गर्ग संहिता — पृष्ठ 41–50

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

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अध्याय ८ ] सुचन्द्र और कलावतीके अधिक कहने से क्या लाभ । देवर्षे! श्रीराधाके साथ भूतलपर अवतीर्ण हुए साक्षात् परिपूर्णतम भगवान्ने व्रजमें कौन - सी लीलाएँ कीं - यह मुझे कृपापूर्वक बताइये । देवर्षे! ऋषीश्वर! इस कथामृतद्वारा आप त्रिताप - दुःखसे मेरी रक्षा कीजिये ॥ २-३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! वह कुल धन्य है, जिसे परात्पर श्रीकृष्णभक्त राजा निमिने समस्त सद्गुणोंसे परिपूर्ण बना दिया है और जिसमें तुम जैसे योगयुक्त एवं भव - बन्धनसे मुक्त पुरुषने जन्म लिया है । तुम्हारे इस कुलके लिये कुछ भी विचित्र नहीं है । अब तुम उन परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्णकी परम मङ्गलमयी पवित्र लीलाका श्रवण करो । वे भगवान् केवल कंसका संहार करनेके लिये ही नहीं, अपितु भूतलके संतजनोंकी रक्षा के लिये अवतीर्ण हुए थे । उन्होंने अपनी तेजोमयी पराशक्ति श्रीराधाका वृषभानुकी पत्नी कीर्ति - रानीके गर्भमें प्रवेश कराया । वे श्रीराधा कलिन्दजाकूलवर्ती निकुञ्जप्रदेशके एक सुन्दर मन्दिरमें अवतीर्ण हुई । उस समय भाद्रपदका महीना था । शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथि एवं सोमका दिन था । मध्याह्नका समय था और आकाशमें बादल छाये हुए थे । देवगण नन्दनवनके भव्य प्रसून लेकर भवनपर बरसा रहे थे । उस समय श्रीराधिकाजीके अवतार धारण करनेसे नदियोंका जल स्वच्छ हो गया । सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न - निर्मल हो उठीं । कमलोंकी सुगन्धसे व्याप्त शीतल वायु मन्दगतिसे प्रवाहित हो रही थी । शरत्पूर्णिमाके शत - शत चन्द्रमाओंसे भी अधिक अभिराम कन्याको देखकर गोपी कीर्तिदा आनन्दमें निमग्न हो गयीं । उन्होंने मङ्गलकृत्य कराकर पुत्रीके कल्याणकी कामनासे आनन्ददायिनी दो लाख उत्तम गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं । जिनका दर्शन बड़े बड़े देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, तत्त्वज्ञ मनुष्य सैकड़ों जन्मोंतक तप करनेपर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे ही श्रीराधिकाजी जब वृषभानुके यहाँ साकाररूपसे प्रकट हुईं और गोप- ललनाएँ जब उनका लालन - पालन करने लगीं, तब सर्वसाधारण लोग उनका दर्शन करने लगे । सुवर्णजटित एवं सुन्दर रत्नोंसे खचित, चन्दननिर्मित तथा रत्नकिरण- मण्डित पालनेमें पूर्व - पुण्यका वर्णन ३५ सखीजनोंद्वारा नित्य झुलायी जाती हुई श्रीराधा प्रतिदिन शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी कलाकी भाँति बढ़ने लगीं । श्रीराधा क्या हैं— रासकी रङ्गस्थलीको प्रकाशित करनेवाली चन्द्रिका, वृषभानु- मन्दिरकी दीपावली, गोलोक - चूड़ामणि श्रीकृष्णके कण्ठकी हारावली । मैं उन्हीं पराशक्तिका ध्यान करता हुआ भूतलपर विचरता रहता हूँ ॥ ४–१२ ॥ राजा बहुलाश्वने पूछा – मुने! वृषभानुजीका सौभाग्य अद्भुत है, अवर्णनीय है; क्योंकि उनके यहाँ श्रीराधिकाजी स्वयं पुत्रीरूपसे अवतीर्ण हुईं । कलावती और सुचन्द्रने पूर्वजन्ममें कौन - सा पुण्यकर्म किया था, जिसके फलस्वरूप इन्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ ॥ १३ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! राजराजेश्वर महाभाग सुचन्द्र राजा नृगके पुत्र थे । परम सुन्दर सुचन्द्र चक्रवर्ती नरेश थे । उन्हें साक्षात् भगवान्‌का अंश माना जाता है । पूर्वकालमें ( अर्यमा - प्रभृति ) पितरोंके यहाँ तीन मानसी कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं । वे सभी परम सुन्दरी थीं । उनके नाम थे - कलावती, रत्नमाला और मेनका । पितरोंने स्वेच्छासे ही कलावतीका हाथ श्रीहरिके अंशभूत बुद्धिमान् सुचन्द्रके हाथमें दे दिया । रत्नमालाको विदेहराजके हाथमें और मेनकाको हिमालयके हाथमें अर्पित कर दिया । साथ ही विधि पूर्वक दहेजकी वस्तुएँ भी दीं । महामते! रत्नमालासे सीताजी और मेनकाके गर्भसे पार्वतीजी प्रकट हुईं । इन दोनों देवियोंकी कथाएँ पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं । तदनन्तर कलावतीको साथ लेकर महाभाग सुचन्द्र गोमतीके तटपर ' नैमिष ' नामक वनमें गये । उन्होंने ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये तपस्या आरम्भ की । वह तप देवताओंके कालमानसे बारह वर्षोंतक चलता रहा । तदनन्तर ब्रह्माजी वहाँ पधारे और बोले- ' वर माँगो । ' राजाके शरीरपर दीमकें चढ़ गयी थीं । ब्रह्मवाणी सुनकर वे दिव्य रूप धारण करके बाँबीसे बाहर निकले । उन्होंने सर्वप्रथम ब्रह्माजीको प्रणाम किया और कहा - ' मुझे दिव्य परात्पर मोक्ष प्राप्त हो । ' राजाकी बात सुनकर साध्वी रानी कलावतीका मन दुःखी हो गया । अतः उन्होंने

