गर्ग संहिता — पृष्ठ 541–550

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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चौवनवाँ अध्याय वसुदेव आदिके द्वारा अनिरुद्धकी अगवानी; सेना और अश्वसहित यादवोंका द्वारकापुरीमें लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदिके द्वारा समागत नरेशोंका सत्कार श्रीगर्गजी कहते हैं - नरेश्वर! तदनन्तर उग्रसेनके आदेशसे वसुदेव आदि समस्त श्रेष्ठ यादव विजय- यात्रा से लौटे हुए अनिरुद्धको लानेके लिये द्वारकापुरीसे निकले । वे हाथी, घोड़ों, रथों और शिबिकाओंपर बैठे थे । नृपेश्वर! उनके साथ बलदेव, श्रीकृष्ण आदि, प्रद्युम्न आदि तथा उद्धव आदि हाथीपर आरूढ़ हो श्यामकर्ण अश्वको देखनेके लिये निकले । नृपश्रेष्ठ! श्रीकृष्ण और बलरामकी माताएँ, देवकी आदि नारियाँ विचित्र शिबिकाओंपर बैठकर नगरसे निकलीं भगवान् श्रीकृष्णकी जो रुक्मिणी और सत्यभामा आदि पटरानियाँ तथा सोलह हजार अन्य रानियाँ थीं, वे सब - की - सव शिबिकाओंपर आरूढ़ हो उन लोगोंके साथ गयीं । नृपेश्वर! बहुत - सी कुमारियाँ हाथियोंपर बैठकर लावा, मोती और फूलोंकी वर्षा करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक गयीं । पनिहारिनें ( पानी ढोनेवाली स्त्रियाँ ) जलसे भरे हुए कलश लेकर निकलीं । सौभाग्यवती ब्राह्मणपत्त्रियाँ गन्ध, पुष्प, अक्षत और दूर्वाङ्कुर लेकर गयीं । रूपवती वाराङ्गनाएँ सब प्रकारके शृङ्गारोंसे सुशोभित हो श्रीहरिके गुणोंका गान करती हुईं नृत्य करनेके लिये निकलीं । समस्त यादव शङ्खनाद, दुन्दुभियोंके शब्द और वेदमन्त्रोंके घोषके साथ एक गजराजको आगे करके गर्गाचार्य आदि मुनियोंसहित अपनी पुरीकी शोभा निहारते हुए गये । द्वारकापुरी ध्वजा - पताकाओंसे अलंकृत थी । उसकी सड़कों पर सुगन्धित जलका छिड़काव किया गया था । पुरीका प्रत्येक भवन केलेके खम्भों और बन्दनवारोंसे शोभित था । रत्नमय दीपों और भाँति-भाँतिके चँदोवोंसे द्वारकापुरी उद्दीप्त हो रही थी । वहाँकी दिव्य नारियाँ और दिव्य पुरुष सुनहरे रंगके पीताम्बर धारण किये नगरकी शोभा बढ़ाते थे । पक्षियोंके कलरव और अगुरुकी गन्धसे व्याप्त धूमजालसे श्रीकृष्णकी वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान सुशोभित थी॥१–११ ॥ इस तरह नगरीकी शोभा - सज्जाका अवलोकन करते हुए यादव शीघ्र उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ श्यामकर्ण अश्वसहित अनिरुद्ध सेनासे घिरे हुए विराजमान थे । उन गुरुजनोंको आये देख अनिरुद्ध अपने रथसे उतर गये और यज्ञ - सम्बन्धी अश्वको आगे करके अन्यान्य नरेशोंके साथ पैदल ही चलने लगे । पहले उन्होंने यदुकुलके आचार्य गर्गमुनिको नमस्कार किया । तत्पश्चात् वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण और अपने पिता प्रद्युम्नको प्रणाम करके वह अश्व उन्हें अर्पित कर दिया । उन सब लोगोंने प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण हृदयसे अनिरुद्धको शुभाशीर्वाद दिया और कहा – ' वत्स! तुमने बड़ा अच्छा किया कि समस्त शत्रुनरेशोंको जीतकर यज्ञ - सम्बन्धी अश्वको एक वर्षके भीतर ही यहाँ वापस ला दिया ' ॥१२- १५३ ॥ उन सबका यह वचन सुनकर अनिरुद्ध मेरी ओर देखते हुए बोले- ' विप्रवर! आपकी कृपासे ही मार्ग-मार्गमें और प्रत्येक युद्धमें बहुत - से शत्रुओंद्वारा पकड़ा जानेपर भी यह अश्व उनसे छुड़ा लिया गया है । गुरुके अनुग्रहसे ही मनुष्य सुखी होता है । इसलिये अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक गुरुदेवका पूजन करना चाहिये ॥ १६ – १८ ॥ इसके बाद अन्य सब भूपाल बलराम और श्रीकृष्णके समीप आये तथा सब लोगोंने प्रसन्न एवं प्रेममग्न होकर अलग - अलग बारी - बारीसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया । उन समस्त भूपालोंको नतमस्तक देख बलरामसहित श्रीकृष्णने चन्द्रहास, भीष्म, बिन्दु, अनुशाल्व, हेमाङ्गद और इन्द्रनील आदि सबको बड़े हर्षके साथ हृदयसे लगाया । अतः श्रीकृष्णभक्त बढ़कर दूसरा कोई इस भूतलपर नहीं है ॥ १ ९ –२१ ॥

