गर्ग संहिता — पृष्ठ 531–540
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540
पृष्ठ 531
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ४ ९ यादवों और कौरवोंका घोर युद्ध ५२५ हो गये । वे अधिक मात्रामें रक्तवमन करते हुए घायल पास गये और पूछनेपर बताया कि यादवोंने हमारी हो अपना क्षत - विक्षत मुँह लिये शीघ्र ही दुर्योधनके यह दुर्दशा की है ॥ ३७–३९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' कौरवोंद्वारा श्यामकर्ण अश्वका अपहरण ' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
उनचासवाँ अध्याय यादवों और कौरवोंका घोर युद्ध श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! भीष्म, द्रोण और कृप आदिके साथ दुर्योधनने अपने वीरोंके भग्न हुए मुखोंको देखकर क्रोधपूर्वक कहा - ' आश्चर्यकी बात है कि नीच यादव स्वयं मौतके मुखमें चले आये । क्या वे मूर्ख महाराज धृतराष्ट्रके महान् बलको नहीं जानते हैं? ' ॥ १-२ ॥ – ऐसा कहकर दुर्योधनने घोड़े, हाथी, रथ और पैदल वीरोंसे युक्त अपनी चतुरङ्गिणी सेना युद्धमें यादवोंका सामना करनेके लिये भेजी । वह विशाल सेना दस अक्षौहिणियोंके द्वारा भूतलको कम्पित करती और शत्रुओंको डराती हुई बलपूर्वक आगे बढ़ी । उसे आती देख वीरोंसे विभूषित जाम्बवतीनन्दन साम्बने बड़े हर्ष और उत्साहसे अपनी सेनाको युद्धके लिये प्रेरणा दी ॥ ३-५ ॥ तब समस्त कौरव अपनी रक्षाके लिये क्रौञ्चव्यूहका निर्माण करके उसीमें सब - के - सब खड़े हो गये । उसके मुखभागमें भीष्म खड़े हुए और ग्रीवाभागमें आचार्य द्रोण । दोनों पंखोंकी जगह कर्ण तथा शकुनि स्थित हुए और पुच्छभागमें दुर्योधन । उस क्रौञ्चव्यूहके मध्यभागमें चतुरङ्गसैनिकोंके साथ कौरवोंकी विशाल वाहिनी खड़ी हुई । यादवोंने जब शत्रुओंके लिये दुर्जय उस क्रौञ्चव्यूहका निर्माण हुआ देखा, तब वे युद्धसे शङ्कित हो उस क्रौञ्चव्यूहपर दृष्टि रखते हुए साम्बसे बोले – ' तुम भी यत्नपूर्वक व्यूह बना लो । ' साम्ब युद्धकी कलामें बड़े निपुण थे । उन्होंने अपने सैनिकोंकी व्यूह - रचना - विषयक बात सुनकर भी कौरवोंको कुछ न गिनते हुए रणक्षेत्रमें व्यूहका निर्माण नहीं किया ॥ ६ – १० ॥ नरेश्वर! जब दोनों ओरकी सेनाएँ युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ीं, तब दो घड़ीतक सारी पृथ्वी जोर - जोरसे काँपती रही । दोनों सेनाओंमें तत्काल रणभेरियाँ बज उठीं और शङ्खनाद होने लगे । सब ओर जगह - जगह धनुषोंकी टंकारें सुनायी देने लगीं । वहाँ हाथी चिग्घाड़ते और घोड़े हिनहिनाते थे । शूरवीर सिंहनाद करते और रथोंकी नेमियाँ ( पहिये ) घरघराहट उत्पन्न करती थीं । सैनिकोंकी पदधूलिसे युद्धस्थलमें अन्धकार छा गया । आकाश मलिन हो गया और वहाँ सूर्यका दीखना बंद हो गया । फिर तो दोनों सेनाओंमें घोर घमासान युद्ध होने लगा । समराङ्गणमें उभय पक्षके सैनिक एक - दूसरेपर बाणों, गदाओं, परिघों, शतनियों, शक्तियों तथा तीखे बाणोंका प्रहार करने लगे । गजारोही गजारोहियोंसे, रथी रथियोंसे, घुड़सवार घुड़सवारोंसे तथा पैदल - योद्धा पैदलोंसे जूझने लगे ॥ ११–१६ ॥ बाणोंसे अन्धकार छा जानेपर धनुर्धर वीर साम्ब बाणवर्षा करते हुए रणक्षेत्रमें भीष्मके साथ और अक्रूर कर्णके साथ युद्ध करने लगे । युयुधान शकुनिके साथ, सारण द्रोणाचार्यके साथ तथा सात्यकि संग्राम-भूमिमें दुर्योधनके साथ शीघ्रतापूर्वक लड़ने लगे । बली दुःशासनके साथ और कृतवर्मा भूरिके साथ भिड़ गये । इस प्रकार उनमें परस्पर भयंकर द्वन्द्वयुद्ध होने लगा । तब साम्बने अत्यन्त कुपित होकर अपने सुदृढ़ धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और शूरवीरोंके हृदयमें कम्प उत्पन्न करते हुए टंकार - ध्वनि की । उन्होंने पहले श्रीकृष्णको नमस्कार करके दस बाण छोड़े । अपने ऊपर आये हुए उन बाणको भीष्मने अपने सायकोंसे
पृष्ठ 532
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड काट डाला । तब रणक्षेत्रमें साम्बने सिंहनाद करके पुनः दस सुवर्णमय बाण भीष्मके कवचपर मारे । चार सायकोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको यमलोक भेज दिया तथा दस बाणोंसे उनके प्रत्यञ्चासहित कोदण्डको खण्डित कर दिया । धनुष कट जाने तथा घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए भीष्मने सहसा उठकर बड़े रोषसे गदा हाथमें ली । तब साम्बने कहा – ' आप पैदल हैं, अतः आपके साथ मैं युद्ध कैसे करूँगा? मैं युद्धस्थलमें आपको दूसरा रथ दूँगा । कुरुश्रेष्ठ । आप समराङ्गणमें मुझसे सशस्त्र रथ लीजिये और मुझ मूढ़ निर्लज्जपर विजय पाइये । आप वृद्ध होनेके कारण मेरे लिये सदा पूजनीय ही हैं ' ॥ १७ - २६ ॥ यह सुनकर क्रोधसे भीष्मका अधर फड़कने लगा । वे दाँतोंसे दाँत पीसते और जीभसे ओठ चाटते हुए आँखें लाल करके साम्बसे बोले - ' तुम्हारे दिये हुए रथपर बैठकर जब मैं युद्ध करूँगा तो मेरी अपकीर्ति होगी तथा मुझे पाप और नरक ही प्राप्त होगा । प्रतिग्रह तो ब्राह्मण लेते हैं । हमलोग तो दाता माने गये हैं । हमने पहले कृपा करके ही यादवोंको राज्य दिया था । ' उनकी बात सुनकर साम्बने रोषपूर्वक उत्तर दिया-' भूतलपर किसी चक्रवर्ती शासकको विद्यमान देख मण्डलेश्वर राजालोग भयके कारण उन्हें अपना राज्य दे डालते हैं । ( किंतु ऐसा करके वे दाता नहीं माने जाते । ) ' ॥ २७–३० ॥ नरेश्वर! साम्बका यह वचन सुनकर शूरशिरोमणि भीष्मने अपनी भारी गदासे साम्बके वक्षःस्थलपर प्रहार किया । उस गदाकी चोटसे व्यथित हो साम्ब मूच्छित हो गये । सारथिने उन्हें रथपर सँभालके लिटा दिया और उनके जीवनके लिये आशङ्कित हो वह उन्हें रणक्षेत्रसे बाहर हटा ले गया । नृपेश्वर! उसी समय यादव - सेनामें भारी कोलाहल मचा । भीष्म दूसरे रथपर आरूढ़ हो, कवच बाँध, शरासन हाथमें ले, मार्गमें यादवोंको मारते हुए शीघ्र ही दुर्योधनके पास जा पहुँचे । राजेन्द्र! उस संग्राममें सात्यकिने गीधकी पाँख लगे हुए चमकीले बाणोंद्वारा दुर्योधनको रथहीन कर दिया । रथहीन होनेपर भी दुर्योधन वेगपूर्वक दूसरे रथपर जा चढ़ा और विषधर सर्पके समान बाणोंद्वारा उसने अपने उस शत्रुको भी रथहीन कर दिया । नरेश्वर! शीघ्र पराक्रम प्रकट करनेवाले सात्यकिने भी दूसरे रथपर आरूढ़ हो एक बाण मारकर दुर्योधनके रथको चार कोस दूर फेंक दिया । आकाशसे उसका रथ भूतलपर गिरा और सारथि तथा घोड़ोंसहित अंगारके समान बिखर गया । उस रथसे गिरनेपर दुर्योधनको तत्काल मूर्च्छा आ गयी । तब अत्यन्त कुपित हुए द्रोणाचार्यने अपने शत्रु सारणको समराङ्गणमें छोड़कर अग्निमय बाणसे सात्यकिपर प्रहार किया । उस बाणसे सात्यकिका रथ घोड़ों और सारथिसहित जलकर भस्म हो गया और सात्यकि भी बाणकी ज्वालासे अङ्ग अङ्ग झुलस जानेके कारण मूर्च्छित हो गये ॥ ३१–४० ॥ राजन् । तब कुपित हुआ कृतवर्मा समराङ्गणमें भूरिको परास्त करके द्रोणके ऊपर अधिक रुष्ट हो सिंहनाद करता हुआ आया । उस वीरने आते ही युद्धक्षेत्रमें रोषपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके आचार्य द्रोणको शस्त्रहीन एवं रथहीन कर दिया और उनका कवच भी काट डाला । तब कर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और उसने रणाङ्गणमें अक्रूरको छोड़कर कृतवर्माके ऊपर उसी प्रकार शक्तिसे प्रहार किया, जैसे स्वामी कार्तिकेयने तारकासुरको शक्तिसे चोट पहुँचायी थी । वह शक्ति कृतवर्माके शरीरका भेदन करके धरतीमें घुस गयी । हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण कृतवर्मा भूमिपर गिर पड़ा ॥ ४१ - ४४ ॥ राजेन्द्र! तब युयुधानने युद्धमें क्रोधपूर्वक शकुनिको परास्त करके रथद्वारा कर्णके ऊपर चढ़ाई की । उन्होंने आते ही अपने शरासनसे दस सायक छोड़े । उन सायकोंको अपने ऊपर आया देख कर्णने उनपर अपने सायकोंद्वारा प्रहार किया । संग्रामभूमिमें उन दोनोंके बाण परस्पर रगड़ उठे और चिनगारियाँ बरसाते हुए अलातचक्रकी भाँति आकाशमें घूमने लगे । पृथ्वीनाथ! तब युयुधानने क्रोध करके कर्णके कवचपर काकपक्षयुक्त तीखे बाण मारे । राजन्! वे बाण कर्णके कवचपर न लगकर उसी तरह पृथ्वीपर गिर गये जैसे पापी स्वर्गमें न जाकर नरकमें ही गिरते
पृष्ठ 533
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ५० ] कौरवोंकी पराजय ५२७ हैं । युयुधान बड़े विस्मयमें पड़ गये और कर्णने नन्दन कर्णने बलीको आया देख पवनास्त्रयुक्त बाणसे हँसकर युद्धस्थलमें नाना प्रकारके शस्त्रोंसे योजित उन्हें रथसहित दूर फेंक दिया । बली एक योजन दूर बाणोंद्वारा उन्हें रथहीन कर दिया । यह देख बलीने जा गिरे । इतनेमें ही साम्ब रोषपूर्वक कौरवोंको मारते युद्धस्थलमें दुःशासनको मूच्छित करके अग्नितुल्य और बाणोंद्वारा अन्धकार प्रकट करते हुए फिर वहाँ
तेजस्वी रथके द्वारा कर्णपर आक्रमण किया । भास्कर- आ पहुँचे ॥ ४५–५३ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' यादवों और कौरवोंके संग्रामका वर्णन ' नामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥ पचासवाँ अध्याय कौरवोंकी पराजय और उनका भगवान् श्रीकृष्णसे मिलकर भेंटसहित अश्वको लौटा देना श्रीगर्गजी कहते हैं— नृपेश्वर! उसी समय भोज, वृष्णि और अन्धक आदि समस्त यादव तथा मथुरा और शूरसेन- प्रदेश महासंग्रामकर्कश एवं बलवान् योद्धा यमुनाजीको पार करके पैरोंकी धूलिसे आकाशको व्याप्त और पृथ्वीको कम्पित करते हुए वहाँ आ पहुँचे । घोड़ेको सब ओर देखते और खोजते हुए महाबलवान् श्रीकृष्ण आदि और अनिरुद्ध आदि महावीर भी आ गये । वृष्णिवंशियोंने दूरसे ही वहाँ युद्धका भयंकर महाघोष, कोदण्डोंकी टंकार, शतनियोंकी गूँजती हुई आवाज, शूरोंकी सिंहगर्जना, शस्त्रोंके परस्पर टकरानेके चट - चट शब्द, कोलाहल और हाहाकार सुना । सुनकर वे बड़े ही विस्मित हुए । जब उन्हें मालूम हुआ कि यादवोंका कौरवोंके साथ घोर युद्ध छिड़ गया है तो अनिष्टकी शङ्का मनमें लिये अनिरुद्ध और श्रीकृष्ण आदि यदुकुलशिरोमणि महापुरुष बड़े वेगसे वहाँ आये । नरेश्वर! ' अनिरुद्ध आदिके साथ हमारी सहायता करनेके लिये सेनासहित श्रीकृष्ण आ पहुँचे हैं ', यह देखकर साम्ब आदिने उनको प्रणाम किया । श्रीकृष्णके पधारनेपर रणभेरियाँ बजने लगीं, शङ्ख और गोमुखोंके शब्द गूँज उठे, आकाशमें स्थित देवता फूलोंकी वर्षा तथा भूतलपर विद्यमान यादव जय - जयकार करने लगे । ' समराङ्गण-में सौ अक्षौहिणी सेनाके साथ भूतलको कम्पित करते हुए महाबली अनिरुद्ध आ पहुँचे हैं । यह देख कौरव योद्धा भयसे भागने लगे । प्रलयकालके समुद्रकी भाँति उमड़ती हुई अन्धकवंशियोंकी उस विशाल वाहिनीको देखकर वैश्यलोग डरके मारे भाग गये । घर - घरमें अर्गला लग गयी । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्रीसमुदाय दुर्योधनको कोसते और गाली देते हुए घरसे निकल गये तथा रोदन करने लगे ॥१–११ ॥ तदनन्तर मूर्च्छा छोड़कर दुःशासनका बड़ा भाई दुर्योधन तत्काल सोकर उठे हुएके समान जाग उठा । उस समय यादव सेनापर उसकी दृष्टि पड़ी । यादवकी वह विशाल सेना देखते ही दुर्योधन आशङ्कित हो गया और डरके मारे पैदल ही अपने नगरमें चला गया । कर्ण, भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भूरि और दुर्योधन आदिने सभाभवनमें जाकर धृतराष्ट्रको नमस्कार करके सारा हाल कह सुनाया । अपने पक्षकी पराजय यादवोंकी विजय तथा श्रीकृष्णका शुभागमन सुनकर राजाने विदुरसे पूछा ॥ १२–१५ ॥ धृतराष्ट्र बोले- वीर! सौ अक्षौहिणी सेना लेकर
क्रोधसे भरे हुए वासुदेव श्रीकृष्ण यहाँ चढ़ आये हैं ।
ऐसी दशामें हमलोग क्या करें । यह बताओ! ॥ १६ ॥
महाराज धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर विदुर ठहाका मारकर हँस पड़े और बोले ॥ १६३ ॥
विदुरने कहा- महाराज! पहले तो अकेले बलरामजी ही कुपित होकर आये थे, जिन्होंने हस्तिनापुरीको हलसे खींचकर गङ्गाकी ओर झुका
पृष्ठ 534
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५२८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड दिया । अब उन्हींके भाई आ पहुँचे हैं, जिन्होंने देवकीके हृदय - कमल - कोषसे अवतार ग्रहण किया है । वे श्रीकृष्ण साक्षात् श्रीहरि हैं । राजन्! जिन्होंने युद्धमें कंस और शकुनि आदि बहुत - से दैत्योंको मार गिराया तथा अनेकानेक नरेशों एवं देवताओंको भी परास्त किया है । इसलिये महाराज! देखिये, हमारे लिये यह युद्धका समय नहीं है । आप कौरवोंद्वारा श्यामकर्ण अश्व श्रीकृष्णको लौटा दीजिये । इससे कौरवों और यादवोंका विनाशकारी युद्ध नहीं होगा ॥१७- २०३ ॥ अपने भाई विदुरके इस प्रकार समझानेपर बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने कौरवोंसे यह देशकालोचित बात कही ॥२१ ॥
धृतराष्ट्र बोले — तुमलोग श्रीकृष्णके निकट जाकर घोड़ा लौटा दो । देवाधिदेव श्रीहरिके सामने युद्ध करना तुम्हारे बलबूतेके बाहर है । श्रीहरि यादवों-की सहायताके लिये कुपित होकर आये हैं, तुम धीरेसे उनके निकट जाकर उन्हें प्रसन्न करो ॥ २२-२३३ ॥ कौरवेन्द्रका ऐसा आदेश सुनकर समस्त कौरव भयभीत हो गये । वे गन्ध, अक्षतसहित दिव्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न आदि विविध उपचार लेकर बलराम और श्रीकृष्णके पवित्र नामोंका कीर्तन करते हुए सब - के - सब श्रीकृष्णके दर्शनार्थ पैदल ही गये । कौरवोंको आया देख यादव क्रोधसे भर गये और उन्होंने शीघ्र ही युद्धके लिये नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र ले लिये । तब समस्त कौरवोंने उनसे कहा हमलोग - युद्धके लिये नहीं आये हैं । हम भगवान् श्रीकृष्णका शुभ दर्शन करेंगे, जो समस्त दुःखोंका नाश करनेवाला है ॥ २४–२८ ॥ उनकी यह बात सुनकर यादवोंको आश्चर्य हुआ । उन्होंने कौरवोंकी वह सारी चेष्टा भगवान् श्रीकृष्णको १. पूर्वं द्रोण उवाचाथ कृष्ण भद्र जगत्पते । २. कृपाचार्य उवाच— मज्जन्मनः फलमिदं मधुकैटभारे मत्प्रार्थनीयमदनुग्रह एष एव । ३. कर्ण उवाच-भक्तस्यार्थे धनं क्षीणं स्वदारागतयौवनम् । ४. भूरिरुवाच-याचामहे वरद किंचिदनन्यलभ्यं नाथ प्रसीद सुमुखी यदि दिव्यदृष्टिः । बतायी । नरेश्वर! तब श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर उन श्रेष्ठ यादव वीरोंने निहत्थे आये हुए कौरवोंको प्रेमपूर्वक बुलाया । श्रीकृष्णके बुलानेपर वे उनके पास गये । उन सबके मुख लज्जासे नीचेको झुके हुए थे । उन्होंने पृथक् - पृथक् प्रणाम करके कहा ॥ २ ९ –३१ ॥ सबसे पहले आचार्य द्रोण बोले- जगदीश्वर श्रीकृष्ण! भद्र! मेरी रक्षा कीजिये । आपकी मायासे मोहित हुए इन कौरवोंको भी बचाइये ॥३२ ॥
कृपाचार्य बोले - मधुसूदन! कैटभनाशन लोकनाथ मेरे जन्मका यही फल है, यही हमारी प्रार्थनीय वस्तु है और यही मुझपर आपका अनुग्रह है कि आप मुझे अपने भृत्यके भृत्यके परिचारकके दासके – दासके दासका - दास मानकर इसी रूपमें याद रखें ॥३३ ॥
कर्णने कहा- माधव! मेरा धन अपने भक्तके लिये क्षीण हो, अर्थात् उन्हींके काम आवे । मेरा यौवन अपनी ही पत्नीके उपयोगमें आवे तथा मेरे प्राण अपने स्वामीके कार्यमें ही चले जायँ और अन्तमें आप मेरे लिये प्राप्तव्य वस्तुके रूपमें शेष रहेंरे ॥३४ ॥
