गर्ग संहिता — पृष्ठ 551–560

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

गर्ग संहिता, पृष्ठ 551 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति मधुररवकलेशं शं भजे भ्रातृशेषं व्रजजनवनितेशं माधवं राधिकेशम् ॥ जिनके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट विशेष शोभा देता है, जिनका अङ्गदेश ( सम्पूर्ण शरीर ) नील कमलके समान श्याम है, चन्द्रमाके समान मनोहर मुखपर कुञ्चित केश सुशोभित हैं, कौस्तुभमणिकी सुनहरी आभासे जिनका वेश कुछ पीतवर्णका दिखायी देता है ( अथवा जो पीताम्बरधारी हैं ) जो मीठी धुनमें मुरली बजा रहे हैं, कल्याणस्वरूप हैं, शेषावतार बलराम जिनके भाई हैं तथा जो व्रजवनिताओंके वल्लभ हैं, उन राधिकाके प्राणेश्वर माधवका मैं भजन ( चिन्तन ) करता हूँ ॥१३ ॥

१. हरिः- भक्तोंके पाप - तापका हरण करनेवाले, २. देवकीनन्दनः = अपने आविर्भावसे माता देवकी एवं यशोदाको आनन्द प्रदान करनेवाले, ३. कंस -हन्ता = कंसका वध करनेवाले, ४. परात्मा परमात्मा, ५. पीताम्बरः = पीतवस्त्रधारी, ६. पूर्णदेवः = परिपूर्ण -देवता श्रीकृष्ण, ७. रमेशः - रमावल्लभ, ८. कृष्णः -सबको अपनी ओर आकर्षित करनेवाले, ९. परेशः = सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवताओंके भी नियन्ता, १०. पुराण: - पुरातन पुरुष या अनादिसिद्ध, ११. सुरेशः - = देवताओंपर भी शासन करनेवाले, १२. अच्युतः = अपनी महिमा या मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले, १३. वासुदेवः = वसुदेवनन्दन अथवा सबके अन्तःकरणमें निवास करनेवाले देवता, चार व्यूहों में से प्रथम व्यूहस्वरूप, १४. देवः = प्रकाशस्वरूप परम देवता ॥ १४ ॥

१५. धराभारहर्ता - पृथ्वीका भार हरण करनेवाले, १६. | कृती = कृतकृत्य अथवा पुण्यात्मा, १७. राधिकेशः - राधाप्राणवल्लभ, १८. परः - सर्वोत्कृष्ट, १ ९. भूवरः = पृथ्वीके स्वामी, २०. दिव्यगोलोक -नाथ: - दिव्यधाम गोलोकके स्वामी, २१. सुदाम्नस्तथा राधिकाशापहेतुः - सुदामा तथा राधिकाके पारस्परिक शापमें कारण, २२. घृणी - दयालु, २३. मानिनी - मानदः - मानिनीको मान देनेवाले, २४. दिव्यलोकः - दिव्यधामस्वरूप ॥ १५ ॥

२५. लसद्गोपवेशः = सुन्दर गोपवेषधारी, २६. अज: - अजन्मा, २७. राधिकात्मा - राधिकाके भगवान् श्रीकृष्णके सहस्त्रनामोंका वर्णन ५४५ आत्मा अथवा राधिका हैं आत्मा जिनकी, वे, २८. चलत्कुण्डलः- हिलते हुए कुण्डलोंसे सुशोभित, २ ९. कुन्तली = घुँघराली अलकोंसे शोभायमान, ३०. कुन्तलत्रक्- केशराशिमें फूलोंके हार धारण करनेवाले, ३१. कदाचिद् राधया रथस्थः-कभी - कभी राधिकाके साथ रथमें विराजमान, ३२. दिव्यरत्नः = दिव्यमणि - कौस्तुभ धारण करनेवाले अथवा अखिल जगत्के दिव्यरत्नस्वरूप, ३३. सुधासौधभूचारण: - चूनेसे लिपे - पुते छतकी महलपर घूमनेवाले, ३४. दिव्यवासाः - दिव्य वस्त्रधारी ॥१६ ॥

३५. कदा वृन्दकारण्यचारी - कभी -कभी वृन्दावनमें विचरनेवाले, ३६. स्वलोके महारत्न-सिंहासनस्थः = अपने धाममें महामूल्यवान् एवं विशाल रत्नमय सिंहासनपर विराजमान, ३७. प्रशान्तः = परम शान्त, ३८. महाहंसभैश्चामरैर्वीज्यमानः = महान् हंसोंके समान श्वेत चामरोंसे जिनके ऊपर हवा की जाती है, ऐसे भगवान्, ३ ९. चलच्छत्रमुक्तावली-शोभमानः = हिलते हुए श्वेतच्छत्र तथा मुक्ताकी मालाओंसे शोभित होनेवाले ॥ १७ ॥

४०. सुखी - आनन्दस्वरूप, ४१. कोटिकंदर्प-लीलाभिरामः = करोड़ों कामदेवोंके समान ललित लीलाओंके कारण अतिशय मनोहर, ४२. क्वणन्नूपुरालं-कृताङ्घ्रिः = झंकारते हुए नूपुरोंसे अलंकृत चरणवाले, ४३. शुभाङ्घ्रिः = शुभ लक्षणसम्पन्न पैरवाले, ४४. सुजानुः - सुन्दर घुटनोंवाले, ४५. रम्भाशुभोरुः = केलेके समान परम सुन्दर ऊरुयुगल ( जाँघ ) वाले, ४६. कृशाङ्गः = दुबले - पतले, ४७. प्रतापी - तेजस्वी एवं प्रतापशाली, ४८. इभशुण्डासुदोर्दण्डखण्डः - हाथीकी समान सुन्दर भुजदण्डमण्डलवाले ॥ १८ ॥

४ ९. जपापुष्पहस्तः - अड़हुलके फूलके समान लाल - लाल हथेलीवाले, ५०. शातोदरश्रीः = पतली कमरकी शोभासे सम्पन्न, ५१. महापद्मवक्षःस्थल: -वक्षःस्थलमें प्रफुल्ल विशाल कमलकी मालासे अलंकृत, अथवा जिनका हृदयकमल विशाल है, ऐसे, ५२. चन्द्रहासः - जिनके हँसते समय चन्द्रमाकी

पृष्ठ 552

गर्ग संहिता, पृष्ठ 552 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड चाँदनीकी - सी छटा छिटक जाती है, ऐसे, ५३. लसत्कुन्ददन्तः - शोभामयी कुन्दकलिकाके समान उज्ज्वल दाँतवाले, ५४. बिम्बाधर श्री: - जिनके अधरकी शोभा पक्व बिम्ब - फलसे अधिक अरुण है, ऐसे, ५५. शरत्पद्मनेत्रः = शरत्कालके प्रफुल्ल कमलके सदृश नेत्रवाले, ५६. किरीटोज्ज्वलाभः = कान्तिमान् किरीटकी उज्ज्वल आभा धारण करनेवाले ॥ १ ९ ॥ ५७. सखीकोटिभिर्वर्तमानः = करोड़ों सखियोंके साथ रहकर शोभा पानेवाले, ५८. निकुञ्जे प्रियाराधया राससक्त: -निकुञ्जमें प्राणवल्लभा श्रीराधाके साथ रास-लीलामें तत्पर, ५ ९. नवाङ्गः- अपने दिव्य अङ्गोंमें नित्य नूतन रमणीयता धारण करनेवाले, ६०. धराब्रह्मरुद्रा -दिभिः प्रार्थितः सन् धराभारदूरीक्रियार्थं प्रजातः पृथ्वी, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि देवताओंकी प्रार्थना सुनकर भूमिका भार दूर करनेके लिये अवतार ग्रहण करनेवाले ॥ २० ॥