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५३६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड नृपेश्वर! तदनन्तर उस यात्रासे विजयी होकर लौटे हुए अनिरुद्धको हाथीपर बिठाकर वसुदेवजी समस्त यादवों तथा मुदित पुत्र - पौत्रोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक कुशस्थलीपुरीमें गये । उस समय देवाङ्गनाएँ उन सबके ऊपर फूलों और मकरन्दोंकी वर्षा करने लगीं तथा हाथियोंपर बैठी हुई कुमारियोंने खीलों और मोतियोंकी वृष्टि की । वे सब लोग नृत्य, वाद्य, गीत और वेदमन्त्रोंके घोषसे सुशोभित हो, जिसकी सड़कोंपर छिड़काव किया गया था, उस द्वारकापुरीकी शोभा निहारते हुए पिण्डारक क्षेत्रमें गये । सब राजा यादवोंके उस देवदुर्लभ वैभवको देखकर आश्चर्यचकित हो अपने - अपने वैभवकी निन्दा करने लगे । उन्होंने यज्ञस्थलको भी देखा, जो घीकी सुगन्धसे भरे धूमजाल तथा ब्राह्मणोंके मन्त्रघोषसे व्याप्त था । फिर वहाँ असिपत्र - व्रतधारी यदुकुलतिलक महाराज उग्रसेनको भी उन्होंने देखा, जो देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी, जितेन्द्रिय, हृष्ट - पुष्ट और दीप्तिमान् थे । वे कुशासनपर बैठे बड़े सुन्दर लग रहे थे । उन्होंने नियम - निर्वाहके लिये आभूषण उतार दिये थे । हाथमें मृगका शृङ्ग ले रखा था और अपनी रानीके साथ मृगछालापर ही वे विराजमान थे, जो उक्त कुशासनके ऊपर बिछा था । महाराज उग्रसेन घृत, गन्ध और अक्षत आदिसे यज्ञ-मण्डपमें अग्निकी पूजा कर रहे थे । उनके साथ ऋषि-मुनि बैठे थे और उनके नेत्र धुआँ लगनेके कारण लाल हो गये थे ॥ २२ – २ ९ ॥ अनिरुद्ध आदि यादवोंने वाहनोंसे उतरकर यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको आगे करके बड़ी प्रसन्नताके साथ महाराजको पृथक् - पृथक् प्रणाम किया । इसके बाद यादवराज श्रीउग्रसेनने उन समस्त नरेशों और यादवोंका अपनी शक्तिके अनुसार यथायोग्य सम्मान किया । तत्पश्चात् अनिरुद्धने शीघ्रतापूर्वक नमस्कार करके, दोनों हाथ जोड़कर सबके सुनते हुए उन जम्बू-द्वीपके स्वामी महाराज उग्रसेनसे कहा ॥ ३०–३२ ॥ अनिरुद्ध बोले- महाराज! इनकी ओर देखिये । ये नरपतियोंमें श्रेष्ठ राजा इन्द्रनील बड़े प्रेमसे आपके चरणोंमें पड़े हैं; आप देवताकी भाँति इन्हें उठाइये । हेमाङ्गद, अनुशाल्व, बिन्दु, श्रीचन्द्रहास तथा ये देवव्रत भीष्मजी भी आपके समीप आये हैं; आप इनपर दृष्टिपात कीजिये । ये मेरे रक्षक जाम्बवतीनन्दन साम्ब पधारे हैं; इनकी ओर देखिये । श्रीरुद्रदेवने इनको और मुझको भी मार डाला था, किंतु परमात्मा श्रीकृष्णने हमें जीवनदान दिया । इसी तरह रुद्रद्वारा मारे गये और श्रीकृष्ण - कृपासे जीवित हुए, इन सुनन्दनपर भी दृष्टिपात कीजिये और अन्य समस्त यादवोंको भी देखिये, जो श्रीकृष्ण - कृपासे ही यहाँ लौटकर आये हैं । निर्विघ्न लौटे हुए इस यज्ञके घोड़ेको ग्रहण कीजिये तथा आपने युद्धके लिये जो तलवार दी थी, उसको

भी ले लीजिये । आपको नमस्कार है ॥ ३३ – ३७ ॥

अनिरुद्धका यह वचन सुनकर यादवराज उग्रसेन बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने उनकी प्रशंसा करके अन्यान्य नरेशोंको भी यथायोग्य आशीर्वाद दिया । फिर समस्त नरेशोंका पूजन करके वे देवव्रत भीष्मसे बोले— ' भीष्मजी! आइये और मेरे साथ हृदय - से - हृदय लगाकर मिलिये । ' यों कहकर यदुकुलतिलक उग्रसेनने उठकर उनका गाढ़ आलिङ्गन किया । इसके बाद दान- मानसे सम्मानित हुए वे राजा तथा यादव बड़ी प्रसन्नताके साथ द्वारकापुरीके विभिन्न गृहोंमें निवास करने लगे ॥ ३८–४० ॥ नरेश्वर! तदनन्तर अनिरुद्धको साम्ब आदिके साथ आया देख देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी तथा रुक्मवती आदि पूजनीया स्त्रियोंने उन्हें हृदयसे लगाकर बड़े हर्षका अनुभव किया । राजन्! सुरूपा, रोचना और ऊषा - इन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई । साम्बकी प्रशंसा सुनकर दुर्योधनकी पुत्री लक्ष्मणा नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाती हुई अत्यन्त हर्षका अनुभव करने लगी । नृपश्रेष्ठ! सेनासहित अनिरुद्धके लौट आनेसे द्वारकाके घर - घरमें मङ्गलोत्सव मनाया जाने लगा ॥ ४१–४४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' यज्ञ - सम्बन्धी अश्वका द्वारकामें आगमन ' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

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पचपनवाँ अध्याय व्यासजीका मुनि - दम्पति तथा राज- दम्पतियोंको गोमतीका जल लानेके लिये आदेश देना; नारदजीका मोह और भगवान्द्वारा उस मोहका भञ्जन; श्रीकृष्णकी कृपासे रानियोंका कलशमें जल भरकर लाना श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! तत्पश्चात् आठ द्वारोंसे युक्त, फहराती हुई पताकाओंसे सुशोभित, अग्निकुण्डोंसे सम्पन्न और आठ याज्ञिकोंसे युक्त रमणीय यज्ञमण्डपमें, जहाँ पलाश, बेल तथा बहुवारके यूप शोभा दे रहे थे, अनेकानेक वेदिकाओं तथा चषालों ( यज्ञस्तम्भोंके ऊपर लगे हुए काष्ठमय वलयों ) से जो विभूषित था तथा जिसमें स्रुवा, मृगचर्म, कुश, मूसल और उलूखल आदि वस्तुएँ संकलित थीं और इनके अतिरिक्त भी जहाँ बहुत - सी सामग्रियों और नाना प्रकारकी वस्तुओंका संग्रह किया गया था, राजर्षि उग्रसेन वेदोंके पारंगत महर्षियों तथा यादवोंके साथ वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे अमरावतीपुरीमें देवराज इन्द्र देवताओंके साथ सुशोभित होते हैं ॥ १-४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके आमन्त्रणपर नन्द आदि गोप, वृषभानुवर आदि श्रेष्ठ पुरुष तथा श्रीदामा आदि ग्वाल - बाल द्वारकापुरीमें आये । यशोदा, राधिका तथा अन्य सब व्रजाङ्गनाएँ शिबिकाओं और रथोंपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक कुशस्थलीमें आयीं । बुलावा जानेपर अपने पुत्रों और कौरवोंके साथ राजा धृतराष्ट्र भी वहाँ आये । अन्यान्य नरेश भी निमन्त्रण पाकर कुशस्थलीमें पधारे । श्रीकृष्णसे आमन्त्रित हो युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव अपनी पत्नी द्रौपदीके साथ वनसे वहाँ आये । श्रीकृष्णने नारदजीको भेजकर इन्द्र आदि आठ दिक्पालों, आठ वसुओं, बारह आदित्यों, चारों सनत्कुमारों, ग्यारह रुद्रों, मरुद्गणों, वेतालों, गन्धर्वों, किंनरों, विश्वेदेवों, समस्त साध्यगणों, विद्याधरों, देवताओं, देवपत्नियों, गन्धर्वियों और अप्सराओंको बुलवाया ॥५–११ ॥ राजन्! वे सब लोग श्रीकृष्णदर्शनकी अभिलाषासे द्वारकामें पधारे । कैलाससे सर्वमङ्गला पार्वतीके साथ भगवान् शिव भी बुलाये गये । सुतललोकसे दैत्य - समुदायके साथ प्रह्लाद और बलि आये । विभीषण, भीषण, मय और बल्वलका भी वहाँ आगमन हुआ । दंष्ट्राधारी वनजन्तुओंके साथ जाम्बवान् वानरोंके साथ हनुमान्, पक्षियोंके साथ पक्षिराज गरुड तथा सर्पोंके साथ नागराज वासुकि भी वहाँ पधारे । महाराज! धेनुओंके साथ धेनुरूपधारिणी धरा देवी भी उपस्थित हुईं । पर्वतोंके साथ मेरु और हिमालय, वृक्षोंके साथ बरगद, रत्नयुक्त रत्नाकर ( समुद्र ), नदियोंके साथ स्वर्धुनी ( गङ्गा ), समस्त तीर्थोंके साथ तीर्थराज प्रयाग और पुष्कर - ये सब आमन्त्रित होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उस यज्ञमें आये । फिर श्रीकृष्णके आवाहनपर व्रजभूमि भी वहाँ आ गयी ॥ १२ – १७ ॥ श्रीकृष्णका यज्ञोत्सव देखनेके लिये यमराजकी बहिन यमुनाजी भी आयीं ॥ १७३ ॥

