गर्ग संहिता — पृष्ठ 521–530

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530

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अध्याय ४४ ] गोपियोंका श्रीकृष्णको खोजते हुए वंशीवटके निकट आना ५१५ उन पसीनोंको पोंछा । उन गोपाङ्गनाओंकी तपस्याके फलका मैं क्या वर्णन कर सकता हूँ? उन्होंने सांख्य, योग, तप, उपदेश - श्रवण, तीर्थसेवन तथा गान आदिके बिना ही केवल प्रेममूलक कामनासे श्रीहरिको प्राप्त कर लिया ॥ ५- १० ॥ तदनन्तर समस्त गोपियाँ अभिमानमें आकर परस्पर ओछी बातें करने लगीं; क्योंकि वे श्रीकृष्णके विहार - सुखसे पूर्णतः परितृप्त थीं । वे कहने लगीं — ' सखियो! पहले श्रीकृष्ण हमलोगोंको छोड़कर मथुरापुरी चले गये थे, जानती हो क्यों? क्योंकि वे स्वयं परम सुन्दर हैं; अतः नगरमें परमसुन्दरी रूपवती स्त्रियोंको देखने गये थे । परंतु वहाँ जानेपर भी उन्हें मनके अनुरूप सुन्दरियाँ नहीं दिखायी दीं । तब वे फिर वहाँसे द्वारका चले गये । जब वहाँ भी सुन्दरियाँ नहीं दृष्टिगोचर हुईं, तब उन्होंने एक सुन्दरी राजकुमारीके साथ विवाह किया । वह थी - भीष्मकराजनन्दिनी रुक्मिणी! किंतु उसे भी रूपवती न मानकर इन्होंने पुन: बहुत - से विवाह किये । सोलह हजार स्त्रियाँ घरमें ला बिठायीं । किंतु सखियो! उन सबको भी मनके अनुकूल रूपवती न पाकर बारंबार शोक करते हुए इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण पुनः हमें देखनेके लिये व्रजमें आये हैं । अरी वीर! सर्वद्रष्टा परमेश्वर हमारे रूप देखकर उसी तरह प्रसन्न हुए हैं, जैसे पहले रासमें हुआ करते थे । इसलिये हमलोग त्रिभुवनकी समस्त सुन्दरियोंमें श्रेष्ठ, सुलोचना, चन्द्रमुखी तथा नित्य सुस्थिरयौवना मानी गयी हैं । हमारे समान रूपवती स्वर्गलोककी देवाङ्गनाएँ भी नहीं हैं; क्योंकि हमने अपने कटाक्षोंद्वारा श्रीकृष्णको शीघ्र ही वशमें कर लिया और कामुक बना दिया । अहो! जिस हंसने पहले मोती चुग लिये हैं, वही दुःखपूर्वक दूसरी वस्तु कैसे खायगा? हर जगह मोती नहीं सुलभ होते । वे तो केवल मानसरोवरमें ही मिलते हैं; उसी प्रकार भूतलपर सर्वत्र सुन्दरी स्त्रियाँ नहीं होतीं । यदि कहीं हैं तो इस व्रजमें ही हैं ॥ ११ - २० ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! जगदीश्वर श्रीकृष्ण आत्माराम हैं । वे उन मानवती गोपसुन्दरियोंका ऐसा कथन सुनकर श्रीराधाके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये । नरेश्वर! निर्धन मनुष्य भी धन पाकर अभिमानसे फूल उठता है; फिर जिसको साक्षात् नारायण प्राप्त हो गये, उसके लिये क्या कहना है ॥ २१ - २२ ॥ रासक्रीडाविषयक ' तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

चौवालीसवाँ अध्याय गोपियोंका श्रीकृष्णको खोजते हुए वंशीवटके निकट आना और श्रीकृष्णका मानवती राधाको त्यागकर अन्तर्धान होना वज्रनाभ बोले- ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे श्रीकृष्णका अद्भुत चरित्र सुना । भगवान्‌के अदृश्य हो जानेपर गोपियोंने क्या किया? उन्होंने गोपाङ्गनाओं-को कैसे दर्शन दिया? मुनिश्रेष्ठ! मुझ श्रद्धालु भक्तको वह सारा प्रसङ्ग सुनाइये । संसारमें वे लोग धन्य हैं, जो सदा अपने कानोंसे श्रीकृष्णकी कथा सुनते हैं, मुखसे श्रीकृष्णचन्द्रके नाम जपते हैं, हाथोंसे प्रतिदिन श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं, नित्यप्रति उनका ध्यान और दर्शन करते हैं तथा प्रतिदिन उन भगवान्‌का चरणोदक पीते और प्रसाद खाते हैं । मुनिप्रवर! इस भावसे श्रम करके जो लोग जगदीश्वर श्रीकृष्णका भजन करते हैं, वे उनके परमधाममें जाते हैं । मुने! जो शारीरिक सौख्यसे उन्मत्त होकर संसारमें नाना प्रकारके भोग भोगते हैं और श्रवण - मनन आदि साधन नहीं करते, वे शरीरका अन्त होनेपर भयंकर यमदूतों-द्वारा पकड़े जाते हैं और जबतक सूर्य तथा चन्द्रमाकी स्थिति है, तबतकके लिये कालसूत्र नरकमें डाल दिये जाते हैं * ॥ १-७ ॥ * धन्यास्ते ये हि शृण्वन्ति कर्णे कृष्णकथां सदा ॥ मुखेन कृष्णचन्द्रस्य नामानि प्रजपन्ति हि । हस्तैः श्रीकृष्णसेवां वै ये प्रकुर्वन्ति नित्यशः ॥

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५१६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड सूतजी कहते हैं - इस प्रकार प्रश्न करनेवाले राजा वज्रनाभकी प्रशंसा करके मुनीश्वर गर्गजी गद्गदवाणीसे उन्हें श्रीहरिका चरित्र सुनाने लगे ॥८ ॥

