गर्ग संहिता — पृष्ठ 511–520
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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अध्याय ३ ९ ] भगवान् शंकरद्वारा वृष्णिवंशियोंको मारा है । श्रीकृष्ण! यही कारण है कि संत पुरुष परमवाञ्छित महान् ऐश्वर्यको स्वयं छोड़कर आपके निर्भय चरणकमलका सदा चिन्तन करते हैं । मनुष्योंको सुख और दुःख तभीतक प्राप्त होते हैं, जबतक उनका मन श्रीकृष्णमें नहीं लगता है । श्रीकृष्णमें मन लग जानेपर वह दुर्जय भक्तियोगरूपी खड्ग प्राप्त होता है, जो मनुष्योंके कर्मरूपी वृक्षोंका मूलोच्छेद कर डालता है । जो लोग मेरी भक्तिके बलसे घमंडमें आकर आप मेरे स्वामी यदुकुलतिलकका अपमान करते हैं, वे सब निश्चय ही नरकमें जायँगे * * ॥ १३–१९ ॥ – ऐसा कहकर भगवान् शंकर चुप हो नेत्रोंमें आँसू भरकर भक्तिभावसे श्रीकृष्णके युगलचरणारविन्दोंमें दण्डकी भाँति प्रणत हो गये । भगवान् श्रीकृष्णने रुद्रदेवको उठाकर अपने पास खड़ा किया और उन्हें आश्वासन देकर, मिलकर उनकी ओर सुधाभरी दृष्टिसे देखा ॥ २० - २१ ॥ तत्पश्चात् श्रीकृष्ण बोले- शिव! सभी देवता अपने भक्तका पालन करते हैं । तुमने भी यदि भक्तका पालन किया तो इसमें कौन - सा निन्दित कर्म कर डाला? तुम मेरे हृदयमें हो और मैं तुम्हारे हृदयमें । हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है । खोटी बुद्धिवाले मूढ़ पुरुष ही हम दोनोंमें अन्तर या भेद देखते हैं । सदाशिव! मेरे भक्त तुमको नमस्कार करते हैं और तुम्हारे भक्त मुझको । जो मेरी इस बातको नहीं मानते हैं, वे नरकमें पड़ेंगे ॥२२–२४ ॥ - ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें श्रीकृष्णका स्तवन ५०५ मारे गये अपने पुत्र सुनन्दनको अमृतवर्षिणी दृष्टिसे देखकर जीवित कर दिया । तत्पश्चात् अनिरुद्धके हृदय-से शूलको धीरे - धीरे खींचा और उन्हें भी जीवनदान दिया । इसके बाद सर्वसमर्थ परमेश्वर श्रीकृष्णने युद्ध-स्थलमें मारे गये समस्त यादवोंको सुधावर्षिणी दृष्टिसे देखकर जीवित कर दिया । इतनेमें ही दुन्दुभिनादके साथ देवता उत्साहसूचक पुष्पवर्षा करने लगे । ऐसा करके उन्होंने भगवान् गरुडध्वजको प्रसन्न किया । सम्पूर्ण त्रिलोकीके नेता भगवान् श्रीकृष्णको आया देख वे श्रेष्ठ यादव वेगपूर्वक उठकर खड़े हो गये और प्रसन्नताके साथ जय - जयकार करने लगे ॥ २५ – २ ९ ॥ तदनन्तर महादेवजीसे सुरक्षित हो बल्वल उठा और रोषपूर्वक कहने लगा- ' अनिरुद्ध कहाँ गया? ' तब शंकरजीने अपने शुभ वचनोंद्वारा उस दैत्यको समझाया और श्रीकृष्णकी महिमाको जानकर वह महामनस्वी दैत्य आनन्दित हो गया । राजन्! तदनन्तर गोविन्दको प्रणाम और उनकी स्तुति करके दैत्य बल्वलने बहुत - सी द्रव्यराशिके साथ घोड़ा लौटा दिया ॥ ३० - ३२ ॥ इसके बाद यज्ञके घोड़ेको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्ण पुत्र - पौत्रोंके साथ सेतुमार्गसे समुद्र तटपर आये । वहाँसे वे पश्चिम दिशाकी ओर चले गये । भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर रुद्रदेव बल्वलको उसके राज्यपर स्थापित करके अपने गणों और भैरवके साथ कैलासको चले गये । जो लोग भगवान् श्रीकृष्ण-के इस चरित्रको अपने घरपर सुनते हैं, भगवान् श्रीकृष्ण उनकी सदा सहायता करेंगे ॥ ३३–३५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अनिरुद्ध - विजय - वर्णन ' नामक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥
-* देवदेव जगन्नाथ राधिकेश जगन्मय । पाहि पाहि कृपाकारिन्निस्त्रपं मां कृतागसम् ॥
त्वं न जानासि किं देव कथयिष्यामि किं त्वहम् । भक्तस्य पालनं कर्तुं मायया तव मोहितः ॥
अहमागतवान् देव त्वं सर्वं क्षन्तुमर्हसि । शास्ताहं सर्वलोकस्य मानादिति मया हरे ॥
मारिताः संगरे शूरा वृष्णयः कृष्णदेवताः । तस्मात् संतः स्वयं त्यक्त्वा परमैश्वर्यमीप्सितम् ॥ ध्यायन्ते सततं कृष्ण पादाब्जं ते निरापदम् । सुखं दुःखं नृणां तावद् यावत्कृष्णे न मानसम् ॥ कृष्णे मनसि संजातो भक्तिखड्गो दुरत्ययः । नराणां कर्मवृक्षाणां मूलच्छेदं करोति यः ॥ मद्भक्तिबलदर्पिष्ठ मत्प्रभुं त्वां यदूत्तमम् । न मन्यन्ते च ते सर्वे यास्यन्ति निरयं ध्रुवम् ॥ ( अ ० ३ ९ । १३–१९ ) मिमासि हृदये त्वं तु भवतो हृदये ह्यहम् । आवयोरन्तरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुर्धियः ॥ त्वां नमन्ति च मद्भक्तास्त्वद्भक्ता मां सदाशिव । ये न मन्यन्ति मद्वाक्यं यास्यन्ति नरकं च ते ॥ ( अ ० ३ ९ । २३-२४ )
