गर्ग संहिता — पृष्ठ 491–500
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
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अध्याय ३० ] ऊर्ध्वकेश और अनिरुद्धका तथा नद और गदका घोर युद्ध ४८५ श्रीकृष्णके दिये हुए उस कोदण्डपर एक बाण रखकर प्रकार उसे आकाशसे पृथ्वीपर गिरा दिया । ऊर्ध्वकेश-रोषसे भरे हुए प्रद्युम्न कुमारने हाथकी फुर्ती दिखाकर का रथ अङ्गारकी तरह बिखर गया । नृपश्रेष्ठ! ऊर्ध्वकेशके रथपर चलाया । उस सायकने ऊर्ध्वकेश- सारथिसहित उसके घोड़े भी उसके सामने ही पञ्चत्वको के रथको ऊपर ले जाकर दो घड़ीतक घुमाया । फिर प्राप्त हो गये । ऊर्ध्वकेश आकाशसे गिरनेके कारण जैसे कोई बालक शीशेका बर्तन पटक देता है, उसी समराङ्गणमें मूच्छित हो गया ॥ ३ ९ -४७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' यादवों तथा असुरोंके संग्रामका वर्णन ' नामक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥ तीसवाँ ऊर्ध्वकेश और अनिरुद्धका तथा नद और श्रीगर्गजी कहते हैं— महाराज! तब ऊर्ध्वकेश मूर्च्छासे उठकर, दूसरे रथपर आरूढ़ हो ज्यों ही अनिरुद्धके सामने संग्रामके लिये आया, त्यों ही उन्होंने अपने तीखे नाराचोंसे उसके रथके टुकड़े - टुकड़े कर डाले । नरेश्वर! रथको टूटा देख उसने पुनः दूसरे रथका आश्रय लिया । परंतु प्रद्युम्नकुमारने रणभूमिमें तत्काल ही बाण मारकर उसके उस रथको भी खण्डित कर दिया । इस प्रकार समराङ्गणमें ऊर्ध्वकेशके नौ रथ अनिरुद्धके द्वारा तोड़े गये॥१–३ ॥ तब उस दैत्यने कुपित होकर रणक्षेत्रमें अनिरुद्धपर तीव्रगतिसे शक्तिका प्रहार किया । उस शक्तिको अपने ऊपर आती देख वीर अनिरुद्धने अनेक नाराचोंसे उसके दस टुकड़े कर डाले । तब युद्धस्थलमें सुवर्ण-मय रथपर आरूढ़ हो ऊर्ध्वकेश अनिरुद्धका सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आया । आते ही हर्षोत्साहसे भरकर उसने अनिरुद्धको पाँच बाणोंसे घायल कर दिया । उन बाणोंके आघातसे अनिरुद्धको बड़ी वेदना हुई । तब कुपित हुए अनिरुद्धने धनुष उठाकर सहसा हाथकी फुर्ती दिखाते हुए ऊर्ध्वकेशकी छातीमें विचित्र पाँखवाले दस बाण मारे उन अत्यन्त दारुण बाणोंने उसका रक्त पी लिया और पीकर उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े, जैसे झूठी गवाही देनेवालोंके पूर्वज नरकमें गिरते हैं ॥ ४-८ ॥ तदनन्तर पुनः कुपित हुए ऊर्ध्वकेशने ' खड़ा रह, खड़ा रह ' — ऐसा कहते हुए दस बाणोंद्वारा अनिरुद्धके अध्याय गदका घोर युद्ध; ऊर्ध्वकेश और नदका वध मस्तकपर प्रहार किया । राजेन्द्र! वे दसों बाण अनिरुद्धकी पगड़ीमें गड़ गये और वृक्षकी दस शाखाओंके समान शोभा पाने लगे । नृपश्रेष्ठ! जैसे फूलोंद्वारा प्रहार करनेपर हाथीको कोई पीड़ा नहीं होती, उसी प्रकार युद्धस्थलमें उन बाणोंके आघातसे रुक्मवतीकुमार अनिरुद्धको व्यथा नहीं हुई । माधव अनिरुद्धने अत्यन्त रोषसे भरकर विचित्र पाँखवाले तथा सुवर्णमय पंखवाले सौ बाण अपने धनुषपर रखकर प्रत्यञ्चा खींचकर छोड़े । राजन्! वे बाण ऊर्ध्वकेशके सारे अङ्गका भेदन करके रक्तरञ्जित हो शीघ्र ही नीचे गिर गये; ठीक उसी तरह, जैसे श्रीकृष्ण-भक्तिसे विमुख मनुष्य अधोगतिको प्राप्त होते हैं । उन बाणसमूहोंसे आहत होनेपर युद्धस्थलमें ऊर्ध्वकेशके प्राणपखेरू उड़ गये । नृपश्रेष्ठ! उस समय दैत्यसेनामें हाहाकार मच गया । यादवोंकी सेनामें ' जय हो, जय हो ' की ध्वनि गूँज उठी और देवतालोग अनिरुद्धके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे । यादवराज! ऊर्ध्वकेश उस युद्धस्थलसे दिव्य देह धारण करके विमानपर आरूढ़ हो पुण्यात्माओंके निवासस्थान स्वर्गलोकमें चला गया ॥ ९ -१६ ॥ भाईको मारा गया देख नद शोकसे भर गया । हाथीपर बैठे हुए उस दैत्यने गजराजपर विराजमान गदको लक्ष्य करके अनेक बाण छोड़े । उन बाणोंको अपने ऊपर आया देख महान् धनुर्धर गदने अनिरुद्ध के देखते - देखते एक ही बाणसे उन सबको काट दिया ।
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४८६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड भाईके शोक में डूबे हुए नदने अत्यन्त कुपित होकर संग्राममें अपने बाणोंके प्रहारसे रोहिणीनन्दन गदको गजहीन कर दिया- उनके हाथीको मार गिराया । सैकड़ों बाणोंके आघातसे उस हाथीके अङ्ग अङ्ग विदीर्ण हो गये थे, इसलिये वह पञ्चत्वको प्राप्त हो गया और गद उसके साथ ही भूमिपर गिर पड़े । वह अद्भुत - सी घटना घटित हुई । तब गद क्रोधसे जल उठे और रणभूमिमें गदा लेकर शत्रुको मारनेके लिये उसी तरह आगे बढ़े, जैसे वनमें एक सिंह दूसरे सिंहपर आक्रमण करता है ॥ १७–२१ ॥ राजन्! आते ही नदके हाथीने गदको अपनी सूँड़में लपेटकर आकाशमें सौ योजन ऊपर फेंक दिया । आकाशसे गिरनेपर गदने उठकर हाथीके शुण्डदण्डको पकड़ लिया और उसे घुमाकर पृथ्वीपर दे मारा । उस हाथीकी युद्धस्थलमें तत्काल मृत्यु हो गयी । यह देखकर महान् असुर नदको आश्चर्य हुआ । उसने गदकी प्रशंसा करके एक भारी गदा हाथमें ली और शीघ्र ही गदाधारी वीर गदको युद्धके लिये ललकारा । प्रजानाथ! इसी प्रकार गदने भी दैत्य नदका अपने साथ संग्रामके लिये आह्वान किया । नदने गदको उत्तर दिया- ' यादव! तू मनुष्य है । अतः तेरे साथ युद्ध करनेमें मुझे लज्जाका अनुभव हो रहा है । भला तू कैसे मेरे साथ युद्ध करेगा? पहले तू मुझपर प्रहार कर । पीछे मेरे प्रहारसे तू जीवित नहीं रह सकेगा'॥२२–२६३ ॥ यह सुनकर गदने उससे उसी प्रकार बात की, जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरसे वार्तालाप किया था ॥ २७ ॥
