गर्ग संहिता — पृष्ठ 51–60
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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अध्याय ११ ] भगवान्का वसुदेव - देवकीमें आवेश; देवताओंद्वारा उनका स्तवन ४५ बेटोंका वध कर दिया गया है । एकमात्र यह बेटी बची है, इसे मुझे भीखमें दे दीजिये । यह स्त्री है, इसका वध करना आप - जैसे वीरके योग्य नहीं है । कल्याणकारी भाई! इस कल्याणी कन्याको तो मेरी गोदमें दे ही दीजिये । यही आपके योग्य कार्य होगा ॥ ५३-५४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! देवकीके मुँहपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । उसने मोहके कारण बेटीको आँचलमें छिपाकर बहुत विनती की - वह बहुत रोयी - गिड़गिड़ायी; तो भी उस दुष्टने बहिनको डाँट - डपटकर उसकी गोदसे वह कन्या छीन ली । वह यदुकुलका कलङ्क एवं महानीच था । सदा कुसङ्गमें रहनेके कारण उसका जीवन पापमय हो गया था । उस दुरात्माने अपनी बहिनकी बच्चीके दोनों पैर पकड़कर उसे शिलापर मारा । वह कन्या साक्षात् योगमायाका अवतार देवी अनंशा थी । कंसके हाथसे छूटते ही वह उछलकर आकाशमें चली गयी । सहस्र अश्वोंसे जुते हुए दिव्य ' शतपत्र ' रथपर जा बैठी । वहाँ चँवर डुलाये जा रहे थे । उस शुभ्र रथपर बैठकर वह दिव्य रूप धारण किये दृष्टिगोचर हुई । उसके आठ भुजाएँ थीं और सबमें आयुध शोभा पा रहे थे । वह मायादेवी अपने पार्षदोंसे परिसेवित थी । उसका तेज सौ सूर्योंके समान दिखायी देता था । उसने मेघगर्जनातुल्य गम्भीर वाणीमें कहा ॥ ५५–५८ ॥ श्रीयोगमाया बोलीं – कंस! तुझे मारनेवाले परिपूर्णतम परमात्मा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण तो कहीं और जगह अवतीर्ण हो गये । इस दीन देवकीको तू व्यर्थ दुःख दे रहा है ॥ ५ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! उससे यों कहकर भगवती योगमाया विन्ध्यपर्वतपर चली गयीं । वहाँ वे अनेक नामोंसे प्रसिद्ध हुईं । योगमायाकी उत्तम बात सुनकर कंसको बड़ा आश्चर्य हुआ । उसने देवकी और वसुदेवको तत्काल बन्धनमुक्त कर दिया ॥ ६० - ६१ ॥ कंसने कहा—- बहिन और बहनोई वसुदेवजी! मैं पापात्मा हूँ । मेरे कर्म पापमय हैं । मैं इस यदुवंशमें महानीच और दुष्ट हूँ । मैं ही इस भूतलपर आप दोनोंके पुत्रोंका हत्यारा हूँ । आप दोनों मेरे द्वारा किये गये इस अपराधको क्षमा कर दें । मेरी बात सुनें । मैं समझता हूँ, यह सब कालने किया - कराया है । जैसे वायु मेघमालाको जहाँ चाहे उड़ा ले जाती है, उसी तरह कालने मुझे भी स्वेच्छानुसार चलाया है । मैंने देव-वाक्यपर विश्वास कर लिया, किंतु देवता भी असत्य-वादी ही निकले । इस योगमायाने बताया है कि ' तेरा शत्रु भूतलपर अवतीर्ण हो गया है ' । किंतु वह कहाँ उत्पन्न हुआ है, यह मैं नहीं जानता ॥ ६२-६४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर कंस बहिन और बहनोईके चरणोंपर गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा । उसके मुँहपर अश्रुधारा बह चली । उसने उन दोनोंके प्रति सौहार्द ( अत्यन्त स्नेह ) दिखाते हुए उनकी बड़ी सेवा की । अहो! परिपूर्णतम प्रभु श्रीकृष्णचन्द्रके दया- दान - दक्ष कटाक्षोंसे भूतलपर क्या नहीं हो सकता? तदनन्तर प्रातः काल दुरात्मा कंसने प्रलम्ब आदि बड़े - बड़े असुरोंको बुलाया और योगमायाने जो कुछ कहा था, वह सब उनसे कह सुनाया ॥ ६५–६७ ॥ कंसने कहा- मित्रो! जैसा कि योगमायाने बताया है, मेरा विनाश करनेवाला शत्रु पृथ्वीपर कहीं उत्पन्न हो चुका है । अतः तुमलोग जो दस दिनके भीतर उत्पन्न हुए हैं और जिनको जन्म लिये दससे अधिक दिन निकल गये हैं, उन समस्त बालकोंको मार डालो ॥ ६८ ॥
दैत्योंने कहा - महाराज! जब आप द्वन्द्व - युद्धमें उतरे थे, उस समय रणभूमिमें आपके चढ़ाये हुए धनुषकी टंकार सुनकर सब देवता भाग खड़े हुए थे, फिर उन्हींसे आप भय क्यों मान रहे हैं? गौ, ब्राह्मण, साधु, वेद, देवता तथा धर्म और यज्ञ आदि जो दूसरे दूसरे तत्त्व हैं, वे ही भगवान् विष्णुके शरीर माने गये हैं; इन सबके विनाशमें दैत्योंका बल ही समर्थ माना गया है । यदि महाविष्णु, जो आपका शत्रु है, इस पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ है तो उसके वधका यही उपाय है कि गौ - ब्राह्मण आदिकी विशेषरूपसे हिंसाका अभियान चलाया जाय ॥ ६ ९ –७१ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! कंसने दैत्योंको यह करनेकी आज्ञा दे दी । इस प्रकार उसका आदेश पाकर वे महान् उद्भट दुष्ट दैत्य आकाशमें उड़ चले
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४६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड और गौ, ब्राह्मण आदिको पीड़ा देने तथा नवजात बालकोंकी हत्या करने लगे । समुद्रपर्यन्त समस्त भूमण्डलमें वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दैत्य सर्पों और चूहोंकी तरह घर - घरमें घुसने और विचरने लगे । उद्भट दैत्य तो स्वभावसे ही कुमार्गगामी होते हैं, उसपर भी उन्हें कंसकी ओरसे प्रेरणा प्राप्त हो गयी थी । एक तो बंदर, फिर वह शराब पी ले और उसपर भी उसे बिच्छु डंक मार दे तो उसकी चपलताके लिये क्या कहना? यही दशा उन दैत्योंकी थी, वे भूतग्रस्तसे हो गये थे । विदेहकुलनन्दन, मैथिलनरेश, विष्णुभक्त, धर्मात्माओंमें मुख्य, परम तपस्वी, प्रतापी, अङ्गराज, बहुलाश्व जनक! भूमण्डलपर साधु - संतोंकी यह अवहेलना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थीका सम्पूर्णतया नाश कर देती है ॥ ७२–७५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्ण - जन्म - वृत्तान्तका वर्णन ' नामक ग्यारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