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चालीसवाँ अध्याय यज्ञ - सम्बन्धी अश्वका व्रजमण्डलमें वृन्दावनके भीतर प्रवेश; श्रीदामाका उसे बाँधकर नन्दजीके पास ले जाना; नन्दजीका समस्त यादवों और श्रीकृष्णसे सानन्द मिलना; यादव - सेनाका वृन्दावनमें और श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! श्रीकृष्णके द्वारा मुक्त हुआ पत्र और चामरोंसे विभूषित वह अश्व सम्पूर्ण देशका नेत्रोंसे अवलोकन करता हुआ आगे बढ़ा । नरेश्वर बल्वलको पराजित हुआ सुनकर अनेक देशोंके नरेश भगवान् श्रीकृष्णके भयसे अपने यहाँ आये हुए अश्वको पकड़ न सके । राजेन्द्र! इस प्रकार आगे - आगे जाता हुआ यदुवीर उग्रसेनका अश्व एक महीने में भारतवर्षके अन्तर्गत व्रजमण्डलमें जा पहुँचा । राजन्! वहाँसे यमुनाको पारकर वृन्दावनका दर्शन करते हुए वह श्रेष्ठ अश्व एक तमाल वृक्षके नीचे खड़ा हो गया । वहाँ दूब चरते हुए घोड़ेको देखकर बहुत से ग्वाल-बाल गौएँ चराना छोड़कर कौतूहलवश उसके पास आ गये और ताली पीटने लगे । राजन्! इस प्रकार जब सब ग्वाल - बाल घोड़ेको देख रहे थे, उसी समय गोपनायक श्रीदामा वहाँ आये और उन्होंने वहाँ विचरते हुए उस चञ्चल अश्वको अनायास ही पकड़ लिया । गाय बाँधनेवाली रस्सीको घोड़ेके गलेमें बाँधकर वे अन्य गोपके साथ ‘ किसने इसको छोड़ा है ' - यह बातचीत करते हुए नन्दरायके निकट गये । उस घोड़ेको आया देख नन्दरायजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उसके भालमें बँधे हुए पत्रको बाँचकर गद्गद -वाणीमें सब लोगोंसे कहा - ' यह उग्रसेनका घोड़ा है, जो मेरे गाँवमें आ गया है । मेरे प्रपौत्र अनिरुद्ध सब ओरसे इसका पालन करते हैं । मैं मित्रोंसे मिलनेके लिये इस यज्ञ - सम्बन्धी अश्वको ग्रहण करता हूँ । इसके बाद श्रीकृष्णकी - सी आकृतिवाले प्रियकारी प्रपौत्र अनिरुद्धको देखूँगा । ' ऐसा कहकर और यशोदाके सामने सारा अभिप्राय बताकर नन्दरायजी अनिरुद्धको देखनेके लिये अन्यान्य गोपोंके साथ नन्दगाँवसे बाहर निकले ॥ १-११ ॥ नृपेश्वर! उसी समय भोज, वृष्णि तथा अन्धक श्रीकृष्णका नन्दपत्तनमें निवास आदि कुलोंके समस्त यादव घोड़ेके पीछे लगे वहाँ आ पहुँचे । नृपेन्द्र! गङ्गासागरसे लौटते समय मार्गमें नैपाल तीर्थ, मिथिला, अयोध्या, बर्हिष्मती, कान्य-कुब्ज ( कन्नौज ), बलभद्रजीके स्थान ( दाऊजी ), गोकुल ( महावन ), सूर्यकन्या यमुना तथा जहाँ भगवान् केशवदेव विराजते हैं, उस मथुरापुरीका भी दर्शन करते हुए श्रीकृष्णसहित सब लोग वृन्दावन होते हुए नन्दगाँवमें आये । नन्दग्रामको दूरसे देखकर रथारूढ़ नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सबसे आगे होकर यादवोंके साथ वहाँ आये । निकट पहुँचकर श्रीहरिने सामने देखा - पिता नन्दरायजी एक सुसज्जित गजराजको आगे रखकर गोपोंके साथ खड़े हैं । नृपेश्वर! तरह - तरहके बाजे बजवाते, शङ्खनाद कराते, जय - जयकारकी ध्वनि फैलाते नन्दरायजी फूलोंके हार, मङ्गल कलश तथा बाजा आदिसे विभूषित थे । राजन्! उस समय नन्दजीका दर्शन करके उद्भव आदि समस्त यादवोंने उनको नमस्कार किया । सबके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक आये थे ॥ १२ - १८ ॥ उसी समय नन्दरायका दाहिना अङ्ग फड़क उठा । नरेश्वर! वह उत्तम शकुन देखकर वे मन - ही - मन कहने लगे - ' क्या मैं आज अपने नेत्रोंसे प्रियवादी श्रीकृष्णको देखूँगा? क्योंकि प्रियकी सूचना देने-वाला मेरा दाहिना नेत्र फड़क रहा है । यदि श्रीकृष्ण मेरे नेत्रोंके समक्ष आ जायँ तो आज मैं ब्राह्मणोंको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत एक लाख गौएँ दान दूँगा ' ॥ १ ९ - २१ ॥ नरेश्वर! ऐसा संकल्प करके जब नन्दजी चुप हुए, तभी व्रजवासियोंके मुखसे उन्होंने अपने पुत्रके शुभागमनका समाचार सुना । श्रीकृष्णका आगमन सुनकर विरहमें डूबे हुए नन्दराय उन श्रीहरिको देखनेके लिये रोते हुए - से सबके आगे चलने लगे । वे गद्गद
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अध्याय ४० ] यज्ञ - सम्बन्धी अश्वका व्रजमण्डलमें वृन्दावनके भीतर प्रवेश ५०७ वाणीसे बार - बार कह रहे थे - ' हे कृष्ण! हे कृष्ण! हे कृष्णचन्द्र! तुम कहाँ चले गये थे? क्या मुझ दुखियाको नहीं देखते हो ' ॥ २२-२४ ॥ पिताको देखकर पितृवत्सल श्रीकृष्ण रथसे कूदकर तत्काल उनके चरणोंमें गिर पड़े । श्रीनन्दरायने सुदीर्घकालके बाद आये हुए अपने पुत्रको उठाया और उन्हें छातीसे लगाकर वे नेत्रोंके जलसे नहलाने लगे । श्रीकृष्णचन्द्र भी करुणासे आकुल हो नेत्रोंसे अश्रुधारा बहाने लगे । तत्पश्चात् प्रेममें डूबे हुए श्रीदामा आदि मित्रोंको देखकर प्रेमपरिप्लुत श्रीकृष्णने उन सबको बारी - बारीसे अपने हृदयसे लगाया । अहो! इस भूतलपर कौन ऐसा मनुष्य है, जो भक्तोंके माहात्म्यका वर्णन कर सके? एक ओरसे नन्द आदि गोप रो रहे थे और दूसरी ओरसे श्रीकृष्ण आदि यादव । सब लोग विरहसे व्याकुल होनेके कारण परस्पर कुछ बोल नहीं पाते थे । श्रीकृष्णके मुखपर आँसुओंकी अविरल धारा बह रही थी । उन्होंने गद्गद वाणीसे प्रेमानन्दमें डूबे हुए समस्त गोपोंको आश्वासन दिया । उन सबने साक्षात् परिपूर्णतम जगदीश्वर श्रीकृष्णको वैसा ही देखा, जैसा वे मथुरा जाते समय दिखायी दिये थे ॥ २५–३१ ॥ नूतन जलधरके समान उनकी श्याम कान्ति थी । किशोर अवस्थाके बालक - से प्रतीत होते थे । उनके नेत्र शरत्कालके प्रभातमें खिले हुए कमलोंकी कान्तिको छीने लेते थे । उनका मुख अपनी छबिसे शरत्पूर्णिमाके शोभासम्पन्न पूर्ण चन्द्रमण्डलकी छबिको आच्छादित किये लेता था । करोड़ों कामदेवोंका लावण्य उनके लावण्यमें विलीन हो गया था । लीला -जनित आनन्दसे वे और भी सुन्दर प्रतीत होते थे । अधरोंपर मुस्कराहट और हाथोंमें मुरली लिये द्विभुज श्रीकृष्ण अत्यन्त मनोहर दिखायी देते थे । विद्युत्की -सी पीतकान्तिसे सुशोभित वस्त्र तथा मीनाकार कुण्डल धारण किये भगवान् श्रीहरिका सारा अङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त तथा कौस्तुभमणिसे दीप्तिमान् था । घुटनोंतक लटकती हुई मालतीसुमनोंकी माला और वनमालासे वे विभूषित थे । मस्तकपर मोरपंखका मुकुट तथा उत्तम रत्नोंका बना हुआ किरीट जगमगा रहा था । ओठ परिपक्व बिम्बाफलसे भी अधिक लाल थे तथा ऊँची नासिकासे उनका मुखमण्डल अद्भुत शोभा पा रहा था । राजेन्द्र! श्रीकृष्णके ऐसे रूपामृतका, आनन्दमें डूबे हुए व्रजवासी नेत्रोंसे पान कर रहे थे, मानो साधारण मानव वसुधापर सुलभ हुई सुधाका पान कर रहे हों * ॥३२–३७ ॥ राजन्! तत्पश्चात् प्रेमरसमें डूबे हुए नन्दरायजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ अनिरुद्धको और साम्ब आदि समस्त यादवोंको शुभाशीर्वाद दिया । इसके बाद समस्त यादवों और पुत्र - पौत्रोंसे घिरे हुए महाबुद्धिमान् नन्दजी अपनी पुरीमें प्रविष्ट हुए । उस समय उनके मनका सम्पूर्ण दुःख दूर हो गया था । द्वारपर पहुँचते ही श्रीकृष्ण रथसे कूद पड़े और साम्ब आदिके साथ माताको आनन्द प्रदान करते हुए तुरंत उनके भवनमें जा पहुँचे । माता यशोदा घरके द्वारतक आ गयी थीं । वे रो रही थीं और उनका गला रुँध गया था । उस दशामें उन्हें देखकर श्रीकृष्ण फूट - फूटकर रोते हुए माताके चरणोंमें पड़ गये । माता यशोदाने अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको छातीसे लगाकर उन्हें गद्गद कण्ठसे आशीर्वाद दिया । नन्द, उपनन्द, छहों वृषभानु तथा वृषभानुवर – ये सब लोग श्रीकृष्णको देखनेके लिये आये । यादवसहित श्रीकृष्णने वहाँ पधारे हुए गोपोंसे विधिपूर्वक मिलकर उन सबका समादर किया । उन सबने प्रसन्नमुख होकर श्रीकृष्णकी कुशल * नवीननीरदश्यामं किशोरवयसं शिशुम् । शरत्पूर्णेन्दुशोभाढ्यं शोभास्वाच्छादनाननम् । सस्मितं मुरलीहस्तं द्विभुजं ह्यतिसुन्दरम् चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं कौस्तुभेन विराजितम् । मयूरपिच्छचूडं च सद्रत्नमुकुटोज्ज्वलम् ।
एवं कृष्णस्य राजेन्द्र रूपं नेत्रैर्व्रजौकसः ।
शरत्प्रभातकमलकान्तिमोचनलोचनम् ॥
कोटिमन्मथलावण्यं लीलानन्दितसुन्दरम् ॥
। तडिद्वस्त्रधरं देवं मत्स्यकुण्डलिनं हरिम् ॥
आजानुमालतीमालावनमालाविभूषितम् ॥
पक्वबिम्बाधिकोष्ठं च नासिकोन्नतशोभनम् ॥
पपुरानन्दसमग्नाः पीयूषं मानवा इव ॥
( अ ० ४०।३२ - ३७ )
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५०८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड पूछी और भगवान् श्रीकृष्णने भी उन सबका उत्तम ही निवास किया, किंतु भगवान् श्रीकृष्ण नन्दनगरमें ही कुशल- समाचार पूछा । ३८ - ४५ ॥ ठहरे । राजन्! श्रीकृष्णसहित नन्दरायजीने वहाँ पधारे नृपेश्वर! तत्पश्चात् वृन्दावनमें यमुनाके तटपर हुए समस्त यादव - सैनिकोंको भोजन दिया और महात्मा अनिरुद्धकी सेनाके सारे शिविर लग गये । पशुओंके लिये भी चारे - दाने आदिका प्रबन्ध कर अनिरुद्ध, साम्ब और उद्धव आदिने तो शिविरोंमें दिया ॥ ४६–४८ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' व्रजमण्डलमें प्रवेश ' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
इकतालीसवाँ अध्याय श्रीराधा और श्रीकृष्णका मिलन श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! संध्याके समय श्रीराधाने नन्दनन्दन श्रीकृष्णको बुलवाया । उनका आमन्त्रण पाकर नित्य एकान्तस्थलमें, जहाँ शीतल कदलीवन था, श्रीकृष्ण वहाँ गये । कदलीवनमें एक मेघ - महल बना था, जिसमें चन्दनपङ्कका छिड़काव हुआ था । केले के पत्तोंसे सज्जित होनेके कारण वह भवन बड़ा मनोहर लगता था । अपनी विशालतासे सुशोभित उस मेघभवनमें यमुनाजलका स्पर्श करके बहती हुई वायु पानीके फुहारे बिखेरती रहती थी । श्रीराधिकाका ऐसा सुन्दर सारा मेघमन्दिर उनके विरह -दुःखकी आगसे सदा भस्मीभूत हुआ - सा प्रतीत होता था । नरेश्वर! गोलोकमें प्राप्त हुए श्रीदामाके शापसे वृषभानुनन्दिनीको श्रीकृष्णविरहका दुःख भोगना पड़ रहा था । उस दशामें भी वे वहाँ अपने शरीरकी रक्षा इसलिये कर रही थीं कि किसी - न - किसी दिन श्रीकृष्ण यहाँ आयेंगे ॥१-४ ॥ सखीके मुखसे जब यह संवाद मिला कि श्रीकृष्ण अपने विपिनमें पधारे हैं, तब श्रीवृषभानुनन्दिनी उन्हें लानेके लिये अपने श्रेष्ठ आसनसे तत्काल उठकर खड़ी हो गयीं और सहेलियोंके साथ दरवाजेपर आयीं । व्रजेश्वरी श्यामाने व्रजवल्लभ श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको उनका कुशल- समाचार पूछते हुए आसन दिया और क्रमशः पाद्य, अर्घ्य आदि उपचार अर्पित किये । नरेश्वर! परिपूर्णतमा श्रीराधाने परिपूर्णतम श्रीकृष्णका दर्शन पाकर विरहजनित दुःखको त्याग दिया और संयोग पाकर वे हर्षोल्लाससे भर गयीं । उन्होंने वस्त्र, आभूषण और चन्दनसे अपना शृङ्गार किया । प्राणनाथ श्रीकृष्णके कुशस्थली चले जानेके बादसे श्रीराधाने कभी शृङ्गार धारण नहीं किया था । इस दिनसे पहले उन्होंने कभी पान नहीं खाया, मिष्टान्न भोजन नहीं किया, शय्यापर नहीं सोयीं और कभी हास - परिहास नहीं किया था । इस समय सिंहासनपर विराजमान मदनमोहनदेवसे श्रीराधाने हर्षके आँसू बहाते हुए गद्गद कण्ठसे पूछा ॥