखसे निकली हुई उस सर्वोत्तम भागवतसंहिताको मुझे दीजिये, जो समस्त कलिदोषोंका विनाश करनेवाली एवं श्रेष्ठ है ' ॥ ६०–६५ ॥ बलदेवजीने कहा - अनघ! तुम्हें उद्धवजीके द्वारा श्रीमद्भागवतसंहिताकी प्राप्ति होगी, जिसका कीर्तन कलियुगमें सर्वाधिक महत्त्व रखनेवाला है ॥६६ ॥
माण्डूकने पूछा- स्वामिन्! भगवान् ने उद्धव-जीको भागवतसंहिता सुनानेका मुख्य अधिकार क्यों दिया है? और उनके साथ मेरा संयोग कब होगा? आप इस मेरे संदेहका निवारण कीजिये ॥ ६७ ॥
बलदेवजी बोले- मैं परम गोपनीय एवं परम अद्भुत रहस्यकी बात बताता हूँ । आज भी मेरे निकट ये उद्धवजी विराजते हैं । तुम इनका दर्शन कर लो । यह उत्तम दर्शन तुम्हें परमार्थ प्रदान करनेवाला है; परंतु आज तीर्थयात्राके अवसरपर तुम्हें इनका उपदेश नहीं प्राप्त हो सकता । जिस प्रकार ये भागवतके उपदेशक होंगे, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ । मैंने उद्भवको श्रीमान् आचार्यके पदपर इसलिये स्थापित किया है कि ये संहिताज्ञानस्वरूप हैं । नन्द आदि व्रजवासियों तथा गोपाङ्गनाओंकी प्रीतिके लिये भगवान् श्रीकृष्णने उद्धवको अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा था । अपना स्वरूप, परिकरका पद और जो कुछ भी पूर्ण भगवत्ता है, वह सब, अपने स्वभाव और गुणके साथ परमात्मा श्रीकृष्णने उद्धवको अर्पित की है । उन्होंने उद्धवको और अपनेको एक ही मानकर आचरण किया है । श्रीकृष्णने अपना आन्तरिक रहस्य पहिले उद्धवके
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अध्याय २४ ] बलदेवजीके द्वारा कोल दैत्यका वध; उनकी गङ्गातटवर्ती तीर्थोंमें यात्रा २३ ९ सिवा और किसीपर नहीं प्रकट किया था । उन्होंने इनमें अपनी अभिन्नताका साक्षात्कार किया है । व्रजवासियोंने इन्हें साक्षात् श्रीकृष्ण ही जानकर बड़े आदरसे इनका पूजन किया था । वसन्त और ग्रीष्म, दोनों ऋतुओंमें इन्होंने व्रजभूमिमें विचरण किया और श्रीराधा तथा राधाकुण्डके आस - पासके लोगोंका शोक शान्त किया । उद्धव व्रजवासी अनुगामियोंके साथ वहाँकी भूमिमें यत्र - तत्र सर्वत्र विचरे हैं । इन्हें गौओं तथा नन्द आदि गोपों और गोपाङ्गनाओंका ' वियोगार्तिहारी ' कहा गया है । ये मन्त्रीके अधिकारमें कुशल तथा समस्त पार्षदोंके अग्रगामी हैं । जब भगवान्के अन्तर्धानकी वेला आयेगी, उस समय धर्मपालक - देहधारी भगवान् उद्धवको अपना परम अद्भुत तेज भी दे देंगे । इनका मुद्राधिकार ( भगवान्की ओरसे कुछ भी कहने और उनकी मुद्रिका या मोहरकी छाप लगाकर कोई आदेश जारी करनेका अधिकार ) तो सर्वत्र और सदा ही विराजता है । अन्तर्धानकालमें इन्हें भगवान्की ओरसे विशेष अधिकार दिया जायगा । ये बदरिकाश्रम - तीर्थमें विराजमान परिकरोंसहित धर्म -नन्दनको भगवद्रहस्यका बोध करायेंगे । अर्जुन आदिको भगवान्के वियोगसे जो बड़ी भारी पीड़ा होगी, उसका निवारण उद्धव ही करेंगे । मथुरामें यादवका उत्तराधिकारी वज्रनाभ होगा । श्रीकृष्णके पौत्रों तथा महारानियोंके समुदायमें जो भगवद्वियोग-की वेदना होगी, उसे दूर करने के लिये साक्षात् श्रीहरिके द्वारा उद्धव ही नियुक्त किये जायँगे ॥ ६८ - ८० ॥ कौरवोंके कुलमें परीक्षित् नामसे विख्यात राजा होगा । उसका अत्यन्त तेजस्वी पुत्र जनमेजय नामसे प्रसिद्ध होगा । वह अपने पिताके शत्रु तक्षक नागके कुलका नाशक सर्पयज्ञ करेगा, इसमें संशय नहीं है । उसको भी सारी यज्ञसामग्री उद्धवके द्वारा ही प्राप्त होगी । उस समय दिव्य श्रीमद्भागवतपुराणकी कथा होगी, जिसमें उज्ज्वल ( सात्त्विक ) प्रकृतिके लोग समवेत होंगे, इसमें संशय नहीं है । महान् भगवद्भक्तों-में उत्तम ब्रह्मर्षि ( आस्तीक ) के प्रसादसे जनमेजय-द्वारा होनेवाले सर्पयज्ञकी समाप्ति हो जायगी । महाराज जनमेजय यज्ञ - संस्कार करानेवाले ब्राह्मणोंका पूजन करके उन्हें सौ ग्राम अग्रहारके रूपमें देंगे ॥ ८१ - ८५ ॥ तदनन्तर आचार्यप्रवर श्रीप्रसादजीकी आज्ञासे राजा जनमेजय शूकरक्षेत्र ( सोरों ) में जायँगे और वहाँ एक मास ठहरेंगे । उस तीर्थमें अनेक प्रकारके दान— गौ, बड़े - बड़े हाथी, घोड़े, रत्न, वस्त्र तथा इच्छानुसार भोजन - ब्राह्मणोंको देकर वे अपने आचार्यके साथ उस स्थानसे लौटकर गङ्गातटके तीर्थस्थानोंका दर्शन करते हुए सत्पुरुषोंसे घिरे शयाननगरमें आकर सेवकोंसहित डेरा डालेंगे । वहाँ श्रीगुरुकी आज्ञासे सामग्री और साधन जुटाकर अश्वमेध यज्ञ करेंगे और सर्वजेता ( दिग्विजयी ) होंगे । इस प्रकार एकच्छत्र राज्यके स्वामी होकर श्रीगुरुदेवकी शरण ले शयान-नगरसे पूर्व दिशामें रमणीय गङ्गाके तटपर अत्यन्त एकान्तवासीके रूपमें तीर्थ सेवन करेंगे । वहाँ धार्मिकोंके समाजमें बड़े आनन्दके साथ भवरोग-विनाशिनी भागवत कथा होगी । उस पूर्ण समाजमें एक तुम भी रहोगे और भागवतकी कथा सुनोगे । उसे सुनकर तुम्हें निर्मल पदकी प्राप्ति होगी । तुमने मेरे लिये तपस्या की है, इसलिये तुम्हारे सामने मैंने इस रहस्यको प्रकाशित किया है । इस प्रकार माण्डूक-देवको वर देकर सेवकोंसहित बलरामजी वहाँसे चले गये ॥ ८६ – ९ ४ ॥ शुद्ध शयाननगरसे ईशानकोणमें गङ्गातटपर स्थित एक रमणीय स्थान है, जो कण्टकतीर्थसे उत्तर है और पुष्पवती नदीसे दक्षिण दिशामें विद्यमान है । उसका विस्तार एक कोसमें है । वहीं ठहरकर संकर्षणदेव दान-पुण्यमें लग गये । बलरामजीने बड़ी प्रसन्नता साथ वहाँ दस हजार घोड़ों, सौ रथों, एक हजार हाथियों और दस हजार गौओंका दान किया । वहाँ समस्त देवता तथा तपस्याके धनी ऋषि - मुनि आये । उन सबने बड़े आदरसे संकर्षणदेवका पूजन किया । फिर इस प्रकार स्तुति की - ' प्रभो! आप कोलेश दैत्यके हन्ता तथा गर्दभासुर ( धेनुक ) - का विनाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है । हलायुध! आपको प्रणाम है । मुसलास्त्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । सौन्दर्यस्वरूप आपको प्रणाम है । तालचिह्नित ध्वजा धारण करनेवाले आपको