उन सबको आया देख राजा उग्रसेनने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें यथायोग्य स्थानोंमें ठहराया । किन्हींको शिविरोंमें, किन्हींको मन्दिरोंमें, किन्हींको विमानोंमें और किन्हींको उपवनोंमें आवासस्थान दिया गया । उस यज्ञमें मैंने वेदव्यासजीको आचार्य बनाया और बकदाल्भ्यको ब्रह्मा तथा पहले जिन लोगोंको निमन्त्रित किया गया था, वे दिव्य ऋषि - महर्षि ऋत्विज् बनाये गये । नरेश्वर! इसके बाद यज्ञमें श्रीकृष्णकी इच्छासे अनिरुद्ध ब्रह्माका, चन्द्रमाका और अपना भी पृथक् - पृथक् रूप धारण करके तीन रूपोंमें सुशोभित हुए । प्रद्युम्रकुमारकी यह लीला देखकर देवता, यादव

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५३८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड और भूपगण आश्चर्यचकित हो परस्पर एक - दूसरेके कानमें इसी बातकी चर्चा करने लगे॥१८–२१३ ॥ व्यासजीने राजासे कहा – यादव श्रेष्ठ! मेरी बात सुनो । यहाँ जो राजा और ब्राह्मण यथायोग्य स्थानपर अलग - अलग बैठे हैं, इनमेंसे चौंसठ दम्पति गोमतीके तटपर मेरे आदेशके अनुसार यथोचित जल लानेके लिये जायँ । अदितिके साथ कश्यप, अरुन्धतीके साथ वसिष्ठ, कृपीके साथ द्रोणाचार्य, अनुसूयाके साथ अग्रि, रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णचन्द्र, रेवतीके साथ बलराम, मायावतीके साथ प्रद्युम्न, ऊषाके साथ अनिरुद्ध, सुभद्राके साथ अर्जुन, लक्ष्मणाके साथ साम्ब और अपनी - अपनी भार्याओंके साथ हेमाङ्गद आदि राजा भी जायँ ॥२२–२६३ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार व्यासजीके कहनेसे सपत्नीक ब्राह्मण और राजा पल्लव बाँधकर गोमतीका जल लानेके लिये गये । देवकी, रोहिणी, कुन्ती, गान्धारी और यशोदाको आगे करके रुक्मिणीसहित श्रीकृष्णने कलश उठाया । इसी प्रकार रेवतीके साथ बलराम तथा जो भी सपत्नीक भूपाल थे - उन सबने फूल और पल्लवोंसहित सोने - चाँदीके कलश लेकर गोमती तटको प्रस्थान किया । उस भीड़ में रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णको जाते देख नारदजी झगड़ा लगानेके लिये सत्यभामाके भवनमें गये । भगवान्‌की उस भार्याको घरमें अकेली देख उसके द्वारा आगमऩका कारण पूछे जानेपर वे बोले ॥ २७ - ३१ ॥ नारदजीने कहा— सत्राजितनन्दिनी! मैं देखता हूँ, इस घरमें तुम्हारा कोई आदर नहीं है । श्रीकृष्ण रुक्मिणीके साथ गोमतीका जल लानेके लिये गये हैं । बहुत - से लोग तुम्हारे पास याचना करने आते हैं । तुम स्वर्गसे पारिजात वृक्ष अपने यहाँ लानेमें सफल हुई हो । श्रीकृष्णके संकल्पको सिद्ध करनेवाली, स्यमन्तक मणिसे मण्डित तथा मानिनी हो । ऐसी तुम परमसुन्दरीको जो गरुडपर यात्रा कर चुकी है, छोड़कर श्रीकृष्ण रुक्मिणीके साथ शोभा देखनेके लिये चले गये । मा सत्यभामिनि! जिसके पुत्र प्रद्युम्न हैं और जिसके पौत्र अनिरुद्ध हैं, वह रुक्मिणी अपनी बात, मान और गौरवका सर्वोपरि प्रदर्शन करती है ॥ ३२-३५ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— ' महाराज! मेरे प्राणनाथ रुक्मिणीके साथ गये हैं ' – यह बात सुनकर सत्यभामाको बड़ा रोष हुआ । वे दुःखी होकर रोने लगीं । इसी समय नारदजीकी चेष्टा जानकर भगवान् श्रीकृष्ण एक रूपसे तत्काल सत्यभामाके भवनमें चले आये । उन सर्वज्ञ परमेश्वरने वहाँ आते ही यह बात कही— ' प्रिये! मैं उस समाज ( जुलूस ) में रुक्मिणीके साथ नहीं गया । भोजन करनेके लिये आ गया हूँ । केवल भौजीके साथ भैया बलरामजी गये हैं ' ॥३६–३९ ॥ उनकी यह बात सुनकर सत्यभामा प्रसन्न हो गयी और नारदजी भयभीत होकर उठे तथा दूसरे भवनमें चले गये । जाम्बवतीके घरमें जाकर उसके आगे सारा समाचार कहा । सुनकर वह हँसने लगी और बोली-' मुनिजी महाराज! झूठ मत बोलिये, श्रीनाथजी तो भोजन करके घरमें सो रहे हैं । ' यह सुनकर डरे हुए नारदजी तुरंत वहाँसे निकलकर मित्रबिन्दाके घरमें जा पहुँचे और चारों ओर देखते हुए बोले ॥ ४०– -४२३ ॥ नारदजीने कहा - मैया! जहाँ राजा और रानियोंका समाज जुटा है, वहाँ नहीं गयीं क्या? घरमें क्यों बैठी हो? वहाँ रमावल्लभ श्रीकृष्ण गोमतीका जल लानेके लिये जा रहे हैं । वे अपने साथ रुक्मिणी, सत्यभामा तथा जाम्बवतीको भी ले जायँगे ॥ ४३-४४ ॥ मित्रबिन्दा बोली- देवर्षिजी! केशवकी तो सभी प्यारी हैं । वे जिसको भी छोड़कर चले जायँगे, वही जीवित नहीं रह सकेगी । उधर घरमें देखिये, श्रीकृष्ण अपने पोतेको लाड़ लड़ा रहे हैं ॥ ४५ ॥

