गर्ग संहिता — पृष्ठ 71–80
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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अध्याय १ ९ ] दामोदर कृष्णका उलूखल - बन्धन देवनायक - ये ' नौ नन्द ' कहे गये हैं, जो व्रजके गोकुलमें उत्पन्न हुए थे । वीतिहोत्र, अनिभुक्, साम्ब, श्रीवर, गोपति, श्रुत, व्रजेश, पावन तथा शान्त - ये ' उपनन्द ' कहे गये हैं । नीतिवित्, मार्गद, शुक्ल, पतंग, दिव्यवाहन और गोपेष्ट - ये छः ' वृषभानु ' हैं, जिन्होंने व्रजमें जन्म धारण किया था । जो गोलोकधाममें श्रीकृष्णचन्द्रके निकुञ्जद्वारपर रहकर हाथमें बेंत लिये पहरा देते थे, वे श्याम अङ्गवाले गोप व्रजमें ' नौ नन्द ' के नामसे विख्यात हुए । निकुञ्जमें जो करोड़ों गायें हैं, उनके पालनमें तत्पर, मोरपंख और मुरली धारण करनेवाले गोप यहाँ ' उपनन्द ' कहे गये हैं । निकुञ्ज-दुर्गकी रक्षाके लिये जो दण्ड और पाश धारण किये उसके छहों द्वारोंपर रहा करते हैं, वे ही छः गोप यहाँ ' छः वृषभानु ' कहलाये । श्रीकृष्णकी इच्छासे ही वे सब लोग गोलोकसे भूतलपर उतरे हैं । उनके प्रभावका वर्णन करनेमें चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, फिर मैं उनके महान् अभ्युदयशाली सौभाग्यका कैसे वर्णन कर सकूँगा, जिनकी गोदमें बैठकर बाल - क्रीडापरायण श्रीहरि सदा सुशोभित होते थे ॥४- १२ ॥ एक दिनकी बात है, यमुनाके तटपर श्रीकृष्णने मिट्टीका आस्वादन किया । यह देख बालकोंने यशोदाजीके पास आकर कहा - ' अरी मैया! तुम्हारा लाला तो मिट्टी खाता है । ' बलभद्रजीने भी उनकी हाँ में हाँ मिला दी । तब नन्दरानीने अपने पुत्रका हाथ पकड़ लिया । बालकके नेत्र भयभीत से हो तथा उनके द्वारा यमलार्जुन - वृक्षोंका उद्धार उठे । मैयाने उससे कहा ॥ १३-१४ ॥ यशोदाजीने पूछा — ओ महामूढ़! खायी! तेरे ये साथी भी बता रहे हैं बड़े भैया ये बलराम भी यही बात ' माँ! मना करनेपर भी यह मिट्टी खाना इसे मिट्टी बड़ी प्यारी लगती है ' ॥१५ ॥
श्रीभगवान्ने कहा – मैया! व्रजके ६५ तूने क्यों मिट्टी और साक्षात् कहते हैं कि नहीं छोड़ता । ये सारे बालक झूठ बोल रहे हैं । मैंने कहीं भी मिट्टी नहीं खायी । यदि तुम्हें मेरी बातपर विश्वास न हो तो मेरा मुँह देख लो ॥ १६ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तब गोपी यशोदाने बालकका सुन्दर मुख खोलकर देखा । यशोदाको उसके भीतर तीनों गुणोंद्वारा रचित और सब ओर फैला हुआ ब्रह्माण्ड दिखायी दिया । सातों द्वीप, सात समुद्र, भारत आदि वर्ष, सुदृढ़ पर्वत, ब्रह्मलोक - पर्यन्त तीनों लोक तथा समस्त व्रज-मण्डलसहित अपने शरीरको भी यशोदाने अपने पुत्रके मुखमें देखा । यह देखते ही उन्होंने आँखें बंद कर लीं और श्रीयमुनाजीके तटपर बैठकर सोचने लगीं – ' यह मेरा बालक साक्षात् श्रीनारायण है । ' इस तरह वे ज्ञाननिष्ठ हो गयीं । तब श्रीकृष्ण उन्हें अपनी मायासे मोहित - सी करते हुए हँसने लगे । यशोदाजीकी स्मरण शक्ति विलुप्त हो गयी । उन्होंने श्रीकृष्णका जो वैभव देखा था, वह सब वे तत्काल भूल गयीं ॥ १७–२० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' ब्रह्माण्डदर्शन ' नामक अठाहरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ दामोदर कृष्णका उलूखल - बन्धन तथा श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! एक समय गोपाङ्गनाएँ घर - घरमें गोपालकी लीलाएँ गाती हुई गोकुलमें सब ओर दधि - मन्थन कर रही थीं । श्रीनन्द -मन्दिरमें सुन्दरी यशोदाजी भी प्रातः काल उठकर दहीके भाण्डमें रई डालकर उसे मथने लगीं । अध्याय उनके द्वारा यमलार्जुन - वृक्षोंका उद्धार मथानीकी आवाज सुनकर बालक श्रीनन्दनन्दन भी नवनीतके लिये कौतूहलवश मञ्जीरकी मधुर ध्वनि प्रकट करते हुए नाचने लगे । माताके पास बाल-क्रीडापरायण श्रीकृष्ण बार - बार चक्कर लगाते और नाचते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे और बजती हुई