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३६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड ब्रह्माजीसे कहा — ' पितामह! पति ही नारियोंके लिये सर्वोत्कृष्ट देवता माना गया है । यदि ये मेरे पतिदेवता मुक्ति प्राप्त कर रहे हैं तो मेरी क्या गति होगी? इनके बिना मेँ जीवित नहीं रहूँगी । यदि आप इन्हें मोक्ष देंगे तो मैं पतिसाहचर्यमें विक्षेप पड़नेके कारण विह्वल हो आपको शाप दे दूँगी ॥ १४- २२ ॥ ब्रह्माजीने कहा - देवि! मैं तुम्हारे शापके भयसे अवश्य डरता हूँ; किंतु मेरा दिया हुआ वर कभी विफल नहीं हो सकता । इसलिये तुम अपने प्राणपतिके साथ स्वर्गमें जाओ । वहाँ स्वर्गसुख भोगकर कालान्तरमें फिर पृथ्वीपर जन्म लोगी । द्वापरके अन्तमें भारतवर्षमें, गङ्गा और यमुनाके बीच, तुम्हारा जन्म होगा । तुम दोनोंसे जब परिपूर्णतम भगवान्‌की प्रिया साक्षात् श्रीराधिकाजी पुत्री - रूपमें प्रकट होंगी, तब तुम दोनों साथ ही मुक्त हो जाओगे ॥ २३-२४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— इस प्रकार ब्रह्माजीके इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद -दिव्य एवं अमोघ वरसे कलावती और सुचन्द्र – दोनोंकी भूतलपर उत्पत्ति हुई । वे ही ' कीर्ति ' तथा ' श्रीवृषभानु ' हुए हैं । कलावती कान्यकुब्ज देश ( कन्नौज ) में राजा भलन्दनके यज्ञकुण्डसे प्रकट हुईं । उस दिव्य कन्याको अपने पूर्वजन्मकी सारी बातें स्मरण थीं । सुरभानुके घर सुचन्द्रका जन्म हुआ । उस समय वे ' श्रीवृषभानु ' नामसे विख्यात हुए । उन्हें भी पूर्वजन्मकी स्मृति बनी रही । वे गोपोंमें श्रेष्ठ होनेके साथ ही दूसरे कामदेवके समान परम सुन्दर थे । परम बुद्धिमान् नन्दराजजीने इन दोनोंका विवाह सम्बन्ध जोड़ा था । उन दोनोंको पूर्वजन्मकी स्मृति थी ही, अतः वह एक-दूसरेको चाहते भी थे और दोनोंकी इच्छासे ही यह सम्बन्ध हुआ । जो मनुष्य वृषभानु और कलावतीके इस उपाख्यानको श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है और अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके सायुज्यको प्राप्त कर लेता है ॥ २५-३० ॥ बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीराधिकाके पूर्वजन्मका वर्णन ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

नवाँ अध्याय गर्गजीकी आज्ञासे देवकका वसुदेवजीके साथ देवकीका विवाह करना; विदाईके समय आकाशवाणी सुनकर कंसका देवकीको मारनेके लिये उद्यत होना और वसुदेवजीकी शर्तपर उसे जीवित छोड़ना श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! एक समयकी बात है, श्रेष्ठ मथुरापुरीके परम सुन्दर राजभवनमें गर्गजी पधारे । वे ज्यौतिष शास्त्रके बड़े प्रामाणिक विद्वान् थे । सम्पूर्ण श्रेष्ठ यादवोंने शूरसेनकी इच्छासे उन्हें अपने पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित किया था । मथुराके उस राजभवनमें सोनेके किवाड़ लगे थे, उन किवाड़ोंमें हीरे भी जड़े गये थे । राजद्वारपर बड़े - बड़े गजराज झूमते थे । उनके मस्तकपर झुंड के झुंड भोरे आते और उन हाथियोंके बड़े - बड़े कानोंसे आहत होकर गुञ्जारव करते हुए उड़ जाते थे । इस प्रकार वह राजद्वार उन भ्रमरोंके नादसे कोलाहलपूर्ण हो रहा था । गजराजोंके गण्डस्थलसे निर्झरकी भाँति झरते हुए मदकी धारासे वह स्थान समावृत था । अनेक मण्डप -समूह उस राजमन्दिरकी शोभा बढ़ाते थे । बड़े - बड़े उद्भट वीर कवच, धनुष, ढाल और तलवार धारण किये राजभवनकी सुरक्षामें तत्पर थे । रथ, हाथी, घोड़े और पैदल - इस चतुरङ्गिणी सेना तथा माण्डलिकोंकी मण्डलीद्वारा भी वह राजमन्दिर सुरक्षित था ॥ १-३ ॥ मुनिवर गर्गने उस राजभवनमें प्रवेश करके इन्द्रके सदृश उत्तम और ऊँचे सिंहासनपर विराजमान राजा उग्रसेनको देखा । अक्रूर, देवक तथा कंस उनकी सेवामें खड़े थे और राजा छत्रचँदोवेसे सुशोभित थे तथा उनपर चँवर ढुलाये जा रहे थे । मुनिको उपस्थित देख राजा उग्रसेन सहसा सिंहासनसे उठकर खड़े हो