तब मुनि उठकर श्रीकृष्णपत्त्रियोंके सभी घरोंमें चक्कर लगाते रहे, परंतु उन सबमें उन्हें श्रीकृष्णकी उपस्थिति जान श्रीराधाको यह महलोंमें गये; साथ नन्दनन्दन देखकर देवर्षिने किया, त्योंही लिया और वहीं पड़ी । फिर सोच - विचारकर देवर्षि समाचार देनेके लिये गोपाङ्गनाओंके परंतु वहाँ श्रीराधा तथा गोपियोंके चौपड़ खेलते दिखायी दिये । उन्हें ज्योंही वहाँसे खिसक जानेका विचार श्रीकृष्णने तुरंत उन्हें हाथसे पकड़ बैठाया । फिर विधिवत् उनकी पूजा

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अध्याय ५६ ] राजाद्वारा यज्ञमें विभिन्न बन्धु बान्धवोंको भिन्न - भिन्न कार्योंमें लगाना ५३ ९ करके वे बोले ॥ ४६–४९ ॥ श्रीकृष्ण बोले- विप्रवर! तुम यह क्या कर रहे हो? व्यर्थ ही मोहित होकर इधर - उधर घूम रहे हो । मैंने अपनी पत्नियोंके घर - घरमें तुम्हें देखा है । मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारे ही डरसे मैंने अनेक रूप धारण किये हैं । तुम ब्राह्मण हो; इसलिये तुम्हें दण्ड तो नहीं दूँगा, परंतु प्रार्थना अवश्य करूँगा । मैं सबका देवता हूँ और ब्राह्मण मेरे देवता हैं । जो मूढ़ मानव ब्राह्मणोंसे द्रोह करते हैं, वे मेरे शत्रु हैं । जो लोग ब्राह्मणोंको मेरा स्वरूप समझकर उनका पूजन करते हैं, वे इहलोकमें सुख भोगते हैं और अन्तमें मेरे परमधाममें चले जायँगे । देवर्षे! तुम मेरी पुरीमें मेरी ही मायासे मोहित हो गये, यह सोचकर खेद न करना; क्योंकि ब्रह्मा तथा रुद्र आदि सब देवता मेरी मायासे मोहित हो जाते हैं ॥ ५० -५४ ॥ भगवान्का यह वचन सुनकर, उनसे प्रशंसित हो वे महामुनि चुपचाप ऋत्विजोंसे भरे हुए यज्ञमण्डपमें चले आये ॥ ५५ ॥

उधर वे श्रीकृष्ण आदि राजा और रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ नाना प्रकारके बाजों - गाजोंके साथ गोमतीके तटपर गयीं । भगवान् गोविन्दके यशका गान करने वाली झुंड -की - झुंड स्त्रियोंके कड़ों और नूपुरोंका मधुर मनोहर शब्द वहाँ गूँजने लगा । मेरे साथ मुनिवर व्यासने जल - सम्बन्धी देवताओंका पूजन करवाकर जलसे भरा हुआ एक घड़ा अनुसूयाजीके हाथमें दिया । तत्पश्चात् रेवती आदि सभी स्त्रियोंने कलश पकड़े, किंतु उनके कोमल हाथोंसे वे सभी कलश नहीं उठ सके । जो फूलोंके भारसे पीड़ित हो जाती हैं, वे कोमलाङ्गी स्त्रियाँ कलशका बोझ कैसे उठा सकती हैं? तब वे राजरानियाँ एक - दूसरेकी ओर देखकर हँसने लगीं और बोलीं-' अब हमलोग कलशके बिना यज्ञमण्डपमें कैसे जायँगी । ' उस समय रुक्मिणी आदि सभी स्त्रियोंने मन ही मन श्रीकृष्णसे प्रार्थना की- ' हे श्रीकृष्ण! हे जगन्नाथ! हे भक्तोंके कष्टका निवारण करनेवाले चक्रधारी देव! आप सर्वशक्तिमान् हैं । इस सङ्कटमें हमारी रक्षा कीजिये । ' इस प्रकार कहती हुई उन स्त्रियोंने जब कलशमें हाथ लगाये, तब वे सभी भारहीन हो गये । उन्होंने रत्नों तथा मोतियोंसे विभूषित अपने - अपने मस्तकपर उन कलशोंको उठाकर रख लिया और अपने पतियोंके साथ वे शीघ्रतापूर्वक यज्ञमण्डपमें चली आयीं, जहाँ भेरी, शङ्ख और पणव आदि बाजे बज रहे थे । गोमतीका जल लाकर उन सबने उस स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ श्यामकर्ण अश्वके साथ यादवराज उग्रसेन विराजमान थे॥५६–६५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' गोमतीके जलका आनयन ' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

छप्पनवाँ अध्याय राजाद्वारा यज्ञमें विभिन्न बन्धु - बान्धवोंको भिन्न - भिन्न कार्योंमें लगाना; श्रीकृष्णका ब्राह्मणोंके चरण पखारना; घीकी आहुतिसे अग्निदेवको अजीर्ण होना; यज्ञपशुके तेजका श्रीकृष्णमें प्रवेश; उसके शरीरका कर्पूरके रूपमें परिवर्तन; उसकी आहुति और यज्ञकी समाप्तिपर अवभृथस्नान श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज! महात्मा राजा विभिन्न कर्मोंमें सगे - सम्बन्धी भाई - बन्धुओंको उग्रसेनके यज्ञमें उनकी परिचर्यामें प्रेमके बन्धनसे बँधे लगाया । भीमसेन रसोईघरके अध्यक्ष बनाये गये । हुए समस्त बन्धु - बान्धव लगे रहे । उन यादवराजने धर्मराज युधिष्ठिरको धर्मपालन - सम्बन्धी कर्ममें नियुक्त * सर्वेषां चैव देवोऽहं मम देवाश्च ब्राह्मणाः । ये दुह्यन्ति द्विजान् मूढाः सन्ति ते मम शत्रवः ॥ ये पूजयन्ति विप्रांश्च मम भावेन भूजनाः । ते भुञ्जन्ति सुखं चात्र ह्यन्ते यास्यन्ति तत्पदम् ॥ ( अध्याय ५५ । ५२-५३ )

