गर्ग संहिता — पृष्ठ 251–260

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

गर्ग संहिता, पृष्ठ 251 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय २ ] मथुरापर जरासंध और कालयवनका आक्रमण २४५ बालकने कमण्डलु पटक दिया हो । बलरामने जरासंधके ऊपर चढ़कर उस शत्रुको मार डालनेके लिये क्रोधसे भरकर घोर मुसल हाथमें लिया । यह देख परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णने उन्हें तत्काल रोक दिया । तब यदुकुल - तिलक बलरामने उसे छोड़ दिया । जरासंधने लज्जित होकर तपस्याके लिये जानेका विचार किया, परंतु अपने मुख्य मन्त्रियोंके मना करनेपर मगधराज तपस्याके लिये न जाकर मगधदेशको ही लौट गया । इस प्रकार मधुसूदन माधवने जरासंधपर विजय पायी ॥ ३८- ४८ ॥ युद्धमें जो कुछ भी धन- वित्त हाथ लगा, वह सब सुखावह वैभव साथ लेकर, यादवोंको आगे करके, बलदेवसहित परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण सूतों, मागधों और वन्दीजनोंके मुखसे विजय - गान सुनते हुए, शङ्खध्वनि, दुन्दुभिनाद तथा वेद - मन्त्रोंके भारी घोषके साथ मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए । मार्गमें माङ्गलिक वस्तुओं, खीलों और फूलोंसे उनकी पूजा होती थी । प्रत्येक द्वारपर मङ्गल - कलशसे सुशोभित पुरीकी शोभा देखते हुए पीताम्बरधारी, श्यामसुन्दर - विग्रह, शुभाङ्ग - शोभित, चमकीले किरीट, अङ्गद और कुण्डलोंसे उद्भासित, र्शाङ्ग आदि अस्त्र - शस्त्रोंको धारण करनेवाले भगवान् गरुडध्वज, तालध्वज बलरामके साथ, मुखसे मन्दहासकी छटा बिखेरते हुए राजा उग्रसेनके पास जा, उन्हें सारी धन - सामग्री भेंट की । उस समय चञ्चल घोडोंसे जुता हुआ उनका रथ उद्दीप्त हो रहा था तथा देवगण उनकी पूजा - प्रशंसा कर रहे थे ॥ ४ ९ -५३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीद्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' जरासंध - पराजय ' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

दूसरा अध्याय मथुरापर जरासंध और कालयवनका आक्रमण; भगवान्‌का युद्ध छोड़कर एक गुफामें जाना और वहाँ गये हुए कालयवनको मुचुकुन्दके दृष्टिपातसे दग्ध कराना; मुचुकुन्दको वर देकर बदरिकाश्रमकी ओर भेजना और स्वयं म्लेच्छ - सेनाका संहार करके जरासंध के सामनेसे भागकर श्रीकृष्ण - बलरामका प्रवर्षणगिरि होते हुए द्वारका पहुँचना और जरासंधका उस पर्वतको जलाकर मगधको लौट जाना नारदजी कहते हैं— राजन्! जरासंध पुनः उतनी ही अक्षौहिणी सेना लेकर शीघ्र ही यादवोंके साथ युद्ध-के लिये आ गया; किंतु श्रीकृष्णसे वह फिर पराजित हो गया । श्रीकृष्णके प्रभावसे समस्त यादव अभ्युदय-को प्राप्त हुए । उन्हें धनुष और हाथी आदिके बलसे सदा शत्रुओंको लूटनेका साहस हो गया ॥ १-२ ॥ राजन्! जब साहस प्राप्त हो गया, तब बालक और पनिहारिनें भी बिना युद्धके ही शत्रुओंकी सम्पत्तिका अपहरण करने लगीं । शत्रुओंके द्रव्यके अपहरणका अवसर देखते हुए मथुराके वस्त्रक्रेता समस्त नागरिक बड़े हर्षको प्राप्त हुए । इस प्रकार सत्रह बार अपनी सेनाका संहार कराकर जरासंध परास्त हुआ । तदनन्तर अठारहवीं बार भी उसने संग्राममें आनेका विचार किया । इसी समय मेरी प्रेरणासे महाबली कालयवनने एक करोड़ म्लेच्छोंकी सेनाको साथ लेकर क्रोधपूर्वक मथुरापर घेरा डाल दिया । म्लेच्छोंकी सेना देखकर, अपने नगरको भयविह्वल जान, दोनों ओरसे आनेवाले भयका विचार करके श्रीकृष्ण बलरामके साथ चिन्तित हो गये ॥३–७ ॥ अपने सजातीय बन्धुओंकी रक्षाके लिये माधवने भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रके भीतर एक ही रात में द्वारका - दुर्गका निर्माण कराया, जहाँ विश्वकर्माने आठों दिक्पालोंकी सिद्धियाँ निर्मित कीं तथा मोक्षकी इच्छा रखनेवाले साधकोंको जहाँ वैकुण्ठकी सारी सम्पत्तिका