बारहवाँ अध्याय श्रीकृष्ण जन्मोत्सवकी धूम; गोप - गोपियोंका उपायन लेकर आना; नन्द और यशोदा- रोहिणीद्वारा सबका यथावत् सत्कार; ब्रह्मादि देवताओंका भी श्रीकृष्णदर्शनके लिये आगमन श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर गोष्ठमें विद्यमान नन्दजीने अपने घरमें पुत्रोत्सव होनेका समाचार सुनकर प्रातःकाल ब्राह्मणोंको बुलवाया और स्वस्तिवाचनपूर्वक मङ्गल - कार्य कराया । विधिपूर्वक जातकर्म - संस्कार सम्पन्न करके महामनस्वी नन्दराजने ब्राह्मणोंको आनन्दपूर्वक दक्षिणा देनेके साथ ही एक लाख गौएँ दान कीं । एक कोस लंबी भूमिमें सप्त-धान्योंके पर्वत खड़े किये गये । उनकै शिखर रत्नों और सुवर्णोंसे सज्जित किये गये । उनके साथ सरस एवं स्निग्ध पदार्थ भी थे । वे सब पर्वत नन्दजीने विनीतभावसे ब्राह्मणोंको दिये । मृदङ्ग, वीणा, शङ्ख और दुन्दुभि आदि बाजे बारंबार बजाये जाने लगे । नन्दद्वारपर गायक मङ्गल - गीत गाने लगे । वाराङ्गनाएँ नृत्य करने लगीं । पताकाओं, सोनेके कलशों, चंदोवों, सुन्दर बंदनवारों तथा अनेक रंगके चित्रोंसे नन्द - मन्दिर उद्भासित होने लगा । सड़कें, गलियाँ, द्वार - देहलियाँ, दीवारें, आँगन और वेदियाँ ( चबूतरे ) - इनपर सुगन्धित जलका छिड़काव करके सब ओरसे वस्त्रों और झंडियोंद्वारा सजावट कर दी गयी थी, जिससे ये सब चित्रमण्डप या चित्रशालाके समान शोभा पा रहे थे । गौओंके सींगोंमें सोना मढ़ दिया गया था । उनके गलेमें सुवर्णकी माला पहना दी गयी घंटी और पैरोंमें मञ्जीरकी झंकार पीठपर कुछ - कुछ लाल रंगकी झूलें इस प्रकार समस्त गौओंका शृङ्गार उनकी पूँछें पीले रंगमें रँग दी गयी बछड़े भी थे, उनके अङ्गोंपर तरुणी छाप लगी थी । हल्दी, कुङ्कुम तथा थी । उनके गलेमें होती थी । उनकी ओढ़ायी गयी थीं । किया गया था । थीं । उनके साथ स्त्रियोंके हाथोंकी विचित्र धातुओंसे वे चित्रित की गयी थीं । मोरपंख और पुष्पोंसे अलंकृत तथा सुगन्धित जलसे अभिषिक्त धर्मधुरंधर मनोहर वृषभ श्रीनन्दरायजीके द्वारपर इधर - उधर सुशोभित थे । गौओंके सफेद बछड़े सोनेकी मालाओं और मोतियोंके हारोंसे विभूषित हो, इधर - उधर उछलते-कूदते फिर रहे थे । उनके पैरोंमें भी मञ्जीर बँधे थे ॥ १-१० ॥ नन्दरायजीके यहाँ पुत्रोत्सवका समाचार सुनकर वृषभानुवर रानी कलावती ( कीर्तिदा ) के साथ हाथीपर चढ़कर नन्दमन्दिरमें आये । व्रजमें जो नौ नन्द, नौ उपनन्द तथा छः वृषभानु थे, वे सब भी नाना प्रकारकी भेंट - सामग्रीके साथ वहाँ आये । वे सिरपर पगड़ी तथा उसके ऊपर माला धारण किये, पीले रंगके जामे पहने, केशोंमें मोरपंख और गुञ्जा बाँधे तथा वनमालासे
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अध्याय १२ ] श्रीकृष्ण - जन्मोत्सवकी धूम; विभूषित थे । हाथोंमें वंशी और बेंतकी छड़ी लिये, सुन्दर पत्ररचनाके साथ तिलक लगाये, कमरमें मोरपंख बाँधे गोपालगण भी वहाँ आ गये । वे नाचते - गाते और वस्त्र हिलाते थे । मूँछवाले तरुण और बिना मूँछके बालक भी भाँति - भाँतिकी भेंट लेकर वहाँ आये । बूढ़े लोग हाथमें डंडा लिये अपने साथ माखन, दूध, दही और घीकी भेंट लेकर नन्दभवनमें उपस्थित हुए । वे आपसमें व्रजराजके यहाँ पुत्रोत्सवका संवाद सुनाते हुए प्रेमसे विह्वल हो नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते थे । पुत्रोत्सव होनेपर श्रीनन्दरायजीका आनन्द चरम सीमाको पहुँच गया था, उनके नेत्र हर्षके आँसुओंसे भरे हुए थे । उन्होंने अपने द्वारपर आये हुए समस्त गोपोंका तिलक आदिके द्वारा विधिवत् सत्कार किया ॥ ११–१८ ॥ गोप बोले - हे व्रजेश्वर! हे नन्दराज! आपके यहाँ जो पुत्रोत्सव हुआ है, यह संतानहीनताके कलङ्क -को मिटानेवाला है । इससे बढ़कर परम मङ्गलकी बात और क्या हो सकती है? दैवने बहुत दिनोंके बाद आज आपको यह दिन दिखाया हमलोग श्रीनन्द - नन्दनका दर्शन करके आज कृतार्थ हो जायँगे । जब आप दूरसे आकर पुत्रको गोदमें लेकर मोदपूर्वक लाड़ लड़ाते हुए ' हे मोहन! ' कहकर पुकारेंगे, उस समय हमें बड़ा सुख मिलेगा ॥ १ ९ –२१ ॥ श्रीनन्दने कहा - – बन्धुओ! आपलोगोंके आशीर्वाद और पुण्यसे आज यह आनन्ददायक शुभ दिवस प्राप्त हुआ है, मैं तो व्रजवासी गोप - गोपियोंका आज्ञापालक सेवक हूँ ॥