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६६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड करधनीके घुघुरुओंकी मधुर झंकार बारंबार फैला रहे थे । वे मातासे मीठे वचन बोलकर ताजा निकाला हुआ माखन माँग रहे थे । जब वह उन्हें नहीं मिला, तब वे कुपित हो उठे और एक पत्थरका टुकड़ा लेकर उसके द्वारा दही मथनेका पात्र फोड़ दिया । ऐसा करके वे भाग चले । यशोदाजी भी अपने पुत्रको पकड़नेके लिये पीछे-पीछे दौड़ीं । वे उनसे एक ही हाथ आगे थे, किंतु वे उन्हें पकड़ नहीं पाती थीं । जो योगीश्वरोंके लिये भी दुर्लभ हैं, वे माताकी पकड़में कैसे आ सकते थे ॥१–६ ॥ नृपेश्वर! तथापि श्रीहरिने भक्तोंके प्रति अपनी भक्तवश्यता दिखायी, इसलिये वे जान - बूझकर माताके हाथ आ गये । अपने बालक - पुत्रको पकड़कर यशोदाने रोषपूर्वक ऊखलमें बाँधना आरम्भ किया । वे जो - जो बड़ी से बड़ी रस्सी उठातीं, वही वही उनके पुत्रके लिये कुछ छोटी पड़ जाती थी । जो प्रकृतिके तीनों गुणोंसे न बँध सके, वे प्रकृतिसे परे विद्यमान परमात्मा यहाँके गुणसे ( रस्सीसे ) कैसे बँध सकते थे? जब यशोदा बाँधते - बाँधते थक गयीं और हतोत्साह होकर बैठ रहीं तथा बाँधनेकी इच्छा भी छोड़ बैठीं, तब ये स्वच्छन्दगति भगवान् श्रीकृष्ण स्ववश होते हुए भी कृपा करके माताके बन्धनमें आ गये । भगवान्की ऐसी कृपा कर्मत्यागी ज्ञानियोंको भी नहीं मिल सकी; फिर जो कर्ममें आसक्त हैं, उनको तो मिल ही कैसे सकती है । यह भक्तिका ही प्रताप है कि वे माताके बन्धनमें आ गये । नरेश्वर! इसीलिये भगवान् ज्ञानके साधक आराधकोंको मुक्ति तो दे देते हैं, किंतु भक्ति नहीं देते । उसी समय बहुत - सी गोपियाँ भी शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं । उन्होंने देखा कि दही मथनेका भाण्ड फूटा हुआ है और भयभीत नन्द - शिशु बहुत - सी रस्सियोंद्वारा ओखलीमें बँधे खड़े हैं । यह देखकर उन्हें बड़ी दया आयी और वे यशोदाजीसे बोलीं ॥ ७ - ११ ॥ गोपियोंने कहा – नन्दरानी! तुम्हारा यह नन्हा सा बालक सदा ही हमारे घरोंमें जाकर बर्तन -भाँड़े फोड़ा करता है, तथापि हम करुणावश इसे कभी * करुणानिधये तुभ्यं जगन्मङ्गलशीलिने कुछ नहीं कहतीं । व्रजेश्वरि यशोदे! तुम्हारे दिलमें जरा भी दर्द नहीं है, तुम निर्दय हो गयी हो । एक बर्तनके फूट जानेके कारण तुमने इस बच्चेको छड़ीसे डराया-धमकाया है और बाँध भी दिया है! ॥ १२-१३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- नरेश्वर! उन गोपियोंके यों कहनेपर यशोदाजी कुछ नहीं बोलीं । वे घरके काम - धंधों में लग गयीं । इसी बीच मौका पाकर श्रीकृष्ण ग्वाल - बालोंके साथ वह ओखली खींचते हुए श्रीयमुनाजीके किनारे चले गये । यमुनाजीके तटपर दो पुराने विशाल वृक्ष थे, जो एक - दूसरेसे जुड़े हुए खड़े थे । वे दोनों ही अर्जुन - वृक्ष थे । दामोदर भगवान् कृष्ण हँसते हुए उन दोनों वृक्षोंके बीचमेंसे निकल गये । ओखली वहाँ टेढ़ी हो गयी थी, तथापि श्रीकृष्णने सहसा उसे खींचा । खींचनेसे दबाव पाकर वे दोनों वृक्ष जड़सहित उखड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े । वृक्षोंके गिरनेसे जो धमाकेकी आवाज हुई, वह वज्रपातके समान भयंकर थी । उन वृक्षोंसे दो देवता निकले - ठीक उसी तरह जैसे काष्ठसे अग्नि प्रकट हुई हो । उन दोनों देवताओंने दामोदरकी परिक्रमा करके अपने मुकुटसे उनके पैर छुए और दोनों हाथ जोड़े । वे उन श्रीहरिके समक्ष नतमस्तक खड़े हो इस प्रकार बोले ॥