भूरि बोले- वरद! नाथ! हम आपसे कोई ऐसी वस्तु माँग रहे हैं जो दूसरोंसे नहीं मिल सकती । यदि आपकी मुझपर सुमुखी दिव्य दृष्टि है तो वही दीजिये । देव! हमने आज विवश होकर आपके सामने यह अञ्जलि बाँधी है । जन्मान्तरमें भी मेरी यह अञ्जलि आपके सामने इसी प्रकार बँधी रहे ॥ ३५ ॥
दुर्योधनने कहा- मैं धर्मको जानता हूँ, किंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है । मैं पापको भी समझता हूँ, किंतु उससे निवृत्त नहीं हो पाता हूँ । कोई देवता मेरे हृदयमें बैठकर मुझे जिस काममें लगाता है, मैं वही काम करता हूँ । मधुसूदन! यन्त्रके गुण - दोषसे रक्ष मां कौरवान् रक्ष मायया तव मोहितान् ॥३२ ॥
त्वद्भृत्यभृत्यपरिचारकभृत्यभृत्यभृत्यस्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ ॥ स्वामिकार्ये गताः प्राणा अन्ते तिष्ठ माधवः ॥ ३४ ॥
अस्माभिरञ्जलिरयं विवशैर्निबद्ध एषैव मे भवतु देव भवान्तरेऽपि ॥ ३५ ॥
पृष्ठ 535
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ५० ] कौरवोंकी प्रभावित न होकर मुझे क्षमा कीजिये । मैं यन्त्र हूँ और आप यन्त्री हैं ( गुण - दोषका उत्तरदायी यन्त्री ही होता है, यन्त्र नहीं । ), अतः आप मुझे दोष न दीजियेगा ॥ ३६-३७ ॥ भीष्म बोले- योगीन्द्र! जिन्हें गोपियोंने रागान्ध होकर चूमा है, योगीन्द्र और भोगीन्द्र ( शेषनाग जिनका मनसे सेवन करते हैं तथा जो कुछ - कुछ लाल कमलके समान कोमल हैं, उन्हीं आपके इन चरणोंके लिये मेरी यह अञ्जलि जुड़ी हुई है २ ॥ ३८ ॥
विदुरने कहा- जो लोग छोटे बालककी भाँति ब्रह्मका परिपालन करते हैं, अर्थात् जैसे माता - पिता बच्चेकी सदा सँभाल रखते हैं, उसी तरह जो निरन्तर ब्रह्म - चिन्तनमें लगे रहते हैं, उनके शुभाशुभ कर्म वैसे ही हैं, जैसे बेचनेवालोंकी वस्तुएँ । तात्पर्य यह है कि जैसे बिकी हुई वस्तुपर विक्रेताका स्वत्व नहीं होता उसी प्रकार अपने द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मपर ब्रह्मनिष्ठ पुरुष अहंता - ममताका भाव नहीं रखते हैं । ( अतः उनके वे कर्म बन्धनकारक नहीं होते हैं । ) ब्रह्म कैसा है? इसके उत्तरमें इतना ही कहा जा सकता है कि वह दैत्य, देवता और मुनियोंके लिये मनसे भी अगम्य है । वेद ' नेति नेति ' कहकर उसका वर्णन करता है । किंतु उसको जान नहीं पाता । ( प्रभो! वह ब्रह्म आप ही हैं ) ३ ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत पराजय ५२ ९ श्रीगर्गजी हैं— राजन्! शरणमें आये हुए कौरवोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें उनसे बोले ॥ ४० ॥
श्रीकृष्णने कहा – आर्य पुरुषो! मेरी बात सुनिये । मैं नारदजीसे प्रेरित होकर यहाँ युद्ध रोकनेके लिये ही आया हूँ । मेरे पुत्र निरङ्कुश ( स्वच्छन्द ) हो गये हैं, अतः मेरी आज्ञा नहीं मानते हैं । । ये बड़े - बड़े लोगोंका अपराध कर बैठते हैं, जो बड़ा भारी दोष है । आपलोग धन्य और माननीय हैं कि हमसे मिलनेके लिये आये हैं । मेरे पुत्रोंने जो कुछ किया है वह सब आपलोग क्षमा कर दें । वीरो! उग्रसेनका घोड़ा आपलोग कृपापूर्वक छोड़ दें और इसकी रक्षा करनेके लिये आपलोग भी चलें, अवश्य चलें । यादव और कौरव तो मित्र हैं । पहलेसे चले आते हुए प्रेम - सम्बन्धको दृष्टिमें रखकर इन्हें आपसमें कलह नहीं करना चाहिये ॥ ४१–४५ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने जब मीठे वचनोंद्वारा संतोष प्रदान किया तब कौरवोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुमूल्य भेंट सामग्रीसहित अश्वको लौटा दिया । राजन्! घोड़ा लौटाकर अन्य सब कौरव तो मन - ही - मन खेदका अनुभव करते हुए अपने नगरमें चले गये । परंतु भीष्मजीने यादव सेनाके साथ अश्वकी रक्षा के लिये जानेका विचार किया ॥ ४६-४७ ॥ अश्वमेधखण्डमें ' हस्तिनापुर - विजय ' नामक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
१. दुर्योधन उवाच—
जानामि धर्म न च मे प्रवृत्तिर्जानामि पापं न च मे निवृत्तिः ।
केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥ ३६ ॥
यन्त्रस्य गुणदोषेण क्षम्यतां मधुसूदन ।
अहं यन्त्रो भवान् यन्त्री मम दोषो न दीयताम् ॥ ३७ ॥
२. भीष्म उवाच -रागान्धगोपीजनचुम्बिताभ्यां योगीन्द्रभोगीन्द्रनिषेविताभ्याम् ।
आताम्रपङ्केरुहकोमलाभ्यां ताभ्यां पदाभ्यामयमञ्जलिर्मे ॥ ३८ ॥
३. विदुर उवाच -आस्तेऽतिविक्रयकृतां सुकृतानि तानि ये ब्रह्म बालमिव तत्परिपालयन्ति ।
पृष्ठ 536
