गर्ग संहिता — पृष्ठ 61–70

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

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अध्याय १५ ] यशोदाद्वारा श्रीकृष्णके मुखमें श्रीनारदजीने कहा— आठ वसुओंमें प्रधान जो ' द्रोण ' नामक वसु हैं, उनकी स्त्रीका नाम ' धरा ' है । इन्हें संतान नहीं थी । वे भगवान् श्रीविष्णुके परम भक्त थे । देवताओंके राज्यका भी पालन करते थे । राजन्! एक समय पुत्रकी अभिलाषा होनेपर ब्रह्माजीके आदेशसे वे अपनी सहधर्मिणी धराके साथ तप करनेके लिये मन्दराचल पर्वतपर गये । वहाँ दोनों दम्पति कंद, मूल एवं फल खाकर अथवा सूखे पत्ते चबाकर तपस्या करते थे । बादमें जलके आधारपर उनका जीवन चलने लगा । तदनन्तर उन्होंने जल पीना भी बंद कर दिया । इस प्रकार जनशून्य देशमें उनकी तपस्या चलने लगी । उन्हें तप करते जब दस करोड़ वर्ष बीत गये, तब ब्रह्माजी प्रसन्न होकर आये और बोले - ' वर माँगो ' ॥ ६ - ९ ॥ उस समय उनके ऊपर दीमकें चढ़ गयी थीं । अतः उन्हें हटाकर द्रोण अपनी पत्नीके साथ बाहर निकले । उन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम किया और विधिवत् उनकी पूजा की । उनका मन आनन्दसे उल्लसित हो उठा । वे उन प्रभुसे बोले - ॥ १० ॥

श्रीद्रोणने कहा- ब्रह्मन्! विधे! परिपूर्णतम जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण मेरे पुत्र हो जायँ और उनमें हम दोनोंकी प्रेमलक्षणा भक्ति सदा बनी रहे, जिसके प्रभावसे मनुष्य दुर्लङ्घ्य भवसागरको सहज ही पार कर जाता है । हम दोनों तपस्वीजनोंको दूसरा कोई वर अभिलषित नहीं है ॥ ११-१२ ॥ श्रीब्रह्माजी बोले- तुमलोगोंने मुझसे जो वर माँगा है, वह कठिनाईसे पूर्ण होनेवाला और अत्यन्त दुर्लभ है । फिर भी दूसरे जन्ममें तुमलोगोंकी अभिलाषा पूरी होगी ॥ १३ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! वे ' द्रोण ' ही इस पृथ्वीपर ' नन्द ' हुए और ' धरा ' ही ' यशोदा ' नामसे विख्यात हुईं । ब्रह्माजीकी वाणी सत्य करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण पिता वसुदेवजीकी पुरी मथुरासे व्रजमें पधारे थे । भगवान् श्रीकृष्णका शुभ चरित्र सुधा - निर्मित खाँड़से भी अधिक मीठा है । गन्धमादन पर्वतके शिखरपर भगवान् नर - नारायणके श्रीमुखसे मैंने इसे सुना है । उनकी कृपासे मैं कृतार्थ हो गया । सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन ५ वही कथा मैंने तुमसे कही है; अब और क्या सुन चाहते हो? ॥ १४–१६ ॥ श्रीबहुलाश्वने पूछा- महामुने! शिशुरूपधा उन सनातन पुरुष भगवान् श्रीहरिने बलरामजीके सा कौन - कौन - सी लीलाएँ कीं, यह मुझे बताइये ॥ १७ श्रीनारदजीने कहा — राजन्! एक दिन वसुदेव जीके भेजे हुए महामुनि गर्गाचार्य अपने शिष्योंके सा नन्दभवनमें पधारे । नन्दजीने पाद्य आदि उत्तम उपचारों द्वारा मुनिश्रेष्ठ गर्गकी विधिवत् पूजा की और प्रदक्षिण करके उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया ॥ १८-१९ ॥ नन्दजी बोले - आज हमारे पितर देवता औ अग्नि – सभी संतुष्ट हो गये । आपके चरणोंकी धू पड़नेसे हमारा घर परम पवित्र हो गया । महामुने आप मेरे बालकका नामकरण कीजिये । विप्रव प्रभो! अनेक पुण्यों और तीर्थोंका सेवन करनेपर १ आपका शुभागमन सुलभ नहीं होता ॥ २०-२१ ॥ श्रीगर्गजीने कहा - नन्दरायजी! मैं तुम्हारे पुत्रव नामकरण करूँगा, इसमें संशय नहीं है; किंतु कु पूर्वकालकी बात बताऊँगा, अतः एकान्त स्थानमें चलो ॥२२ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर गर्ग नन्द - यशोदा तथा दोनों बालक - श्रीकृष्ण ए बलरामको साथ लेकर गोशालामें, जहाँ दूसरा को नहीं था, चले गये । वहाँ उन्होंने उन बालकोंव नामकरण - संस्कार किया । सर्वप्रथम उन्होंने गणेश आ देवताओंका पूजन किया, फिर यत्नपूर्वक ग्रहोंका शोध ( विचार ) करके हर्षसे पुलकित हुए महामुनि गर्गाचा नन्दसे बोले ॥ २३-२४ ॥ गर्गजीने कहा- ये जो रोहिणीके पुत्र हैं, इनव नाम बताता हूँ - सुनो । इनमें योगीजन रमण करते अथवा ये सबमें रमते हैं या अपने गुणोंद्वा भक्तजनोंके मनको रमाया करते हैं, इन कारणों उत्कृष्ट ज्ञानीजन इन्हें ' राम ' नामसे जानते हैं योगमायाद्वारा गर्भका संकर्षण होनेसे इनका प्रादुर्भा हुआ है, अतः ये ' संकर्षण ' नामसे प्रसिद्ध होंगे अशेष जगत्का संहार होनेपर भी ये शेष रह जा हैं, अतः इन्हें लोग ' शेष ' नामसे जानते हैं । सब