६१. यदुः- यादवकुलके प्रवर्तक राजा यदु जिनकी विभूति हैं, वे ६२. देवकीसौख्यदः - देवकीको सुख देनेवाले, ६३. बन्धनच्छित् = भवबन्धनका उच्छेद करनेवाले अथवा अवतारकालमें माता - पिताके बन्धनको काट देनेवाले, ६४. सशेषः = शेषावतार बलरामजीके साथ विराजमान, ६५. विभुः = व्यापक अथवा सर्वसमर्थ, ६६. योगमायी - योगमायाके प्रवर्तक तथा स्वामी, ६७. विष्णुः = व्यापक या वैकुण्ठनाथ विष्णुस्वरूप, ६८. व्रजे नन्दपुत्रः - व्रज -मण्डलमें ६ ९. विख्यात, करनेवाले, सुन्दर एवं ७३. श्यामरूप: नन्दनन्दनके रूपमें लीला करनेवाले, यशोदासुताख्यः = यशोदाजीके पुत्ररूपमें ७०. महासौख्यदः = महान् सौख्य प्रदान ७१. बालरूपः शिशुरूपधारी, ७२. शुभाङ्गः = शुभ लक्षणसम्पन्न शरीरवाले ॥ २१ ॥

पूतनामोक्षदः = पूतनाको मोक्ष देनेवाले, ७४. - श्याम मनोहर रूपवाले, ७५. दयालुः = कृपालु, ७६. अनोभञ्जनः शकट - भङ्ग करनेवाले, ७७. पल्लवाङ्घ्रिः- नूतन पल्लवोंके समान कोमल एवं अरुण चरणवाले, ७८. तृणावर्त -संहारकारी = तृणावर्तका संहार करनेवाले, ७ ९. गोपः = गोपालरूप, ८०. यशोदायश: - यशोदाके यशरूप, ८१. विश्वरूपप्रदर्शी = माताको अपने मुखमें ( तथा अर्जुन, धृतराष्ट्र और उत्तङ्कको ) सम्पूर्ण विश्वरूपका दर्शन करानेवाले ॥२२ ॥

८२. गर्गदिष्टः- गर्गजीके द्वारा जिनका नामकरण-संस्कार एवं भावी फलादेश किया गया, ऐसे, ८३. भाग्योदय श्रीः = भाग्योदयसूचक शोभासे सम्पन्न, ८४. लसद्वालकेलिः - सुन्दर बालोचित क्रीडा करनेवाले, ८५. सराम: -बलरामजीके साथ विचरनेवाले, ८६. सुवाच: = मनोहर बात करनेवाले, ८७. क्वणन्नूपुरैः शब्दयुक् = खनकते हुए नूपुरोंसे शब्दयुक्त, ८८. जानु-हस्तैर्व्रजेशाङ्गणे रिङ्गमाणः = घुटनों और हाथोंके बलपर व्रजराजनन्दके आँगनमें रेंगने या चलनेवाले ॥ २३ ॥

८ ९. दधिस्पृक् = दहीका स्पर्श ( दान ) करनेवाले, ९ ० हैयंगवीदुग्धभोक्ता - ताजा माखन खानेवाले और दूध पीनेवाले, ९ १. दधिस्तेयकृत् - व्रजाङ्गनाओंको सुख देनेके लिये दहीकी चोरी लीला करनेवाले, ९ २. दुग्धभुक् = दूधका भोग आरोगनेवाले, ९ ३. भाण्डभेत्ता = दही - दूध आदिके मटके फोड़नेवाले, ९ ४. मृदं भुक्तवान् = मिट्टी खानेवाले, ९ ५. गोपजः = नन्दगोपके पुत्र, ९ ६. विश्वरूपः = सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, ऐसे, ९ ७. प्रचण्डांशुचण्डप्रभामण्डिताङ्गः - सूर्यकी प्रखर किरणोंसे सुशोभित शरीरवाले ॥ २४ ॥

९ ८. यशोदाकरैर्बन्धनप्राप्तः = यशोदाके हाथों ओखलीमें बाँधे गये, ९९. आद्यः = आदिपुरुष या सबके आदिकारण, १००. मणिग्रीवमुक्तिप्रदः-कुबेरपुत्र मणिग्रीव और नलकूबरका शापसे उद्धार करनेवाले, १०१. दामबद्धः - यशोदाद्वारा रस्सीसे बाँधे गये, १०२. कदा व्रजे गोपिकाभिः नृत्यमानः = कभी व्रजमें गोपिकाओंके साथ नृत्य करनेवाले, १०३. कदा नन्दसन्नन्दकैर्लाल्यमानः = कभी नन्द और सन्नन्द आदिके द्वारा लाड़ लड़ाये जानेवाले ॥२५ ॥

१०४. कदा गोपनन्दाङ्कः - कभी गोपराज नन्दकी गोदमें समोद विराजमान, १०५. गोपालरूपी -ग्वाल- रूपधारी, १०६. कलिन्दाङ्गजाकूलगः - कलिन्द-नन्दिनी यमुनाके तटपर विहार करनेवाले, १०७. वर्तमान: - नित्य सत्तावाले, १०८. घनैर्मारुतैश्छन्न-

पृष्ठ 553

गर्ग संहिता, पृष्ठ 553 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णके सहस्त्रनामोंका वर्णन ५४७ भाण्डीरदेशे नन्दहस्ताद् राधया गृहीतो वरः = एक ' अघारि ' नामसे प्रसिद्ध, १३२. वने वत्सकृत् = वनमें समय प्रचण्ड वायु और घने बादलोंसे आच्छादित भाण्डीरवनके प्रदेशमें नन्दजीके हाथसे श्रीराधाद्वारा गृहीत वरस्वरूप ॥ २६ ॥

१० ९. गोलोकलोकागते महारत्नसंघैर्युते कदम्बावृते निकुञ्जे राधिकासद्विवाहे ब्रह्मणा प्रतिष्ठानगतः = गोलोक - धामसे आये महान् रत्नसमूहोंसे शोभित तथा कदम्ब - वृक्षोंसे आवृत निकुञ्जमें राधिकाजी साथ विवाहके अवसरपर ब्रह्माजीके द्वारा सादर स्थापित, ११०. साममन्त्रैः पूजितः = सामवेदके मन्त्रोंद्वारा पूजित ॥ २७ ॥

१११. रसी = विविध रसोंके अधिष्ठान, परम रसिक, ११२. मालतीनां वनेऽपि प्रियाराधया सह राधिकार्थं रासयुक् = मालती - वनमें भी प्रियतमा राधिकाके साथ उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये रास -विलासमें संलग्न, ११३. रमेशः धरानाथ: - लक्ष्मीके पति और पृथ्वीके स्वामी, ११४. आनन्ददः = आनन्द प्रदान करनेवाले, ११५. श्रीनिकेतः = रमानिवास, ११६. वनेशः - वृन्दावनके स्वामी, ११७. धनी = सीमातीत धन और ऐश्वर्यके स्वामी, ११८. सुन्दरः = अप्रतिम सौन्दर्यकी निधि, ११ ९. गोपिकेशः = गोपाङ्गनाओंके प्राणवल्लभ ॥ २८ ॥

१२०. कदा राधया नन्दगेहे प्रापितः = किसी समय राधिकाद्वारा नन्दके घरमें पहुँचाये गये, १२१. यशोदाकरैर्लालितः = यशोदाके हाथ दुलारे गये, १२२. मन्दहासः - मन्द मन्द मनोरम हाससे सुशोभित, १२३. क्वापि भयी - कहीं - कहीं डरे हुएकी भाँति लीला करनेवाले, १२४. वृन्दारकारण्यवासी = वृन्दावनमें निवास करनेवाले, १२५. महामन्दिरे वासकृत् = नन्दरायके विशाल भवनमें रहनेवाले, १२६. देवपूज्यः - देवताओंके पूजनीय ॥ २ ९ ॥ १२७. वने वत्सचारी वनमें बछड़े चरानेवाले, १२८. महावत्सहारी - महान् बछड़ेका रूप धारण करके आये हुए वत्सासुरके विनाशक, १२ ९. बकारिः = बकासुरके शत्रु, १३०. सुरैः पूजितः देवगणोंद्वारा सम्मानित, १३१. अघारिनामा - अघासुरका वध करके नूतन बछड़ोंकी सृष्टि करनेवाले, १३३. गोपकृत् = नूतन ग्वाल - बालोंका निर्माण करनेवाले, १३४. गोपवेशः = ग्वालवेषधारी, १३५. कदा ब्रह्मणा संस्तुतः - किसी समय ब्रह्माजीके मुखसे अपना गुणगान सुननेवाले, १३६. पद्मनाभः = एकार्णवके जलमें अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले ॥३० ॥