१४–१८ ॥ दोनों देवता कहने लगे- अच्युत! आपके दर्शनसे हम दोनोंको इसी क्षण ब्रह्मदण्डसे मुक्ति मिली है । हरे! अब हम दोनोंसे आपके निज भक्तोंकी अवहेलना न हो । आप करुणाकी निधि हैं । जगत्का मङ्गल करना आपका स्वभाव है । आप ' दामोदर ', ' कृष्ण ' और ' गोविन्द ' को हमारा बारंबार नमस्कार है ॥ १ ९ -२० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार श्रीहरिको नमस्कार करके वे दोनों देवकुमार उत्तर दिशाकी ओर चल दिये । उसी समय भयसे कातर हुए नन्द आदि समस्त गोप वहाँ आ पहुँचे । वे पूछने लगे - ' व्रजबालको! बिना आँधी - पानीके ये दोनों वृक्ष कैसे गिर पड़े? शीघ्र बताओ । ' तब उन समस्त व्रजवासी बालकोंने कहा ॥२१-२२ ॥ बालकोंने कहा – इस कन्हैयाने ही दोनों । दामोदराय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० १ ९ । २० )
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अध्याय २० ] दुर्वासाद्वारा भगवान्की मायाका वृक्षोंको गिराया है । उन वृक्षोंसे दो पुरुष निकलकर यहाँ खड़े थे, जो इसे नमस्कार करके अभी - अभी उत्तर दिशाकी ओर गये हैं । उनके अङ्गोंसे दीप्तिमती प्रभा निकल रही थी ॥ २३ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! ग्वाल - बालोंकी यह बात सुनकर उन बड़े - बूढ़े गोपोंने उसपर विश्वास नहीं किया । नन्दजीने ओखलीमें रस्सीसे बँधे हुए अपने बालकको खोल दिया और लाड़ - प्यार करते हुए गोदमें उठाकर उस शिशुको सूँघने लगे । नरेश्वर! नन्दजीने अपनी पत्नीको बहुत उलाहना दिया और ब्राह्मणोंको सौ गायें दानके रूपमें दीं ॥ २४-२५ ॥ बहुलाश्वने कहा – देवर्षिप्रवर! वे दोनों दिव्य पुरुष कौन थे, यह बताइये । किस दोषके कारण उन्हें यमलार्जुनवृक्ष होना पड़ा था ॥ २६ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! वे दोनों कुबेरके श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनका नाम था - ' नलकूबर ' और ' मणिग्रीव ' । एक दिन वे नन्दनवनमें गये और वहाँ मन्दाकिनीके तटपर ठहरे । वहाँ अप्सराएँ उनके गुण गाती रहीं और वे दोनों वारुणी मदिरासे मतवाले होकर वहाँ नंग - धड़ंग विचरते रहे । एक एवं गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन ६७ तो उनकी युवावस्था थी और दूसरे वे द्रव्यके दर्प ( धनके मद ) से दर्पित ( उन्मत्त ) थे । उसी अवसरपर किसी कालमें ' देवल ' नामधारी मुनीन्द्र, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे, उधर आ निकले । उन दोनों कुबेर-पुत्रोंको नग्न देखकर ऋषिने उनसे कहा - ' तुम दोनोंके स्वभावमें दुष्टता भरी है । तुम दोनों अपनी सुध - बुध खो बैठे हो ' ॥ २७ – २ ९ ॥ इतना कहकर देवलजी फिर बोले- तुम दोनों वृक्षके समान जड, धृष्ट तथा निर्लज्ज हो । तुम्हें अपने द्रव्यका बड़ा घमंड है; अतः तुम दोनों इस भूतलपर सौ ( दिव्य ) वर्षोंतकके लिये वृक्ष हो जाओ । जब द्वापरके अन्तमें भारतवर्षके भीतर मथुरा - जनपदके व्रज - मण्डलमें कलिन्दनन्दिनी यमुनाके तटपर महावनके समीप तुम दोनों साक्षात् परिपूर्णतम दामोदर हरि गोलोकनाथ श्रीकृष्णका दर्शन करोगे, तब तुम्हें अपने पूर्वस्वरूपकी प्राप्ति हो जायगी ॥