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५६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड अधिक बलवान् होनेसे ये ' बल ' नामसे भी विख्यात होंगे ॥ २५-२६३ ॥ नन्द! अब अपने पुत्रके नाम सावधानीके साथ सुनो- ये सभी नाम तत्काल प्राणिमात्रको पावन करनेवाले तथा चराचर समस्त जगत् के लिये परम कल्याणकारी हैं । ' क ' का अर्थ है— कमलाकान्त; ' ऋ'कारका अर्थ है— राम; ' ष ' अक्षर षड्विध ऐश्वर्यके स्वामी श्वेतद्वीपनिवासी विराजते हैं, वे ही परम प्रभु तुम्हारे यहाँ बालकरूपसे प्रकट हुए हैं । पृथ्वीका भार उतारना, कंस आदि दुष्टोंका संहार करना और भक्तोंकी रक्षा करना - ये ही इनके अवतारके उद्देश्य हैं ॥ ३३ - ३६ ॥ भरतवंशोद्भव नन्द! इनके नामोंका अन्त नहीं है । वे सब नाम वेदोंमें गूढ़रूपसे कहे गये हैं । इनकी लीलाओंके कारण भी उन - उन कर्मोंके अनुसार इनके भगवान् विष्णुका वाचक है । ' ण ' नरसिंहका प्रतीक है नाम विख्यात होंगे । इनके अद्भुत कर्मोंको लेकर और ' अकार ' अक्षर अनिभुक् ( अग्निरूपसे हविष्यके भोक्ता अथवा अग्निदेवके रक्षक ) का वाचक है तथा दोनों विसर्गरूप बिंदु (: ) नर - नारायणके बोधक हैं । ये छहों पूर्ण तत्त्व जिस महामन्त्ररूप परिपूर्णतम शब्दमें लीन हैं, वह इसी व्युत्पत्तिके कारण ' कृष्ण ' कहा गया है । अतः इस बालकका एक नाम ' कृष्ण ' है । सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग - इन युगों में इन्होंने शुक्ल, रक्त, पीत तथा कृष्ण कान्ति ग्रहण की है । द्वापरके अन्त और कलिके आदिमें यह बालक ' कृष्ण ' अङ्गकान्तिको प्राप्त हुआ है, इस कारणसे भी यह नन्दनन्दन ' कृष्ण ' नामसे विख्यात होगा ॥ २७–३२ ॥ इनका एक नाम ' वासुदेव ' भी है । इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ' वसु ' नाम है इन्द्रियोंका । इनका देवता है - चित्त । उस चित्तमें स्थित रहकर जो चेष्टाशील हैं, उन अन्तर्यामी भगवान्‌को ' वासुदेव ' कहते हैं । वृषभानुकी पुत्री राधा जो कीर्तिके भवनमें प्रकट हुई हैं, उनके ये साक्षात् प्राणनाथ बनेंगे; अतः इनका एक नाम ' राधापति ' भी है । जो साक्षात् परिपूर्णतम स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं, असंख्य ब्रह्माण्ड जिनके अधीन हैं और जो गोलोकधाममें आश्चर्य नहीं करना चाहिये । तुम्हारा अहोभाग्य है; क्योंकि जो साक्षात् परिपूर्णतम परात्पर श्रीपुरुषोत्तम प्रभु हैं, वे तुम्हारे घर पुत्रके रूपमें शोभा पा रहे हैं ॥३७-३८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं — राजन्! यों कहकर श्रीगर्गजी जब चले गये, तब प्रमुदित हुए महामति नन्दरायने यशोदा- सहित अपनेको पूर्णकाम एवं कृतकृत्य माना ॥३ ९ ॥ तदनन्तर ज्ञानिशिरोमणि ज्ञानदाता मुनिश्रेष्ठ श्रीगर्गजी यमुनातटपर सुशोभित वृषभानुजीकी पुरीमें पधारे । छत्र धारण करनेसे वे दूसरे इन्द्रकी तथा दण्ड धारण करनेसे साक्षात् धर्मराजकी भाँति सुशोभित होते थे । साक्षात् दूसरे सूर्यकी भाँति वे अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे । पुस्तक तथा मेखलासे युक्त विप्रवर गर्ग दूसरे ब्रह्माकी भाँति प्रतीत होते थे । शुक्ल वस्त्रोंसे सुशोभित होनेके कारण वे भगवान् विष्णुकी सी शोभा पाते थे । उन मुनिश्रेष्ठको देखकर वृषभानुजीने तुरंत उठकर अत्यन्त आदरके साथ सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये । पूजनोपचारके ज्ञाता वृषभानुने मुनिको एक मङ्गलमय आसनपर बिठाकर पाद्य आदिके द्वारा उन ज्ञानिशिरोमणि गर्गका १ - रमन्ते योगिनो ह्यस्मिन् सर्वत्र रमतीति वा ॥

गुणैश्च रमयन् भक्तांस्तेन रामं विदुः परे । गर्भसंकर्षणादस्य संकर्षण इति स्मृतः ॥

सर्वावशेषाद् यं शेषं बलाधिक्याद् बलं विदुः । ( गर्ग ०, गोलोक ० १५। २५–२६३ ॥ )

२- सद्यः प्राणिपवित्राणि जगतां मङ्गलानि च । ककारः कमलाकान्त ऋकारो राम इत्यपि ॥

षकार: षड्गुणपतिः श्वेतद्वीपनिवासकृत् । णकारो नरसिंहोऽयमकारो ह्यक्षरोऽग्निभुक् ॥

विसर्गौ च तथा ह्येतौ नरनारायणावृषी । सम्प्रलीनाश्च षट् पूर्णा यस्मिञ्छब्दे महामनौ ॥ परिपूर्णतमे साक्षात् तेन कृष्णः प्रकीर्तितः । शुक्लो रक्तस्तथा पीतो वर्णोऽस्यानुयुगं धृतः ॥ द्वापरान्ते कलेरादौ बालोऽयं कृष्णतां गतः । तस्मात् कृष्ण इति ख्यातो नाम्नायं नन्दनन्दनः ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १५ | २८–३२ )

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अध्याय १५ ] यशोदाद्वारा श्रीकृष्णके मुखमें विधिवत् पूजन किया । फिर उनकी परिक्रमा करके महान् ' वृषभानुवर ' इस प्रकार बोले ॥ ४०–४५ ॥ श्रीवृषभानुने कहा – संत पुरुषोंका विचरण शान्तिमय है; क्योंकि वह गृहस्थजनोंको परम शान्ति प्रदान करनेवाला है । मनुष्योंके भीतरी अन्धकारका नाश महात्माजन ही करते हैं, सूर्यदेव नहीं । भगवन्! आपका दर्शन पाकर हम सभी गोप पवित्र हो गये । भूमण्डलपर आप जैसे साधु - महात्मा पुरुष तीर्थोंको भी पावन बनानेवाले होते हैं । मुने! मेरे यहाँ एक कन्या हुई है, जो मङ्गलकी धाम है और जिसका ' राधिका ' नाम है । आप भली - भाँति विचारकर यह बतानेकी कृपा कीजिये कि इसका शुभ विवाह किसके साथ किया जाय । सूर्यकी भाँति आप तीनों लोकोंमें विचरण करते हैं । आप दिव्यदर्शन हैं, जो इसके अनुरूप सुयोग्य वर होगा, उसीके हाथमें इस कल्याणमयी कन्याको दूँगा ॥ ४६ - ४ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर मुनिवर गर्गजी वृषभानुजीका हाथ पकड़े यमुनाके तटपर गये । वहाँ एक निर्जन और अत्यन्त सुन्दर स्थान था, जहाँ कालिन्दीजलकी कल्लोलमालाओंकी कल - कल ध्वनि सदा गूँजती रहती थी । वहीं गोपेश्वर वृषभानुको बैठाकर धर्मज्ञ मुनीन्द्र गर्ग इस प्रकार कहने लगे ॥ ५०-५१ ॥ श्रीगर्गजी बोले - वृषभानुजी! एक गुप्त बात है, यह तुम्हें किसीसे नहीं कहनी चाहिये । जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकधामके स्वामी, परात्पर तथा साक्षात् परिपूर्णतम हैं; जिनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है; स्वयं वे ही भगवान् श्रीकृष्ण नन्दके घरमें प्रकट हुए हैं ॥ ५२-५३ ॥ श्रीवृषभानुने कहा – महामुने! नन्दजीका भी भाग्य अद्भुत है, धन्य एवं अवर्णनीय है । अब आप भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका सम्पूर्ण कारण मुझे बताइये ॥५४ ॥

