गर्ग संहिता — पृष्ठ 481–490

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490

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अध्याय २४ ] अनुशाल्व और प्रकार युगव्यवस्था करते हैं, वह सुनो । सत्ययुगमें समस्त भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले वे सर्वभूतात्मा श्रीहरि कपिल आदिका स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान प्रदान करते हैं । त्रेतामें चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें प्रकट हो वे ही प्रभु दुष्टोंका निग्रह करते हुए तीनों लोकोंका परिपालन करते हैं । द्वापरमें वेदव्यासका स्वरूप धारण करके वे विभु एक वेदके चार वेद करके फिर शाखा-प्रशाखारूपसे उसके सैकड़ों भेद करते हैं । फिर उसका बहुत विस्तार कर देते हैं । इस प्रकार वेदोंका व्यास ( विस्तार ) करके कलियुगके अन्तमें वे श्रीहरि पुनः कल्किरूपसे प्रकट होते हैं और वे प्रभु दुष्टोंको सन्मार्गमें स्थापित करते हैं । इस प्रकार अनन्तात्मा श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि, पालन और अन्तमें संहार करते यादव- वीरोंमें घोर युद्ध ४७५ नमस्कार है, जिनसे यह प्राकृत या जड जगत् भिन्न है । समस्त लोकोंके आदिकारण वे श्रीकृष्ण ही सबके ध्येय हैं । वे अविनाशी परमात्मा मुझपर प्रसन्न हों । तस्मान्नृपेन्द्र हरिपौत्र मनोमयं च सर्वं विहाय जगतश्च सुखं च दुःखम् । मोक्षप्रदं सुरवरं किल सर्वदं त्वं द्वारावतीनरपतिं भज कृष्णचन्द्रम् ॥ २६ ॥

इसलिये नृपेन्द्र! हरिपौत्र! जगत्के सम्पूर्ण मनोमय सुख - दुःखको छोड़कर तुम मोक्षदाता देवेश्वर एवं सब कुछ देनेवाले द्वारावतीनरेश भगवान् श्रीकृष्ण- चन्द्रका भजन करो । इस प्रकार जो भक्तियुक्त पुरुष भगवान् श्रीकृष्णके इस वृत्तसारका वर्णन करता और सुनता है, उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है । उसे कभी आत्माके विषयमें हैं । उनसे भिन्न दूसरे किसीसे ये सृष्टि आदि कार्य नहीं मोह नहीं होता । वह भगवत्स्मरणमें संलग्न रहकर सम्पादित होते हैं । उन सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीहरिको अविचल भक्तिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है ॥ १३ – २७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' वैराग्य - कथन ' नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

चौबीसवाँ अध्याय अनुशाल्व और यादव - वीरोंमें घोर युद्ध श्रीगजी कहते हैं— राजन्! सान्दीपनि मुनिका यह वचन सुनकर अनिरुद्धको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणोंमें अपना मन लगाकर उन मुनीश्वरसे कहा – ' प्रभो! आपके उपदेशरूपी खड्गसे मेरा मोहरूपी शत्रु नष्ट हो गया । अब आप आज ही अपने पुत्रके साथ श्रीकृष्णपुरी द्वारकाको पधारिये ' ॥१-२ ॥ उनकी यह बात सुनकर सान्दीपनि मुनि प्रसन्नता -पूर्वक श्रीकृष्णके दिये हुए पुत्रके साथ रथपर बैठकर द्वारकापुरीको गये । द्वारकापुरीमें बलराम और श्रीकृष्णने बड़े आदरके साथ उन्हें ठहराया । समस्त यादवों तथा भोजराज उग्रसेनने विधिपूर्वक उनका पूजन किया ॥ ३-४ ॥ इधर प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धने सोनेकी साँकलमें बँधे हुए अत्यन्त उज्ज्वल श्यामकर्ण अश्वको विजय-यात्राके लिये खोल दिया । वह घोड़ा राजाधिराज उग्रसेनदेवका वैभव सूचित करता हुआ वेगपूर्वक आगे बढ़ा और उस ' राजपुर ' में चला गया, जहाँ शाल्वका भाई राजा अनुशाल्व नित्य राज्य करता था । स्वेच्छानुसार वहाँ पहुँचे हुए उस अश्वको अनुशाल्वने पकड़ लिया और उसके भालमें बँधे हुए पत्रको बाँचा । बाँचकर उसे बड़ा हर्ष हुआ । सारा अभिप्राय समझकर रोषसे उसके ओठ फड़कने लगे । वह टेढ़ी आँखोंसे देखता हुआ अपने सैनिकोंसे बोला- ' बड़े सौभाग्यकी बात है कि मेरे सारे शत्रु स्वयं यहाँ आ गये । मैं उन सबको मार डालूँगा, जिन्होंने मेरे भाईका वध किया है ' ॥५ – ९ ॥ - ' ऐसा कहकर और यादवोंको तिनकेके समान मानकर दस अक्षौहिणी सेनाके साथ वह नगरसे बाहर निकला । उसी समय समस्त वृष्णिवंशियोंने देखा, सामने विशाल सेना आयी है और बाणवर्षा कर रही है, तब उन्होंने भी बाण बरसाना आरम्भ किया । उस रणक्षेत्रमें दोनों सेनाओंके बीच खड्ग, बाण, शक्ति और भिन्दिपालद्वारा घोर युद्ध होने लगा । अनुशाल्वकी