१३७. विहारी = वृन्दावनमें विचरण करनेवाले और भक्तोंके साथ नाना प्रकार विहार करनेवाले, १३८. तालभुक् = ताड़का फल खानेवाले, १३ ९. धेनुकारिः = धेनुकासुरके शत्रु १४०. सदा रक्षकः = सदा सबके रक्षक, १४१. गोविषार्ति-प्रणाशी यमुनाजीका विषाक्त जल पीनेसे गौओंके भीतर व्याप्त विषजनित पीड़ाका नाश करनेवाले, कलिन्दाङ्गजाकूलगः - कलिन्द - कन्या यमुनाके तटपर जानेवाले, १४२. कालियस्य दमी = कालियनागका दमन करनेवाले, १४३. फणेषु नृत्यकारी = कालियनागके फणोंपर नृत्य करनेवाले, १४४. प्रसिद्धः = सर्वत्र प्रसिद्धिको प्राप्त ॥ ३१ ॥

१४५. सलील: - लीलापरायण, १४६. शमी-स्वभावतः शान्त, १४७. ज्ञानदः - ज्ञानदाता, १४८. कामपूरः = कामनाओंके पूरक, १४ ९. गोपयुक् = गोपोंके साथ विराजमान, १५०. गोपः - गोपस्वरूप या गौओंके पालक, १५१. आनन्दकारी = आनन्ददायिनी लीला प्रस्तुत करनेवाले, १५२. स्थिरः = स्थैर्ययुक्त, १५३. अग्निभुक् = दावानलको पी जानेवाले, १५४. पालक: - रक्षक, १५५. बाललील: -बालकों - जैसी क्रीडा करनेवाले, १५६. सुरागः = मुरलीके स्वरोंमें सुन्दर राग गानेवाले, १५७. वंशीधरः - मुरलीधारी, १५८. पुष्पशील: -स्वभावतः फूलोंका शृङ्गार धारण करनेवाले ॥३२ ॥

१५ ९. प्रलम्बप्रभानाशकः - बलरामरूपसे प्रलम्बासुरकी प्रभाके नाशक, १६०. गौरवर्णः - गोरे वर्णवाले बलराम, १६१. बल: -बलस्वरूप या बलभद्र, १६२. रोहिणीज: - रोहिणीनन्दन, १६३. राम: - बलराम, १६४. शेषः - शेषके अवतार, १६५. बली - बलवान्, १६६. पद्मनेत्रः कमलनयन,

पृष्ठ 554

गर्ग संहिता, पृष्ठ 554 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५४८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड १६७. कृष्णाग्रजः - श्रीकृष्णके बड़े भाई, १६८. धरेशः = धरणीधर, १६ ९. फणीशः - नागराज, १७०. नीलाम्बराभ: -नीलवस्त्रकी शोभासे युक्त ॥ ३३ ॥

महासौख्यदः = महान् सौख्य देनेवाले, १७१. अग्निहारकः- मुञ्जाटवीमें लगी हुई आगको हर लेनेवाले, १७२. व्रजेश: - व्रजके स्वामी, १७३. शरद्ग्रीष्मवर्षाकरः - शरद्, ग्रीष्म और वर्षा प्रकट करनेवाले, १७४. कृष्णवर्णः- श्यामसुन्दर, १७५. व्रजे गोपिकापूजितः - व्रजमण्डलमें गोप-सुन्दरियोंद्वारा पूजित, १७६. चीरहर्ता - चीरहरणकी लीला करनेवाले १७७. कदम्बे स्थितः = चीर लेकर कदम्बपर जा बैठनेवाले, १७८. चीरदः - गोपकिशोरियोंके माँगनेपर उन्हें चीर लौटा देनेवाले, १७ ९. सुन्दरीशः = सुन्दरी गोपकुमारियोंके प्राणेश्वर ॥ ३४ ॥

१८०. क्षुधानाशकृत् = ग्वाल - बालोंकी भूख मिटानेवाले, १८१. यज्ञपत्नीमनःस्पृक् = यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंकी पत्नियोंके मनका स्पर्श करनेवाले - उनके मन - मन्दिरमें बस जानेवाले, १८२. कृपाकारकः = दया करनेवाले, १८३. केलिकर्ता - क्रीडापरायण, १८४. अवनीशः- भूस्वामी, १८५. व्रजे शक्रयाग-प्रणाशः - व्रजमण्डलमें इन्द्रयागकी परम्पराको मिटा देनेवाले, १८६. अमिताशी - गोवर्धन पूजामें समर्पित अपरिमित भोजन - राशिको आरोग लेनेवाले, १८७. शुनासीरमोहप्रदः - इन्द्रको मोह प्रदान करनेवाले अथवा उनके मोहका खण्डन करनेवाले, १८८. बालरूपी = बालरूपधारी ॥ ३५ ॥

१८ ९. गिरेः पूजक: - गिरिराज गोवर्धनकी पूजा करनेवाले, १ ९ ०. नन्दपुत्रः- नन्दरायजीके बेटे, १ ९ १. अगध्रः = गिरिवरधारी, १ ९ २. कृपाकृत् - कृपा करनेवाले, १ ९ ३. गोवर्धनोद्धारिनामा = ' गोवर्धनोद्धारी ' नामवाले, १ ९ ४. वातवर्षाहर: - आँधी और वर्षाके कष्टको हर लेनेवाले, १ ९ ५. रक्षकः = व्रजवासियोंकी रक्षा करनेवाले, १ ९ ६. व्रजाधीश-गोपाङ्गनाशङ्कितः - व्रजराज नन्द और गोपाङ्गनाओंसे डरनेवाले, अथवा गोवर्धन उठानेके अलौकिक कर्मको देखकर व्रजराज नन्द तथा गोपियोंको जिनके प्रति यह शङ्का हुई थी कि ये साधारण गोप नहीं, साक्षात् नारायण हो सकते हैं, इस तरहकी शङ्काके पात्र ॥ ३६ ॥

१ ९ ७. अगेन्द्रोपरि शक्रपूज्यः - गिरिराज गोवर्धन-के ऊपर इन्द्रके द्वारा पूजनीय, १ ९ ८. प्राक्स्तुतः = पहले जिनका स्तवन हुआ है, ऐसे, १ ९९. मृषा-शिक्षक: - अपने ऊपर शङ्का करनेवाले नन्दादि गोपोंको व्यर्थकी बातोंसे बहला देनेवाले, २००. देवगोविन्द-नामा- ' गोविन्ददेव ' नाम धारण करनेवाले, २०१. व्रजाधीशरक्षाकरः = व्रजराज नन्दकी रक्षा करनेवाले ( उन्हें वरुणलोकसे छुड़ाकर लानेवाले ), २०२. पाशिपूज्यः - पाशधारी वरुणके द्वारा पूजनीय, २०३. अनुगैर्गोपजैः दिव्यवैकुण्ठदर्शी = अनुगामी ग्वालबालोंके साथ जाकर उन्हें दिव्य वैकुण्ठधामका दर्शन करानेवाले ॥ ३७ ॥

२०४. चलच्चारुवंशीक्वणः = मनोहर वंशीकी ध्वनिको चारों ओर फैलानेवाले, २०५. कामिनीश: -गोप- सुन्दरियोंके प्राणेश्वर, २०६. व्रजे कामिनी-मोहदः - व्रजकी कामिनियोंको मोह प्रदान करनेवाले, २०७. कामरूपः = कामदेवसे भी सुन्दर रूपवाले, २०८. रसाक्तः = रसमग्न २० ९. रसी रासकृत् = रासक्रीडा करनेवाले रसोंके निधि, २१०. राधिकेशः = राधिकाके स्वामी, २११. महामोहदः = महान् मोह प्रदान करनेवाले, २१२. मानिनीमानहारी = मानिनियों-के मान हर लेनेवाले ॥ ३८ ॥