पृष्ठ 252

गर्ग संहिता, पृष्ठ 252 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२४६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड दर्शन होता है । मिथिलेश्वर! श्रीहरि योगशक्तिसे समस्त आत्मीयजनों को द्वारकादुर्गमें पहुँचाकर, बलरामजीकी आज्ञा ले मथुरा नगरसे बिना अस्त्र-शस्त्रके ही निकले । मैंने जो पहचान बतायी थी, उसके अनुसार उस दुष्ट कालयवनने श्रीहरिको पहचान लिया और उन्हें बिना अस्त्र - शस्त्रके देखकर स्वयं भी आयुध त्यागकर उनसे युद्ध करनेके लिये पैदल ही आया । वे युद्धसे विमुख होकर भागने लगे । जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, उन्हीं श्रीहरिको पकड़नेके लिये वह अपने सैनिकोंके देखते - देखते उनका पीछा करने लगा ॥ ८ - १२ ॥ माधव अपने शरीरको एक ही हाथ आगे दिखाते हुए भागते - भागते दूर चले गये और शीघ्र ही श्यामलाचलकी कन्दरामें घुस गये । मान्धाताके बड़े पुत्र मुचुकुन्द उस गुहामें शयन करते थे । उन्होंने पूर्वकालमें असुरोंसे देवताओंकी रक्षा की थी । नरेश्वर! उस समय देवसेनाकी रक्षामें तत्पर रहनेके कारण वे दिन - रात सो नहीं पा रहे थे । कार्य सिद्ध हो जानेपर सब देवताओंने प्रसन्न होकर उन नृपश्रेष्ठसे कहा ॥ १३ - १५ ॥ राजन्! तुम्हारे मनमें जो कुछ हो, उसको वरदानके रूपमें माँग लो । ' तब राजेन्द्र मुचुकुन्दने देवताओंको प्रणाम करके उनसे कहा- ' मैं अच्छी तरह सोना चाहता हूँ । सोकर उठनेपर मुझे साक्षात् श्रीहरिका दर्शन हो । जो हतचेतन पुरुष बीचमें मुझे जगा दे, वह मेरी दृष्टि पड़ते ही तत्काल भस्म हो जाय । ' देवताओंने ' तथास्तु ' कहकर उन्हें उनका अभिलषित वर दे दिया । तब राजा मुचुकुन्दने पूर्वकालके सत्ययुगमें शयन किया ॥ १६ - १८ ॥ भगवान्के पीछे -पीछे कालयवनने भी उस गुफामें प्रवेश किया और मुचुकुन्दको पीताम्बर ओढ़कर सोया हुआ श्रीकृष्ण ही समझकर क्रोधसे भरे हुए उस महादुष्ट यवनने तुरंत ही उनके ऊपर लातसे प्रहार किया । मुचुकुन्द सहसा उठ बैठे और उन्होंने धीरे - धीरे आँखें खोलकर चारों ओर दृष्टिपात किया । उस समय कालयवन उन्हें पास ही खड़ा दिखायी दिया । * मुचुकुन्द उवाच कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च मैथिल! रोषसे भरे हुए नरेशकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन अपने ही देहसे उत्पन्न आगकी ज्वालासे उसी क्षण जलकर भस्म हो गया ॥ १ ९ –२१ ॥ यवनके भस्मीभूत हो जानेपर साक्षात् परिपूर्णतम भगवान्ने बुद्धिमान् मुचुकुन्दको अपने स्वरूपका दर्शन कराया । करोड़ों सूर्योंके समान जाज्वल्यमान ज्योति र्मण्डलमय भगवान् खड़े थे । उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल, बाँहोंमें अङ्गद और पैरोंमें नूपुर उद्दीप्त हो रहे थे । उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था । वे चार भुजाओंसे सम्पन्न थे । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान विशाल थे और उनकी ग्रीवामें वनमाला लटक रही थी । वे अपने लावण्यसे करोड़ों कामदेवोंको लज्जित कर रहे थे । उनकी कान्ति काले मेघके समान श्याम थी । उन्हें देखकर राजा हर्षसे उल्लसित हो उठकर खड़े हो गये और हाथ जोड़कर उन्हें परिपूर्णतम भगवान् जानकर भक्तिभावसे प्रणाम किया ॥ २२ - २५ ॥ मुचुकुन्दने कहा- जो वसुदेवपुत्र और देवकीनन्दन होते हुए भी श्रीनन्दगोपके कुमार हैं, उन सच्चिदानन्दस्वरूप गोविन्दको बारंबार नमस्कार है । जिनकी नाभिसे ब्रह्माण्ड - कमलकी उत्पत्ति हुई है, जो कमलकी मालासे अलंकृत हैं, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं तथा चरण भी अपनी शोभासे कमलोंको तिरस्कृत करते हैं, उन भगवान्‌को बारंबार नमस्कार है । शुद्ध - बुद्ध परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णको नमस्कार है । प्रणतजनोंके क्लेशका नाश करनेवाले गोविन्दको बारंबार नमस्कार है । जिनकी सहस्रों मूर्तियाँ हैं, जो सहस्रों चरण, नेत्र, मस्तक, उरु और भुजा धारण करनेवाले हैं, जिनके सहस्रों नाम हैं तथा जो सहस्र कोटि युगोंको धारण करते हैं, उन सनातन पुरुष भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । हरे! इस भूतलपर मेरे समान कोई पातकी नहीं है और आपके समान पापहारी भी दूसरा कोई नहीं है - यह जानकर जगन्नाथ देव! आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही कृपा मेरे ऊपर कीजिये * ॥ २६ – ३० ॥ । नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥

पृष्ठ 253

गर्ग संहिता, पृष्ठ 253 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय २ ] मथुरापर जरासंध और कालयवनका आक्रमण २४७ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! मुचुकुन्दके इस प्रकार स्तुति करनेपर साक्षात् परमानन्दस्वरूप श्रीहरिने उन्हें निर्गुण भक्त जानकर गम्भीर वाणीमें कहा ॥ ३१ ॥

श्रीभगवान् बोले — राजसिंह! तुम धन्य हो तथा निरपेक्ष दिव्य भक्तिभावसे भरी हुई तुम्हारी विमल बुद्धि भी धन्य है । तुम आज ही मेरे धाम बदरिकाश्रमको चले जाओ । वहीं तपस्या करके दूसरे जन्ममें श्रेष्ठ ब्राह्मण होओगे । महाराज! ब्राह्मण-शरीरसे प्रेमलक्षणा - भक्ति करके तुम प्रकृतिसे परे मेरे दिव्य धाममें पहुँच जाओगे, जहाँसे फिर यहाँ लौटना नहीं होता है ॥ ३२-३४ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार श्रीहरिकी आज्ञा पाकर, पुनः उनकी स्तुति, वन्दना और परिक्रमा करके, नतमस्तक एवं श्रीकृष्णप्रेमसे विह्वल हुए मुचुकुन्द उस गुहादुर्गसे बाहर निकले । द्वापरमें छोटी आकृतिवाले मनुष्य कई ताड़ ऊँचे राजा मुचुकुन्दको देखकर मार्गमें भयभीत हो इधर - उधर थे । ' मत डरो! मत डरो! ' इस प्रकार हुए मुचुकुन्द उत्तर दिशाको चले गये । बुद्धिमान् मुचुकुन्दको वरदान देकर म्लेच्छों से घिरी हुई मथुरामें आये म्लेच्छसेनाका संहार करके बलपूर्वक छीन लिया ॥ ३५-३८ ॥ तदनन्तर राजा जरासंधने पुनः भागने लगते अभयदान देते इस तरह उन भगवान् पुनः और सारी उसका धन युद्ध करनेका विचार मनमें लेकर मुहूर्त बतानेवाले मागध ब्राह्मणोंको बुलवाया और कहा - ' यदि मैं वासुदेवको जीतकर लौटूंगा तो तुम्हारे अधीन रहकर सदा तुमलोगोंकी पूजा करूँगा । तबतक हे ब्राह्मणो! तुमलोग मेरे कारागारमें ठहरो । यदि मैं पराजित हुआ तो तुम सबको मार डालूँगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ३ ९ –४१ ॥ ब्राह्मणोंसे यों कहकर महाबली राजा जरासंध तेईस अक्षौहिणी सेना साथ लेकर शीघ्र मथुरामें आया । मागध ब्राह्मणोंकी बात सत्य करनेके लिये भगवान्ने अपनी टेक छोड़ दी और मनुष्यकी - सी चेष्टाको अपनाकर अपने नगरसे भयभीतकी भाँति परमदेव बलराम और श्रीकृष्ण पैदल ही बड़े जोरसे भागे । उन्हें भागते देख मगधराज अट्टहास करने लगा । वह ब्राह्मणोंके वचनोंका अनुस्मरण करके रथसेनाके साथ उनका पीछा करने लगा । वे दोनों भाई श्रीहरि दक्षिण दिशाकी ओर जाते हुए प्रवर्षणगिरिपर पहुँच गये । उन दोनोंको उस पर्वतपर ही छिपे जान जरासंधने लकड़ी जलाकर वहाँके जंगलमें आग लगा दी । प्रवर्षणगिरिके समस्त वनके भस्मीभूत हो जानेपर उस जलते हुए पर्वतके ग्यारह योजन ऊँचे शिखरसे कूदकर वे दोनों देवेश्वर शत्रुओंसे अलक्षित रहकर द्वारकामें जा पहुँचे । महाबली वीर मगधराज उन दोनोंको दग्ध हुआ जान अपनी विजयके नगारे बजवाता हुआ मगधदेशको लौट गया॥४२–४८ ॥ नरेश्वर! उसने बड़ी भक्तिसे ब्राह्मणोंका पूजन किया और कहा - ' ब्राह्मण जिसका सहायक है, उसकी पराजय कैसे हो सकती है! ' ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' द्वारकावास - कथन ' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमालिने । नमः पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रये ॥