२२ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! श्रीनन्दरायजीके यहाँ पुत्र होनेका अद्भुत समाचार सुनकर गोपियोंके हर्षकी सीमा न रही । उनके हृदय, उनके तन - मन परमानन्दसे परिपूर्ण हो गये । वे घरके सारे काम - काज तत्काल छोड़कर भेंट- सामग्री लिये तुरंत व्रजराजके भवनमें जा पहुँचीं । नरेन्द्र! अपने घरसे नन्दमन्दिरतक इधर - उधर बड़ी उतावलीके साथ आतीं जातीं सब गोपियाँ रास्तेकी भूमिपर मोती लुटाती चलती थीं । शीघ्रतापूर्वक आने - जानेसे उनके वस्त्र, आभूषण तथा केशोंके बन्धन भी ढीले पड़ गये थे; उस दशामें उनकी गोप - गोपियोंका उपायन लेकर आना ४७ बड़ी शोभा हो रही थी । झनकारते हुए नूपुर, नये बाजूबंद, सुनहरे लहँगे, मञ्जीर, हार, मणिमय कुण्डल, करधनी, कण्ठसूत्र, हाथोंके कंगन तथा भालदेशमें लगी हुई बेंदियोंकी नयी - नयी छटाओंसे उनकी छवि देखते ही बनती थी । नरेश्वर! वे सब - की - सब राई-नोन, हल्दीके विशेष चूर्ण, गेहूंके आटे, पीली सरसों तथा जौ आदि हाथोंमें लेकर बड़े लाड़से लालाके मुखपर उतारती हुई उसे आशीर्वाद देती थीं । यह सब करके उन्होंने यशोदाजी से कहा – ॥ २३ - २६ ॥ गोपियाँ बोलीं- यशोदाजी! बहुत उत्तम, बहुत अच्छा हुआ । अहोभाग्य! आज परम सौभाग्यका दिन है । आप धन्य हैं और आपकी कोख धन्य है, जिसने ऐसे बालकको जन्म दिया । दीर्घकालके बाद दैवने आज आपकी इच्छा पूरी की है । कैसे कमल - जैसे नेत्र हैं इस श्यामसुन्दर बालकके! कितनी मनोहर मुसकान है इसके होठोंपर बड़ी सँभालके साथ इसका लालन - पालन कीजिये ॥२७-२८ ॥ श्रीयशोदाने कहा - बहिन! आप सबकी दया और आशीर्वादसे ही मेरे घरमें यह सुख आया है, यह आनन्दोत्सव प्राप्त हुआ है । मेरे ऊपर आपकी सदा ही बड़ी दया रही है । इसके बाद आप सबको भी दैव-कृपासे ऐसा ही परम सुख प्राप्त हो— यह मेरी मङ्गल-कामना है । बहिन रोहिणी! तुम बड़ी बुद्धिमती हो । सब कार्य बड़े अच्छे ढंगसे करती हो । अपने घर आयी हुई ये व्रजवासिनी गोपियाँ बड़े उत्तम कुलकी हैं । तुम इनका पूजन - स्वागत - सत्कार करो । अपनी इच्छाके अनुसार इन सबकी मनोवाञ्छा पूर्ण करो ॥ २ ९ -३० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! रोहिणीजी भी राजाकी बेटी थीं । उनके हाथ तो स्वभावसे ही दानशील थे, उसपर भी यशोदाजीने दान करनेकी प्ररेणा दे दी । फिर क्या था? उन्होंने अत्यन्त उदारचित्त होकर दान देना आरम्भ किया । उनकी अङ्गकान्ति गौर - वर्णकी थी शरीरपर दिव्य वस्त्र शोभा पाते थे और वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थीं । रोहिणीजी साक्षात् लक्ष्मीकी भाँति व्रजाङ्गनाओंका सत्कार करती हुई सब ओर विचरने लगीं । साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णके व्रजमें पधारनेपर सब ओर मानव - वाद्य बजने लगे ।
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४८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड बड़े जोर - जोरसे जै - जैकारकी ध्वनि होने लगी । उस समय गोप दही, दूध और घीसे तथा गोपाङ्गनाएँ ताजे माखनके लौंदोंसे एक - दूसरेको हर्षोल्लाससे भिगोने और उच्चस्वरसे गीत गाने लगीं । नन्दभवनके बाहर और भीतर सब ओर दहीकी कीच मच गयी । उसमें बूढ़े और मोटे शरीरवाले लोग फिसलकर गिर पड़ते थे और दूसरे लोग खूब ताली पीट - पीटकर हँसते थे । महाराज! वहाँ जो पौराणिक सूत, वंशोंके प्रशंसक मागध और निर्मल बुद्धिवाले तथा अवसरके अनुरूप बातें कहनेवाले बंदीजन पधारे थे, उन सबको नन्द - रायजीने प्रत्येकके लिये अलग-अलग एक - एक हजार गौएँ प्रदान कीं । वस्त्र, आभूषण, रत्न, घोड़े और हाथी आदि सब कुछ दिये । समस्त बंदियों तथा मागधजनोंको धनी गोप व्रजेश्वर नन्दरायने बहुत धन दिया । धनराशिकी वर्षा कर दी । व्रजकी गली -गली में घर - घरमें निधि, सिद्धि, वृद्धि, भुक्ति और मुक्ति-ये लोटती - सी दिखायी देती थीं । उन्हें पानेकी इच्छा वहाँ किसीके भी मनमें नहीं होती थी ॥ ३१–३९ ॥ उस समय सनत्कुमार, कपिल, शुक और व्यास आदिको तथा हंस, दत्तात्रेय, पुलस्त्य और मुझ ( नारद ) को साथ ले ब्रह्माजी वहाँ गये । ब्रह्माजीका वर्ण तप्त सुवर्णके समान था । उनके मस्तकोंपर मुकुट तथा कानोंमें कुण्डल जगमगा रहे थे । वे वेदकर्ता चतुर्मुख ब्रह्मा हंसपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको देदीप्यमान करते हुए वहाँ आये थे । उनके पीछे भूतोंसे इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत घिरे हुए वृषभारूढ़ महेश्वर पधारे । फिर रथपर चढ़े हुए साक्षात् सूर्य, ऐरावत हाथीपर सवार देवराज इन्द्र, खञ्जरीटपर चढ़े हुए वायुदेव, महिषवाहन यम, पुष्पकारूढ़ कुबेर, मृगवाहन चन्द्रमा, बकरेपर बैठे हुए अग्निदेव, मगरपर आरूढ़ वरुण, मयूरवाहन कार्तिकेय, हंसवाहिनी सरस्वती, गरुडारूढ़ लक्ष्मी, सिंहवाहिनी दुर्गा तथा गोरूपधारिणी पृथ्वी, जो विमानपर बैठी थीं, ये सब वहाँ आये । दिव्यकान्तिवाली मुख्य - मुख्य सोलह मातृकाएँ पालकीपर बैठकर आयी थीं । खड्ग, चक्र तथा यष्टि धारण करनेवाली षष्ठीदेवी शिबिकापर सवार हो वहाँ पहुँची थीं । मङ्गल देवता वानरपर और बुध देवता भास नामक पक्षीपर चढ़कर वहाँ पधारे थे । काले मृगपर बैठे बृहस्पति, गवयपर चढ़े शुक्राचार्य, मगरपर आरूढ़ शनिदेव और ऊँटपर आरूढ़ सिंहिकाकुमार राहु- ये सभी ग्रह, जो करोड़ों बालसूर्योंके समान तेजस्वी थे, नन्दमन्दिरमें पधारे । वहाँ बड़ा कोलाहल मच रहा था । वह नन्दभवन झुंड के झुंड गोपों और गोपियोंसे भरा हुआ था । देवतालोग वहाँ पहुँचकर क्षणभर रुके और फिर चले गये । बालरूपधारी परिपूर्णतम परमात्मा साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णको देखकर, उन्हें मस्तक नवाकर, देवताओंने उस समय उनका उत्तम स्तवन किया । ब्रह्मा आदि सब देवता ऋषियोंसहित वहाँ श्रीकृष्णका दर्शन करके प्रेमविह्वल और हर्षविभोर होकर अपने - अपने धामको चले गये ॥ ४०–५१ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णदर्शनार्थ ब्रह्मादि देवताओंका आगमन ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय पूतनाका उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! नन्दजी राजा विचरती हुई गोप और गोपियोंसे भरे हुए गोकुलमें कंसका कर चुकाने, वसुदेवजीकी कुशल पूछने और आ पहुँची । उसकी नाकसे साँसके साथ ' घर्घर ' शब्द उन्हें अपने यहाँके पुत्रोत्सवका समाचार देनेके लिये होता था । गोकुलके निकट आनेपर उसने मायासे मथुरा चले गये । उसी समय कंसकी भेजी हुई बाल- दिव्य रूप धारण कर लिया । वह सोलह वर्षकी घातिनी दुष्टा राक्षसी पूतना नगरों, गाँवों और गोष्ठोंमें अवस्थावाली तरुणी बन गयी । उसका सौन्दर्य इतना
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अध्याय १३ ] पूतनाका दिव्य था कि वह अपनी अङ्गकान्तिसे शची, सरस्वती लक्ष्मी, रम्भा तथा रतिको भी तिरस्कृत कर रही थी । चलते समय उसके उन्नत कुच दिव्य आभासे झलकते और हिलते थे । उसे देखकर रोहिणी तथा यशोदा भी हतप्रतिभ हो गयीं । उसने आते ही बालगोपालको गोदमें ले लिया और बारंबार लाड़ लड़ाती हुई उस महाघोर दानवीने शिशुके मुखमें हलाहल विषसे लिप्त अपना स्तन दे दिया । यह देख तीक्ष्ण रोषसे आवृत हो श्रीहरिने उसका सारा दूध उसके प्राणोंसहित पी लिया । उसके स्तनोंमें जब असह्य पीड़ा हुई, तब ' छोड़ो - छोड़ो ' कहते हुए वह उठकर भागी । बच्चेको लिये लिये घरसे बाहर निकल गयी । बाहर जानेपर उसकी माया नष्ट हो गयी और वह अपने असली रूपमें दिखायी देने लगी । उसके नेत्र बाहर निकल आये । सारा शरीर सफेद पड़ गया और वह रोती - चिल्लाती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी । उसकी चिल्लाहटसे सातों लोक और सातों पाताल-सहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा । द्वीपोंसहित सारी पृथ्वी डोलने लगी । वह एक अद्भुत - सी घटना हुई । नृपेश्वर! पूतनाका विशाल शरीर छः कोस लंबा और वज्रके समान सुदृढ़ था । उसके गिरनेसे उसकी पीठके नीचे आये हुए बड़े - बड़े वृक्ष पिसकर चकनाचूर हो गये । उस समय गोपगण उस दानवीके भयंकर और विशाल शरीरको देखकर परस्पर कहने लगे – ' इसकी गोदमें गया हुआ बालक कदाचित् जीवित नहीं होगा । ' परंतु वह अद्भुत बालक उसकी छातीपर बैठा हुआ आनन्दसे खेलता और मुसकराता था । वह पूतनाका दूध पीकर जम्हाई ले रहा था । उसे उस अवस्थामें देखकर यशोदा तथा रोहिणीके साथ जाकर स्त्रियोंने उठा लिया और छाती से लगाकर वे सब की सब बड़े विस्मयमें पड़ गयीं । बच्चेको ले जाकर गोपियोंने सब ओरसे विधिपूर्वक उसकी रक्षा की । यमुनाजीकी पवित्र मिट्टी * श्रीगोप्य ऊचुः -श्रीकृष्णस्ते शिरः पातु वैकुण्ठः कण्ठमेव हि । नृसिंहो नेत्रयुग्मं च जिह्वां दशरथात्मजः । कपोलौ पान्तु ते साक्षात् सनकाद्याः कला हरेः । चिबुकं कपिलः पातु दत्तात्रेय ठरोऽवतु । दोर्दण्डं सततं रक्षेत् पृथुः पृथुलविक्रमः । उद्धार ४ ९ लगाकर उसके ऊपर यमुना - जलका छींटा दिया, फिर उसके ऊपर गायकी पूँछ घुमायी । गोमूत्र और गोरजमिश्रित जलसे उसको नहलाया और निम्नाङ्कित रूपसे कवचका पाठ किया- ॥ १-१४ ॥ श्रीगोपियाँ बोलीं- मेरे लाल! श्रीकृष्ण तेरे सिरकी रक्षा करें और भगवान् वैकुण्ठ कण्ठकी । श्वेतद्वीपके स्वामी दोनों कानोंकी, यज्ञरूपधारी श्रीहरि नासिकाकी, भगवान् नृसिंह दोनों नेत्रोंकी, दशरथ-नन्दन श्रीराम जिह्वाकी और नर - नारायण ऋषि तेरे अधरोंकी रक्षा करें । साक्षात् श्रीहरिके कलावतार सनक - सनन्दन आदि चारों महर्षि तेरे दोनों कपोलोंकी रक्षा करें । भगवान् श्वेतवाराह तेरे भालदेशकी तथा नारद दोनों भ्रूलताओंकी रक्षा करें । भगवान् कपिल तेरी ठोढ़ीको और दत्तात्रेय तेरे वक्षःस्थलको सुरक्षित रखें । भगवान् ऋषभ तेरे दोनों कंधोंकी और मत्स्य-भगवान् तेरे दोनों हाथोंकी रक्षा करें । पृथुल - पराक्रमी राजा पृथु सदा तेरे बाहुदण्डोंको सुरक्षित रखें । भगवान् कच्छप उदरकी और धन्वन्तरि तेरी नाभिकी रक्षा करें । मोहिनी - रूपधारी भगवान् तेरे गुह्यदेशको और वामन तेरी कटिको हानिसे बचायें । परशुरामजी तेरे पृष्ठभागकी और बादरायण व्यासजी तेरी दोनों जाँघोंकी रक्षा करें । बलभद्र दोनों घुटनोंकी और बुद्धदेव तेरी पिंडलियोंकी रक्षा करें । धर्मपालक भगवान् कल्कि गुल्फोंसहित तेरे दोनों पैरोंको सकुशल रखें । यह सबकी रक्षा करनेवाला परम दिव्य ' श्रीकृष्ण - कवच ' है । इसका उपदेश भगवान् विष्णुने अपने नाभि - कमलमें विद्यमान ब्रह्माजीको दिया था । ब्रह्माजीने शम्भुको शम्भुने दुर्वासाको और दुर्वासाने नन्द - मन्दिरमें आकर श्रीयशोदाजीको इसका उपदेश दिया था । इस कवचके द्वारा गोपियोंसहित श्रीयशोदाने नन्दनन्दनकी रक्षा करके उन्हें अपना स्तन पिलाया और ब्राह्मणोंको प्रचुर धन दिया * ॥ १५–२४ ॥ श्वेतद्वीपपतिः कर्णौ नासिकां यज्ञरूपधृक् ॥