गद बोले – दैत्य! जो मुँहसे बड़ी - बड़ी बातें बनाते हैं, वे कुछ कर नहीं पाते । जो शूरवीर हैं, वे रणभूमिमें डींग नहीं हाँकते हैं; अपना पराक्रम दिखाते हैं ॥ २८ ॥
राजेन्द्र! यह सुनकर नद कुपित हो उठा । उसने गर्जना करते हुए अपनी भारी और विशाल गदा गदकी छातीपर दे मारी । गदाकी चोट खाकर भी वीरवर गद युद्धभूमिमें उसी प्रकार विचलित नहीं हुए, जैसे मदोन्मत्त हाथी किसी बालकद्वारा फूलसे मारे जानेपर उसकी कोई परवाह नहीं करता । दानव लज्जित हो गया था । उसकी ओर देखकर वीरशिरोमणि गदने कहा - ' परंतप! यदि तुम वीर हो तो मेरा भी एक प्रहार सहन कर लो ' ॥ २ ९ -३१ ॥ - ऐसा कहकर गदने गदासे उसके ललाटपर भारी चोट पहुँचायी । धर्मज्ञ नदने भी कुपित होकर गदके कंधेपर गदा मारी । वे दोनों वीर गदायुद्धमें कुशल थे और इस प्रकार भारी आघात करते हुए एक - दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे गदायुद्धमें लगे रहे । दोनों परस्परके आघातसे खिन्न हो क्रोधसे भरकर विजयके प्रयत्नमें तत्पर रहे । परंतु वहाँ उनमें से कोई भी न तो हारता था और न उत्साहहीन ही होता था । भालपर, कंधेपर, मस्तकपर, वक्षःस्थलमें तथा सम्पूर्ण अङ्गोंमें आघात लगनेसे वे लहूलुहान हो रक्तसे भीग गये थे और दो खिले हुए पलाश वृक्षोंके समान दिखायी पड़ते थे । समराङ्गणमें गदाओंद्वारा उन दोनोंका महान् युद्ध चल रहा था । उनकी दोनों गदाएँ आगकी चिनगारियाँ छोड़ती हुई परस्पर चूर - चूर हो गयीं । तब उन दोनों - गद यादव और नद दैत्यमें घोर बाहुयुद्ध होने लगा । उस समय रोषसे भरे हुए बलराम-के छोटे भाई गदने नदको अपनी बाँहोंसे पकड़कर उसी तरह पृथ्वीपर दे मारा, जैसे सिंहराज किसी भैंसे-को पटक देता है । तब दैत्यने गदकी छातीमें मुक्केसे प्रहार किया । लगे हाथ गदने भी उसके मस्तकपर एक बँधा हुआ मुक्का जड़ दिया । मुक्कों, घुटनों, पैरों, तमाचों और भुजाओंसे वे दोनों एक - दूसरेपर प्रहार कर रहे थे और दोनों ही रोषसे अपने अधरपल्लव दबाये हुए थे । तब समरभूमिमें दैत्यने कुपित हो बलपूर्वक गदका एक पैर पकड़ लिया और घुमाकर उन्हें धरतीपर दे मारा । उसी समय रोषसे जलते हुए गदने भी उठकर शत्रुका एक पैर पकड़कर उसे घुमाते हुए हाथी पृष्ठभागपर पटक दिया ॥ ३२ - ४१ ॥ राजन्! दैत्यने फिर उठकर रोहिणीकुमारको जा पकड़ा और बलपूर्वक आकाशमें उन्हें सौ योजन ऊपर फेंक दिया । वहाँसे गिरनेपर भी वज्रके समान अङ्गवाले गदको कोई चोट नहीं पहुँची; किंचिन्मात्र मनमें व्याकुलता । फिर उन्होंने उस दैत्यको भी एक सहस्र योजन ऊपर उछाल दिया । उतनी ऊँचाईसे
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अध्याय ३१ ] वृकद्वारा सिंहका और साम्बद्वारा कुशाम्बका वध ४८७ गिरनेपर भी वह दैत्य फिर उठकर युद्ध करने लगा । गद नदको और नद गदको पारस्परिक आघातोंद्वारा चोट पहुँचाते रहे । नृपेश्वर! भयंकर घूँसोंकी मारसे उन दोनोंमें महान् युद्ध छिड़ा हुआ था । दोनोंमें लाठा - लाठी, मुक्का - मुक्की, केशा - केशि ( झॉटा - झोंटी ) नखा- नखि ( बकोटा - बकोटी ) और दाँता - दाँती होने लगी । इस प्रकार घोर युद्ध छिड़ा हुआ था । इस तरह जूझते हुए वे दोनों योद्धा बारंबार मारा - मारी कर रहे थे । एक - दूसरेके वधकी इच्छासे दोनों आपसमें इस प्रकार गुँथ गये कि पैरपर पैर, छातीपर छाती, हाथ पर हाथ और मुँहपर मुँह सट गया था । बलपूर्वक आक्रमणके शिकार होकर वे दोनों गिरे और मूच्छित हो गये । नरेश्वर! उन दोनोंका ऐसा युद्ध देखकर दानव और यादव बोलने लगे - ' गद धन्य है, नद धन्य है ॥ ४२–४९ ॥ गदको गिरा देख अनिरुद्ध शोकमें डूब गये । उन्होंने जल छिड़कर और व्यजन डुलाकर गदको होशमें लानेकी चेष्टा की । राजेन्द्र! वे तत्काल क्षणभरमें उठकर खड़े हो गये और बोल उठे-' कहाँ नद है, कहाँ नद है! वह मेरे भयसे युद्ध छोड़कर भाग तो नहीं गया? ' लोगोंने देखा वह दानव वहाँ मूच्छित होकर प्राणशून्य हो गया था । फिर तो यादव और देवतालोग जय - जयकार करने लगे ॥५०-५२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' ऊर्ध्व - केश और नदका वध ' नामक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