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२४० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड बारंबार नमस्कार है । * उन सबके द्वारा की गयी इस स्तुतिको सुनकर संकर्षण बोले — ' आप सब लोगोंको जो अभीष्ट हो, वह वर मुझसे माँगिये ' ॥ ९ ५ - १०० ॥ ब्रह्मर्षि और देवता बोले- भगवन्! जब -जब आपत्तिमें पड़कर हम आपके चरणोंका चिन्तन करें, तब - तब आपकी आज्ञासे समस्त बाधाओंसे मुक्त हो जायँ ॥१०१ ॥
बलरामने कहा- जब - जब आपलोग मेरी शरणमें आकर मेरा स्मरण करेंगे, तब - तब कलियुगमें निश्चय ही मैं आपलोगोंकी रक्षा करूँगा, यह मेरा सत्य वचन है । इस स्थानपर मुनिपुंगवोंने मेरा पूजन करके वर प्राप्त किया, इसलिये कलियुगमें यह तीर्थ ' संकर्षणस्थान ' के नामसे विख्यात होगा । जो लोग इस तीर्थमें गङ्गा - स्नान और देवताओंका पूजन करेंगे, ब्राह्मणोंको दान देंगे, उन्हें भोजन करायेंगे और विष्णुभगवान्की पूजा करेंगे, इस भूतलपर उनका जीवन सफल होगा । वे देवताओंके लोकमें जायँगे । अथवा यदि उनके मनमें कोई अभीष्ट होगा तो उस अभीष्टको ही प्राप्त कर लेंगे ॥ १०२ -१०५ ॥ तदनन्तर बलराम सबके साथ अपनी पुरी मथुराको चले गये । कोल राक्षसका वध और गङ्गाके जलमें स्नान करके उन्होंने लोकसंग्रहके लिये प्रायश्चित्त किया था । जो मनुष्य बलके देवता बलरामकी इस कथाको सुनेंगे, वे सब पापोंसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त होंगे ॥ १०६-१०७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कोलदैत्यका वध ' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
पचीसवाँ मथुरापुरीका माहात्म्य एवं बहुलाश्वने पूछा – मुने! जहाँ बलरामजी अकस्मात् पहुँच गये, वहाँ ऐसा उत्तम तीर्थ सुना गया । अहो! मथुरापुरी धन्य है, जहाँ वे नित्य निवास करते हैं । मथुराका देवता कौन है? क्षत्ता ( द्वारपाल ) कौन है? उसकी रक्षा कौन करता है? चार कौन है? मन्त्रिप्रवर कौन है? और किन - किन लोगोंके द्वारा वहाँकी भूमिका सेवन किया गया है? ॥ १-२ ॥ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण हरि स्वयं ही मथुराके स्वामी या देवता हैं । भगवान् केशवदेव वहाँके क्लेशनाशक हैं । साक्षात् भगवान्ने कपिल नामक ब्राह्मणको अपनी वाराहमूर्ति प्रदान की थी । कपिलने प्रसन्न होकर वह मूर्तिदेवराज इन्द्रको दे दी । फिर समस्त लोकोंको रुलानेवाला राक्षसराज रावण देवताओंको जीतकर * नमः कोलेशघाताय खरासुरविघातिने । नमः सौन्दर्यरूपाय अध्याय मथुराखण्डका उपसंहार उस मूर्तिका स्तवन करके उसे पुष्पकविमानपर रखकर लङ्कामें ले आया और उसकी पूजा करने लगा । मिथिलेश्वर! तदनन्तर राघवेन्द्र श्रीराम लङ्कापर विजय प्राप्त करके भगवान् वाराहको प्रयत्नपूर्वक अयोध्या-पुरीमें ले आये और वहाँ उनकी अर्चना करते रहे । तत्पश्चात् शत्रुघ्र श्रीरामकी स्तुति करके उनकी आज्ञासे उस वाराह - विग्रहको प्रयत्नपूर्वक महापुरी मथुरामें ले आये और वहाँ वाराहभगवान् की स्थापना करके उनको प्रणाम किया । फिर समस्त मथुरावासियोंने उन वरदायक भगवान्की सेवा - पूजा प्रारम्भ की । वे ही ये साक्षात् कपिल- वाराह मथुरापुरीमें श्रेष्ठ मन्त्री माने गये हैं । ' भूतेश्वर ' नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव मथुरा द्वारपाल या क्षेत्रपाल हैं । वे पापियोंको दण्ड देकर भक्तिके लिये उन्हें मन्त्रोपदेश करते हैं । महाविद्या-हलायुध नमस्तेऽस्तु मुसलास्त्राय ते नमः ॥ तालाङ्काय नमो नमः ॥ ( गर्ग ०, मथुरा ० २४ । ९९ )