३०–३२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! इस प्रकार देवलके शापसे वृक्षभावको प्राप्त हुए नलकूबर और मणिग्रीवका श्रीकृष्णने उद्धार किया ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' उलूखल - बन्धन और यमलार्जुन - मोचन ' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ बीसवाँ अध्याय दुर्वासाद्वारा भगवान्की मायाका एवं गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन तथा श्रीनन्दनन्दनस्तोत्र श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! एक दिन मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन करनेके लिये व्रजमण्डलमें आये । उन्होंने कालिन्दीके निकट पवित्र वालुकामय पुलिनके रमणीय स्थलमें महावनके समीप श्रीकृष्णको निकटसे देखा । वे शोभाशाली मदनगोपाल बालकोंके साथ वहाँ लोटते, परस्पर मल्ल युद्ध करते तथा भाँति - भाँतिकी बालोचित लीलाएँ करते थे । इन सब कारणोंसे वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे । उनके सारे अङ्ग धूल धूसरित थे । मस्तकपर काले घुँघराले केश शोभा पाते थे । दिगम्बर - वेषमें बालकोंके साथ दौड़ते हुए श्रीहरि-को देखकर दुर्वासाके मनमें बड़ा विस्मय हुआ॥१–४ ॥ श्रीमुनि ( मन - ही - मन ) कहने लगे - क्या यह वही षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न ईश्वर है? फिर यह बालकोंके साथ धरतीपर क्यों लोट रहा है? मेरी समझमें यह केवल नन्दका पुत्र है, परात्पर श्रीकृष्ण नहीं है ॥५ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! जब महामुनि दुर्वासा इस प्रकार मोहमें पड़ गये, तब खेलते हुए श्रीकृष्ण स्वयं उनके पास उनकी गोदमें आ गये ।
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६८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ गोलोकखण्ड फिर उनकी गोदसे हट गये । श्रीकृष्णकी दृष्टि बाल - सिंहके समान थी । वे हँसते और मधुर वचन बोलते हुए पुनः मुनिके सम्मुख आ गये । हँसते हुए श्रीकृष्णके श्वाससे खिंचकर मुनि उनके मुँहमें समा गये । वहाँ जाकर उन्होंने एक विशाल लोक देखा, जिसमें अरण्य और निर्जन प्रदेश भी दृष्टिगोचर हो रहे थे । उन अरण्यों ( जंगलों ) में भ्रमण करते हुए मुनि बोल उठे -'मैं कहाँसे यहाँ आ गया? इतनेमें ही उन महामुनिको एक अजगर निगल गया । उसके पेटमें पहुँचनेपर मुनिने वहाँ सातों लोकों और पातालोंसहित समूचे ब्रह्माण्डका दर्शन किया । उसके द्वीपोंमें भ्रमण करते हुए दुर्वासा मुनि एक श्वेत पर्वतपर ठहर गये । उस पर्वतपर शतकोटि वर्षोंतक भगवान्का भजन करते हुए वे तप करते रहे । इतनेमें ही सम्पूर्ण विश्वके लिये भयंकर नैमित्तिक प्रलयका समय आ पहुँचा । समुद्र सब ओरसे धरातलको डुबाते हुए मुनिके पास आ गये । दुर्वासा मुनि उन समुद्रोंमें बहने लगे । उन्हें जलका कहीं अन्त नहीं मिलता था । इसी अवस्थामें एक सहस्र युग व्यतीत हो गये । तदनन्तर मुनि एकार्णवके जलमें डूब गये । उनकी स्मृति - शक्ति नष्ट हो गयी । फिर वे पानीके भीतर विचरने लगे । वहाँ उन्हें एक दूसरे ही ब्रह्माण्डका दर्शन हुआ । उस ब्रह्माण्डके छिद्रमें प्रवेश करनेपर वे दिव्य सृष्टिमें जा पहुँचे । वहाँसे उस ब्रह्माण्डके शिरोभागमें विद्यमान लोकोंमें ब्रह्माकी आयु पर्यन्त विचरते रहे । इसी प्रकार वहाँ एक छिद्र देखकर श्रीहरिका स्मरण करते हुए वे उसके भीतर घुस गये । घुसते ही उस ब्रह्माण्डके बाहर आ निकले । फिर तत्काल उन्हें महती जलराशि दिखायी दी । उस जलराशिमें उन्हें कोटि - कोटि ब्रह्माण्डोंकी राशियाँ बहती दिखायी दीं । तब मुनिने जलको ध्यानसे देखा तो उन्हें वहाँ विरजा नदीका दर्शन हुआ । उस नदीके पार पहुँचकर