नमः कृष्णाय शुद्धाय ब्रह्मणे परमात्मने । प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ हरे मत्समः पातकी नास्ति भूमौ तथा त्वत्समोनास्ति पापापहारी । इति त्वं च मत्वा जगन्नाथ देव यथेच्छा भवेत्ते तथा मां कुरु त्वम् ॥ ( गर्ग, द्वारका २ । २६ – ३० )

पृष्ठ 254

गर्ग संहिता, पृष्ठ 254 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तीसरा अध्याय बलदेवजीका रेवतीके साथ विवाह नारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान्‌के द्वारकामें निवासका कारण बताया । अब उन परमेश्वर - बन्धुओंके विवाह आदिके सारे वृत्तान्त सुनाऊँगा । मिथिलेश्वर! तुम पहले बलदेवजीके विवाहका वृत्तान्त सुनो, जो समस्त पापोंको हर लेनेवाला तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला उत्तम साधन है ॥ १-२ ॥ सूर्यवंशमें महामनस्वी राजा आनर्त हुए, जिनके नामसे भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रके तटपर आनर्तदेश बसा हुआ था । राजा आनर्तके एक रैवत नामका पुत्र हुआ, जो गुणोंकी खान तथा चक्रवर्ती राजाके लक्षणोंसे सम्पन्न था । उसने कुशस्थलीपुरीका निर्माण करके वहीं रहकर राज्यशासन किया । रैवतके सौ पुत्र थे और रेवती नामवाली एक कन्या । वह सर्वोत्तम चिरंजीवी तथा सुन्दर वर पानेकी इच्छा रखती थी । एक दिन स्वर्णरत्नविभूषित रथपर आरूढ़ हो अपनी पुत्रीको भी उसीपर बिठाकर राजा रैवत भूमण्डलकी परिक्रमा करने लगे । ( इस यात्राका उद्देश्य था - पुत्रीके लिये योग्य वरकी खोज । ) अन्ततोगत्वा राजाने अपनी पुत्रीके लिये वरकी जिज्ञासाके निमित्त योगबलसे मङ्गलकारी ब्रह्मलोकमें पदार्पण किया और वहाँ ब्रह्माजीके चरणों में शीश झुकाया । उस समय ब्रह्माजीकी सभामें पूर्वचित्ति नामकी अप्सराका गान हो रहा था, इसलिये वे एक क्षणतक चुपचाप बैठे रहे । तदनन्तर ब्रह्माजीको एकचित्त हुआ जानकर उनसे अपना अभिप्राय निवेदित किया ॥ ३ - ८ ॥ रैवत बोले- प्रभो! आप परम पुराणपुरुष हैं । आपसे ही इस विश्वरूपी वृक्षका अड्डर उत्पन्न हुआ है । आप पूर्ण परमात्मा परमेश्वर हैं और अपने पारमेष्ठ्य धाममें सदा स्थित रहकर इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार किया करते हैं । देव! वेद आपके मुख हैं, धर्म हृदय है, अधर्म पृष्ठभाग है, मनु बुद्धि है, देवता अङ्ग हैं, असुर पैर हैं और सारा संसार आपका शरीर है । आप सम्पूर्ण विश्वको अपने हाथपर रखे हुए आँवलेकी भाँति प्रत्यक्ष देखते हैं और जैसे सारथि रथको अभीष्ट मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार आप संसाररूपी रथको तीनों गुणों अथवा त्रिगुणात्मक विषयोंकी ओर ले जानेमें समर्थ हैं । आप एकमात्र अद्वितीय हैं तथा जैसे मकड़ी अपने स्वरूपसे ही एक जाला उत्पन्न करती और फिर उसे ग्रस लेती है, उसी प्रकार आप जगत्रूपी एक जाल बुन रहे हैं और समय आनेपर फिर इसे अपने - आपमें विलीन कर लेंगे । महेन्द्रका निवासस्थान – स्वर्गलोक आपके वशमें है; फिर सार्वभौम राज्य और योगसिद्धि आपके अधीन हों, इसके लिये तो कहना ही क्या है । आप सदा पारमेष्ठ्य पद - ब्रह्मधाममें स्थित हैं । ऐसे अनन्तगुणशाली आप भूमा ( महान् एवं सर्वव्यापी ) पुरुषको नमस्कार है । विधे! आप स्वयम्भू ( स्वयं प्रकट हुए ) हैं, तीनों लोकोंके पितामह ( पिताके भी पिता ) हैं । अपने इसी प्रभावके कारण आपको ' सुरज्येष्ठ ' कहा जाता है । आप सर्वदर्शी हैं, अतः मेरी इस पुत्रीके लिये आप शीघ्र ही मुझे कोई दिव्य, सर्वगुणसम्पन्न तथा चिरंजीवी वर बताइये ॥ ९ - १३ ॥ नारदजी कहते हैं— मैथिल! यह सुनकर सर्वदर्शी भगवान् स्वयम्भू ब्रह्माने राजा रैवतसे हँसते हुए - से कहा ॥ १४ ॥