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४७६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड सेना भाग चली । यह देख महाबली अनुशाल्वने उसे रोका और सिंहनाद करते हुए रथके द्वारा वह स्वयं युद्धके मैदानमें आया । उसे आया देख श्रीकृष्णनन्दन दीप्तिमान् उसके साथ युद्ध करनेके लिये तत्काल सामने जा पहुँचे । दीप्तिमान्‌को युद्धभूमिमें देखकर अनुशाल्व अमर्षसे भर गया और अपने धनुषसे चलाये गये दस बाणोंद्वारा उनपर आघात किया । मानो किसी बाघने हाथीपर पंजे मार दिये हों । उन बाण-समूहोंसे ताड़ित होनेपर दीप्तिमान्‌की भुजा क्षत - विक्षत हो खूनसे लथपथ हो गयी । उन्होंने तत्काल धनुष उठाकर रोषपूर्वक दस बाण हाथमें लिये । उन बाणोंको कोदण्डपर रखकर दीप्तिमान्‌ने छोड़ा । राजन्! वे बाण अनुशाल्वके शरीरको विदीर्ण करके बाहर निकल गये, जैसे अनेक गरुड घोंसले छोड़कर सहसा बाहर चले गये हों । उन बाणोंसे घायल हुआ अनुशाल्व रणभूमिमें मूच्छित हो गया; तब उसके समस्त सैनिकोंके ओठ रोषसे फड़कने लगे और वे चित्र -विचित्र शस्त्रों और बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें दीप्तिमान्पर चोट करने लगे । उस समय श्रीहरिके पुत्र भानुने आकर जैसे भानु ( सूर्य ) कुहासेके बादलोंको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार अपने बाणोंद्वारा समस्त शत्रुओंको छिन्न-भिन्न कर दिया । फिर तो अनुशाल्वके सारे सैनिक भाग चले । नरेश्वर! उसी समय अनुशाल्वके ' प्रचण्ड ' नामक मन्त्रीने कुपित हो समराङ्गणमें सत्यभामाकुमार भानुपर शक्तिसे प्रहार किया । वह शक्ति भानुकी छाती छेदकर धरतीमें समा गयी और वे भी रणक्षेत्रमें मूर्च्छित होकर रथसे नीचे गिर पड़े ॥ १०–२२३ ॥ ऐसा कौतुक देख साम्ब वहाँ रोषसे जल उठे । वे शीघ्र ही हाथमें कोदण्ड लिये रथके द्वारा वहाँ आ पहुँचे । साम्बने सौ बाण मारकर प्रचण्डके ध्वज, सारथि और घोड़ोंसहित सम्पूर्ण रथको चूर्ण - चूर्ण कर डाला । रथ नष्ट हो जानेपर रणदुर्मद प्रचण्ड गदा लेकर अपने शत्रु साम्बको मारनेके लिये उसी प्रकार आया, जैसे पतंग अग्निपर टूट पड़ा हो । उसे आया देख साम्बने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक ही बाणसे समरभूमिमें उसका मस्तक काट दिया । नृपेश्वर! उस समय उसकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ २३ - २७ ॥ तदनन्तर अनुशाल्व दो घड़ीमें मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़ा हुआ । उसने देखा मेरा मन्त्री साम्बके हाथसे युद्धमें मारा गया । यह देख उस राजाने रथपर आरूढ़ हो कवच बाँधकर धनुष और खड्ग लेकर धावा किया तथा समरमें चार बाणोंद्वारा साम्बके चार घोड़ों, दो बाणोंसे उसके ध्वज, तीन बाणोंसे सारथि, पाँच बाणोंसे धनुष तथा तीस बाणोंसे रथकी धज्जियाँ उड़ा दीं । धनुष कट गया, रथ नष्ट हो गया और घोड़े तथा सारथि मारे गये, तब जाम्बवतीकुमार साम्ब दूसरे रथपर आरूढ़ हो शोभा पाने लगे । तदनन्तर उन्होंने कुपित हो धनुष लेकर युद्धस्थलमें सौ बाणोंद्वारा अपने शत्रुपर प्रहार किया, मानो गरुडने अपने पंखोंकी मारसे सर्पको चोट पहुँचायी हो । उस प्रहारसे अनुशाल्वका भी रथ टूट गया, घोड़े कालके गालमें चले गये, सारथि दिवंगत हो गया और स्वयं अनुशाल्व रणभूमिमें मूर्च्छित हो गया । तब उसके समस्त सैनिक गोधकी पाँखोंसे युक्त और विषधर सर्पके समान तीखे चमकीले बाणोंद्वारा रोषपूर्वक साम्बपर प्रहार करने लगे ॥ २८-३४ ॥ युद्धस्थलमें साम्बको अकेला देख कृष्णपुत्र मधु रोषसे भर गया और वह कबूतरके समान रंगवाले घोड़ेपर चढ़कर युद्धस्थलमें आ पहुँचा । राजेन्द्र! साम्बके साथ मिलकर मधु सारे दुष्ट शत्रुओंको तलवारकी चोटसे मौतके घाट उतारता हुआ आधे पहरतक समराङ्गणमें विचरता रहा । तत्पश्चात् अनुशाल्वने मूर्च्छासे उठकर अपनी पराजय देख, जलसे आचमनकर शुद्ध हो, समस्त शत्रुओंको मार डालनेका निश्चय किया । उसने मयासुरसे ब्रह्मास्त्रकी शिक्षा पायी थी, किंतु उसका निवारण करना वह नहीं जानता था । तथापि प्राणसङ्कट प्राप्त होनेपर उसने रोषपूर्वक ब्रह्मास्त्रका संधान किया । उस अस्त्रका दारुण और महान् तेज तीनों लोकोंको दग्ध करता हुआ - सा बारह सूर्योके समान अन्तरिक्षमें फैलने लगा । उसके दुस्सह तेजसे जलते हुए समस्त यादव प्रद्युम्रकुमार अनिरुद्धके पास गये और कहने लगे— ' नरहरे! महात्मन्! इस दुःखसे हमारी रक्षा कीजिये । ' राजन्! तब रुक्मवतीकुमार वीर अनिरुद्धने उन सबको अभय दे, समराङ्गणमें रोषपूर्वक ब्रह्मास्त्र चलाकर उस

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अध्याय २५ ] अनुशाल्वद्वारा प्रद्युम्नको ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया ॥ ३५ -४१ ॥ तब अनुशाल्वने आग्नेयास्त्र चलाया । उस अस्त्रके प्रभावसे आकाशमण्डल अग्निसे व्याप्त हो गया । सारी भूमि आगसे जलने लगी, मानो खाण्डववन आगकी लपटोंमें आ गया हो । यह देख बलवान् अनिरुद्धने फिर वारुणास्त्रका प्रयोग किया । उससे प्रचण्ड मेघ उत्पन्न हो गये और उनकी बरसायी हुई जलधाराओंसे वह आग बुझ गयी । उस समय महामेघोंद्वारा वर्षा ऋतुका आगमन जानकर मेंढक, कोकिल, मोर और सारस आदि बार - बार बोलकर अपनी आन्तरिक प्रसन्नता प्रकट करने लगे । तब मायावी अनुशाल्वने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया । यह देख अनिरुद्ध सब ओर पर्वतास्त्रद्वारा युद्ध करने लगे ॥ ४२-४५ ॥ इसके बाद अनुशाल्वने हजार भारसे युक्त भारी गदा हाथमें लेकर युद्धस्थलमें शूरवीरोंके मुकुटमणि अनिरुद्धसे क्रुद्ध होकर कहा - ' राजेन्द्र! तुम्हारी सेनामें कोई ऐसा वीर नहीं है, जो गदा युद्धमें कुशल हो । यदि कोई है तो उसे शीघ्र मेरे सामने लाओ ' ॥ ४६-४७ ॥ उसका यह वचन सुनकर महान् गदाधारी गद अनिरुद्धके देखते - देखते आगे होकर बोले-' दैत्यराज! इस सेनामें बहुत से ऐसे वीर हैं, जिन्हें उपहारसहित अश्वका अर्पण ४७७ सम्पूर्ण शस्त्रोंमें निपुणता प्राप्त है । घमंड न करो; क्योंकि तुम रणक्षेत्रमें अकेले हो । असुर! यदि तुम मेरी बात नहीं मानते हो तो पहले मेरे साथ गदायुद्ध कर लो, फिर दूसरोंको देखना ' ॥ ४८–५० ॥ नरेश्वर! ऐसा कहकर गदने लाख भारकी सुदृढ़ गदा हाथमें ली और उसके द्वारा अनुशाल्वके मस्तकपर तथा छातीमें चोट की । अनुशाल्वने भी समराङ्गणमें गदपर गदासे आघात किया । फिर तो वे दोनों क्रोधसे मूच्छित हो एक - दूसरेपर अपनी - अपनी गदासे चोट करने लगे । इतनेमें ही गदने अनुशाल्वको उठा लिया और उसे सौ बार घुमाकर आकाशमें फेंक दिया । अनुशाल्व पृथ्वीपर गिर पड़ा । राजेन्द्र! तदनन्तर उसने भी रोहिणीकुमार गदको पकड़कर धरतीपर खूब रगड़ा । वह एक अद्भुत - सा दृश्य था । तत्पश्चात् गदने एक हाथीको पकड़कर अनुशाल्वके ऊपर फेंका । अनुशाल्वने अपने ऊपर आते हुए हाथीको हाथमें ले लिया और पुनः उसे गदपर ही दे मारा । वे दोनों परस्पर घुटनों और मुक्कोंके घोर प्रहारोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे । दोनों दोनोंके द्वारा धरतीपर रौंदे गये । फिर दोनों ही गिरकर मूच्छित हो गये ॥ ५१–५६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' राजपुर विजय ' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥

पचीसवाँ अध्याय अनुशाल्वद्वारा प्रद्युम्नको उपहारसहित अश्वका अर्पण तथा बल्वल दैत्यके द्वारा श्रीगर्गजी कहते हैं— उन दोनोंका युद्ध देखकर यादव परस्पर कहने लगे - ' अनुशाल्व धन्य है । ' शत्रुसैनिक आपसमें चर्चा करने लगे कि ' गद महान् वीर हैं । ' वे सब इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि गद वहीं सचेत होकर उठे और बोल पड़े- ' मेरा शत्रु मुझपर प्रहार करके रणक्षेत्रसे कहाँ गया! कहाँ गया? ' ॥ १-२ ॥ —ऐसा कहकर उन्होंने अनुशाल्वको हाथसे पकड़कर रोषपूर्वक खींचा और अनिरुद्ध के निकट बड़े उस अश्वका अपहरण वेगसे दे मारा । अनुशाल्व औंधे मुँह गिरा और मूच्छित हो गया । यह देख अनिरुद्धने स्वयं पानी छिड़ककर और व्यजन डुलवाकर उसे होश कराया । उसी समय असुरेश्वर अनुशाल्व मूर्च्छासे जाग उठा और अपने सामने मेघके समान श्यामवर्णवाले परम-सुन्दर श्रीकृष्णपौत्रको देखकर उन्हें प्रणाम करके बोला- ' श्रीकृष्णपौत्र अनिरुद्ध! आपने मेरे प्राणोंकी रक्षा की है, अतः मैंने जो अपराध किया है उसे क्षमा कर दें । सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् वासुदेवको

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४७८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड नमस्कार है । संकर्षणको प्रणाम है । प्रद्युम्नको नमस्कार है और आप अनिरुद्धको भी प्रणाम है * । आप अपना घोड़ा लीजिये और मैं भी इसकी रक्षाके लिये आपके साथ चलूँगा ' ॥३–७ ॥ ऐसा कह उसने नगरमें जाकर अनिरुद्धको घोड़ा लौटा दिया । साथ ही दस हजार हाथी, एक लाख घोड़े, पचास हजार रथ तथा एक सहस्र शिविकाएँ उन्हें भेंट कीं । नृपश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त राजा अनुशाल्वने एक हजार ऊँट, एक सहस्र गवय ( वनगाय अथवा घड़रोज ), पिजड़ेमें बंद दो हजार सिंह, एक हजार शिकारी कुत्ते, एक सहस्र शिविर ( तम्बू - कनात ), एक लाख रुनझुन शब्द करती हुई धनुषकी प्रत्यञ्चाएँ, दस हजार परदे, एक लाख दुधारू गौएँ, सहस्र भार सुवर्ण, चार सहस्र भार चाँदी और एक भार मोती अनिरुद्धको अर्पित किये । तब अनिरुद्धने अत्यन्त प्रसन्न हो उसे मणिमय हार भेंट किया ॥ ८- १३ ॥ अनुशाल्व अपने राज्यपर श्रेष्ठ सचिवको स्थापित कर यादवोंके साथ स्वयं भी अन्यान्य देशोंको गया । भूपते! तत्पश्चात् छूटा हुआ मणिमय और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित वह अश्व वीरोंसे भरे दूसरे - दूसरे देशका दर्शन करता हुआ भ्रमण करने लगा । ' अनुशाल्व हार गया, यौवनाश्व तथा भीषण भी परास्त हो गये'-यह सुनकर अन्यान्य मण्डलेश्वर नरेशोंने अपने यहाँ आनेपर भी उस घोड़ेको नहीं पकड़ा । महाराज! इस तरह घूमते हुए उस घोड़ेके छः मास बीत गये और उतने ही शेष रह गये ॥ १४- १७ ॥ नरेश्वर! मणिपुरके राजा तथा रत्नपुरके भूपालने घोड़ेको पकड़ा; किंतु अनिरुद्धके भयसे उसको छोड़ दिया । राजन्! वह श्रेष्ठ अश्व शूरवीरोंसे रहित समस्त राष्ट्रोंको छोड़कर प्राची दिशामें गया, जहाँ दैत्यराज बल्वल निवास करता था । यह दैत्य नारदजीके मुखसे यज्ञ - सम्बन्धी घोड़ेका समाचार सुनकर नैमिषारण्यमें होनेवाले यज्ञका विनाश करके वहाँसे शीघ्र ही अपने नगरको लौटा । रास्तेमें उसने देखा, वह यज्ञ - सम्बन्धी घोड़ा प्रयागतीर्थमें त्रिवेणीका जल पी रहा है । राजन्! उसे देखते ही बल्वलने भगवान् श्रीकृष्णकी कोई परवा न करके उसे शीघ्र ही जा पकड़ा । उसी समय समस्त वृष्णिवंशी योद्धा दण्डकारण्यका दर्शन करते हुए चर्मण्वती नदी पार करके चित्रकूटमें आ पहुँचे । वहाँ श्रीरामक्षेत्रमें दान करके अश्वको देखते हुए उसके पीछे लगे वे सब लोग तीर्थराज प्रयागमें आ गये ॥ १८-२३ ॥ राजन्! वहाँ पहुँचकर उन श्रेष्ठतम यादव - वीरोंने देखा कि ' पत्रसहित अश्वको दुरात्मा असुर बल्वलने बलपूर्वक पकड़ रखा है । ' बल्वल नील अञ्जनके ढेरकी भाँति दिखायी पड़ता था । उसके शरीरकी ऊँचाई दो योजनकी थी । उस उग्र दैत्यके नेत्र अङ्गारके समान जान पड़ते थे । उसकी दाढ़ी - मूँछ तपायी हुई ताम्रशिखाके समान दिखायी देती थी । बड़ी - बड़ी दाढ़ और उग्र भ्रुकुटिके कारण उसका मुख भयंकर प्रतीत होता था । वह ब्राह्मणद्रोही असुर अपनी जीभ लपलपा रहा था और उसमें दस हजार हाथियोंके समान बल था । उसे देखते ही यादवोंके अधर - पल्लव रोषसे फड़क उठे और वे बोले – ' अरे! तू कौन है? हमारा यह यज्ञपशु लेकर तू कहाँ जायगा? अतः इसे शीघ्र छोड़ दे, नहीं तो हमलोग युद्धमें तुझे मार डालेंगे । ' यह सुनकर उस असुरने कहा - ' मनुष्यो! मेरी बात सुनो ' ॥ २४ - २८ ॥ बल्वलने कहा- मैं देवताओंको दुःख देनेवाला दैत्य बल्वल हूँ, जिसके सामने सारे मनुष्य भयसे व्याकुल हो जाते हैं ॥२ ९ ॥ यह सुनकर यादवोंने बल्वलको बाणोंसे मारना आरम्भ किया । नरेश्वर! उनके बाणोंकी चोट खाकर बल्वल घोड़ेसहित सहसा अन्तर्धान हो गया ॥३० ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' बल्वलके द्वारा अश्वका अपहरण ' नामक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥

* ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च । प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः ॥ ( २५।७ )

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छब्बीसवाँ अध्याय नारदजीके मुखसे बल्वलके निवासस्थानका पता पाकर यादवोंका अनेक तीर्थोंमें स्नान - दान करते हुए कपिलाश्रमतक जाना और वहाँ कपिल मुनिको प्रणाम करके सागरके तटपर सेनाका पड़ाव डालना श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! यज्ञपशुके अपहृत हो जानेपर समस्त यादवगण शोक करने लगे कि ' हम कहाँ जायँ और इस पृथ्वीपर क्या करें? ' अनिरुद्ध आदि सब लोगोंको उस समय कोई उपाय नहीं सूझा । नरेश्वर! तब श्रीनारदरूपधारी भगवान् वहाँ आ पहुँचे । देवर्षि नारदको आया देख यादवोंसहित अनिरुद्धने आसनपर बैठाकर उनका पूजन किया और बड़े प्रसन्न होकर वे उन मुनीश्वरसे बोले ॥ १-३ ॥ अनिरुद्धने कहा - भगवन्! वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! दुरात्मा दैत्य बल्वल हमारा घोड़ा लेकर कहाँ चला गया है? यह सब मुझे बताइये । आपका दर्शन दिव्य है । आप सूर्यदेवकी भाँति तीनों लोकोंमें विचरते हैं । त्रिभुवनके भीतर वायुके समान विचरण करनेवाले आप सर्वज्ञ तथा आत्मसाक्षी हैं । इसलिये सब बात मुझसे कहिये । अनिरुद्धका यह प्रश्न सुनकर नारदजी माधव प्रद्युम्नकुमारसे बोले ॥४-५ ॥ नारदजीने कहा – नृपेश्वर! बल्वलने तुम्हारे घोड़ेको समुद्रके बीचमें बसे हुए ' पाञ्चजन्य ' नामक उपद्वीपमें ले जाकर रख दिया है । उसका मित्र या बन्धु शकुनि यादवोंके हाथसे मारा गया था, अतः यादवोंका वध करनेके लिये उसने यह कार्य किया है । वह महान् असुर सुतललोकसे दैत्यसमूहोंको बुलाकर वहाँ राज्य करता है । भगवान् शिवका वरदान पाकर वह घमंडसे भरा रहता है ॥ ६-८ ॥ यह सुनकर अनिरुद्धने शङ्कित होकर पूछा ॥ ८ ॥

अनिरुद्ध बोले- देवर्षे! चन्द्रमौलि भगवान् शिवने उस दैत्यको कौन - सा श्रेष्ठ वर प्रदान किया है? उसके किस कार्यसे शिवजी संतुष्ट हो गये थे ॥ ९ ३ ॥ तब मुनिवर नारदने कहा— प्रद्युम्नकुमार! मेरी बात सुनो । एक समय उस दैत्यने कैलास पर्वतपर एक पैरसे खड़े रहकर बारह वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया । उस तपस्यासे संतुष्ट होकर महादेवजीने कहा - ' वर माँगो ' । उनकी बात सुनकर वह बोला - ' सदाशिव! आपको नमस्कार है । कृपानिधान! देव! महासमरमें आप मेरी रक्षा करें । ' नरेश्वर! तब ' तथास्तु ' कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये । फिर वह दैत्य पाञ्चजन्य उपद्वीपमें बलपूर्वक राज्य करने लगा । वह युद्धके बिना स्वतः तुम्हें घोड़ा नहीं देगा॥१०–१४ ॥ तब अनिरुद्ध कहने लगे - मुनिश्रेष्ठ! मैं सेना-सहित दुष्ट बल्वलको मारकर घोड़ा छुड़ा लूँगा । यदि यह भगवान् शिवके वरदानसे युद्ध करेगा तो मुझे विश्वास है कि शिवजी युद्धमें उस श्रीकृष्णद्रोही दुष्टकी रक्षा नहीं करेंगे॥१५-१६ ॥ - ऐसा कहकर अनिरुद्धने विजययात्राके लिये सहसा समस्त यादवोंको आज्ञा दी । नृपेश्वर! नारदजीके हृदयमें युद्ध देखनेका कौतूहल था । वे अनिरुद्धसे विदा ले आकाशमार्गसे उस स्थानपर गये । समस्त यादव तत्काल तीर्थराजमें विधिवत् स्नान - दान करके रोषपूर्वक युद्धयात्राके लिये सुसज्जित हो गये ॥ १७–१९ ॥ राजन्! वे हाथियों, घोड़ों तथा रथोंके द्वारा उस उपद्वीपमें गये । प्रतिदिन दो लाख सिपाही उनके जानेके लिये मार्ग तैयार करते थे । वे भिन्दिपालोंकी सहायतासे सर्वत्र सेनाके लिये पहले ही मार्ग तैयार कर देते थे, जिसपर रथ, हाथी और घोड़े सुखसे यात्रा करते थे । राजेन्द्र! उस निष्कण्टक मार्गमें पैदल सिपाही भी तीव्रगतिसे चलते थे । यादव - सेनाके भारसे पीड़ित हो शेषनाग मन - ही - मन कहते थे- ' न जाने भूतलपर क्या हो गया है? ' ॥ २०–२२३ ॥ नरेश्वर! अनिरुद्ध सेनाके आगे होकर अलक्षित