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अध्याय २५ ] मथुरापुरीका माहात्म्य एवं स्वरूपा दुर्गम कष्ट दूर करनेवाली चण्डिकादेवी दुर्गा सिंहपर आरूढ़ हो सदा मथुरापुरीकी रक्षा करती हैं । मैं ( नारद ) ही मथुराका चार ( गुप्तचर ) हूँ और इधर-उधर लोगोंपर दृष्टि रखकर सबकी बात महात्मा श्रीकृष्णको बताता हूँ । विदेहराज! नगरके मध्य-भागमें स्थित शुभदायिनी करुणामयी मथुरादेवी समस्त भूखे लोगोंको अन्न प्रदान करती हैं । मथुरामें मरे हुए लोगोंको विमानोंद्वारा ले जानेके लिये श्याम अङ्गवाले, चार भुजाधारी श्रीकृष्णपार्षद आते - जाते रहते हैं ॥ ३ – १३ ॥ महापुरी मथुरा, जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है, श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई है । पूर्व -कालमें ब्रह्माजीने मथुरामें आकर निराहार रहते हुए सौ दिव्य वर्षोंतक तपस्या की । उस समय वे परब्रह्म श्रीहरिके नामका जप करते थे, इससे उन्हें स्वायम्भुव -मनु - जैसे प्रवीण पुत्रकी प्राप्ति हुई । नृपराज! सतीपति देववर भूतेश मधुवनमें एक सौ दिव्य वर्षतक तप करके श्रीकृष्णकी कृपासे तत्काल मथुरापुरी और माथुर - मण्डलके क्षेत्रपाल हो गये । श्रीकृष्णके कृपा-प्रसादसे ही मैं मथुरा - मण्डलका चार बना हूँ और सदा भ्रमण करता रहता हूँ । इसी प्रकार ' दुर्गा ' मथुरामें जाती हैं और निश्चय ही श्रीकृष्णकी सेवा करती हैं । इन्द्रने मथुरामें तप करके इन्द्रपद, सूर्यने तप करके वैवस्वत मनु - जैसा पुत्र, कुबेरने अक्षयनिधि, वरुणने पाश और ध्रुवने मधुवनमें तप करके सम्यक् ध्रुवपद प्राप्त किया था । यहीं तपस्या करके अम्बरीषने मोक्ष पाया, रामने अक्षय शक्ति एवं लवणासुरसे विजय प्राप्त की । राजा रघुने सिद्धि पायी तथा इसी मधुवनमें तप करके चित्रकेतुने भी अभीष्ट फल प्राप्त किया । यहींके सुन्दर मधुवनमें तप करके अत्यन्त बलिष्ठ हुए महासुर मधु माधवमासमें मधुसूदन माधवके साथ युद्ध -भूमिमें जाकर युद्ध किया । सप्तर्षियोंने मथुरामें आकर यहीं तपस्या करके योगसिद्धि प्राप्त की । पूर्वकालमें अन्य ऋषियोंने भी यहाँ तप करके सर्वतोमुखी सफलता पायी थी और गोकर्ण नामक वैश्यने भी यहाँ तप करके महानिधि उपलब्ध की थी । इसी शुभ मधुवनमें लोकरावण रावणने तपस्या करके स्वर्गके मथुराखण्डका उपसंहार २४१ देवताओंपर विजय पायी तथा राक्षसोंको अधिकारी बनाकर मन्दिर निर्माण करके लङ्कामें प्रतिष्ठित हो बड़ी शोभा प्राप्त की । मिथिलेश्वर! यहीं सुन्दर मधुवनमें तपस्या करके हस्तिनापुरके राजा शंतनुने अत्यन्त साधु-शिरोमणि तथा तत्त्वार्थसागरके कर्णधार भीष्मको पुत्र-रूपमें प्राप्त किया॥१४–२३ ॥ बहुलाश्वने पूछा— देवर्षि - शिरोमणे – मथुराका माहात्म्य बताइये । वहाँ निवास करनेवाले सज्जनोंको किस फलकी प्राप्ति बतायी गयी है? ॥२४ ॥