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अध्याय ९ ] गर्गजीकी आज्ञासे देवकका वसुदेवजीके साथ देवकीका विवाह करना ३७ गये । उन्होंने अन्यान्य यादवोंके साथ उन्हें प्रणाम किया और सुभद्रपीठपर बिठाकर उनकी सम्यक् प्रकारसे पूजा की । फिर स्तुति और परिक्रमा करके वे उनके सामने विनीतभावसे खड़े हो गये । गर्ग मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर समस्त राजपरिवारका कुशल - मङ्गल पूछा । फिर उन महामना महर्षिने नीतिवेत्ता यदुश्रेष्ठ देवकसे कहा ॥४-६ ॥ श्रीगर्गजी बोले - राजन्! मैंने बहुत दिनोंतक इधर - उधर ढूँढ़ा और सोचा- विचारा है । मेरी दृष्टिमें वसुदेवजीको छोड़कर भूमण्डलके नरेशोंमें दूसरा कोई देवकीके योग्य वर नहीं है । इसलिये नरदेव! वसुदेवको ही वर बनाकर उन्हें अपनी पुत्री देवकीको सौंप दो और विधिपूर्वक दोनोंका विवाह कर दो ॥ ७ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! गर्गजीके उक्त आदेशको ही शिरोधार्य करके समस्त धर्मधारियों-में श्रेष्ठ श्रीदेवकने सगाईके निश्चयके लिये पानका बीड़ा भेज दिया और गर्गजीकी इच्छासे मङ्गलाचारका सम्पादन करके विवाहमें वसुदेव- वरको अपनी पुत्री अर्पित कर दी । विवाह हो जानेपर विदाईके समय वसुदेवजी घोड़ोंसे सुशोभित अत्यन्त सुन्दर रथपर सुवर्ण - निर्मित एवं रत्नमय आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न नववधू देवकराज -कन्या देवकीके साथ आरूढ़ हुए ॥ ८ - ९ ॥ वसुदेवके प्रति कंसका बहुत ही स्नेह और कृपाभाव था । वह अपनी बहिनका अत्यन्त प्रिय करनेके लिये चतुरङ्गिणी सेनाके साथ आकर गमनोद्यत घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले स्वयं रथ हाँकने लगा । उस समय देवकने अपनी पुत्रीके लिये उत्तम दहेजके रूपमें एक हजार दासियाँ, दस हजार हाथी, दस लाख घोड़े, एक लाख रथ और दो लाख गौएँ प्रदान कीं । उस विदाकालमें भेरी, उत्तम मृदङ्ग, गोमुख, धन्धुरि, वीणा, ढोल और वेणु आदि वाद्योंका और साथ जानेवाले यादवोंका महान् कोलाहल हुआ । उस समय मङ्गलगीत गाये जा रहे थे । और मङ्गलपाठ भी हो रहा था । उसी समय आकाशवाणीने कंसको सम्बोधित करके कहा - ' अरे मूर्ख कंस! घोड़ोंकी बागडोर हाथमें लेकर जिसे रथपर बैठाये लिये जा रहा है, इसीकी आठवीं संतान अनायास ही तेरा वध कर डालेगी - तू इस बातको नहीं जानता । ' कंस सदा दुष्टोंका ही साथ करता था । स्वभावसे भी वह अत्यन्त खल ( दुष्ट ) था । लज्जा तो उसे छू नहीं गयी थी । वह निर्दय होनेके कारण बड़े भयंकर कर्म कर डालता था । उसने तीखी धारवाली तलवार हाथमें उठा ली, बहिन-के केश पकड़ लिये और उसे मारनेका निश्चय कर लिया । उस समय बाजेवालोंने बाजे बंद कर दिये । जो आगे थे, वे चकित होकर पीछे देखने लगे । सबके मुँहपर मुर्दनी छा गयी । ऐसी स्थितिमें सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ श्रीवसुदेवजीने कंससे कहा॥१०–१५ ॥ श्रीवसुदेवजी बोले – भोजेन्द्र! आप इस वंशकी कीर्तिका विस्तार करनेवाले हैं । भौमासुर, जरासंध, बकासुर, वत्सासुर और बाणासुर - सभी योद्धा आपसे लड़नेके लिये युद्धभूमिमें आये; किंतु उन्होंने आपकी प्रशंसा ही की । वे ही आप तलवारसे बहिनका वध करनेको कैसे उद्यत हो गये? बकासुर -की बहिन पूतना आपके पास आकर लड़नेकी इच्छा करने लगी; किंतु आपने राजनीतिके अनुरूप बर्ताव करनेके कारण स्त्री समझकर उसके साथ युद्ध नहीं किया । उस समय शान्ति स्थापनके लिये आपने पूतनाको बहिनके तुल्य बनाकर छोड़ दिया । फिर यह तो आपकी साक्षात् बहिन है । किस विचारसे आप इस अनुचित कृत्यमें लग गये? मथुरानरेश! यह कन्या यहाँ विवाहके शुभ अवसरपर आयी है । आपकी छोटी बहिन है । बालिका है । पुत्रीके समान दयनीय - दयापात्र है । यह सदा आपको सद्भावना प्रदान करती आयी है । अतः इसका वध करना आपके लिये कदापि उचित नहीं है । आपकी चित्तवृत्ति तो दीन - दु: खियोंके दुःख दूर करनेमें ही लगी रहती है॥१६–१८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार वसुदेवजीके समझानेपर भी अत्यन्त खल और कुसङ्गी कंसने उनकी बात नहीं मानी । तब वसुदेवजी, यह भगवान्का विधान है, अथवा कालकी ऐसी ही गति है— यह समझकर भगवत् - शरणापत्र हो, पुनः कंससे बोले ॥ १ ९ ॥ श्रीवसुदेवजीने कहा- राजन्! इस देवकीसे

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३८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड तो आपको कभी भय है नहीं । आकाशवाणीने जो श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश! कंसने कुछ कहा है, उसके विषयमें मेरा विचार सुनिये । वसुदेवजीके निश्चयपूर्वक कहे गये वचनपर विश्वास मेँ इसके गर्भसे उत्पन्न सभी पुत्र आपको दे दूँगा; कर लिया । अतः उनकी प्रशंसा करके वह उसी क्षण क्योंकि उन्हींसे आपको भय है । अतः व्यथित न घरको चला गया । इधर वसुदेवजी भी भयभीत हो होइये ॥ २० ॥ देवकीके साथ अपने भवनको पधारे ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' वसुदेवके विवाहका वर्णन ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

दसवाँ अध्याय कंसके अत्याचार; बलभद्रजीका अवतार तथा व्यासदेवद्वारा उनका स्तवन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! कंसने सोचा, वसुदेवजी भयभीत होकर कहीं भाग न जायँ - ऐसा विचार मनमें आते ही उसने बहुत - से सैनिक भेज दिये । कंसकी आज्ञासे दस हजार शस्त्रधारी सैनिकोंने पहुँचकर वसुदेवजीका घर घेर लिया । वसुदेवजीने यथासमय देवकीके गर्भसे आठ पुत्र उत्पन्न किये, वे क्रमशः एक वर्षके बाद होते गये । फिर उन्होंने एक कन्याको भी जन्म दिया, जो भगवान्‌की सनातनी माया थी । सर्वप्रथम जो पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम कीर्तिमान् था । वसुदेवजी उसे गोदमें उठाकर कंसके पास ले गये । वे दूसरेके प्रयोजनको भी अच्छी तरहसे समझते थे, इसलिये वह बालक उन्होंने कंसको दे दिया । वसुदेवजीको अपने सत्यवचनके पालनमें तत्पर देख कंसको दया आ गयी । साधुपुरुष दुःख सह लेते हैं, परंतु अपनी कही हुई बात मिथ्या नहीं होने देते । सचाई देखकर किसके मनमें क्षमाका भाव उदित नहीं होता? ॥ १-४ ॥ कंसने कहा - वसुदेवजी! यह बालक आपके साथ ही घर लौट जाय, इससे मुझे कोई भय नहीं है । परंतु आप दोनोंका जो आठवाँ गर्भ होगा, उसका वध मैं अवश्य करूँगा — इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ५ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! कंसके यों कहनेपर वसुदेवजी अपने पुत्रके साथ घर लौट आये, परंतु उस दुरात्माके वचनको उन्होंने तनिक भी सत्य नहीं माना । उस समय आकाशसे उतरकर मैं वहाँ गया । उग्रसेनकुमार कंसने मुझे मस्तक झुकाकर मेरा स्वागत - सत्कार किया, और मुझसे देवताओंका अभिप्राय पूछा । उस समय मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह मुझसे सुनो । मैंने कहा - ' नन्द आदि गोप वसुके अवतार हैं और वृषभानु आदि देवताओंके । नरेश्वर कंस! इस व्रजभूमिमें जो गोपियाँ हैं, उनके रूपमें वेदोंकी ऋचाएँ आदि यहाँ निवास करती हैं । मथुरामें वसुदेव आदि जो वृष्णिवंशी हैं, वे सब - के - सब मूलतः देवता ही हैं । देवकी आदि सम्पूर्ण स्त्रियाँ भी निश्चय ही देवाङ्गनाएँ हैं । सात बार गिन लेनेपर सभी अङ्क आठ ही हो जाते हैं । तुम्हारे घातककी संख्यासे गिना जाय तो यह प्रथम बालक भी आठवाँ हो सकता है; क्योंकि देवताओंकी ' वामतो गति ' है॥६–१० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— मिथिलेश्वर! उससे यों कहकर जब मैं चला आया, तब देवताओंद्वारा किये गये दैत्यवधके लिये उद्योगपर कंसको बड़ा क्रोध हुआ । उसने उसी क्षण यादवोंको मार डालनेका विचार किया । उसने वसुदेव और देवकीको मजबूत बेड़ियोंसे बाँधकर कैद कर लिया और देवकीके उस प्रथम- गर्भजनित शिशुको शिलापृष्ठपर रखकर पीस डाला । उसे अपने पूर्वजन्मकी घटनाओंका स्मरण था, अतः भगवान् विष्णुके भयसे तथा अपने दुष्ट स्वभावके कारण भी उसने इस भूतलपर प्रकट हुए देवकीके प्रत्येक बालकको जन्म लेते ही मार डाला । ऐसा करनेमें उसे तनिक भी हिचक नहीं हुई । यह सब