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४८० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड भावसे चलते थे । वे अश्वकी रक्षाके बहाने पापियोंका विनाश - सा करते थे । राजन्! प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध अश्वकी रक्षाके लिये जहाँ - जहाँ गये, वहाँ - वहाँ वे श्रीकृष्णके समग्र यशका गान सुनते थे । जो लोग श्रीकृष्ण और बलरामकी प्रशंसा करते थे । उनको वे रत्न, वस्त्र और आभूषण बाँटते थे । उनकी सेनाओंमें जो कुछ भी उत्तम धन था, वह सब श्रीकृष्णकथासे आकृष्टचित्त हो वे प्रसन्नतापूर्वक दे डालते थे॥२३–२६३ ॥ राजन्! इस प्रकार श्रीहरिका यशोगान सुनते और काशी तथा गया आदि तीर्थोंको देखते हुए वहाँ अनेक प्रकारके दान दे, वे पूर्वदिशाकी ओर चले गये । यादवोंकी ऐसी भयंकर सेना देखकर गिरि- व्रजपुरके स्वामी जरासंधपुत्र सहदेव शङ्कित हो गये । वे नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट ले, भयसे विह्वल हो, दोनों हाथ जोड़कर अनिरुद्धके चरणोंमें गिर पड़े । शरणागतवत्सल अनिरुद्धने सहदेवको प्रसन्नतापूर्वक रत्नमयी माला भेंट की और उन्हें उनके राज्यपर स्थापित करके शीघ्र ही श्रेष्ठ वृष्णिवंशी वीरोंके साथ वे कपिलाश्रमको गये । उन श्रेष्ठ यादव - वीरने वहाँ गङ्गा - सागर - सङ्गममें स्नान किया और सिद्ध मुनीन्द्र कपिलका दर्शन करके सेनासहित उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया । राजन्! उस स्थानसे दक्षिण दिशामें समुद्रके तटपर महलों-के समान ऊँचे - ऊँचे शिविर लग गये । राजेन्द्र! उन शिविरोंमें अनुयायियोंसहित अनिरुद्ध आदि शूरवीर और विजयाभिलाषी समस्त यादवोंने निवास किया ॥ २७ – ३४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अश्वके लिये उपद्वीपमें गमन ' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

सत्ताईसवाँ अध्याय यादवोंद्वारा समुद्रपर बाणमय सेतुका निर्माण श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज! तत्पश्चात् यादवराज अनिरुद्धने उद्धवजीको बुलाकर गम्भीर वाणीमें पूछा — ' साधुशिरोमणे! पाञ्चजन्य द्वीप कितनी दूर है, जिसमें उस दैत्यने मेरा घोड़ा ले जाकर रखा है? ' ॥ १-२ ॥ उनका यह और सखा उद्धव चिन्तन करके " ' भगवन्! सर्वज्ञ! गौरव रखनेके वैसा बता रहा प्रश्न सुनकर श्रीकृष्णके मन्त्री, सुहृद् मन - ही - मन श्रीकृष्णचरणारविन्दोंका यदुकुलनन्दन अनिरुद्धसे बोले-प्रभो! लोकेश! मैं आपकी बातका लिये मार्गमें जैसा सुना है, हूँ । नृपेश्वर! तीस योजन विस्तृत सागरके उस पार दक्षिण दिशामें ' पाञ्चजन्य ' नामक उपद्वीप है ॥ ३-५ ॥ उद्धवकी बात सुनकर बलवान्, धैर्यशाली तथा धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्ध रोष और उत्साहसे भरकर श्रेष्ठ यादव - वीरोंसे बोले ॥ ६ ॥

अनिरुद्धने कहा— श्रेष्ठतम वीर यादवो! मैं समुद्रके पार जाऊँगा । इसलिये तुमलोग शीघ्र ही बाणोंद्वारा समुद्रके ऊपर सेतुका निर्माण करो ॥ ७ ॥

उनकी यह बात सुनकर युद्धकुशल यादव परस्पर हँसते हुए समुद्रके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे । तब समस्त जलचर जन्तु तीखे बाणोंसे घायल हो चीत्कार करते हुए चारों दिशाओंमें भाग चले । देवर्षि नारद आकाशमें खड़े होकर यह सब कौतुक देख रहे थे । किसीके बाण हैं ' ॥ ८- ९ ३ ॥ नरेश्वर! अक्रूर, हृदीक, कृतवर्मा और इन्द्रनील और वे बड़े जोरसे बोले - ' तुमलोगोंमेंसे अभी समुद्रके पारतक नहीं पहुँचे उस समय नारदजीकी बात सुनकर युयुधान, सात्यकि, उद्भव, बलवान् सारण आदि वीरों तथा हेमाङ्गद, अनुशाल्व आदि भूपालोंका घमण्ड चूर - चूर हो गया । तब बलवान् अनिरुद्धने श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका चिन्तन करके र्शाङ्गधनुषके तुल्य कोदण्ड लेकर उसके द्वारा दिव्य बाण छोड़े । उन