श्रीगर्गजी बोले - राजन्! श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर समस्त गोपाङ्गनाएँ उन्हें न देखकर उसी तरह संतप्त हो उठीं, जैसे हरिणियाँ यूथपति हरिणको न पाकर दुःखमग्न हो जाती हैं । ' भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये ' – यह जानकर समस्त गोपसुन्दरियाँ पूर्ववत् यूथ बनाकर चारों ओर वन - वनमें उनकी खोज करने लगीं । परस्पर मिलकर वे समस्त वृक्षोंसे पूछने लगीं-' वृक्षगण! नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हमको अपने कटाक्ष बाणसे घायल करके कहाँ चले गये? यह बात हमें बता दो; क्योंकि तुम सब लोग इस वनके स्वामी हो । सूर्यनन्दिनि यमुने! तुम्हारे पुलिनके प्राङ्गणमें प्रतिदिन गौएँ चराते हुए जो तरह- तरहकी लीलाएँ किया करते थे, वे गोपाल श्रीकृष्ण कहाँ चले गये? यह हमें बताओ । सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित होनेके कारण ' शतशृङ्ग ' नामसे विख्यात गोवर्द्धन! तुम गिरिराज हो । तुम्हें पूर्वकालमें इन्द्रके कोपसे व्रजवासियोंकी रक्षा करनेके लिये श्रीनाथजीने अपने बायें हाथपर धारण किया था । तुम श्रीहरिके औरस पुत्र हो; इसलिये वे कभी तुमको छोड़ते नहीं हैं । अत: तुम्हीं बताओ, वे नन्दनन्दन हमें वनमें छोड़कर कहाँ गये और इस समय कहाँ हैं? हे मयूर! हरिण! गौओ! मृगो! तथा विहङ्गमो! क्या तुमने काली काली घुँघराली अलकोंसे सुशोभित किरीटधारी श्रीकृष्णको देखा है? बताओ! वे हमारे मनमोहन इस समय कहाँ, किस वनमें हैं? ' ॥ ९ – १६ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! इन वचनोंद्वारा पूछे जानेपर भी वे कठोर तीर्थवासी प्राणी कोई उत्तर नहीं दे रहे थे; क्योंकि वे सभी मोहके वशीभूत थे ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रका पता पूछती हुई समस्त गोपसुन्दरियाँ ' कृष्ण! कृष्ण! ' पुकारते कृष्णमयी हो नित्यं कुर्वन्ति कृष्णस्य ध्यानं दर्शनमेव च । पादोदकं गयीं । वे कृष्णस्वरूपा गोपाङ्गनाएँ वहाँ श्रीकृष्णके लीला - चरित्रोंका अनुकरण करने लगीं । फिर वे यमुनाकी रेतीमें गयीं और वहाँ उन्हें श्रीहरिके पदचिह्न दिखायी दिये । वज्र " ध्वज और अङ्कुश आदि चिह्नोंसे उपलक्षित महात्मा श्रीकृष्णके चरण देखती और उनका अनुसरण करती हुई व्रजाङ्गनाएँ तीव्र गतिसे आगे बढ़ीं । वे श्रीकृष्णकी चरणरेणु लेकर अपने मस्तकपर रखती जाती थीं । इतनेमें ही अन्य चिह्नोंसे उपलक्षित दूसरे पदचिह्न भी उनके दृष्टिपथमें आये । उन चरण-चिह्नोंको देखकर वे आपसमें कहने लगीं - ' मालूम होता है, प्रियतम श्यामसुन्दर प्रियाके साथ गये हैं ' इस तरह बात करती और चरणचिह्न देखती हुई वे गोपाङ्गनाएँ तालवनमें जा पहुँचीं । नरेश्वर! व्रजेश्वरी श्रीराधाके साथ व्रजमें आगे - आगे जाते हुए व्रजेन्द्र श्रीकृष्ण पीछे आती हुई गोपियोंका कोलाहल सुनकर स्वामिनी श्रीलाड़िलीजीसे बोले - ' करोड़ चन्द्रमाओंके समान कान्ति धारण करनेवाली प्रियतमे! जल्दी - जल्दी चलो । तुमको और मुझको साथ ले जानेके लिये व्रजसुन्दरियाँ सब ओरसे यहाँ आ पहुँची हैं ॥ १८-२४ ॥ नरेश्वर! तब प्रियाजीने पहले प्रियतम श्याम-सुन्दरका फूलोंसे शृङ्गार किया । शृङ्गार करके वृन्दावनमें उन्हें पूर्ववत् दिव्य सुन्दर बना दिया । इसके बाद नन्दनन्दनने बहुत - से पुष्प लाकर उनके द्वारा प्रियाको भी दिव्य शृङ्गार धारण कराया । जैसे पूर्वकालमें उन्होंने भाण्डीरवनमें प्रियाका शृङ्गार किया था, उसी प्रकार उन्होंने पहले तो उनके केश सँवारे; फिर उनमें फूलोंके गजरे लगा दिये । इसके बाद प्राणवल्लभाके अङ्ग अङ्गमें अनुरूप अनुलेपन एवं अङ्गराग धारण कराये । फिर पानका बीड़ा खिलाया । श्यामसुन्दरके द्वारा सुन्दर शृङ्गार धारण कराये जानेपर गौरसुन्दरी श्रीराधा अत्यन्त सुन्दरी हो गयीं । सुन्दरताकी पराकाष्ठाको पहुँच गयीं ॥२५–२७ ॥ प्रसादं च ये प्रभुञ्जन्ति नित्यशः ॥ इतीदृशेन भावेन श्रमेण जगदीश्वरम् । ये भजन्ति मुनिश्रेष्ठ ते प्रयान्ति हरेः पदम् ॥ संसारे ये प्रभुञ्जन्ति भोगान्नानाविधान् मुने । श्रवणादीन कुर्वन्ति देहसौख्येन दुर्मदाः ॥ ते चान्ते यमदूतैश्च गृहीताश्च भयानकैः । पतिताः कालसूत्रे वै यावद्रविनिशाकरौ ॥ ( अध्याय ४४ । २ –७ )

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अध्याय ४५ ] गोपाङ्गनाओंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए उनका आह्वान ५१७ महाराज! इसके बाद प्रमोदपूरित रमावल्लभ श्रीकृष्णने एक फूलके वृक्षके नीचे पुष्पमयी शय्या तैयार करके उसके ऊपर प्रियतमाके साथ प्रेममयी दिव्य क्रीडा की । वृन्दावन, गिरिराज, गोवर्धन, यमुना-पुलिन, नन्दीश्वरगिरि, बृहत्सानुगिरि और रोहितपर्वतपर तथा व्रजमण्डलके बारह वनोंमें सर्वत्र प्राणवल्लभाके साथ विचरण करके प्रियतम श्यामसुन्दर वंशीवटके नीचे आकर खड़े हुए थे । राजेन्द्र! वहाँ स्वामिनीसहित श्रीगोपीजनवल्लभ माधवने ' कृष्ण, कृष्ण ' का कीर्तन करती हुई गोपियोंका महान् कोलाहल सुना । फिर प्रिया प्रेमपूर्वक बोले- ' प्रियतमे! जल्दी - जल्दी चलो! ' श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर श्रीराधा मानवती होकर बोलीं ॥ २८–३२ ॥ श्रीराधाने कहा — दीनवत्सल! अब मैं चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गयी हूँ । आजतक कभी घरसे नहीं निकली थी । मैं दुर्बल हूँ । अतः तुम्हारा जहाँ मन हो, वहाँ स्वयं मुझे ले चलो ॥३३ ॥