अधराववतात्ते तु नरनारायणावृषी ।
भालं ते श्वेतवाराहो नारदो भ्रूलतेऽवतु ॥
स्कन्धौ द्वावृषभः पातु करौ मत्स्यः प्रपातु ते ॥
उदरं कमठः पातु नाभिं धन्वन्तरिश्च ते ॥
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५० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड उसी समय नन्द आदि गोप मथुरापुरीसे गोकुलमें लौट आये । पूतनाके भयानक शरीरको देखकर वे सबके -सब भयसे व्याकुल हो गये । गोपोंने कुठारोंसे उसके शरीरको काट - काटकर यमुनाजीके किनारे कई चिताएँ बनायीं और उसका दाह - संस्कार किया । पूतनाका शरीर परम पवित्र हो गया था । जलानेपर उससे जो धुआँ निकला, उसमें इलाइची - लवङ्ग, चन्दन, तगर और अगरकी सुगन्ध भरी हुई थी । अहो! जिन पतित - पावनने पूतनाको मोक्षगति प्रदान की, उन श्रीकृष्णको छोड़कर हम यहाँ किसकी शरणमें जायँ ॥ २५ - २८ ॥ बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! यह बालघातिनी राक्षसी पूतना पूर्वजन्ममें कौन थी? इसके स्तनमें विष लगा हुआ था तथा उसके भीतरका भाव भी दूषित ही था; तथापि इसे उत्तम मोक्षकी प्राप्ति कैसे हुई? ॥ २ ९ ॥ श्रीनारदजी बोले – पूर्वकालमें राजा बलिके यज्ञमें भगवान् वामनके परम उत्तम रूपको देखकर बलि - कन्या रत्नमालाने उनके प्रति पुत्रोचित स्नेह किया था । उसने मन ही मन यह संकल्प किया था कि ' यदि मेरे भी ऐसा ही बालक उत्पन्न हो और उस पवित्र मुसकानवाले शिशुको मैं अपना स्तन पिला सकूँ तो उससे मेरा चित्त प्रसन्न हो जायगा । ' बलि भगवान्के परम भक्त हैं, अतः उनकी पुत्रीको वामन भगवान्ने यह वर दिया कि ' तेरे मनमें जो मनोरथ है, वह पूर्ण हो । ' वही रत्नमाला द्वापरके अन्तमें पूतना नामसे विख्यात राक्षसी हुई । भगवान् श्रीकृष्णके स्पर्शसे उसका उत्तम मनोरथ सफल हो गया । मिथिलानरेश! जो मनुष्य परात्पर भगवान् श्रीकृष्णके इस पूतनोद्धारसम्बन्धी प्रसङ्गको सुनता है, उसको भगवान्की प्रेमपूर्ण भक्ति प्राप्त हो जाती है; फिर उसे धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गकी उपलब्धि हो जाय, इसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ३० – ३४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' पूतना - मोक्ष ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय शकटभञ्जन; उत्कच और तृणावर्तका उद्धार; दोनोंके पूर्वजन्मोंका वर्णन श्रीगर्गजीने कहा— शौनक! इस प्रकार मैंने भगवान् श्रीकृष्णके सर्वोत्कृष्ट दिव्य चरित्रका वर्णन किया । जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह कृतार्थ है, उसे परम पुरुषार्थ प्राप्त हो गया- इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
श्रीशौनकजी बोले- मुने! भगवान् श्रीकृष्णका मङ्गलमय चरित्र अमृत रससे तैयार की हुई परम मधुर खाँड़ है । इसे साक्षात् आपके मुखसे सुनकर हम कृतार्थ हो गये । तपोधन! संतोंमें बहुलाश्व भगवान् श्रीकृष्णके परम भक्त मनमें सदा शान्ति बनी रहती थी । इसके मुनिवर नारदजीसे कौन - सी बात पूछी, बतानेकी कृपा कीजिये ॥ २-३ ॥ श्रीगर्गजीने कहा - शौनक! मिथिलाके महाराज बहुलाश्व हर्षसे उत्फुल्ल विह्वल हो गये । फिर उन धर्मात्मा नरेशने श्रेष्ठ राजा थे । उनके बाद उन्होंने यह मुझे तदनन्तर और प्रेम परिपूर्णतम
मोहिनी गुह्यदेशं च कटिं ते वामनोऽवतु । पृष्ठं परशुरामश्च तवोरू बादरायणः ॥
बलो जानुद्वयं पातु जङ्घे बुद्धः प्रपातु ते । पादौ पातु सगुल्फौ व कल्किर्धर्मपतिः प्रभु ॥
सर्वरक्षाकरं दिव्यं श्रीकृष्णकवचं परम् । इदं भगवता दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥
ब्रह्मणा शम्भवे दत्तं शम्भुर्दुर्वाससे ददौ । दुर्वासाः श्रीयशोमत्यै प्रादाच्छ्रीनन्दमन्दिरे ॥ अनेन रक्षां कृत्वास्य गोपीभिः श्रीयशोमती । पाययित्वा स्तनं दानं विप्रेभ्यः प्रददौ महत् ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १३ । १५ – २४ )
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अध्याय १४ ] शकटभञ्जन; उत्कच और तृणावर्तका उद्धार; दोनोंके पूर्वजन्मोंका वर्णन ५१ भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए नारदजीसे कहा ॥ ४ ॥
राजा बहुलाश्व बोले- मुने! आपने भूरि - भूरि पुण्यकर्म किये हैं । आपके सम्पर्कसे मैं धन्य और कृतार्थ हो गया; क्योंकि भगवान्के भक्तोंका सङ्ग दुर्लभ और दुस्साध्य है । मुने! अद्भुत भक्तवत्सल साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें आगे चलकर कौन-सी विचित्र लीला की, यह मुझे बताइये ॥ ५-६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तुम श्रीकृष्ण-सम्मत धर्मके पालक हो, तुमने यह बहुत उत्तम प्रश्न किया है । निश्चय ही संत पुरुषोंका सङ्ग सबके कल्याणका विस्तार करनेवाला होता है ॥ ७ ॥