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अध्याय २८ ] यादवोंका पाञ्चजन्य उपद्वीपमें जाना ४८१ बाणोंको देखकर देवर्षि बोले- ' अनिरुद्धके बाण समुद्रके पार जाकर उसकी तटवर्ती भूमिमें प्रविष्ट हो गये हैं ' ॥ १०–१४ ॥ राजन्! देवर्षिका यह वचन सुनकर साम्ब और दीप्तिमान् आदि यादवोंने भी बाण छोड़े । उनके भी वे बाण समुद्रके उस पार पहुँच गये । महाराज! यों करोड़ों बाण घुसते चले गये । यह देख समस्त धनुर्धर इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' आश्चर्यचकित हो गये । इस प्रकार सब यादवोंने जलके ऊपर आकाशमें तीस योजन लंबा और एक योजन चौड़ा पुल तैयार कर दिया । चार पहरमें इतना बड़ा पुल बाँधकर अनिरुद्ध आदि यादव रात्रिके समय अपने शिविरोंमें सोये । अतः परमात्मा श्रीकृष्णके शूरवीर पुत्र - पौत्रोंके, जो श्रीकृष्णके ही प्रतिबिम्ब हैं, बलका मैं क्या वर्णन करूँ? ॥ १५–१९ ॥ सेतु - बन्धन ' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय यादवोंका पाञ्चजन्य उपद्वीपमें जाना; दैत्योंकी परस्पर मन्त्रणा; मयासुरका बल्वलको घोड़ा लौटा देनेके लिये सलाह देना; परंतु श्रीगर्गजी कहते हैं— नृपेन्द्र! प्रातः काल शौचादिकर्म करके यदुनन्दन अनिरुद्ध यादवोंके साथ! उसी प्रकार सागरके उस पार गये, जैसे पूर्वकालमें कपियोंके साथ श्रीरामचन्द्रजी गये थे । वहाँ जाकर उन अनिरुद्ध आदि यादवोंने पाञ्चजन्य उपद्वीप देखा, जिसका विस्तार सौ योजन था । राजेन्द्र! उस उपद्वीपमें आसुरी पुरी शोभा पाती थी, जो बीस योजनतक फैली हुई थी । उसमें दैत्योंके समुदाय निवास करते थे । पुंनाग, नागकेसर, चम्पा, तिलक, देवदारु, अशोक, पाटल, आम, मन्दार, कोविदार, निम्ब, जम्बू, कदम्ब, प्रियाल, पनस ( कटहल ), साल, ताल, तमाल, मल्लिका, जाति ( चमेली ), जूही, नीप, मौलश्री, चम्पक तथा मदन नामवाले वृक्ष एवं पुष्प उस रमणीय नगरीकी शोभा बढ़ाते थे । उसमें रत्नोंके महल बने हुए थे ॥ १-६ ॥ यादवोंका आगमन सुनकर दुष्ट बल्वलने महात्मा यादवोंकी सेनाकी गणना करनेके लिये मायावी मयको भेजा । उसने तोतेका रूप धारण करके वहाँ जाकर सब यादवोंको देखा और लौटकर अत्यन्त विस्मित हो पुरीके भीतर बल्वलसे कहा ॥७-८ ॥ मय बोला — दैत्यराज! बलवान् वृष्णिवंशी योद्धाओंकी गणना कौन कर सकता है? जहाँ वे प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध लाख - लाख करोड़ सैनिकोंके साथ बल्वलका युद्धके निश्चयपर ही अडिग रहना सुशोभित हैं । समस्त यादव समुद्रके ऊपर बाणोंसे सेतुका निर्माण करके तुम्हारे ऊपर चढ़ आये हैं । राजन् देखो, उनकी सेना देवताओंको भी विस्मयमें डालने-वाली है । दैत्यराज! मैं बूढ़ा हो गया, परंतु आजतक सागरके ऊपर बाणोंका बना हुआ पुल न तो देखा था और न सुना ही था । आज तुम्हारे सामने ही यह देखनेको मिला है । रघुकुलशिरोमणि श्रीरामने पूर्व-कालमें लङ्काके निकट जो सेतु निर्माण किया था, वह पत्थरों और वृक्षोंसे बनाया गया था और उनके नामके प्रतापसे पानीके ऊपर प्रस्तर ठहर सके थे । वह सारा सेतु मैंने प्रत्यक्ष देखा था; परंतु आज जो देखा है, वह तो बहुत ही अद्भुत है । राजन्! पूर्वकालमें श्रीकृष्णने कंस आदि तथा शकुनि आदि दैत्योंको युद्धमें मारा था और समस्त राजाओंको परास्त कर दिया था । श्रीकृष्ण तो साक्षात् भगवान् हैं । पूर्वकालमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर वे अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये गोलोकसे भूमिपर पधारे हैं । वे दुष्ट पापियोंका विनाश करनेके लिये कुशस्थलीमें विराजमान हैं । इसीलिये अनिरुद्ध आदि महाबली समस्त श्रेष्ठ यादव भीषण, बक तथा अन्य नरेशोंको परास्त करके यहाँ आये हैं । श्रीकृष्णके पुत्र, पौत्र तथा जाति - भाई श्रेष्ठ यादव आकाशको भी जीतनेका हौसला रखते हैं, फिर भूतलपर विजय पाने-की तो बात ही क्या? अतः बल्वल! तुम मरनेसे बचे

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४८२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड हुए दैत्योंकी भलाई और अपने कुलकी कुशलताके लिये अनिरुद्धको घोड़ा लौटा दो । देवद्रोही दैत्योंको सुख मिले, इस उद्देश्यसे अनिरुद्धको घोड़ा देकर श्रीकृष्णचन्द्रका भजन करते हुए तपस्यासे प्राप्त हुए अपने राज्यको भोगो ॥ ९ -१ ९ ॥ इस प्रकार शुभ वचनोंसे समझाये जानेपर भी बल्वल श्रीकृष्णसे विमुख हो लंबी साँस खींचकर मयसे रोषपूर्वक बोला ॥ २० ॥

बल्वलने कहा – दैत्य! तुम बिना युद्धके ही कैसे भयभीत हो रहे हो, और मेरे सामने ऐसी बात बोल रहे हो जो शूरवीरोंके लिये हास्यजनक है । तुम बुढ़ापे कारण बुद्धि और बल दोनोंसे हीन हो गये हो; इसलिये इस समय मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकता । यद्यपि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं और ये यादव श्रीकृष्णके ही वंशज हैं, तथापि मैं शिवजीका भक्त हूँ । मेरे सामने ये क्या पुरुषार्थ करेंगे? इसलिये तुम भय न करो । तुम्हारी मायाएँ कहाँ चली गयीं? मैं तो तुम्हारे सहारे ही युद्ध करने जा रहा अनिरुद्ध बड़े शूरवीर हैं तो क्या हमलोग शौर्यसे सम्पन्न नहीं हैं? मेरे रहते इस भूमण्डलमें यादवोंका यह बड़ा भारी गर्व क्या है? मेरे धनुषसे छूटे हुए सायकोंद्वारा अनिरुद्ध अपनी वीरताके गर्वका फल प्राप्त करें । दैत्यप्रवर! आज रणभूमिमें मेरे तीखे बाण मानी अनिरुद्धको उसके कवच छिन्न - भिन्न करके रक्तसे लथपथ कर देंगे । आज योगिनियोंके झुंड मनुष्योंकी खोपड़ियोंसे जी भरकर रक्तपान करें । वैरियोंके कच्चे मांसको चबाकर आज महाकाली संतुष्ट हो जाय । अपने महान् कोदण्ड-से करोड़ों भल्लोंकी वर्षा करते हुए मुझ वीरके बाहुबलको समस्त सुभट प्रत्यक्ष देखें ॥ २१–३० ॥ बल्वलकी यह बात सुनकर महाबुद्धिमान् मायावी मय श्रीकृष्णके माहात्म्यको जाननेके कारण उस मदान्ध दैत्यसे इस प्रकार बोला ॥ ३१ ॥

मयने कहा— जब तुम रणक्षेत्रमें श्रीकृष्णके पुत्रों एवं यादवोंको जीत लोगे तब तुम्हें परास्त करनेके लिये श्रीकृष्ण अथवा बलराम यहाँ पदार्पण करेंगे ॥ ३२ ॥

मयकी बात सच्ची और हितकारक थी तो भी कालपाशसे बँधे हुए उस महादैत्यने उसे सुनकर भी नहीं स्वीकार किया; उलटे वह रोषसे जल उठा ॥ ३३ ॥

