गर्ग संहिता — पृष्ठ 501–510
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510
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अध्याय ३५ ] बल्वलके चारों मन्त्रिकुमारोंका वध; बल्वलद्वारा मायामय युद्ध ४ ९ ५ उस बलवान् वीरने युद्धस्थलमें साम्बको दस, मधुको पाँच, बृहद्बाहुको तीन, चित्रभानुको पाँच, वृकको दस, अरुणको सात, संग्रामजित्को पाँच, सुमित्रको तीन, दीप्तिमानको तीन, भानुको पाँच, वेदबाहुको पाँच, पुष्करको सात, श्रुतदेवको आठ, सामने खड़े हुए सुनन्दनको बीस, विरूपको दस, चित्रबाहुको नौ, न्यग्रोधको दस तथा कविको नौ तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया । साथ ही उस मानी कुनन्दनने बड़ी प्रसन्नता के साथ विजयसूचक शङ्खध्वनि की । उसके बाणोंसे रथ और घोड़ोंसहित चक्कर काटते हुए कोई एक योजनपर गिरे, कोई पाँच कोसपर और कोई दो योजनपर ॥ ३२ – ३ ९ ॥ नृपश्रेष्ठ! उस समय यादव - सेनामें हाहाकार होने लगा । सब यादव बलराम और श्रीकृष्णका नाम ले-लेकर रोने लगे । उस समय गद आदि सब योद्धा तथा इन्द्रनील आदि राजा क्रोधसे भरे हुए आये और तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे । उन सभी वीरोंको आया देख महाबली राजकुमारने सायकोंसे उन्हें बींध डाला । वे सब - के - सब रणभूमिमें मूच्छित हो गये । राजन्! तत्पश्चात् बल्वलकुमारने अपने बाणसमूहोंद्वारा यादव-वीरोंको मारना आरम्भ किया । उसके आघातसे बहुसंख्यक योद्धा पञ्चत्वको प्राप्त हो गये । संग्राम भूमिमें उसके बाणसमूहोंद्वारा रक्तकी नदी प्रकट हो गयी, जिसमें जीवित हाथी डूबकर मर जाते थे । उस समय यादव - सेना तथा आकाशमें ' हाय - हाय ' की आवाज गूँजने लगी । इन्द्र और वरुण आदि देवता भी आश्चर्यचकित हो भयभीत हो गये । अपनी विजय देखकर समस्त असुरोंके मुखपर प्रसन्नता छा गयी ॥४०–४५३ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - उधर कपिलमुनिने देखा कि अनिरुद्ध मूच्छित पड़े हैं । इनका रथ नष्ट हो गया है तथा बाणोंसे इनका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया है । तब उन कृपालु मुनिने अपने तपोबलसे हाथद्वारा स्पर्श करके अनिरुद्धको चैतन्ययुक्त कर दिया । तदनन्तर यदुकुलतिलक अनिरुद्धने उठकर उन सिद्ध महर्षिको नमस्कार किया और समस्त यादवोंको हर्ष प्रदान करते हुए वे सेतुमार्गसे रणक्षेत्रमें आ गये ॥ ४६–४८ ॥ राजन्! तत्पश्चात् दूसरे रथपर आरूढ़ हो बलवान् अनिरुद्धने ' प्रतिशार्ङ्ग ' नामक धनुष उठाया और रोषपूर्वक दैत्य - राजकुमारके रथपर एक बाण मारा । उस बाणने सारथि और घोड़ोंसहित उसके रथको लेकर आकाशमें चार मुहूर्त ( आठ घड़ी ) तक चक्कर कटाया । उस समय समस्त दानवों और वृष्णिवंशी वीरोंने यह प्रत्यक्ष देखा कि रथसहित कुनन्दन आकाशमें चक्कर काट रहा है । उसके बाद साम्ब आदि वीर दूसरे रथोंपर आरूढ़ हो वेगपूर्वक आये । साथ ही अनुशाल्व आदि समस्त धनुर्धर भी तत्काल आ पहुँचे ॥ ४ ९ –५२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' दैत्यों और यादवोंके युद्धका वर्णन ' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पैंतीसवाँ अध्याय बल्वलके चारों मन्त्रिकुमारोंका वध; बल्वलद्वारा मायामय युद्ध तथा अनिरुद्धके द्वारा उसकी पराजय श्रीगर्गजी कहते हैं— महाराज! तदनन्तर उस दुःस्वभावको मार डाला । हेमाङ्गदने युद्धस्थलमें संग्राममें अनुशाल्व दुर्मुखसे, इन्द्रनील दुरात्मा दुर्नेत्रसे, दुर्मदको तीन बाणोंसे पीट दिया । दुर्मदने भी रणक्षेत्रमें हेमाङ्गद दुर्मदसे और सारण दुःस्वभावसे युद्ध करने हेमाङ्गदको अपने बाणोंसे घायल किया । फिर लगे । इस प्रकार रणक्षेत्रमें परस्पर द्वन्द्व युद्ध होने हेमाङ्गदने शक्तिद्वारा उस दैत्यका वध कर डाला । लगा । सारणने बड़े वेगसे अपनी गदाद्वारा दैत्य इन्द्रनीलने खेल - खेलमें ही दुर्नेत्रको अपने बाणोंसे
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४ ९ ६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड कालके गालमें भेज दिया । अनुशाल्वने बाण मारकर दुर्मुखके रथको चौपट कर डाला । फिर दुर्मुखने भी दूसरे रथपर आरूढ़ हो बाणोंद्वारा अनुशाल्वको रथहीन कर दिया । तब अनुशाल्वने एक परिघ लेकर युद्ध-स्थलमें दुर्मुखको मार डाला । इस प्रकार दुर्नेत्र, दुः स्वभाव, दुर्मुख और दुर्मदके मारे जानेपर शेष दैत्य प्राण बचानेके लिये भाग चले॥१–६३ ॥ राजन्! इसी समय राजकुमार कुनन्दन आकाशसे चक्कर काटता हुआ गिरा और मुँहसे रक्त वमन करता हुआ रणक्षेत्रमें मूर्च्छित हो गया । उसका रथ अङ्गारकी भाँति बिखर गया और घोड़े तत्काल मर गये । पुत्रको मूच्छित हुआ देख बल्वल कुपित हो उठा । उसने अनिरुद्धपर बड़े वेगसे धनुषद्वारा दस बाण चलाये । उन दसों बाणोंको आया देख रुक्मवतीकुमार अनिरुद्धने अपने तेज धारवाले सुवर्णभूषित सायकों-द्वारा काट डाला । तब रोषसे भरे हुए दैत्य बल्वलने पुनः धनुषपर बाणका संधान करके अनिरुद्धसे इसी प्रकार कहा, जैसे पहले युद्धमें प्रद्युम्नसे शकुनिने कहा था ॥ ७ - ११ ॥ बल्वल बोला - ' यदुकुलके प्रमुख वीर! तुम युद्धके अभिमानी और धनुर्धर हो । आज इस बाणसे समरभूमिमें तुम्हें मार डालूँगा । मैं झूठ नहीं बोलता । यदि जीवित रहनेकी इच्छा हो तो अपने प्राणोंकी रक्षा करो । ' उसकी बात सुनकर अनिरुद्धने भी अपने कोदण्डपर एक बाण रखा और जैसे प्रद्युम्नने शकुनिको उत्तर दिया था, उसी प्रकार बल्वलसे हँसते हुए कहा ॥ १२-१३ ॥ अनिरुद्ध बोले- कौन प्राणी किसके द्वारा मारा जाता है और कौन किससे रक्षित होता है? सदा काल ही सबको मारता है और वही संकटसे सबकी रक्षा करता है । ' मैं करूँगा, मैं कर्ता हूँ, संहर्ता हूँ और पालक भी मैं ही हूँ ' – जो ऐसी बात कहता है, वह कालसे ही विनाशको प्राप्त होता है । * मैं तुमको नहीं जीत सकूँगा और तुम भी मुझे नहीं जीत सकोगे । विश्वात्मा कालरूपी जगदीश्वर ही तुमको और मुझको जीतेंगे । दानव! न जाने वे कालपुरुष किसको जय अथवा पराजय देते हैं । मैं तो अपनी विजयके लिये उन कालदेवताकी ही मनसे वन्दना करता हूँ । अतः तुम भी अपने मनसे कालको ही बलवानोंमें श्रेष्ठ समझो और मेरी बात मानकर अपने बड़े भारी अज्ञानको त्यागकर युद्ध करो ॥ १४ – १८ ॥ अनिरुद्धकी यह बात सुनकर बल्वलको आश्चर्य हुआ । उनके वचनोंसे संतोष प्राप्त करके उसने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा- ठीक उसी तरह, जैसे वृत्रासुरने देवराज इन्द्रसे वार्तालाप किया था ॥ १ ९ ॥ बल्वल बोला- यदुकुलतिलक! इस भूतल-पर ' कर्म ' ही प्रधान है । कर्म ही गुण और ईश्वर है । कर्मसे ही लोगोंको ऊँची और नीची स्थिति प्राप्त होती है । जैसे बछड़ा हजारों गायोंके बीचमें अपनी माताको ढूँढ़ लेता है, उसी प्रकार जिसने शुभ या अशुभ कर्म किया है, उसका वह ' कर्म ' विद्यमान रहकर फल-प्रदानके समय उसको खोज लेता है । अतः मैं अपने सुदृढ़ कर्मके द्वारा संग्रामभूमिमें तुमपर विजय पाऊँगा । मैंने तो प्रतिज्ञा कर ली । अब तुम तुरंत उसका प्रतीकार करो ॥ २० - २२ ॥ अनिरुद्धने कहा – दैत्य! तुम ' कर्म ' को प्रधान मानते हो, परंतु कालके बिना उसका कोई फल नहीं मिलता; जैसे भोजन बना लेनेपर भी कभी - कभी उसकी प्राप्तिमें विघ्न पड़ जाता है । पाकके विभिन्न प्रकार हैं । उनकी सिद्धिके लिये जो पाकका निर्माण किया जाता है, वह बिना कर्ताके सम्भव नहीं होता । अतः बहुत-से विद्वान् ' कर्म ' और ' काल ' की अपेक्षा ' कर्ता ' को ही श्रेष्ठ बताते हैं । वह ' कर्ता ' भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं, जो गोलोकधामके स्वामी तथा परात्पर परमेश्वर हैं । उन्होंने ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि समस्त देवताओंकी सृष्टि की है * ॥ २३–२५ ॥ बल्वल बोला - श्रीकृष्णपौत्र! तुम धन्य हो और अपने वचनोंद्वारा ऋषियोंका अनुकरण करते हो । * ' कः केन हन्यते जन्तुस्तथा कः केन रक्ष्यते । हनिष्यति सदा कालस्तथा रक्षति दुःखतः ॥ अहं करोमि कर्ताहं हर्ताहं पालकोऽप्यहम् । यो वदेच्चेदृशं वाक्यं स विनश्यति कालतः ॥ ( अ ० ३५ ।१४-१५ ) + स कर्ता कृष्णचन्द्रस्तु गोलोकेशः परात्परः । येन वै निर्मिताः सर्वे ब्रह्मविष्णुशिवादयः ॥ ( अ ० ३५ । २५ )
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अध्याय ३५ ] बल्वलके चारों मन्त्रिकुमारोंका वध; बल्वलद्वारा मायामय युद्ध ४ ९ ७ तुम तीनों गुणोंसे अतीत हो, तथापि प्राणियोंके लिये अपने स्वभावका परित्याग दुष्कर होता है । यादवश्रेष्ठ! अब सावधान होकर अपने ऊपर प्राप्त होनेवाले मेरे इस प्राणसंहारी बाणको देखो और अपना मन युद्धमें ही लगाये रखो ॥ २६-२७ ॥ - ऐसा कहकर बल्वलने अपने बाणद्वारा मयासुरकी माया प्रकट की । उस समय घोर अन्धकार छा गया । कोई भी दिखायी नहीं देता था । बहुत - से लोगोंको यह भी पता नहीं चलता था कि ' कौन अपना है और कौन पराया ' । योद्धाओंके ऊपर ऊँचे पर्वतोंके समान शिलाएँ गिर रही थीं । बरसती हुई जलधाराओं-के कारण चारों ओरसे सब लोग व्याकुल हो गये थे । बिजलियाँ चमकतीं और बादल जोर - जोरसे गर्जना करते थे । वे बादल गरम - गरम रक्तकी और मलमिश्रित जलकी वर्षा करते थे । आकाशसे रुण्ड और मुण्ड गिर रहे थे । उस समय समस्त श्रेष्ठ यादव संग्राममें परस्पर व्याकुल और भयातुर हो वहाँसे पलायन करने लगे । तब अनिरुद्धने उस संग्रामभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णके युगल - चरणारविन्दोंका चिन्तन करके लीलापूर्वक मोहनास्त्रद्वारा उस मायाको नष्ट कर दिया । उस समय सारी दिशाएँ प्रकाशित हो गयीं । सूर्यमण्डलका घेरा समाप्त हो गया । बादल जैसे आये थे, वैसे ही विलीन हो गये और चपलाएँ शान्त हो गयीं ॥ २८–३४ ॥ राजन्! माया दूर हो जानेपर वह प्रचण्ड पराक्रमी मायावी दैत्य दानवोंके साथ सामने दिखायी दिया । उसने नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र ले रखे थे । बल्वलने कुपित होकर यादवोंके वधके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया, परंतु अनिरुद्धने पुनः ब्रह्मास्त्र चलाकर उस ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया । इससे बल्वलका क्रोध उद्दीप्त हो उठा । उसने युद्धमें विजय पानेके लिये अत्यन्त मोहमें डालनेवाली ' गान्धर्वी माया ' प्रकट की । नृपश्रेष्ठ! अब वहाँ गन्धर्वनगर दिखायी देने लगा । संग्रामका कोई चिह्न नहीं दीखता था । करोड़ों सुवर्णमय महल दृष्टिगोचर होने लगे । उस नगरमें बहुत - सी गन्धर्व - सुन्दरियाँ वीणा, ताल और मृदङ्गकी ध्वनिके साथ नृत्य करती हुई मधुर कण्ठसे गीत गाने लगीं । कन्दुककी क्रीडाओं, हाव - भाव और कटाक्षों तथा कटि और वेणीके प्रदर्शनोंद्वारा वे कमलनयनी सुन्दरियाँ सब लोगोंका मनोरञ्जन करने लगीं । उनका सौन्दर्य देखकर यादव - वीर कामवेदनासे विह्वल हो गये और अस्त्र - शस्त्रोंको भूमिपर डालकर आपसमें कहने लगे - ' हम सब लोग कहाँ आ गये? दैवयोगसे स्वर्गलोकमें तो नहीं पहुँच गये, जहाँ मनको मोह लेनेवाली अति सुन्दरी कलकण्ठी सुराङ्गनाएँ नृत्य करती हैं? इनके लावण्य - जलधिमें मग्न होकर हम कामवेदनासे व्याकुल हो रहे हैं । हमारी विजय कैसे होगी? यहाँ रणक्षेत्र तो दिखायी ही नहीं देता है ' ॥ ३५ - ४३ ॥ जब सब लोग इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय क्रोधसे भरा हुआ बल्वल तलवार हाथमें लेकर समस्त यादवोंको शीघ्र मार डालनेके लिये आया । आकर उसने उस तलवारसे सहस्रों मोहित यादव-वीरोंको युद्धस्थलमें मार डाला और वे पृथ्वीपर गिर पड़े । यह देखकर अनिरुद्धने रोषपूर्वक उससे कहा-' अरे! क्या तुम संग्रामभूमिमें अधर्म - युद्ध करोगे, जिसकी सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने निन्दा की है? मोहितोंको मारनेसे तुम्हारी प्रशंसा नहीं होगी । यदि तुम्हारे शरीरमें शक्ति है तो आओ मेरे साथ युद्ध करो ' ॥ ४४ – ४६ ॥ अनिरुद्ध की यह बात सुनकर बलके घमंडसे भरा हुआ बल्वल पैदल ही ढाल और तलवार लिये गर्जना करता हुआ अनिरुद्धपर चढ़ आया । उसे आते देख प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध रोषपूर्वक रथसे कूद पड़े और जैसे देवराज इन्द्र अपने वज्रसे पर्वतको विदीर्ण करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने कालदण्डसे उस दैत्यपर प्रहार किया । उस आघातसे दैत्यकी छाती फट गयी और वह पृथ्वीको कम्पित करता हुआ गिर पड़ा तथा चार दिनोंतक संग्रामभूमिमें मूच्छित पड़ा रहा । उस समय उस दैत्यके गिरते ही सारी माया स्वतः शान्त हो गयी । युद्धस्थल दिखायी देने लगा और वहाँ खड़े हुए यादव आश्चर्यसे चकित हो गये ॥ ४७–५० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अनिरुद्धकी विजय ' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
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छत्तीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णपुत्र सुनन्दनद्वारा श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! इसी समय कुनन्दन भी मूर्च्छा त्यागकर रथारूढ़ हो क्रोधपूर्वक धनुषसे बाणोंकी वर्षा करता हुआ युद्धस्थलमें आया । शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले वीर अनिरुद्ध उसको आया देख रोषसे आगबबूला हो उठे तथा अपने सेवकोंसे उसकी बात पूछने लगे । सेवकोंने कहा - ' महाराज! यह बल्वलनन्दन कुनन्दन है और आपके साथ युद्ध करनेके लिये आया है । ' यह सुनकर अनिरुद्ध बोले— ' मैं कुनन्दनको मार डालूँगा । ' उसी समय श्रीकृष्णपुत्र सुनन्दनने उनसे कहा॥१–४ ॥ सुनन्दन बोले- राजन्! यह दैत्यपुत्र क्या है? तथा इसकी यह थोड़ी - सी सेना क्या बिसात रखती है? प्रभो! मैं आपके प्रतापसे इसको जीत लूँगा । अतः मैं ही युद्धके लिये जाता हूँ । राजन्! मेरी प्रतिज्ञा सुनिये । यह आपके लिये आनन्ददायिनी होगी - ' यदि मैं अधिक संग्रामकुशल कुनन्दनको न जीत लूँ तो श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंके मकरन्दका आस्वादन करनेसे विरत रहनेवाले मनुष्योंको जो पाप लगता है, वही मुझे भी लगे । यदि मैं इस दानवको परास्त न कर दूँ तो भवबन्धन हर लेनेवाले गुरु और पिताकी सेवासे विमुख पुरुषको जो पाप लगता है, वही मुझे भी लगे ' ॥ ५-८ ॥ पृथ्वीनाथ! सुनन्दनकी इस प्रतिज्ञाको सुनकर अनिरुद्ध मन - ही - मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उस वीरको युद्धके लिये आदेश दे दिया । इस प्रकार अनिरुद्ध की आज्ञा पाकर श्रीकृष्णनन्दन सुनन्दन कवच धारण कर अकेले ही उस स्थानपर गये, जहाँ बल्वल -नन्दन कुनन्दन विद्यमान था । कुनन्दन सुनन्दनको युद्धके लिये आया देख रोषपूर्वक उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ा; क्योंकि वह वीरोंमें श्रेष्ठ, रथी एवं शूरशिरोमणि था । राजसिंह! रथपर बैठे और धनुष धारण किये वे दोनों वीर एक - दूसरेसे मिलकर दमन और पुष्कलके समान शोभा पाने लगे । दोनोंके अङ्ग सायकोंसे विदीर्ण हो रहे थे । दोनों ही खूनसे लथपथ दिखायी देते थे तथा दोनों ही बड़े वेगसे करोड़ों दैत्यपुत्र कुनन्दनका वध बाणोंका संधान करते ओर छोड़ते थे । पृथ्वीनाथ! वे कब बाण लेते हैं, धनुषपर रखते हैं और कब छोड़ते हैं, यह किसीको ज्ञात नहीं होता था । वे दोनों महान् शूरवीर धनुषको खींचकर कुण्डलाकार किये दिखायी देते थे । दैत्य राजकुमारने शोभाशाली भ्रामकास्त्रके द्वारा सुनन्दनके रथको भूतलपर कुम्हारके चाककी भाँति घुमाया । उनका रथ दो घड़ीतक चक्कर काटनेके बाद घोड़ोंसहित सुस्थिर हो गया । तब श्रीकृष्णकुमारने कुनन्दनके रथपर बाण मारा । उस बाणसे आहत हो वह रथ घोड़ोंसहित आकाशमें जाकर मतवाले हाथीकी भाँति चक्कर काटने लगा और पृथ्वीपर गिर पड़ा । गिरते ही शीशेके बर्तनकी भाँति चूर - चूर हो गया । रथ, घोड़े और सारथिके नष्ट हो जानेपर कुनन्दन उठा और दूसरे रथपर आरूढ़ हो ज्यों ही सामने आया, त्यों - ही कृष्णनन्दन सुनन्दनने बहुत - से बाण मारकर उसके रथकी धज्जियाँ उड़ा दीं । इस तरह उस रणभूमिमें दैत्यकुमारके सात रथ नष्ट हो गये॥