श्रीगर्गजी बोले- पृथ्वीका भार उतारने और कंस आदि दुष्टोंका विनाश करनेके लिये ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं । उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णकी पटरानी, जो प्रिया श्रीराधिकाजी गोलोकधाममें विराजती हैं, वे ही तुम्हारे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन ५७ घर पुत्रीरूपसे प्रकट हुई हैं । तुम उन पराशक्ति राधिकाको नहीं जानते ॥ ५५-५६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! उस समय गोप वृषभानुके मनमें आनन्दकी बाढ़ आ गयी और वे अत्यन्त विस्मित हो गये । उन्होंने कलावती ( कीर्ति ) -को बुलाकर उनके साथ विचार किया । पुनः श्रीराधा-कृष्णके प्रभावको जानकर गोपवर वृषभानु आनन्दके आँसू बहाते हुए पुनः महामुनि गर्गसे कहने लगे ॥ ५७-५८ ॥ श्रीवृषभानुने कहा – द्विजवर! उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको मैं अपनी यह कमलनयनी कन्या समर्पण करूँगा । आपने ही मुझे यह सन्मार्ग दिखलाया है; अतः आपके द्वारा ही इसका शुभ विवाह - संस्कार सम्पन्न होना चाहिये ॥ ५ ९ ॥ श्रीगर्गजीने कहा- राजन्! श्रीराधा और श्रीकृष्णका पाणिग्रहण - संस्कार मैं नहीं कराऊँगा । यमुनाके तटपर भाण्डीर वनमें इनका विवाह होगा । वृन्दावनके निकट जनशून्य सुरम्य स्थानमें स्वयं श्रीब्रह्माजी पधारकर इन दोनोंका विवाह करायेंगे । गोपवर! तुम इन श्रीराधिकाको भगवान् श्रीकृष्णकी वल्लभा समझो । संसारमें राजाओंके शिरोमणि तुम हो और लोकोंका शिरोमणि गोलोकधाम है । तुम सम्पूर्ण गोप गोलोकधामसे ही इस भूमण्डलपर आये हो । वैसे ही समस्त गोपियाँ भी श्रीराधिकाजीकी आज्ञा मानकर गोलोकसे आयी हैं । बड़े - बड़े यज्ञ करनेपर देवताओं-को भी अनेक जन्मोंतक जिनकी झाँकी सुलभ नहीं होती, उनके लिये भी जिनका दर्शन दुर्घट है, वे साक्षात् श्रीराधिकाजी तुम्हारे मन्दिरके आँगनमें गुप्तरूपसे विराज रही हैं और बहुसंख्यक गोप और गोपियाँ उनका साक्षात् दर्शन करती हैं ॥ ६०–६४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! श्रीराधिकाजी और भगवान् श्रीकृष्णका यह प्रशंसनीय प्रभाव सुनकर श्रीवृषभानु और कीर्ति — दोनों अत्यन्त विस्मित तथा आनन्दसे आह्लादित हो उठे और गर्गजीसे कहने लगे ॥ ६५ ॥

दम्पति बोले- ब्रह्मन्! ' राधा ' शब्दकी तात्त्विक व्याख्या बताइये । महामुने! इस भूतलपर मन

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५८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड संदेहको दूर करनेवाला आपके समान दूसरा कोई नहीं है ॥ ६६ ॥

श्रीगर्गजीने कहा – एक समयकी बात है, मैं गन्धमादन पर्वतपर गया । साथमें शिष्यवर्ग भी थे । वहीं भगवान् नारायणके श्रीमुखसे मैंने सामवेदका यह सारांश सुना है । ' रकार ' से रमाका, ' आकार ' से गोपिकाओंका, ' धकार ' से धराका तथा ' आकार ' से विरजा नदीका ग्रहण होता है । परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका सर्वोत्कृष्ट तेज चार रूपोंमें विभक्त हुआ । लीला, भू, श्री और विरजा ये चार पत्नियाँ ही उनका चतुर्विध तेज हैं । ये सब की सब कुञ्जभवनमें जाकर श्रीराधिकाजीके श्रीविग्रहमें लीन हो गयीं । इसीलिये विज्ञजन श्रीराधाको ' परिपूर्णतमा ' कहते हैं । गोप! जो मनुष्य बारंबार ' राधाकृष्ण ' के इस नामका उच्चारण करते हैं, उन्हें चारों पदार्थ तो क्या, साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण भी सुलभ हो जाते हैं * ॥६७–७१ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! उस समय भार्या-सहित श्रीवृषभानुके आश्चर्यकी सीमा न रही । श्रीराधा-कृष्णके दिव्य प्रभावको जानकर वे आनन्दके मूर्तिमान् विग्रह बन गये । इस प्रकार श्रीवृषभानुने ज्ञानिशिरोमणि श्रीगर्गजीकी पूजा की । तब वे सर्वज्ञ एवं त्रिकालदर्शी मुनीन्द्र गर्ग स्वयं अपने स्थानको सिधारे ॥७२-७३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' नन्द - पत्नीका विश्वरूपदर्शन तथा श्रीकृष्ण - बलरामका नामकरण- संस्कार ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

सोलहवाँ भाण्डीर - वनमें नन्दजीके द्वारा श्रीराधाजीकी द्वारा विवाह; ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णका श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! एक दिन नन्दजी अपने नन्दनको अङ्कमें लेकर लाड़ लड़ाते और गौएँ चराते हुए खिरकके पाससे बहुत दूर निकल गये । धीरे - धीरे भाण्डीर - वन जा पहुँचे, जो कालिन्दी - नीरका स्पर्श करके बहनेवाले तीरवर्ती शीतल समीरके झोंकेसे कम्पित हो रहा था । थोड़ी ही देरमें श्रीकृष्णकी इच्छासे वायुका वेग अत्यन्त प्रखर हो उठा । आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित हो गया । तमाल और कदम्ब वृक्षोंके पल्लव टूट - टूटकर गिरने, उड़ने और अत्यन्त भयका उत्पादन करने लगे । उस समय महान् अन्धकार छा गया । नन्दनन्दन रोने लगे । वे पिताकी गोदमें बहुत भयभीत दिखायी देने लगे । नन्दको भी भय हो गया । वे शिशुको गोदमें लिये परमेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये ॥ १- ३ ॥ अध्याय स्तुति; श्रीराधा और श्रीकृष्णका ब्रह्माजीके स्तवन तथा नव - दम्पतिकी मधुर लीलाएँ उसी क्षण करोड़ों सूर्योंके समूहकी सी दिव्य दीप्ति उदित हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त थी; वह क्रमशः निकट आती - सी जान पड़ी उस दीप्तिराशिके भीतर नौ नन्दोंके राजाने वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाको देखा । वे करोड़ों चन्द्रमण्डलोंकी कान्ति धारण किये हुए थीं । उनके श्रीअङ्गोंपर आदिवर्ण नील रंगके सुन्दर वस्त्र शोभा पा रहे थे । चरणप्रान्तमें मञ्जीरोंकी धीर-ध्वनिसे युक्त नूपुरोंका अत्यन्त मधुर शब्द उस शब्दमें काञ्चीकलाप और कङ्कणोंकी मिली थी । रत्नमय हार, मुद्रिका और प्रभासे वे और भी उद्भासित हो रही मोतीकी बुलाक और नकबेसरकी अपूर्व थी । कण्ठमें कंठा, सीमन्तपर चूड़ामणि कुण्डल झलमला रहे थे । श्रीराधाके हो रहा था । झनकार भी बाजूबंदोंकी थीं । नाकमें शोभा हो रही और कानोंमें दिव्य तेजसे