एक दिन, जब भगवान् श्रीकृष्णके जन्मका नक्षत्र प्राप्त हुआ था, नन्दरानी श्रीयशोदाजीने गोप और गोपियोंको अपने यहाँ बुलाकर ब्राह्मणोंके बताये अनुसार मङ्गल - विधान सम्पन्न किया । उस समय श्याम - सलोने बालक श्रीकृष्णको लाल रंगका वस्त्र पहनाया गया । अङ्गोंको सुवर्णमय भूषणोंसे भूषित किया गया । उन्हें गोदमें लेकर मैयाने उनके विकसित कमल - सदृश कमनीय नेत्रोंमें काजल लगाया और गलेमें बघनखायुक्त चन्द्रहार धारण कराया तथा देवताओंको नमस्कार करके ब्राह्मणोंके लिये उत्तम धनका दान दिया । तदनन्तर गोपी यशोदाजीने शीघ्र ही अपने लालाको पालनेपर लिटा दिया और मङ्गल -दिवसपर गोपियोंमेंसे प्रत्येकका अलग - अलग स्वागत किया । उस मङ्गल - भवनमें उस दिन बहुत से गोपोंका आना - जाना लगा रहा, अतः उन्हींके सत्कारमें व्यस्त रहनेके कारण वे अपने रोते हुए बालकका रुदन - शब्द सुन न सकीं । उसी क्षण पापात्मा कंसका भेजा हुआ एक राक्षस आया । उसका नाम ' उत्कच ' था । वह वायुमय शरीर धारण किये रहता था । वह आकर छकड़ेपर ( जिसपर बड़े - बड़े वजनदार दही - दूधके मटके रखे जाते थे ) बैठ गया और बालकके मस्तक-पर उस शकटको उलटकर गिरानेके प्रयासमें लगा । इतनेमें ही श्रीकृष्णने रोते - रोते ही उस शकटपर पैरसे प्रहार कर दिया । फिर तो वह बड़ा छकड़ा टूक - टूक हो गया और दैत्य मरकर नीचे आ गिरा । ऐसी स्थितिमें वह वायुमय शरीर छोड़कर निर्मल दिव्य देहसे सम्पन्न हो गया और भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके सौ घोड़ोंसे जुते हुए दिव्य विमानपर बैठकर भगवान्के निजी परमधाम गोलोकको चला गया । उस समय व्रजवासी नन्द आदि गोप तथा गोपियाँ सब - के - सब एक साथ वहाँ आ गये और बालकोंसे पूछने लगे-' व्रजकुमारो! यह शकट अपने आप ही गिर पड़ा या किसीने इसे गिराया है? कैसे इसकी यह दशा हुई है, तुम जानते हो तो बताओ ॥ ८–१३ ॥ बालकोंने कहा - पालनेपर सोया हुआ यह बालक दूध पीनेके लिये रोते - रोते ही पैर फेंक रहा था । वही पैर छकड़ेसे टकराया, इसीसे यह छकड़ा उलट गया । व्रजबालकोंकी इस बातपर गोप और गोपियोंको विश्वास नहीं हुआ । वे सभी आश्चर्यमग्न होकर सोचने लगे- ' कहाँ तो तीन महीनेका यह छोटा-सा बालक और कहाँ इतने विशाल बोझवाला यह छकड़ा! ' यशोदाको यह शङ्का हो गयी कि बच्चेको कोई बालग्रह लग गया है । अतः उन्होंने बालकको गोदमें लेकर ब्राह्मणोंद्वारा विधिपूर्वक ग्रहयज्ञ करवाया । उसमें उन्होंने ब्राह्मणोंको धन आदिसे पूर्णतया तृप्त कर दिया ॥ १४–१६ ॥ श्रीबहुलाश्वने पूछा – महामुने! इस ' उत्कच ' नामके राक्षसने पूर्वजन्ममें कौन - सा पुण्यकर्म किया था, जिसके फलस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके चरणका स्पर्श पाकर वह तत्काल मोक्षका भागी हो गया? ॥ १७ ॥
श्रीनारदजीने कहा- मिथिलेश्वर! यह उत्कच पूर्वजन्ममें हिरण्याक्षका पुत्र था । एक दिन वह लोमशजीके आश्रमपर गया और वहाँ उसने आश्रमके वृक्षोंको चूर्ण कर दिया । स्थूलदेहसे युक्त महाबली उत्कचको खड़ा देख ब्राह्मण - ऋषिने रोष-युक्त होकर उसे शाप दे दिया- ' दुर्मते! तू देह-रहित हो जा । ' उसी कर्मके परिपाकसे उसका वह शरीर सर्प - शरीरसे केंचुलकी भाँति छूटकर गिर पड़ा । यह देख वह महान् दानव मुनिके चरणोंमें गिर पड़ा और बोला ॥ १८-२० ॥
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५२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं उत्कचने कहा- -मुने! आप कृपाके सागर हैं । मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये । भगवन्! मैंने आपके प्रभावको नहीं जाना । आप मेरी देह मुझे दे दीजिये ॥२१ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे मुनि लोमश प्रसन्न हो गये । जिन्होंने विधाताकी सौ नीतियाँ देखी हैं, अर्थात् जिनके सामने सौ ब्रह्मा बीत चुके हैं, ऐसे संतोंका रोष भी वरदायक होता है । फिर उनका वरदान मोक्षप्रद हो, इसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ २२ ॥
लोमशजी बोले - चाक्षुष - मन्वन्तरतक तो तेरा शरीर वायुमय रहेगा । इसके बीत जानेपर वैवस्वत-मन्वन्तर आयेगा । उसी समयमें ( अट्ठाईसवें द्वापरके अन्तमें ) भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श होनेसे तेरी मुक्ति होगी ॥ २३ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! उक्त वरद शापके कारण लोमशजीके प्रतापसे दानव उत्कच भी भगवान्के परम धामका अधिकारी हो गया । जो वर और शाप देनेमें पूर्ण स्वतन्त्र हैं, उन श्रेष्ठ संतोंके लिये मेरा नमस्कार है ॥ २४ ॥