इकतीसवाँ अध्याय वृकद्वारा सिंहका और साम्बद्वारा कुशाम्बका वध श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! अपनी सेनाकी पराजय होती देख गदहेपर चढ़ा हुआ ' सिंह ' नामक दैत्य रोषसे आगबबूला हो उठा और रथपर बैठे हुए वृकपर बाणोंद्वारा प्रहार करने लगा । नरेश्वर! उन बाणोंको अपने ऊपर आया देख युद्धस्थलमें श्रीकृष्ण-नन्दन वृकने खेल - खेलमें ही बाण मारकर उन्हें काट गिराया । सिंहने फिर बाण मारे और श्रीकृष्णकुमारने फिर उन्हें काट डाला॥१-२३ ॥ राजन्! फिर तो रणक्षेत्रमें असुरराज सिंहके क्रोधकी सीमा न रही । उसने धनुषपर आठ बाण रखे । उनमेंसे चार बाणोंद्वारा उस वीरने वृकके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया, एक बाणसे हँसते हुए उसने वेगपूर्वक उनके रथकी बहुत ही ऊँची और भयंकर ध्वजा काट डाली और एक बाणसे सारथिका सिर धड़ से अलग करके पृथ्वीपर गिरा दिया । फिर एक बाणसे रोषपूर्वक रणभूमिमें उनके प्रत्यञ्चासहित धनुषको काट दिया और एक बाणसे उस वेगशाली दैत्यने वृककी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३-६ ॥ उसके उस अद्भुत कर्मको देखकर सब वीरोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । उसी समय वृकने सहसा उस दैत्यपर शक्तिसे आघात किया । वह शक्ति उसके शरीरको छेदकर और गदहेको भी विदीर्ण करके बाहर निकल गयी । राजन्! जैसे साँप बिलमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह शक्ति सिंहको घायल करके धरतीमें समा गयी । गदहा तो वहीं मर गया और दैत्य भी तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा । परंतु वह दैत्य पुनः उठकर सिंहके समान जोर - जोरसे गर्जना करने लगा । उसने वृकके ऊपर एक शिखारहित शूल लेकर चलाया । अपने ऊपर आते हुए उस शूलको वृकने समराङ्गणमें अपने हाथसे पकड़ लिया । राजन्! फिर उसी शूलसे अत्यन्त कुपित हुए कृष्णकुमारने शत्रुपर आघात किया । सिंहका शरीर विदीर्ण हो गया । वह हाय - हाय करता हुआ पृथ्वीपर गिरा और मर गया । उसी समय समराङ्गणमें दानवोंका महान् हाहाकार प्रकट हुआ । देवताओंने फूलोंकी वर्षा की और श्रेष्ठ यादव - वीर ' जय - जयकार करने लगे ॥ ७ – १२ ॥ तब क्रोधसे भरे हुए कुशाम्बने युद्धके मैदानमें रथपर आरूढ़ हो शीघ्र आकर साम्ब आदि समस्त
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४८८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड यादवोंको अपने सायकोंद्वारा बींधना आरम्भ किया । उसके बाणोंसे छिन्न - भिन्न होकर बहुत - से विशाल गजराज धराशायी हो गये, रथ उलट गये और युद्धमें बहुत - से घोड़ोंकी गर्दनें कट गयीं तथा बहुत से पैदल योद्धा बिना सिर और भुजाओंके हो गये । राजन्! इस प्रकार कुशाम्ब अनेक वीरोंको मारता - काटता हुआ युद्धभूमिमें विचरने लगा । उसका ऐसा पराक्रम देखकर युद्धकुशल जाम्बवतीनन्दन साम्बने युद्धके लिये कुशाम्बको ललकारा ॥ १३–१६ ॥ साम्ब बोले- वीर! आओ और सहसा मेरे साथ युद्ध करो । दूसरे करोड़ों दीन मनुष्योंको डरानेसे क्या लाभ होगा? ॥ १७ ॥
– ऐसा कहते हुए साम्बकी ओर देखकर बलवान् कुशाम्ब हँसने लगा । उसने साम्बकी छातीमें आठ बाण मारे । श्रीहरिके पुत्र साम्ब उसकी इस धृष्टताको सहन न कर सके । उन्होंने अपने कोदण्डपर सात बाणोंका संधान करके उनके द्वारा उस शत्रुभूत दानवकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी । दोनों ही युद्धके लिये रोषावेशसे भरे थे और दोनों ही अपनी - अपनी जीत चाहते थे । संग्रामभूमिमें वे दोनों योद्धा स्कन्द तथा तारकासुरके समान शोभा पाते थे । युद्धस्थलमें साम्बने कुशाम्बपर और कुशाम्बने साम्बपर आपसमें सर्पसदृश बाणोंकी वर्षा आरम्भ की । कुशाम्बने अपने धनुषपर सौ चमकीले बाणका संधान करके उनके द्वारा साम्बको रथहीन कर दिया और उनके धनुषको भी काट डाला । जब धनुष कट गया, रथ टूट गया तथा घोड़े और सारथि मारे गये, तब साम्ब दूसरे रथपर आरूढ़ हुए तथा कुपित हो धनुष हाथमें लेकर बोले ॥ १८- २३ ॥ साम्बने कहा- दैत्य! ऐसा विशाल पराक्रम प्रकट करके अब तुम कहाँ जाओगे? क्षणभर संग्राम-भूमिमें ठहरकर मेरा उत्तम पराक्रम देख लो ॥२४ ॥
- ऐसा कहकर साम्बने अपने कोदण्डपर एक उग्र सायकका संधान किया और उसे दिव्य - मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके कुशाम्बके रथपर छोड़ दिया । उस बाणसे आहत हो कुशाम्बका रथ घोड़े और सारथि -सहित अलातचक्रकी भाँति भूतलपर चक्कर काटने लगा । चक्कर काटते - काटते वह शीघ्र ही एक योजनतक चला गया । रथसहित दैत्यको घूमते देख जाम्बवतीनन्दन साम्बके मुखपर हास्यकी छटा छा गयी और वे धनुषपर एक बाण रखकर बोले ॥ २५–२७ ॥ साम्बने कहा - असुरेश्वर! तुम्हारे जैसे महान् वीर, जो देवेन्द्रके तुल्य पराक्रमी हैं, स्वर्गलोकमें रहनेके योग्य हैं । इस धरतीपर उनकी शोभा नहीं होती है । अतः मेरे इस दूसरे बाणसे रथसहित तुम सदेह स्वर्गमें चले जाओ । यह तुम्हारे ऊपर मेरी बड़ी कृपा होगी ॥ २८-२९ ॥ – ऐसा कहकर साम्बने आकाशमें पहुँचानेवाला दिव्यास्त्र छोड़ा । नरेश्वर! उस बाणसे रथसहित कुशाम्ब चक्कर काटता हुआ धरतीसे ऊपरको उठा और बहुत-से लोकोंको लाँघकर सूर्यमण्डलमें जा पहुँचा । वहाँ पहुँचकर घोड़े और सारथिसहित उसका रथ सूर्यकी ज्वालामें जल गया तथा उस दैत्यका शरीर भी तत्काल दग्ध होकर पृथ्वीपर आसुरी पुरीमें बल्वलके समीप गिर पड़ा । उस पापी दानवके गिरने और मर जानेपर समस्त दैत्य भयभीत हो हाहाकार करने लगे । उस समय यादवोंकी सेनामें बार - बार दुन्दुभियाँ बजने लगीं । देवता साम्बके रथपर सानन्द पुष्पवर्षा करने लगे ॥ ३० – ३४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' सिंह और कुशाम्बका वध ' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