* रमया तु रकारः स्यादाकारस्त्वादिगोपिका । धकारो धरया हि स्यादाकारो विरजा नदी ॥

श्रीकृष्णस्य परस्यापि चतुर्धा तेजसोऽभवत् । लीला भूः श्रीश्च विरजा चतस्रः पत्न्य एव हि ॥ सम्प्रलीनाश्च ताः सर्वा राधायां कुञ्जमन्दिरे । परिपूर्णतमां राधां तस्मादाहुर्मनीषिणः ॥ राधाकृष्णेति हे गोप ये जपन्ति पुनः पुनः । चतुष्पदार्थं किं तेषां साक्षात् कृष्णोऽपि लभ्यते ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १५ । ६८-७१ )

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अध्याय १६ ] भाण्डीर - वनमें नन्दजीके अभिभूत हो नन्दने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा - ' राधे! ये साक्षात् पुरुषोत्तम हैं और तुम इनकी मुख्य प्राणवल्लभा हो, यह गुप्त रहस्य मैं गर्गजीके मुखसे सुनकर जानता हूँ । राधे! अपने प्राणनाथको मेरे अङ्कसे ले लो । ये बादलोंकी गर्जनासे डर गये हैं । इन्होंने लीलावश यहाँ प्रकृतिके गुणोंको स्वीकार किया है । इसीलिये इनके विषयमें इस प्रकार भयभीत होनेकी बात कही गयी है । देवि! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ । तुम इस भूतलपर मेरी यथेष्ट रक्षा करो । तुमने कृपा करके ही मुझे दर्शन दिया है, वास्तवमें तो तुम सब लोगोंके लिये दुर्लभ हो ' * ॥ ४ – ८३ ॥ श्रीराधाने कहा – नन्दजी! तुम ठीक कहते हो । मेरा दर्शन दुर्लभ ही है । आज तुम्हारे भक्ति - भावसे प्रसन्न होकर ही मैंने तुम्हें दर्शन दिया है ॥ ९ ॥

श्रीनन्द बोले- देवि! यदि वास्तवमें तुम मुझपर प्रसन्न हो तो तुम दोनों प्रिया - प्रियतमके चरणारविन्दोंमें मेरी सुदृढ़ भक्ति बनी रहे । साथ ही तुम्हारी भक्तिसे भरपूर साधु - संतोंका सङ्ग मुझे सदा मिलता रहे । प्रत्येक युगमें उन संत - महात्माओंके चरणोंमें मेरा प्रेम बना रहे ॥ १० ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तब ' तथास्तु ' कहकर श्रीराधाने नन्दजीकी गोदसे अपने प्राणनाथको दोनों हाथोंमें ले लिया । फिर जब नन्दरायजी उन्हें प्रणाम करके वहाँसे चले गये, तब श्रीराधिकाजी भाण्डीर - वनमें गयीं । पहले गोलोकधामसे जो ' पृथ्वी देवी ' इस भूतलपर उतरी थीं, वे उस समय अपना दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुईं । उक्त धाममें जिस तरह पद्मराग मणिसे जटित सुवर्णमयी भूमि शोभा पाती है, उसी तरह इस भूतलपर भी व्रजमण्डलमें उस दिव्य भूमिका तत्क्षण अपने सम्पूर्ण रूपसे आविर्भाव हो गया । वृन्दावन कामपूरक दिव्य वृक्षोंके साथ अपना दिव्य रूप धारण करके शोभा पाने लगा । कलिन्दनन्दिनी यमुना भी तटपर सुवर्णनिर्मित प्रासादों तथा सुन्दर रत्नमय सोपानोंसे सम्पन्न हो गयीं । * तदैव कोट्यर्कसमूहदीप्तिरागच्छती वा चलती दिशासु । कोटीन्दुबिम्बद्युतिमादधानां नीलाम्बरं सुन्दरमादिवर्णम् । काञ्चीकलाकङ्कणशब्दमिश्रां हाराङ्गुलीयाङ्गदविस्फुरन्तीम् । तत्तेजसा धर्षित आशु नन्दो नत्वाथ तामाह कृताञ्जलिः सन् । गुप्तं त्विदं गर्गमुखेन वेद्मि गृहाण राधे निजनाथमङ्कात् । नमामि तुभ्यं भुवि रक्ष मां त्वं यथेप्सितं सर्वजनैर्दुरापा । द्वारा श्रीराधाजीकी स्तुति ५ ९ गोवर्धन पर्वत रत्नमयी शिलाओंसे परिपूर्ण हो गया । उसके स्वर्णमय शिखर सब ओरसे उद्भासित होने लगे । राजन्! मतवाले भ्रमरों तथा झरनोंसे सुशोभित कन्दराओंद्वारा वह पर्वतराज अत्यन्त ऊँचे अङ्गवाले गजराजकी भाँति सुशोभित हो रहा था । उस समय वृन्दावनके निकुञ्जने भी अपना दिव्य रूप प्रकट किया । उसमें सभाभवन, प्राङ्गण तथा दिव्य मण्डप शोभा पाने लगे । वसन्त ऋतुकी सारी मधुरिमा वहाँ अभिव्यक्त हो गयी । मधुपों, मयूरों, कपोतों तथा कोकिलोंके कलरव सुनायी देने लगे । निकुञ्जवर्ती दिव्य मण्डपोंके शिखर सुवर्ण - रत्नादिसे खचित कलशोंसे अलंकृत थे । सब ओर फहराती हुई पताकाएँ उनकी शोभा बढ़ाती थीं । वहाँ एक सुन्दर सरोवर प्रकट हुआ, जहाँ सुवर्णमय सुन्दर सरोज खिले हुए थे और उन सरोजोंपर बैठी हुई मधुपावलियाँ उनके मधुर मकरन्दका पान कर रही थीं ॥ ११-१६ ॥ दिव्यधामकी शोभाका अवतरण होते ही साक्षात् पुरुषोत्तमोत्तम घनश्याम भगवान् श्रीकृष्ण किशोरावस्थाके अनुरूप दिव्य देह धारण करके श्रीराधाके सम्मुख खड़े हो गये । उनके श्रीअङ्गपर पीताम्बर शोभा पा रहा था । कौस्तुभमणिसे विभूषित हो, हाथमें वंशी धारण किये वे नन्दनन्दन राशि - राशि मन्मथ ( कामदेवों ) को मोहित करने लगे । उन्होंने हँसते हुए प्रियतमाका हाथ अपने हाथमें थाम लिया और उनके साथ विवाह - मण्डपमें प्रविष्ट हुए । उस मण्डपमें विवाहकी सब सामग्री संग्रह करके रखी गयी थी । मेखला, कुशा, सप्तमृत्तिका और जलसे भरे कलश आदि उस मण्डपकी शोभा बढ़ा रहे थे । वहीं एक श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ, जिसपर वे दोनों प्रिया-प्रियतम एक- दूसरेसे सटकर विराजित हो गये और अपनी दिव्य शोभाका प्रसार करने लगे । वे दोनों एक - दूसरेसे मीठी - मीठी बातें करते हुए मेघ और विद्युत्की भाँति अपनी प्रभासे उद्दीप्त हो रहे थे । उसी समय देवताओं में श्रेष्ठ विधाता - भगवान् ब्रह्मा आकाशसे उतरकर बभूव तस्यां वृषभानुपुत्रीं ददर्श राधां नवनन्दराजः ॥ मञ्जीरधीरध्वनिनूपुराणामाविभ्रतीं शब्दमतीवमञ्जुम् ॥ श्रीनासिकामौक्तिकहंसिकीभिः श्रीकण्ठचूडामणिकुण्डलाढ्याम् ॥ अयं तु साक्षात्पुरुषोत्तमस्त्वं प्रियासि मुख्यासि सदैव राधे ॥ एनं गृहं प्रापय मेघभीतं वदामि चेत्थं प्रकृतेर्गुणाढ्यम् ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १६ । ४–८