बल्वलने कहा- बलराम और श्रीकृष्ण मेरे शत्रु हैं । समस्त वृष्णिवंशी यादव मेरे वैरी हैं । जिन्होंने मेरे मित्रोंको मारा है, मैं उन सबको मौतके घाट उतार दूँगा । यहाँ यादवोंका वध करके पीछे मैं भी यज्ञ करूँगा और उस यज्ञके दिग्विजय - प्रसङ्गमें मैं द्वारकापुरीपर विजय पाऊँगा ॥ ३४-३५ ॥ मय बोला- दैत्यराज! घमंड न करो । यह कालरूपी घोड़ा तुम्हारे नगरमें आया है । अबतक मरनेसे जो बच गये हैं, उन महान् असुरोंको मरवा डालनेके लिये ही इसका यहाँ पदार्पण हुआ है । असुरेश्वर! अनिरुद्धके समस्त बाण इसी क्षण तुम्हारी पुरीको छिन्न - भिन्न तथा शूरवीरोंसे हीन कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है । जिन्होंने हिरण्याक्ष आदि दैत्यों तथा रावण आदि निशाचरोंको कालके गालमें भेजा था, वे ही श्रीकृष्ण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं, ऐसा मैंने सुना है । बल्वल! इस छोटेसे राज्यके अभिमान-में आकर तुम उन्हें नहीं जानते हो । मेरे कहने से घोड़ा अनिरुद्धको दे दो । यह हमारे लिये युद्धका समय नहीं है ॥ ३६-३९ ॥ बल्वल बोला- मैं तुम्हारी बात समझता हूँ । तुम यादवोंके साथ युद्ध नहीं करोगे । इसलिये पूर्व-कालमें जैसे रावणका भाई विभीषण श्रीरामके पास चला गया था, उसी प्रकार तुम भी अनिरुद्धके पास चले जाओ ॥ ४० ॥

श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! बल्वलकी यह बात सुनकर मायावियोंमें श्रेष्ठ मयने वहाँ अपने मानसिक दुःखको दूर करनेके लिये इस प्रकार विचार किया - ' पूर्वकालमें वैरभावसे भगवच्चिन्तन करनेके कारण बहुत - से निशाचर और दैत्य वैकुण्ठधामको जा पहुँचे । अतः जो भी उस भावको अपने हृदयमें स्थान देता है, उसकी अवश्य उत्तम गति होती है । ' ऐसा विचार करके मयासुरने सहसा उस महान् असुरसे कहा ॥४१-४२३ ॥ मयासुर बोला - बल्वल! तुम महान् वीर हो । अब मैं तुझे युद्धसे नहीं रोकूँगा । तुम रणभूमिमें जाकर युद्ध करो और अपने सायकोंसे यादवोंको मार

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अध्याय २ ९ ] यादवों और डालो । अब मैं भी तुम्हारे कहनेसे संग्रामभूमिमें जाकर युद्ध ही करूँगा ॥ ४३ —ऐसा कहकर बल्वलको हर्षप्रदान करता हुआ मयासुर मौन हो गया । राजन्! तब ऊर्ध्वकेश, नद, सिंह और कुशाम्ब आदि चार मन्त्रियोंने अत्यन्त कुपित होकर वल्वलसे कहा ॥ ४४-४५ ॥ मन्त्री बोले – दैत्यराज! पहले हमलोग समस्त श्रेष्ठ यादवोंका वध करनेके लिये युद्धके मुहानेपर असुरोंका घोर संग्राम ४८३ जायँगे; क्योंकि हमें बहुत दिनोंसे संग्राम करनेका अवसर नहीं मिला है । राजेन्द्र! चिन्ता मत करो । हमलोग मयदैत्यके साथ रहकर कोटि - कोटि मनुष्योंको क्षणभरमें मार गिरायेंगे ॥ ४६-४७ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ! उन मन्त्रियोंका भाषण सुनकर बल्वलको बड़ी प्रसन्नता हुई । उस रणकोविद दैत्यने उन्हें युद्ध करनेके लिये आज्ञा दे दी ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' दैत्योंकी मन्त्रणाका वर्णन ' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

उन्तीसवाँ यादवों और असुरोंका घोर संग्राम तथा श्रीगर्गजी कहते हैं- राजेन्द्र! तदनन्तर ऊर्ध्व-केश आदि चार मन्त्री कवच बाँधकर करोड़ों दैत्योंकी सेनाके साथ युद्धके लिये नगरसे बाहर निकले । नरेश्वर! वे सब - के - सब धनुर्धर तथा विद्याधरोंके समान शौर्यसम्पन्न थे । लोहेका कवच बाँधकर खड्ग, शूल, गदा, परिघ, मुद्गर, एकघ्नी, दशघ्नी, शतघ्नी, भुशुण्डी, भाले, भिन्दिपाल, चक्र, सायक, शक्ति आदि सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंसे सुसज्जित थे । हाथी, घोड़े, रथ, नीलगाय, गाय, भैंस, मृग, ऊँट, गधे, सूअर, भेड़िये, सिंह, सियार, बड़े - बड़े गीध, शङ्ख, चील, मगर और तिमिङ्गल— इन वाहनोंपर चढ़कर वे रणकर्कश दैत्य युद्धके मैदानमें उतरे । उस समय शङ्ख और दुन्दुभियों-के नादसे, वीरोंकी सिंहगर्जनासे और शतनियों ( तोपों ) की आवाजसे धरती बार - बार हिलने लगी॥१–६३ ॥ असुरोंकी ऐसी भयंकर सेना देखकर महेन्द्र, कुबेर आदि सब देवता भयभीत हो गये । जिन्होंने अनेक वार भूतलपर विजय पायी थी, वे बलवान् यादव भी दैत्योंकी सेना देखकर मन - ही - मन विषादका अनुभव करने लगे । पहले प्रद्युम्नने राजसूय यज्ञके अवसरपर चन्द्रावती नगरीमें जो यादवोंके प्रति नीति और धैर्य बढ़ानेवाली बात कही थी, वह सब प्रद्युम्नकुमारने पुनः उनके समक्ष दुहरायी ॥७–१० ॥ अध्याय ऊर्ध्वकेश एवं अनिरुद्धका द्वन्द्व युद्ध श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर यादवोंने तुरंत अस्त्र - शस्त्र उठा लिये । उन्होंने जीते जाने और माँगनेकी अपेक्षा मौतको श्रेष्ठ माना । फिर तो दैत्योंका यादवोंके साथ उस ' पाञ्चजन्य ' नामक उपद्वीपमें घोर युद्ध होने लगा । ठीक उसी तरह, जैसे पहले लङ्कामें निशाचरोंका वानरोंके साथ युद्ध हुआ था ॥ ११-१२ ॥ वहाँ युद्धमें रथियोंके साथ रथी, पैदलोंके साथ पैदल, घोड़ोंके साथ घोड़े और हाथियोंके साथ हाथी-सभी आपसमें जूझने लगे । राजन्! उस महासमरमें कितने ही मतवाले हाथियोंने अपने शुण्डदण्डसे रथोंको चकनाचूर कर दिया तथा घोड़ों और पैदल - वीरोंको मार गिराया । घोड़ों और सारथियों सहित रथोंको सूँड़में लपेटकर वे धरतीपर गिरा देते और फिर बलपूर्वक उठाकर आकाशमें फेंक देते थे । राजन्! कितने ही क्षत - विक्षत गजराज समराङ्गणसे बाहर भाग रहे थे । उन्होंने कितनोंको अपनी सुदृढ़ सूँड़ोंसे विदीर्ण करके दो पैरोंसे मसल डाला । नृपेश्वर! वीर सवारोंसहित घोड़े वहाँ दौड़ते हुए रथोंको लाँघ जाते और उछलकर हाथियोंपर चढ़ जाते थे । वे सिंहकी भाँति युद्धमें महावत और हाथीसवारको रौंदते जाते थे । महाबली अश्व उछलते हुए हाथियोंकी सेनामें घुस जाते और उनके सवार खड्गप्रहार करके बहुत - से