उनका यह कथन सुनकर रामानुज श्रीकृष्ण रामाशिरोमणि श्रीराधिकाको अपने पीताम्बरसे हवा करने लगे; क्योंकि वे पसीने - पसीने हो गयी थीं । फिर वे उन्हें हाथसे पकड़कर कहने लगे – ' रानी! जिसमें तुम्हें सुख मिले, उसी तरह चलो । ' श्रीहरिके इस प्रकार कहनेपर उन्होंने अपने - आपको सबसे अधिक श्रेष्ठ मानकर मन - ही - मन सोचा - ' ये प्रियतम अन्य समस्त सुन्दरियोंको छोड़कर रात्रिमें इस एकान्त स्थलमें मेरी सेवा करते हैं । ' मनमें ऐसा सोचकर वे श्रीहरिसे कुछ नहीं बोलीं । व्रजेश्वरी राधा चुपचाप आँचलसे मुँह ढककर श्यामसुन्दरकी ओर पीठ करके खड़ी हो गयीं । तब श्रीहरिने उनसे फिर कहा - ' प्रिये! मेरे साथ चलो । भद्रे! तुम शापवश वियोगसे पीड़ित हो; इसलिये मैं तुम्हारा सदा साथ दे रहा हूँ । पीछे लगी हुई समस्त गोपियोंको छोड़कर तुम्हारी सेवा करता हूँ । तुम चाहो तो मेरे कंधेपर बैठकर सुखपूर्वक एकान्त स्थलमें चलो'॥३४–३८३ ॥ राजन्! मानी श्यामसुन्दरने अपनी मानवती प्रियासे ऐसा कहकर जब देखा कि ' ये कंधेपर चढ़नेको उत्सुक हैं ' तब वे आत्माराम पुरुषोत्तम अपनी लीला दिखाते हुए उन्हें छोड़कर अन्तर्धान हो गये । नरेश्वर! भगवान्‌के अन्तर्धान हो जानेपर वधू राधिकाका सारा मान जाता रहा । वे शोकसे संतप्त हो उठीं और दुःखसे आतुर होकर रोने लगीं । तब श्रीराधाका रोदन सुनकर समस्त गोपसुन्दरियाँ वंशीवटके तटपर तुरंत आ पहुँचीं । आकर उन्होंने श्रीराधाको बहुत दुःखी देखा । वे सब गोपियाँ व्यजन और चँवर लेकर श्रीराधाके अङ्गोंपर हवा करने लगीं । उन्हें प्रेमपूर्वक केसरमिश्रित जलसे नहलाकर वे फूलोंके मकरन्दों तथा चन्दनद्रवके फुहारोंसे उनके अङ्गोंपर छींटा देने लगीं । परिचर्या -कर्ममें कुशल गोपकिशोरियोंने मीठे वचनों-द्वारा श्रीराधाको आश्वासन दिया । उनके मुखसे उन्होंके अभिमानके कारण गोविन्दके चले जानेकी बात सुनकर उन सम्पूर्ण मानवती गोपियोंको बड़ा विस्मय हुआ । नरेश्वर! वे सब की सब मान त्यागकर यमुना-पुलिनपर आयीं और श्रीकृष्णके लौट आनेके लिये मधुर स्वरसे उनके गुणोंका गान करने लगीं ॥ ३ ९ –४५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' रासक्रीडाविषयक ' चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पैंतालीसवाँ अध्याय गोपाङ्गनाओंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए उनका आह्वान और श्रीकृष्णका उनके बीचमें आविर्भाव गोपियाँ बोलीं- जो अपने अधरबिम्बकी मुखारविन्द नीलकमलके समान कोमल तथा श्याम है, लालिमासे मूँगेको लज्जित करते हैं और मधुर मुरली- उन गोपकुमार श्यामसुन्दरकी हम उपासना करती हैं । नादसे विनोद मानते - आनन्द पाते हैं, जिनका जिनकी अङ्गकान्ति साँवली है, जो वनविहारके रसिक

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५१८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड हैं, जिनका अङ्ग - अङ्ग कोमल है, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल हैं, जो भक्तजनोंकी अभीष्ट कामना पूर्ण कर देते हैं, व्रज-सुन्दरियोंके नेत्रोंको शीतल करनेवाले हैं, उन मनमोहन श्रीकृष्णका हम भजन करती हैं । जिनके लोचनाञ्चल विशेष चञ्चल हैं और कोमल अधर अर्धविकसित कमलकी शोभा धारण करते हैं, जिनके हाथोंकी अँगुलियाँ और मुख बाँसुरीसे सुशोभित हैं, उन वेणुवादनरसिक माधवका हम चिन्तन करती हैं । जिनके दाँत किंचित् अङ्कुरित हुई कुन्दकलिकाके समान उज्ज्वल हैं, जो व्रजभूमिके भूषण हैं, अखिल भुवनके लिये मङ्गलमयी शोभासे सम्पन्न हैं, जो अपने शब्द और सौरभसे मनको हर लेता है, श्रीहरिके उस सुन्दर वेषको ही हम गोपाङ्गनाएँ खोज रही हैं । जिनकी आकृति देवताओंद्वारा पूजित होती हैं, जिनके चरणारविन्दोंके अमृतका मुनीश्वरगण नित्य - निरन्तर सेवन करते रहते हैं, वे कमलनयन भगवान् श्याम -सुन्दर नित्य हम सबका कल्याण करें । जो गोपोंके साथ मल्लयुद्धका आयोजन करते हैं, जिन्होंने युद्धमें बड़े - बड़े चतुर जवानोंको परास्त किया है तथा जो सम्पूर्ण योगियोंके भी आराध्य देवता हैं, उन श्रीहरिका हम सदैव सेवन करती हैं । उमड़ते हुए नूतन मेघके समान जिनकी आभा है, जिनका लोचनाञ्चल प्रफुल्ल कमलकी शोभाको छीने लेता है, जो गोपाङ्गनाओंके हृदयको देखते - देखते चुरा लेते हैं तथा जिनका अधर नूतन पल्लवोंकी शोभाको तिरस्कृत कर देता है, उन श्यामसुन्दरकी हम उपासना करती हैं । जो अर्जुनके रथकी शोभा है, समस्त संचित पापोंको तत्काल खण्डित कर देनेवाला है और वेदकी वाणीका जीवन है, वह निर्मल श्यामल तेज हमारे मनमें सदा स्फुरित होता रहे । जिनकी दृष्टि- परम्परा गोपिकाओंके वक्षःस्थल और चञ्चल लोचनोंके प्रान्तमें पड़ती रहती है तथा जो बाल - क्रीडाके रसकी लालसासे इधर - उधर घूमते रहते हैं, उन माधवका हम दिन - रात ध्यान करती हैं । जिनके मस्तकपर नीलकण्ठ ( मोर ) के पंखका मुकुट शोभा पाता है, जिनके अङ्ग - वैभव ( कान्ति ) को नीलमेघकी उपमा दी जाती है, जिनके नेत्र नील कमलदलके समान शोभा पाते हैं, उन नील केश-पाशधारी श्यामसुन्दरका हम भजन करती हैं । व्रजकी युवतियाँ जिनके लीला - वैभवका सदा गान करती हैं, जो कोमल स्वरमें मुरली बजाया करते हैं तथा जो मनोऽभिराम सम्पदाओंके धाम हैं, उन सब सारस्वरूप कमलनयन श्रीकृष्णका हम भजन करती हैं । जो मनपर मोहनी डालनेवाले और उत्तम शार्ङ्गधनुषधारी हैं, जो मानवती गोपाङ्गनाओंको छोड़कर निकल गये हैं तथा नारद आदि मुनि जिनका सदा भजन सेवन करते हैं, उन नन्दगोपनन्दनका हम भजन करती हैं । जो श्रीहरि असंख्य रमणियोंसे घिरे रहकर रासमण्डलमें सबपर विजय पाते हैं, उन्हीं प्रियतम श्यामसुन्दरको वनमें राधासहित दुःख उठाती हुई हम व्रजवनिताएँ ढूँढ़ रही हैं । देवदेव! व्रजराजनन्दन! हरे! हमें पूर्णरूपसे दर्शन दीजिये, जो सब दुःखोंको हर लेनेवाला है । हम आपकी क्रीत दासियाँ हैं । आप पूर्ववत् हमारी ओर देखकर हमें अपनाइये । जिन्होंने एकार्णवके जलसे इस भूमण्डलका उद्धार करनेके लिये परम उत्तम सम्पूर्ण यज्ञवाराहस्वरूप धारण किया था और अपनी तीखी दाढ़से ' हिरण्याक्ष ' नामक दैत्यको विदीर्ण कर डाला था, वे भगवान् श्रीहरि ही हम सबका उद्धार करनेमें समर्थ हों । जिन्होंने वेनकी दाहिनी बाँहसे स्वेच्छापूर्वक पृथुरूपमें प्रकट हो देवताओंसहित मनुकी सम्मतिसे इस पृथ्वीका दोहन किया और मत्स्यरूप धारण करके वेदोंकी रक्षा की, वे ही भगवान् श्रीकृष्ण इस अशुभ वेलामें हम गोपियोंके लिये शरणदाता हों । अहो! जिन परम प्रभुने समुद्र - मन्थनके समय कच्छपरूप धारण करके बड़े भारी पर्वत मन्दराचलको अपनी पीठपर ढोया था और नृसिंहरूप धारण करके अपने भक्त के प्राण लेनेको उद्यत हुए असुर हिरण्यकशिपुको प्राणदण्डसे दण्डित किया, वे ही श्रीहरि हम सबको परम आश्रय देनेवाले हों । जिन्होंने राजा बलिको छला - तीन पग भूमिके ब्याजसे त्रिलोकीका राज्य उनसे छीन लिया तथा देवद्रोहियोंका दलन करके मुनिजनोंपर अनुग्रह करते हुए भूमण्डलपर विचरण किया, जो यदुकुलतिलक बलरामजीके रूपमें प्रकट हुए हैं और जिन्होंने उसी रूपसे कौरवपुरी