२१३. विहारी वरः = विहारशील श्रेष्ठ पुरुष, २१४. मानहृत = मान हर लेनेवाले, २१५. राधिकाङ्गः = श्रीराधिका जिनकी वामाङ्गस्वरूपा हैं, वे, २१६. धराद्वीपगः = भूमण्डलके सभी द्वीपोंमें जानेवाले, २१७. खण्डचारी - विभिन्न वनखण्डोंमें विचरनेवाले, २१८. वनस्थः - वनवासी, २१ ९. प्रिय: - सबके प्रियतम, २२०. अष्टवक्रर्षिद्रष्टा = अष्टावक्र ऋषिका दर्शन करनेवाले, २२१. सराध: - राधिकाके साथ विचरनेवाले, २२२. महामोक्षदः - महामोक्ष प्रदान करनेवाले, २२३. प्रियार्थं पद्महारी- प्रियतमाकी प्रसन्नताके लिये कमलका फूल लानेवाले ॥३ ९ ॥ २२४. वटस्थः- वटवृक्षपर विराजमान, २२५. सुरः = देवता, २२६. चन्दनाक्तः - चन्दनसे चर्चित, २२७. प्रसक्तः = श्रीराधाके प्रति अधिक अनुरक्त,

पृष्ठ 555

गर्ग संहिता, पृष्ठ 555 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति २२८. राधया व्रजं ह्यागतः = श्रीराधाके साथ व्रज-मण्डलमें अवतीर्ण, २२ ९. मोहिनीषु महामोहकृत् = मोहिनियोंमें महामोह उत्पन्न करनेवाले, २३०. गोपिका -गीतकीर्तिः - गोपिकाओं द्वारा गायी गयी कीर्तिवाले, २३१. रसस्थः - अपने स्वरूपभूत रसमें स्थित, २३२. पटी = पीताम्बरधारी, २३३. दुःखिता- कामिनीश: - दुखिया नारियोंके रक्षक ॥ ४० ॥

२३४. वने गोपिकात्यागकृत् = वनमें गोपियोंका त्याग करनेवाले, २३५. पादचिह्नप्रदर्शी = वनमें ढूँढ़ती हुई गोपिकाओंको अपना चरणचिह्न प्रदर्शित करनेवाले, २३६. कलाकारकः = चौंसठ कलाओंके कलाकार, २३७. काममोही - अपने रूप लावण्यसे कामदेवको भी मोहित करनेवाले, २३८. वशी - मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, २३ ९. गोपिकामध्यगः = गोपाङ्गनाओंके बीचमें विराजमान, २४०. पेशवाचः = मधुरभाषी, २४१. प्रियाप्रीतिकृत् = प्रिया श्रीराधासे प्रेम करनेवाले अथवा प्रियाकी प्रसन्नताके लिये कार्य करनेवाले, २४२. रासरक्त: - रासके रंगमें रँगे हुए, २४३. कलेशः = सम्पूर्ण कलाओंके स्वामी ॥४१ ॥

२४४. रसारक्तचित्तः = रसमग्न चित्तवाले, २४५. अनन्तस्वरूपः - अनन्त रूपवाले अथवा शेषनाग - स्वरूप, २४६. स्त्रजासंवृतः - आजानुलम्बिनी वनमाला धारण करनेवाले, २४७. वल्लवीमध्यसंस्थ: -गोपाङ्गनामण्डलके मध्य बैठे हुए, २४८. सुन्दर बाँहवाले, २४ ९. सुपादः = सुन्दर २५०. सुवेश: - सुन्दर वेशवाले, २५१. व्रजेशः = सुन्दर केशवाले व्रजमण्डलके २५२. सखा - सख्य - रतिके आलम्बन, २५३. प्राणवल्लभा श्रीराधाके हृदयेश, २५४. सर्वोत्कृष्ट देशस्वरूप ॥४२ ॥

सुबाहुः = चरणवाले, सुकेशो स्वामी, वल्लभेश: = सुदेश: = २५५. वणत्किङ्किणीजालभृत् = झनकारती हुई किङ्किणीक लड़को धारण करनेवाले, २५६. नूपुराढ्य: -चरणोंमें नूपुरोंकी शोभासे सम्पन्न, २५७. लसत्कङ्कणः = कलाइयोंमें सुन्दर कंगन धारण करनेवाले, २५८. अङ्गदी = बाजूबंदधारी, २५ ९. हारभारः = हारोंके भारसे विभूषित, भगवान् श्रीकृष्णके सहस्त्रनामोंका वर्णन ५४ ९ २६०. किरीटी = मुकुटधारी, २६१. चलत्कुण्डलः = कानोंमें हिलते हुए कुण्डलोंसे सुशोभित, २६२. अङ्गुलीयस्फुरत्कौस्तुभः = हाथोंमें अँगूठीके साथ वक्षःस्थलपर जगमगाती हुई कौस्तुभमणि धारण करनेवाले, २६३. मालतीमण्डिताङ्गः - मालतीकी मालासे अलंकृत शरीरवाले ॥ ४३ ॥

२६४. महानृत्यकृत् = महारास नृत्य करनेवाले, २६५. रासरङ्गः - रासरंगमें तत्पर २६६. कलाढ्यः = समस्त कलाओंसे सम्पन्न, २६७. चलद्धारभः - हिलते हुए रत्नहारकी छटा छिटकानेवाले, २६८. भामिनी-नृत्ययुक्तः = भामिनियोंके साथ नृत्यमें संलग्न, २६ ९. कलिन्दाङ्गजाकेलिकृत् = कलिन्दनन्दिनी यमुनाजीके जलमें क्रीडा करनेवाले, २७०. कुङ्कुमश्रीः = केसर - कुङ्कुमकी शोभासे सम्पन्न, २७१. सुरैर्नायिका-नायकैर्गीयमानः - नायिकाओंके नायक, अर्थात् अपनी प्राणवल्लभाओंके साथ सुशोभित देवताओंद्वारा जिनके यशका गान किया जाता है, वे ॥ ४४ ॥

२७२. सुखाढ्यः = स्वरूपभूत सुखसे सम्पन्न, २७३. राधापतिः- राधिकाके प्राणवल्लभ, २७४. पूर्ण-बोधः = पूर्ण ज्ञानस्वरूप, २७५. कटाक्षस्मिती - कुटिल कटाक्षके साथ मन्द मुस्कान - शोभा २७६. वल्गितभ्रूविलासः = नचायी विलाससे शोभायमान, २७७. सुरम्यः २७८. अलिभिः कुन्तलालोलकेश: युक्त कुछ हिलते घुँघराले केशवाले, कुन्दस्त्रजाचारुवेश: - फरफराते हुए और कुन्दकुसुमोंकी मालासे मनोहर प्रकट करनेवाले, हुई भौंहोंके - अत्यन्त रमणीय, - मँडराते भ्रमरोंसे २७ ९. स्फुरद्वर्ह-मोरपंखके मुकुट वेषवाले ॥४५ ॥

२८०. महासर्पतो नन्दरक्षापराङ्घ्रिः - जिनके चरण महान् अजगरके भयसे नन्दकी रक्षा करनेवाले हैं, वे, २८१. सदा मोक्षदः - सतत मोक्ष प्रदान करनेवाले, २८२. शङ्खचूडप्रणाशी ' शङ्खचूड़ ' नामक यक्षको मार भगानेवाले, २८३. प्रजारक्षक: - प्रजाजनोंके प्रतिपालक, २८४. गोपिकागीयमानः- गोपाङ्गनाओंद्वारा जिनके यशका गान किया जाता है, वे २८५. कुद्मिप्रणाशप्रयासः = अरिष्टासुरके वध लिये प्रयास करनेवाले, २८६. सुरेज्य: - देवताओंके पूजनीय ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 556

गर्ग संहिता, पृष्ठ 556 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५५० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड २८७. कलिः = कलिस्वरूप, २८८. क्रोधकृत् = दुष्टोंपर क्रोध करनेवाले, २८ ९. कंसमन्त्रोपदेष्टा = नारदरूपसे कंसको मन्त्रोपदेश करनेवाले, २ ९ ०. अक्रूरमन्त्रोपदेशी = अक्रूरको अपने नाम - मन्त्रका उपदेश करनेवाले अथवा उनको मन्त्रणा देनेवाले, २ ९ १. सुरार्थ: - देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेवाले, २ ९ २. बली केशिहा = केशीका नाश करनेवाले महान् बलवान्, २ ९ ३. पुष्पवर्षामलश्रीः = देवताओंद्वारा जिनपर पुष्पवर्षा की गयी है, वे भगवान्, २ ९ ४. अमलश्रीः = उज्ज्वल शोभासे सम्पन्न, २ ९ ५. नारदादेशतो व्योमहन्ता - नारदजीके कहनेसे व्योमासुरका वध करनेवाले ॥४७ ॥