९ –१ ९ ॥ नरेश्वर! तब कुनन्दन एक विचित्र यानमें बैठकर युद्धस्थलमें श्रीकृष्णपुत्रका सामना करनेके लिये वेगपूर्वक आया । आते ही कुनन्दनने सुनन्दनको युद्धस्थलमें दस बाण मारे । उन बाणोंसे घायल होनेपर उन्हें बड़ी वेदना हुई । तब कुपित हुए बलवान् कृष्णकुमारने धनुष उठाकर दस सायक हाथमें ले उन्हें कुनन्दनकी छातीको लक्ष्य करके छोड़ा । राजन्! वे बाण उस दैत्यका रक्त पीकर उसी तरह पृथ्वीपर गिर पड़े, जैसे झूठी गवाही देनेवालेके पितर नरकमें गिरते हैं । कुनन्दन सुनन्दनको और सुनन्दन कुनन्दनको उस महासमरमें विशाल बार्णोद्वारा परस्पर घायल करने लगे ॥ २० - २४ ॥ इस प्रकार उन दोनोंके शरीर बाणोंके आघातसे क्षत - विक्षत हो गये थे । दोनों रक्तसे नहा गये थे और दोनों ही धनुष लिये रोषपूर्वक एक - दूसरेको बाण मारते हुए घोर युद्ध कर रहे थे । उस समराङ्गणमें कुनन्दन और सुनन्दन कुशाम्ब और साम्बके समान शोभा पाते थे । तदनन्तर कृष्णकुमार वीर सुनन्दनने सुवर्णनिर्मित
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अध्याय ३७ ] भगवान् शिवका अपने गणोंके साथ कोदण्डपर अर्धचन्द्राकार बाण रखकर शीघ्र ही कुनन्दनसे कहा ॥ २५-२६ ॥ सुनन्दन बोले - वीर! मेरी बात सुनो । मैं इस बाणके द्वारा इसी क्षण तुम्हारा मस्तक काट लूँगा । यदि बलवान् हो तो अपने सिरकी रक्षा करो । यदि इस रण-क्षेत्रमें तुम मेरी कही बातको सत्य नहीं मानते तो तुम्हारी मृत्युकी सूचना देनेवाली मेरी इस प्रतिज्ञाको सुन लो — ' जो सती - साध्वी, पतिव्रता तथा गुरुपत्नीको कामभावसे दूषित करता है, वह यमराजके समीप जिस यातनामें डाला जाता है, वही यातना मुझे भी मिले; यदि मेरी प्रतिज्ञा सत्य न हो । जो सामर्थ्य रहते हुए गुरु और पिताका पालन नहीं करता, उसका पाप मुझे ही लगे, यदि रणभूमिमें मैं तुझे मार न डालूँ ' ॥ २७–३० ॥ सुनन्दनकी यह बात सुनकर दैत्य रोषसे जल उठा और बोला ॥ ३१ ॥
दैत्य राजकुमारने कहा— मैं शत्रुके सम्मुख संग्राममें मरनेसे नहीं डरता । मृत्यु तो सभी प्राणियोंकी होती ही है; परंतु तुम इस समय संग्राममें मेरे वधके लिये जो भी महान् बाण छोड़ोगे, उसे मैं अपने बाणसे उसी क्षण शीघ्र काट दूंगा, इसमें संशय नहीं है । जो लोग अभिमानवश इस पृथ्वीपर एकादशीको अन्न खाते हैं तथा माता, भौजाई, बहिन और बेटीके साथ पाप करते हैं, उन सबका पाप मुझे ही लगे, यदि मैं तुम्हारे बाणको न काट डालूँ ॥ ३२-३४ ॥ यह सुस्पष्ट बात सुनकर सुनन्दनके मनमें शङ्का हो गयी । अतः वे भी श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए बल्वलकी ओरसे युद्धस्थलमें आना ४ ९९ फिर बोले ॥ ३५ ॥
सुनन्दनने कहा - यदि मैंने छल - कपट छोड़कर सच्चे मनसे श्रीकृष्णके युगल - चरणारविन्दोंका सेवन किया हो तो मेरी बात सत्य हो । वीर! यदि मैं अपनी पत्नीको छोड़कर दूसरी किसी स्त्रीको कामभावसे न देखता होऊँ तो इस सत्यके प्रभावसे संग्रामभूमिमें मेरा यह कथन अवश्य सत्य हो ॥ ३६-३७ ॥ – ऐसा कहकर सुनन्दनने महाकाल और अग्रिके समान एक तीखे सायकको मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके छोड़ा । उस बाणको छूटा हुआ देख दैत्य राजकुमारने अपने बाणसे तत्काल काट दिया; ठीक उसी तरह, जैसे पक्षिराज गरुड अपने पंखसे सर्पके दो टुकड़े कर डालते हैं । राजन्! उस बाणके कटते ही तुरंत हाहाकार मच गया । लोकोंसहित पृथ्वी डोलने लगी और वे देवता भी विस्मयमें पड़ गये । बाणका नीचेवाला आधा भाग तो कटकर गिर पड़ा, किंतु फलयुक्त पूर्वार्ध भागने उस दैत्यके मस्तकको उसी तरह काट गिराया, जैसे हाथी किसी वृक्षके स्कन्ध ( मोटी डाली ) को तोड़ डालता है ॥ ३८–४१ ॥ उसके किरीट और कुण्डलोंसे युक्त मस्तकको कटकर गिरा देख समस्त दैत्य दुःखी होकर हाय - हाय करने लगे । कुनन्दनके धड़ने युद्धस्थलमें शीघ्र उठकर खड्गसे, घूँसोंसे और लातोंकी मारसे बहुत - से शत्रुओंको मौतके घाट उतार दिया । तत्पश्चात् यादव-सेनामें बार - बार दुन्दुभि बजने लगी और सुनन्दनके ऊपर देवताओंने फूलोंकी वर्षा की ॥ ४२–४४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' दैत्यपुत्रके वधका वर्णन ' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सैंतीसवाँ अध्याय भगवान् शिवका अपने गणोंके साथ बल्वलकी ओरसे युद्धस्थलमें आना और शिवगणों तथा यादवोंका घोर युद्ध; दीप्तिमान्का शिवगणको मार भगाना और अनिरुद्धका भैरवको जृम्भणास्त्रसे मोहित करना वज्रनाभने पूछा — ब्रह्मन्! कुनन्दनके मारे जाने शिव वहाँ आये क्यों नहीं? दैत्योंने घोड़ेको कैसे और बल्वलके रणभूमिमें मूच्छित हो जानेपर करुणामय छोड़ा? और यज्ञ किस तरह पूर्ण हुआ? – ये सब भगवान् शिवने उसकी सहायता क्यों नहीं की! भगवान् बातें विस्तारपूर्वक मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥