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अध्याय १० ] कंसके अत्याचार; बलभद्रजीका देखकर यदुकुल - नरेश राजा उग्रसेन उस समय कुपित हो उठे । उन्होंने वसुदेवजीकी सहायता की और कंसको अत्याचार करनेसे रोका । कंसके दुष्ट अभिप्रायको प्रत्यक्ष देख महान् यादव वीर उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए । वे उग्रसेनके पीछे रहकर, खड्गहस्त हो उनकी रक्षा करने लगे । उग्रसेनके अनुगामियोंको युद्धके लिये उद्यत देख कंसके निजी वीर सैनिक भी उनका सामना करनेके लिये खड़े हुए । राजसभाके मण्डपमें ही उन दोंनों दलोंका परस्पर युद्ध होने लगा । राजद्वारपर भी उन दोनों दलोंके वीरोंमें परस्पर युद्ध छिड़ गया । वे सब लोग खुलकर एक - दूसरेपर खड्गका प्रहार करने लगे । इस संघर्षमें दस हजार मनुष्य खेत रहे । तदनन्तर कंसने गदा हाथमें लेकर पिताकी सेनाको कुचलना आरम्भ किया । उसकी गदासे छू जानेसे ही कितने ही लोगोंके मस्तक फट गये, कितनोंके पाँव कट गये, नख विदीर्ण हो गये, बाँहें कट गयीं और उनकी आशापर पानी फिर गया । कोई औंधे मुँह और कोई उतान होकर अस्त्र - शस्त्र लिये क्षणभर में धराशायी हो गये । बहुत - से वीर खून उगलते हुए मूच्छित हो कालके गालमें चले गये । वहाँ इतना रक्त प्रवाहित हुआ कि सारा सभामण्डप रँग गया ॥ ११ - २० ॥ राजराजेश्वर! इस प्रकार दुष्ट एवं मदमत्त कंसने कुपित हो उद्भट शत्रुओंको धराशायी करके अपने पिताको कैद कर लिया । उन्हें राजसिंहासनसे उतारकर उस दुष्टने पाशोंसे बाँधा और उनके मित्रोंके साथ उन्हें भी कारागारमें बंद कर दिया । मधु और शूरसेनकी सारी सम्पत्तिओंपर अधिकार करके कंस स्वयं सिंहासनपर जा बैठा और राज्यशासन करने लगा । समस्त पीड़ित यादव सम्बन्धीके घरपर जानेके बहाने तुरंत चारों दिशाओंमें विभिन्न देशोंके भीतर जाकर रहने लगे और उचित अवसरकी प्रतीक्षा करने लगे । देवकीका सातवाँ गर्भ उनके लिये हर्ष और शोक दोनोंकी वृद्धि करनेवाला हुआ, उसमें साक्षात् अनन्त -देव अवतीर्ण हुए थे । योगमायाने देवकीके उस गर्भको खींचकर व्रजमें रोहिणीकी कुक्षिके भीतर पहुँचा दिया । ऐसा हो जानेपर मथुराके लोग खेद प्रकट करते हुए अवतार तथा व्यासदेवद्वारा उनका स्तवन ३ ९ कहने लगे- ' अहो! बेचारी देवकीका गर्भ कहाँ चला गया? कैसे गिर गया? ' व्रजमें उस गर्भको गये पाँच ही दिन बीते थे कि भाद्रपद शुक्ला षष्ठीको, स्वाती नक्षत्रमें, बुधके दिन वसुदेवकी पत्नी रोहिणीके गर्भसे अनन्तदेवका प्राकट्य हुआ । उच्चस्थानमें स्थित पाँच ग्रहों से घिरे हुए तुला लग्न में, दोपहरके समय बालकका जन्म हुआ । उस जन्मवेलामें जब देवता फूल बरसा रहे थे और बादल वारिबिन्दु बिखेर रहे थे, प्रकट हुए अनन्तदेवने अपनी अङ्गकान्तिसे नन्दभवनको उद्भासित कर दिया । नन्दरायजीने भी उस शिशुका जातकर्मसंस्कार करके ब्राह्मणोंको दस लाख गौएँ दान कीं । गोपोंको बुलाकर उत्तम गान - विद्यामें निपुण गायकोंके संगीतके साथ महान् मङ्गलमय उत्सवका आयोजन किया । देवल, देवरात, वसिष्ठ, बृहस्पति और मुझ नारदके साथ आकर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास भी वहाँ बैठे और नन्दजीके दिये हुए पाद्य आदि उपहारोंसे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २१ - ३० ॥ नन्दरायजीने पूछा- महर्षियो! यह सुन्दर बालक कौन है, जिसके समान दूसरा कोई देखनेमें नहीं आता? महामुने! इसका जन्म पाँच ही दिनोंमें कैसे हुआ? यह मुझे बताइये ॥ ३१ ॥

श्रीव्यासजी बोले – नन्द! तुम्हारा अद्भुत सौभाग्य है, इस शिशुके रूपमें साक्षात् सनातन देवता शेषनाग पधारे हैं । पहले तो मथुरापुरीमें वसुदेवसे देवकीके गर्भमें इनका आविर्भाव हुआ । फिर भगवान् श्रीकृष्णकी इच्छासे इनका देवकीके उदरसे कल्याणमयी रोहिणीके गर्भमें आगमन हुआ है । नन्दराय! ये योगियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, किंतु तुम्हें इनका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है । मैं महामुनि वेदव्यास इनके दर्शनके लिये ही यहाँ आया हूँ, अतः तुम शिशुरूप- धारी इन परात्पर देवताका हम सबको दर्शन कराओ ॥ ३२-३४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर नन्दने विस्मित होकर शिशुरूपधारी शेषका उन्हें दर्शन कराया । पालनेमें विराजमान शेषजीका दर्शन करचके सत्यवतीनन्दनने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति की - ॥ ३५ ॥