श्रीब्रह्माजी बोले - राजन्! इस क्षणतक पृथ्वी-

पृष्ठ 255

गर्ग संहिता, पृष्ठ 255 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ४ ] श्रीकृष्णको रुक्मिणीका संदेश; ब्राह्मणसहित श्रीकृष्णका कुण्डिनपुरमें आगमन २४ ९ पर महाबली काल बड़ी तेजीके साथ बीत चुका है । सत्ताईस चतुर्युगियाँ समाप्त हो चुकी हैं । मर्त्यलोकमें तुम्हारे पुत्र, पौत्र और उनके भाई - बन्धु नहीं रह गये हैं । उनके पुत्रोंके भी पोते - नातियोंके गोत्रतक अब नहीं सुनायी देते हैं । अतः राजन्! शीघ्र जाओ और सर्वश्रेष्ठ नररत्न सनातन पुरुष बलदेवजीको यह कन्यारत्न समर्पित करो । साक्षात् गोलोकके अधिपति परिपूर्णतम प्रभु बलराम और केशव भूमिका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए हैं । असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति होते हुए भी वे दोनों भक्तवत्सल हरि वसुदेवनन्दन होकर द्वारकामें यदुवंशियोंके साथ विराज रहे हैं ॥ १५–१९ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर नृपश्रेष्ठ रैवत ब्रह्माजीको नमस्कार करके पुनः समृद्धिशालिनी द्वारकापुरीमें आये । बलदेवजीसे कन्याका विवाह करके दहेजमें विश्वकर्माका बनाया हुआ एक दिव्य रथ प्रदान किया, जो एक योजन विस्तृत था । उस रथमें एक सहस्र अश्व जुते हुए थे । मिथिलेश्वर! ब्रह्माजीके दिये हुए दिव्य वस्त्र तथा रत्न देकर राजा रैवत मङ्गलमय बदरिकाश्रमतीर्थमें तपस्या करनेके लिये चले गये । उस समय यदुपुरीके घर-घरमें महान् उत्सव मनाया गया । तदनन्तर भगवान् संकर्षण रानी रेवतीके साथ बड़ी शोभा पाने लगे । जो मनुष्य बलदेवजीके विवाहकी इस कथाको सुनेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो परमसिद्धिको प्राप्त होगा ॥२०–२४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' बलदेव - विवाहोत्सव ' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय श्रीकृष्णको रुक्मिणीका संदेश; ब्राह्मणसहित श्रीकृष्णका कुण्डिनपुरमें आगमन; कन्या और वरके अपने - अपने घरोंमें मङ्गलाचार; शिशुपालके साथ आयी हुई बारातको विदर्भराजका ठहरनेके लिये स्थान देना श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! अब श्रीकृष्णदेवके विवाहका वृत्तान्त सुनो, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यजनक तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्वर्गमय फल प्रदान करनेवाला है ॥१ ॥

विदर्भदेशमें भीष्मक नामसे प्रसिद्ध एक प्रतापी राजा राज्य करते थे, जो कुण्डिनपुरके स्वामी, श्रीसम्पन्न तथा सम्पूर्ण धर्मवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ थे । उनके रुक्मिणी नामक एक पुत्री हुई, जो लक्ष्मीजीका अंश थी । वह इतनी अधिक सुन्दरी थी कि उसके सामने करोड़ों चन्द्रमा फीके लगें । वह सद्गुणरूपी आभूषणोंसे विभूषित थी । पहलेकी बात है, एक दिन मेरे मुँह से श्रीहरिके अलौकिक गुणका वर्णन सुनकर वह राजकुमारी परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णको अपने अनुरूप पति मानने लगी । इसी तरह मेरे मुखसे रुक्मिणीके रूप और गुणका प्रीतिवर्धक वर्णन सुनकर श्रीहरिने उसे अपनी योग्य पत्नी समझा और उसके साथ विवाह करनेका मन - ही - मन संकल्प किया । श्रीकृष्णके भावको जाननेवाले सर्वधर्मज्ञ राजा भीष्मकने भी अपनी उस कन्याको उन्होंके हाथमें देनेका निश्चय किया था; किंतु युवराज रुक्मीने यत्नपूर्वक पिताको रोका और श्रीकृष्णके शत्रु महावीर शिशुपालको रुक्मिणीके योग्य वर माना ॥ २७ ॥

मिथिलेश्वर! इससे भीष्मकुमारी रुक्मिणीके चित्तमें बड़ा खेद हुआ और उसने एक ब्राह्मणको अपना दूत बनाकर महात्मा श्रीकृष्णके पास भेजा । ब्राह्मणदेवता जब दिव्य द्वारकापुरीमें पहुँचे, तब श्रीकृष्णने उनकी आवभगत की । उन्होंने वहीं भोजन किया और श्रीकृष्णके मन्दिरमें ही आसन लगाकर विश्राम किया । फिर महात्मा श्रीकृष्णने उनसे सारा कुशल- समाचार पूछा । उनकी आज्ञा पाकर ब्राह्मणने