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६० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड परमात्मा श्रीकृष्णके सम्मुख आये और उन दोनोंके चरणोंमें प्रणाम करके, हाथ जोड़, कमनीय वाणीद्वारा चारों मुखोंसे मनोहर स्तुति करने लगे ॥ १७ - २० ॥ श्रीब्रह्माजी बोले- प्रभो! आप सबके आदिकारण हैं, किंतु आपका कोई आदि - अन्त नहीं है । आप समस्त पुरुषोत्तमोंमें उत्तम हैं । अपने भक्तोंपर सदा वात्सल्यभाव रखनेवाले और ' श्रीकृष्ण ' नामसे विख्यात हैं । अगणित ब्रह्माण्डोंके पालक - पति हैं । ऐसे आप परात्पर प्रभु राधा - प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण-चन्द्रकी मैं शरण लेता हूँ । आप गोलोकधामके अधिनाथ हैं, आपकी लीलाओंका कहीं अन्त नहीं है । आपके साथ ये लीलावती श्रीराधा अपने लोक ( नित्यधाम ) में ललित लीलाएँ किया करती हैं । जब आप ही ' वैकुण्ठनाथ ' के रूपमें विराजमान होते हैं, तब ये वृषभानुनन्दिनी ही ' लक्ष्मी ' रूपसे आपके साथ सुशोभित होती हैं । जब आप ' श्रीरामचन्द्र ' के रूपमें भूतलपर अवतीर्ण होते हैं, तब ये जनकनन्दिनी ' सीता ' के रूपमें आपका सेवन करती हैं । आप ' श्रीविष्णु ' हैं और ये कमलवनवासिनी ' कमला ' हैं; जब आप ' यज्ञ -पुरुष ' का अवतार धारण करते हैं, तब ये श्रीजी आपके साथ ' दक्षिणा ' रूपमें निवास करती हैं । आप पतिशिरोमणि हैं तो ये पत्नियोंमें प्रधान हैं । आप ' नृसिंह ' हैं तो ये आपके हृदयमें ' रमा ' रूपसे निवास करती हैं । आप ही ' नर नारायण ' रूपसे रहकर तपस्या करते हैं, उस समय आपके साथ ये ' परम शान्ति ' के रूपमें विराजमान होती हैं । आप जहाँ जिस रूपमें रहते हैं, वहाँ तदनुरूप देह धारण करके ये छायाकी भाँति आपके साथ रहती हैं । आप ' ब्रह्म ' हैं और ये ' तटस्था प्रकृति ' । आप जब ' काल ' रूपसे स्थित होते हैं, तब * अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं श्रीकृष्णचन्द्र निजभक्तवत्सलम् । गोलोकनाथस्त्वमतीवलीलो लीलावतीयं निजलोकलीला । त्वं रामचन्द्रो जनकात्मजेयं भूमौ हरिस्त्वं कमलालयेयम् । त्वं नारसिंहोऽसि रमा हृदीयं नारायणस्त्वं च नरेण युक्तः । त्वं ब्रह्म चेयं प्रकृतिस्तटस्था कालो यदेमां च विदुः प्रधानम् । यदान्तरात्मा विदितश्चतुर्भिस्तदा त्वियं लक्षणरूपवृत्तिः श्यामं च गौरं विदितं द्विधा महस्तवैव साक्षात् पुरुषोत्तमोत्तम सदा पठेद् यो युगलस्तवं परं गोलोकधाम प्रवरं प्रयाति सः यदा युवां प्रीतियुतौ च दम्पती परात्परौ तावनुरूपरूपितौ इन्हें ' प्रधान ' ( प्रकृति ) के रूपमें जाना जाता है । जब आप जगत्के अङ्कर ' महान् ' ( महत्तत्त्व ) रूपमें स्थित होते हैं । तब ये श्रीराधा ' सगुणा माया ' रूपसे स्थित होती हैं । जब आप मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - इन चारों अन्तःकरणोंके साथ ' अन्तरात्मा ' रूपसे स्थित होते हैं, तब ये श्रीराधा ' लक्षणावृत्ति ' के रूपमें विराजमान होती हैं । जब आप ' विराट् ' रूप धारण करते हैं, तब ये अखिल भूमण्डलमें ' धारणा ' कहलाती हैं । पुरुषोत्तमोत्तम! आपका ही श्याम और गौर - द्विविध तेज सर्वत्र विदित है । आप गोलोकधामके अधिपति परात्पर परमेश्वर हैं । मैं आपकी शरण लेता हूँ । जो इस युगलरूपकी उत्तम स्तुतिका सदा पाठ करता है, वह समस्त धामोंमें श्रेष्ठ गोलोकधाममें जाता है और इस लोकमें भी उसे स्वभावतः सौन्दर्य, समृद्धि और सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है । यद्यपि आप दोनों नित्य- दम्पति हैं और परस्पर प्रीतिसे परिपूर्ण रहते हैं, परात्पर होते हुए भी एक-दूसरेके अनुरूप रूप धारण करके लीला - विलास करते हैं; तथापि मैं लोक व्यवहारकी सिद्धि या लोकसंग्रहके लिये आप दोनोंकी वैवाहिक विधि सम्पन्न कराऊँगा * ॥ २१–२९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने उठकर कुण्डमें अग्नि प्रज्वलित की और अग्निदेवके सम्मुख बैठे हुए उन दोनों प्रिया-प्रियतमके वैदिक विधानसे पाणिग्रहण - संस्कारकी विधि पूरी की । यह सब करके ब्रह्माजीने खड़े होकर श्रीहरि और राधिकाजीसे अग्निदेवकी सात परिक्रमाएँ करवायीं । तदनन्तर उन दोनोंको प्रणाम करके वेदवेत्ता विधाताने उन दोनोंसे सात मन्त्र पढ़वाये । उसके बाद श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर श्रीराधिकाका हाथ रखवाकर स्वयं त्वसंख्याण्डपतिं परात्परं राधापतिं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् ॥ वैकुण्ठनाथोऽसि यदा त्वमेव लक्ष्मीस्तदेयं वृषभानुजा हि ॥ यज्ञावतारोऽसि यदा तदेयं श्रीर्दक्षिणा स्त्री पतिपत्निमुख्यौ ॥ तदा त्वियं शान्तिरतीव साक्षाच्छायेव याता च तवानुरूपा ॥ महान् यदा त्वं जगदङ्करोऽसि राधा तदेयं सगुणा च माया ॥ । यदा विराड्देहधरस्त्वमेव तदाखिलं वा भुवि धारणेयम् ॥ । गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् ॥ । इहैव सौन्दर्यसमृद्धिसिद्धयो भवन्ति तस्यापि निसर्गतः पुनः ॥ । तथापि लोकव्यवहारसंग्रहाद् विधिं विवाहस्य तु कारयाम्यहम् ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १६ । २१ - २ ९ )