पृष्ठ 546

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५४० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड किया गया । राजाने सत्पुरुषोंकी सेवा - शुश्रूषामें अर्जुनको, विभिन्न द्रव्योंको प्रस्तुत करनेमें नकुलको, पूजन कर्ममें सहदेवको और धनाध्यक्षके स्थानमें दुर्योधनको नियुक्त किया । दानकर्ममें दानी कर्णको, परोसनेके कार्यमें द्रौपदीको तथा रक्षाके कार्यमें श्रीकृष्णके अठारह महारथी पुत्रोंको लगाया ॥१–४ ॥ तत्पश्चात् भूपालने युयुधान, विकर्ण, हृदीक विदुर, अक्रूर और उद्धवको भी अनेक कर्मोंमें लगाकर श्रीकृष्णसे पूछा - ' देव! आप कौन - सा कार्य अपने हाथमें लेंगे? ' उनकी बात सुनकर श्रीकृष्णने कहा - ' राजन्! मैं तो ब्राह्मणोंके चरण पखारनेका कार्य करूँगा । इन्द्रप्रस्थमें भी मैंने यही काम किया था । ' यह सुनकर ब्रह्मा आदि देवता और भूतलके मनुष्य हँसने लगे ॥५-७ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने तपस्वी ऋषि - मुनियोंके चरण धोकर उन सबको यथायोग्य आसनोंपर बिठाया । नये - नये वस्त्र पहन, बारह तिलक लगा, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो नाना मतोंकी मालाएँ-अनेक प्रकारकी कलाओंसे निर्मित पुष्पहार धारण किये । अनेक आसनोंपर बैठे हुए वे ब्राह्मण पानके बीड़े चबाकर यज्ञमण्डपमें देवताओंके समान शोभा पाने लगे ॥ ८ - १० ॥ तदनन्तर विभिन्न वस्तुओंके प्रयोजनवाले अर्थी, भिक्षुक, विरक्त और भूखे- ये सभी दूर देशसे आकर वहाँ याचना करने लगे- ' नरेश्वर! हमें अन्न दो, अन्न दो, अन्न दो । उपानह, पात्र, वस्त्र तथा कम्बल दो ' ॥ ११-१२ ॥ मुनिवृन्दों तथा राजाओंसे भरे हुए उग्रसेनके उस यज्ञमें उन याचकोंकी वह करुण याचना सुनकर यदुकुलतिलक महाराजने बड़े हर्ष और उत्साहके साथ उन्हें सोना, चाँदी, वस्त्र, बर्तन, हाथी, घोड़े, रथ, गौ, छत्र और शिबिका आदि प्रदान किये । जिनको जिनको जो - जो वस्तु प्रिय थी, उनको उनको राजाने वही वस्तु दी॥१३-१४३ ॥ यज्ञकर्ममें दीक्षित असिपत्रव्रतधारी राजा उग्रसेन स्नान करके रानी रुचिमतीके साथ बड़ी शोभा पा रहे थे । वेदशास्त्रोंमें विशारद व्यास और गर्ग आदि बीस हजार ब्राह्मण वह श्रेष्ठ यज्ञ करा रहे थे । नृपश्रेष्ठ! अग्निकुण्डमें हाथीकी सूँड़के समान मोटी घृतकी धारा गिर रही थी और ब्रह्मवादी मुनि उसे गिरवा रहे थे । श्रीकृष्णकी कृपासे उस यज्ञमें अग्निदेवको अजीर्ण हो गया । वे सबके सुनते हुए राजासे बोले - ' मैं प्रसन्न हूँ, मैं प्रसन्न हूँ । अब मुझे पशु प्रदान करो ।'-यज्ञसभामें अग्रिका यह वचन सुनकर मुनियोंसहित यादवेन्द्र उग्रसेनने सोनेके यूपमें सुवर्णमयी डोरीसे बँधे हुए उस घोड़ेसे बोले॥१५–२० ॥ उग्रसेनने कहा- हे अश्व! तुम अग्निदेवकी बात सुनो । यज्ञमें घीसे तृप्त होनेपर भी अग्निदेव तुझ विशुद्ध यज्ञपशुको अपना आहार बनायेंगे ॥ २१ ॥

राजाकी बात सुनकर श्यामकर्ण अश्वने प्रसन्न हो श्रीकृष्णकी ओर देखते और अपनी स्वीकृति सूचित करते हुए सिर हिलाया । × × × X तत्पश्चात् घोड़ेके शरीरसे एक ज्योति प्रकट हुई, जो सबके देखते - देखते मधुसूदन श्रीकृष्णमें समा गयी । इसके बाद घोड़ेका शरीर कर्पूर होकर गिर पड़ा । मानो भगवान् शंकरके शरीरसे विभूति झड़ गयी हो । उस अद्भुत कर्पूरराशिको देखकर और उसकी सुगन्धसे यज्ञशाला तथा द्वारकापुरीको सुवासित हुई जानकर वे व्यास आदि महर्षि अत्यन्त हर्षित हो, यज्ञकर्ममें संलग्न राजासे बोले - ' नृपश्रेष्ठ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा यह उत्तम यज्ञ सफल हो गया । अब हम इस कर्पूरसे ही हवन करेंगे और तुम भी करो ' ॥२२–३३ ॥ - ऐसा कहकर समस्त ऋत्विजोंने उस यज्ञकुण्डमें उसी क्षण पहले यज्ञेश्वरके उद्देश्यसे घनसार ( कर्पूर ) की आहुतियाँ दीं । राजा वज्रनाभ! जहाँ चतुर्व्यूहरूपधारी साक्षात् परमेश्वर परमात्मा श्रीकृष्ण अपने पुत्र और पौत्रोंके साथ विराजमान थे, वहाँ कौन - सी वस्तु दुर्लभ थी? उस यज्ञमें मैंने महेन्द्रसे कहा – ' भगवन् शक्र! इस यज्ञमें कर्पूरकी आरती ग्रहण कीजिये । आइये, राजा उग्रसेनकी दी हुई इस आहुतिको स्वीकार कीजिये; अब आगे कलियुगमें यह दुर्लभ हो जायगी ' ॥ ३४–३६३ ॥ मेरी बात सुनकर इन्द्रने मुस्कराते हुए कहा-