श्रीनारदजीने कहा- राजन्! आदियुगमें भगवान् वराहने महासागरके जलमें, जहाँ बड़ी ऊँची लहरें उठ रही थीं, डूबी हुई पृथ्वीको, जैसे हाथी सूँड़से कमलको उठा ले, उसी प्रकार स्वयं अपनी दाढ़से उठाकर जब जलके ऊपर स्थापित किया, तब मथुराके माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया था । यदि मनुष्य ' मथुरा ' का नाम ले ले तो उसे भगवन्नामोच्चारणका फल मिलता है । यदि वह मथुराका नाम सुन ले तो श्रीकृष्णके कथा - श्रवणका फल पाता है । मथुराका स्पर्श प्राप्त करके मनुष्य साधु - संतोंके स्पर्शका फल पाता है । मथुरामें रहकर किसी भी गन्धको ग्रहण करनेवाला मानव भगवच्चरणोंपर चढ़ी हुई तुलसीके पत्रकी सुगन्ध लेनेका फल प्राप्त करता है । मथुराका दर्शन करनेवाला मानव श्रीहरिके दर्शनका फल पाता है । स्वतः किया हुआ आहार भी यहाँ भगवान् लक्ष्मीपतिके नैवेद्य - प्रसादभक्षणका फल देता है । दोनों बाँहोंसे वहाँ कोई भी कार्य करके श्रीहरिकी सेवा करनेका फल पाता है और वहाँ घूमने - फिरनेवाला भी पग-पगपर तीर्थयात्राके फलका भागी होता है ॥ २५-२७ ॥ राजन्! सुनो । जो राजाधिराजोंका हनन करनेवाला, अपने सगोत्रका घातक तथा तीनों लोकोंको नष्ट करनेके लिये प्रयत्नशील होता है, ऐसा महापापी भी मथुरामें निवास करनेसे योगीश्वरोंकी गतिको प्राप्त होता है । उन पैरोंको धिक्कार है, जो कभी मधुवनमें नहीं गये । उन नेत्रोंको धिक्कार है, जो कभी मथुराका दर्शन नहीं कर सके । मिथिलेश्वर! उन कानोंको धिक्कार है, जो मथुराका नाम नहीं सुन पाते और उस वाणीको भी
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२४२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीमथुराखण्ड धिक्कार है, जो कभी थोड़ा - सा भी मथुराका नाम नहीं ले सकी । विदेहराज! मथुरामें चौदह करोड़ वन हैं, जहाँ तीर्थोका निवास है । इन तीर्थोंमेंसे प्रत्येक मोक्षदायक है । मैं मथुराका नामोच्चारण करता हूँ और साक्षात् मथुराको प्रणाम करता हूँ । जिसमें असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति परिपूर्णतम देवता गोलोकनाथ साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रने स्वयं अवतार लिया, उस मथुरापुरीको नमस्कार है । दूसरी पुरियोंमें क्या रखा है? जिस मथुराका नाम तत्काल पापका नाश कर देता है, जिसके नामोच्चारण करनेवालेको सब प्रकारकी मुक्तियाँ सुलभ हैं तथा जिसकी गली -गली में मुक्ति मिलती है, उस मथुराको इन्हीं विशेषताओंके कारण विद्वान् पुरुष श्रेष्ठतम मानते हैं । यद्यपि संसारमें काशी आदि पुरियाँ भी मोक्षदायिनी हैं, तथापि उन सबमें मथुरा ही धन्य है, जो जन्म, मौञ्जीव्रत, मृत्यु और दाह - संस्कारोंद्वारा मनुष्योंको चार प्रकारकी मुक्ति प्रदान करती है । जो सब पुरियोंकी ईश्वरी, व्रजेश्वरी, तीर्थेश्वरी, यज्ञ तथा तपकी निधीश्वरी, मोक्षदायिनी तथा परम धर्म - धुरंधरा है, मधुवनमें उस श्रीकृष्णपुरी मथुराको मैं नमस्कार करता हूँ । वैदेहराजेन्द्र! जो लोग एकमात्र भगवान् श्रीकृष्णमें चित्त लगाकर संयम और नियमपूर्वक जहाँ - कहीं भी रहते हुए मधुपुरीके इस माहात्म्यको सुनते हैं, वे मथुराकी परिक्रमाके फलको प्राप्त करते हैं- इसमें संशय नहीं है ॥ २८–३५ ॥ विदेहराज! जो लोग इस मथुराखण्डको सब ओर सुनते, गाते और पढ़ते हैं, उनको यहीं सब प्रकारकी समृद्धि और सिद्धियाँ सदा स्वभावसे ही प्राप्त होती रहती हैं । जो बहुत वैभवकी इच्छा करनेवाले लोग नियमपूर्वक रहकर इस मथुराखण्डका इक्कीस बार श्रवण करते हैं, उनके घर और द्वारको हाथीके कर्णतालोंसे प्रताड़ित भ्रमरावली अलंकृत करती है । इसको पढ़ने और सुननेवाला ब्राह्मण विद्वान् होता है, राजकुमार युद्धमें विजयी होता है, वैश्य निधियोंका स्वामी होता है तथा शूद्र भी शुद्ध - निर्मल हो जाता है । स्त्रियाँ हों या पुरुष - इसे निकटसे सुननेवालोंके अत्यन्त दुर्लभ मनोरथ भी पूर्ण हो जाते हैं । जो बिना किसी कामनाके भगवान्में मन लगाकर इस भूतलपर भक्ति - भावसे इस मथुरा - माहात्म्य अथवा मथुरा-खण्डको सुनता है, वह विघ्नोंपर विजय पाकर, स्वर्गलोकके अधिपतियोंको लाँघकर सीधे गोलोक -धाममें चला जाता है ॥ ३६- ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीमथुराखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीमथुरामाहात्म्य ' नामक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
॥ श्रीमथुराखण्ड सम्पूर्ण ॥
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ द्वारकाखण्ड पहला अध्याय जरासंधका विशाल सेनाके साथ मथुरापर आक्रमण; श्रीकृष्ण और बलरामद्वारा उसकी सेनाका संहार; मगधराजकी मथुरामें विजयी
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥ १ ॥
जो वसुदेवके पुत्र और देवकीनन्दन होनेके साथ ही नन्दगोपके भी कुमार हैं, उन गोविन्दको बारंबार नमस्कार है ॥ बहुलाश्वने पूछा — ब्रह्मन्! अद्भुत मथुराखण्डकी कथा सुनी । चरितामृतसे पूर्ण द्वारकाखण्ड वल्लभ श्रीकृष्णके कितने विवाह, कितने पौत्र हुए? महामते! उनके सच्चिदानन्दस्वरूप १ ॥ मैंने आपके मुखसे अब मुझे श्रीकृष्ण-सुनाइये । श्रीरमा -कितने पुत्र और मथुराको छोड़कर द्वारकामें निवास करनेका क्या कारण है? ये सब बातें बताइये ॥ २-३ ॥ श्रीनारदजीने कहा - मैथिलेश्वर! महाबली कंसके मारे जानेपर उसकी दो रानियाँ - अस्ति और प्राप्ति बड़े दुःखसे जरासंधके घर गयीं । उनके मुखसे कंसके मरणका वृत्तान्त सुनकर जरापुत्र महाबली जरासंध अत्यन्त कुपित हो इस भूतलको यदुवंशियोंसे शून्य कर देनेके लिये उद्यत हो गया । राजन्! उस बलवान् नरेशने तेईस अक्षौहिणी सेना साथ लेकर मथुरापुरीपर धावा बोल दिया । महासागरके समान गर्जना करनेवाली उसकी सेना और भयसे व्याकुल हुई अपनी नगरीको देखकर साक्षात् भगवान्ने सभामें बलदेवजीसे कहा ॥ ४–७ ॥ ' भैया बलरामजी! इस मगधराज जरासंधकी सारी सेनाको तो निस्संदेह नष्ट कर देना चाहिये, किंतु इस मगधनरेशको तो नहीं मारना चाहिये, जिससे यह पुनः सेना जुटाकर ले आनेका उद्योग करे । जरासंधको ही पराजय तथा श्रीकृष्ण - बलरामका होकर लौटना निमित्त बनाकर पृथ्वीके राजाओंके रूपमें स्थित पृथ्वीसे सारे भारको यहीं रहकर हर लूँगा और साधु पुरुषोंका प्रिय करूँगा ॥ ८- ९ ॥ राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि वैकुण्ठसे सबके देखते - देखते दो सुन्दर रथ उतर आये । उन रथोंपर तत्काल आरूढ़ हो महाबली बलराम और श्रीकृष्ण यदुवंशियोंकी थोड़ी - सी सेना साथ लेकर तुरंत ही नगरसे बाहर निकले । आकाशमें देवताओंके देखते - देखते भूतलपर यादवों और मागधोंमें अद्भुत रोमाञ्चकारी एवं तुमुल युद्ध होने लगा । पहले महाबली मगधराज रथपर आरूढ़ हो दस अक्षौहिणी सेनाके साथ भगवान् श्रीकृष्णके सामने आकर लड़ने लगा । धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जरासंधकी सहायताके लिये पाँच अक्षौहिणी सेनाके साथ आकर यादवोंके साथ युद्ध करने लगा । राजन्! विन्ध्यदेशका बलवान् राजा पाँच अक्षौहिणी सेनाके साथ तथा वङ्गदेशका महाबली नरेश तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ उस महायुद्धमें जरासंधकी ओरसे सम्मिलित हुआ । मिथिलेश्वर! इसी तरह दूसरे राजा भी जो जरासंधके वशवर्ती थे, प्राणपनसे उसकी सहायता कर रहे थे ॥ १०–१६ ॥ शत्रुसेनासे व्याप्त आकाशमें बाणोंका अन्धकार फैल जानेपर र्शाङ्गधन्वा श्रीकृष्णने अपने र्शाङ्गधनुषकी टंकार- ध्वनि प्रारम्भ की । उस टंकारसे सात लोकों और सात पातालोंसहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा, दिग्गज विचलित हो उठे, तारे टूटने लगे और सारा भूखण्डमण्डल काँपने लगा । शत्रुओंका सारा सैन्य-
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२४४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड मण्डल उसी क्षण बहरा - सा हो गया, घोड़े युद्धमण्डल -से उछलकर भागने लगे तथा हाथियोंने भी अपना मुँह फेर लिया । जरासंधकी सारी सेना उस टंकारसे भय -विह्वल हो भाग चली और उलटी दिशामें दो कोस जाकर फिर वहाँ आयी । इस प्रकार विद्युत्की पीली प्रभासे युक्त एवं कान्तिमान् र्शाङ्गधनुषकी टंकार फैलाकर श्रीहरिने अपने बाणसमूहोंकी वर्षासे जरासंधकी सारी सेनाको आच्छादित कर दिया ॥ १७-२१ ॥ राजन्! र्शाङ्गधन्वाके बाणोंसे शत्रुसेनाके रथ चूर-चूर हो गये, पहिये टूक - टूक होकर गिर पड़े तथा रथी और सारथि भी मारे जाकर भूमिपर सदाके लिये सो गये । गजारोहियोंके साथ चलनेवाले हाथी उनके बाणोंसे दो टूक हो गये । सवारोंसहित घोड़े बाणोंद्वारा गर्दन कट जानेसे धराशायी हो गये । इसी प्रकार उस महायुद्धमें वक्षःस्थल और मस्तक छिन्न हो जानेसे पैदल योद्धा धराशायी हो गये । उनके कवचकी धज्जियाँ उड़ गयी थीं । वे निस्संदेह कालके गालमें चले गये । राजन्! जैसे फूटे हुए बर्तन कोई अधोमुख और कोई ऊर्ध्वमुख होकर पड़े दिखायी देते हैं, उसी प्रकार जिनके शरीर कट गये थे, वे राजकुमार उस समराङ्गणमें कोई ऊर्ध्वमुख और कोई अधोमुख होकर पड़े हुए थे । एक ही क्षणमें उस