मुनिने साक्षात् गोलोकमें प्रवेश किया । वहाँ उन्हें क्रमशः वृन्दावन, गोवर्धन और सुन्दर यमुनापुलिनका दर्शन करके बड़ी प्रसन्नता हुई । फिर वे मुनि जब निकुञ्जके भीतर घुसे, तब उन्होंने अनन्त कोटि मार्तण्डोंके समान ज्योतिर्मण्डलके अंदर दिव्य लक्षदल कमलपर विराजमान साक्षात् परिपूर्णतम पुरुषोत्तम राधावल्लभ भगवान् श्रीकृष्णको देखा, जो असंख्य गोप-गोपियोंसे घिरे तथा कोटि - कोटि गौओंसे सम्पन्न थे । असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति उन भगवान् श्रीहरिके साथ ही उनके गोलोकका भी मुनिको दर्शन हुआ॥६–२० ॥ उन्हें देखकर भगवान् श्रीकृष्ण हँसने लगे । हँसते समय उनके श्वाससे खिंचकर दुर्वासा मुनि उनके मुँहके भीतर पहुँच गये । उस मुखसे पुनः बाहर निकलनेपर उन्होंने उन्हीं बालरूपधारी श्रीनन्दनन्दनको देखा, जो कालिन्दीके निकटवर्ती पुण्य वालुकामय रमणस्थलीमें बालकोंके साथ विचर रहे थे । महावनमें श्रीकृष्णका उस रूपमें दर्शन करके दुर्वासा मुनि यह समझ गये कि ये श्रीकृष्ण साक्षात् परात्पर ब्रह्म हैं । फिर तो उन्होंने श्रीनन्दनन्दनको बार - बार नमस्कार करके हाथ जोड़कर कहा ॥ २१ - २३ ॥ श्रीमुनि बोले - जिसके नेत्र नूतन विकसित शतदल कमलके समान विशाल हैं, अधर बिम्बा-फलकी अरुणिमाको तिरस्कृत करनेवाले हैं तथा श्रीअङ्ग सजल जलधरकी श्याममनोहर कान्तिको छीने लेते हैं, जिनके मुखपर मन्द मुसकानकी दिव्य छटा छा रही है तथा जो सुन्दर मधुर मन्दगतिसे चल रहे हैं, उन बाल्यावस्थासे विलसित मनोज्ञ श्रीनन्दनन्दनको मैं मनसे प्रणाम करता हूँ । जिनके चरणोंमें मञ्जीर और नूपुर झंकृत हो रहे हैं और कटिमें खनखनाती हुई नूतन रत्ननिर्मित काञ्ची ( करधनी ) शोभा दे रही है; जो बघनखासे युक्त यन्त्रसमुदाय तथा सुन्दर कण्ठहारसे सुशोभित हैं, जिनके भालदेशमें दृष्टि - जनित पीड़ा हर लेनेवाली कज्जलकी बेंदी शोभा दे रही है तथा जो कलिन्दनन्दिनीके तटपर बालोचित क्रीड़ामें संलग्न हैं, उन श्रीहरिकी मैं वन्दना करता हूँ । जिनके पूर्णचन्द्रोपम सुन्दर मुखपर नूतन नीलघनकी श्याम विभाको तिरस्कृत करनेवाले घुँघराले काले केश चमक रहे हैं, तथा जिनका मस्तकरूपी मुकुद कुछ झुका हुआ है । उन आप नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा आपके अग्रज श्रीबलरामको मेरा बारंबार नमस्कार है । जो प्रातः काल उठकर इस ' श्रीनन्दनन्दनस्तोत्र ' का पाठ करता है, उसके नेत्रोंके समक्ष श्रीनन्दनन्दन
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अध्याय २० ] दुर्वासाद्वारा भगवान्की मायाका एवं गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन ६ ९ सानन्द प्रकट होते हैं? ॥२४–२७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - इस प्रकार श्रीकृष्णको प्रणाम करके मुनिशिरोमणि दुर्वासा उन्हींका ध्यान और जप करते हुए उत्तरमें बदरिकाश्रमकी ओर चले गये ॥ २८ ॥
श्रीगर्गजी कहते हैं— शौनक! इस प्रकार देवर्षिप्रवर महात्मा नारदने बुद्धिमान् राजा बहुलाश्वको भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र सुनाया था । ब्रह्मन्! वह सब मैंने तुमसे कह सुनाया । भगवान्का सुयश कलिकलुषका विनाश करनेवाला, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों पदार्थोंको देनेवाला तथा दिव्य ( लोकातीत ) है । अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥२ ९ -३० ॥ शौनक बोले – तपोधन! इसके बाद मिथिलानरेश बहुलाश्वने शान्तस्वरूप, ज्ञानदाता महामुनि नारदसे क्या पूछा, वही प्रसङ्ग मुझसे कहिये ॥ ३१ ॥