पृष्ठ 256

गर्ग संहिता, पृष्ठ 256 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२५० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड उन्हें सब बातें बतायीं ॥ ८-१० ॥ [ वे रुक्मिणीका पत्र सुनाते हुए बोले - ] “ स्वस्ति श्री ५ नित्यानन्द - महासागर श्रीमद्दिव्यगुणपरिपूर्ण वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण! जोग लिखी कुण्डिनपुरसे रुक्मिणीका कोटिशः प्रणाम स्वीकृत हो । यहाँ कुशल है, वहाँ भी कुशल चाहिये । आगे आपका पत्र आया और श्रीनारदजीकी वाणीसे भी यह ज्ञात हुआ कि आप प्रकृतिसे परे परमेश्वर हैं । यद्यपि सर्वज्ञ होनेके नाते आप सब कुछ जानते हैं, तथापि मैं गुप्त बात आपको बता रही हूँ । महामते! आप मुझे वीरका भाग ( अपना अंश ) जानें और स्वीकार करें । यदि चेदिराज शिशुपालने मेरा हाथ पकड़ लिया तो यह समझना चाहिये कि सिंहके लिये नियत बलिका भाग कोई मृग ( कुत्ता, बिल्ली आदि ) उठा ले गया । यदि आप ऐसा सोचते हों कि ' तुम तो कुण्डिनपुरके दुर्गमें निवास करती हो, तुम्हें मैं किस प्रकार ब्याहकर लाऊँगा, तो इसके विषयमें भी सुन लीजिये । हरे! यहाँकी कुल -प्रथाके अनुसार विवाहके एक दिन पूर्व राजकुमारी कुलदेवीके मन्दिरको जाती है । यह यात्रा बड़ी धूम - धामसे की जाती है । अतः मैं जहाँ कुलदेवीका मन्दिर है, वहाँपर आऊँगी । प्रभो! वहीं आप मुझे अपने साथ ले लें " ॥११- १५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! ब्राह्मणके मुखसे रुक्मिणीके उस अभिप्रायको सुनकर सबको मान देनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने अपने सारथि दारुकको बुलाकर कहा - ' मेरा रथ शीघ्र ही जोतकर तैयार करो । ' पिछली रातमें वैकुण्ठसे प्राप्त हुए उस रथको, जो किङ्किणी - जालसे युक्त और सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित था, शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामके श्रेष्ठ अश्वोंसे जोतकर दारुकने सुसज्जित किया । घोड़े चञ्चल तथा चारु चामरोंसे विभूषित थे । उनसे युक्त, सहस्रों सूर्योके समान तेजस्वी उस दिव्य विशाल रथपर लक्ष्मीपति श्रीकृष्णने पहले तो अपने हाथसे उस ब्राह्मणदेवताको बैठाया और स्वयं सारथिकी पीठपर अपने श्रीचरण -कमल रखकर वे रथपर आरूढ़ हुए । राजन्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण विदर्भदेशको चले । श्रीकृष्ण अकेले ही समस्त राजमण्डलके बीचसे राजकन्याको हर लाने गये हैं, इस समाचारसे बलरामजीको युद्धकी आशङ्का हुई, अतः वे भाईकी सहायता करनेके लिये समर्थ वल-वाहनसे युक्त सम्पूर्ण यादव- सेनाको लेकर विपक्षी राजाओंको जीतनेके लिये पीछेसे शीघ्रतापूर्वक गये ॥ १६-२२ ॥ प्रातःकाल होते - होते ब्राह्मण और रथके साथ भगवान् श्रीकृष्ण कुण्डिनपुरके उपवनमें जा पहुँचे । वहाँ एक इमलीके वृक्षके नीचे घोड़ेकी झूल बिछाकर वे बैठ गये । उस स्थानसे कुछ दूरीपर उत्तम कुण्डिनपुर दिखायी देता था । वह नगर बहुत बड़े दुर्गसे घिरा हुआ सात योजन गोलाकार भूमिपर बसा था । वहाँ जलसे भरी हुई तीन परिखाएँ थीं, जो दुर्लङ्घय और दुर्गम थीं । उनकी चौड़ाई सौ धनुष थी । वे परिखाएँ ( खाइयाँ ) चौमासेकी नदीके समान जलसे भरी हुई थीं । दुर्गकी दीवार पचास हाथ ऊँची थी । नगरमें रमणीय अट्टालिकाएँ शोभा पाती थीं, जिनके सुनहरे शिखरपर सोनेके कलश उद्भासित होते थे । ध्वजके ऊपर चमकती हुई पताकाएँ फहरा रही थीं । कबूतर और मोर आदि पक्षी जहाँ - तहाँ उड़ रहे थे ॥ २३–२७ ॥ शिशुपालको अपनी कन्या देनेके लिये उद्यत हो राजा भीष्मकने रत्नमण्डपमें वैवाहिक सामग्रीका संचय कराया । राजन्! नारियोंद्वारा गाये जानेवाले गीत और मङ्गलाचारसे युक्त सुन्दर भवनमें रुक्मिणी उसी प्रकार शोभा पा रही थी, जैसे सिद्धियोंसे भूमिकी शोभा होती है । अथर्ववेदके विद्वानोंने रुक्मिणीको भलीभाँति नहलाकर रत्नमय आभूषण तथा वस्त्र धारण करवाये और वेदमन्त्रोंद्वारा शान्तिकर्म करके वधूकी रक्षा की । महामनस्वी राजा भीष्मकने ब्राह्मणोंको लाख भार सोना, दो लाख भार मोती, सहस्र भार वस्त्र और छः अरब गायें दानमें दीं ॥२८-३३ ॥ उसी प्रकार दमघोषपुत्र शिशुपालके लिये भी ब्राह्मणोंने पहले परमशान्तिका विधान करके रक्षाबन्धन करवाया । ब्राह्मणोंद्वारा जब शिशुपालका माङ्गलिक स्नानकर्म सम्पन्न हो गया, तब उसे पीले रंगका रेशमी जामा पहनाकर सुशोभित किया गया । सिरपर मुकुट और मुकुटके ऊपर फूलोंका सुन्दर सेहरा सजाया गया । हार, कंगन, भुजबंद और चूड़ामणिसे

पृष्ठ 257

गर्ग संहिता, पृष्ठ 257 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ ] रुक्मिणीकी चिन्ता; ब्राह्मणद्वारा विभूषित हुए शिशुपालकी माङ्गलिक गाजों -बाजोंके साथ गन्ध और अक्षतद्वारा विशिष्ट पूजा की गयी । आचारलाजों ( खीलों ) से शिशुपालको सुन्दर वर सजाकर ऊँचे हाथीपर चढ़ाया गया । उसके साथ बारात लिये दमघोष निकले । मिथिलेश्वर! जरासंध, शाल्व, बुद्धिमान् दन्तवक्र, विदूरथ और पौण्ड्रक पीछे और अगल - बगलसे उसके रक्षक होकर चले । महाबली दमघोष विशाल सेना साथ लेकर उच्चस्वरसे नगारे बजवाते हुए कुण्डिनपुरको गये । सामनेसे यदुदेव श्रीकृष्णका कन्या अपहरण - विषयक उद्योग सुनकर दूसरे हजारों राजा शिशुपालके सहायक बनकर श्रीहरिके शुभागमनका समाचार २५१ आये ॥ ३४–४० ॥ भीष्मकने आगे जाकर राजा दमघोषका विधिपूर्वक पूजन किया । कश्मीरी कम्बलों तथा समुद्रसे उत्पन्न दिव्य अरुणवर्णके रत्नोंसे सबको मण्डित किया । सबके कण्ठों में मोतियोंकी मालाएँ पहनायीं । सुगन्धयुक्त पुष्परस ( इत्र - फुलेल आदि ) से सबका स्वागत किया । उस राज्यमें राजाओंके शिविरोंमें वाराङ्गनाओंके नृत्य हो रहे थे । मृदङ्ग बजाये जा रहे थे । उस समय विदर्भके महाराजने समागत राजाओं-सहित वरके लिये अलग - अलग वासस्थान प्रदान किये ॥ ४१–४३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कुण्डिनपुरकी यात्रा ' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पाँचवाँ अध्याय रुक्मिणीकी चिन्ता; ब्राह्मणद्वारा श्रीहरिके शुभागमनका समाचार पाकर प्रसन्नता; भीष्मकद्वारा बलराम और श्रीकृष्णका सत्कार; पुरवासियोंकी कामना; रुक्मिणीकी कुलदेवीके पूजनके सौभाग्यवती स्त्रियोंसे श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्दका चिन्तन करती हुई कमललोचना भीष्मकुमारी रुक्मिणी उनके बिना जीवनको व्यर्थ मानने लगी । वह निरन्तर घनश्यामका ही ध्यान करती थी । इसी अवस्थामें वह मन ही मन कहने लगी ॥ १ ॥