राजन्! एक दिन नन्दरानी यशोदाजीकी गोदमें बालक श्रीकृष्ण खेल रहे थे और नन्दरानी उन्हें लाड़ लड़ा रही थीं । थोड़ी ही देरमें बालक पर्वतके समान भारी प्रतीत होने लगा । वे उसे गोदमें उठाये रखनेमें असमर्थ हो गयीं और मन ही मन सोचने लगीं - ' अहो! इस बालकमें पहाड़ - सा भारीपन कहाँसे आ गया? ' फिर उन्होंने बालगोपालको भूमिपर रख दिया, किंतु यह रहस्य किसीको बतलाया नहीं । उसी समय कंसका भेजा हुआ महाबली दैत्य ' तृणावर्त ' वहाँ आकर आँगनमें परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड पड़ीं और होशमें आनेपर उच्चस्वरसे इस प्रकार करुण - विलाप करने लगीं, मानो बछड़ेके मर जानेपर गौ क्रन्दन कर रही हो । प्रेम और स्नेहसे व्याकुल हुई गोपियाँ भी रो रही थीं । उन सबके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । वे इधर - उधर देखती हुई नन्द-नन्दनकी खोजमें लग गयीं । उधर तृणावर्त आकाशमें दस योजन ऊपर जा पहुँचा । बालक श्रीकृष्ण उसके कंधेपर थे । उनका शरीर उसे सुमेरु पर्वतकी भाँति भारी प्रतीत होने लगा । उसे अत्यन्त पीड़ा होने लगी । तब वह दानव श्रीकृष्णको वहाँ नीचे पटकनेकी चेष्टामें लग गया । यह जानकर परिपूर्णतम भगवान्ने स्वयं उसका गला पकड़ लिया । निशाचरके ‘ छोड़ दे, छोड़ दे । ' कहनेपर अद्भुत बालक श्रीकृष्णने बड़े जोरसे उसका गला दबाया, इससे उसके प्राण - पखेरू उड़ गये । उसकी देहसे ज्योति निकली और घनश्याममें उसी प्रकार विलीन हो गयी, जैसे बादलमें बिजली । तब आकाशसे दैत्यका शरीर बालकके साथ ही एक शिलापर गिर पड़ा । गिरते ही उसकी बोटी - बोटी छितरा गयी । गिरनेके धमाकेसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं, भूमण्डल काँपने लगा । उस समय रोती हुई सब गोपियोंने राक्षसकी पीठपर चुपचाप बैठे बालक श्रीकृष्णको एक साथ ही देखा और दौड़कर उन्हें उठा लिया । फिर माता यशोदाको देकर वे कहने लगीं ॥ २५–३७ ॥ गोपियाँ बोलीं- यशोदे! तुममें बालकके लालनपालनकी रत्तीभर भी योग्यता नहीं है । कहनेसे तो तुम बुरा मान जाती हो; किंतु सच बात यह है कि कहीं, कभी तुमसे दया देखी नहीं गयी । भला कहो तो, इस प्रकार अन्धकार आ जानेपर कोई भी अपने खेलते हुए सुन्दर बालक श्रीकृष्णको बवंडररूपसे उठा बच्चेको गोदसे अलग करता है! तू ऐसी निर्दय है कि ले गया । तब गोकुलमें ऐसी धूल उठी, जिसके कारण अँधेरा छा गया और भयंकर शब्द होने लगा । दो घड़ीतक सबकी आँखोंमें धूल भरी रही । उस समय यशोदाजी नन्द - मन्दिरके आँगनमें अपने लालाको न देखकर घबरा गयीं । रोती हुई महलके शिखरोंकी ओर देखने लगीं । वे बड़े भयंकर दीखते थे । जब कहीं भी अपना लाला नहीं दिखायी दिया, तब वे मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर ऐसे महान् भयके अवसरपर भी बालकको जमीनपर रख दिया? ॥३८-३९ ॥ यशोदाजीने कहा- बहिनो! समझमें नहीं आता कि उस समय मेरा लाला क्यों गिरिराजके समान भारी लगने लगा था; इसीलिये उस महा-भयंकर बवंडरमें भी मैंने इसे गोदीसे उतारकर भूमिपर रख दिया ॥ ४० ॥
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अध्याय १४ ] शकटभञ्जन; उत्कच और तृणावर्तका उद्धार; दोनोंके पूर्वजन्मोंका वर्णन ५३ गोपियाँ कहने लगीं - यशोदाजी! रहने दो, झूठ न बोलो । कल्याणी! तुम्हारे दिलमें जरा भी दयामया नहीं है । यह दुधमुँहा बच्चा तो फूल और रूईके समान हलका है ॥ ४१ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— बालक श्रीकृष्णके घर आ जानेपर नन्द आदि गोप और गोपियाँ - सभीको बड़ा हर्ष हुआ । वे सब लोगोंके साथ उसकी कुशल-वार्ता कहने लगे । यशोदाजी बालक श्रीकृष्णको उठा ले गयीं और बार - बार स्तन्य पिलाकर, मस्तक सूँघकर और आँचलसे छातीमें छिपाकर छोह - मोहके वशीभूत हो, रोहिणीसे कहने लगीं ॥ ४२-४३ ॥ श्रीयशोदाजी बोलीं- बहिन! मुझे दैवने यह एक ही पुत्र दिया हैं, मेरे बहुत - से पुत्र नहीं हैं; इस एक पुत्रपर भी क्षणभरमें अनेक प्रकारके अरिष्ट आते रहते हैं । आज यह मौतके मुँहसे बचा है । इससे अधिक उत्पात और क्या होगा? अतः अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ तथा अब और कहाँ रहनेकी व्यवस्था करूँ? धन, शरीर, मकान, अटारी और विविध प्रकारके रत्न – इन सबसे बढ़कर मेरे लिये यह एक ही बात है कि मेरा यह बालक कुशलसे रहे । यदि मेरा यह बच्चा अरिष्टोंपर विजयी हो जाय तो मैं भगवान् श्रीहरिकी पूजा, दान एवं यज्ञ करूँगी; तड़ागवापी आदिका निर्माण करूँगी और सैकड़ों मन्दिर बनवा दूँगी । प्रिय रोहिणी! जैसे अंधेके लिये लाठी ही सहारा है, उसी प्रकार मेरा सारा सुख इस बालकसे ही है । अतः बहिन! अब मैं अपने लालाको उस स्थानपर ले जाऊँगी, जहाँ कोई भय न हो ॥ ४४ - ४८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! उसी समय नन्दमन्दिरमें बहुत - से विद्वान् ब्राह्मण पधारे और उत्तम आसनपर बैठे विधिवत् पूजन * ब्राह्मणा । नन्द और यशोदाजीने उन सबका किया ॥ ४ ९ ॥ ऊचुः -दामोदरः पातु पादौ जानुनी विष्टरश्रवाः । कटिं राधापतिः पातु पीतवासास्तवोदरम् I । मुखं च मथुरानाथो द्वारकेशः शिरोऽवतु ।
श्लोकत्रयमिदं स्तोत्रं यः पठेन्मानवः सदा ।
महाभाग ब्राह्मण बोले- व्रजपति नन्दजी तथा व्रजेश्वरी यशोदे! तुम चिन्ता मत करो । हम इस बालककी कवच आदिसे रक्षा करेंगे, जिससे यह दीर्घजीवी हो जाय ॥ ५० ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कुशाग्रों, नूतन पल्लवों, पवित्र कलशों, शुद्ध जल तथा ऋक्, यजु एवं सामवेदके स्तोत्रों और उत्तम स्वस्तिवाचन आदिके द्वारा विधि - विधान से यज्ञ करवाकर अग्निकी पूजा करायी । तब उन्होंने बालक श्रीकृष्णकी विधिवत् रक्षा की ( रक्षार्थ निम्नाङ्कित कवच पढ़ा ) ॥ ५१-५२ ॥ ब्राह्मणोंने कहा— भगवान् दामोदर तुम्हारे चरणोंकी रक्षा करें । विष्टरश्रवा घुटनोंकी, श्रीविष्णु जाँघोंकी और स्वयं परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारी नाभिकी रक्षा करें । भगवान् राधावल्लभ तुम्हारे कटिभागकी तथा पीताम्बरधारी तुम्हारे उदरकी रक्षा करें । भगवान् पद्मनाभ हृदयकी गोवर्धनधारी बाँहोंकी, मथुराधीश्वर मुखकी एवं द्वारकानाथ सिरकी रक्षा करें । असुरोंका संहार करनेवाले भगवान् पीठकी रक्षा करें और साक्षात् भगवान् गोविन्द सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें । तीन