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इक्यावनवाँ अध्याय यादवोंका द्वैतवनमें राजा युधिष्ठिरसे मिलकर घोड़ेके पीछे - पीछे अन्यान्य देशोंमें जाना तथा अश्वका कौन्तलपुरमें प्रवेश श्रीगर्गजी कहते हैं – नृपेश्वर! तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण यादवोंकी रक्षा करके सबसे मिल - जुलकर रथके द्वारा कुशस्थलीपुरीको चल दिये । उनके चले जानेपर अनिरुद्धने अश्वका यत्नपूर्वक पूजन किया और विजययात्राके लिये पुनः उसे बन्धनमुक्त कर दिया । छूटनेपर वह घोड़ा अनेकानेक देशोंको देखता हुआ तीव्र गतिसे आगे बढ़ा । राजेन्द्र! उसके पीछे वृष्णिवंशी यादव भी वेगपूर्वक चले । दुर्योधनकी पराजय सुनकर दूसरे दूसरे भूपाल महाबली श्रीकृष्णके भयसे अपने राज्यमें आनेपर भी उस घोड़ेको पकड़ न सके ॥ १ - ४ ॥ तदनन्तर यज्ञका वह घोड़ा इधर - उधर देखता सुनता हुआ द्वैतवनमें जा पहुँचा, जहाँ राजा युधिष्ठिर भाइयों और पत्नीके साथ वनवास करते थे । उस द्वैतवनमें भीमसेन प्रतिदिन हाथियोंके समुदायोंके साथ उसी तरह क्रीडा करते थे, जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है । उन्होंने वहाँ उस घोड़ेको देखा । वह वन बड़ा ही विशाल और घना था । बरगद, पीपल, बेल, खजूर, कटहल, मौलसिरी, छितवन, तिन्दुक, तिलक, साल, तमाल, बेर, लोध, पाटल, बबूल, सेमर, बाँस और पलाश आदि वृक्षोंसे भरा था । उस दुर्जर - निर्जन वनमें, जहाँ सूअर, हिरण, व्याघ्र, भेड़िये और सर्प रहते थे, जहाँ झींगुरोंकी झीनी झनकार गूँजती रहती थी, जिसमें गीध और चील आदि पक्षी रहा करते थे, बाँबीसे आधा शरीर निकाले हुए अगणित सर्प भरे थे; सियार, वानर, भैंसे, नीलगाय, आदि जिसे वनकी शोभा बढ़ाते थे तथा राजन्! गवय, हाथी, भालू, बिलाव और वनमानुष आदिके रहनेसे जो बड़ा भयंकर प्रतीत होता था, उस वनमें उस घोड़ेको आया हुआ देख भयानक पराक्रमी भीमसेनने उसका केश पकड़ लिया । नरेश्वर! भालपत्रसहित उस अश्वको अनायास ही काबूमें करके ' किसने इसे छोड़ा है ' – ऐसी - बात कहते हुए वे उसे लेकर धीरे - धीरे आश्रमकी ओर चले ॥५- १३३ ॥ राजन्! उसी समय उस वनमें यज्ञ - सम्बन्धी अश्वका बड़े कष्टसे अवलोकन करते हुए अनिरुद्ध आदि समस्त यादव वहाँ आ पहुँचे । घोड़ेको पकड़ा गया देख वे आपसमें कहने – ' अहो! यह वनेचर तो भीमसेनके समान दिखायी देता है । बड़ी - बड़ी बाँहें, अत्यन्त पुष्ट शरीर, बहुत ऊँचा कद, लाल आँखें और महान् गौरवर्ण - सब उन्हींके समान हैं । यह कठिनाइयोंको झेलनेमें समर्थ है । इसके सारे अङ्गमें धूल लिपटी हुई है तथा इसने भीमकी ही भाँति गदा भी ले रखी है । ' परस्पर ऐसी बातें कहते हुए वे सब लोग फिर उस वनेचरसे बोले ॥ १४ – १७ ॥ ' अरे भाई! तुम कौन हो? राजाधिराजके इस अश्वको लेकर कहाँ जाओगे? अतः शीघ्र इसे छोड़ दो, नहीं तो हमलोग तुम्हें बाणोंसे मारेंगे ' ॥ १८ ॥
उनकी यह बात सुनकर भीमने घने जंगलमें घोड़ेको बाँध दिया और दस हजार भार लोहेकी बनी हुई अपनी भारी गदा लेकर वे उनके सामने गये । पराक्रमी भीमने संग्राममें यादव - सैनिकोंको गदासे मारना आरम्भ किया । भीमकी चोट जिनपर पड़ गयी, वे सब यादव वहीं ढेर हो गये । उस वनेचरका पराक्रम देख अनिरुद्ध कुपित हो उठे । उन्होंने अपने उस शत्रुके ऊपर एक हजार मतवाले हाथी हाँक दिये । वे हाथी क्या थे, दिग्गज थे और पर्वतके शिखरके समान दिखायी देते थे । उन्होंने भीमसेनको पृथ्वीपर पटक दिया और दाँतोंसे दबाना आरम्भ किया । यह देख भीमसेन सहसा उठकर खड़े हो गये और क्रोधसे उनके ओठ फड़कने लगे । उन्होंने अपनी वज्र - सरीखी गदासे उन मतवाले हाथियोंको पीटना आरम्भ किया । किन्हींको उठाकर आकाशमें फेंक दिया और कितनोंको वहीं पृथ्वीपर दे मारा । कुछ हाथियोंको उन्होंने पैरोंसे
पृष्ठ 537
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ५१ ] अश्वका कौन्तलपुरमें प्रवेश मसल दिया और कितनोंको उठाकर दूसरे हाथियोंपर फेंक दिया । फिर तो सारे हाथी भयसे व्याकुल हो भागने लगे ॥१ ९ –२४३ ॥ तब अत्यन्त कुपित हो गदाधारी गद वहाँ आ पहुँचे । निकट जाकर उन्होंने भीमसेनको पहचान लिया । फिर भी मनमें शङ्का बनी रही । अतः उन्होंने नमस्कार करके पूछा — ' हे वीर! तुम कौन हो? यह मेरे सामने ठीक - ठीक बताओ ' ॥ २५-२६ ॥ वे बोले - ' हे गद! मैं भीमसेन हूँ । हमारे शत्रु दुर्योधनने हमें जुए में जीतकर नगरसे निकाल दिया । यहाँसे एक योजनकी दूरीपर भाइयोंसहित युधिष्ठिर वनवास करते हैं । देखो न, यह भगवान्की कैसी विचित्र माया है । वनमें निवास करते हुए आठ वर्ष बीत गये हैं । अभी चार वर्ष शेष हैं । इसके बाद हमें पुनः एक वर्षतक अज्ञातवास करना होगा । अर्जुन इन्द्रके बुलानेसे स्वर्गलोकमें गये हैं । मैं नहीं जानता कि वे इस भूतलपर कबतक लौटेंगे । गद! तुम हमें यादवका कुशल- समाचार बताओ । यह किस राजाका घोड़ा है? और तुमलोग किसलिये यहाँ आये हो? ' ऐसा कहकर भीमसेन दुर्योधनके दिये हुए क्लेशोंको याद करके दुःखी हो अश्रुधारा बहाते हुए रोने लगे ॥ २७ – ३२ ॥ उनकी ये बातें सुनकर गद भी दुःखी हो गये और भीमको आश्वासन देकर उन्होंने सारी बातें विस्तारपूर्वक कह सुनायीं । वह सब सुनकर भीमसेनको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे अनिरुद्ध आदि श्रेष्ठ यादव-वीरोंको साथ लेकर धर्मनन्दन युधिष्ठिरके समीप गये । राजन्! यादवोंका आगमन सुनकर अजातशत्रु युधिष्ठिरको बड़ा हर्ष हुआ और वे नकुल आदिके साथ उनकी अगवानीके लिये आश्रमसे बाहर निकले । नरेश्वर! समस्त यादवोंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और युधिष्ठिरने उन्हें उत्तम आशीर्वाद दे बड़ी प्रसन्नताके साथ उन सबको द्वैतवनमें ठहराया । राजा युधिष्ठिरने सूर्यदेवकी दी हुई बटलोईके प्रभावसे वहाँ ५३१ आये हुए सब अतिथियोंको यथायोग्य उनकी रुचिके अनुरूप भोजन दिया । परंतप! वहाँ एक रात रहकर प्रातःकाल प्रद्युम्रकुमार अनिरुद्ध पाण्डवोंको यज्ञका निमन्त्रण दे, घोड़ेको मुक्त कराकर यादवोंके साथ वहाँसे शीघ्र चल दिये और घोड़ेके पीछे - पीछे सारस्वत - देशोंमें गये ॥ ३३–३९ ॥ राजन्! बहुत - से वीर- विहीन देशोंको छोड़कर वह अश्वराज इच्छानुसार विचरता हुआ कौन्तलपुरमें गया । महाराज । उस नगरमें ' चन्द्रहास ' नामक वैष्णव राजा राज्य करता था, जो केरल - देशके राजाका पुत्र था और कुलिन्दने उसका पालन किया था । वह भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे वहाँ राज्य करता था । राजन्! भक्त चन्द्रहासकी कथा ' जैमिनी महाभारत ' में वर्णित है । नारदजीने अर्जुनके सामने चन्द्रहासके जीवनवृत्तका विस्तारपूर्वक वर्णन किया था । उस कौन्तलपुरमें सब लोग श्रीकृष्णके भक्त होकर रहते हैं । वे सब - के - सब ब्राह्मणभक्त, पुण्य-परायण, परस्त्रीपराङ्मुख, अपनी ही पत्नीमें अनुराग रखनेवाले तथा सतत श्रीकृष्णकी समाराधनामें संलग्न रहनेवाले थे । वे गोविन्दकी गाथाएँ और पुराण - कथा सुनते तथा बड़े आनन्दसे श्रीराधा और माधवके नाम जपते थे । वहाँके द्विज दो ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण करते, तुलसीकी मालाएँ पहनते और गोपीचन्दन, केसर तथा हरिचन्दनसे चर्चित रहते थे । वे सब ललाटमें श्याम- बिन्दु धारण करते, उनमें से कोई -ही-कोई ऐसे थे, जो श्रीतिलक लगाते थे । वहाँके सभी वैष्णव बारह तिलक और आठ मुद्राएँ धारण करते थे । ब्राह्मण आदि वर्णके गृहस्थलोग प्रतिदिन प्रातः काल गोपीचन्दनसे युक्त शीतल मुद्रा धारण करते थे । कोई - कोई विरक्त और संन्यासी साधु अग्निसंस्कार के लिये तप्तमुद्रा धारण करते थे । उस नगरमें इधर-उधर देखता हुआ वह घोड़ा राजभवनमें जा पहुँचा, जहाँ राजा चन्द्रहास चन्द्रमाके समान शोभा पाता था ॥ ४०–५० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अश्वका कौन्तलपुरमें गमन ’ नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥
पृष्ठ 538
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बावनवाँ अध्याय श्यामकर्ण अश्वका कौन्तलपुरमें जाना और भक्तराज चन्द्रहासका बहुत - सी भेंट - सामग्री के साथ अश्वको अनिरुद्धकी सेवामें अर्पित करना और वहाँसे उन श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! वहाँ आये हुए घोड़ेको देखकर व्रजचन्द्र श्रीकृष्णके दास राजा चन्द्रहासने उसे तत्काल पकड़ लिया और प्रसन्नता -पूर्वक उसके भालपत्रको पढ़ा । नरेश्वर! उस पत्रको पढ़कर उस महाभगवद्भक्त नरेशने कहा- ' अहो! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं आज भगवान् श्रीकृष्णके पौत्रको अपने नेत्रोंसे देखूँगा । पता नहीं, पूर्वकालमें मेरे द्वारा कौन - सा ऐसा पुण्य बन गया है, जिससे मुझे श्रीकृष्णतुल्य यदुकुलतिलक अनिरुद्धके दर्शनका अवसर मिल रहा है । मैंने आजतक मायासे मानव-शरीर धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन नहीं किया है । इसलिये मैं प्रद्युम्नकुमारके साथ द्वारका जाऊँगा और वहाँ श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न तथा उन महाराज उग्रसेनका भी दर्शन करूँगा, जो भगवान् श्रीकृष्णसे भी पूजित हैं॥१–४३ ॥ - ऐसा कहकर राजा चन्द्रहास गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि उपचार, दिव्य वस्त्र, दिव्य रत्न और उस घोड़े को भी साथ लेकर माला - तिलकसे सुशोभित समस्त पुरजनों सहित अनिरुद्धका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर निकला । गीत और बाजोंकी मङ्गलमयी ध्वनिके साथ राजा पैदल ही गया ॥ ५–७ ॥ नरेश्वर! नागरिकों सहित राजाको आया देख अनिरुद्धको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे मन्त्री उद्धवजीसे पूछने लगे ॥८ ॥
अनिरुद्धने कहा - महामन्त्रिन्! यह कौन राजा है, जो समस्त पुरवासियोंके साथ हमसे मिलनेके लिये आया है? आप इसका वृत्तान्त हमें बतावें ॥९ ॥