श्रीगर्गजीने कहा - शौनक! ज्ञानदाता नारदजीको नमस्कार करके मानदाता मैथिलनरेशने पुनः उनसे श्रीकृष्णचरित्रके विषयमें, जो मङ्गलका धाम है, प्रश्न किया ॥ ३२ ॥
श्रीबहुलाश्वने पूछा – प्रभो! परमानन्दविग्रह साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने इसके बाद और कौन-कौन - सी विचित्र लीलाएँ कीं, यह मुझे बताइये । पूर्वके अवतारोंद्वारा भी मङ्गलमय चरित्र सम्पादित हुए हैं । इस श्रीकृष्णावतारके द्वारा इसके बाद और कौन - कौन - से पवित्र चरित्र किये गये, यह सब बताइये ॥ ३३-३४ ॥ श्रीनारदजीने कहा— राजन्! तुम्हें अनेक साधुवाद है; क्योंकि तुमने श्रीहरिके मङ्गलमय चरित्रके विषयमें प्रश्न किया है । वृन्दावनमें जो उनकी यशोवर्धक लीलाएँ हुई हैं, उनका मैं वर्णन करूँगा । यह गोलोकखण्ड अत्यन्त गोपनीय और परम अद्भुत है । गोलोकके रासमण्डलमें साक्षात् श्रीकृष्णने इसका वर्णन किया था । इसे श्रीकृष्णने निकुञ्जमें राधिकाको सुनाया और श्रीराधाने मुझे इसका ज्ञान प्रदान किया है । फिर मैंने तुमको वह सब सुना दिया । यह गोलोकखण्डका वृत्तान्त सम्पूर्ण पदार्थोंको देनेवाला उत्कृष्ट साधन है । यदि ब्राह्मण इसका पाठ करता है तो वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका ज्ञाता होता है, क्षत्रिय इसे सुने तो वह प्रचण्ड - पराक्रमी चक्रवर्ती सम्राट् होता है, वैश्य सुने तो वह निधिपति हो जाय और शूद्र सुने तो वह संसारके बन्धनसे छुटकारा पा जाय । जो इस जगत्में फलकी कामनासे रहित होकर इसका पाठ करता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है । जो सम्यक् भक्तिभावसे युक्त हो नित्य इसका पाठ करता है, वह भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके गोलोकधाममें, जो प्रकृतिसे परे है, पहुँच जाता है? ॥ ३५–४० ॥ इस प्रकार श्रीगर्ग - संहितामें गोलोकखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' दुर्वासाके द्वारा भगवान्की मायाका दर्शन तथा श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रका वर्णन ' नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
गोलोकखण्ड सम्पूर्ण । १- श्रीमुनिरुवाच-बालं नवीनशतपत्रविशालनेत्रं बिम्बाधरं सजलमेघरुचिं मनोज्ञम् । मन्दस्मितं मधुरसुन्दरमन्दयानं श्रीनन्दनन्दनमहं मनसा नमामि ॥ मञ्जीरनूपुररणन्नवरत्नकाञ्ची श्रीहारकेसरिनखप्रतियन्त्रसंघम् । दृष्टयार्तिहारिमपिबिन्दुविराजमानं वन्दे कलिन्दतनुजातटबालकेलिम् ॥ पुर्णेन्दुसुन्दरमुखोपरि कुञ्चिताग्राः केशा नवीनघननीलनिभाः स्फुरन्तः । राजन्त आनतशिरः कुमुदस्य यस्य नन्दात्मजाय सबलाय नमो नमस्ते ॥ श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रं प्रातरुत्थाय यः पठेत् । तन्नेत्रगोचरं याति सानन्दं २ - इदं गोलोकखण्डं च गुह्यं परममद्भुतम् । श्रीकृष्णेन प्रकथितं गोलोके रासमण्डले निकुञ्ज राधिकायै च राधा मह्यं ददाविदम् । मया तुभ्यं श्रावितं च दत्तं सर्वार्थदं परम् ॥ इदं पठति विप्रस्तु सर्वशास्त्रार्थगो भवेत् । श्रुत्वेदं चक्रवर्ती स्यात् क्षत्रियश्चण्डविक्रमः ॥ वैश्यो निधिपतिर्भूयाच्छूद्रो मुच्येत बन्धनात् । निष्फलो योऽपि जगति जीवन्मुक्तः स जायते ॥ यो नित्यं पठते सम्यग् भक्तिभावसमन्वितः । स गच्छेत् कृष्णचन्द्रस्य गोलोकं प्रकृतेः परम् ॥ नन्दनन्दनः ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० २० । २४–२७ ) ॥ ( गर्ग ०, गोलोक ० २० । ३६–४० )
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ब्रह्माजी द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन
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श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः श्रीवृन्दावनखण्ड प्रथम अध्याय सन्नन्दका गोपोंको महावनसे वृन्दावनमें चलनेकी सम्मति देना और व्रजमण्डलके सर्वाधिक मङ्गलाचरण कृष्ण कोकिलाकेलिकीरे गुञ्जापुञ्जे देवपुष्पादिकुञ्जे । कम्बुग्रीवौ क्षिप्तबाहू चलन्तौ राधाकृष्णौ मङ्गलं मे भवेताम् ॥ १ ॥
श्रीयमुनाजीके तटपर, जहाँ कोकिलाएँ तथा क्रीडाशुक विचरते हैं, गुञ्जापुञ्जसे विलसित देवपुष्प ( पारिजात ) आदिके कुञ्जमें, शङ्ख - सदृश सुन्दर ग्रीवासे सुशोभित तथा एक - दूसरेके गलेमें बाँह डालकर चलनेवाले प्रिया - प्रियतम श्रीराधा - कृष्ण मेरे लिये मङ्गलमय हों ॥ १ ॥
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ २ ॥
मैं अज्ञानरूपी रतौंधीसे अंधा हो रहा था; जिन्होंने ज्ञानरूपी अञ्जनकी शलाकासे मेरी आँखें खोल दी हैं, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ २ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! एक समयकी बात है- व्रजमें विविध उपद्रव होते देख नन्दराजने अपने सहायक नन्दों, उपनन्दों, वृषभानुओं, वृषभानु-वरों तथा अन्य बड़े - बूढ़े गोपोंको बुलाकर सभामें उनसे कहा ॥ ३३ ॥
नन्द बोले – गोपगण! महावनमें तो बहुत - से उत्पात हो रहे हैं । बताइये, हमलोगोंको इस समय क्या करना चाहिये ॥ ४ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं — यह सुनकर उन सबमें विशेष मन्त्रकुशल वृद्ध गोप सन्नन्दने बलराम और श्रीकृष्णको गोदमें लेकर नन्दराजसे कहा ॥ ५ ॥
माहात्म्यका वर्णन करना सन्नन्द बोले- मेरे विचारसे तो हमें अपने समस्त परिकरोंके साथ यहाँसे उठ चलना चाहिये और किसी दूसरे ऐसे स्थानमें जाकर डेरा डालना चाहिये, जहाँ उत्पातकी सम्भावना न हो । तुम्हारा बालक श्रीकृष्ण हम सबको प्राणोंके समान प्रिय है, व्रजवासियोंका जीवन है, व्रजका धन और गोपकुलका दीपक है और अपनी बाललीलासे सबके मनको मोह लेनेवाला है । हाय! कितने खेदकी बात है कि इस बालकपर पूतना, शकट और तृणावर्तका आक्रमण हुआ, फिर इसके ऊपर वृक्ष गिर पड़े; इन सब संकटोंसे यह किसी प्रकार बचा है, इससे बढ़कर उत्पात और क्या हो सकता है । इसलिये हमलोग अपने बालकोंके साथ वृन्दावनमें चलें और जब उत्पात शान्त हो जायँ, तब फिर यहाँ आयें ॥ ६ - ९ ॥ नन्दने पूछा – बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सन्नन्दजी! इस व्रजसे वृन्दावन कितनी दूर है? वह वन कितने कोसोंमें फैला हुआ है, उसका लक्षण क्या है और वहाँ कौन-सा सुख सुलभ है? यह सब बताइये ॥ १० ॥
सन्नन्द बोले- बहिषत्से ईशानकोण, यदुपुरसे दक्षिण और शोणपुरसे पश्चिमकी भूमिको ' माथुर -मण्डल ' कहते हैं । मथुरामण्डलके भीतर साढ़े बीस योजन विस्तृत भूभागको मनीषी पुरुषोंने ' दिव्य माथुर - मण्डल ' या ' व्रज ' बताया है । एक बार मैं मथुरापुरीमें वसुदेवजीके घर ठहरा हुआ था; वहीं श्रीगर्गाचार्यजीके मुखसे मैंने सुना था कि तीर्थराज प्रयागने भी इस दिव्य मथुरा - मण्डलकी पूजा की है । यों तो मथुरा - मण्डलमें बहुत - से वन हैं किंतु उन सबसे