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४० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड श्रीव्यासजी बोले- भगवन्! आप देवताओंके भी अधिदेवता और कामपाल ( सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाले ) हैं, आपको नमस्कार है । आप साक्षात् अनन्तदेव शेषनाग हैं, बलराम हैं; आपको मेरा प्रणाम है । आप धरणीधर, पूर्णस्वरूप, स्वयंप्रकाश, हाथमें हल धारण करनेवाले, सहस्र मस्तकोंसे सुशोभित तथा संकर्षणदेव हैं, आपको नमस्कार है । रेवती-रमण! आप ही बलदेव तथा श्रीकृष्णके अग्रज हैं । हलायुध एवं प्रलम्बासुरके नाशक हैं । पुरुषोत्तम! आप मेरी रक्षा कीजिये । आप बल, बलभद्र तथा तालके चिह्नसे युक्त ध्वजा धारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है । आप नीलवस्त्रधारी, गौरवर्ण तथा रोहिणीके सुपुत्र हैं; आपको मेरा प्रणाम है । आप ही धेनुक, मुष्टिक, कुम्भाण्ड, रुक्मी, कूपकर्ण, कूट तथा बल्वलके शत्रु हैं । कालिन्दीकी धाराको मोड़नेवाले और हस्तिनापुरको गङ्गाकी ओर आकर्षित करनेवाले आप ही हैं । आप द्विविदके विनाशक, यादवोंके स्वामी तथा व्रजमण्डलके मण्डन ( भूषण ) हैं । आप कंसके भाइयोंका वध करनेवाले तथा तीर्थयात्रा करनेवाले प्रभु हैं । दुर्योधनके गुरु भी साक्षात् आप ही हैं । प्रभो! जगत्‌की रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परात्पर देवता साक्षात् अनन्त! आपकी जय हो, जय हो । आपका सुयश समस्त दिगन्तमें व्याप्त है । आप सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और फणीन्द्रोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं । मुसलधारी, हलधर तथा बलवान् हैं; आपको नमस्कार है । जो इस जगत् में सदा ही इस स्तवनका पाठ करेगा, वह श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होगा । संसारमें उसे शत्रुओंका संहार करनेवाला सम्पूर्ण बल प्राप्त होगा । उसकी सदा जय होगी और वह प्रचुर धनका स्वामी होगा * ॥ ३६–४४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! पराशरनन्दन विशाल - बुद्धि बादरायण मुनि सत्यवतीकुमार श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास उन मुनियोंके साथ बलरामजीको सौ बार प्रणाम और परिक्रमा करके सरस्वती नदीके तटपर चले गये ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' बलभद्रजीके जन्मका वर्णन ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

' श्रीव्यास उवाच -देवाधिदेव भगवन् कामपाल नमोऽस्तु ते । नमोऽनन्ताय शेषाय साक्षाद्रामाय ते नमः ॥

धराधराय पूर्णा स्वधाम्ने सीरपाणये । सहस्रशिरसे नित्यं नमः संकर्षणाय ते ॥

रेवतीरमण त्वं वै बलदेवोऽच्युताग्रजः । हलायुधः प्रलम्बघ्नः पाहि मां पुरुषोत्तम ॥

बलाय बलभद्राय तालाङ्काय नमो नमः । नीलाम्बराय गौराय रौहिणेयाय ते नमः ॥

धेनुकारिर्मुष्टिकारिः कुम्भाण्डारिस्त्वमेव हि । रुक्मयरिः कूपकर्णारिः कूटारिर्बल्वलान्तकः ॥ कालिन्दीभेदनोऽसि त्वं हस्तिनापुरकर्षकः । द्विविदारिर्यादवेन्द्रो व्रजमण्डलमण्डनः ॥ कंस भ्रातृप्रहन्तासि तीर्थयात्राकरः प्रभुः । दुर्योधनगुरुः साक्षात् पाहि पाहि प्रभो जगत् ॥

जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुत ।

सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवराय ते मुसलिने बलिने हलिने नमः ॥

इह पठेत्सततं स्तवनं तु यः स तु हरेः परमं पदमाव्रजेत् ।

जगति सर्वबलं त्वरिमर्दनं भवति तस्य जयः स्वधनं धनम् ॥

( गर्ग ०, गोलोक ० १० । ३६–४४ )