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अध्याय १६ ] श्रीराधा और श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णका हाथ श्रीराधिकाके पृष्ठदेशमें स्थापित करके विधाताने उनसे मन्त्रोंका उच्चस्वरसे पाठ करवाया । उन्होंने राधाके हाथोंसे श्रीकृष्णके कण्ठमें एक केसरयुक्त माला पहनायी, जिसपर भ्रमर गुञ्जार कर रहे थे । इसी तरह श्रीकृष्णके हाथोंसे भी वृषभानु-नन्दिनीके गलेमें माला पहनवाकर वेदज्ञ ब्रह्माजीने उन दोनोंसे अग्निदेवको प्रणाम करवाया और सुन्दर सिंहासनपर उन अभिनव दम्पतिको बैठाया । वे दोनों हाथ जोड़े मौन रहे । पितामहने उन दोनोंसे पाँच मन्त्र पढ़वाये और जैसे पिता अपनी पुत्रीका सुयोग्य वरके हाथमें दान करता है, उसी प्रकार उन्होंने श्रीराधाको श्रीकृष्णके हाथमें सौंप दिया ॥ ३०-३४ ॥ राजन्! उस समय देवताओंने फूल बरसाये और विद्याधरियोंके साथ देवाङ्गनाओंने नृत्य किया । गन्धर्वों, विद्याधरों, चारणों और किंनरोंने मधुर स्वरसे श्रीकृष्णके लिये सुमङ्गल - गान किया । मृदङ्ग, वीणा, मुरचंग, वेणु, शङ्ख, नगारे, दुन्दुभि तथा करताल आदि बाजे बजने लगे तथा आकाशमें खड़े हुए श्रेष्ठ देवताओंने मङ्गल - शब्दका उच्चस्वरसे उच्चारण करते हुए बारंबार जय - जयकार किया । उस अवसरपर श्रीहरिने विधातासे कहा-‘ ब्रह्मन्! आप अपनी इच्छाके अनुसार दक्षिणा बताइये । ' तब ब्रह्माजीने श्रीहरिसे इस प्रकार कहा - ' प्रभो! मुझे अपने युगलचरणोंकी भक्ति ही दक्षिणाके रूपमें प्रदान कीजिये । ' श्रीहरिने ' तथास्तु ' कहकर उन्हें अभीष्ट वरदान दे दिया । तब ब्रह्माजीने श्रीराधिकाके मङ्गलमय युगल - चरणारविन्दोंको दोनों हाथों और मस्तकसे बारंबार प्रणाम करके अपने धामको प्रस्थान किया । उस समय प्रणाम करके जाते हुए ब्रह्माजीके मनमें अत्यन्त हर्षोल्लास छा रहा था ॥ ३५-३८ ॥ तदनन्तर निकुञ्जभवनमें प्रियतमाद्वारा अर्पित दिव्य मनोरम चतुर्विध * अन्न परमात्मा श्रीहरिने हँसते - हँसते ग्रहण किया और श्रीराधाने भी श्रीकृष्णके हाथोंसे चतुर्विध अन्न ग्रहण करके उनकी दी हुई पान - सुपारी भी खायी । इसके बाद श्रीहरि अपने हाथसे प्रियाका हाथ पकड़कर कुञ्जकी ओर चले । वे दोनों मधुर भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य - ये ही चार प्रकारके ब्रह्माजीके द्वारा विवाह ६१ आलाप करते तथा वृन्दावन, यमुना तथा वनकी लताओंको देखते हुए आगे बढ़ने लगे । सुन्दर लता-कुञ्जों और निकुञ्जोंमें हँसते और छिपते हुए श्रीकृष्णको शाखाकी ओटमें देखकर पीछेसे आती हुई श्रीराधाने उनके पीताम्बरका छोर पकड़ लिया । फिर श्रीराधा भी माधवके कमलोपम हाथोंसे छूटकर भागीं और युगल-चरणोंके नूपुरोंकी झनकार प्रकट करती हुई यमुना-निकुञ्जमें छिप गयीं । जब श्रीहरिसे एक हाथकी दूरीपर रह गयीं, तब पुनः उठकर भाग चलीं । जैसे तमाल सुनहरी लतासे और मेघ चपलासे सुशोभित होता है तथा जैसे नीलमका महान् पर्वत स्वर्णाङ्कित कसौटीसे शोभा पाता है, उसी प्रकार रमणी श्रीराधासे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सुशोभित हो रहे थे । रास - रङ्गस्थलीके निर्जन प्रदेशमें पहुँचकर श्रीहरिने श्रीराधाके साथ रासका रस लेते हुए लीला - रमण किया । भ्रमरों और मयूरोंके कल-कूजनसे मुखरित लताओंवाले वृन्दावनमें वे दूसरे कामदेवकी भाँति विचर रहे थे । परमात्मा श्रीकृष्ण हरिने, जहाँ मतवाले भ्रमर गुञ्जारव करते थे, बहुत - से झरने तथा सरोवर जिनकी शोभा बढ़ाते थे और जिनमें दीप्तिमती लता- वल्लरियाँ प्रकाश फैलाती थीं, गोवर्धनकी उन कन्दराओंमें श्रीराधाके साथ नृत्य किया ॥३ ९ –४५ ॥ तत्पश्चात् श्रीकृष्णने यमुनामें प्रवेश करके वृषभानु-नन्दिनीके साथ विहार किया । वे यमुनाजलमें खिले हुए लक्षदल कमलको राधाके हाथसे छीनकर भाग चले । तब श्रीराधाने भी हँसते - हँसते उनका पीछा किया और उनका पीताम्बर, वंशी तथा बेंतकी छड़ी अपने अधिकारमें कर लीं । श्रीहरि कहने लगे - ' मेरी बाँसुरी दे दो । ' तब राधाने उत्तर दिया- ' मेरा कमल लौटा दो । ' तब देवेश्वर श्रीकृष्णने उन्हें कमल दे दिया । फिर राधाने भी पीताम्बर, वंशी और बेंत श्रीहरिके हाथमें लौटा दिये । इसके बाद फिर यमुनाके किनारे उनकी मनोहर लीलाएँ होने लगीं ॥ ४६–४८ ॥ तदनन्तर भाण्डीर वनमें जाकर व्रज - गोप- रत्न श्रीनन्दनन्दनने अपने हाथोंसे प्रियाका मनोहर शृङ्गार किया – उनके मुखपर पत्र - रचना की, दोनों पैरोंमें अन्न हैं ।