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बत्तीसवाँ अध्याय मयको बल्वलका समझाना; बल्वलकी युद्धघोषणा; समस्त दैत्योंका युद्धके लिये निर्गमन; विलम्बके कारण सैन्यपालके पुत्रका वध तथा दुःखी सैन्यपालको मन्त्रिपुत्रों का विवेकपूर्वक धैर्य बँधाना श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर सोनेके सिंहासनपर बैठे और शोकमें डूबे हुए दैत्य बल्वलसे मय उसी प्रकार बोला, जैसे कुम्भश्रुति अपने ज्येष्ठ बन्धुसे बात कर रहा हो ॥१ ॥
नरेश्वर! आज तुमने यादवोंका बल देख लिया । दैत्यसमूहसहित तुम्हारे चार मन्त्री मारे गये । अब तुम्हारे नगरमें प्रमुख लोगोंमेंसे तुम बचे हो और मैं । दैत्यराज! अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ॥२-३ ॥ बल्वल बोला- अब मैं यादवोंका शीघ्र विनाश करनेके लिये रणभूमिमें जाऊँगा । तुम मेरे महलमें छिपे रहो । हरि श्रीकृष्ण तो पहले ' नन्दका पुत्र ' कहा जाता था । अब यह निर्लज्ज वसुदेव उसे अपना पुत्र मानता है । वह गोपियोंके घरसे माखन, दूध, घी, दही और तक्र आदि चुराया करता था । रासमण्डलमें रसिया बनकर नाचता था । अब जरासंधके भयसे उसने समुद्रकी शरण ली है । जिसने अपने मामाको मारा है, वह क्या पुरुषार्थ करेगा ॥ ४ – ७ ॥ बल्वलकी यह बात सुनकर मयको बड़ा क्रोध हुआ । वह बोला ॥७३ ॥
मयने कहा — ओ निन्दक! जिससे ब्रह्मा, शिव, माया ( दुर्गा ) और इन्द्र भी डरते हैं, ऐसे सबको भय देनेवाले नित्य निर्भय श्रीकृष्णकी तू निन्दा कर रहा है । जो मूर्ख अज्ञानवश और कुसङ्गके कारण श्रीकृष्णकी निन्दा करता है, वह तबतक कुम्भीपाकमें पड़ा रहता है, जबतक ब्रह्माजीकी आयु पूरी नहीं हो जाती * । जिन्होंने चण्डपाल और शिशुपालकी मण्डलीका खण्डन किया है, जो दानवोंके दलका दमन करने-वाले हैं, उन परमात्मा मदनमोहन माधवका तू अपने
* कृष्णं निन्दति यो मूढो ह्यज्ञानाच्च कुसङ्गतः ।
कुलकी कुशलताके लिये भजन कर ॥ ८ - ११ ॥
मयका यह वचन सुनकर बल्वल परम ज्ञानको प्राप्त हो गया । राजेन्द्र! उसने क्षणभर विचार करके हँसते हुए - से कहा ॥ १२ ॥
बल्वल बोला- मैं जानता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण विश्वके पालक हैं, बलरामजी साक्षात् भगवान् शेषनाग हैं, प्रद्युम्न कामदेवके अवतार हैं और यहाँ आये हुए अनिरुद्ध साक्षात् ब्रह्माजी हैं । इन्हींके हाथसे हमारा वध होनेवाला है, यह सोचकर ही मैंने इस अश्वका अपहरण किया है । उनके बाणोंसे मारा जाकर यदि मैं मृत्युको प्राप्त होऊँगा, तो शीघ्र ही सुखपूर्वक भगवान् विष्णुके परमपदको चला जाऊँगा । पहले भी बहुत - से दानव तथा राक्षस वैरभावसे भगवान्का भजन करके वैकुण्ठधाममें जा चुके हैं । अतः मैं भी उसी वैरभावका आश्रय ले रहा हूँ ॥ १३-१५ ॥ - ऐसा कह कवच धारण करके दानवशिरोमणि बल्वलने तुरंत ही अपने सेनापतिको बुलाया और इस प्रकार कहा - " सेनापते! तुम प्रयत्नपूर्वक ढिढोरा पिटवाकर इस पुरीमें मेरा यह आदेश प्रसारित कर दो कि ' वीरोंमेंसे जो लोग भी बच गये हैं, वे अनिरुद्ध साथ युद्धके लिये चलें । ' जो मेरी आज्ञा नहीं मानेंगे, वे बेटे अथवा भाई ही क्यों न हों, युद्ध किये बिना वधके योग्य समझे जायँगे " ॥ १६-१८ ॥ बल्वलका ऐसा आदेश सुनकर सेनापतिने गली-गली और घर - घरमें डंका बजाकर बड़े वेगसे उसकी आज्ञा घोषित कर दी । ढिंढोरेके साथ की गयी इस घोषणाको सुनकर समस्त दैत्य भयसे आतुर हो गये और शीघ्र ही सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र लेकर वे कुम्भीपाके स पतति यावद्वै ब्रह्मणो वयः ॥ ( अ ० ३२ । १० )
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४ ९ ० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड बल्वलके सभाभवनमें आ गये । तब सबसे पहले सैन्यपाल लाख दैत्योंसे घिरकर, कवच और धनुषसे सुसज्जित हो, रथके द्वारा नगरसे बाहर निकला । दुर्नेत्र, दुर्मुख, दु: स्वभाव और दुर्मद - ये मन्त्रियोंके चार पुत्र भी युद्धके लिये निकले ॥ १ ९ –२२ ॥ बल्वलके साथ महामत्त गजराज, चपल अङ्गवाले तुरङ्ग तथा देवविमानोंके समान आकारवाले रथ थे । विद्याधरोंके समान पैदल योद्धा भी साथ चल रहे थे । इस चतुरङ्गिणी सेनाके साथ तत्काल मयके दिये हुए एवं इच्छानुसार चलनेवाले यानपर बैठकर बल्वल स्वयं युद्धके लिये प्रस्थित हुआ । उसके साथ चार लाख बड़े - बड़े असुर थे । सैन्यपालका पुत्र भूखा था और घरपर भोजन कर रहा था, इसलिये युद्धके निमित्त शीघ्र नहीं निकल सका । सेनामें उसे नहीं आया देख बल्वलके सैनिकोंने डरते - डरते दैत्यराजसे उसके अनुपस्थित होनेकी बात बतायी । तब बल्वलके आदेशसे कई वीर गये और उसे रोषपूर्वक रस्सियोंसे बाँधकर राजाके सामने ले आये । इस सफलतासे उनके मुख और नेत्र खिल उठे थे ॥ २३ - २७ ॥ सैन्यपालके पुत्रको देखकर प्रचण्ड शासक बल्वलने बहुत फटकारा और वेगपूर्वक उसके मुखपर भुसुण्डी मार दी । सैन्यपालके पुत्रका वध हुआ देख सब दैत्य भयभीत हो उठे । सैन्यपाल संग्राममें अपने पुत्रको मार दिया गया सुनकर दुःखसे आतुर हो हाथोंसे माथा पीटता हुआ रथसे गिर पड़ा । वह पुत्रके दुःखसे दुःखी हो अत्यन्त विलाप करने लगा -' हा पुत्र! हा वीर! मुझ वृद्ध पिताको छोड़कर रणक्षेत्रमें शतघ्नीके मार्गसे तुम स्वर्गको चले गये । मेरा दर्शनतक नहीं किया । बेटा! तुम राजाके शासनसे युद्ध किये बिना ही कहाँ चले गये? ' इस तरह विलाप करता हुआ सैन्यपाल समराङ्गणमें रो रहा था । तब मन्त्रियोंके पुत्रोंने शोकमग्न सैन्यपालके सामने आकर कहा॥२८–३२ ॥ मन्त्रिपुत्र बोले- सेनापते! तुम तो शूरवीर हो, रणभूमिमें आकर रोदन न करो । शोक करनेपर भी जो मर गया, वह तुम्हारे पास लौटकर नहीं आयेगा । मृत्यु जीवधारियोंके पीछे जन्मकालसे ही लगी रहती है । वही इस समय प्राप्त हुई है । धीर पुरुष मृत्युके लिये शोक नहीं करते हैं । मूर्खलोग ही मृत पुरुषके लिये सदा शोकमें डूबे रहते हैं । कोई गर्भमें मर जाते हैं, किसीकी जन्म लेते ही मृत्यु हो जाती है, कोई बचपनमें और कोई जवानीमें ही काल - कवलित हो जाते हैं, कोई - कोई ही बुढ़ापेमें मरते हैं । कोई शस्त्रसे, कोई अस्त्रसे, कोई दुःखसे और कोई ऊँचे स्थानसे गिरनेके कारण मृत्युके वशीभूत होते हैं । दैववश कर्मके अधीन हुए सभी जीव एक दिन मृत्युको प्राप्त होंगे । कौन किसका पिता और पुत्र है? अथवा कौन किसकी माता या प्रियतमा पत्नी है । विधाता कर्मके अनुसार प्राणियोंमें संयोग और वियोग कराया करता है । संयोगमें बड़ा आनन्द मिलता है और वियोगमें प्राण-संकटकी घड़ी आ जाती है । ऐसी अवस्था सदा मूर्खो-की ही हुआ करती है । आत्माराम पुरुष निश्चय ही हर्ष-शोकके वशीभूत नहीं होते हैं । तुम दुःखी होकर जब अपने प्राणोंका त्याग कर रहे हो तो आत्मघाती बनोगे । इसका परिणाम यह होगा कि नरकमें पड़ोगे और फिर जन्म लोगे, इसमें संशय नहीं है । इसलिये इस महा-समरमें तुम श्रेष्ठ यादव - वीरोंके साथ युद्ध करो । क्षत्रियवृत्तिवाले लोगोंके लिये धर्मयुद्धसे बढ़कर परम कल्याणका साधन दूसरा कोई नहीं है । जो समराङ्गणमें धर्मयुद्ध करते हुए शत्रुके सामने वीरगतिको प्राप्त होते हैं, वे समस्त लोकोंको लाँघकर भगवान् विष्णुके परम धाममें चले जाते हैं ॥ ३३–४१३ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! उन दैत्योंके इस प्रकार समझानेपर सैन्यपालने सब शोक त्याग दिया तथा रोषसे भरकर वहाँ आये हुए समस्त वीरोंका निरीक्षण किया । संग्रामभूमिमें सबपर दृष्टिपात करके रोषसे जलते हुए सैन्यपालने शीघ्र ही यह बात कही॥४२-४३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' सैन्यपालके पुत्रका वध ' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
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तैंतीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णकी कृपासे दैत्यराजकुमार कुनन्दनके जीवनकी रक्षा सैन्यपालने कहा – यहाँ सभी रणदुर्मद धनुर्धर वीर तो आ गये हैं, केवल राजाके पुत्र युवराज इस रणभूमिमें नहीं दिखायी देते हैं । वे मेरे बेटेको मरवाकर घरमें बैठे क्या कर रहे हैं? क्या वे भुशुण्डीके मुँहमें पड़कर मेरे पुत्रके ही रास्तेपर नहीं जायँगे? ॥ १-२ ॥ ऐसा कहकर रोषसे आँखें लाल किये सैन्यपाल बड़े हर्ष के साथ राजकुमारको पकड़नेके लिये शीघ्र ही पुरीमें जा पहुँचा । उस राजकुमारने रातमें भोजनके बीचमें ही मदिरा पीकर शयन किया था; अतः मदमत्त होनेके कारण वह राजाकी आज्ञाको भूल गया था । ढिंढोरेपर की गयी घोषणा सुनकर उसकी पत्नी भयसे विह्वल हो रो पड़ी और अपने पति राजकुमारको जगाने लगी-" हे वीर! उठो! उठो! उठो! प्रातः काल हो गया । नगाड़ेकी आवाजके साथ तुम्हारे पिताका यह शासन पुरीमें सुनायी देता है— ' जो युद्धके लिये नहीं जायँगे, वे पुत्र आदि ही क्यों न हों, वधके योग्य होंगे ' । इसलिये शीघ्र जाओ और पिताका दर्शन करो " ॥ ३–७ ॥ अपनी प्यारी पत्नीके जगानेपर उसको कुछ होश हुआ । जब बल्वलकी सेना चली गयी, तब उसकी पत्नीने उसे पुनः जगाया । तब निद्रा त्यागकर राजकुमार उठा और तुरंत धनुष - बाण लेकर मन - ही - मन भगवान् शिव तथा गणेशजीका स्मरण करता हुआ रथके द्वारा युद्धके लिये चला । राजकुमारको आया देख सैन्य-पालने रोषपूर्वक पूछा - ' तुमने दैत्यराजके शासनका किस बलसे और क्यों उल्लङ्घन किया है? वह मुझे बताओ । मेरा बेटा भी तुम्हारे ही समान विलम्ब करके शीघ्र रणभूमिमें नहीं पहुँचा था, इसलिये बल्वलने उसे शतघ्नीके मुँहपर खड़ा करके मार डाला; अतः पिताके पास चलो । तुम्हारे पिता बड़े सत्यवादी हैं । उन्होंने तुम्हें पकड़ लानेके लिये मुझे भेजा है; अतः वे शीघ्र ही तुम्हें मार डालेंगे ' ॥ ८- १२ ॥ सैन्यपालकी तीखी बात सुनकर भयके कारण राजकुमारका मुँह सूख गया । वह दुःखी सुधन्वाकी भाँति पिताके पास गया । दैत्य - समुदायसे घिरे हुए उसके पिता अनिरुद्धको जीतनेके लिये उत्सुक हो रोषपूर्वक रथपर बैठे थे । उनके पास जाकर राजकुमारने पिताका दर्शन किया । पिताको देखकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर राजकुमार लज्जित तथा भयसे विह्वल हो गया । दानवेन्द्रके सामने वह पृथ्वीपर नीचे मुँह किये खड़ा था । बल्वल कुपित हो दाँतोंसे दाँत पीसता हुआ बोला – ' अरे! अपने विनाशके लिये तूने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन क्यों किया? तेरे इस अपराधके कारण मैं तुझे दण्ड दूँगा । निश्चय ही तू डरकर रणक्षेत्रसे प्राण बचानेके लिये घरमें जा घुसा था । कुनन्दन! तू पुत्र नहीं, कुपुत्र है, शत्रुके समान है और अत्यन्त मलिन है । मैं तुझे त्यागकर शतघ्नीके मुखसे अभी मार डालूँगा ' ॥ १३–१७ ॥ अपने बेटेसे ऐसा कहकर वीर बल्वल दुःखसे आँसू बहाने लगा और मन ही मन खिन्न होकर बोला – ' हाय! मैंने ऐसी प्रतिज्ञा क्यों की? अहो! सैन्यपालके बेटेको मैंने बिना अपराधके ही मार डाला; उसी पापसे मेरा पुत्र भी मरेगा, इसमें संशय नहीं है । यदि अपने वीर पुत्रको मैं बलपूर्वक मृत्युके मुखसे छुड़ा लूँगा तो मेरे समस्त सैनिक मुझे गाली देंगे और मुझपर हँसेंगे । ' दैत्यराजको इस प्रकार शोकमग्न, दुःखी अपने पुत्रके लिये खिन्नचित्त देखकर रोष और अमर्षसे भरा हुआ सैन्यपाल हँसता हुआ बोला ॥ १८–२१ ॥ सैन्यपालने कहा- राजन्! पहले अपने इस पुत्र कुनन्दनको शीघ्र मार डालो । इसके बाद यादवका दानवोंके साथ संग्राम होगा । दैत्येन्द्र! तुम सत्यवादी हो और यह कर्म अत्यन्त दारुण है । यदि दुःखके कारण तुम इसे नहीं करोगे तो तुम्हें नरकमें जाना पड़ेगा । भूपाल! कोसलपति राजा दशरथने सत्यकी रक्षाके लिये श्रीराम- जैसे बेटेको त्याग दिया । सत्यके बन्धनमें बँधे हुए हरिश्चन्द्रने अपनी प्यारी पत्नीको, पुत्रको और अपने - आपको भी बेच दिया था । बलिने
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४ ९ २ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड सत्यके कारण सारी पृथ्वी दे डाली । विरोचनने अपना जीवन दे दिया । राजा शिबिने अपकीर्तिका तथा दधीचिने अपने शरीरका त्याग कर दिया था । जैसे गुरु वसिष्ठने पृषध्रको तथा राजा रन्तिदेवने भोजनको त्याग दिया था, उसी प्रकार दैत्यराज! तुम भी आज्ञा भङ्ग करनेवाले इस पुत्रका मोह छोड़कर इसे मार डालो । तुमने पहले जो यह प्रतिज्ञा की थी कि ' मैं अपनी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाले बेटे और भाईको भी तत्काल मार डालूँगा, फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? ' उस देशमें निवास करना चाहिये, जहाँ राजा सत्यवादी हो । उस देशमें कदापि नहीं रहना चाहिये, जहाँका राजा मिथ्यावादी हो ॥ २२ - २८ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— सैन्यपालकी बात सुनकर बल्वलने खिन्नचित्त हो अपने उस पुत्रका भी वध करनेके लिये उसीको आज्ञा दे दी । तदनन्तर बल्वल दुःखी हो यादवोंके सामने गया । इधर सैन्यपालने राजकुमारके आगे उसके पिताकी दी हुई आज्ञा सुना दी । यह सुनकर कुनन्दनने उसे शीघ्र ही इस प्रकार उत्तर दिया ॥२ ९ -३०३ ॥ राजपुत्र बोला - सेनापते! तुम पराधीन हो; इसलिये तुम्हें राजाकी आज्ञाका अवश्य पालन करना चाहिये । परशुरामजीने अपने पिताकी आज्ञासे माताका मस्तक काट लिया था । सैन्यपाल! मैं निश्चिन्त हूँ । मैंने धर्मकार्यका पालन कर लिया है । अब मुझे मृत्युसे कोई भय नहीं है । तुम मुझे शतघ्नीमें झोंक दो॥३१-३२ ॥ - ऐसा कहकर राजकुमारने अपना किरीट, भुजबंद, मोतियोंका हार, सुवर्णमयी माला तथा कुण्डल और कड़े आदि सब आभूषण ब्राह्मणोंको दान कर दिये । उन ब्राह्मणोंने बड़े दुःखसे उस राजकुमारको आशीर्वाद दिया ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर स्नान करके, अपने शरीरमें तीर्थकी मिट्टी * कृष्णं मुकुन्दमरविन्ददलायताक्षं शङ्खेन्दुकुन्ददशनं नरनाथवेषम् श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे श्रीकृष्ण गोविन्द कुशस्थलीश स्मरणात्तव गोविन्द ग्राहान्मुक्तो मतङ्गजः आनर्त्तश्चैव कक्षीवान् मृगेन्द्राद्बहुला तथा पोतकर, मुखमें तुलसीदल और कण्ठमें तुलसीकी माला पहनकर राजकुमार ' श्रीकृष्ण! हे राम! ' – इस प्रकार कहता हुआ भगवान्का स्मरण करने लगा । राजेन्द्र! सैन्यपालने बलपूर्वक उसकी दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और रोषपूर्वक उसे शतघ्नीके मुखमें डाल दिया । उसी समय हाहाकार मच गया । समस्त सैनिक फूट - फूटकर रोने लगे । बल्वल भी रो उठा और वहाँ खड़े हुए ब्राह्मण भी रोदन करने लगे । शतघ्नीमें बारूद भरकर उसमें ताँबेके गोले डाल दिये गये और वह अनियुक्त होकर तप गयी । उस दशामें उस भयंकर शतघ्नीको देखकर राजकुमार कुनन्दन सर्वव्यापी परमेश्वर श्रीकृष्णको याद करके आँसू बहाता हुआ यह निर्मल वचन बोला ॥ ३५–४० ॥ ' जिनके नेत्र प्रफुल्लित कमलदलके समान विशाल हैं, दाँतोंकी पङ्क्ति शङ्ख और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल है, जो नरेन्द्रके वेषमें रहते हैं तथा जिनके चरणारविन्दोंकी इन्द्रादि देववृन्द भी वन्दना करते हैं, उन श्रीकृष्ण मुकुन्द हरिका आज मैं प्राणान्तकालमें चिन्तन करता हूँ । हे श्रीकृष्ण! हे गोविन्द! हे हरे! हे मुरारे! हे द्वारकानाथ श्रीकृष्ण गोविन्द! हे व्रजेश्वर श्रीकृष्ण गोविन्द! तथा हे पृथ्वीपालक श्रीकृष्ण गोविन्द! आप भयसे मेरी रक्षा कीजिये । गोविन्द! आपके स्मरणसे हाथी ग्राहके संकटसे छूट गया था । स्वायम्भुव मनु प्रह्लाद, अम्बरीष, ध्रुव, आनर्तराज कक्षीवान् भी भयसे मुक्त हुए थे । बहुला सिंहके चंगुलसे छूटी थी । रैवत और चन्द्रहासकी भी आपकी शरणमें जानेसे रक्षा हुई थी, इसी प्रकार मैं भी आपकी शरणमें आया हूँ । * अहो! यदि युद्ध किये बिना पहले ही मेरी मृत्यु हो जाती है तो यह उचित नहीं है । अभी मैंने युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा अनिरुद्धको संतुष्ट नहीं किया । यादवोंको संतोष नहीं दिलाया । श्रीकृष्णके पुत्रोंके दर्शन नहीं किये । शार्ङ्गधनुषसे । इन्द्रादिदेवगणवन्दितपादपद्मं प्राणप्रयाणसमये च हरिं स्मरामि ॥ । श्रीकृष्ण गोविन्द व्रजेश भूप श्रीकृष्ण गोविन्द भयात् प्रपाहि ॥ । स्वायम्भुवश्च प्रादो ह्यम्बरीषो ध्रुवस्तथा ॥ । रैवतश्चन्द्रहासश्च तथाहं शरणं गतः ॥ ( अ ० ३३ | ४१–४४ )
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अध्याय ३४ ] दैत्यों और यादवोंका घोर युद्ध; बल्वल, कुनन्दन तथा अनिरुद्धके अद्भुत पराक्रम ४ ९ ३ छूटे हुए बाणोंद्वारा अपने इस शरीरके टुकड़े - टुकड़े नहीं करवाये । ऐसी दशामें शूरवीर कुनन्दनकी यह चोरके समान गति हो गयी! भगवन्! मैं आपका भक्त हूँ । मेरी दुर्गति देखकर समस्त पापिष्ठ मुझपर हँसते हैं । जिसे भूमिपर देखकर यमराज भी पलायन कर जाते हैं, विघ्न डालनेवाले विनायकगण मर जाते हैं, उस पूजनीय एवं निरङ्कुश कृष्णभक्त मुझ कुनन्दनको शतघ्नी कैसे मार डालेगी ' ॥ ४१–४८ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! वह शूरवीर कुनन्दन जब ऐसी बात कह रहा था, उसी समय सैन्यपालकी आज्ञासे किसीने शतघ्नीको छोड़ा । छोड़नेके साथ ही हाहाकार मच गया । नरेश्वर! उस समय श्रीकृष्णचन्द्रके स्मरणसे एक विचित्र बात हो गयी । शतघ्नी शीतल हो चुकी थी और आगकी ज्वाला बुझ गयी थी । राजसिंह! यह आश्चर्य देखकर वहाँ खड़े हुए राजा आदि सब लोग बड़े विस्मित हुए । तब सैन्यपाल बोला- ' शतघ्रीकी बारूद सूखी पड़ी है और उसमें गोले भी ज्यों - के - त्यों हैं, किंतु राजकुमार वहाँ नहीं है । इससे सिद्ध है कि वह रणक्षेत्रमें मारा नहीं गया है ' ॥ ४ ९ –५२ ॥ उसकी बात सुनकर वीरगण रुष्ट होकर बोले-' यह परम बुद्धिमान् पापशून्य शूरवीर राजकुमार भगवान् श्रीकृष्णका भक्त है । इसलिये भगवान्ने ही उसे दुःखसे बचाया है । अब फिर तुम्हें इसका वध नहीं करना चाहिये ॥ ५३३ ॥
उन वीरोंकी बात सुनकर सैन्यपालको बड़ा रोष हुआ । उसने जब पुनः दृष्टिपात किया तो राजकुमार शतघ्नीके मुखमें बैठा दिखायी दिया । उसके अश्रुभरे नेत्र बंद थे और वह ' कृष्ण, कृष्ण ' जप रहा था । उसे देखकर उस दुष्ट सैन्यपालने फिर उसे मारनेके लिये शतघ्नी दाग दी । किंतु उस समय शतघ्नी फट गयी और उससे वज्रपातके समान शब्द हुआ । शतघ्नीके गोलेसे सैन्यपालकी मृत्यु हो गयी और उसकी ज्वालासे उसका अनुसरण करनेवाले सैनिक जल गये । कोई ‘ हाय - हाय ' करते हुए भागे, कोई धड़ाकेकी आवाजसे बहरे हो गये और कितने ही धुएँसे घबरा गये । नृपेश्वर! उस समय सबने राजकुमारको निर्भय देखा । देखकर बल्वल आदि सभी वीर जय - जयकार करने लगे ॥ ५४–५९ ॥ दैत्य बोले - जिसकी रक्षा श्रीकृष्ण करते हैं, उसे कौन मनुष्य मार सकता है? जो भक्तका वध करनेके लिये आता है, वह दैवयोगसे आप ही नष्ट हो जाता है । जिन्होंने भयसे इस राजकुमारकी रक्षा की है, उन भक्तवत्सल श्रीकृष्णको हम सब लोग नमस्कार करते हैं * ॥ ६०-६१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' राजकुमारके जीवनकी रक्षा ' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय दैत्यों और यादवोंका घोर युद्ध; बल्वल, श्रीगजी कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात बल्वल-बड़ी प्रसन्नता साथ पुत्रको रथपर चढ़ाया और उसके साथ ही अपनी सेना लेकर बड़ी उतावलीके साथ वह युद्धके लिये चला । उसके समस्त सैनिक नाना प्रकारके शस्त्र लिये हुए थे । वे अनेक प्रकारके वाहनोंपर बैठे थे तथा भाँति - भाँतिके कवचोंसे * यं च रक्षति श्रीकृष्णस्तं को भक्षति मानवः तस्मात् कृष्णसमो नास्ति येनायं रक्षितो भयात् कुनन्दन तथा अनिरुद्धके अद्भुत पराक्रम सुसज्जित हो नाना प्रकारके रूपोंमें बड़े भयंकर दिखायी देते थे । वे गजराजके समान हृष्ट - पुष्ट शरीरवाले और सिंहके समान पराक्रमी थे । वे पृथ्वीको कम्पित करते हुए वृष्णिवंशी यादवोंके सम्मुख गये । उन बहुत - से दैत्योंको आया हुआ देख अनिरुद्ध शङ्कित हो गये और उन्होंने समस्त यादवोंकी रक्षाके लिये चक्रव्यूहकी । भक्तं हन्तु चागतो यः स विनश्यति दैवतः ॥ । सर्वे वयं नमस्यामस्तं कृष्णं भक्तवत्सलम् ॥ ( अ ० ३३ । ६०-६१ )