श्लोकवाले इस स्तोत्रका जो मनुष्य निरन्तर पाठ करेगा,
उसे परम सुखकी प्राप्ति होगी और उसे कहीं भी भयका सामना नहीं करना पड़ेगा * ॥५३–५६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— तदनन्तर नन्दजीने उन ब्राह्मणोंको एक लाख गायें, दस लाख स्वर्णमुद्राएँ, एक हजार नूतन रत्न और एक लाख बढ़िया वस्त्र दिये । उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके चले जानेपर नन्दजीने गोपोंको बुला-बुलाकर भोजन कराया और मनोहर वस्त्राभूषणोंसे उन सबका सत्कार किया ॥ ५७-५८ ॥ श्रीबहुलाश्वने पूछा – मुने! यह तृणावर्त पहले जन्ममें कौन - सा पुण्यकर्मा मनुष्य था, जो साक्षात् परि-पूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो गया? ॥ ५ ९ ॥ ऊरू पातु हरिर्नाभिं परिपूर्णतमः स्वयम् ॥ हृदयं पद्मनाभश्च भुजौ गोवर्धनोद्धरः ॥ पृष्ठं पात्वसुरध्वंसी सर्वतो भगवान् स्वयम् ॥ महासौख्यं भवेत्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १४ । ५३–५६ )
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५४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड श्रीनारदजी बोले- राजन्! पाण्डुदेशमें दिया — ' दुर्बुद्धे! तू राक्षस हो जा । ' फिर तो राजा ' सहस्राक्ष ' नामसे विख्यात एक राजा थे । उनकी सहस्राक्ष दुर्वासाजीके चरणोंमें पड़ गये । तब मुनिने कीर्ति सर्वत्र व्याप्त थी । भगवान् विष्णुमें उनकी अपार श्रद्धा थी । वे धर्ममें रुचि रखते थे । यज्ञ और दानमें उनकी बड़ी लगन थी । एक दिन वे रेवा ( नर्मदा ) नदीके दिव्य तटपर गये । लताएँ और बेंत उस तटकी शोभा बढ़ा रहे थे । वहाँ सहस्त्रों स्त्रियोंके साथ आनन्दका अनुभव करते हुए वे विचरने लगे । उसी समय स्वयं दुर्वासा मुनिने वहाँ पदार्पण किया । राजाने उनकी वन्दना नहीं की, तब मुनिने शाप दे उन्हें वर दिया — ' राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके विग्रहका स्पर्श होनेसे तुम्हारी मुक्ति हो जायगी ' ॥ ६०–६३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! वे ही राजा सहस्राक्ष दुर्वासाजीके शापसे भूमण्डलपर ' तृणावर्त ' नामक दैत्य हुए थे । भगवान् श्रीकृष्णके दिव्य श्रीविग्रहका स्पर्श होनेसे उनको सर्वोत्तम मोक्ष ( गोलोकधाम ) प्राप्त हो गया ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' शकटासुर और तृणावर्तका मोक्ष ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पंद्रहवाँ अध्याय यशोदाद्वारा श्रीकृष्णके मुखमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन; नन्द और यशोदाके पूर्व-पुण्यका परिचय; गर्गाचार्यका नन्द भवनमें जाकर बलराम और श्रीकृष्णके नामकरण - संस्कार करना तथा वृषभानुके यहाँ जाकर उन्हें श्रीराधा-कृष्णके नित्य - सम्बन्ध एवं माहात्म्यका ज्ञान कराना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! एक दिन साँवले - सलोने बालक श्रीकृष्ण सोनेके रत्नजटित पालनेपर सोये हुए थे । उनके मुखपर लोगोंके मनको मोहनेवाले मन्दहास्यकी छटा छा रही थी । दृष्टिजनित पीड़ाके निवारणके लिये नन्दनन्दनके ललाटपर काजलका डिठौना शोभा पा रहा था । कमलके समान सुन्दर नेत्रोंमें काजल लगा था । अपने उस सुन्दर लालाको मैया यशोदाने गोदमें ले लिया । वे बालमुकुन्द पैरका अँगूठा चूस रहे थे । उनका स्वभाव चपल था । नील, नूतन, कोमल एवं घुँघराले केशबन्धोंसे उनकी अङ्गच्छटा अद्भुत जान पड़ती थी । वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न, बघनखा तथा चमकीला अर्धचन्द्र ( नामक आभूषण ) शोभा दे रहे थे । अपार दयामयी गोपी श्रीयशोदा अपने उस लालाको लाड़ लड़ाती हुई बड़े आनन्दका अनुभव कर रही थी । राजन्! बालक श्रीकृष्ण दूध पी चुके थे । उन्हें जँभाई आ रही थी । माताकी दृष्टि उधर पड़ी तो उनके मुखमें पृथिव्यादि पाँच तत्त्वोंसहित सम्पूर्ण विराट् ( ब्रह्माण्ड ) तथा इन्द्रप्रभृति श्रेष्ठ देवता दृष्टिगोचर हुए । तब श्रीयशोदाके मनमें त्रास छा गया । अतः उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं ॥१-३ ॥ महाराज! परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ हैं । उनकी ही मायासे सम्पूर्ण संसार सत्तावान् बना है । उसी मायाके प्रभावसे यशोदाजीकी स्मृति टिक न सकी । फिर अपने बालक श्रीकृष्णपर उनका वात्सल्यपूर्ण दयाभाव उत्पन्न हो गया । अहो! श्रीनन्दरानीके तपका वर्णन कहाँतक करूँ! ॥ ४ ॥
श्री बहुलाश्वने पूछा- मुनिवर! नन्दजीने यशोदाके साथ कौन - सा महान् तप किया था, जिसके प्रभावसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र उनके यहाँ पुत्ररूपमें प्रकट हुए ॥ ५ ॥