५–१० ॥ श्रीराधा बोलीं- हृषीकेश! तुम तो साक्षात् गोकुलेश्वर हो; फिर गोकुल और मथुरा छोड़कर कुशस्थली क्यों चले गये? इसका कारण मुझे बताओ । नाथ! तुम्हारे वियोगसे मुझे एक - एक क्षण युगके समान जान पड़ता है । एक - एक घड़ी एक - एक मन्वन्तरके तुल्य प्रतीत होती है और एक दिन मेरे लिये दो परार्धके समान व्यतीत होता है । देव! किस कुसमयमें मुझे दुःखदायी विरह प्राप्त हुआ, जिसके कारण मैं तुम्हारे सुखदायी चरणारविन्दोंका दर्शन नहीं कर पाती हूँ । जैसे सीता श्रीरामको और हंसिनी मानसरोवरको चाहती है, उसी तरह मैं तुम मानदाता रासेश्वरसे नित्यमिलनकी इच्छा रखती हूँ । तुम तो सर्वज्ञ हो, सब कुछ जानते हो । मैं तुमसे अपना दुःख क्या कहूँ? नाथ! सौ वर्ष बीत गये, किंतु मेरे वियोगका अन्त नहीं हुआ ॥ ११ - १५ ॥ राजन्! अपने परम प्रियतम स्वामी श्यामसुन्दरसे ऐसा वचन कहकर स्वामिनी श्रीराधा विरहावस्था के दुःखोंको स्मरण करके अत्यन्त खिन्न हो फूट - फूटकर
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अध्याय ४२ ] रासक्रीडाके प्रसङ्गमें श्रीवृन्दावन, यमुना- पुलिन, वंशीवट आदिकी शोभाका वर्णन ५० ९ रोने लगीं । प्रियाको रोते देख प्रियतम श्रीकृष्णने अपने वचनोंद्वारा उनके मानसिक क्लेशको शान्त करते हुए यह प्रिय बात कही ॥ १६-१७ ॥ श्रीकृष्ण बोले- प्रिये राधे! यह शोक शरीरको सुखा देनेवाला है; अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । हम दोनोंका तेज एक है, जो दो रूपोंमें प्रकट हुआ है; इस बातको ऋषि - महर्षि जानते हैं । जहाँ मैं हूँ, वहाँ सदा तुम हो और जहाँ तुम वहाँ सदा मेँ हूँ । हम दोनोंमें प्रकृति और पुरुषकी भाँति कभी वियोग नहीं होता । राधे! जो नराधम हम दोनोंके बीचमें भेद देखते हैं, वे शरीरका अन्त होनेपर अपनी उस दोषदृष्टिके कारण नरकोंमें पड़ते हैं । श्रीराधिके! जैसे चकई प्रतिदिन प्रातः काल अपने प्यारे चक्रवाकको देखती हैं, उसी तरह आजसे तुम भी मुझे सदा अपने निकट देखोगी । प्राणवल्लभे! थोड़े ही दिनोंके बाद मैं समस्त गोप - गोपियोंके और तुम्हारे साथ अविनाशी ब्रह्मस्वरूप श्रीगोलोकधाममें चलूँगा ॥ १८–२२ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! माधवकी यह बात सुनकर गोपियोंसहित श्रीराधिकाने प्रसन्न हो प्यारे श्यामसुन्दरका उसी प्रकार पूजन किया, जैसे रमादेवी रमापतिकी पूजा करती हैं । नरेश्वर! श्रीराधिकाने पुनः श्रीकृष्णसे रासक्रीडाके लिये प्रार्थना की । तब प्रसन्न हुए रासेश्वरने वृन्दावनमें रास करनेका विचार किया ॥ २३-२४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' श्रीराधा - कृष्णका मिलन ' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
बयालीसवाँ अध्याय रासक्रीडाके प्रसङ्गमें श्रीवृन्दावन, यमुना - पुलिन, वंशीवट, निकुञ्जभवन आदिकी शोभाका वर्णन; गोपसुन्दरियों, श्यामसुन्दर तथा श्रीराधाकी छबिका चिन्तन श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! हेमन्त ऋतुके प्रथम मासमें पूर्णिमाकी रातको राधिकावल्लभ श्याम -सुन्दरने वृन्दावनमें पहलेकी ही भाँति सबको वशमें कर लेनेवाली वंशी बजायी । वह वंशीध्वनि सबके मनको आकृष्ट करती हुई सब ओर फैल गयी । उसे सुनकर गोपसुन्दरियाँ प्रेमवेदनासे पीड़ित एवं त्रस्त हो गयीं । मेघोंकी गतिको रोकती, तुम्बुरुको बार - बार आश्चर्यमें डालती, सनक - सनन्दन आदिके ध्यानमें बाधा पहुँचाती, ब्रह्माजीको विस्मित करती, उत्कण्ठावलियोंसे राजा बलिको भी चपल बनाती नागराज शेषमें चञ्चलता लाती तथा ब्रह्माण्डकटाहकी भित्तियोंका भेदन करती हुई वह वंशीध्वनि सब ओर फैल गयी ॥१-३ ॥ राजेन्द्र! इतनेमें ही चराचर प्राणियोंके सूर्यकिरण-जनित संतापका मार्जन करते हुए चन्द्रमाका उदय हुआ; जैसे परदेशसे आया हुआ प्रियतम अपनी प्रियाके विरह - शोकको दूर कर देता है । दूसरोंको मान देनेवाले नरेश! उसी समय यमुनाने दिव्य रूप धारण किया । वृन्दावन, गिरिराज और व्रजभूमिका स्वरूप भी दिव्य हो गया । श्यामवर्णा यमुनानदीका उत्कर्ष बहुत बढ़ गया । वहाँ मणियोंमें श्रेष्ठ रत्न, मोती, माणिक्य, शुभ्ररत्न ( हीरा ), हरितरत्न ( पन्ना ) आदिसे निर्मित १ - तेजश्चैकं द्विधाभूतमावयोर्ऋषयो विदुः ॥ यत्राहं त्वं सदा तत्र यत्र त्वं ह्यहमेव च । वियोग आवयोर्नास्ति मायापुरुषयोर्यथा ॥ भेदं हि चावयोर्मध्ये ये पश्यन्ति नराधमाः । देहान्ते नरकान् राधे ते प्रयान्ति स्वदोषतः ॥ ( अध्याय ४१ । १८-२० ) २ - रुन्धन्नम्बुभृतश्चमत्कृतिपरं कुर्वन्मुहुस्तुम्बुरु ध्यानादन्तरयन् सनन्दनमुखान् विस्मापयन् वेधसम् । औत्सुक्यावलिभिर्बलिं चटुलयन् भोगीन्द्रमाघूर्णयन् भिन्दन्नण्डकटाहभित्तिमभितो बभ्राम वंशीध्वनिः ॥ ( अध्याय ४२ । ३ )