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अध्याय ५७ ] देवताओंका अपने - अपने ' महर्षियो! जब कौरव - पाण्डव - युद्ध में कौरवकुलका क्षय होगा और धर्मराज युधिष्ठिर हस्तिनापुरमें उत्तम अश्वमेध यज्ञ करेंगे, उस समय ब्राह्मणोंकी दी हुई ऐसी आहुति मैं पुनः ग्रहण करूँगा । आप इसे दुर्लभ क्यों बता रहे हैं? ' ॥ ३७-३८ ॥ नृपश्रेष्ठ! इन्द्रका यह वचन सुनकर सब मुनीश्वरोंने इसे सच माना और उस यज्ञमें सम्पूर्ण देवताओंके लिये आहुतियाँ दीं । दूसरे लोगोंने यह नहीं समझा कि इन्द्रने क्या कहा है । ' अग्नये स्वाहा ' – इस मन्त्रसे सभी देवताओंके लिये ब्राह्मणोंने आहुतियाँ दीं । उस कर्पूरके होमसे भी समस्त चराचर विश्व प्रसन्न हो गया । राजा उग्रसेन उस महान् यज्ञमें उऋण हो गये ॥ ३ ९ - ४१ ॥ तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणों, श्रीकृष्ण आदि यादवों तथा अन्य भूपालोंके साथ महाराज उग्रसेनने यज्ञकी निवास स्थानको प्रस्थान ५४१ समाप्तिपर पिण्डारक तीर्थमें अवभृथस्नान किया । वेदोक्त विधिसे पत्नीसहित स्नान करके, रेशमी वस्त्र धारणकर राजा उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे दक्षिणाके साथ यज्ञदेवता सुशोभित होते हैं । उस समय देवताओं तथा मनुष्योंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । सब देवता राजा उग्रसेनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे । इसके बाद स्वधा - पान कराकर और पुरोडासका प्राशन करवाकर व्यासजीने सब लोगोंको क्रमशः यज्ञशेष पुरोडासका प्रसाद बाँटा । गाजे-बाजेके साथ बन्दीजनोंने प्रसन्नतापूर्वक राजा उग्रसेनकी स्तुति की । फिर देवकी आदि स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी । आरतीके बाद प्रसन्न हुए महाराजने उन सब स्त्रियोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र और अलंकार दिये ॥४२-४७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' यज्ञकी पूर्ति होनेपर राजाका अभिषेक नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥

सत्तावनवाँ अध्याय ब्राह्मणभोजन, दक्षिणा दान, पुरस्कार वितरण, सम्बन्धियोंका सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने - अपने श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्ण और भीमसेनके साथ यादवराज उग्रसेनने ब्राह्मणों और राजाओंसे प्रार्थना करके उन्हें भाँति - भाँतिके पदार्थ भोजन कराये । उन्होंने ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उत्तम शष्कुली ( पूड़ी ), खीर, भात, अच्छी दाल और कढ़ी, हलुआ, मालपुआ तथा सुन्दर फेणिका आदि विशेष अन्न परोसकर भलीभाँति भोजन कराया । शिखरिणी ( सिखरन ), घृतपूर ( घेवर ), सुशक्तिका ( अच्छी-अच्छी साग - सब्जी ), सुपटिनी ( चटनी आदि ), दधिकूप ( दहीबड़ा ) लप्सी तथा गोल, सुन्दर और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल सोहारी आदिको बड़े, लड्डू और पापड़के साथ परोसा । उन ब्राह्मणोंमेंसे कुछ तो फलाहारी थे, कुछ सूखे पत्ते खानेवाले थे, कोई केवल जल पीकर रहनेवाले और कोई दूर्बाके रसका आस्वादन करनेवाले ( दुर्वासा ) थे । कोई हवा निवास स्थानको प्रस्थान पीकर रहनेवाले जन्मकालसे ही तपस्वी थे । कितने तो भोजनों ( भोज्यपदार्थों ) के नामतक नहीं जानते थे । जब उनके सामने भाँति - भाँतिके भोजन परोसे गये, तब उन्हें देखकर वे बड़े विस्मित हुए । कोई भातको मालतीके फूल समझने लगे, कई लड्डुओंको गूलरके फल मानने लगे, किन्होंने खीर और फेणिका देखकर उसे चन्द्रमाका बिम्ब समझा, कई ब्राह्मणोंने पापड़ फेणिकाको देखकर उन्हें पलाशके पत्ते समझा और ' मधुशीर्षक ' नामक मिष्टान्नको आमका फल मान लिया, चटनी और लप्सी देखकर कितने ही ऋषि उन्हें घिसा हुआ चन्दन समझने लगे, कितने ही मुनिश्रेष्ठ मीठा चूरन या शक्कर देखकर बालू समझने लगे । इस प्रकारकी भावना मनमें लेकर वे सब ब्राह्मण वहाँ भोजन कर रहे थे । कोई दूध पीते और कोई दाखका रस । कोई - कोई ब्राह्मण आमका रस पीते हुए जोर-