रुक्मिणी बोली – अहो! मेरे विवाहका मुहूर्त आनेमें अब एक ही रात बाकी रह गयी है, किंतु मेरे प्रियतम श्रीकृष्णचन्द्र नहीं आये । मैं नहीं जानती कि इसमें क्या कारण है? जो ब्राह्मणदेवता उनके पास गये थे, वे भी अबतक लौटकर नहीं आये । हे विधाता! इसमें क्या हेतु है? ये यदुकुल - तिलक देवेश्वर श्रीकृष्ण निश्चय ही मुझमें कोई दोष देखकर मेरा पाणिग्रहण करनेके निमित्त अधिक उद्योगशील होकर नहीं आ रहे हैं । हाय विधाता! अब मैं क्या लिये यात्रा, देवीसे प्रार्थना तथा आशीर्वादकी प्राप्ति करूँ? हाय! मुझ अभागिनीके लिये विधाता अनुकूल नहीं हैं । चन्द्रशेखर भगवान् शिव तथा गणेशजी भी प्रतिकूल हो गये हैं । भगवती गौरीने भी मुझसे मुँह फेर लिया है और गौ तथा ब्राह्मण भी मेरे अनुकूल नहीं हैं ॥ २-४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस तरह चिन्तामें पड़ी हुई वह भीष्मक - राजकुमारी महलकी अट्टालिकाओंमें चक्कर लगाती हुई ऊँचे शिखरसे श्रीकृष्णचन्द्रकी बाट देखने लगी । इतनेमें ही रुक्मिणीका बायाँ अङ्ग फड़क उठा, मानो वही उनकी शङ्काका उत्तर या समाधान था । कालको जाननेवाली सर्वमङ्गला श्रीभीष्मकनन्दिनी उस अङ्गस्फुरणसे बहुत प्रसन्न हुई ॥ ५-६ ॥ उसी समय श्रीकृष्णका भेजा हुआ ब्राह्मण तत्काल वहाँ आ पहुँचा । श्रीकृष्णका आगमन सम्बन्धी सारा

पृष्ठ 258

गर्ग संहिता, पृष्ठ 258 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२५२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड वृत्तान्त उसने धीरेसे रुक्मिणीको बता दिया । इससे श्रीभीष्मक - राजकुमारीको बड़ा हर्ष हुआ और वह ब्राह्मणदेवताके चरणों में प्रणत होकर बोली- ' विप्रवर! मैं तुम्हारे वंशसे कभी दूर नहीं जाऊँगी ( अर्थात् तुम्हारी कुल परम्परामें धन-सम्पत्तिका कभी अभाव नहीं होगा ), यह मेरा प्रतिज्ञापूर्ण वचन है ॥ ७-८ ॥ विदर्भराज भीष्मकने जब सुना कि मेरी कन्याका विवाह देखनेके लिये उत्सुक हो बलराम और श्रीकृष्ण - दोनों भाई पधारे हैं, तब वे ब्राह्मणोंके साथ उन्हें लिवा लानेके लिये निकले; क्योंकि उन्हें उनके प्रभावका पूर्ण परिज्ञान था । मङ्गल - पात्रोंमें गन्ध और अक्षत भरकर वस्त्र तथा रत्नराशि रखकर माङ्गलिक गाजे - बाजेके साथ वे आये । मधुपर्कोंके कोटिशः कलशसमूह सजाकर राजाने बलराम और श्रीकृष्ण दोनों परमेश्वर - बन्धुओंका विधिपूर्वक पूजन किया । पूजन करके वे मन - ही - मन यह सोचकर अत्यन्त खिन्न हो गये कि ‘ अहो! मैंने इन्हींको अपनी कन्या क्यों नहीं दी? ' उनको सेनासहित आनन्दवनमें ठहराया और उन्हें प्रणाम करके वे अपने महलमें लौट आये ॥ ९ -१२ ॥ तीनों लोकोंके लावण्यकी निधि परमेश्वर श्रीवसुदेवनन्दनका आगमन सुनकर कुण्डिनपुरके निवासी वहाँ आये और अपने नेत्रपुटोंसे उनके मुखारविन्दकी मकरन्द- सुधाका पान करने लगे । वे पुरवासी परस्पर इस प्रकार बात करने लगे - ' बन्धुओ! रुक्मिणी तो इन भगवान् श्रीकृष्णकी ही पत्नी होनेयोग्य है, दूसरे किसीकी नहीं । ' उन नगरनिवासियोंने श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका विवाह हो, इसके लिये विधातासे प्रार्थना करते हुए अपने सारे पुण्य समर्पित कर दिये । वे श्रीकृष्णके लावण्यके बन्धनमें बँध गये थे । उन्होंने पुनः आपसमें इस प्रकार कहा - ' यदि यहाँ इनका विवाह हो जाय तो ये कभी - कभी स्वयं श्वशुरके घर अवश्य आया करेंगे? उस समय हम सब लोग निकटसे इनका दर्शन करेंगे और कृतकृत्य हो जायँगे । लोकमें इनके दर्शनसे वञ्चित होकर दीर्घकालतक जीनेसे क्या लाभ ' ॥ १३–१५ ॥ नरेश्वर! जब लोग इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय भीष्मक - राजकुमारी रुक्मिणी गिरिराजनन्दिनी उमाका पूजन करनेके लिये अपनी सम्पूर्ण सखियोंके साथ अन्त: पुरसे बाहर निकली । श्रीकृष्णने उसके हृदयको हर लिया था । उस समय भेरी, मृदङ्ग और दुन्दुभिकी जोर - जोरसे ध्वनि होने लगी । अच्छे गायक गीत गाने लगे, वन्दीजन और मागध यशोगान करने लगे और वाराङ्गनाओंका मनोहर नृत्य होने लगा । इन सबके साथ जय - जयकारका मङ्गलघोष उच्चस्वरसे गूँजने लगा ॥१६-१७ ॥ लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मिणी कोटि चन्द्रमण्डलकी कान्ति धारण कर रही थी । बालरविके समान दीप्तिमान् कुण्डल उसके कानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे और पार्श्ववर्तिनी परिचारिकाओंका समुदाय श्वेत छत्र लगाये व्यजन और चमकीले चामर डुलाते हुए उसकी सेवामें संलग्न था । म्यानसे खींचकर लाखों श्वेत रंगकी नंगी तलवारें हाथमें लिये पैदल वीर योद्धा इधर - उधरसे उसकी रक्षा कर रहे थे । इनसे थोड़ी ही दूरपर घुड़सवार, रथी और हाथीसवार योद्धा भी अस्त्र उठाये राजकुमारीकी रक्षामें लगे थे ॥ १८-१९ ॥ देवीके मन्दिरमें पहुँचकर आँगनमें शान्त और शुद्धभावसे खड़ी हो राजकुमारीने अपने कमलोपम हाथ और पैर धोये । फिर मौनभावसे देवीके समीप जाकर उसने दोनों हाथ जोड़, भवभीतिहारिणी भवानीकी सेवामें इस प्रकार प्रार्थना की- ' दुर्गे! गणेश -कार्तिकेय आदि संतानोंसहित शोभा पानेवाली शुभकारिणी भवानी शिवे! मैं तुम्हें सदा प्रणाम करती हूँ और यह वर माँगती हूँ कि प्रकृतिसे परे विराजमान साक्षात् परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र मेरे पति हों ' ॥ २०-२१ ॥ उस समय सखियाँ कहने लगीं- ' शुभे! इस तरह श्रीकृष्णका नाम न लो । चेदिराज शिशुपालके उद्देश्यसे वर माँगो । ' इस तरह बोलती हुई सखियोंके बीच खड़ी भीष्मकनन्दिनी पुनः भवानीके भवनमें पूर्वोक्त प्रार्थनाको ही दुहराने लगी । ' अम्ब! यह बालिका है, कुछ जानती नहीं; अतः आप इसकी बातपर ध्यान न दें । ' यों कहती हुई सखियोंके बीचमें स्थित हो रुक्मिणीने गन्ध, अक्षत, धूप, आभूषण, पुष्पहार, पुष्प, दीपमाला, पूआ आदि