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ग्यारहवाँ अध्याय भगवान्‌का वसुदेव - देवकीमें आवेश; देवताओंद्वारा उनका स्तवन; आविर्भावकाल; अवतार - विग्रहकी झाँकी; वसुदेव - देवकीकृत भगवत् - स्तवन; भगवान्द्वारा उनके पूर्वजन्मके वृत्तान्तवर्णनपूर्वक अपनेको नन्दभवनमें पहुँचानेका आदेश; कंसद्वारा नन्दकन्या योगमायासे कृष्णके प्राकट्यकी बात जानकर पश्चात्तापपूर्वक वसुदेव - देवकीको बन्धनमुक्त करना, क्षमा माँगना और दैत्योंको बाल - वधका आदेश देना श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! तदनन्तर परात्पर एवं परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण पहले वसुदेवजीके मनमें आविष्ट हुए । भगवान्‌का आवेश होते ही महामना वसुदेव सूर्य, चन्द्रमा और अग्रिके समान महान् तेजसे उद्भासित हो उठे, मानो उनके रूपमें दूसरे यज्ञनारायण ही प्रकट हो गये हों । फिर सबको अभय देनेवाले श्रीकृष्ण देवी देवकीके गर्भमें आविष्ट हुए । इससे उस कारागृहमें देवकी उसी तरह दिव्य दीप्तिसे दमक उठीं, जैसे घनमालामें चपला चमक उठती है । देवकीके उस तेजस्वी रूपको देखकर कंस मन - ही - मन भयसे व्याकुल होकर बोला- ' यह मेरा प्राणहन्ता आ गया; क्योंकि इसके पहले यह ऐसी तेजस्विनी नहीं थी । इस शिशुको जन्म लेते ही मैं अवश्य मार डालूँगा । ' यों कहकर वह भयसे विह्वल हो उस बालकके जन्मकी प्रतीक्षा करने लगा । भयके कारण अपने पूर्वशत्रु भगवान् विष्णुका चिन्तन करते हुए वह सर्वत्र उन्हींको देखने लगा । अहो! दृढ़तापूर्वक वैर बँध जानेसे भगवान् कृष्णका भी प्रत्यक्षकी भाँति दर्शन होने लगता है । इसलिये असुर श्रीकृष्णकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही उनके साथ वैर करते हैं । जब भगवान् गर्भमें आविष्ट हुए, तब ब्रह्मादि देवता तथा अस्मदादि ( नारद - प्रभृति ) मुनीश्वर वसुदेवके गृहके ऊपर आकाशमें स्थित हो, भगवान्‌को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे ॥ देवता बोले- जाग्रत्, स्वप्न आदि में प्रतीत होनेवाले विश्वके जो एकमात्र भी अहेतु हैं, जिनके गुणोंका आश्रय प्राणिसमुदाय सब ओर विचरते हैं तथा निकलकर सब ओर फैले हुए ( चिनगारियाँ ) पुनः उसमें प्रवेश नहीं १-७ ॥ अवस्थाओं-हेतु होते हुए लेकर ही ये जैसे अग्निसे विस्फुलिङ्ग करते, उसी प्रकार महत्तत्त्व, इन्द्रियवर्ग तथा उनके अधिष्ठाता देव-समुदाय जिनसे प्रकट हो पुनः उनमें प्रवेश नहीं पाते, उन परमात्मा आप भगवान् श्रीकृष्णको हमारा सादर नमस्कार है । बलवानों में भी सबसे अधिक बलिष्ठ यह काल भी जिनपर शासन करनेमें समर्थ नहीं है, माया भी जिनपर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती तथा नित्यशब्द ( वेद ) जिनको अपना विषय नहीं बना पाता, उन परम अमृत, प्रशान्त, शुद्ध, परात्पर पूर्ण ब्रह्मस्वरूप आप भगवान्‌की हम शरणमें आये हैं । जिन परमेश्वरके अंशावतार, अंशांशावतार, कलावतार, आवेशावतार तथा पूर्णावतारसहित विभिन्न अवतारोंद्वारा इस विश्वके सृष्टिपालन आदि कार्य सम्पादित होते हैं, उन्हीं पूर्णसे भी परे परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णको हम प्रणाम करते हैं । प्रभो! अतीत, वर्तमान और अनागत ( भविष्य ) मन्वन्तरों, युगों तथा कल्पोंमें आप अपने अंश और कलाद्वारा अवतार - विग्रह धारण करते हैं । किंतु आज ही वह सौभाग्यपूर्ण अवसर आया है, जब कि आप अपने परिपूर्णतम धाम ( तेजःपुञ्ज ) का यहाँ विस्तार कर रहे हैं! अब इस परिपूर्णतम अवतारद्वारा भूतलपर धर्मकी स्थापना करके आप लोकमें मङ्गल ( कल्याण ) का प्रसार करेंगे । आनन्दकंद! देवकीनन्दन! आपकी जो चरणरज विशुद्ध अन्तःकरणवाले योगियोंके लिये भी दुर्लभ और अगम्य है, वही उन बड़भागी भक्तोंके लिये परम सुलभ है, जो अपने निर्मल हृदयमें भक्तियोग धारण करके, सदा प्रीतिरसमें निमग्न हो, द्रवित - चित्त रहते हैं । शिशुरूपमें मन्द मन्द विचरनेवाले आपके चरणारविन्दोंके मकरन्द एवं परागको हम सानुराग सिरपर धारण करें, यही हमारी आन्तरिक अभिलाषा है । आप पहलेसे ही परम कमनीय कलेवरधारी हैं

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४२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड और यहाँ इस अवतारमें भी उसी कमनीय रूपसे आप सुशोभित होंगे । आपका रूप कोटिशत कामदेवोंको भी मोहित करनेवाला और परम अद्भुत है । आप गोलोकधाममें धारित दिव्य दीप्ति - राशिको यहाँ भी धारण करेंगे । सर्वोत्कृष्ट धर्मधनके धारयिता आप श्रीराधावल्लभको हम प्रणाम करते हैं * ॥८- १३ ॥ उस समय मुनियोंसहित ब्रह्मा आदि सब देवता श्रीहरिको नमस्कार करके उनकी महिमाका गान तथा स्वभावकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने - अपने धामको चले गये । मिथिला- सम्राट् बहुलाश्व! तदनन्तर जब श्रीहरिके प्राकट्यका समय आया, आकाश स्वच्छ हो गया । दसों दिशाएँ निर्मल हो गयीं । तारे अत्यन्त उद्दीप्त हो उठे । भूमण्डलमें प्रसन्नता छा गयी । नदी, नद, सरोवर और समुद्रके जल स्वच्छ हो गये । सब ओर सहस्रदल तथा शतदल कमल खिल उठे । वायुके स्पर्शसे उनके सुगन्धयुक्त पराग सब दिशाओंमें फैलने लगे । उन कमलोंपर भ्रमर गुंजार करने लगे । शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु बहने लगी । जनपद और ग्राम सुख - सुविधासे सम्पन्न हो गये । बड़े - बड़े नगर तो मङ्गलके धाम बन गये । देवता, ब्रह्मण, पर्वत, वृक्ष और गौएँ - सभी सुख - सामग्रीसे परिपूर्ण हो गये । देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । साथ ही जय - जयकारकी ध्वनि सब ओर व्याप्त हो गयी । महाराज! जहाँ - तहाँ सब जगह सबका परम मङ्गल हो गया । गायन - कलामें निपुण विद्याधर, गन्धर्व, सिद्ध, किंनर तथा चारण गीत गाने लगे । देवता लोग स्तोत्र पढ़कर उन परम पुरुषका स्तवन करने लगे । देवलोकमें गन्धर्व तथा विद्याधरियाँ आनन्दमग्न होकर नाचने लगीं । मुख्य - मुख्य देवता पारिजात, मन्दार तथा मालतीके मनोरम फूल बरसाने लगे और मेघ गर्जना करते हुए जलकी वृष्टि करने लगे । भाद्रपद मास, कृष्णपक्ष, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग तथा वृष लग्नमें अष्टमी तिथिको आधी रातके समय चन्द्रोदय - कालमें, जब कि जगत्में अन्धकार छा रहा था, वसुदेव - मन्दिरमें देवकीके गर्भसे साक्षात् श्रीहरि प्रकट हुए - ठीक उसी तरह, जैसे अरणिकाष्ठसे अग्निका आविर्भाव होता है ॥ १४–२४ ॥ कण्ठमें प्रकाशमान स्वच्छ एवं विचित्र मुक्ताहार, वक्षपर शोभा - प्रभा - समन्वित सुन्दर कौस्तुभ मणि तथा रत्नोंकी माला, चरणोंमें नूपुर तथा बाहोंमें बाजूबंद धारण किये भगवान् मण्डलाकार प्रभापुञ्जसे उद्भासित हो रहे थे । मस्तकपर किरीट तथा कानोंमें कुण्डल - युगल बालरविके सदृश उद्दीप्त हो रहे थे । कलाइयोंमें प्रज्वलित अग्नि के समान कान्तिमान् अद्भुत कङ्कण हिल रहे थे । कटिकी करधनीमें जो डोर या जंजीर लगी थी, उसकी प्रभा विद्युत् के समान सब ओर व्याप्त हो रही थी । कण्ठदेशमें कमलोंकी माला शोभा पाती थी, जिसके ऊपर मधु - लोलुप मधुकर मँडरा रहे थे । उनके श्रीअङ्गपर जो दिव्य पीतवस्त्र था, वह नूतन ( तपाये हुए ) जाम्बूनद ( सुवर्ण ) की शोभाको तिरस्कृत कर रहा