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५४२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड जोरसे हँसते और लोट जाते थे ॥ १-१० ॥ तब भीमसेनके साथ भगवान् श्रीकृष्ण सानन्द हँसते हुए वहाँ बैठे तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ परिहास करने लगे – ' मुनियो! आप जल्दीसे इन भोजनोंके नाम तो बताइये । आप जिनके नाम बतावेंगे, वे ही भोजन भीमसेनके साथ मैं आपके सामने प्रस्तुत करूँगा ' ॥ ११-१२ ॥ श्रीकृष्ण और भीमसेनकी बात सुनकर वे मुनिश्रेष्ठ कुछ बोल न सके; केवल आनन्दित होकर परस्पर एक - दूसरेका मुँह देखने लगे । तैलङ्ग, कर्णाटकी, गुजराती, गौड़ और सनाढ्य आदि अनेक जातिके विभिन्न ब्राह्मणशिरोमणियोंका राजाधिराज उग्रसेनने सुवर्ण, वस्त्र तथा रत्नराशियोंद्वारा पूजन करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ १३-१४ ॥ नरेश्वर! यज्ञके अन्तमें राजा उग्रसेनने सबसे पहले मुझे एक लाख घोड़े, एक हजार हाथी, दो हजार रथ, एक लाख धेनु और सौ भार सुवर्ण - इतनी दक्षिणा विधिपूर्वक दी । मुझसे आधी दक्षिणा बकदाल्भ्य और व्यासजीको दी । तत्पश्चात् उग्रसेनने निमन्त्रित ब्राह्मणोंमेंसे प्रत्येकको प्रसन्नतापूर्वक एक हजार घोड़े, सौ हाथी, दो सौ रथ, एक हजार धेनु और बीस भार सुवर्ण - इतनी दक्षिणा दी । राजन्! फिर हर्षसे भरे यादवराजने प्रत्येक ब्राह्मणको एक हाथी, एक रथ, एक गौ, एक घोड़ा, एक भार सुवर्ण और दो भार चाँदी - इतनी - इतनी दक्षिणा दी ॥ १५ - २० ॥ उस महान् यज्ञके अवसरपर श्रीकृष्णपुरी द्वारका भूतलपर उसी तरह सुशोभित हुई, जैसे स्वर्गमें अमरावतीपुरी । उस समय मागध, सूत, बन्दीजन, गायक और वाराङ्गनाएँ राजद्वारपर आयीं । फिर तो मृदङ्ग, वीणा, मुरयष्टि, वेणु, ताल, शङ्ख, आनक और दुन्दुभिकी ध्वनियों तथा संगीत, नृत्य एवं वाद्यगीतोंके शब्दोंसे युक्त महान् उत्सव होने लगा । वाराङ्गनाएँ मधुर कण्ठसे गाने लगीं, सुन्दर तालोंके साथ नृत्य करने लगीं । संगीत और गीतके अक्षरोंके साथ सामवेदके गीत गूँज उठे । नर्तकियाँ अपने कुसुम्भ रंगके वस्त्र हिलाती हुई संगीत और नृत्यके साथ सब ओर प्रकाशित हो उठीं । उस उत्सवमें जो बन्दीजन, मागध और गायक आये थे, उन्हें अपने निकट आनेपर राजाने बहुत - सा सुवर्ण और रत्न दिये तथा जो अप्सराएँ आयी थीं, उनको भी बहुमूल्य पुरस्कार समर्पित किया । सूतों, मागधों और समस्त बंदीजनोंको भी अश्वमेधसे प्रसन्न हुए राजाने बहुत धन दिया । जैसे बादल पानी बरसाता उस तरह महाराज उग्रसेन धनकी वृष्टि कर रहे थे ॥ २१ - २५ ॥ तत्पश्चात् यादवराज भूपालशिरोमणि उग्रसेनने अपने यहाँ आये हुए प्रत्येक राजाको एक लाख घोड़े, एक हजार हाथी, सौ - सौ शिबिकाएँ, कुण्डल, कड़े और तीस भार सुवर्ण सानन्द भेंट किये । इससे दूना उपहार महाराजने गद आदि समस्त यादवों तथा नन्द आदि गोपोंको दिया । यशोदा आदि गोपाङ्गनाओं, देवकी आदि यदुकुलकी स्त्रियों तथा रुक्मिणी और राधिका आदि श्रीहरिकी पटरानियोंको भी राजाने बहुत-से दिव्य वस्त्र और अलंकार देकर सबको संतुष्ट किया । अन्तमें राजाने फिर प्रसन्न होकर मुझ गर्गाचार्यको सौ ग्राम दिये । वह सब मैंने क्रमशः वहाँके ब्राह्मणोंको बाँट दिया । इसके बाद राजाने श्रीकृष्ण और बलभद्रका वस्त्र, आभूषण, तिलक, पुष्पहार और नीराजना आदि उपचारोंसे पूजन किया ॥ २६-३१ ॥ राजन्! तब श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले-महाराज! इस महायज्ञमें समर्थ होते हुए भी आपने मुझे कुछ नहीं दिया ॥३२ ॥

यह सुनकर राजा बोले- जगदीश्वर! माधव! आप बलरामजीके साथ शीघ्र ही यथोक्त दक्षिणा ग्रहण कीजिये ॥ ३३ ॥

- ऐसा विह्वल हुए यज्ञोंका सारा उस समय तत्काल संतुष्ट लगे ॥३४-३५ तदनन्तर कहकर हर्षसे उल्लसित और प्रेमसे राजाने राजसूय तथा अश्वमेध – दोनों फल श्रीकृष्णके हाथमें दे दिया । द्वारकामें जय - जयकार होने लगी । हुए समस्त देवता फूलोंकी वर्षा करने ॥ सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो अपना - अपना भाग लेकर स्वर्गलोकको चले गये । इसी तरह राक्षस, दैत्य, दाढ़वाले पशु, पक्षी, वानर, बिलमें रहनेवाले सर्प आदि जीव, पर्वत, गौ, वृक्ष - समुदाय, नदियाँ, तीर्थ

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अध्याय ५८ ] श्रीकृष्णद्वारा कंस आदिका आवाहन ५४३ और समुद्र – सभी अपना - अपना भाग ले, संतुष्ट हो, गोप और यशोदा आदि व्रजाङ्गनाएँ श्रीकृष्णसे पूजित अपने - अपने निवासस्थानको चले गये । जो - जो राजा हो उनके विरहजनित कष्टका अनुभव करती हुई वहाँ आये थे, वे सब दान - मानसे पूजित हो सेनाओं- व्रजको चली गयीं । इस प्रकार यादवराज उग्रसेन द्वारा भूतलको कम्पित करते हुए अपनी - अपनी श्रीहरिकी कृपासे मनोरथके दुस्तर महासागरको पार राजधानीको लौट गये । राजन्! नन्द आदि समस्त करके निश्चिन्त हो गये ॥ ३६–४० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' विश्व भोज्यदक्षिणाका वर्णन ' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

अट्ठावनवाँ अध्याय श्रीकृष्णद्वारा कंस आदिका आवाहन और उनका श्रीकृष्णको ही परमपिता बताकर इस लोकके माता - पितासे मिले श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! इसके बाद महात्मा श्रीकृष्णके आवाहन करनेपर कंस आदि नौ भाई सब - के - सब वैकुण्ठसे शीघ्र ही वहाँ आ गये । उनको आया देख वहाँ सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ । द्वारकामें पहुँचकर उन कंस आदि सब भाइयोंने बारी - बारीसे श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको प्रणाम किया॥१-२३ ॥ नरेश्वर! सुधर्मा - सभामें इन्द्रके सिंहासनपर रानी रुचिमतीके साथ बैठे हुए महाराज उग्रसेनने अपने कंस आदि पुत्रोंको श्रीकृष्णस्वरूप एवं चार भुजाधारी देखा । देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे विभूषित थे तथा पीताम्बर धारण किये श्रीकृष्णके पास खड़े थे । राजाने अपने उन पुत्रोंको निकट बुलाया । तब भगवान् श्रीकृष्णने मन्द मुस्कानके साथ कंस आदिसे कहा - ' देखो, वे दोनों तुम्हारे माता-पिता हैं और तुम्हें देखनेके लिये उत्सुक हैं । वीरो! तुम उनके निकट जाकर भक्तिभावसे नमन करो ' ॥ ३–६ ६३ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उन्हींके किंकरभावको प्राप्त हुए वे कंस, न्यग्रोध आदि सब भाई बड़े हर्षसे भरकर बोले ॥७३ ॥