२ ९ ६. अक्रूरसेवापरः- नन्द - व्रजमें आये हुए अक्रूरकी सेवामें संलग्न, २ ९ ७. सर्वदर्शी - सबके द्रष्टा, २ ९ ८. व्रजे गोपिकामोहदः - व्रजमें गोपाङ्गनाओंको मोहित करनेवाले, २ ९९. कूलवर्ती = यमुनाके तटपर विद्यमान, ३००. सतीराधिकाबोधदः = मथुरा जाते समय सती राधिकाको बोध ( आश्वासन ) देनेवाले, ३०१. स्वप्नकर्ता = श्रीराधिकाके लिये सुखमय स्वप्नकी सृष्टि करनेवाले, ३०२. विलासी = लीला - विलास -परायण, ३०३. महामोहनाशी - महामोहके नाशक, ३०४. स्वबोधः - आत्मबोधस्वरूप ॥ ४८ ॥

३०५. व्रजे शापतस्त्यक्तराधासकाश: - व्रजमें शापवश राधाके समीप निवासका त्याग करनेवाले, ३०६. महामोहदावाग्निदग्धापतिः = श्रीकृष्णविषयक महामोहरूप दावानलसे दग्ध होनेवाली श्रीराधाके पालक या प्राणरक्षक, ३०७. सखीबन्धनान्मोचिताक्रूर: -सखियोंके बन्धनसे अक्रूरको छुड़ानेवाले, ३०८. आरात् सखीकङ्कणैस्ताडिताक्रूररक्षी = निकट आयी हुई सखियोंके कंगनोंकी मारसे पीड़ित अक्रूरकी रक्षा करनेवाले ॥ ४ ९ ॥ ३० ९. व्रजे राधयारथस्थः - व्रजमें राधाके साथ रथपर विराजमान, ३१०. कृष्णचन्द्र: - श्रीकृष्णचन्द्र, ३११. गोपकैः सुगुप्तो गमी - ग्वाल - बालोंके साथ अत्यन्त गुप्तरूपसे मथुराकी यात्रा करनेवाले, ३१२. चारुलीलः - मनोहर लीलाएँ करनेवाले, ३१३. जलेऽक्रूरसंदर्शित: - यमुनाके जलमें अक्रूरको अपने रूपका दर्शन करानेवाले, ३१४. दिव्यरूपः = दिव्यरूपधारी, ३१५. दिदृक्षुः = मथुरापुरी देखनेके इच्छुक, ३१६. पुरीमोहिनीचित्तमोही - मथुरापुरीकी मोहिनी स्त्रियोंके भी चित्तको मोह लेनेवाले ॥ ५० ॥

३१७. रङ्गकारप्रणाशी = कंसके रंगकार या धोबीको नष्ट करनेवाले, ३१८. सुवस्त्र: -सुन्दर वस्त्रधारी, ३१ ९. स्त्रजी -माली सुदामाकी दी हुई माला धारण करनेवाले, ३२०. वायकप्रीतिकृत् = दर्जीको प्रसन्न करनेवाले, ३२१. मालिपूज्यः = मालीके द्वारा पूजित, ३२२. महाकीर्तिदः = मालीको महान् सुयश प्रदान करनेवाले, ३२३. कुब्जाविनोदी = कुब्जाके साथ हास - विनोद करनेवाले, ३२४. स्फुरच्चण्ड-कोदण्डरुग्ण: = कंसके कान्तिमान् कोदण्डका खण्डन ( धनुष- भङ्ग ) करनेवाले, ३२५. प्रचण्डः = प्रचण्ड ( महान् बलवान् ) दिखायी देनेवाले ॥५१ ॥

३२६. भटार्त्तिप्रदः - कंसके मल्ल योद्धाओंको पीड़ा देनेवाले, ३२७. कंसदुःस्वप्नकारी = कंसको बुरे सपने दिखानेवाले, ३२८. महामल्लवेश: = महान् मल्लोंके समान वेष धारण करनेवाले, ३२ ९. करीन्द्र-प्रहारी- गजराज कुवलयापीड़पर प्रहार करनेवाले, ३३०. महामात्यहा = महावतोंको मारनेवाले, ३३१. रङ्गभूमिप्रवेशी - कंसकी मल्लशालामें प्रवेश करनेवाले, ३३२. रसाढ्यः = नौ रसोंसे सम्पन्न ( भिन्न - भिन्न द्रष्टाओंको विभिन्न रसोंके आलम्बनके रूपमें दिखायी देनेवाले ), ३३३. यशःस्पृक्-यशस्वी, ३३४. बलीवाक्पटुश्रीः = अनन्त शक्तिसे सम्पन्न और बातचीत करनेमें प्रवीण ऐश्वर्यवान् ॥५२ ॥

३३५. महामल्लहा- बड़े - बड़े मल्ल चाणूर और मुष्टिक आदिका वध करनेवाले, ३३६. युद्धकृत् - युद्ध करनेवाले, ३३७. स्त्रीवचोऽर्थी - रंगोत्सव देखनेके लिये आयी हुई स्त्रियोंके वचनोंको सुननेकी इच्छावाले, ३३८. धरानायक: कंसहन्ता - कंसका हनन करने-वाले भूतलके स्वामी, ३३ ९. प्राग्यदुः = पूर्ववर्ती राजा यदुस्वरूप, ३४०. सदापूजितः - सदा सबसे पूजित, ३४१. उग्रसेनप्रसिद्धः - उग्रसेनकी प्रसिद्धिके कारण, ३४२. धराराज्यदः = उग्रसेनको भूमण्डलका राज्य

पृष्ठ 557

गर्ग संहिता, पृष्ठ 557 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति देनेवाले, ३४३. यादवैर्मण्डिताङ्गः = यादवोंसे सुशोभित शरीरवाले ॥ ५३ ॥

३४४. गुरोः पुत्रदः - गुरुको पुत्र प्रदान करनेवाले, ३४५. ब्रह्मविद् = ब्रह्मवेत्ता, ३४६. ब्रह्मपाठी - वेदपाठ करनेवाले, ३४७. महाशङ्खहा = महान् राक्षस शङ्खासुरका वध करनेवाले, ३४८. दण्डधृक्पूज्यः = दण्डधारी यमराजके लिये पूजनीय, ३४ ९. व्रजे उद्धव-प्रेषिता = व्रजमें वहाँका समाचार जाननेके लिये उद्धवको भेजनेवाले, ३५०. गोपमोही - अपने रूप, गुण और सद्भावसे गोपगणोंको मोह लेनेवाले, ३५१. यशोदाघृणी = मैया यशोदाके प्रति अत्यन्त कृपालु, ३५२. गोपिकाज्ञानदेशी - गोपाङ्गनाओंको ज्ञानोपदेश करनेवाले ॥ ५४ ॥

३५३. सदा स्नेहकृत् सदा स्नेह करनेवाले, ३५४. कुब्जया पूजिताङ्गः = कुब्जाके द्वारा पूजित अङ्गवाले, ३५५. अक्रूरगेहंगमी = अक्रूरके घर पधारने -वाले, ३५६. मन्त्रवेत्ता - मन्त्रणाके मर्मज्ञ, ३५७. पाण्डवप्रेषिताक्रूर: - पाण्डवोंका समाचार लानेके लिये अक्रूरको भेजनेवाले, ३५८. सुखी सर्वदर्शी -सौख्ययुक्त, सबके साक्षी अथवा सर्वज्ञ, ३५ ९. नृपानन्द-कारी - राजा उग्रसेनको आनन्द देनेवाले ॥ ५५ ॥