पृष्ठ 259

गर्ग संहिता, पृष्ठ 259 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ६ ] श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका अपहरण २५३ भोग, वस्त्र, फल, गन्ने तथा ताम्बूल आदि अर्पण करके बड़ी भक्तिसे भवानीकी सेवा - पूजा की । तदनन्तर देवीको प्रणाम करके, बहुत - से आभूषण आदिद्वारा सौभाग्यवती स्त्रियोंका पूजन करके राजकुमारीने उन सबको प्रणाम किया ॥ २२ -२४ ॥ उन सम्पूर्ण सौभाग्यवती स्त्रियोंने रुक्मिणीको वर दिये और परम मङ्गलमय आशीर्वाद प्रदान किये -' राजकुमारी! तुम्हारा रूप - सौन्दर्य सदा महारानी शतरूपाके समान अक्षय बना रहे, शील - स्वभाव गिरिराजनन्दिनी उमाके समान शोभित हो । तुममें पतिसेवाका भाव अरुन्धतीके समान हो और क्षमा जनकनन्दिनी सीताके समान । भीष्मकनन्दिनि! तुम्हारा सौभाग्य ( यज्ञपत्नी ) दक्षिणाके समान और उत्तम वैभव शचीके तुल्य हो । तुम्हारी वाणी सरस्वतीके सदृश और पतिभक्ति संतोंकी हरिभक्तिके समान हो ' ॥ २५ - २६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' रुक्मिणीका निर्गमन ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

छठा अध्याय श्रीकृष्णद्वारा रुक्मिणीका अपहरण तथा यादव - वीरोंके साथ युद्धमें विपक्षी राजाओंकी पराजय श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार ब्राह्मणपत्रियोंके शुभाशीर्वादसे अभिनन्दित हो रुक्मिणीने पुनः बार - बार देवी तथा विप्र - वधुओंको प्रणाम किया ॥ १ ॥

तत्पश्चात् मौनव्रतका त्याग करके भीष्मकराजकुमारी सखी - सहेलियोंके साथ धीरे - धीरे गिरिजागृहसे बाहर निकली । उस समय करोड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती कमललोचना रुक्मिणीको वीर योद्धाओंने अकस्मात् इस प्रकार देखा, मानो निर्धनोंको सहसा कोई उत्तम निधि मिल गयी हो । घुड़सवार, रथी, हाथीसवार और पैदल - जो - जो रक्षक वहाँ आये थे, वे सब रुक्मिणीपर दृष्टि पड़ते ही मोहित हो गये । उसके मुस्कानयुक्त कटाक्ष कामदेवके धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंके समान थे । उनसे आहत एवं पीड़ित हो समस्त सैनिक अपने अस्त्र त्यागकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥२-५ ॥ इसी समय घंटियों और मँजीरोंके नादसे मुखरित तथा वैकुण्ठस्थित नैःश्रेयस नामक वनमें उद्भूत अश्वोंसे जुते हुए, फहराती हुई ऊँची पताकासे अलंकृत तथा वायुके समान वेगशाली रथद्वारा दारुक सारथिसहित श्रीहरि अपनी सेनाकी टक्करसे उस रक्षक सेनामें दरार उत्पन्न करके तत्काल वहाँ उसी प्रकार घुस आये, जैसे वायु कमलवनमें बेरोक - टोक प्रविष्ट हो जाती है । शत्रुओंके देखते - देखते शीघ्र ही स्त्री - समुदायके पास पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णने भीष्मकनन्दिनी रुक्मिणीको अपने रथपर चढ़ाकर, जैसे गरुड़ देवताओंके सामनेसे सुधाका कलश उठा ले गये थे, उसी प्रकार उस राजकन्याका अपहरण कर लिया । राजन्! उस समय वे शस्त्रोंमें उत्तम दिव्य र्शाङ्ग - धनुषको बारंबार टंकार रहे थे । तदनन्तर बड़े वेगसे अपनी सेनाके भीतर श्रीहरिके लौट आनेपर देवताओंकी दुन्दुभियाँ और यादवोंके नगारे एक साथ ही बज उठे । सिद्ध और सिद्धोंकी कन्याएँ तथा देवतालोग हर्षसे भरकर श्रीकृष्णके रथपर नन्दनवनके फूलोंकी वर्षा करने लगे । तब जय - जयकारकी ध्वनिके साथ बलरामसहित श्रीकृष्ण धीरे - धीरे वहाँसे जाने लगे - ठीक उसी प्रकार जैसे सिंह सियारोंके बीचसे अपना भाग लेकर मौजसे चला जाता है ॥६- १२ ॥ रुक्मिणीका हरण हो जानेपर उस समय बड़ा भारी कोलाहल मचा । रक्षक सैनिक आपसमें ही शस्त्रोंके प्रहारपूर्वक युद्ध करने लगे । जरासंधके वशमें रहनेवाले समस्त मानी नृपश्रेष्ठ इस घटनासे प्राप्त हुए