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अध्याय ४५ ] गोपाङ्गनाओं द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए उनका आह्वान ५१ ९ हस्तिनापुरको हलसे खींचते हुए उसे गङ्गाजीमें डुबा देनेका विचार किया था, वे भगवान् श्रीकृष्ण सर्वथा हमारे रक्षक हों । जिन्होंने गिरिराज गोवर्द्धनको उठाकर व्रजके पशुओंका उद्धार किया तथा व्रजपति नन्दरायकी, अन्यान्य गोपजनोंकी तथा हम गोपाङ्गनाओंकी भी रक्षा की थी, फिर आगे चलकर जिन्होंने कौरवोंद्वारा उत्पन्न किये गये संकटसे द्रुपदराजकुमारी पाञ्चालीके प्राण बचाये - भरी सभामें उसकी लज्जा रखी, उन्हींके चरणारविन्दोंमें हमारा सदा अनन्य अनुराग बना रहे । जिन परमपुरुष यदुवंशविभूषणने समस्त पाण्डवोंकी विषसे, लाक्षागृहकी महाभयंकर अग्निसे, बड़े - बड़े अस्त्रोंसे तथा अनेकानेक विपत्तियोंसे पूर्णतः रक्षा की, उन्हींके चरण हम सबके लिये शरण हों । हम उस बालरूपिणी देवमूर्तिकी वन्दना करती हैं, जो वनमाला, मोरपंख तथा परमसुन्दर केशपाश धारण करती है, वृन्दावनके फूलोंके आभूषण पहनती है, शिलासे उत्पन्न अगुरु एवं कस्तूरी आदिके द्वारा रचित विचित्र तिलकसे अलंकृत होती है, सदा भक्तजनोंके मनको अपनी ओर खींचती रहती है, लीलामृत तथा वेणुनादामृतके वितरणके लिये जो एकमात्र रसिक है, जिसकी आकृति लावण्यलक्ष्मीमयी है तथा अङ्गकान्ति बाल तमालके समान नीली है * ॥१–२१ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! यों रोती हुई गोपसुन्दरियोंके इस प्रकार भक्तिपूर्वक आह्वान करनेपर रेवतीरमण बलरामके छोटे भाई श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उनके बीचमें प्रकट हो गये ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' श्रीरासक्रीडाके प्रसङ्गमें श्रीकृष्णका आगमन ' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥

* गोप्य ऊचुः अधरबिम्बविडम्बितविद्रुमं श्यामलं विपिनकेलिलम्पटं तं विसंचलितलोचनाञ्चलं ईषदङ्कुरितदन्तकुड्मलं अस्तु नित्यमरविन्दलोचनः गोपकै रचितमल्लसंगरं उल्लसन्नवपयोदमेव तं यद्धनंजयरथस्य मण्डनं मधुरवेणुनिनादविनोदितम् कोमलं कमलपत्रलोचनम् साभिकुडालितकोमलाधरम् भूषणं भुवनमङ्गलश्रियम् श्रेयसे हि तु सुरार्चिताकृतिः संगरे जितविदग्धयौवनम् फुल्लतामरसलोचनाञ्चलम् खण्डनं तदपि संचितैनसाम् गोपिकास्तनविलोललोचनप्रान्तलोचनपरम्परावृतम् नीलकण्ठकृतपिच्छशेखरं नीलमेघतुलिताङ्गवैभवम् घोषयोषिदनुगीतवैभवं कोमलस्वरितवेणुनिस्वनम् मोहनं मनसि शार्ङ्गिणं परं निर्गतं किल विहाय मानिनीः श्रीहरिस्तु रमणीभिरावृतो यस्तु वै जयति रासमण्डले देवदेव व्रजराजनन्दन देहि दर्शनमलं च नो हरे क्षितितलोद्धरणाय दधार यः सकलयज्ञवराहवपुः परम् मनुमपाद्चिजो दिविजैः सह वसु दुदोह धरामपि यः पृथुः अवहदब्धिमहो गिरिमूर्जितं कमठरूपधरः परमस्तु यः नृपबलिं छलयन् दलयन्नरीन् मुनिजनाननुगृह्य चचार यः । व्रजपशून् गिरिराजमथोद्धरन् व्रजपगोपजनं च जुगोप यः विषमहाग्निमहास्त्रविपद्गणात् सकलपाण्डुसुताः परिरक्षिताः । मालां बर्हिमनोज्ञकुन्तलभरां वन्यप्रसूनोषितां लीलावेणुरवामृतैकरसिकां लावण्यलक्ष्मीमयीं । कमलकोमलनीलमुखाम्बुजं तमपि गोपकुमारमुपास्महे ॥ । कामदं व्रजविलासिनीदृशां शीतलं मतिहरं भजामहे ॥ । वंशवल्गितकराङ्गुलीमुखं वेणुनादरसिकं भजामहे ॥ । घोषसौरभमनोहरं हरेर्वेषमेव मृगयामहे वयम् ॥ । यस्य पादसरसीरुहामृतं सेव्यमानमनिशं मुनीश्वरैः ॥ । चिन्तयामि मनसा सदैव तं दैवतं निखिलयोगिनामपि ॥ । बल्लवीहृदयपश्यतोहरं पल्लवाधरमुपास्महे वयम् ॥ । जीवनं श्रुतिगिरां सदामलं श्यामलं मनसि मेऽस्तु तन्महः ॥ । बालकेलिरसलालसम्भ्रमं माधवं तमनिशं विभावये ॥ । नीलपङ्कजपलाशलोचनं नीलकुन्तलधरं भजामहे ॥ । सारभूतमभिरामसम्पदां धाम तामरसलोचनं भजे ॥ । नारदादिमुनिभिश्च सेवितं नन्दगोपतनयं भजामहे ॥ । राधया सह वने च दुःखितास्तं प्रियं हि मृगयामहे वयम् ॥ । सर्वदुःखहरणं च पूर्ववत् संनिरीक्ष्य तव शुल्कदासिकाः ॥ । दितिसुतं विददार च दंष्ट्रया स तु सदोद्धरणाय क्षमोऽस्तु नः ॥ । श्रुतिमपाद्धृतमत्स्यवपुः परं स शरणं किल नोऽस्त्वशुभक्षणे ॥ । असुहरं नृहरिः समदण्डयत् स च हरिः परमं शरणं च नः ॥ कुरुपुरं च हलेन विकर्षयन् यदुवरः स गतिर्मम सर्वथा ॥ । द्रुपदराजसुतां कुरुकश्मलाद् भवतु तच्चरणाब्जरतिश्च नः ॥ यदुवरेण परेण च येन वै भवतु तच्चरणः शरणं च नः ॥