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५१० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड करतोलिकाओंसे, जो वैदूर्य, नीलम, हरिन्मणि, इन्द्रनील, वज्रमणि और पीतमणियोंसे निर्मित सोपानों एवं रत्नमण्डपोंसे युक्त थीं, यमुनाजीकी अतिशय शोभा हो रही थी । यमुना नदी वहाँ श्रीकृष्णसदनमें लौटती हुई सब नदियोंसे उत्कृष्ट शोभा पा रही थीं । स्वच्छन्द उछलते हुए मत्स्यगणोंके साथ बहती तथा सुन्दर श्याम अङ्गसे पापराशिका हरण करती हुई वे अपनी ऊँची - ऊँची चञ्चल लहरों तथा प्रफुल्ल कमलोंसे सुशोभित थीं ॥ ४ - ७ ॥ उस गोवर्धनगिरिका भजन - सेवन करो । जो शत-शत चन्द्रमाओंके प्रकाशसे युक्त है, मन्दार और चन्दन लताओंसे वेष्टित कल्पवृक्ष जहाँ अद्भुत शोभा पाते हैं, जहाँ रासमण्डल तथा मणिमय मण्डप विद्यमान हैं तथा जिसके शिखरपर करोड़ों मञ्जुल निकुञ्ज कुटीर दीप्तिमान् हैं । यमुनाजीके तटप्रदेश, नीरराशि तथा तीरके सम्पर्क में आकर मन्दगतिसे प्रवाहित होनेवाली अत्यन्त सुगन्धित वायुसे कम्पित वृन्दावनका सारा भाग सुवासित है तथा श्रीखण्ड, कुङ्कुमयुक्त मृत्तिका एवं अगुरुसे चर्चित होकर वह वन परम कल्याणमय जान पड़ता है । वसन्त ऋतुमें सुलभ नूतन पल्लवों और फूलोंके रंगोंसे सेवित वृन्दावन मन्दार, चन्दन, चम्पा, कदम्ब, निरम्ब, अमड़ा, आम, कटहल, अगुरु, नारंगी, श्रीफल, ताड़, पीपल, बरगद और नवल नारियलसे सुशोभित है । खजूर, श्रीफल ( बेल ) और लवङ्गलताएँ उस वनकी शोभा बढ़ाती थीं । अंजीर, साल, तमाल, कदम्ब, सन्तान ( कल्पवृक्ष ), कुन्द, बेर, केला और मोतियोंसे वह सम्पन्न था । सेमल, मौलसिरी, केतकी और शिरीष आदि वृक्ष उसके वैभव थे ॥ ८–११ ॥ नृपेन्द्र! सत्पुरुषोंके मनको मोद प्रदान करनेवाली लता - बल्लरी और कमलोंके समूहसे जिसकी आभा मनोहारिणी प्रतीत होती है, वह तुलसी - लतासे सम्पन्न श्रेष्ठ वृन्दावन श्रीमल्लिका, अमृतलता और मधुमयी माधवी - लताओंसे सुशोभित है । व्रजमण्डलके मध्य -भागमें तुम ऐसे वृन्दावनका चिन्तन करो । यमुनाके तटपर मधुर कण्ठवाले विहङ्गमोंसे युक्त वंशीवट शोभा पाता है । उसका पुलिन बालुकाओंसे सम्पन्न है । श्रीपाटल, महुआ, पलाश, प्रियाल, गूलर, सुपारी, दाख और कपित्थ ( कैथ ) आदि वृक्ष यमुनातटकी शोभा बढ़ाते हैं । कोविदार ( कचनार ), पिचुमन्द ( नीम ), लताजाल, अर्जुन ( सरल ), देवदारु, जामुन, सुन्दर बेंत, नरकुल, कुब्जक, स्वर्णयूथी, पुन्नाग, नागकेसर, कुटज और कुरबकसे भी वह आवृत है । चक्रवाक, सारस, तोते, श्वेत राजहंस, कारण्डव और जलकुक्कुट यमुनातटपर सदा कल- कूजन किया करते हैं । दात्यूह ( पपीहा ), कोयल, कबूतर, नीलकण्ठ और नाचते हुए मोरोंके कलरवसे मुखरित यमुनापुलिनका तुम सदा स्मरण करो ॥१२–१६ ॥ श्यामा, चकोर, खञ्जरीट, सारिका ( मैना ), पारावत ( परेवा ), भ्रमर, तीतर, तीतरी, कनकलता, मधुलता, मधुयुक्त जूही - इन सबसे जो आवेष्टित है, हरिण, मर्कट और मर्कटियाँ जहाँ सदा विचरती रहती हैं और पद्मरागमणिके शिखर जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, वह वृन्दावनका निकुञ्जभवन, श्रीकौस्तुमणि और इन्द्रनील मणियोंसे अलंकृत है । वहाँ कोटि - कोटि चन्द्रमण्डलकी शोभासे युक्त सुनहरे चँदोवे लगे हैं, जो रेशमके सूतसे निर्मित हुए हैं । उस निकुञ्ज - भवनका द्वार मणिमय बन्दनवारोंसे विलसित है । मोतियोंकी झालरोंसे युक्त सुवर्णके समान पीली पताकाएँ वहाँ फहराती रहती हैं । कबूतर और हंस आदि पक्षी उसे घेरे रहते हैं । मन्दार, कुन्द, कनेर, जूही और नूतन चम्पाके फूलोंकी विचित्र मालाओंसे उस निकुञ्ज - भवनकी सुन्दर सजावट की गयी है । नागकेसर, कमल और हरिचन्दनके पल्लवोंकी मालाओंसे तथा श्रीमालती, कुरबक तथा काञ्चनयूथिकाके फूलोंके हारोंसे आवृत वह निकुञ्ज भवन कामदेवके मनको भी मोह लेनेवाला है । वहाँ दीवारोंपर सुन्दर रत्नमय दर्पण लगे हैं और श्वेत चामर उस भवनकी शोभा बढ़ाते हैं । नूतन पल्लवों और पुष्पोंसे अलंकृत सिंहासनों, शय्यासनोंमें सुवर्ण और मूँगेके पाये लगे हैं, जिनसे उस भवनकी अनुपम शोभा होती है । श्रीचन्दन और अगुरुके जल, सुगन्धित पुष्पोंकी मकरन्दराशि तथा कस्तूरीके सौरभसे आमोदित केसरपङ्कसे उस भवनमें सब ओर छिड़काव किया गया है । हिलते हुए वसन्त-
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अध्याय ४२ ] रासक्रीडाके प्रसङ्गमें श्रीवृन्दावन, यमुना- पुलिन, वंशीवट आदिकी शोभाका वर्णन ५११ वृक्षोंके पल्लवोंसे जिनका अनुमान होता है, ऐसे शीतल तथा गजराजकी - सी गतिवाले मन्द मन्द समीरणसे उस भवनका सर्वाङ्ग सुगन्धसे भीना हुआ था । वहाँके वृक्षोंकी शाखाएँ अत्यन्त नम्र - झुकी हुई थीं तथा अधिकाधिक पुष्पसमूहोंसे वह अलंकृत था । श्रीहरिके ऐसे निकुञ्ज - भवनका तुम चिन्तन करो ॥ १७ - २२ ॥ नरेश्वर! श्रीहरिके वेणुवादनसे निकला हुआ गीत अत्यन्त प्रेमोन्मादकी वृद्धि करनेवाला था । उसे सुनकर समस्त व्रजसुन्दरियोंका मन प्रियतम श्रीकृष्णके वशमें हो गया । वे घरका सारा काम - काज छोड़कर व्रजमें चली आयीं । राजन्! जिन्हें पतियोंने रोक लिया, वे भी प्रियतम श्रीकृष्णके द्वारा हृदय हर लिये जानेके कारण स्थूल शरीर छोड़कर तत्काल श्रीकृष्णके पास चली गयीं । जिसपर सुनहरा दुकूल बिछा हुआ था, उस सिंहासनपर, उसके मध्यभागमें श्यामसुन्दर नन्दनन्दन श्रीसुन्दरी राधिकाके साथ बैठे थे । उनके गलेमें मकरन्दपूरित मालतीकी माला शोभा पा रही थी । उनकी अङ्गकान्ति श्याम थी । वे प्रात: कालके सूर्यके समान दीप्तिमान् किरीटसे सुशोभित थे । उनकी प्रभा चारों ओर फैल रही थी । अधरसे लगी हुई श्रीमुरलीके कारण उन श्रीहरिकी मनोहरता और भी बढ़ गयी थी । वहाँ आयी हुई व्रजसुन्दरियोंने कोटि - कोटि कामदेवके समूहोंको मोहित करनेवाले पीताम्बरधारी श्यामसुन्दरको देखा ॥