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५०० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड सौति कहते हैं - ब्रह्मन्! वज्रनाभका यह प्रश्न सुनकर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ गर्गजी सम्पूर्ण कथाका स्मरण करके उन यादवशिरोमणिसे बोले ॥ ३ ॥
श्रीगर्गजीने कहा- राजन्! जब बल्वल मूच्छित हो गया और शूरवीर कुनन्दन मारा गया, तब देवर्षि नारदकी प्रेरणासे भगवान् शिवने बड़ा कोप किया । नरेश्वर! भक्तोंकी रक्षा करनेवाले शिव क्रोध-पूर्वक नन्दीपर आरूढ़ हो, मस्तकपर जटाजूटके भीतर चन्द्रलेखा धारण किये, सर्पोंके हार और मुण्डमालासे अलंकृत हो, सारे अङ्गमें भस्म रमाये भयंकररूपसे आये । दस बाँह, पाँच मुख और पंद्रह नेत्रोंसे युक्त रुद्रदेव सिंहके चर्मका वस्त्र धारण किये मदमस्त एवं भयकारक प्रतीत होते थे । उनके हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश, धनुष, बाण, कुठार, पाश, परिघ और भिन्दिपाल शोभा दे रहे थे । वे सहस्रों सूर्योके तुल्य तेजस्वी और समस्त भूतगणोंसे आवृत थे । अनिरुद्ध आदि समस्त श्रेष्ठ वृष्णिवंशी वीरोंका युद्धस्थलमें वध करनेके लिये वे बड़ी उतावलीके साथ कैलाससे पृथ्वीतलको कम्पित करते हुए आये ॥ ४ - ९ ॥ नरेश्वर! उस समय आकाश और भूतलपर बड़ा हंगामा मचा । देवता, दैत्य और मनुष्य सभी विस्मित और भयभीत हो उठे । समस्त गणों और परिवारके साथ प्रलयंकर शंकरको रोषपूर्वक आया देख यादवोंको बड़ा भय हो गया । अनिरुद्धका मुँह भयके कारण निस्तेज हो गया । समराङ्गणमें वे दुःखी हो गये और उनका हृदय काँपने लगा । उस समय क्रोधसे भरे हुए गिरीशने हाथमें त्रिशूल लेकर समस्त यादवोंसे यह निष्ठुर बात कही ॥ १० - १३ ॥ शंकर बोले- कहाँ गये अनिरुद्ध और कहाँ गये सुनन्दन? मेरे भक्त कुनन्दनका वध करके साम्ब आदि यादव कहाँ चले गये? मेरे भक्त दैत्यशिरोमणि बल्वलको मूर्च्छित करके और उसके सेवकोंको युद्धमें मारकर वृष्णिवंशी जायँगे कहाँ? मैं युद्धस्थलमें अपने भक्तोंके इन सभी शत्रुओंको मार डालूँगा । मैं, विष्णु और ब्रह्मा — ये सभी संकटसे भक्तजनोंकी रक्षा करते हैं ॥१४–१६ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर रुद्रदेवने अनिरुद्धके पास भैरवको भेजा और कहा-' शूर! तुम समराङ्गणमें विजयी प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धसे युद्ध करनेके लिये जाओ । ' फिर उन्होंने सुनन्दनसे युद्ध करनेके लिये नन्दीको रोषपूर्वक भेजा, गदसे लोहा लेनेके लिये वीरभद्रको और साम्बसे लड़नेके लिये मयूरवाहन कार्तिकेयको प्रेरित किया । उन विरूपाक्ष शिवने भानुके साथ युद्ध करनेके लिये भृङ्गीको आदेश दिया और अन्य यादव - सैनिकोंसे जूझनेके लिये भूतों और प्रेतोंको प्रेषित किया । भगवान् रुद्रकी आज्ञा पाकर वे भूत, प्रेत, विनायक, भैरव, प्रमथ, वेताल, ब्रह्मराक्षस, उन्माद और कूष्माण्ड करोड़ोंकी संख्यामें युद्धमें आये । भूत यादवोंको अंगारोंसे मारने लगे । विनायक पट्टिशोंसे, भैरव शूलोंसे और प्रमथ खट्वाङ्गोंसे प्रहार करने लगे । ब्रह्मराक्षस मनुष्यों और घोड़ोंको पकड़कर खा जाते थे । यातुधान समराङ्गणमें मनुष्योंके मुण्ड चबाते और बेताल खप्परोंमें रक्त ले - लेकर पीते थे । पिशाच वहाँ नाचते और प्रेत गीत गाते थे । वे बारंबार योद्धाओंके मस्तकोंको गेंदकी भाँति इधर - उधर फेंकते थे । अट्टहास करते हुए चारों ओर दौड़ते और हाथियों तथा रथारोहियोंको रणमण्डलमें चबाते हुए दिखायी देते थे । पिशाचिनी और डाकिनियाँ युद्धस्थलमें अपने बालकोंको रक्त पिलातीं और ' रोओ मत ' - ऐसा कहती हुई उनकी आँखें पोंछती थीं । उन्माद और कूष्माण्ड स्वर्गगामी शूरवीरोंके मुण्डोंकी मालाएँ तैयार करके भगवान् शंकरको भेंट करते थे ॥ १७–२७ ॥ नृपेश्वर! उस समय यादव - सेनामें हाहाकार मच गया । भयसे भागते हुए घोड़े, हाथी और पैदल - वीर सहस्रोंकी संख्यामें युद्धक्षेत्रमें गिरकर मृत्युको प्राप्त हो गये । शिवगणोंका ऐसा बल देखकर श्रीकृष्ण-कुमार दीप्तिमान्ने अपने धनुषपर अत्यन्त अद्भुत बाणोंका संधान करके छोड़ना आरम्भ किया । राजन्! वे तीखे बाण कोटि - कोटि भूतों, प्रेतों और विनायकोंके शरीरमें उसी तरह घुसने लगे, जैसे वनमें मोर प्रवेश करते हैं । बाणोंसे विदीर्ण होकर समस्त भूतगण भागने लगे । कोई युद्धस्थलमें गिर गये और कोई मर गये । कितने ही बाणोंका आघात लगनेसे पहले ही धराशायी