शैलेयागुरुक्लृप्तचित्रतिलकां शश्वन्मनोहारिणीम् ।

बालां बालतमालनीलवपुषं वन्दामहे देवताम् ॥

( अध्याय ४५ ।१ – २१ )

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छियालीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णके आगमनसे गोपियोंको उल्लास; मूर्च्छाका निवारण; श्रीहरिका श्रीराधा स्थल - विहार, जल - विहार, श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! श्रीकृष्णको आया देख वे सब गोपसुन्दरियाँ हर्षसे उल्लसित होकर उठीं और दुःख त्यागकर जय - जयकार करने लगीं । श्रीराधा मूर्च्छामें ही पड़ी थीं । उनकी अवस्था देख गोपाङ्गनाओंके प्रार्थना करनेपर श्रीहरि उन्हें होशमें लानेके लिये उस व्रजभूमिमें वंशीनाद करने लगे । तब भी राधिका नहीं उठीं । यह देख श्रीराधावल्लभ हरि उन्हें बार - बार वेणुगीत सुनाने लगे । राजन्! वह गीत सुनकर श्रीराधा उठीं; किंतु वियोगजनित दुःखका स्मरण करके माधवके देखते - देखते फिर मूच्छित हो गयीं । तब श्रीकृष्णके वेणुगीतसे प्रसन्न हुई चन्द्रानना नामवाली सखी उनका आदेश पाकर तत्काल चन्द्रावलीके प्रति श्रीराधाको ही सम्बोधित करके बोलीं- ॥ १-५ ॥ चन्द्राननाने कहा – हे राधे! जो श्रीकृष्णचन्द्र पहले तुम्हारे मानसे रूठकर चले गये थे, वे मानो एक युगके बाद फिर आ गये हैं । उन्हीं देवकीनन्दनने तुम्हारे समस्त दुःखोंका नाश करनेके लिये निकट बैठकर वेणु बजाते हुए गीत गाया है । रासके रमणीय प्राङ्गणमें लुंग - लुंग ध्वनिके साथ मधुर स्वरमें मृदङ्ग बजाया जा रहा है और देवाङ्गनाओंसे सेवित देवकी -नन्दन माधव नृत्य करते हुए वेणुगीत सुना रहे हैं । वे मनोहर सुवर्णकी - सी कान्तिवाले पीताम्बरसे सुशोभित * कृष्णचन्द्रः पुरा निर्गतो मानतो ह्यागतः सोऽपि राधे युगान्ते पुनः छुङ्गछुङ्गेति नादं मृदङ्गे कलं वाद्यमाने सुरस्त्रीजनैः सेवितः चारुचामीकराभासिवासा विभुर्वैजयन्तीभराभासितोरः स्थलः चारुचन्द्रावलीलोचनाचुम्बितो गोपगोवृन्दगोपालिकावल्लभः बालिकातालिकाताललीलालयासङ्गसंदर्शितभ्रूलताविभ्रमः मौलिमालाङ्गदैः किङ्किणीकुण्डलैर्भूषितो नन्दनो नन्दराजस्य च पारिजातं समुद्धृत्य राधावरो रोषयामास भामाभयादङ्गणे अक्षराजं विनिर्जित्य नीत्वा मणिं संददौ भीतवद् भूमिनाथाय च श्रीहरिके वेणुगीतकी चर्चासे श्रीराधाकी आदि गोपसुन्दरियोंके साथ वन - विहार, पर्वत - विहार और रासक्रीडा हैं । उनके वक्षःस्थलमें वैजयन्तीकी मालाएँ शोभा दे रही हैं । उन देवकीनन्दनने नन्दके वृन्दावनमें गोपिका-मण्डलीके मध्यमें विराजमान होकर वेणु बजाते हुए गीत गाया है । मनोहर चन्द्रावलीके लोचनोंसे चुम्बित, गोप, गौओं तथा गोपाङ्गनाओंके वल्लभ और कंस-वंशरूपी वनको जलानेके लिये दावानलरूप देवकी-नन्दनने वेणु बजाते हुए गीत गाया है । गोपबालिकाएँ ताली बजाकर ताल दे रही हैं और उस ताल - लीलाके लयके साथ - साथ जो अपनी भ्रूलताओंका विभ्रम-विलास प्रदर्शित कर रहे हैं, वे देवकीनन्दन गोपाङ्गनाओंके गीतोंकी ओर ध्यान देकर स्वयं भी वेणु बजाते हुए गा रहे हैं । देवि! जो तुम्हारे प्रेमी हैं, उन परमसुन्दर नन्दराजकुमार देवकीनन्दनने मुकुट, माला, बाजूबंद, करधनी और कुण्डल आदि आभूषणोंसे विभूषित हो तुम्हारी प्रसन्नताके लिये वेणुगीत आरम्भ किया है । जिन श्रीराधावल्लभने सत्यभामाके भयसे स्वर्गीय पारिजात उखाड़कर उनके आँगनमें लगा दिया है, गोपाङ्गनाओं और देवाङ्गनाओंके कामपूरक उन देवकीनन्दनने वेणुद्वारा गीत गाया है । जिन्होंने ऋक्षराजको जीतकर उनके यहाँसे स्यमन्तकमणि ले आकर भयभीतकी भाँति भूमिनाथ उग्रसेनको अर्पित की थी, वे ही रासेश्वर देवकीनन्दन आज रासमण्डलमें पधारकर वेणुके स्वरोंमें गीत गा रहे हैं * ॥६–१३ ॥ । नाशयन् सर्वदुःखानि ते संनिधौ संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । रासरम्याङ्गणे नृत्यकृन्माधवः संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । नन्दवृन्दावने गोपिकामध्यगः संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । कंसवंशाटवीदाहदावानलः संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । गोपिकागीतदत्तावधानः स्वयं संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । प्रीतिकृत् सुन्दरो देवि प्रीत्या तव संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । वल्लवीवृन्दवृन्दारिकाकामुकः संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ । सोऽपि रासे समागत्य रासेश्वरः संजगौ वेणुना देवकीनन्दनः ॥ ( अध्याय ४६ । ६-१३ )