३६०. महाक्षौहिणीहा = जरासंधकी तीस अक्षौहिणी सेनाका विनाश करनेवाले, ३६१. जरासंध -मानोद्धरः = जरासंधका मान भङ्ग करनेवाले, ३६२. द्वारकाकारकः = द्वारकापुरीका निर्माण करनेवाले, ३६३. मोक्षकर्ता = भव - बन्धनसे छुटकारा दिलाने-वाले, ३६४. रणी - युद्धके लिये सदा उद्यत, ३६५. सार्वभौमस्तुतः = सत्ययुगके चक्रवर्ती राजा मुचुकुन्द जिनकी स्तुति की, ऐसे, ३६६. ज्ञानदाता -मुचुकुन्दको ज्ञान प्रदान करनेवाले, ३६७. जरासंध -संकल्पकृत् - एक बार अपनी पराजयका अभिनय करके जरासंध संकल्पकी पूर्ति करनेवाले, ३६८. धावदङ्घ्रिः = पैदल भागनेवाले ॥ ५६ ॥

३६ ९. नगादुत्पतन्द्वारकामध्यवर्ती - प्रवर्षणगिरिसे उछलकर द्वारकापुरीके बीच विराजमान, ३७०. रेवती-भूषणः - बलरामरूपसे रेवती सौभाग्यभूषण, ३७१. तालचिह्नो यदु: - तालके चिह्नसे युक्त ध्वजा -भगवान् श्रीकृष्णके सहस्त्रनामोंका वर्णन ५५१ वाले यदुवीर, ३७२. रुक्मिणीहारकः = रुक्मिणीका अपहरण करनेवाले, ३७३. चैद्यभेद्यः = चेदिराज शिशुपाल जिनका वध्य वे, ३७४ रुक्मिरूपप्रणाशी -रुक्मीकी आधी मूँछ मूँड़कर उसे कुरूप बनानेवाले, ३७५. सुखाशी - स्वरूपभूत आनन्दके आस्वादक ॥ ५७ ॥

३७६ अनन्तः - शेषनागस्वरूप, ३७७. मारः = कामदेवावतार, ३७८. कार्ष्णिः = कृष्णकुमार प्रद्युम्न, ३७ ९. काम: - कामदेव, ३८०. मनोज: - काम, ३८१. शम्बरारिः = शम्बरासुरके शत्रु कामदेव, ३८२. रतीश: - रतिके स्वामी, ३८३. रथी - रथारूढ़, ३८४. मन्मथः = मनको मथ देनेवाले, ३८५. मीनकेतुः = मत्स्यचिह्न ध्वजासे युक्त, ३८६. शरी = बाणधारी, ३८७. स्मरः = काम, ३८८. दर्पक: - कामदेव, ३८ ९. मानहा = मानमर्दन करनेवाले, ३ ९ ०. पञ्चबाणः = पञ्चबाणधारी कामदेव ( ये सब नाम प्रद्युम्नस्वरूप श्रीहरिके पर्यायवाची हैं ) ॥५८ ॥

३ ९ १. प्रियः सत्यभामापतिः = सत्यभामाके प्रिय पति, ३ ९ २. यादवेशः = यादवोंके स्वामी, ३ ९ ३. सत्राजित्प्रेमपूरः = सत्राजित्‌के प्रेमको पूर्ण करनेवाले, ३ ९ ४. प्रहासः - उत्कृष्ट हासवाले, ३ ९ ५. महारत्नदः - महारत्र स्यमन्तकको ढूँढ़कर ला देनेवाले, ३ ९ ६. जाम्बवद्युद्धकारी - जाम्बवान्से युद्ध करनेवाले, ३ ९ ७. महाचक्रधृक् = महान् सुदर्शनचक्र धारण करनेवाले, ३ ९ ८. खड्गधृक् = ' नन्दक ' नामक खड्ग धारण करनेवाले, ३ ९९. रामसंधि: -बलरामजीके साथ संधि करनेवाले ॥ ५ ९ ॥ ४००. विहारस्थितः = लीलाविहारपरायण, ४०१. पाण्डवप्रेमकारी = पाण्डवोंसे प्रेम करनेवाले, ४०२. कलिन्दाङ्गजामोहनः = कालिन्दीके मनको मोह लेनेवाले, ४०३. खाण्डवार्थी - खाण्डव - वनको अग्निदेवके लिये अर्पित करनेके इच्छुक, ४०४. फाल्गुनप्रीतिकृत् सखा- अर्जुनपर प्रेम रखनेवाले उनके सखा, ४०५. नग्नकर्ता - खाण्डव वनको जलाकर नग्न ( शून्य ) करनेवाले, ४०६. मित्रविन्दापतिः -' मित्रविन्दा ' नामवाली अवन्तीदेशकी राजकुमारीके पति, ४०७. क्रीडनार्थी - क्रीडा या खेलके

पृष्ठ 558

गर्ग संहिता, पृष्ठ 558 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५५२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड इच्छुक ॥ ६० ॥

४०८. नृपप्रेमकृत् = राजा नग्नजित्से प्रेम करनेवाले, ४० ९. सप्तरूपो गोजयी- सात रूप धारण करके सात बिगड़ैल बैलोंको एक ही साथ नाथकर काबू में कर लेनेवाले, ४१०. सत्यापतिः -नग्नजित्कुमारी सत्याके पति, ४११. पारिवहीं राजा नग्नजित्के द्वारा दिये दहेजको ग्रहण करनेवाले, ४१२. यथेष्टम् - पूर्ण, ४१३. नृपैः संवृतः - सत्याको लेकर लौटते समय मार्गमें युद्धार्थी राजाओंद्वारा घेर लिये जानेवाले, ४१४. भद्रापतिः = भद्राके स्वामी, ४१५. मधोर्विलासी - मधुमास चैत्रकी पूर्णिमाको रासविलास करनेवाले, ४१६. मानिनीशः - मानिनी जनोंके प्राणवल्लभ, ४१७. जनेश: - प्रजाजनोंके स्वामी ॥ ६१ ॥

४१८. शुनासीरमोहावृतः - इन्द्रके प्रति मोह ( स्नेह एवं कृपाभाव ) से युक्त, ४१ ९. सत्सभार्यः = सती भार्यासे युक्त, ४२०. सतार्क्ष्य: = गरुडपर आरूढ़, ४२१. मुरारिः = मुर दैत्यका नाश करनेवाले, ४२२. पुरीसंघभेत्ता - भौमासुरकी पुरीके दुर्गसमुदायका भेदन करनेवाले, ४२३. सुवीरः शिरः खण्डनः -श्रेष्ठवीर असुरोंका मस्तक काटनेवाले, ४२४. दैत्य -नाशी- दैत्योंका नाश करनेवाले, ४२५. शरी भौमहा = सायकधारी होकर भौमासुरका वध करनेवाले, ४२६. चण्डवेग: -प्रचण्ड वेगशाली, ४२७. प्रवीरः = उत्कृष्ट वीर ॥६२ ॥

४२८. धरासंस्तुतः - पृथ्वीदेवीके मुखसे अपना गुणगान सुननेवाले, ४२ ९. कुण्डलच्छत्रहर्ता - अदिति -के कुण्डल और इन्द्रके छत्रको भौमासुरकी राजधानीसे लेकर उसे स्वर्गलोकतक पहुँचानेवाले, ४३०. महा-रत्नयुक् = महान् मणिरत्नोंसे सम्पन्न, ४३१. राजकन्या -अभिरामः - सोलह हजार राजकुमारियोंके सुन्दर पति, ४३२. शचीपूजितः - स्वर्गमें इन्द्रपत्नी शचीके द्वारा सम्मानित, ४३३. शक्रजित् पारिजातके लिये होने-वाले युद्धमें इन्द्रको जीतनेवाले, ४३४. मानहर्ता = इन्द्रका अभिमान चूर्ण कर देनेवाले, ४३५. पारि -जातापहारी रमेश: - पारिजातका अपहरण करनेवाले रमावल्लभ ॥ ६३ ॥

४३६. गृही चामरैः शोभितः = गृहस्थरूपमें रहकर श्वेत चँवर डुलाये जानेके कारण अतिशय शोभायमान, ४३७. भीष्मककन्यापतिः = राजा भीष्मककी पुत्री रुक्मिणीके पति, ४३८. हास्यकृत् = रुक्मिणीके साथ परिहास करनेवाले, ४३ ९. मानिनीमानकारी = मानिनी रुक्मिणीको मान देनेवाले, ४४० रुक्मिणीवाक्पटुः-रुक्मिणीको अपनी बातोंसे रिझानेमें कुशल, ४४१. प्रेमगेहः = प्रेमके अधिष्ठान, ४४२. सतीमोहनः = सतियोंको भी मोह लेनेवाले, ४४३. कामदेवा-परश्रीः = दूसरे कामदेवके समान मनोरम सुषमासे सम्पन्न ॥६४ ॥