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अध्याय ३७ ] भगवान् शिवका अपने गणोंके साथ हो गये ॥ २८ - ३२ ॥ प्रेतगणोंके पलायन कर जानेपर भैरव क्रोधसे भर गये । वे कुत्तेपर सवार हो, त्रिशूल हाथमें लिये कालकी भाँति आ पहुँचे । नरेश्वर! उन कालभयंकर भैरवको देखकर कोई भी उनके साथ जूझनेके लिये तैयार नहीं हुआ । केवल अनिरुद्ध उनके साथ युद्ध करने लगे । अनिरुद्धने युद्धस्थलमें भैरवको पाँच बाण मारे । भैरवने भी परिघके प्रहारसे उनके उत्तम रथको चूर - चूर रथपर आरूढ़ चढ़ाकर मायावी घायल कर दिया मूर्च्छा - सी आ प्रज्वलित तीन फेंका । शूलको बाणोंद्वारा उसके त्रिशूलको छिन्न -भैरवने मायाद्वारा कर दिया । फिर अनिरुद्धने भी दूसरे हो अपने सुदृढ़ धनुषपर प्रत्यञ्चा भैरवको रणभूमिमें दस बाणोंद्वारा । उन बाणोंसे आहत हो भैरवको कुछ गयी । फिर उन्होंने अग्रिके समान शिखाओंवाला त्रिशूल अनिरुद्धपर आया देख प्रद्युम्नकुमारने अपने टुकड़े - टुकड़े कर डाले । अपने भिन्न हुआ देख बलवान् रुद्रकुमार अपने मुखसे अग्रिकी सृष्टि की । उस अग्निसे भूमि, वृक्ष और दसों दिशाएँ जलने लगीं । पैदल - वीरों, रथारोहियों, घोड़ों तथा हाथियोंके शरीर सुन्दर फूलवाले सेमरकी रूईके समान जलने लगे । कितने ही वीर आगकी ज्वालाकी लपेटमें आ गये और कितने ही भस्म हो गये । सारी सेना अग्निज्वालासे व्याप्त हो गयी । कितने ही योद्धा भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करने लगे ॥ ३३ -४१ ॥ अपनी सेनाको भयसे व्याकुल देख और भैरवकी रची हुई मायाको जानकर धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्धने अपने धनुषपर एक बाण रखा । उस सायकको बल्वलकी ओरसे युद्धस्थलमें आना ५०१ पर्जन्यास्त्रसे अभिमन्त्रित र श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए शीघ्र ही आकाशमें छोड़ दिया ॥ ४२-४३ ॥ राजन्! उस बाणके छूटते ही मेघ प्रकट होकर पानी बरसाने लगे । आग बुझ गयी और ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो वर्षाकाल आ गया हो । मोर, कोयल, चातक, सारस और मेढक आदि बोलने लगे । यत्र - तत्र इन्द्रगोप ( वीरबहुटी नामक कीड़े ) शोभा पाने लगे । आकाश इन्द्रधनुष और बिजलीकी चमकसे दीप्तिमान् हो उठा । अपना प्रयास निष्फल हुआ देख भैरवने अपने मुखसे भैरव गर्जना की । जिससे सबका मन संत्रस्त हो उठा । उस भैरवनादसे समस्त लोकों और पातालोंसहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा । दिग्गज विचलित हो उठे, तारे टूटने लगे और उनसे भूखण्ड-मण्डल चमक उठा । उसी समय समस्त मनुष्य बहरे हो गये और गिर गये॥४४–४८ ॥ फिर सर्पोंसे विभूषित भैरवने क्रुद्ध हो हाथसे हाथ-को दबाते, दाँतोंसे ओठको चबाते, जीभ लपलपाते और लाल - लाल नेत्रोंसे देखते हुए यदुकुल - तिलक अनिरुद्धको तिनकेके समान समझकर एक तीखा फरसा हाथमें लिया । उसी समय रणनीतिमें कुशल अनिरुद्धने जृम्भणास्त्रका प्रयोग करके भैरवको उसी प्रकार मोहाच्छन्न कर दिया, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण बाणासुर - विजयके अवसरपर भगवान् शंकरको मोहित कर दिया था । राजन्! उस अस्त्र प्रभावसे अनिरुद्धके देखते - देखते भैरव रणभूमिमें गिर पड़े और जँभाई लेते हुए निद्रासुखका आस्वादन करने लगे ॥ ४ ९ -५२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' भैरव - मोहन ' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
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अड़तीसवाँ अध्याय नन्दिकेश्वरद्वारा सुनन्दनका वध; भगवान् शिवके त्रिशूलसे आहत हुए अनिरुद्धकी मूर्च्छा; साम्बद्वारा शिवकी भर्त्सना; साम्ब और शिवका युद्ध तथा रणक्षेत्रमें भगवान् श्रीकृष्णका शुभागमन श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! भैरवको निद्रित देख मृत्युञ्जय शिव कुपित हो उठे । उन्होंने वीरमानी अभिमन्युपर आक्रमण करनेके लिये अपने वृषभ नन्दिकेश्वरको प्रेरित किया । वृषभ उसी समय क्रोधसे भरकर दोनों सींगों, दाँतों और पिछले पैरोंसे यादवोंपर प्रहार करता हुआ सेनामें विचरने लगा । उसने सामने खड़े हुए सुनन्दनपर अपने एक सींगसे शीघ्र ही आघात किया । उस सींगके आघातसे सुनन्दनका वक्ष विदीर्ण हो गया और वे पञ्चत्वको प्राप्त हो गये ॥ १–३ ॥ तब हाथीपर बैठे हुए अनिरुद्ध धनुष लिये, कवच बाँधकर ' मत डरो, मत डरो ' – ऐसा कहते हुई अत्यन्त क्रोधपूर्वक वहाँ आये । श्रीकृष्णपुत्र वीर सुनन्दनको वहाँ मारा गया देख अनिरुद्धको बड़ा दुःख हुआ । वे शोकमें डूबकर काँपने लगे । उस महावीरके मारे जानेपर शोक पड़े हुए अनिरुद्धसे शिवजीने कहा— ' महाबली अनिरुद्ध! तुम रणक्षेत्रमें शोक न करो । युद्धमें भाग जाना शूरवीरोंके लिये अकीर्तिकारक माना गया है । इसलिये तुम भी संग्रामस्थलमें मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध करो । मेरे सामने युद्धकी अभिलाषासे आये हुए तुम्हारे भी प्राण जानेवाले ही हैं । तुम उनकी रक्षा करो'॥४–७३ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! भगवान् शिवकी यह बात सुनकर यदुकुलतिलक अनिरुद्धने शोक त्याग दिया और शिवजीके मस्तकपर पाँच बाण मारे । वे पाँचों बाण महेश्वरके जटाजूटमें उलझ गये और गीधके पंखोंसे युक्त वनस्पतिकी शाखाके समान दिखायी देने लगे । तब रुद्रदेवने अपने कोदण्डपर एक बाण रखा और उसके द्वारा सहसा अनिरुद्धके धनुषकी प्रत्यश्चा काट दी । अनिरुद्धने फिर शीघ्र ही अपने सुदृढ़ धनुषकी प्रत्यचा चढ़ा ली और एक सायकद्वारा शंकरजीके धनुषकी प्रत्यञ्चाको भी खण्डित कर दिया । तब उन दोनोंमें अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी युद्धका समाचार सुनकर विमानपर बैठे हुए इन्द्र आदि देवता कौतूहलवश वहाँ आ गये और आकाशमें स्थित हो वह युद्ध देखकर भयसे विह्वल हो परस्पर कहने लगे ॥८- १३ ॥ देवता बोले- ये दोनों त्रिभुवनकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं । इसलिये रणमण्डलमें इन दोनोंका युद्ध निष्फल है । कौन इस युद्धको जीतेगा और किसकी पराजय होगी? ( यह कैसे कहा जा सकता है ) ॥ १४३ ॥