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अध्याय ४६ ] श्रीकृष्णके आगमनसे गोपियोंको उल्लास ५२१ श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! वेणु बजानेवाले श्यामसुन्दरकी महिमाका वर्णन सुनकर प्रिया श्रीराधा प्रसन्न होकर उठीं और उन्होंने प्रियतमका गाढ़ आलिङ्गन किया । तत्पश्चात् वृन्दावनाधीश्वर गोविन्द वृन्दावनमें वृन्दावनवासिनी प्राणवल्लभाके साथ उस वनके वृक्षोंकी शोभा देखते हुए विहार करने लगे । नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर व्रजकी युवतियोंने सब ओरसे श्रीकृष्णको उसी तरह जा पकड़ा, जैसे वर्षाकालमें चपलाएँ मेघको घेर लेती हैं । राजन्! वहाँ जितनी गोपियाँ विद्यमान थीं, उतने ही रूप धारण करके श्यामसुन्दर उन सबके साथ यमुनापुलिनपर आये । जैसे पूर्वकालमें श्रुतियाँ भगवान्से मिलकर प्रसन्न हुई थीं, उसी प्रकार गोपाङ्गनाएँ श्यामसुन्दरके साथ परम आनन्दका अनुभव करने लगीं । उन्होंने श्रीकृष्णचन्द्रको अपने - अपने वस्त्रोंका आसन दिया । राजन्! उस आसनपर श्रीराधारमण नन्दनन्दन राधाके साथ बैठे । अहो! उन गोपसुन्दरियोंने अपनी भक्तिसे भगवान्‌को वशमें कर लिया था । श्रीकृष्णने गोलोकमें जैसा रूप दिखाया था, वैसा ही त्रिभुवनमोहन रूप उन्होंने उस समय राधा-सहित गोपाङ्गनाओंके समक्ष प्रकट किया । गोकुलचन्द्रका वह परम अद्भुत सुन्दर रूप देखकर गोपसुन्दरियाँ ब्रह्मानन्दमें निमग्न हो अपने - आपमें भूल गयीं ॥ १४ - २१ ॥ उनके साथ स्थलमें विहार करके उनकी भक्तिके वशीभूत हुए श्यामसुन्दरने श्रीराधा और गोपाङ्गनाओंके साथ यमुनाके जलमें प्रवेश किया । भगवान्ने वहाँ उन व्रजसुन्दरियोंके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्र अप्सराओंके साथ मन्दाकिनीके जलमें करते हैं । राजन्! माधव माधवीको और माधवी माधवको जलमें परस्पर भिगोने लगे । वे दोनों बड़ी उतावली के साथ एक - दूसरेपर पानी उछालते थे । नरेश्वर! गोपाङ्गनाओंकी वेणी और केशपाशसे गिरे हुए फूलोंसे यमुनाजीकी वैसी ही विचित्र शोभा हुई, जैसे अनेक रंगके छापसे छपी हुई नीली पगड़ी शोभा पाती है । विद्याधरियाँ और देवाङ्गनाएँ फूल बरसाने लगीं । उनकी साड़ियोंकी नीवी ढीली पड़ गयी और वे प्रेमावेशसे व्याकुल हो मोहको प्राप्त हो गयीं ॥ २२ - २६ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर जल - विहार समाप्त करके श्यामसुन्दर लीलापूर्वक यमुनाजलसे बाहर निकले और गोवर्द्धन पर्वतपर गये । नृपेश्वर! उनकी सहचरी गोपियाँ भी उनके साथ - साथ गयीं । किन्होंके हाथोंमें व्यजन थे और कितनी ही चँवर डुलाती चल रही थीं । किन्हींके हाथोंमें पानके बीड़े थे । बहुत - सी गोपियाँ दर्पण लिये चलती थीं । कितनोंके हाथोंमें नाना प्रकारके आभूषणोंके पात्र थे और कितनी ही पुष्पभार लिये जा रही थीं । कुछ गोपियोंके हाथोंमें चन्दनके पात्र थे और कुछ विविध प्रकारके बर्तनोंका भार ढो रही थीं । कोई महावर लिये जाती थीं और कोई वस्त्र । किन्हींके हाथोंमें मृदंग थे, तो कोई झाँझ लिये हुए थीं । कोई मुरयष्टिधारिणी थीं तो कोई वीणाधारिणी । कोई करताल लिये चलती थीं और कोई गीत गाती जा रही थीं । छत्तीसों राग - रागिनियाँ व्रजसुन्दरियोंका रूप धारण करके उस यूथमें सम्मिलित हो गयी थीं । जो गोपियाँ पूर्वकालमें श्रीराधाके साथ गोलोकसे भारत-वर्षमें आयी थीं, वे श्रीराधावल्लभके समीप गान तथा नृत्य कर रही थीं ॥ २७–३३ ॥ उन सबके बीचमें वेणुसे गीत गाते और त्रिलोकीको मोहित करते हुए मदनमोहन श्रीकृष्ण हरि नृत्य करने लगे । रासमण्डलमें बाजों, करधनियों, कड़ों, कंगनों और नूपुरोंकी झनकारोंसे युक्त गीतमिश्रित शब्दक तुमुल ध्वनि होने लगी । राजन्! देवता और देवाङ्गनाएँ श्रीहरिका रास देखकर आकाशमें प्रेमवेदनासे पीड़ित हो मूच्छित हो गयीं । चन्द्रमाकी चाँदनीमें चतुर चञ्चल श्रीकृष्ण नृत्यकी गति से चलते हुए गोपाङ्गनारूपी चन्द्रावलीसे घिरकर उसी तरह शोभा पाते थे, जैसे विद्युन्मालासे आवेष्टित मेघ सुशोभित हो रहा हो । उस पर्वतपर महान् गिरिधर श्यामसुन्दरने फूलोंके हार, महावर, काजल और कमलपत्र आदिके द्वारा श्रीराधाका शृङ्गार किया । श्रीराधिकाने भी कुङ्कुम, अगुरु और चन्दन आदिके द्वारा श्रीकृष्णके मुखमण्डलमें सुन्दर कमलपत्रकी रचना की । तब मुसकराती हुई राधाने मन्दहासकी छटासे युक्त भगवान्‌के मुखकी ओर देखते हुए उन्हें प्रसन्नतापूर्वक पानका बीड़ा दिया । प्रियतमाके

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५२२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड दिये हुए उस ताम्बूलको नन्दनन्दन श्रीहरिने बड़े प्रेमसे खाया । फिर श्रीकृष्णद्वारा अर्पित ताम्बूलको श्रीराधिकाने भी प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किया । पतिपरायणा सती श्रीराधाने भक्तिभावसे प्रेरित हो श्रीकृष्णके चबाये हुए ताम्बूलको हठात् लेकर शीघ्र अपने मुँहमें रख लिया । तब भगवान्ने भी प्रियाके द्वारा चबाये हुए ताम्बूलको उनसे माँगा; किंतु श्रीराधाने नहीं दिया । वे भयभीत होकर उनके चरणकमलमें गिर पड़ीं ॥ ३४–४३ ॥ पद्मा, पद्मावती, नन्दी, आनन्दी, सुखदायिनी, चन्द्रावली, चन्द्रकला तथा वन्द्या – ये गोपाङ्गनाएँ श्रीहरिकी प्राणवल्लभा हैं । श्रीहरिने वसन्त ऋतुके वैभवसे भरे वृन्दावनमें उन सबके साथ नाना प्रकारका शृङ्गार धारण किया । वे कामदेवसे भी अधिक मनोहर लगते थे । कुछ गोपियाँ श्रीकृष्णका अधरामृत पान करती थीं और कितनी ही उन परमात्मा श्रीकृष्णको अपने बाहुपाशमें बाँध लेती थीं । फिर तो मदनमोहन भगवान् श्रीकृष्ण गोपाङ्गनाओंके वक्ष: स्थलमें लगे हुए केसरोंसे लिप्त होकर सुनहरे रंगके हो गये और अनुपम शोभा पाने लगे ॥ ४४–४७ ॥ राजेन्द्र! फिर सुन्दर कदलीवनमें गोपीजनोंके साथ श्रीगोपीजनवल्लभने रास किया । नरेश्वर! इस प्रकार रासमण्डलमें नित्यानन्दमय श्यामसुन्दरके साथ गोपियोंकी वह हेमन्त ऋतुकी रात एक क्षणके समान व्यतीत हो गयी ॥ ४८-४९ ॥ इस प्रकार रास करनेके पश्चात् नन्दनन्दन श्रीहरि नन्दभवनको चले गये । श्रीराधा वृषभानुपुरमें लौट गयीं तथा अन्यान्य गोपाङ्गनाएँ भी अपने - अपने घरको चली गयीं । नृपेश्वर! व्रजके गोप श्रीहरिकी इस रासवार्ताको बिलकुल नहीं जान सके । उन्हें अपनी - अपनी स्त्रियाँ अपने पास ही सोती प्रतीत हुईं । राधामाधवके इस परम उत्तम शृङ्गारचरित्रको जो लोग पढ़ते और सुनते हैं, वे अक्षय धाम गोलोकको प्राप्त होंगे ॥ ५०–५२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' रासक्रीडाकी पूर्ति ' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

सैंतालीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णसहित यादवोंका व्रजवासियोंको आश्वासन देकर वहाँसे प्रस्थान श्रीगर्गजी कहते हैं— राजेन्द्र! श्रीकृष्णका यह चरित्र शास्त्रोंमें गुप्तरूपसे वर्णित है, जिसे मैंने तुम्हारे सामने प्रस्तुत किया है । अब तुम भगवान्‌के अन्य चरित्रोंको विस्तारपूर्वक सुनो । इस प्रकार श्रीकृष्ण नन्दनगरमें आठ दिनोंतक रहकर सब लोगोंको आनन्द प्रदान करते रहे । इसके बाद पुनः उन्होंने वहाँसे जानेका विचार किया ॥ १-२ ॥ श्रीकृष्णकी माता यशोदा अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको जानेके लिये उद्यत देख पहलेकी ही भाँति उच्चस्वरसे रोदन करने लगीं । नृपेश्वर! वहाँ गोपियोंके भी नेत्र आँसुओंसे भर आये और वे घर - घरमें पहलेके दुःखोंको याद करके करुणभावसे रोदन करने लगीं । सान्त्वना देनेमें कुशल श्रीहरिने जितनी व्रजाङ्गनाएँ थीं, उतने ही रूप धारण करके उन सबको पृथक् - पृथक् आश्वासन दिया तथा श्रीराधाको भी धीरज बँधाया । इसके बाद भगवान् माता यशोदासे बोले - " मैया! शोक न करो । मैं इस उत्तम अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान पूरा करवाकर शीघ्र ही यहाँ आऊँगा । यदि तुम नहीं विश्वास करती हो तो मेरी यह बात सुन लो - ' मैया! आजसे तुम प्रतिदिन मुझे पुत्ररूपमें अपने पास ही देखोगी । ' मैं भक्तिभावसे स्मरण करनेपर कालके भयका भी नाश करनेवाला हूँ " ॥३–७ ॥ इस प्रकार यशोदाजीको आश्वासन देकर नेत्रोंमें आँसू भरे श्रीहरि नन्दसदनसे बाहर निकले और गोपोंके साथ अपने पोते अनिरुद्धकी सेनामें गये । नृपश्रेष्ठ! अनिरुद्धकी सेनामें पहुँचकर साक्षात् नारायण श्रीहरिने यादवोंको घोड़ा छोड़नेके लिये आज्ञा दी । श्रीकृष्णचन्द्रसे प्रेरित होकर उनके पौत्र अनिरुद्धने यत्रपूर्वक अश्वका पूजन किया और पुनः पूर्ववत् विजययात्राके लिये उसे छोड़ दिया ॥ ८–१० ॥

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अध्याय ४८ ] अश्वका हस्तिनापुरमें जाना; यादव अनिरुद्ध आदि सब यादव नेत्रोंमें आँसू भरे नन्दको नमस्कार करके बड़े कष्टसे वहाँसे जानेके लिये अपने - अपने वाहनोंपर आरूढ़ हुए । श्रीकृष्णके पुत्र और पौत्र सबके आकार उन्हींके समान सुन्दर थे । श्रीकृष्णके साथ उन सब यादवोंको जानेके लिये उद्यत देख, गोविन्दके विरहसे व्याकुल हो, वे गोपगण वहाँ फूट - फूटकर रोने लगे । पहलेके विरहजनित दुःखोंको याद करके उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे । नन्दराजके नेत्रोंमें भी आँसू छलक रहे थे । वे दुःखसे पीड़ित हो सूखे हुए मुँहसे कुछ बोल न सके; केवल रोदन करने लगे । श्रीकृष्ण भी आँसू बहाते हुए ' मैं फिर आऊँगा ' – ऐसा कहकर सबसे पृथक् - पृथक् मिले और सबको आश्वासन

दिया । ११ - १५ ॥

सैनिकोंका कौरवोंको घायल करना ५२३ उन्होंने कहा — गोपालगण! चैत्रमासमें जब द्वारकापुरीमें यज्ञ आरम्भ बुलवाऊँगा, इसमें संशय तुम सब लोग प्रतिदिन देखोगे । अतः अभी करो ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार आश्वासन लेकर, नन्दजीको प्रणाम होगा, तब मैं तुम सबको नहीं है । मेरे मित्र गोपगण! गोकुलमें मुझ गोपालको यहीं व्रजमण्डलमें निवास दे, उनके दिये हुए उपहारको करके श्रीहरि वृष्णिवंशियोंके साथ रथपर बैठकर, वहाँसे चल दिये । नन्द आदि दुखी गोप श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलमें लगे हुए मनको पुनः हटानेमें असमर्थ हो केवल शरीरसे गोकुलको लौटे । नरेश्वर । उस दिनसे प्रेममग्न गोप और गोपीगण योगियोंके लिये भी परम दुर्लभ श्रीकृष्णको अपने समीप देखने लगे ॥ १८ - २० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' यादवोंका व्रजसे अन्यत्र गमन ' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