उद्धव बोले- प्रद्युम्न कुमार! यह केरलके राजाका पुत्र ‘ चन्द्रहास ' नामक नरेश है । इसके माता -पिता बचपनमें ही परलोकवासी हो गये; अतः कुलिन्द ने इसका पालन किया है । यह बाल्यावस्थासे ही भगवान् श्रीकृष्णका भक्त है और उन्होंने ही इसकी रक्षा की है । दुष्टबुद्धिवाले मन्त्रीकी पुत्रीके साथ सबका प्रस्थान इसने विवाह किया है । कुन्तल - देशके राजा इसे अपना राज्य देकर वनमें चले गये थे । उस राजाका वृत्तान्त मैंने द्वारकामें श्रीकृष्णके ही मुखसे सुना था । उसे दर्शन देनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं यहाँ पधारेंगे ॥ १० - – १२ १२३ ॥ उद्धवकी यह बात सुनकर यादवप्रवर अनिरुद्ध चकित हो गये । समस्त पुरवासियोंसे घिरे हुए राजा चन्द्रहासने अनिरुद्धके निकट जाकर श्यामकर्ण घोड़ा दिया और प्रसन्नतापूर्वक बहुत धन - राशि भी भेंट की । पचास हजार हाथी, एक लाख रथ, एक करोड़ घोड़े, एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ, एक हजार गवय, एक हजार शिबिकाएँ, दस लाख धेनु, दस हजार प्रत्यञ्चा, एक करोड़ भर सोना, चार करोड़ भर चाँदी और एक लाख आभूषण - उस राजाने माधव अनिरुद्धको भेंटमें दिये ॥ १३–१७ ॥ चन्द्रहासने कहा— जो समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ, श्रीकृष्णपौत्र, लोकेश्वर, प्रद्युम्नपुत्र, यदुकुलतिलक तथा पूर्ण परमात्मदेव हैं, उन अनिरुद्धको बारंबार मेरा नमस्कार है ॥ १८ ॥
भक्तका यह वचन सुनकर प्रसन्न हुए प्रद्युम्नकुमारने उसकी प्रशंसा करके उसे एक देदीप्यमान रत्नमाला अर्पित की । राजेन्द्र! चन्द्रहासने अपने राज्यपर मन्त्रीको नियुक्त करके अपने नगरसे यादवोंके साथ जानेका विचार किया । वे समस्त श्रेष्ठ यादव उस नगरमें एक रात रहकर प्रातः काल चन्द्रहासके साथ वहाँसे प्रस्थित हो गये । भालपत्रसे सुशोभित घोड़ा उनके आगे - आगे चला और सैकड़ों आवर्ती ( भँवरों ) से व्याप्त ' सप्तवती ' के पास जा पहुँचा । वह नदी अपनी तरङ्गोंसे तटभूमिको तोड़ रही थी । उसका वेग बहुत प्रबल था और उसे पार करना सबके लिये कठिन था । उसके किनारे बहुत - सी नौकाएँ बँधी थीं । उस नदीका दर्शन करके वीर प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धने सौ अक्षौहिणी सेनाके साथ उसके पार जानेका विचार
पृष्ठ 539
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ५३ ] उद्धवकी सलाहसे समस्त यादवोंका द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान ५३३ किया ॥ १ ९ –२३ ॥ नृपश्रेष्ठ! अनिरुद्ध पहले साम्ब आदिसे घिरकर हाथीपर सवार हुए और नाव छोड़कर उन्होंने नदीके जलमें प्रवेश किया । पहले तो उसका जल उस सेनासे मथित होकर गँदला हो गया । फिर वह नदी पङ्किल भूमिमात्र रह गयी । यह विचित्र घटना घटित हुई । समस्त यादव हँसते हुए बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ २४-२६ ॥ तदनन्तर वह घोड़ा धीरे - धीरे आगे बढ़ा और जाते - जाते जहाँ सिन्धु नदी एवं समुद्रके मध्यमें नारायण-सरोवर है, वहाँ पहुँच गया । वह प्याससे व्याकुल हो रहा था । उसने उस तीर्थका जल पिया । इतनेमें ही अनिरुद्ध आदि समस्त यादव वहाँ आ गये । उन्हें मार्गमें धर्मद्वेषी नीच म्लेच्छोंसे लोहा लेना पड़ा और उन्हें परास्त करके वे वहाँ आये थे । वहाँ घोड़ेको देखकर उन सबने नारायण सरोवरमें स्नान किया ॥ २७ - २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥
तिरपनवाँ अध्याय उद्धवकी सलाहसे समस्त यादवोंका द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्धकी प्रेरणासे उद्धवका पहले द्वारकापुरीमें पहुँचकर यात्राका वृत्तान्त सुनाना श्रीगजी कहते हैं - महाराज! राजा उग्रसेनका घोड़ा बड़े - बड़े वीर नरेशोंका दर्शन करता तथा भारतवर्षमें विचरता हुआ अन्यान्य राज्योंमें गया । प्रजानाथ! इस तरह भ्रमण करते हुए उस अश्वको बहुत काल व्यतीत हो गया और फाल्गुनका महीना आ पहुँचा, जो सबको घरकी याद दिलानेवाला है । फाल्गुन मास आया हुआ देख अनिरुद्ध शङ्कित हो गये और बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर उद्धवसे बोले ॥ १-३ ॥ अनिरुद्धने कहा - मन्त्रिप्रवर! यादवराज उग्रसेन चैत्रमें ही यज्ञ करेंगे । हमलोग क्या करें? अब अधिक दिन शेष नहीं रह गये हैं । इस भूतलपर अश्वका अपहरण करनेवाले राजा कितने शेष रह गये हैं, मैं सुनना चाहता हूँ । आप शीघ्र उनके नाम बतावें ॥ ४-५ ॥ उद्धव बोले- हरे! अब भूतलपर या आकाशमें अश्वका अपहरण करनेवाले शूरवीर शेष नहीं रह गये हैं । इसलिये अब तुम सोनेके हारोंसे अलंकृत द्वार-वाली यादवोंकी द्वारकापुरीको चलो ॥ ६ ॥
उनकी यह बात सुनकर अनिरुद्धको बड़ा हर्ष हुआ । राजन्! अनिरुद्धने अश्वके आगे भी उद्धवजीकी कही हुई बात दोहरायी । इस प्रकार अनिरुद्धका कथन सुनकर वह सर्वज्ञ अश्व उसी तरह शीघ्रतापूर्वक द्वारका -को चल दिया, जैसे लङ्कासे लौटे हुए हनुमान्जी बड़े वेगसे किष्किन्धापुरीमें आये थे । नरेश्वर! उसके पीछे-पीछे भानु और साम्ब आदि शूरवीर वायु तथा मनके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा दौड़ने लगे । उन सब लोगों-ने अश्वके अपहरणकी आशङ्कासे उसको पकड़कर सोनेकी रस्सियोंसे बाँध दिया और उसे सेनाके बीचमें करके अपनी पुरीकी ओर प्रस्थान किया॥७–१० ॥ गाजे - बाजेकी आवाजके साथ दुन्दुभियाँ बजवाते, पृथ्वीको कम्पित करते तथा दुष्ट शत्रुओंके मनमें त्रास भरते हुए यादवगण आगे बढ़ रहे थे । यादवोंके साथ जाते हुए उस घोड़ेको देखकर नारदजी नया कलह या विवाद खड़ा करनेके लिये दूतकी भाँति इन्द्रके पास गये । उनके सामने घोड़ेका वृत्तान्त उन्होंने विस्तारपूर्वक कहा । राजेन्द्र! वह वृत्तान्त सुनकर इन्द्रने उस घोड़ेको चुरा ले जानेका विचार किया । वे शीघ्र ही अदृश्य होकर अश्वको देखनेके लिये भूतलपर आये । अहो! भगवान् विष्णुकी मायासे सब देवता भी मोहित रहते हैं । कुबेर, ब्रह्मा और इन्द्र आदि भी जब भगवान्की मायासे मोहित हो जाते हैं, तब भूतलके साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? इन्द्रने वहाँ जाकर वृष्णिवंशियोंकी सम्पूर्ण सेनाका निरीक्षण किया । वह सेना प्रलय कालके समुद्रकी भाँति भयंकर तथा करोड़ों