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६२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड महावर लगाया, नेत्रोंमें काजलकी पतली रेखा खींच दी और उनके हाथमें बालकको देकर बोलीं- ' आपके तथा उत्तमोत्तम रत्नों और फूलोंसे भी उनका शृङ्गार पतिदेवने मार्गमें इस बालकको मुझे दे दिया था । ' उस किया । इसके बाद जब श्रीराधा भी श्रीहरिको शृङ्गार धारण करानेके लिये उद्यत हुईं, उसी समय श्रीकृष्ण अपने किशोररूपको त्यागकर छोटे - से बालक बन गये । नन्दने जिस शिशुको जिस रूपमें राधाके हाथोंमें दिया था, उसी रूपमें वे धरतीपर लोटने और भयसे रोने लगे । श्रीहरिको इस रूपमें देखकर श्रीराधिका भी तत्काल विलाप करने लगीं और बोलीं- ' हरे! मुझपर माया क्यों फैलाते हो? ' इस प्रकार विषादग्रस्त होकर रोती हुई श्रीराधासे सहसा आकाशवाणीने कहा - ' राधे! इस समय सोच न करो । तुम्हारा मनोरथ कुछ काल पश्चात् पूर्ण होगा ' ॥ ४ ९ –५२ ॥ यह सुनकर श्रीराधा शिशुरूपधारी श्रीकृष्णको लेकर तुरंत व्रजराजकी धर्मपत्नी यशोदाजीके घर गयीं समय नन्द - गृहिणीने श्रीराधासे कहा - ' वृषभानुनन्दिनि राधे! तुम धन्य हो; क्योंकि तुमने इस समय, जब कि आकाश मेघोंकी घटासे आच्छन्न हैं, वनके भीतर भयभीत हुए मेरे नन्हे से लालाकी पूर्णतया रक्षा की है । ' यों कहकर नन्दरानीने श्रीराधाका भलीभाँति सत्कार किया और उनके सद्गुणोंकी प्रशंसा की । इससे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे यशोदाजीकी आज्ञा ले धीरे - धीरे अपने घर चली गयीं ॥ ५३ - ५५ ॥ राजन् इस प्रकार श्रीराधाके विवाहकी परम मङ्गलमयी गुप्त कथाका यहाँ वर्णन किया गया । जो लोग इसे सुनते - पढ़ते अथवा सुनाते हैं, उन्हें कभी पापका स्पर्श नहीं प्राप्त होता ॥५६ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीराधिकाके विवाहका वर्णन ' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥

सत्रहवाँ अध्याय श्रीकृष्णकी बाल लीलामें दधि - चोरीका वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर बलराम और श्रीकृष्ण - दोनों गौरश्याम मनोहर बालक विविध लीलाओंसे नन्दभवनको अत्यन्त सुन्दर एवं आकर्षक बनाने लगे । मिथिलेश्वर! वे दोनों हाथों और घुटनोंके बलसे चलते हुए और मीठी - तोतली बोली बोलते हुए थोड़े ही समयमें व्रजमें इधर - उधर डोलने रोहिणीके द्वारा लालित - पालित वे गोदसे निकल जाते और कभी बैठते थे । मायासे बालरूप धारण करनेवाले वे दोनों भाई, राम और और करधनीकी झंकार फैलाते व्रज - बालकोंके साथ आँगनमें लगे । माता यशोदा और दोनों शिशु, कभी माताओंकी पुनः उनके अङ्कमें आ करके त्रिभुवनको मोहित श्याम, इधर - उधर मञ्जीर फिरते थे । माता यशोदा खेलते - लोटते तथा धूल लग जानेसे धूसर अङ्गवाले अपने लालाको गोदमें लेकर बड़े आदरसे झाड़ती- पोंछती थीं ॥१-५ ॥ श्रीकृष्ण दोनों हाथों और घुटनोंके बल चलते हुए पुनः आँगनमें चले जाते और वहाँसे फिर माताकी गोदमें आ जाते थे । इस तरह वे व्रजमें सिंह - शावककी भाँति लीला कर रहे थे । माता यशोदा उन्हें सोनेके तार जड़े पीताम्बर और पीली झगुली पहनाती तथा मस्तक-पर दीप्तिमान् रत्नमय मुकुट धारण कराती और इस प्रकार अत्यन्त शोभाशाली भव्यरूपमें उन्हें देखकर अत्यन्त आनन्दका अनुभव करती थीं । अत्यन्त सुन्दर बालोचित क्रीड़ामें तत्पर बालमुकुन्दका दर्शन करके गोपियाँ बड़ा सुख पाती थीं । वे सुखस्वरूपा गोपाङ्गनाएँ अपना घर छोड़कर नन्दराजके गोष्ठमें आ जातीं और वहाँ आकर वे सब की सब अपने घरोंकी सुध - बुध भूल जाती थीं । राजन्! नन्दरायजीके गृह - द्वारपर कृत्रिम सिंहकी मूर्ति देखकर भयभीतकी तरह जब

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अध्याय १७ ] श्रीकृष्णकी बाल लीलामें दधि चोरीका वर्णन ६३ श्रीकृष्ण पीछे लौट पड़ते, तब यशोदाजी अपने लालाको गोदमें उठाकर घरके भीतर चली जाती थीं । उस समय गोपियाँ व्रजमें दयासे द्रवित - हृदय हो यशोदाजीसे इस प्रकार कहती थीं ॥ ६ - ९ ॥ श्रीगोपाङ्गनाएँ कहने लगीं - शुभे! तुम्हारा लाला खेलनेके लिये बड़ी चपलता दिखाता है । इसकी बालकेलि अत्यन्त मनोहर है । ऐसा न हो कि इसे किसीकी नजर लग जाय । अतः तुम इस काक-पक्षधारी दुधमुँहे बालकको आँगनसे बाहर मत निकलने दिया करो । देखो न, इसके ऊपरके दो दाँत ही पहले निकले हैं, जो मामाके लिये दोषकारक हैं । यशोदाजी! तुम्हारे इस बालकके भी कोई मामा नहीं है, इसलिये विघ्ननिवारणके हेतु तुम्हें दान करना चाहिये । गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु, महात्मा तथा वेदोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ १० - १२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तबसे यशोदा और रोहिणीजी पुत्रोंकी कल्याण - कामनासे प्रतिदिन वस्त्र, रत्न तथा नूतन अन्नका दान करने लगीं । कुछ दिनों बाद सिंह - शावककी भाँति दीखनेवाले राम और कृष्ण – दोनों बालक कुछ बड़े होकर गोष्ठोंमें अपने पैरोंके बलसे चलने लगे । श्रीदामा और सुबल आदि व्रज - बालक सखाओंके साथ यमुनाजीके शुभ्र वालुकामय तटपर कौतूहलपूर्वक लोटते हुए राम और श्याम नील-सघन तमालोंसे घिरे और कदम्ब - कुञ्जकी शोभासे विलसित कालिन्दी - तटवर्ती उपवनमें विचरने लगे ॥ १३ – १६ ॥ श्रीहरि अपनी बाललीलासे गोप - गोपियोंको आनन्द प्रदान करते हुए सखाओंके साथ घरोंमें जा - जाकर माखन और घृतकी चोरी करने लगे । एक दिन उपनन्दपत्नी गोपी प्रभावती श्रीनन्द - मन्दिरमें आकर यशोदाजीसे बोलीं ॥ १७-१८ ॥ प्रभावतीने कहा – यशोमति! हमारे और तुम्हारे घरोंमें जो माखन, घी, दूध, दही और तक्र है, उसमें ऐसा कोई बिलगाव नहीं है कि यह हमारा है और वह तुम्हारा । मेरे यहाँ तो तुम्हारे कृपाप्रसादसे ही सब कुछ हुआ है । मैं यह नहीं कहना चाहती कि तुम्हारे इस लालाने कहीं चोरी सीखी है । माखन तो यह स्वयं ही चुराता फिरता है, परंतु तुम इसे ऐसा न करनेके लिये कभी शिक्षा नहीं देती । एक दिन जब मैंने शिक्षा दी तो तुम्हारा यह ढीठ बालक मुझे गाली देकर मेरे आँगनसे भाग निकला । यशोदाजी! व्रजराजका बेटा होकर यह चोरी करे, यह उचित नहीं है; किंतु मैंने तुम्हारे गौरवका खयाल करके इसे कभी ' कुछ नहीं कहा है ॥ १ ९ –२२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! प्रभावतीकी बात सुनकर नन्द - गेहिनी यशोदाने बालकको डाँट बतायी और बड़े प्रेमसे सान्त्वनापूर्वक प्रभावतीसे कहा ॥ २३ ॥