२३ - २६ ॥ राजन्! मीनाकार कुण्डलधारी प्रिया - प्रियतम श्रीहरिको देखकर गोपियाँ तत्काल मूच्छित हो गयीं । उनके अङ्गोंमें किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं दिखायी देती थी । तब श्रीकृष्णने अमृतके समान मधुर वचनोंद्वारा उन सबको सान्त्वना दी - धीरज बँधाया । तब समस्त गोपसुन्दरियाँ उस वनप्रान्तमें चेतनाको प्राप्त हुईं । गद्गद वाणीसे श्रीकृष्णकी स्तुति करके डरी हुई - सी उन गोपसुन्दरियोंने विरहजनित दुःखका परित्याग कर प्राणवल्लभ गोविन्दकी ओर बड़े प्यारसे देखा । मालतीवनसे व्याप्त दिव्य वृक्षों एवं दिव्य लताओंके जालसे मण्डित तथा भ्रमरोंकी गुञ्जारोंसे मुखरित शोभाशाली वृन्दावनमें साक्षात् मदनमोहनदेव श्रीहरि गोपाङ्गनाओंके साथ विचरने लगे । अपने हस्तकमलसे श्रीराधिकाके करकमलको पकड़कर हँसते हुए साक्षात् भगवान् नन्दनन्दन यमुनाजीके तटपर आये । यमुनाके किनारे शोभायमान निकुञ्ज - भवनमें श्रीकृष्ण विराजमान हुए । राजन्! मधुपतिके उस भवनमें श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें संलग्न हुई गोपाङ्गनाओंके पैरोंमें झनकारते हुए नूपुरोंकी ध्वनिके साथ खनखनाते हुए हाथके कंगनों, पाँवके मञ्जीरों और कटिप्रदेशकी रत्ननिर्मित चञ्चल किंकिणियोंके मधुर रवको तुम मनके कानोंसे सुनो ॥ २७–३३ ॥ मन्द - मन्द मुसकानकी कान्तिसे उन गोपसुन्दरियोंके कोमल कपोल - प्रान्त सुस्पष्ट चमकते या चमत्कारपूर्ण शोभा धारण करते थे । शोभामयी दन्तपङ्क्तिसे विद्युद्विलास - सा प्रकट करनेवाली उन सखियोंके वेष बड़े मनोहर थे । कोटीर रत्नके हार और हरितमणिके बाजूबंदसे विभूषित तथा सूर्यमण्डलके समान दीप्तिमान् कुण्डलोंसे मण्डित हुई उन गोपसुन्दरियोंमें कोई - कोई युवती ' मुग्धा ' बतायी गयी है । कोई तरुणी ' मध्या ' और कोई सुन्दरी ' प्रगल्भा ' नायिका थी । कोई तरुणी ' तरुं नयति- इति तरुणी । ' - इस व्युत्पत्तिके अनुसार तरुको भी विनयकी शिक्षा देती थी । कोई सखी उस सुन्दर वनमें अपने मधुर हासकी छटा बिखेरती थी और कोई मदमत्त होकर चलती थी । कोई उसे भी हाथसे ठोंककर आगे दौड़ जाती थी और कोई उसको भी पकड़कर उस निकुञ्ज - भवनमें कमलके फूलोंसे पीटती थी । कोई किसीके ढीले या टूटते हुए सुवर्णहारको हँसी - हँसीमें खींच लेती और कोई उस वन - विहारमें इस तरह मतवाली होकर दौड़ती कि उसके बँधे हुए केशपाश खुल जाते थे । उस निकुञ्ज भवनमें श्रीजाह्नवी ( गङ्गा ), मधु माधवी, शीला, रमा, शशिमुखी, विरजा, सुशीला, चन्द्रानना, ललिता, अचला, विशाखा और माया आदि असंख्य गोपियाँ थीं । मैंने यहाँ थोड़ी - सी गोपाङ्गनाओंके ही नाम बताये हैं । वहाँकी मणिमयी भूमियोंपर कोई लीलाछत्र लेकर और कोई अतिमौक्तिक लता ( मौगरा आदि ) के फूलोंकी मालाएँ लेकर चलती थी । कितनी ही सखियाँ चामर, व्यजन,
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५१२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड दण्ड और फहराती हुई पीली पताकाएँ लिये चल रही थीं । कुछ गोपाङ्गनाएँ वहाँ श्रीहरि ( नटवर नन्दकिशोर ) का वेष धारण करके नाचती थीं । कोई हाथमें वीणा लेकर बजाती, कोई हाथसे ताल देती और कोई मृदङ्गवादनकी कला दिखाती थी । कितनी ही सखियाँ वृषभानुनन्दिनीका - सा वेष धारण किये, केयूर और कुण्डलोंसे अलंकृत हो वंशी लेकर बजातीं और कई मणिमण्डित बेंतकी छड़ी हाथमें लेकर चलती थीं । सुन्दर हाव - भाव, रस और तालसे युक्त मन्द मुसकानके रससे सिक्त तथा झंकारते हुए नूपुरोंके शब्दसे युक्त विशद कटाक्षों, भौंहोंके कुटिल विलासों एवं संगीत -नृत्यकलाके ज्ञानोंद्वारा गोपाङ्गनाएँ वहाँ श्रीराधा तथा माधवको सतत संतुष्ट कर रही थीं । यमुनाके तटपर उस निकुञ्ज - भवनमें वंशीवटके पासकी वनभूमिके निकट नटवरवेषधारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ गिरिराजकी घाटीमें विचर रहे हैं । इस झाँकीमें तुम उनका चिन्तन करो ॥ ३४–४१ ॥ श्रीपद्मरागमणिके समान अरुण आभावाले चमकीले नखोंसे जिनके चरणारविन्द उद्दीप्त जान पड़ते हैं, जो अपने पैरोंमें झंकारते हुए नूपुर धारण किये हुए हैं, जिनके सम्पूर्ण अङ्गदेशसे दिव्य दीप्ति झर रही है, जो विचरणकालमें अपने लाल - लाल पादतलोंसे भूप्रदेशको अरुण रंगसे रञ्जित कर रहे हैं, शोभाशाली चरणपरागकी सुन्दर कान्ति बिखेरते हुए इधर - उधर टहल रहे हैं, जिनका युगल जानुदेश लक्ष्मीजीके करकमलोंद्वारा सब ओरसे लालित होता - दुलारा जाता है, जिनके रम्भाके समान जाँघोंपर पीताम्बर शोभा पाता है, जिनका उदरभाग अत्यन्त कृश है, नाभिसरोवर रोमावलिरूपी भ्रमरोंसे सुशोभित है, जो उदरमें त्रिवेणीमयी तीन रेखा धारण करते हैं, जिनका वक्षःस्थल भृगुके चरणचिह्न तथा कौस्तुभमणिसे अलंकृत है, श्रीवत्सचिह्न एवं हारोंसे अत्यन्त रुचिर दिखायी देता है, जिनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति नूतन मेघमालाके समान नील है, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं, जिनके