४४४. सुदेष्णः = ' सुदेष्ण ' नामक श्रीकृष्ण - पुत्र, ४४५. सुचारु: - सुचारु, ४४६. चारुदेष्णः = चारुदेष्ण, ४४७. चारुदेह: - चारुदेह, ४४८. बली चारुगुप्तः = बली, चारुगुप्त, ४४ ९. सुती भद्रचारु: - पुत्रवान् भद्रचारु, ४५०. चारुचन्द्रः = चारुचन्द्र, ४५१. विचारुः = विचारु, ४५२. चारु: -चारु, ४५३. रथी पुत्ररूपः - रथी पुत्रस्वरूप ॥ ६५ ॥

४५४. सुभानुः = सुभानु, ४५५. प्रभानुः प्रभानु, ४५६. चन्द्रभानुः = चन्द्रभानु, ४५७. बृहद्भानुः = बृहद्भानु, ४५८. अष्टभानुः = अष्टभानु, ४५ ९. साम्ब: -साम्ब, ४६०. सुमित्र: - सुमित्र, ४६१. क्रतुः क्रतु, ४६२. चित्रकेतुः - चित्रकेतु, ४६३. वीरः अश्व-सेनः = वीर अश्वसेन, ४६४. वृषः = वृष, ४६५. चित्रगुः = चित्रगु, ४६६. चन्द्रबिम्ब: = चन्द्रबिम्ब ॥ ६६ ॥

४६७. विशङ्कुः - विशङ्कु, ४६८. वसुः = वसु, ४६ ९. श्रुतः = श्रुत, ४७०. भद्रः = भद्र, ४७१. सुबाहुः वृषः - उत्तम भुजाओं - युक्त वृष, ४७२. पूर्णमासः = पूर्णमास, ४७३. सोमः वरः - श्रेष्ठ सोम, ४७४. शान्ति: -शान्ति, ४७५. प्रघोष: - प्रघोष, ४७६. सिंहः = सिंह, ४७७. बलः ऊर्ध्वगः - बल और ऊर्ध्वग ४७८. वर्धनः = वर्धन, ४७ ९. उन्नादः - उन्नाद ॥६७ ॥

४८०. महाश: - महाश, ४८१. वृकः- वृक, ४८२. पावनः = पावन, ४८३. वह्निमित्र: - वह्निमित्र, ४८४. क्षुधिः = क्षुधि, ४८५. हर्षक: - हर्षक, ४८६. अनिलः - अनिल, ४८७. अमित्रजित्: = अमित्रजित् ४८८. सुभद्रः = सुभद्र, ४८ ९. जयः = जय, ४ ९ ०. सत्यकः = सत्यक, ४ ९ १. वामः = वाम, ४ ९२.आयुः =

पृष्ठ 559

गर्ग संहिता, पृष्ठ 559 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ ९ ] गर्गाचार्यके द्वारा राजा उग्रसेनके प्रति आयु, यदुः = यदु, ४ ९ ३. कोटिशः पुत्रपौत्रैः प्रसिद्धः = इस प्रकार करोड़ों पुत्र - पौत्रोंसे प्रसिद्ध ॥ ६८ ॥

४ ९ ४. हली दण्डधृक् = ईषादण्डधारी हलधर बलराम, ४ ९ ५. रुक्महा = रुक्मीका वध करनेवाले, ४ ९ ६. अनिरुद्धः = किसीके द्वारा रोके न जा सकने-वाले, ४ ९ ७. राजभिर्हास्यगः = अनिरुद्धके विवाहमें द्यूत - क्रीड़ाके समय राजाओंने जिनकी हँसी उड़ायी, वे, ४ ९ ८. द्यूतकर्ता = विनोदके लिये द्यूत - क्रीड़ामें भाग लेनेवाले बलरामजी ४ ९९ मधुः = मधुवंशमें अवतीर्ण, ५००. ब्रह्मसू: -ब्रह्माजीके अवतार अनिरुद्ध, ५०१. बाणपुत्रीपतिः- बाणासुरकी कन्या ऊषाके स्वामी, ५०२. महासुन्दरः - अतिशय सौन्दर्य -शाली, ५०३. कामपुत्रः = प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धरूप, ५०४. बलीशः - बलवानोंके ईश्वर ॥ ६ ९ ॥ ५०५. महादैत्यसंग्रामकृद् यादवेश: - बड़े - बड़े दैत्योंके साथ युद्ध करनेवाले यादवोंके स्वामी, ५०६. पुरीभञ्जनः = बाणासुरकी नगरीको नष्ट - भ्रष्ट करनेवाले, ५०७. भूतसंत्रासकारी - भूतगणोंको संत्रस्त कर देनेवाले, ५०८. मृधे रुद्रजित् - युद्धमें रुद्रको जीतनेवाले, ५० ९. रुद्रमोही - जृम्भणास्त्र प्रयोगसे रुद्रदेवको मोहित करनेवाले, ५१०. मृधार्थी = युद्धाभिलाषी, ५११. स्कन्दजित् = कुमार कीर्तिकेयको परास्त करनेवाले, ५१२. कूपकर्णप्रहारी - = ' कूपकर्ण ' नामक प्रमथगणपर प्रहार करनेवाले ॥ ७० ॥

५१३. धनुर्भञ्जनः = धनुष भङ्ग करनेवाले, ५१४. बाणमानप्रहारी- बाणासुरके अभिमानको चूर्ण कर देनेवाले, ५१५. ज्वरोत्पत्तिकृत् = ज्वरकी उत्पत्ति करनेवाले, ५१६. ज्वरेण संस्तुतः = रुद्रके ज्वरद्वारा जिनकी स्तुति की गयी, वे, ५१७. भुजाछेदकृत् - बाणासुरकी बाँहोंको काट देनेवाले, ५१८. बाणसंत्रासकर्ता - बाणासुरके मनमें त्रास उत्पन्न कर देनेवाले, ५१ ९. मृडप्रस्तुतः = भगवान् शिवके द्वारा स्तुत, ५२०. युद्धकृत् = युद्ध करनेवाले, ५२१. भूमिभर्त्ता - भूमण्डलका भरण - पोषण करनेवाले, अथवा भूदेवीके पति ॥ ७१ ॥

५२२. नृगं मुक्तिदः - राजा नृगका उद्धार करने-वाले, ५२३. यादवानां ज्ञानदः - यादवोंको ज्ञान देने-भगवान् श्रीकृष्णके सहस्रनामोंका वर्णन ५५३ वाले, ५२४. रथस्थः- दिव्य रथपर आरूढ़, ५२५. व्रजप्रेमपः = व्रजविषयक प्रेमके पालक अथवा व्रजवासियोंके प्रेमरसका पान करनेवाले, ५२६. गोपमुख्यः - गोपशिरोमणि, ५२७. महा-सुन्दरीक्रीडितः = अपनी प्रेयसी परम सुन्दरियोंके साथ क्रीडा करनेवाले बलरामजी, ५२८. पुष्पमाली - पुष्प-मालाओंसे अलंकृत, ५२ ९. कलिन्दाङ्गजाभेदन: -कालिन्दीकी धाराको फोड़कर अपनी ओर खींच लाने-वाले, ५३०. सीरपाणि: = हाथमें हल धारण करने-वाले ॥ ७२ ॥

५३१. महादम्भिहा- बड़े - बड़े दम्भी - पाखण्डियोंका दमन करनेवाले, ५३२. पौण्ड्रमानप्रहारी = पौण्ड्रकके घमंडको चूर्ण कर देनेवाले, ५३३. शिरश्छेदकः-उसके मस्तकको काट देनेवाले, ५३४. काशिराज-प्रणाशी - काशिराजका नाश करनेवाले, ५३५. महा-अक्षौहिणीध्वंसकृत् = शत्रुओंकी विशाल अक्षौहिणी सेनाका विनाश करनेवाले, ५३६. चक्रहस्तः - चक्र-पाणि, ५३७. पुरीदीपक: - काशीपुरीको जलानेवाले, ५३८. राक्षसीनाशकर्ता = राक्षसीके नाशक ॥७३ ॥