श्रीगर्गजी कहते हैं—– राजन्! तदनन्तर तीन दिनोंतक उन दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ । फिर रुद्रदेवने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर रोषपूर्वक ब्रह्मास्त्रका संधान किया, जो वहाँ तीनों लोकोंका प्रलय करनेमें समर्थ था । परंतु अनिरुद्धने ब्रह्मास्त्रसे ब्रह्मास्त्रका, वज्रास्त्रसे पर्वतास्त्रका और पर्जन्यास्त्रसे आग्नेयास्त्र-का निवारण कर दिया । तब पिनाकधारी शिव अत्यन्त क्रोधके कारण प्रज्वलित - से हो उठे । उन्होंने तीन शिखाओंवाले त्रिशूलसे प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धपर आघात किया । वह त्रिशूल अनिरुद्धको विदीर्ण करके हाथीको भी चीरता हुआ निकल गया और उन दोनोंके बीचमें ऊपरको पुङ्खभाग तथा नीचेको मुख किये स्थित हो गया । हाथीकी तत्काल मृत्यु हो गयी और युद्ध-स्थलमें अनिरुद्ध भी मूच्छित हो गये । वे दोनों रणभूमिमें वक्षःस्थल विदीर्ण हो जानेके कारण एक-दूसरेसे लगे हुए ही गिर पड़े । उस समय हाहाकार मच गया । सब यादव रोने लगे । जैसे यमराजके आगे पापी डर जाते हैं, उसी प्रकार रुद्रदेवके आगे सब यादव भयभीत हो गये । अनिरुद्ध मृतकके समान मूर्च्छित होकर गिर पड़े हैं, यह समाचार सुनकर साम्ब शङ्कित हो स्कन्दको छोड़कर वहाँ गये । यादववीरको
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अध्याय ३८ ] नन्दिकेश्वरद्वारा मूर्च्छित हुआ देख साम्बके नेत्रोंसे अश्रुधारा बह चली और वे धनुष हाथमें लेकर क्रोधपूर्वक शिवसे बोले-" रुद्र! संग्राममें अनिरुद्ध तथा वीर सुनन्दनको मारकर तुम दानवोंका पालन कैसे करोगे? मैंने पहले वेदमें और भागवत - शास्त्रमें ब्राह्मणोंके मुँहसे सुन रखा था कि शिव वैष्णव हैं और वे सदा ' श्रीकृष्ण ' संज्ञक परब्रह्मका भजन - सेवन करते हैं । आज प्रद्युम्न कुमारके धराशायी होनेपर वह सब कुछ व्यर्थ हो गया । सुनन्दन श्रीकृष्णके पुत्र हैं, किंतु उन्हें भी तुमने युद्धमें मार डाला । महेश्वर! शिव! तुम व्यर्थ युद्ध करते हो । तुम्हें धिक्कार है । तुम श्रीकृष्णसे विमुख हो; अतः मैं रणभूमिमें क्षुरप्रों तथा सायकोंद्वारा तुम्हें शीघ्र ही मार गिराऊँगा । तुम खड़े रहो, खड़े रहो " ॥ १५ – २७३ ॥ साम्बकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले ॥२८ ॥
शिवने कहा – यादवश्रेष्ठ! तुम धन्य हो । तुम मुझसे जो कुछ कह रहे हो, वह सब सत्य है । देव - दानव - वन्दित ये भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र मेरे स्वामी हैं । किंतु वीर! जब कुनन्दन मारा गया तथा रणक्षेत्रमें बल्वल मूच्छित हो गया, तब मैं उसकी सहायताके लिये, अथवा यों कहो कि भक्तकी रक्षाके लिये यहाँ आ गया । मैं अपने दिये हुए वचनको सत्य करनेके लिये आया हूँ और भक्तका प्रिय करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें किंचित् कुपित होकर युद्ध करता हूँ ॥२ ९ –३१ ॥ भगवान् भूतनाथ शिव जब इस प्रकार कह रहे थे, तभी रोषसे भरे हुए साम्बने बड़ी शीघ्रताके साथ अपने धनुषसे छूटे हुए क्षुरप्रों एवं सायकोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया । उन बाणोंसे आहत होनेपर भी रुद्रदेवको थोड़ीसी भी वेदना नहीं हुई, जैसे फूलोंसे मारनेपर गजराजको कुछ पता नहीं चलता है । अब शिवने सुनन्दनका वध ५०३ अपना धनुष उठाया और युद्धमें जाम्बवतीकुमारको अनेक तीखे बाण मारे । साम्ब शिवको और शिव साम्बको परस्पर घायल करने लगे । उन दोनोंका युद्ध देखकर देवता ऐसा मानने लगे कि अब समस्त लोकोंका संहार होनेवाला है । राजन्! पृथ्वीपर और आकाशमें महान् कोलाहल मच गया । समस्त वृष्णि-वंशी भयभीत हो अपने रक्षक भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करने लगे ॥ ३२-३६ ॥ तब यादवोंपर महान् विपत्ति आयी हुई जानकर श्रीयदुकुलपालक शत्रुसूदन घोड़े और सारथिसे युक्त रथके द्वारा वहाँ आ पहुँचे । उनकी अङ्गकान्ति श्याम थी । मस्तकपर किरीट शोभा पा रहा था । नेत्र नूतन नील कमलकी शोभा छीन लेते थे । करोड़ों नवीन सूर्यकी कान्ति धारण किये भगवान् श्यामसुन्दर हाथोंमें कौमोदकी गदा, शङ्ख, चक्र, पद्म, धनुष, बाण और खड्ग लिये हुए थे । श्रीवत्सचिह्न, कौस्तुभमणि, पीताम्बर तथा वनमालासे अलंकृत श्रीहरि नीली अलकों तथा कुण्डल, कङ्कण आदि आभूषणोंसे विभूषित हो, करोड़ों कामदेवोंके समान शोभा पा रहे थे । जैसे राजहंस मुखसे मुक्ताफल गिरा रहे हों, उसी प्रकार श्वेत फेनकणोंको उगलनेवाले सुग्रीव आदि अत्यन्त वेगशाली तथा सुन्दर सामगान करनेवाले घोड़ोंसे उनका रथ जुता हुआ था । जैसे सर्दीसे डरे हुए लोग सूर्यका उदय देखकर सुखी हो जाते हैं, उसी प्रकार यादव अपने स्वामी श्रीकृष्णका शुभागमन देखकर हर्षसे विह्वल हो गये । उस समय यादव-सेनामें जय - जयकार होने लगा । आकाशमें स्थित हुए देवता फूलोंकी वृष्टि करने लगे । भगवान् श्रीकृष्णको अपनी सहायताके लिये आया जान साम्ब हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे और धनुष त्यागकर उनके चरणोंमें गिर पड़े ॥ ३७-४३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अनिरुद्ध आदिकी सहायताके लिये श्रीकृष्णका आगमन ' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