पृष्ठ 260

गर्ग संहिता, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२५४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड अपने पराभव और सुयशके नाशको नहीं सह सके । वे परस्पर कहने लगे- ' अहो! हमलोगोंको धिक्कार है । हम धनुर्धर राजाओंके यशको गोपोंने उसी प्रकार हर लिया, जैसे सियारोंने सिंहोंके यशका अपहरण किया हो । इससे बढ़कर हमारी पराजय और क्या हो सकती है? ' यों कहकर सब - के - सब क्रोधसे भर उठे और द्यूतक्रीड़ा एवं चौपड़ आदि खेलोंको छोड़कर, कवच और सेनासे सुसज्जित हो उन्होंने युद्धके लिये शस्त्र उठा लिये । क्रोधसे भरा हुआ पौण्ड्रक दो अक्षौहिणी सेनाके साथ, महावीर विदूरथ तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ, अत्यन्त दारुण दन्तवक्र पाँच अक्षौहिणी सेनाके साथ, राजपुरका स्वामी राजा शाल्व तीन अक्षौहिणी सेनाके साथ तथा महाबली जरासंध दस अक्षौहिणी सेनाके साथ महामनस्वी यादवोंके समक्ष युद्धके लिये आ पहुँचे । चेदिराज शिशुपालके पक्षवाले अन्य सहस्त्रों योद्धा भी श्रीकृष्णके सामने धनुषको टंकारते हुए युद्धके लिये आ धमके ॥ १३ – २० ॥ प्रलयकालके महासागरकी भाँति उस विशाल सेनाको देखकर यदुश्रेष्ठ योद्धा उसे पार करनेके लिये श्रीकृष्णके पास आ गये । श्रीकृष्ण ही उनके केवट और जहाज थे । देवता और दानवोंकी भाँति उन स्वकीय एवं परकीय सैनिकोंमें अत्यन्त अद्भुत तथा रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध होने लगा । उस संग्राममें रथी रथियोंके साथ, पैदल पैदलोंके साथ, हाथी-सवार हाथीसवारोंके साथ और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे । शस्त्रोंकी वर्षासे अन्धकार - सा छा गया । उस समय रुक्मिणीको भयसे विह्वल हुई देख भगवान् श्रीकृष्णने अभय - दान देते हुए कहा - ' डरो मत ' ॥ २१ - २४ ॥ बलदेवजीके छोटे भाई वीरवर गद अपने महान् धनुषको कम्पित करते हुए शत्रुओंकी सेनामें उसी प्रकार घुस गये, जैसे वनमें दावानल । गदके बाणोंसे अङ्गोंके विदीर्ण हो जानेके कारण कितने ही रथी योद्धाओंके कवच कटकर छिन्न - भिन्न हो गये, घोड़े और सारथि मारे गये तथा वे स्वयं भी प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । पैदल योद्धाओंके पैर कट गये । राजन्! गदके बाणोंसे व्यथित हो शत्रुयोद्धा आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंकी भाँति धराशायी हो गये । नरेश्वर! घोड़ोंपर चढ़े हुए कितने ही वीर गदके बाणोंसे विदीर्ण हो समराङ्गणमें बृहतीफलकी भाँति गिर पड़े । इसी प्रकार गदके बाणोंसे फट जानेके कारण बीच - बीचसे विदीर्ण कुष्माण्डके टुकड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर पड़े रहे थे ॥ २५–२९ ॥ तदनन्तर शत्रुओंकी सारी सेना भाग देख गदा- युद्ध - विशारद महाबली शाल्वने घोड़ोंसहित कुम्भस्थल हुए हाथी शोभा पा चली । यह गदके ऊपर अपनी गदासे आघात किया । गदाकी चोट खाकर गदा- युद्धके प्रभावको जाननेवाले धनुर्धर गद धनुषद्वारा युद्ध करना छोड़कर तत्काल मनसे अत्यन्त व्यथाका अनुभव करते हुए युद्धभूमिमें गिर पड़े । गिरकर भी वे सहसा उठ खड़े हुए और तत्काल बलदेवजीकी दी हुई गदाको गदने अपने हाथमें ले लिया । लाख भार लोहेकी बनी हुई वह भारी गदा कौमोदकीके समान सुदृढ़ थी । उसके द्वारा गदने राजा शाल्वपर उसी प्रकार चोट की, जैसे इन्द्रने वज्रद्वारा किसी पर्वतपर आघात किया हो । गदाके प्रहारसे व्यथित हो राजा शाल्व जब पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब पौण्ड्रक, जरासंध, दन्तवक्र और विदूरथ - ये चारों वीर गदके प्रति रोषसे भरे हुए वहाँ आ पहुँचे । महावीर पौण्ड्रकने भी जैसे कोई कटु वचनोंसे मित्रताके सम्बन्धको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार दस तीखे बाण मारकर गदके रथपर फहराती हुई पताकाको काट डाला ॥ ३० – ३५३ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् दन्तवक्रने गदाकी चोटसे गदके सुन्दर रथको भी इस तरह चूर - चूर कर डाला, मानो किसीने डंडेकी मारसे मिट्टीका सुन्दर घड़ा फोड़ डाला हो । विदेहराज! इसी प्रकार जरासंधने उस रथके घोड़े मार डाले और विदूरथने सारथिको तीखे बाणोंसे पृथ्वीपर मार गिराया । तब मुसल हाथमें ले बलवान् बलदेवजी बड़ी तीव्रगतिसे वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने दन्तवक्रके विकराल एवं भयानक मुखपर बड़े जोरसे प्रहार किया । समराङ्गणमें युद्ध करते हुए दन्तवक्रके मुखमें मुसलकी चोट पड़नेपर उसके मुखमें जो एक