विशाल भुजदण्ड हाथीकी सूँड़के समान प्रतीत होते हैं, जो रत्नमय बाजूबंद और मणिमय कंगन धारण करते हैं, जिनके एक हाथमें दिव्य कमल है तथा दूसरे हाथमें दिव्य शङ्ख कमलपर विराजित राजहंसके समान शोभा पाता है, जो शङ्खाकार ग्रीवासे सुन्दर दिखायी देते हैं, जिनके कपोलोंका मध्यभाग अत्यन्त शोभाशाली है, चिबुक ( ठोढ़ी ) का भाग गहरा है और दाँत कुन्दके समान चमकीले हैं, पके हुए बिम्बफलको अपनी अरुणिमासे लज्जित करनेवाले अधर मन्द मुसकानकी छटासे छबिमान हैं, नासिका तोतेकी चोंचके समान नुकीली है और जिनके वचनोंसे मानो अमृत झरता रहता है, कटाक्ष अत्यन्त चञ्चल हैं, नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान मनोहर हैं, जिनकी प्रत्येक लीला उनके प्रति प्रेमकी वृद्धि करनेवाली है और भ्रूमण्डल मानो मन्द मुस्कानरूपी प्रत्यञ्चासे युक्त कामदेवके धनुष हैं, जिनके मस्तकपर धारित रत्नमय किरीट विद्युत्की छटाको विलज्जित कर रहा है तथा जो मार्तण्डमण्डलके समान कान्तिमान् कुण्डलोंसे मण्डित हैं, जिनके अधरपर वंशी विराजमान है, काली काली घुँघराली अलकें चञ्चल भुजङ्गके समान जान पड़ती हैं, जिनका मुख सजल पद्मपत्रके समान स्वेद बिन्दुओंसे विलसित है, जो करोड़ों कामदेवोंके घनीभूत सौन्दर्याभिमानको हर लेनेवाले हैं, जिनका श्रीविग्रह पतला है तथा जो वृन्दावनमें वंशीवटके समीप विचर रहे हैं, उन राधावल्लभ नटवर नन्दकिशोरका तुम सब प्रकारसे भजन सेवन करो ॥ ४२ – ४७ ॥ * श्रीपद्मरागनखदीप्तिपदारविन्दं लक्ष्मीकराब्जपरिलालितजानुदेशं श्रीवत्सहाररुचिरं नवमेघनीलं श्रीकम्बुकण्ठललितं विलसत्कपोलं श्रीपुण्डरीकदलनेत्रमनङ्गलीलं वंशीधरं त्वहिविलोलगुडालकाढ्यं झङ्कारनूपुरधरं स्फुरदङ्गदेशम् । रम्भोरुपीतवसनं तु कृशोदराभम् । पीताम्बरं करिकरस्फुटबाहुदण्डम् । मध्यं तु निम्नचिबुकं किल कुन्ददन्तम् । भ्रूमण्डलस्मितगुणावृतकामचापम् ।
राधापतिं सजलपद्ममुखं चलन्तम् ।
कुर्वन्तमेव तु पदारुणभूमिदेशं श्रीमत्परागसुरुचालमितस्ततस्तु ॥
रोमावलिभ्रमरनाभिसरस्त्रिरेखं काञ्चीधरं भृगुपदं मणिकौस्तुभाढ्यम् ॥
रत्नाङ्गदं च मणिकङ्कणपद्महस्तं श्रीराजहंसवरकन्धरशोभमानम् ॥
बिम्बाधरं स्मितलसच्छुकचञ्चनासं पीयूषकल्पवचनं प्रचलत्कटाक्षम् ॥
विद्युच्छटोच्छलितरत्नकिरीटकोटिं मार्तण्डमण्डलविकुण्डलमण्डिताभम् ॥
कंदर्पकोटिघनमानहरं कृशाङ्गं वंशीवटे नटवरं भज सर्वथा त्वम् ॥
( अध्याय ४२ ।४२-४७ )
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अध्याय ४२ ] गोपसुन्दरियों, श्यामसुन्दर तथा श्रीराधाकी छबिका चिन्तन ५१३ जिनके लाल - लाल नखचन्द्रोंसे युक्त चरणारविन्द -की शोभा कुछ - कुछ लाल दिखायी देती है, मञ्जीर और नूपुरोंकी झङ्कारके साथ जिनके कटिप्रदेशकी किंकिणी खनकती रहती है, घुँघुरू और सोनेके कंगनों मधुर शब्दसे शोभित होनेवाली तथा तरुपुञ्जके निकुञ्जमें विराजमान उन श्रीराधारानीका मैं ध्यान करता हूँ । श्रीराधाके शरीरपर नीले रंगके वस्त्र शोभा पाते हैं, जो सुनहरे किनारोंके कारण सूर्यकी किरणोंके समान चमक रहे हैं । यमुनातटपर प्रवाहित होनेवाली वायुकी गतिसे वे वस्त्र चञ्चल हो गये हैं-उड़ रहे हैं और अत्यन्त सूक्ष्म ( महीन ) होनेके कारण बहुत ही ललित ( सुन्दर ) दीख पड़ते हैं । ऐसे वस्त्रोंसे सुशोभित, अतिशय गौरवर्णा एवं मनोहर मन्द हासवाली रासेश्वरी श्रीराधाका भजन करो । जिनके बहुमूल्य मणिमय अङ्गद तथा रत्नमय हार प्रातः काल -के सूर्यमण्डलकी भाँति दीप्तिमान् हैं, जो कानोंके ताटङ्क ( बाली ) और कण्ठमें सुशोभित मणिराज कौस्तुभके कारण अत्यन्त मनोहर छबि धारण करती हैं, जिनके गलेमें रत्नमयी कण्ठमाला तथा फूलोंके चौदह लड़ोंके हार शोभा पाते हैं तथा जो रत्ननिर्मित मुद्रिकासे ललित ( अत्यन्त आकर्षक ) प्रतीत होती हैं, उन व्रजराज नन्दनन्दनकी पत्नी श्रीराधाका स्मरण करो । जिनके मस्तकपर चूड़ामणिकी कान्तिसे लसित अर्धचन्द्राकार भूषण जगमगा रहा है, कण्ठगत आभूषणों और मुख-मण्डलमें की गयी पत्ररचनासे जिनका रूप - सौन्दर्य विचित्र ( अद्भुत ) जान पड़ता है, जो श्रीपट्टसूत्र और मणिमय पट्टसूत्रोंद्वारा निर्मित दो लड़ोंकी चञ्चल माला धारण करती हैं तथा जिन्होंने अपने एक हाथमें प्रकाशमान सहस्रदल कमलको धारण कर रखा है, उन श्रीराधाका भजन करो । श्रीयुक्त भुजाओंके मणिमय कंगनोंसे कुचमण्डलमें विलसित रत्नमय हारकी दीप्ति द्विगुणित हो उठती है, सुन्दर नासिकाके नकबेसर आदि आभूषण समूचे कपोलमण्डलको उद्भासित करते हैं । उत्तम यौवनावस्थाके अनुरूप उनकी मन्द मन्द गति है । सिरपर बँधी हुई सुन्दर वेणी नागिनके समान शोभा पाती है । खिली हुई चम्पाके फूलोंकी - सी अङ्गोंकी पीत - गौर आभा है तथा मुखकी शोभा संध्याकालमें उदित करोड़ों चन्द्रमाओंकी कान्तिको तिरस्कृत करती है, ऐसी श्रीराधाका भजन करो । जो सुन्दर हावभावसे सुशोभित, नव विकसित नीलकमलके समान नेत्रवाली, मन्द मुसकानकी कान्तिमती कलाको प्रकाशित करनेवाली तथा चञ्चल कटाक्षोंके कारण कमनीय हैं, जिनकी कुन्तलराशिकी श्याम आभा बड़ी मनोहर है तथा जो पारिजातके हारोंके मधुर मकरन्दपर लुभायी हुई भ्रमरीके गुञ्जारवसे सुशोभित हैं, उन श्रीकृष्णवल्लभा राधाका चिन्तन करो । श्रीखण्डचन्दन, केसरपङ्क तथा अगुरुमिश्रित जलसे जिनका अभिषेक हुआ है, भालदेशमें जो कुङ्कुमकी वेणी धारण करती हैं तथा जिनके मुख - मण्डलमें रुचिर पत्ररचनाके रूपमें विचित्र चित्र चित्रित किया गया है, कल्पवृक्षके पत्रोंके समान जिनकी रुचिर गौर कान्ति है तथा जो नेत्रोंमें पूर्णरूपसे अञ्जनकी शोभा धारण करती हैं, उन गजगामिनी, पद्मिनी नायिका रासेश्वरी श्रीराधाका भजन करो * ॥४८–५४ ॥ ऐसी रतिसे भी अधिक सुन्दर श्रीराधाको साथ लेकर श्रीकृष्ण निकुञ्जवनकी शोभा देखनेके लिये