* श्यामः किरीटी नवकञ्जनेत्रो नवार्ककोटिद्युतिमादधानः । कौमोदकीशङ्खरथाङ्कपद्मकोदण्डबाणैर्नियुतोऽसिधारी श्रीवत्सचिह्नेन तु कौस्तुभेन पीताम्बरेणापि च मालयाढ्यः । नीलालकैः कुण्डलकङ्कणाद्यैर्विभूषितः कोटिमनोजतुल्यः ॥ समुद्गलद्भिः सितफेनशीकरान् मुक्ताफलानीव च राजहंसकैः । सुग्रीवमुख्यैरतिवेगवत्तरैर्हयैर्युतः सुन्दरसामगायनैः ॥ ( अध्याय ३८ । ३८-४० )
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उन्तालीसवाँ अध्याय भगवान् शंकरद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन; शिव और श्रीकृष्णकी एकता; श्रीकृष्णद्वारा सुनन्दन, अनिरुद्ध एवं अन्य सब यादवोंको जीवनदान देना तथा बल्वलद्वारा यज्ञ - सम्बन्धी अश्वका लौटाया जाना श्रीगर्गजी कहते हैं — भगवान् श्रीकृष्णको वहाँ उपस्थित देख महादेवजी भयभीत एवं शङ्कितचित्त हो गये और धनुष तथा त्रिशूल आदि त्यागकर उन श्रीपतिसे भक्तिपूर्वक बोले ॥ १ ॥
शंकरने कहा – सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वत्र व्यापक विष्णुदेव! मेरे अविनयको दूर कीजिये । मनको दबाइये और विषयोंकी मृगतृष्णा शान्त कीजिये । प्राणियोंके प्रति मेरे हृदयमें दयाका विस्तार कीजिये और मुझे संसार - सागरसे उबारिये । देवनदी गङ्गा जिनकी मकरन्दराशि है, जिनका मनोहर सौरभ - समूह सच्चिदानन्दमय है तथा जो भवबन्धनके भय एवं खेदका छेदन करनेवाले हैं, श्रीपतिके उन चरणारविन्दोंकी मैं वन्दना करता हूँ । प्रभो! परमार्थदृष्टिसे आपमें और मुझमें कोई भेद न होनेपर भी मैं ही आपका हूँ, आप मेरे नहीं हैं; क्योंकि समुद्रकी ही तरङ्गे हुआ करती हैं, तरङ्गोंका समुद्र कहीं नहीं होता । हे गोवर्धनपर्वत धारण करनेवाले! हे पर्वत - भेदी इन्द्रके अनुज! हे दानव-कुलके शत्रु! तथा हे सूर्य और चन्द्रमाको नेत्रोंके रूपमें धारण करनेवाले परमेश्वर! आप प्रभुका दर्शन हो जानेपर क्या इस संसारका तिरस्कार नहीं हो जाता है? परमेश्वर! मैं भवतापसे भीत हूँ और आप मत्स्य आदि अवतारोंद्वारा अवतारी होकर वसुधाका पालन करते हैं, अतः मेरा भी पालन कीजिये । दामोदर! गुणोंके मन्दिर! सुन्दर वदनारविन्द! गोविन्द! भवसागरको मथ डालनेके लिये मन्दराचलरूप श्रीकृष्ण! आप मेरे बड़े भारी भयको भगाइये । नारायण! करुणामय! मैं * ॐ अविनयमपनय विष्णो दमय मनः शमय विषयमृगतृष्णाम् दिव्यधुनीमकरन्दे परिमलपरिभोगसच्चिदानन्दे सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् उद्धतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे । मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवतावता सदा वसुधाम् । दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावकौ चरणौ आपके युगल - चरणोंकी शरण लूँ । यह छः पदोंवाली स्तुतिरूपिणी षट्पदी ( भ्रमरी ) मेरे मुखरूपी कमलमें सदा निवास करे * ॥२–८ ॥ भगवान् शंकरके इस प्रकार स्तुति करनेपर बलरामके छोटे भाई श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर अपने चरणोंमें झुके हुए चन्द्रशेखर शिवसे सारा अभिप्राय पूछा ॥ ९ ॥
श्रीकृष्ण बोले- शिव! मेरे कुबुद्धि पुत्रने तुम्हारा क्या अपराध किया था, जिससे तुमने युद्धमें उसे मार डाला और अनिरुद्धको मूच्छित कर दिया? किसलिये यदुकुलका विनाश किया? तुम युद्धस्थलमें आये ही क्यों? और आये भी तो युद्ध क्यों करने लगे? यह सब बात विस्तारपूर्वक मुझे बताओ ॥ १०-११ ॥ श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर प्रमथनाथ शिव लज्जित हो गये और कुछ सोच - विचारकर उन मधुसूदनसे बोले ॥१२ ॥
शंकरजीने कहा— देवदेव! जगन्नाथ! राधिकावल्लभ! जगन्मय! करुणाकर! मैं निर्लज्ज हूँ, अपराधी आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । देव! क्या आप नहीं जानते, मैं आपके सामने क्या कहूँगा? प्रभो! आपकी मायासे मोहित होकर मैं भक्तकी रक्षा करनेके लिये यहाँ आया था; आप मेरे इस सारे अपराधको क्षमा कर दीजिये । हरे! ' मैं ही सम्पूर्ण जगत्का शासक हूँ ' इस अभिमानसे मैंने युद्धस्थलमें, जिनके । भूतदयां विस्तारय । श्रीपतिपदारविन्दे । सामुद्रो हि तरङ्गः दृष्टे भवति प्रभवति परमेश्वर परिपाल्यो । भवजलधिमथनमन्दर श्रीकृष्ण ही देवता हैं, उन शूरवीर तारय संसारसागरतः ॥ भवभयखेदच्छिदे वन्दे ॥ क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ न भवति किं भवतिरस्कारः ॥ भवता भवतापभीतोऽहम् ॥ परमं दरमपनय त्वं मे ॥ । इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु ॥ ( अ ० ३ ९ । २–८ )