युद्धभूमिमें सौ कोस लंबी खूनकी नदी बह चली, जो अत्यन्त दुर्गम थी । हाथी उसमें ग्राहके समान जान पड़ते थे । ऊँटों और गदहोंके धड़ आदि कच्छपके समान प्रतीत होते थे । रथ शिशुमारों ( सूसों ) का, केश सेवारोंका तथा कटी हुई भुजाएँ सर्पोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं । हाथ मछलियाँ तथा मुकुटोंके रत्न, हार एवं कुण्डल कंकड़ - पत्थर जान पड़ते थे । अस्त्र - शस्त्र सीप, छत्र शङ्ख तथा चामर और ध्वजा बालू प्रतीत होते थे । रथके पहिये भँवरका भ्रम उत्पन्न कर रहे थे और दोनों ओरकी सेनाएँ उस रुधिरसरिताके दोनों तट थीं । इस तरह वह शतयोजन - विस्तृत नदी वैतरणीके समान भयंकर जान पड़ने लगी । प्रमथ, भैरव, भूत, वेताल और योगिनियाँ अट्टहास करती हुई रणभूमिमें नाचने लगीं । नृपेश्वर! वे भूत- वेताल आदि खप्परमें ले-लेकर निरन्तर रक्त पी रहे थे और भगवान् शंकरकी मुण्डमाला बनानेके लिये कटे हुए सिरोंका संग्रह कर रहे थे । सैकड़ों डाकिनियोंसे घिरी हुई भद्रकाली वहाँका गरम - गरम रक्त पीती हुई अट्टहास करने लगी । विद्याधरियाँ, स्वर्गवासिनी गन्धर्वकन्याएँ तथा अप्सराएँ क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर वीरगति पानेवाले देवरूपधारी वीरोंको अपने पतिके रूपमें वरण कर रही थीं । आकाशमें उन वीरोंको पकड़कर पति बनानेके निमित्त वे आपसमें कलह करने लगीं । वे कहतीं— ' ये तो मेरे अनुरूप हैं, अतः मैं ही इनका वरण करूँगी । ' इस प्रकार उनमें आसक्त - चित्त हुई सुरबालाएँ परस्पर विवादपर उतर आयी थीं । कुछ धर्मपरायण वीर समराङ्गणसे तनिक भी विचलित न होनेके कारण मार्तण्ड - मण्डलका भेदन करके सीधे भगवान् विष्णुके दिव्यधाममें चले गये । शेष सेनाको त्रिलोकीका बल धारण करनेवाले बलदेवजी कुपित हो हलसे खींचकर मुसलसे मारने लगे । इस प्रकार जरासंधकी सेनाका सब ओरसे संहार हो जानेपर दुर्योधन, विन्ध्यराज तथा वङ्गनरेश – सब भयभीत हो रणभूमिसे इधर - उधर भाग गये ॥ २२–३७ ॥ राजन्! तब दस हजार हाथियोंके समान बलशाली महापराक्रमी जरासंध रथपर आरूढ़ हो बलदेवजीके सामने आया । यदुश्रेष्ठ बलरामने जरासंधके सुन्दर रथको हलाग्रभागसे खींचकर मुसलकी चोटसे चूर्ण कर डाला । घोड़े और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए जरासंधने सारे शस्त्रसमूहको त्यागकर बलदेवको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया । फिर उन दोनोंमें रणभूमिके भीतर घोर युद्ध होने लगा । मैथिल! आकाशमें खड़े देवताओं तथा भूतलपर विद्यमान मनुष्योंके देखते - देखते वे दोनों महाबली वीर मल्लयुद्धमें दो सिंहोंके समान जूझने लगे । वे छातीसे, मस्तकसे, भुजाओंसे चोट करते हुए पृथक्-पृथक् पैरोंको पकड़कर एक - दूसरेको गिरानेकी चेष्टा करते थे । उन दोनोंके युद्धसे वहाँका सारा भूखण्डमण्डल खुदकर गड्ढेके समान हो गया । राजन्! उस समय भूमि सहसा बटलोईकी तरह दो घड़ीतक काँपती रही । तब यदुश्रेष्ठ बलरामने अपने बाहुदण्डोंसे जरासंधको पकड़कर इस प्रकार पृथ्वीपर दे मारा, मानो किसी