श्रीयशोदा बोलीं- बहिन! मेरे घरमें करोड़ों गौएँ हैं, इस घरकी धरती सदा गोरससे भीगी रहती है । पता नहीं, यह बालक क्यों तुम्हारे घरमें दही चुराता है । यहाँ तो कभी ये सब चीजें चावसे खाता ही नहीं । प्रभावती! इसने जितना भी दही या माखन चुराया हो, वह सब तुम मुझसे ले लो । तुम्हारे पुत्र और मेरे लालामें किंचिन्मात्र भी कोई भेद नहीं है । यदि तुम इसे माखन चुराकर खाते और मुखमें माखन लपेटे हुए पकड़कर मेरे पास ले आओगी तो मैं इसे अवश्य ताड़ना दूँगी, डाँगूँगी और घरमें बाँध रखूँगी ॥ २४–२६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यशोदाजीकी यह बात सुनकर गोपी प्रभावती प्रसन्नतापूर्वक अपने घर लौट आयी । एक दिन श्रीकृष्ण समवयस्क बालकोंके साथ फिर दही चुरानेके लिये उसके घरमें गये । घरकी दीवारके पास सटकर एक हाथसे दूसरे बालकका हाथ पकड़े धीरे - धीरे घरमें घुसे । छीकेपर रखा हुआ गोरस हाथसे पकड़में नहीं आ सकता, यह देख श्रीहरिने स्वयं एक ओखलीके ऊपर पीढ़ा रखा । उसपर कुछ ग्वाल-बालोंको खड़ा किया और उनके सहारे आप ऊपर चढ़ गये । तो भी छीकेपर रखा हुआ गोरस अभी और ऊँचे कदके मनुष्यसे ही प्राप्त किया जा सकता था, इसलिये वे उसे न पा सके । तब श्रीदामा और सुबलके साथ उन्होंने मटकेपर डंडेसे प्रहार किया । दहीका बर्तन फूट गया और सारा गव्य पृथ्वीपर बह चला । तब बलरामसहित माधवने ग्वाल - बालों और बंदरोंके साथ वह मनोहर दही जी

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६४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड भरकर खाया । भाण्डके फूटनेकी आवाज सुनकर गोपी प्रभावती वहाँ आ पहुँची । अन्य सब बालक तो वहाँसे भाग निकले; किंतु श्रीकृष्णका हाथ उसने पकड़ लिया । श्रीकृष्ण भयभीत से होकर मिथ्या आँसू बहाने लगे । प्रभावती उन्हें लेकर नन्द भवनकी ओर चली । सामने नन्दरायजी खड़े थे । उन्हें देखकर प्रभावतीने मुखपर घूँघट डाल दिया । श्रीहरि सोचने लगे – ' इस तरह जानेपर माता मुझे अवश्य दण्ड देगी । ' अतः उन स्वच्छन्दगति परमेश्वरने प्रभावतीके ही पुत्रका रूप धारण कर लिया । रोषसे भरी हुई प्रभावती यशोदाजीके पास शीघ्र जाकर बोली-' इसने मेरा दहीका बर्तन फोड़ दिया और सारा दही लूट लिया ॥ २७ - ३५ ॥ यशोदाजीने देखा, यह तो इसीका पुत्र है; तब वे हँसती हुई उस गोपीसे बोलीं- ' पहले अपने मुखसे घूँघट तो हटाओ, फिर बालकके दोष बताना । यदि इस तरह झूठे ही दोष लगाना है तो मेरे नगरसे बाहर चली जाओ । क्या तुम्हारे पुत्रकी की हुई चोरी मेरे बेटेके माथे मढ़ दी जायगी? ' तब लोगोंके बीच इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत लजाती हुई प्रभावतीने अपने मुँहसे घूँघटको हटाकर देखा तो उसे अपना ही बालक दिखायी दिया । उसे देखकर वह मन - ही - मन चकित होकर बोली- ' अरे निगोड़े! तू कहाँसे आ गया! मेरे हाथमें तो व्रजका सार - सर्वस्व था । ' इस तरह बड़बड़ाती हुई वह अपने बेटेको लेकर नन्दभवनसे बाहर चली गयी । यशोदा, रोहिणी, नन्द, बलराम तथा अन्यान्य गोप और गोपाङ्गनाएँ हँसने लग और बोलीं- ' अहो! व्रजमें तो बड़ा भारी अन्याय दिखायी देने लगा है । ' उधर भगवान् बाहरकी गलीमें पहुँचकर फिर नन्द - नन्दन बन गये और सम्पूर्ण शरीरसे धृष्टताका परिचय देते हुए, चञ्चल नेत्र मटकाकर, जोर-जोरसे हँसते हुए उस गोपीसे बोले ॥ ३६-४१ ॥ श्रीभगवान् ने कहा — अरी गोपी! यदि फिर कभी तू मुझे पकड़ेगी तो अबकी बार मैं तेरे पतिका रूप धारण कर लूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर वह गोपी आश्चर्यसे चकित हो अपने घर चली गयी । उस दिनसे सब घरोंकी गोपियाँ लाजके मारे श्रीहरिका हाथ नहीं पकड़ती थीं ॥ ४३ ॥

श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें श्रीकृष्णके बालचरित्रगत ' दधि - चोरीका वर्णन ' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

अठारहवाँ अध्याय नन्द, उपनन्द और वृषभानुओंका परिचय तथा श्रीकृष्णकी मृद्भक्षण - लीला श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! गोपाङ्गनाओं के घरोंमें विचरते और माखन चोरीकी लीला करते हुए नवकंज लोचन मनोहर श्याम-रूपधारी श्रीकृष्ण बालचन्द्रकी भाँति बढ़ते और लोगोंके चित्त चुराते हुए - से व्रजमें अद्भुत शोभाका विस्तार करने लगे । नौ नन्द नामके गोप अत्यन्त चञ्चल श्रीनन्दनन्दनको पकड़कर अपने घर ले जाते और वहाँ बिठाकर उनकी रूपमाधुरीका आस्वादन करते हुए मोहित हो जाते थे । वे उन्हें अच्छी - अच्छी गेंदें देकर खेलाते, उनका लालन - पालन करते, उनकी लीलाएँ गाते और बढ़े हुए आनन्दमें निमग्न हो सारे जगत्को भूल जाते थे॥१-२ ॥ राजाने पूछा- देवर्षे! आप मुझसे नौ उपनन्दोंके नाम बताइये । वे सब बड़े सौभाग्यशाली थे । उनके पूर्वजन्मका परिचय दीजिये T । वे पहले कौन थे, जो इस भूतलपर अवतीर्ण हुए? उपनन्दोंके साथ ही छ: वृषभानुओंके भी मङ्गलमय कर्मोंका वर्णन कीजिये ॥ ३३ ॥

श्रीनारदजीने कहा — गय, विमल, श्रीश, श्रीधर, मङ्गलायन, मङ्गल, रङ्गवल्लीश, रङ्गोजि तथा