* आरक्तरक्तनखचन्द्रपदाब्जशोभां मञ्जीरनूपुररणत्कटिकिङ्किणीकाम् ।
श्रीघण्टिकाकनककङ्कणशब्दयुक्तां राधां दधामि तरुपुञ्जनिकुञ्जमध्ये ॥
नीलाम्बरैः कनकरश्मितटस्फुरद्भिः श्रीभानुजातटमरुद्गतिचञ्चलाङ्गैः ।
सूक्ष्मस्वरूपललितैरतिगौरवणां रासेश्वरीं भज मनोहरमन्दहासाम् ॥
बालार्कमण्डलमहाङ्गदरत्नहारां ताटङ्कतोरणमणीन्द्रमनोहराभाम् ।
श्रीकण्ठभालसुमनोनवपंचदाम्नीं रत्नाङ्गुलीयललितां व्रजराजपत्नीम् ॥
चूडामणिद्युतिलसत्स्फुरदर्धचन्द्रं ग्रैवेयकालपनपत्रविचित्ररूपाम् ।
श्रीपट्टसूत्रमणिपट्टचलद्विदानीं स्फूर्जत्सहस्रदलपद्मधरां भजस्व ॥
श्रीबाहुकङ्कणलसत्कुचरत्नदीसिं श्रीनासिकाभरणभूषितगण्डदेशाम् ।
सयौवनालसगतिं कलसर्पवेर्णी संध्येन्दुकोटिवदनां स्फुटचम्पकाभाम् ॥
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५१४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड जब जा रहे थे, तब वहाँ गोपाङ्गनाएँ मणिमय छत्र धारण किये, मनोहर चँवर लिये तथा फहराती हुई पताकाएँ ग्रहण किये उनके साथ - साथ दौड़ने लगीं । आदिपुरुष नन्दनन्दन उत्तम धैवत और मध्यम आदि स्वरोंसे छः राग तथा उनका अनुगमन करनेवाली छत्तीसों रागिनियोंका ललित वंशीरवके द्वारा गान करते हुए चल रहे थे, ऐसे श्रीकृष्णका ध्यान करो । जो शृङ्गार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, रौद्र, बीभत्स और भयानक रसोंसे नित्य युक्त हैं, व्रजवधुओंके मुखारविन्दके भ्रमर हैं और जिनके युगल चरण योगीश्वरोंके हृदयकमलमें सदा प्रकाशित होते हैं, उन भक्तप्रिय भगवान्का भजन करो । जो समस्त क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञरूपसे निवास करते हैं, आदिपुरुष हैं, अधियज्ञ-स्वरूप हैं, समस्त कारणोंके भी कारणेश्वर हैं, प्रकृति और पुरुषमेंसे पुरुषरूप हैं तथा जिन्होंने अपने तेजसे यहाँ समस्त छल - कपट - काम - कैतवको निरस्त कर दिया है, उन सर्वेश्वर श्रीकृष्ण हरिका भजन करो । शिव, धर्म, इन्द्र, शेष, ब्रह्मा, सिद्धिदाता गणेश तथा अन्य देवता आदि भी जिनकी ही स्तुति करते हैं; श्रीराधा, लक्ष्मी, दुर्गा, भूदेवी, विरजा, सरस्वती आदि तथा सम्पूर्ण वेद सदा जिनका भजन करते हैं, उन श्रीहरिका मैं भजन करता हूँ ॥ ५५–५९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' रासक्रीडा - विषयक ' बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णका श्रीराधा और गोपियोंके साथ विहार तथा मानवती गोपियोंके अभिमानपूर्ण वचन सुनकर श्रीराधाके साथ उनका अन्तर्धान होना श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! वृक्षों, लताओं और भ्रमरोंसे व्याप्त तथा शीतल - मन्द पवनसे वीजित वृन्दावनमें मुरलीके छिद्रोंको मुखोद्गत समीरसे 1. भरते - वेणु बजाते हुए नन्दनन्दन श्रीहरि बारंबार देवताओंका मन मोहने लगे । तदनन्तर वेणुगीत सुनकर प्रेमविह्वला कीर्तिनन्दिनी श्रीराधाने प्रियतम नन्दनन्दनको दोनों बाँहों में भर लिया । गोकुलचन्द्र श्रीकृष्णने गोकुलकी चकोरी राधाको प्रेमपूर्वक निहारते हुए फूलोंकी सेजपर उनके मनको लुभाते हुए उनके साथ आनन्दमयी दिव्य क्रीडा की । श्रीकृष्णके साथ विहारका सुख पाकर स्वामिनी श्रीराधा ब्रह्मानन्दमें निमग्न हो गयीं । उन्होंने स्वामीको वशमें कर लिया और वे परमानन्दका अनुभव करने लगीं ॥ १- ४ ॥ राजन्! प्रेमानन्द प्रदान करनेवाले रमणीय रमावल्लभ श्रीहरिको गोपरामाओंने रासमण्डलमें सब ओरसे पकड़ लिया । उनमें सौ यूथोंकी युवतियाँ विद्यमान थीं । नरेश्वर! रमणीय नन्दनन्दन श्रीहरिने रासमण्डलमें जितनी व्रजसुन्दरियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके उनके साथ विहार किया । जैसे संत पुरुष ब्रह्मका साक्षात्कार करके परमानन्दमें निमग्न हो जाते हैं, उसी प्रकार वे वृन्दावनविहारिणी समस्त गोप-सुन्दरियाँ बाँकेविहारीके साथ विहारका सुख पाकर ब्रह्मानन्दमें डूब गयीं । श्रीवल्लभ श्यामसुन्दरने अपने शोभाशाली युगलकरकमलोंद्वारा उन सम्पूर्ण व्रज-वनिताओंको अपने हृदयसे लगाया; क्योंकि उन्होंने अपनी भक्तिसे भगवान्को वशमें कर लिया था । उन गोपसुन्दरियोंके मुखोंपर पसीनेकी बूँदें छा रही थीं । व्रजवल्लभ श्रीकृष्णने बड़े प्यारसे अपने पीताम्बरद्वारा
सद्धावभावसहितां नवपद्मनेत्रां स्फूर्जत्स्मितद्युतिकलां प्रचलत्कटाक्षाम् ।
कृष्णप्रियां ललितकुन्तलकुन्तलाभां मन्दारहारमधुरभ्रमरीरवाढ्याम् ॥
श्रीखण्डकुङ्कुममृदागुरुवारिसिक्तां श्रीबिन्दुकीरुचिरपत्रविचित्रचित्राम् ।
संतानपत्ररुचिरामलमश्रुनाभां रासेश्वरीं गजगतिं भज पद्मिनीं ताम् ॥
( अध्याय ४२ । ४८–५४ )