पृष्ठ 540
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५३४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड शूरवीरोंसे भरी हुई थी । यादवोंकी उस उद्भट एवं विशाल सेनाको देखकर इन्द्र डर गये । राजन्! श्रीकृष्णके भयसे देवेन्द्र अविलम्ब इन्द्रावतीपुरीको लौट गये । यह भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा थी, जिससे उन्होंने युद्धकी आशा छोड़कर चुपचाप बैठ रहनेकी नीति अपनायी ॥ ११–१७ ॥ अनेक चतुरङ्गिणी टुकड़ियोंसे युक्त हो यात्रा करती हुई महात्मा अनिरुद्धकी वह विशाल सेना हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदल वीरोंके द्वारा स्वर्गलोकमें इन्द्रकी सेनाके समान सुशोभित हो रही थी । सम्पूर्ण हाथी अलग हो गये । रथ, घोड़े और पैदल भी अलग-अलग होकर चलने लगे । श्रीकृष्णके पुत्रगण हर्षोल्लाससे भरकर द्वारकाके पथका अनुसरण कर रहे थे । वे जम्बूद्वीपके विजेता थे और लोक - परलोक -दोनोंपर विजय पाना चाहते थे । राजन्! वे श्रेष्ठ यादव अग्रगामी वाहन - श्यामकर्ण अश्वको आगे करके भाँति-भाँतिके बाजे बजाते तथा नाच - गान आदि उत्सव करते हुए जा रहे थे ॥ १८-२१ ॥ नरेश्वर! साम्ब आदि श्रीकृष्णपुत्रों तथा इन्द्रनील एवं चन्द्रहास आदि सहस्रों भूपालोंसे विभूषित हो अनिरुद्धने आनर्तदेशमें प्रवेश करके साम्बकी अनुमतिसे उद्धवजीको द्वारका भेजा । अभी वह पुरी वहाँसे दो योजन दूर थी । उनके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो उद्धवजी उन रुक्मवतीकुमार अनिरुद्धको नमस्कार करके शीघ्र ही एक शिबिकापर आरूढ़ हुए और हर्षपूर्वक पुरीकी ओर चल दिये, जहाँ मुनियोंसे घिरे हुए महाराज उग्रसेन सभामण्डपसे भूषित श्रेष्ठ पिण्डारक क्षेत्रमें निवास करते थे । राजन्! जहाँ वसुदेव आदि, बलराम और श्रीकृष्ण आदि तथा बलवान् प्रद्युम्न आदि प्रतिदिन यज्ञकी रक्षा करते थे, वहाँ उद्धवजी राजसभामें गये । उन्होंने यादवेन्द्र उग्रसेनको प्रणाम करके वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण तथा प्रद्युम्न आदि समस्त उत्तम यादवोंको यथायोग्य प्रणाम किया और उनके सामने खड़े हो गये । उन्हें देखकर सबका मन प्रसन्न हो गया । फिर उनके पूछने-पर उद्धवने सब वृत्तान्त बताया ॥ २२–२८ ॥ उद्धव बोले- राजेन्द्र! आपका श्यामकर्ण अश्व निर्विघ्न लौट आया । अनिरुद्ध आदि श्रेष्ठ यादव भी कुशलपूर्वक आ गये हैं । गोविन्दकी कृपासे राजा इन्द्रनील और हेमाङ्गद आये हैं । स्त्रीराज्यकी साम्राज्ञी सुरूपा भी आ पहुँची है । भीषणसहित बक भी युद्धमें परास्त हुआ है । बिन्दु और अनुशाल्व - ये दो वीर अपने - अपने नगरसे पधारे हैं । ' पाञ्चजन्य ' नामक उपद्वीपमें असुरोंसहित बल्वलको जीत लिया गया है । उस युद्धमें भगवान् शंकरने रुष्ट होकर अनिरुद्ध और सुनन्दनका वध कर दिया था तथा और भी बहुतसे यादव मार डाले थे; किंतु भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ पहुँचकर समस्त यादवोंको जीवनदान दिया । अतः यह ध्यान देनेयोग्य है कि श्रीकृष्णकी कृपासे ही हम सब लोग सकुशल लौटे हैं । समस्त कौरव परास्त हो गये और भीष्मजी हमारे साथ ही यहाँ पधारे हैं । हमने द्वैतवनमें दुःखपीड़ित पाण्डवोंको देखा और व्रजमें श्रीकृष्णविरहसे व्याकुल गोपगणोंका भी दर्शन किया । जो बाल्यावस्थासे ही भगवान् श्रीकृष्णका भक्त है, वह राजा चन्द्रहास भी हमारे साथ यहाँ आया है । और भी बहुत - से भूपाल आपके भयसे यहाँ आये हैं ॥ २ ९ –३६ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— महाराज! उद्धवजीके मुखसे इस प्रकार श्रीकृष्णके गुणोंका गान सुनकर यादवेश्वर उग्रसेन प्रेमसे विह्वल हो कुछ बोल न सके । वे आनन्दके महासागरमें मग्न हो गये । उन्होंने उद्धवको मणिमय हार दिया । रत्न, वस्त्र, शिबिका, हाथी, घोड़े और रथ भी दिये । तब भगवान् श्रीकृष्णने शीघ्र ही उठकर हर्षोल्लाससे पूरित हो भरी सभामें मित्र उद्धवसे मिलकर उन्हें हृदयसे लगा लिया । इसके बाद हर्षसे भरे हुए उग्रसेनने गोविन्दसे कहा-' श्रीकृष्ण! तुम यादवोंके साथ अनिरुद्धको ले आनेके लिये जाओ ' ॥ ३७–४० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें अश्वमेधखण्डके अन्तर्गत ' उद्धवका आगमन ' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥५३ ॥