५३ ९. अनन्तः - शेषनागरूप, ५४०. महीधः-धरणीको धारण करनेवाले, ५४१. फणी - फणधारी, ५४२. वानरारिः = ' द्विविद ' नामक वानरके शत्रु, ५४३. स्फुरद्गौरवर्णः - प्रकाशमान गौरवर्णवाले, ५४४. महापद्मनेत्रः = प्रफुल्ल कमलके समान विशाल नेत्रवाले, ५४५. कुरुग्रामतिर्यग्गतिः = कौरवोंके निवासस्थल हस्तिनापुरको गङ्गाकी ओर तिरछी दिशामें खींच लेनेवाले, ५४६. गौरवार्थ कौरवैः स्तुतः -जिनका गौरव प्रकट करनेके लिये कौरवोंने स्तुति की, वे बलरामजी, ५४७. ससाम्बः पारिबही - साम्बके साथ कौरवोंसे दहेज लेकर लौटनेवाले ॥ ७४ ॥

५४८. महावैभवी = महान् वैभवशाली, ५४ ९. द्वारकेश: - द्वारकानाथ, ५५०. अनेकः - अनेक रूपधारी, ५५१. चलन्नारदः = नारदजीको विचलित कर देनेवाले, ५५२. श्रीप्रभादर्शक: - अपनी लक्ष्मी तथा प्रभावको दिखानेवाले, ५५३. महर्षिस्तुतः = महर्षियोंसे संस्तुत, ५५४. ब्रह्मदेव: - ब्राह्मणोंको देवता माननेवाले अथवा ब्रह्माजीके आराध्यदेव, ५५५. पुराण: -

पृष्ठ 560

गर्ग संहिता, पृष्ठ 560 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५५४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड पुराणपुरुष, ५५६. सदा षोडशस्त्रीसहस्थितः = सर्वदा सोलह हजार पत्नियोंके साथ रहनेवाले ॥ ७५ ॥

५५७. गृही = आदर्श गृहस्थ, ५५८. लोक -रक्षापरः- समस्त लोकोंकी रक्षा तत्पर, ५५ ९. लोकरीतिः = लौकिक रीतिका अनुसरण करनेवाले, ५६०. प्रभुः = अखिल विश्वके स्वामी, ५६१. उग्रसेनावृतः = उग्र सेनाओंसे घिरे हुए, ५६२. दुर्गयुक्त: - दुर्गसे युक्त, ५६३. राजदूतस्तुतः = जरासंधके बंदी राजाओंद्वारा भेजे गये दूतने जिनकी स्तुति की, वे, ५६४. बन्धभेत्ता स्थितः = बन्दी राजाओंके बन्धन काटकर उनके लिये मुक्तिदाताके रूपमें स्थित नित्य विद्यमान, ५६५. नारदप्रस्तुतः = नारदजीके द्वारा संस्तुत, ५६६. पाण्डवार्थी = पाण्डवोंका अर्थ सिद्ध करनेवाले ॥ ७६ ॥

५६७. नृपैर्मन्त्रकृत् - राजाओंके साथ सलाह करनेवाले, ५६८. उद्धवप्रीतिपूर्णः - उद्धवकी प्रीतिसे परिपूर्ण, ५६ ९. पुत्रपौत्रैर्वृतः = पुत्र - पौत्रोंसे घिरे हुए, ५७०. कुरुग्रामगन्ता घृणी = कुरुग्राम – इन्द्रप्रस्थमें जानेवाले दयालु, ५७१. धर्मराजस्तुतः = धर्मराज युधिष्ठिरसे संस्तुत, ५७२. भीमयुक्तः = भीमसेनसे सप्रेम मिलनेवाले, ५७३. परानन्ददः = परमानन्द प्रदान करनेवाले, ५७४. धर्मजेन मन्त्रकृत् - धर्मराज युधिष्ठिरसे सलाह करनेवाले ॥७७ ॥

५७५. दिशाजित् बली - दिग्विजय बलवान्, ५७६. राजसूयार्थकारी - युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञ - सम्बन्धी कार्यको सिद्ध करनेवाले, ५७७. जरासंधहा = जरासंधका वध करनेवाले, ५७८. भीमसेनस्वरूपः = भीमसेनस्वरूप, ५७ ९. विप्ररूपः = ब्राह्मणका रूप धारण करके जरासंधके पास जानेवाले, ५८०. गदा -युद्धकर्ता = भीमरूपसे गदायुद्ध करनेवाले, ५८१. कृपालुः = दयालु, ५८२. महाबन्धनच्छेदकारी = बड़े - बड़े बन्धनोंको काट देनेवाले अथवा महान् भवबन्धनका उच्छेद करनेवाले ॥ ७८ ॥

५८३. नृपैः संस्तुतः जरासंधके कारागारसे मुक्त राजाओंद्वारा संस्तुत, ५८४. धर्मगेहमागतः = धर्मराजके घरमें आये हुए, ५८५. द्विजैः संवृतः - ब्राह्मणोंसे घिरे हुए, ५८६. यज्ञसम्भारकर्ता = यज्ञके उपकरण जुटाने-वाले, ५८७. जनैः पूजितः = सब लोगोंसे पूजित, ५८८. चैद्यदुर्वाक्क्षम: - चेदिराज शिशुपाल दुर्वचनोंको सह लेनेवाले, ५८ ९. महामोक्षदः -उसे महान् मोक्ष देनेवाले, ५ ९ ०. अरे: शिरश्छेदकारी = सुदर्शन चक्रसे शत्रु शिशुपालका सिर काट लेनेवाले ॥ ७ ९ ॥ ५ ९ १. महायज्ञशोभाकरः = युधिष्ठिरके महान् यज्ञकी शोभा बढ़ानेवाले, ५ ९ २. चक्रवर्ती नृपानन्दकारी = राजाओंको आनन्द प्रदान करनेवाले सार्वभौम सम्राट्, ५ ९ ३. सुहारी विहारी - सुन्दर हारसे सुशोभित विहार-परायण प्रभु, ५ ९ ४. सभासंवृतः = सभासदोंसे घिरे हुए, ५ ९ ५. कौरवस्य मानहृत् = कुरुराज दुर्योधनका मान हर लेनेवाले, ५ ९ ६. शाल्वसंहारक: - राजा शाल्वका संहार करनेवाले, ५ ९ ७ यानहन्ता - शाल्वके सौभ विमानको तोड़ डालनेवाले ॥८० ॥

५ ९ ८. सभोजः = भोजवंशियोंसहित, ५ ९९. वृष्णिः = वृष्णिवंशी, ६०० मधुः = मधुवंशी, ६० ९. शूरसेन: - शूरवीर सेनासे संयुक्त, अथवा शूरसेनवंशी, ६०२. दशार्हः = दशार्हवंशी, ६०३. यदुः अन्धक: - यदुवंशी तथा अन्धकवंशी, ६०४. लोकजित् = लोकविजयी, ६०५ द्युमन्मानहारी = द्युमान्‌का मान हर लेनेवाले, ६०६. वर्मधृक = कवचधारी, ६०७. दिव्य-शस्त्री - दिव्य आयुधधारी, ६०८. स्वबोधः = आत्म-बोधस्वरूप, ६० ९. सदा रक्षक: - साधुपुरुषोंकी सदा रक्षा करनेवाले, ६१०. दैत्यहन्ता - दैत्योंका वध करनेवाले ॥८१ ॥

६११. दन्तवक्त्रप्रणाशी = दन्तवक्त्रका नाश करनेवाले, ६१२. गदाधृक् = गदाधारी, ६१३. जगत्तीर्थयात्राकरः = सम्पूर्ण जगत्की तीर्थयात्रा करनेवाले बलरामजी ६१४. पद्महारः - कमलकी माला धारण करनेवाले, ६१५. कुशी सूतहन्ता = कुश हाथमें लेकर रोमहर्षण सूतका वध करनेवाले, ६१६. कृपाकृत् कृपा करनेवाले, ६१७. स्मृतीशः = धर्मशास्त्रोंके स्वामी, ६१८. अमल: - निर्मल स्वरूप, ६१ ९. बल्वलाङ्गप्रभाखण्डकारी - बल्वलकी अङ्ग-