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४८४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड शत्रुओंको विदीर्ण कर डालते थे । नटोंकी भाँति कभी तो घोड़ोंकी पीठपर नहीं दिखायी देते और कभी दिखायी देते थे । कितने ही वीर खड्गोंसे घोड़ोंके दो टुकड़े कर डालते और कितने ही हाथियोंके दाँत पकड़कर उनके कुम्भस्थलोंपर चढ़ जाते थे । कितने ही घुड़सवार योद्धा भी तलवारोंको बड़े वेगसे चलाकर शत्रुसेनाको विदीर्ण करते हुए बाहर निकल जाते थे, जैसे हवा कमलोंके वनमें समाकर अनायास ही निकल जाती है ॥ १३ – २१ ॥ उन दोनों सेनाओंमें बाणों, गदाओं, परिघों, खड्गों, शूलों और शक्तियोंद्वारा अद्भुत तथा रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध होने लगा । उस युद्धके मैदानमें हाथी चिग्घाड़ते और घोड़े जोर - जोरसे हिनहिनाते थे । बहुत से पैदल वीर हाय - हाय करते और रथोंकी नेमियाँ ( पहियोंके ऊपरी भाग ) घरघराहट पैदा करती थीं । सेनाके पैरोंकी धूलराशिसे आकाश अन्धा - सा हो गया था । वहाँ समराङ्गणमें कोई अपना पराया नहीं सूझता था । परस्पर बाणसमूहोंकी वर्षासे कितने ही वीरोंके दो - दो टुकड़े हो गये थे । युद्धस्थलमें टेढ़े हुए रथ वृक्षोंकी भाँति गिर पड़ते थे । वीरोंके ऊपर वीर और घोड़ोंके ऊपर घोड़े गिरे थे । उस युद्धके मैदानमें शूरवीरोंके भयंकर कबन्ध उछल रहे थे । वे उस महासमरमें खड्गहस्त हो घोड़ों और वीरोंको धराशायी कर रहे थे । वहाँ शस्त्रोंके प्रहारसे घना अन्धकार छा गया था । हाथियोंके कुम्भस्थल फट जानेसे उनके भीतरी छिद्रसे गोल - गोल मोती गिर रहे थे, मानो रातमें आकाशसे तारागण बिखर रहे हों ॥ २२ - २७ ॥ तदनन्तर दोनों सेनाओंमें रक्तकी नदी बह चली और वेतालगण भगवान् शिवकी माला बनानेके लिये कटे हुए मुण्डोंका संग्रह करने लगे । सिंहवाहिनी महाकाली डाकिनियोंके साथ युद्धस्थलमें आकर खप्परसे रक्तपान करती हुई दिखायी देती थीं । डाकिनियाँ भी वहाँ अपने बच्चोंको गरम - गरम रक्त पिलातीं और ' मत रोओ, चुप रहो ' – ऐसा कहती हुई उनके नेत्र पोंछती थीं । विद्याधरियाँ, गन्धर्वियाँ और अप्सराएँ आकाशमें खड़ी हो, क्षत्रियधर्ममें स्थित रहकर वीरगतिको पानेवाले देवरूपधारी शूरवीरोंका वरण करती थीं; उनमें परस्पर पतिके लिये झगड़ा हो जाता था । वे आकाशमें विह्वलचित्त होकर एक-दूसरीसे कहतीं - ' यह वीर तो मेरे ही योग्य है, तुम्हारे योग्य नहीं ' ॥ २८–३२ ॥ राजन्! कितने ही धर्मपरायण शूरवीर युद्धभूमिसे विचलित नहीं हुए और वीरगतिको प्राप्त हो सूर्यमण्डलका भेदन करके विष्णुधाममें चले गये । नरेश्वर! कितने ही वीर उस महायुद्धको देखकर रणभूमिसे भागते हुए मारे गये । वे यमलोकके तप्त-बालुकावाले मार्गसे नरकमें गये । इस प्रकार समस्त यदुकुलशिरोमणि वीरोंने महान् दैत्यवीरोंका संहार कर डाला । इसी तरह उस महायुद्धमें दानवोंने भी नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा यादव - सैनिकोंको भी कालके गालमें भेज दिया ॥ ३३ – ३५ ॥ राजन्! करोड़ोंकी संख्यामें युद्धके लिये आये हुए समस्त दैत्य उस समराङ्गणमें मृत्युके ग्रास बन गये तथा सहस्रों यादव भी रणभूमिमें मारे गये । जब वहाँ बाण-वर्षासे अन्धकार छा गया, तब धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्ध ऊर्ध्वकेशके साथ उसी प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे वृत्रासुरके साथ इन्द्रने किया था । नृपेश्वर! नदके साथ गद सिंहके साथ वृक और कुशाम्बके साथ साम्ब उस समराङ्गणमें लोहा लेने लगे । इस प्रकार उनमें परस्पर बड़ा भारी तुमुल युद्ध छिड़ गया ॥ ३६–३८ ॥ महाराज! उस समय बारंबार धनुष टंकारते हुए ऊर्ध्वकेशने युद्धस्थलमें प्रद्युम्न कुमारको दस नाराच मारे । परंतु श्रेष्ठ धनुर्धर रुक्मवतीनन्दन भगवान् अनिरुद्ध उन सबको काट गिराया । तब ऊर्ध्वकेशने पुनः उनके कवचपर दस बाण मारे । वे सभी सोनेके पंखोंसे विभूषित थे और अनिरुद्धका कवच काटकर उनके शरीरमें घुस गये थे । फिर उसने चार बाणोंसे उनके चार घोड़ोंको मार गिराया । बीस बाणोंद्वारा प्रत्यञ्चासहित उनके धनुषको खण्डित कर दिया । राजेन्द्र! बल्वलके उस बलवान् सेवकने जब अनिरुद्धके रथको बेकार कर दिया, तब वे उस रथको छोड़कर दूसरे रथपर आरूढ़ हो गये । नृपश्रेष्ठ! वह रथ इन्द्रका दिया हुआ था । उसपर चढ़कर महान् वीर अनिरुद्धने ' प्रतिशार्ङ्ग ' नामक धनुष हाथमें लिया ।