कंस आदिने कहा – नाथ! आपकी मायासे संसारचक्रमें घूमते हुए हमें ऐसे पिता और ऐसी माताएँ बहुत प्राप्त हो चुकी हैं । ' श्रीहरि ही जीवमात्रके वास्तविक बिना ही वैकुण्ठलोकको प्रस्थान पिता हैं ' - ऐसी सनातन श्रुति है । अतः हमलोग आपके निकट रहकर अब दूसरे किसी माता - पिताको नहीं देखेंगे । पूर्वकालमें युद्धके अवसरपर हमने बलरामसहित आपका दर्शन किया था । उसके बाद द्वारकामें प्रद्युम्न और अनिरुद्धजीका प्रादुर्भाव हुआ, जिन्हें हमलोगोंने नहीं देखा था । अतः चतुर्व्यूहरूपमें आपका दर्शन करनेके लिये हमलोग यहाँ आये हैं । अहो! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हमलोगोंने श्रीकृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इन चारों परिपूर्णतम महापुरुषोंका दर्शन किया । हम नहीं जानते कि किस पूर्वपुण्यके प्रभावसे इन परिपूर्णतम चतुर्व्यूहस्वरूप परमात्माका, जो बड़े - बड़े संतोंके लिये भी दुर्लभ हैं, हमें दर्शन मिला है । हे संकर्षण! हे श्रीकृष्ण! हे प्रद्युम्न! और हे ऊषावल्लभ अनिरुद्ध! हम मूढ़ हैं, कुबुद्धि हैं । आप हमारे अपराधको क्षमा करें । गोविन्द! अब वैकुण्ठमें पधारिये । आपका वह सुन्दर धाम आपके बिना सूना लग रहा है । आपके रहनेसे द्वारकापुरी वैकुण्ठसे भी अधिक वैभवशालिनी और धन्य हो गयी है । ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, सूर्य, शिव, मरुद्गण, यम, कुबेर, चन्द्रमा तथा वरुण आदिने जिनका पूजन किया है, आपके उन्हीं चरणारविन्दोंका हम सदा भजन करते हैं । बड़े - बड़े मुनीश्वर, लक्ष्मी, देवता, भक्तजन तथा सात्वतवंशियोंने गन्ध, चन्दन, धूप, लावा, अक्षत, दूर्वाङ्कुर और सुपारी आदिसे जिनका

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५४४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड भलीभाँति पूजन किया है, आपके उन्हीं चरणारविन्दोंका कंस आदि सब भाई सबके देखते - देखते वैकुण्ठ-हम सदा भजन करते हैं ॥ ८- १७ ॥ धामको चले गये तथा पत्नीसहित राजा उग्रसेन श्रीगर्गजी कहते हैं- नरेश्वर! ऐसा कहकर वे आश्चर्यसे चकित रह गये ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' कंसादिका दर्शन ' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

उनसठवाँ अध्याय गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके सहस्रनामोंका वर्णन श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! तब राजा उग्रसेनने पुत्रकी आशा छोड़कर सम्पूर्ण विश्वको मनका संकल्प -मात्र जानकर व्यासजीसे अपना संदेह पूछा -' ब्रह्मन्! किस प्रकारसे लौकिक सुखका परित्याग करके मनुष्य परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णका भजन करे, यह मुझे विश्वासपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥ व्यासजी बोले – महाराज उग्रसेन! मैं तुम्हारे सामने सत्य और हितकर बात कह रहा हूँ, इसे एकाग्रचित्त होकर सुनो । राजेन्द्र! तुम श्रीराधा और श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट आराधना करो । इन दोनोंके पृथक् -पृथक् सहस्र नाम हैं । उनके द्वारा तुम दोनोंका भक्तिभावसे भजन करो । भूपते! राधाके सहस्र नामको ब्रह्मा, शंकर, नारद और कोई - कोई मेरे जैसे लोग भी जानते हैं ॥ ३५ ॥

उग्रसेनने कहा – ब्रह्मन्! मैंने पूर्वकालमें सूर्यग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रके एकान्त दिव्य शिविरमें नारदजीके मुखसे ' राधिकासहस्रनाम ' का श्रवण किया था; परंतु अनायास ही महान् कर्म करने-वाले भगवान् श्रीकृष्णके सहस्र नामको मैंने नहीं सुना है । अतः कृपा करके मेरे सामने उसीका वर्णन कीजिये, जिससे मैं कल्याणका भागी हो सकूँ ॥ ६-७ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— उग्रसेनकी यह बात सुनकर महामुनि वेदव्यासने प्रसन्नचित्त होकर उनकी प्रशंसा की और श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए कहा ॥ ८ ॥

व्यासजी बोले – राजन्! सुनो । मैं तुम्हें श्रीकृष्णका सुन्दर सहस्रनामस्तोत्र सुनाऊँगा, जिसे पहले अपने परमधाम गोलोकमें इन भगवान् श्रीकृष्णने श्रीराधाके लिये प्रकट किया था ॥ ९ ॥

श्रीभगवान् बोले – प्रिये! यह सहस्रनाम-स्तोत्र, जो अभी बताया जायगा, गोपनीय रहस्य है । इसे हर एकके सामने प्रकट कर दिया जाय तो सदा हानि ही उठानी पड़ेगी । अधिकारीके सामने प्रकट किया गया यह स्तोत्र सम्पूर्ण सुखोंको देनेवाला, मोक्षदायक, कल्याणस्वरूप, उत्कृष्ट परमार्थरूप और समस्त पुरुषार्थोंको देनेवाला है । श्रीकृष्णसहस्रनाम मेरा रूप है । जो इसका पाठ करेगा, वह मेरा स्वरूप होकर ही प्रसिद्ध होगा । कहीं किसी शठ और दाम्भिकको इसका उपदेश कदापि नहीं देना चाहिये । जो करुणासे भरा हुआ तथा गुरुके चरणोंमें निरन्तर भक्ति रखनेवाला है, उस संतोंके सेवक और मद एवं क्रोधसे रहित मुझ श्रीकृष्णके भक्तको ही इसका उपदेश देना चाहिये ॥ १०–१२ ॥ विनियोग ॐ अस्य श्रीकृष्णसहस्त्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिर्भुजङ्गप्रयातं छन्दः श्रीकृष्णचन्द्रो देवता वासुदेवो बीजम् श्रीराधाशक्तिः मन्मथः कीलकम् श्रीपूर्णब्रह्मकृष्णचन्द्रभक्तिजन्यफल-प्राप्तये जपे विनियोगः । इस ' श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्रमन्त्र ' के नारायण ऋषि हैं, भुजङ्गप्रयात छन्द है, श्रीकृष्णचन्द्र देवता हैं, वासुदेव बीज, श्रीराधा शक्ति और मन्मथ कीलक है । श्रीपूर्णब्रह्म कृष्णचन्द्रकी भक्तिजन्य फलकी प्राप्तिके लिये इसका विनियोग किया जाता है । ध्यान शिखिमुकुटविशेषं नीलपद्माङ्गदेशं विधुमुखकृतकेशं कौस्तुभापीतवेशम् ।