* यज्जागरादिषु भवेषु परं ह्यहेतुर्हेतुः स्विदस्य विचरन्ति गुणाश्रयेण ।

नैतद् विशन्ति महदिन्द्रियदेवसंघास्तस्मै नमोऽग्निमिव विस्तृतविस्फुलिङ्गाः ॥

नैवेशितुं प्रभुरयं बलिनां बलीयान् माया न शब्द उत नो विषयी करोति ।

तद्ब्रह्म पूर्णममृतं परमं प्रशान्तं शुद्धं परात्परतरं शरणं गताः स्मः ॥

अंशांशकांशकलाद्यवतार वृन्दैरावेशपूर्णसहितैश्च परस्य यस्य ।

सर्गादयः किल भवन्ति तमेव कृष्णं पूर्णात्परं तु परिपूर्णतमं नताः स्मः ॥

मन्वन्तरेषु च युगेषु गतागतेषु कल्पेषु चांशकलया स्ववपुर्बिभर्षि ।

अद्यैव धाम परिपूर्णतमं तनोषि धर्मं विधाय भुवि मङ्गलमातनोषि ॥

यद्दुर्लभं विशदयोगिभिरप्यगम्यं गम्यं द्रवद्भिरमलाशयभक्तियोगैः ।

आनन्दकंद चरतस्तव मन्दयानपादारविन्दमकरन्दरजो दधामः ॥

पूर्व तथात्र कमनीयवपुष्मयं त्वां कंदर्पकोटिशतमोहनमद्भुतं च ।

गोलोकधामधिषणद्युतिमादधानं राधापतिं धरमधुर्यधनं दधानम् ॥

( गर्ग ०, गोलोक ० ११। ८–१३ )

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अध्याय ११ ] भगवान्‌का वसुदेव - देवकीमें आवेश; देवताओंद्वारा उनका स्तवन ४३ था । श्यामसुन्दर विग्रहपर सुशोभित वह पीताम्बर विद्युद्विलाससे विलसित नीलमेघके सौभाग्यपूर्ण सौन्दर्यको छीने लेता था । मुखके ऊपर शिरोदेशमें काले - काले घुँघराले केश शोभा पाते थे । मुखचन्द्रकी चञ्चल रश्मियाँ वहाँका सम्पूर्ण अन्धकार दूर किये देती थीं । वह परम सुन्दर शुभद आनन प्रफुल्ल इन्दीवर - सदृश युगल नेत्रोंसे सुशोभित था । उसपर विचित्र रीतिसे मनोहर पत्ररचना की गयी थी, जिससे मण्डित अभिराम मुख सदैव करोड़ों कामदेवोंको मोहे लेता था । वे परिपूर्णतम परात्पर भगवान् मधुर ध्वनिसे वेणु बजानेमें तत्पर थे * ॥ २५ - २८ ॥ ऐसे पुत्रका अवलोकन करके यदुकुलतिलक वसुदेवजीके नेत्र भगवान्‌ के जन्मोत्सवजनित आनन्दसे खिल उठे । फिर उन्होंने शीघ्र ही ब्राह्मणोंको एक लाख गो - दान करनेका मन - ही - मन संकल्प किया । सूतिकागारमें प्रभुका आविर्भाव प्रत्यक्ष हो गया, इससे वसुदेवजीका सारा भय जाता रहा । वे अत्यन्त विस्मित हो, हाथ जोड़कर आदि - अन्तरहित श्रीहरिको स्तोत्रोंद्वारा उनका स्तवन करने लगे ॥ श्रीवसुदेवजी बोले- भगवन्! अद्वितीय हैं, वे ही परब्रह्म परमात्मा सत्त्वादि गुणोंके कारण अनेक रूपोंमें आप ही संहारक, आप ही उत्पादक इस जगत्के पालक हैं । हे आदिदेव! प्रणाम करके, २ ९ -३० ॥ जो एकमात्र आप प्रकृतिके प्रतीत होते हैं । तथा आप ही हे त्रिभुवनपते परमात्मन्! जैसे स्फटिकमणि औपाधिक रंगोंसे लिप्त नहीं होती, उसी प्रकार आप देहके वर्णोंसे निर्लिप्त ही रहते हैं । ऐसे आप परमेश्वरको मेरा नमस्कार है ॥ ३१ ॥

जैसे ईंधनमें आग छिपी रहती है, उसी तरह आप अव्यक्तरूपसे इस सम्पूर्ण जगत् में विद्यमान हैं; तथा जैसे आकाश सबके भीतर और बाहर भी रहता है, उसी प्रकार आप सबके भीतर और बाहर भी स्थित हैं । आप ही पृथ्वीकी भाँति इस समस्त जगत्‌के आधार हैं, सबके साक्षी हैं तथा वायुकी भाँति सर्वत्र जानेकी शक्ति रखते हैं । आप गौ, देवता, ब्राह्मण, अपने भक्तजन तथा बछड़ोंके पालक हैं और उद्भट भूभारका हरण करनेके लिये ही मेरे घरमें अवतीर्ण हुए हैं । इस भूतलपर समस्त पुरुषोंत्तमोंसे भी उत्तम आप ही हैं । भुवनपते! पापी कंससे मुझे बचाइये ॥३२-३३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलापते! सर्व-देवतास्वरूपिणी देवकीको भी यह ज्ञात हो गया कि मेरे घरमें परिपूर्णतम भगवान् साक्षात् श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका आविर्भाव हुआ है । अतः वे भी उन्हें नमस्कार करके बोलीं ॥ ३४ ॥

देवकीने कहा- हे सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्ण! हे अगणित ब्रह्माण्डोंके स्वामी! हे परमेश्वर! हे गोलोक-धाममन्दिरकी ध्वजा! हे आदिदेव! हे पूर्णरूप ईश्वर! हे परिपूर्णतम परमेश! हे प्रभो! आप पापी कंसके * स्फुरदच्छविचित्रहारिणं विलसत्कौस्तुभरत्नहारिणम् । चलदद्भुतवह्निकङ्कणं चलदूर्जद्गुणमेखलाचितम् । सतडिद्घनदिव्यसौभगं चलनीलालकवृन्दभृन्मुखम् । कृतपत्रविचित्रमण्डनं सततं कोटिमनोजमोहनम् । + श्रीवसुदेव उवाच-एको यः प्रकृतिगुणैरनेकधासि हर्ता त्वं परिधिद्युतिनूपुराङ्गदं धृतबालार्क किरीटकुण्डलम् ॥ मधुभृद्ध्वनिपद्ममालिनं नवजाम्बूनददिव्यवाससम् ॥ चलदंशुतमोहरं परं शुभदं सुन्दरमम्बुजेक्षणम् ॥ परिपूर्णतमं परात्परं कलवेणुध्वनिवाद्यतत्परम् ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० ११ । २५-२८ )