अड़तालीसवाँ अध्याय अश्वका हस्तिनापुरीमें जाना; उसके भालपत्रको पढ़कर दुर्योधन आदिका रोषपूर्वक अश्वको पकड़ लेना तथा यादव सैनिकोंका कौरवोंको घायल करना श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर यमुना नदीको पार करके वह अश्व आस - पासके देशोंका निरीक्षण करता हुआ कुरुदेशकी राजधानीमें गया, जहाँ बलवान् विचित्रवीर्यकुमार चक्रवर्ती राजा धृतराष्ट्र राज्य करते थे । वहाँ उस अश्वने अनेकानेक उपवनों, तड़ागों और सरोवरोंसे युक्त सुन्दर कौरव -नगरको देखा ॥ १-२ ॥ नरेश्वर! वह नगर दुर्गसे तथा गङ्गारूपिणी खाईसे घिरा हुआ था । वहाँ सोने - चाँदीके महल थे और बड़े-बड़े शूरवीर वहाँ निवास करते थे । राजन्! उस कैौरवनगरसे वनवासी मृगोंका शिकार करनेके लिये सुयोधन निकला । वह वीरजनोंसे युक्त हो रथपर बैठा था । उसने उस यज्ञ - सम्बन्धी घोड़ेको भालपत्रसहित देखा । महाराज! दुर्योधन बड़ा मानी था । घोड़ेको देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने रथसे उतरकर अनायास ही घोड़ेको पकड़ लिया । कर्ण, भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भूरि और दुःशासन आदिके साथ उसने हर्षित होकर उसका भालपत्र पढ़ा । उसमें लिखा था- ' चन्द्रवंशके अन्तर्गत यादवकुलमें राजा उग्रसेन विराजते हैं । इन्द्र आदि देवता भी जिनकी आज्ञाके पालक हैं, भक्तपरिपालक भगवान् श्रीकृष्ण उनके सहायक हैं । वे उन्हींकी भक्तिसे आकृष्ट हो द्वारकापुरीमें निवास करते हैं । उन्हींकी आज्ञासे राजाधिराज चक्रवर्ती उग्रसेन हठपूर्वक अपने यशके विस्तारके लिये अश्वमेध यज्ञ करते हैं । उन्होंने यह श्रेष्ठ और शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न घोड़ा छोड़ा है । उस घोड़ेके रक्षक हैं श्रीकृष्णपौत्र अनिरुद्ध, जो वृक दैत्यका वध करनेवाले हैं । हाथी, घोड़े, रथ और पैदल - वीरोंकी अनेक चतुरङ्गिणी सेनाओंके साथ अनिरुद्ध अश्वकी रक्षामें चल रहे हैं । जो राजा इस पृथ्वीपर राज्य करते

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५२४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड हैं और अपनेको शूरवीर मानते हैं, वे भालपत्रसे शोभित इस यज्ञ - सम्बन्धी अश्वको बलपूर्वक ग्रहण करें । धर्मात्मा अनिरुद्ध राजाओं द्वारा पकड़े गये उस अश्वको अपने बाहुबल और पराक्रमसे अनायास ही हठपूर्वक छुड़ा लेंगे । जो घोड़ेको न पकड़ सकें, वे धनुर्धर अनिरुद्धके चरणोंमें नतमस्तक होकर चले जायँ ' ॥३–१३ ॥ श्रीगजी कहते हैं— उस पत्रको बाँचकर वे शत्रुभूत कौरव क्रुद्ध हो उठे । उन मानियोंके नेत्र लाल हो गये और वे परस्पर कहने लगे ॥ १४ ॥

कौरव बोले- अहो भालपत्रमें क्या लिख रखा कोई राजा ही नहीं है? यज्ञमें हमने जिन यादवोंको अब फिर अश्वमेध करने सबको जीतेंगे । घोड़ेको यादवोंको जीतनेके पश्चात् करेंगे । कौन है उग्रसेन? घोड़ेकी रक्षा करनेवाला भी ! इन धृष्ट यादवोंने घोड़ेके है? क्या यादवोंके सामने पूर्वकालमें अपने राजसूय परास्त किया है, वे ही मूर्ख चले हैं । इसलिये हम इन कदापि वापस नहीं देंगे । हमलोग स्वयं अश्वमेध यज्ञ क्या है कृष्ण? और वह कौन है? समस्त यादवोंके साथ आकर ये लोग हमारे सामने क्या पौरुष दिखायेंगे? कृष्ण आदि समस्त यदुवंशी जरासंधके डरसे मथुरापुरी छोड़कर समुद्रकी शरणमें गये हैं । वे हमलोगोंके ही भयसे युद्ध छोड़कर भाग खड़े हुए हैं । पहले हमलोगोंने कृपा करके इन यादवोंको राज्य दे दिया और अब वे कृतघ्न यादव अपनेको चक्रवर्ती मानने लगे हैं । पाण्डवोंका मान रखनेके लिये हमने पहले यादवोंको नहीं मारा था; किंतु वे पाण्डव भी हमारे शत्रु ही हैं । अतः हमने उन्हें देशनिकाला दे दिया है । इन भागे हुए यादवों को आज युद्धमें पराजित करके हम उग्रसेनको सहसा उनके चक्रवर्तीपनका मजा चखायेंगे ॥ १५–२२ ॥ राजन्! वे समस्त श्रीकृष्णविमुख कौरव लक्ष्मी और राजवैभवके घमंडमें आकर ऐसी बातें कहने लगे । फिर सबने शीघ्र ही नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र ले लिये और उस घोड़ेको नगरमें प्रवेश कराया । इसके बाद वे वहीं ठहर गये । अश्वके दूर चले जानेपर श्रीकृष्णकी प्रेरणासे साम्ब तुरंत ही मार्ग प्रदान करनेवाली गहरी यमुना नदीको पार करके दस अक्षौहिणी सेना पीछे लिये, कवच बाँध, अक्रूर और युयुधान आदिके साथ रोषपूर्वक हस्तिनापुरकी ओर गये । इस प्रकार वे समस्त यादव हस्तिनापुरके निकट आ पहुँचे । उन्होंने देखा - घोड़ा चुरानेवाले कौरव सामने खड़े हैं । श्रीकृष्ण ही जिनके आराध्यदेव हैं तथा जो लोक और परलोक दोनोंपर विजय पानेके इच्छुक हैं, उन बलवान् यादवोंने कौरवोंको देखकर उन सबको तिनकेके समान समझते हुए कहा – ' अहो! किसने हमारे घोड़ेको बाँधा है? किसके ऊपर आज यमराज प्रसन्न हुए हैं और कौन युद्धस्थलमें नाराचों द्वारा बड़ी भारी पीड़ा प्राप्त करनेके लिये उत्सुक है? अहो! जिनके चरणोंमें देवता और दानव भी वन्दना करते हैं, जो पहले राजसूय यज्ञ कर चुके हैं, जिनकी समानता करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है तथा जो नरेशोंके भी ईश्वर हैं, उन वृष्णिकुलतिलक चक्रवर्ती राजाधिराज उग्रसेनको क्या वे राजा नहीं जानते, जो अपने ही विनाशके लिये घोड़ेको पकड़ रहे हैं? हेमाङ्गद, इन्द्रनील, बक, भीषण और बल्वल– इन समस्त नरेशोंको हमने संग्रामभूमिमें पराजित किया है ' ॥ २३–३२ ॥ यादवोंकी यह बात सुनकर कौरवोंके अधर क्रोधसे फड़क उठे । वे यादवोंकी ओर टेढ़ी आँखोंसे देखते हुए उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगे ॥३३ ॥

कौरवोंके अनुगामी बोले- हमलोगोंने ही घोड़ेको पकड़ा है । तुमलोग हमारा क्या कर लोगे? हम अपने सायकोंद्वारा तुम सब यादवोंको यमलोक पहुँचा देंगे । उग्रसेन कितने दिनोंसे श्रीकृष्णके हाथसे राज्य पाकर घमंड करने लगा है? हम उसे बाँधकर स्वयं राज्य करेंगे । अनिरुद्ध हमारे भयसे कहाँ भाग गया है? बताओ, हम युद्धमें अपने बाणोंद्वारा उसकी पूजा करेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३४-३६ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! कौरवोंकी यह बात सुनकर यादव क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे । उन्होंने कौरवसैनिकोंके मुखोंपर धनुषसे अनेक बाण फेंके । उन बाणोंसे कितने ही कौरवोंकी जीभें कट गयीं, किन्हींके दाँत टूट गये और किन्हींके मुख छिन्न - भिन्न