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४ ९ ४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड रचना की । चारों ओरसे शूरवीर यादव सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र लिये हाथी, घोड़े और रथोंद्वारा खड़े होकर बड़ी शोभा पाने लगे । राजन्! उनके मध्यभागमें इन्द्रनील आदि राजा खड़े हुए । उनके बीचमें अक्रूर और कृतवर्मा आदि अच्छे वीर स्थित हुए । राजेन्द्र! उनके बीचमें गद आदि श्रीकृष्णके भाई विराजित हुए । उनके मध्यभागमें साम्ब और दीप्तिमान आदि महान् वीर खड़े हुए ॥ १-७ ॥ पृथ्वीनाथ! इस प्रकार चक्रव्यूह बनाकर उसके बीचोबीच प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध कवच धारण करके खड़े हुए । नरेश्वर! वहाँ सागरके तटपर यादवोंके साथ दानवोंका बड़ा घोर युद्ध हुआ, मानो अनेक समुद्रोंके साथ बहुत - से दूसरे समुद्र जूझ रहे हों । उस संग्रामस्थलमें रथी रथियोंके साथ, हाथी - सवार हाथी - सवारोंके साथ, अश्वारोही अश्वारोहियोंके साथ और पैदल - वीर पैदल - वीरोंके साथ परस्पर युद्ध करने लगे । राजन्! तीखे बाणों, ढाल - तलवारों, गदाओं, ऋष्टियों, पाशों, फरसों, शतघ्रियों और भुशुण्डियोंद्वारा यादव - वीर बल्वलके सैनिकोंका वध करने लगे । उनकी मार खाकर भयभीत हो वे सब - के - सब अपना-अपना रणस्थल छोड़कर भाग चले । सैनिकोंके पैरोंसे उड़ी हुई बहुत - सी धूलराशिने आकाश और सूर्यको ढक दिया । सब ओर अन्धकार फैल गया और उस अँधेरेमें समस्त महादैत्य युद्धसे पीठ दिखाकर पलायन करने लगे । यादवोंके सायकोंसे घायल होकर उन असुरोंमेंसे कितने ही कुएँमें गिर गये, कई औंधे मुँह होकर गड्डेमें गिर पड़े और कितने ही पोखरे तथा बावलीमें डूब गये । अपनी सेनामें भगदड़ मची देख बल्वल रोषसे भर गया और चारों मन्त्रिकुमारों तथा अपने पुत्रके साथ यादवोंका सामना करनेके लिये आया । उस महासमरमें बल्वलके साथ अनिरुद्ध, दुर्नेत्रके साथ बृहद्बाहु, दुर्मुखके साथ बलवान् अरुण, दुःस्वभावके साथ न्यग्रोध, दुर्मदके साथ कवि तथा कुनन्दनके साथ श्रीकृष्णपुत्र सुनन्दन युद्ध करने लगे ॥ ८-१७ ॥ राजेन्द्र! इस प्रकार वहाँ देवताओंको भी विस्मयमें डाल देनेवाला संग्राम छिड़ गया । कार्तिक मासके सम्पूर्ण दिन वहाँ युद्धमें ही व्यतीत हो गये । राजन्! बारंबार अपना धनुष टंकारते हुए बल्वलने कुपित हो रणभूमिमें इन्द्रनीलको तीन और हेमाङ्गदको छः बाण मारे । अनुशाल्वको दस, अक्रूरको दस, गदको बारह, युयुधानको पाँच, कृतवर्माको पाँच, उद्धवको दस और प्रद्युम्नको सौ बाणोंद्वारा समराङ्गणमें उस असुरने घायल कर दिया । उसके बाणोंके आघातसे रथोंसहित वे सभी वीर दो घड़ीतक चक्कर काटते रहे । रणभूमिमें उनके घोड़े मर गये तथा रथ चूर - चूर हो गये । मानद नरेश! उसके हाथकी फुर्ती देखकर अनिरुद्ध आदि समस्त यादव चकित हो गये । फिर वे सब - के - सब दूसरे रथोंपर आरूढ़ हुए ॥ १८–२३ ॥ राजन्! उधर बल्वल भी दूसरे दूसरे वीरोंको देखनेके लिये चला । तब क्रोधसे लाल आँखें किये अनिरुद्धने कहा - ' ओ दैत्य! मेरे सामने खड़ा रह, खड़ा रह । पराक्रम दिखाकर तू कहाँ जायगा? मेरे तीखे बाणोंको भी देख ले । ' अनिरुद्धकी यह बात सुनकर दैत्य युवराज कुनन्दन बल्वलके देखते - देखते शीघ्र ही बोल उठा ॥२४–२६ ॥ राजपुत्रने कहा— प्रद्युम्ननन्दन! रणभूमिमें दैत्यराजको देखनेकी योग्यता तुममें नहीं है । इसलिये पहले इस युद्धस्थलमें तुम मेरा बल देख लो ॥ २७ ॥
अनिरुद्ध बोले- दैत्यकुमार! तू अभी बालक है । युद्ध करनेकी योग्यता नहीं रखता है । अतः अपने घर जाकर कृत्रिम खिलौनोंसे खेल ॥ २८ ॥
राजकुमारने कहा – आज तुम यहाँ बड़े - बड़े वीरोंके साथ मुझ बालकका खेल देखो । यदि घर जाकर खेलूँगा तो वहाँ कोई नहीं देखेगा ॥ २ ९ ॥ - ऐसा कहकर कुनन्दनने अपने प्रचण्ड कोदण्ड-पर सौ सायक रखे और उनके द्वारा अपना बल दिखाते हुए उसने रथपर बैठे हुए अनिरुद्धको घायल कर दिया । उन बाणोंके आघातसे सारथि, घोड़े तथा रथके साथ वे स्वयं भी आकाशमार्गसे चक्कर काटते हुए कपिलाश्रममें जा गिरे । अनिरुद्ध के चले जानेपर तत्काल हाहाकार मच गया ॥ ३०-३१ ॥ तब रणस्थलमें कुपित हुए साम्ब आदि यादव उस दैत्यकुमारको मारनेके लिये आये । उन बहुसंख्यक योद्धाओंको आया देख युवराजको बड़ा हर्ष हुआ ।