जनक उतास्य पालकस्त्वम् ।

निर्लिप्तः स्फटिक इवाद्य देहवर्णस्तस्मै श्रीभुवनपते नमामि तुभ्यम् ॥

एधस्सु त्वनल इवात्र वर्तमानो योऽन्तःस्थो बहिरपि चाम्बरं यथा हि ।

आधारो धरणिरिवास्य सर्वसाक्षी तस्मै ते नम इव सर्वगो नभस्वान् ॥

भूभारोद्भहरणार्थमेव जातो गोदेवद्विजनिजवत्सपालकोऽसि ।

गेहे मे भुवि पुरुषोत्तमोत्तमस्त्वं कंसान्मां भुवनपते प्रपाहि पापात् ॥

( गर्ग ०, गोलोक ० ११ । ३१-३३ )

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४४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड भयसे मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये * ॥३५ ॥ गये । पहरेदार भी नींद लेने लगे । सारे दरवाजे मानो

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! पिता - माताकी किसीने खोल दिये । साँकल और अर्गलाएँ टूट - फूट ओरसे किया गया वह स्तवन सुनकर पापनाशन साक्षात् गयीं । श्रीकृष्णको माथेपर लिये जब वसुदेवजी गृहसे परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण मन्द मन्द मुस्कराते हुए देवकी तथा वसुदेवजीसे बोले —॥३६ ॥

श्रीभगवान् ने कहा – पूर्वसृष्टिमें ये माता पतिव्रता पृश्नि थीं और आप प्रजापति सुतपा । आप दोनोंने संतानके लिये ब्रह्माजीकी आज्ञासे अन्न और जलका त्याग करके बड़ी भारी तपस्या की थी । एक मन्वन्तरका समय बीत जानेपर भी प्रजाकी कामनासे आपकी तपस्या चलती रही, तब मैं आप दोनोंपर प्रसन्न होकर बोला- ' आपलोग कोई उत्तम वर माँग लें । ' मेरी बात सुनकर आप तत्काल बोले- ' प्रभो! हम दोनोंको आपके समान पुत्र प्राप्त हो । ' उस समय ' तथास्तु ' कहकर जब मैं चला आया, तब आप दोनों दम्पति अपने पुण्यकर्मके फलस्वरूप प्रजापति हुए । संसारमें मेरे समान तो कोई पुत्र है नहीं - यह विचारकर मैं स्वयं परमेश्वर ही आपका पुत्र हुआ । उस समय भूतलपर मैं ' पृश्नगिर्भ ' नामसे विख्यात हुआ । फिर दूसरे जन्ममें जब आप कश्यप और अदिति हुए, तब मैं आपका पुत्र वामन आकारवाला उपेन्द्र हुआ । उसी प्रकार इस वर्तमान जन्ममें भी मैं परात्पर परमेश्वर आप दोनोंका पुत्र हुआ हूँ । पिताजी! अब आप मुझे नन्दभवनमें पहुँचा दें । इससे आप दोनोंको कंससे कोई भय नहीं होगा । नन्दरायकी पुत्रीको यहाँ ले आकर आप सुखी होइयेगा ॥ ३७–४१ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर भगवान् वहाँ मौन हो, उन दोनोंके देखते - देखते वर्तमान स्वरूपको अदृश्य करके, बालरूप हो पृथ्वीपर पड़ गये – जैसे किसी नटने क्षणभरमें वेष- परिवर्तन कर लिया हो । शिशुको पालनेमें सुलाकर ज्यों ही वसुदेवजी ले जानेको उद्यत हुए, त्यों - ही महावनमें नन्दपत्नीके गर्भसे योगमायाने स्वतः जन्मग्रहण किया । उसीके प्रभावसे सब लोग सो बाहर निकले, उस समय उनके भीतरका अज्ञान और बाहरका अँधेरा स्वतः दूर हो गया- ठीक उसी तरह, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका तत्काल नाश हो जाता है । आकाशमें बादल घिर आये और वे जलकी वृष्टि करने लगे । तब सहस्र मुखवाले स्वयंप्रकाश शेषनाग अपने फनोंसे छत्रछाया करके गिरती हुई जलकी धाराओंका निवारण करते हुए उनके पीछे - पीछे चलने लगे । उस समय यमुनामें जलके वेगसे बहनेके कारण ऊँची लहरें उठतीं और भँवरें पड़ रही थीं । वे सिंह और सर्पादि जन्तुओंको भी बहाये लिये जाती थीं; किंतु सरिताओंमें श्रेष्ठ उन कलिन्दनन्दिनी यमुनाने वसुदेवजीको तत्काल मार्ग दे दिया । नन्दरायजीका सारा व्रज गाढ़ी नींदमें सो रहा था । वहाँ पहुँचकर वसुदेवजीने अपने परम शिशुको यशोदाजीकी शय्यापर शीघ्र सुलाकर उस दिव्य कन्याको देखा । यशोदाजीकी उस कन्याको गोदमें लेकर वसुदेवजी पुनः अपने घर लौट आये । वे यमुनाजीको पार करके पूर्ववत् अपने घरमें स्थित हो गये ॥ ४२ - ४ ९ ॥ उधर गोपी यशोदाको इतना ही ज्ञात हुआ कि उसे कोई पुत्र या पुत्री हुई है । वे प्रसव वेदनाके श्रमसे अत्यन्त थकी होनेके कारण अपनी शय्यापर आनन्दकी नींद लेती हुई सो गयी थीं । इधर बालकके रोनेकी आवाज सुनकर पहरेदार राजभवनमें उपस्थित हुए और जाकर वीर कंसको बालकके जन्मनेकी सूचना दी । यह समाचार कानमें पड़ते ही कंस भयसे कातर हो तुरंत सूतीगृहमें जा पहुँचा । उस समय सती - साध्वी बहिन देवकी दीनकी तरह रोती हुई भाईसे बोलीं ॥ ५०–५२ ॥ देवकीने कहा- भैया! आप दीन दुःखियोंके प्रति स्नेह और दया करनेवाले हैं । मैं आपकी बहिन हूँ, तथापि कारागारमें डाल दी गयी हूँ । मेरे सभी पुत्र मार डाले गये हैं । मैं वह अभागिनी माँ हूँ, जिसके

* हे कृष्ण हेऽविगणिताण्डपते परेश गोलोकधामधिषणध्वज आदिदेव ।

पूर्णेश पूर्ण परिपूर्णतम प्रभो मां त्वं पाहि पाहि परमेश्वर कंसपापात् ॥

( गर्ग ०, गोलोक ०, ११।३५ )