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७२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड श्रेष्ठ ' वृन्दावन ' नामक वन है, जो परिपूर्णतम भगवान्के भी मनको हरण करनेवाला लीला - क्रीडा - स्थल है । वैकुण्ठसे बढ़कर दूसरा कोई लोक न तो हुआ है और न आगे होगा । केवल एक ' वृन्दावन ' ही ऐसा है, जो वैकुण्ठकी अपेक्षा भी परात्पर ( परम उत्कृष्ट ) है । जहाँ ' गोवर्धन ' नामसे प्रसिद्ध गिरिराज विराजमान है, जहाँ कालिन्दीके तटपर मङ्गलधाम पुलिन है, जहाँ बृहत्सानु ( बरसाना ) पर्वत है तथा जहाँ नन्दीश्वर गिरि शोभा पाता है, जो चौबीस कोसके विस्तारमें स्थित तथा विशाल काननोंसे आवृत है; जो पशुओंके लिये हितकर, गोप-गोपी और गौओंके लिये सेवन करनेयोग्य तथा लताकुञ्जसे आवृत है, उस मनोहर वनको ' वृन्दावन ' के नामसे स्मरण किया जाता है ॥ ११–१८ ॥ नन्दजीने पूछा— सन्नन्दजी! तीर्थराज प्रयागने कब इस व्रजकी पूजा की है, मैं यह जानना चाहता हूँ । इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल- बड़ी उत्कण्ठा है ॥ १ ९ ॥ सन्नन्द बोले – नन्दराज! पूर्वकालमें नैमित्तिक प्रलयके अवसरपर एक महान् दैत्य प्रकट हुआ, जो शङ्खासुरके नामसे प्रसिद्ध था । वह वेदद्रोही दैत्यराज समस्त देवताओंको जीतकर ब्रह्मलोकमें गया और वहाँ सोते हुए ब्रह्माके पाससे वेदोंकी पोथी चुराकर समुद्रमें जा घुसा । वेदोंके जाते ही देवताओंका सारा बल चला गया । तब पूर्ण भगवान् यज्ञेश्वर श्रीहरिने मत्स्यरूप धारण करके नैमित्तिक प्रलयके सागरमें उस शङ्खासुरके साथ युद्ध किया । महाबली दैत्य शङ्खने श्रीहरिके ऊपर शूल चलाया । किंतु साक्षात् श्रीहरिने अपने चक्रसे उस शूलके सैकड़ों टुकड़े कर दिये । तब शङ्खने अपने सिरसे भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें प्रहार किया । किंतु उसके उस प्रहारसे परात्पर श्रीहरि विचलित नहीं हुए । उस समय मत्स्यरूपधारी श्रीहरिने हाथमें गदा लेकर महाबली शङ्खरूपधारी उस दैत्यकी पीठपर आघात किया । गदाके प्रहारसे वह इतना पीड़ित हुआ कि उसका चित्त कुछ व्याकुल हो गया; किंतु पुनः उठकर उसने सर्वेश्वर श्रीहरिको मुक्केसे मारा । तब कमलनयन साक्षात् भगवान् विष्णुने कुपित हो अपने चक्रसे उसके सुदृढ़ मस्तकको सींगसहित काट डाला । व्रजेश्वर! इस प्रकार शङ्खको जीतकर देवताओंके साथ सर्वव्यापी श्रीहरिने प्रयागमें आकर वे चारों वेद ब्रह्माजीको दे दिये । फिर सम्पूर्ण देवताओंके साथ उन्होंने विधिवत् यज्ञका अनुष्ठान किया और प्रयागतीर्थके अधिष्ठाता देवताको बुलाकर उसे ' तीर्थराज ' पदपर अभिषिक्त कर दिया । साक्षात् अक्षयवटको तीर्थराजके लिये लीला-छत्र - सा बना दिया । मुनिकन्या गङ्गा तथा सूर्यसुता यमुना अपनी तरङ्गरूपी चामरोंसे उनकी सेवा करने लगीं । उसी समय जम्बूद्वीपके सारे तीर्थ भेंट लेकर बुद्धिमान् तीर्थराजके पास आये और उनकी पूजा और वन्दना करके वे तीर्थ अपने - अपने स्थानको चले गये । नन्द! जब देवताओंके साथ श्रीहरि भी चले गये, तब वहीं कलहप्रिय मुनीन्द्र नारदजी आ पहुँचे और सिंहासनपर देदीप्यमान तीर्थराजसे बोले ॥ २० - ३३ ॥ श्रीनारदजीने कहा— महातपस्वी तीर्थराज! निश्चय ही तुम समस्त तीर्थोंद्वारा विशेषरूपसे पूजित हुए हो, तुम्हें सभी मुख्य - मुख्य तीर्थोंने यहाँ आकर भेंट समर्पित की है; परंतु व्रजके वृन्दावनादि तीर्थ यहाँ तुम्हारे सामने नहीं आये । तुम तीर्थोंके राजाधिराज हो, व्रजके प्रमादी तीर्थोंने यहाँ न आकर तुम्हारा तिरस्कार किया है ॥ ३४-३५ ॥ सन्नन्द कहते हैं— यों कहकर साक्षात् देवर्षि-शिरोमणि नारदजी वहाँसे चले गये । तब तीर्थराजके मनमें बड़ा क्रोध हुआ और वे उसी क्षण श्रीहरिके लोकमें गये । श्रीहरिको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके सम्पूर्ण तीर्थोंसे घिरे हुए तीर्थराज हाथ जोड़कर भगवान् के सामने खड़े हुए और उन श्रीनाथसे बोले ॥ ३६-३७ ॥ तीर्थराजने कहा- देवदेव! मैं आपकी सेवामें इसलिये आया हूँ कि आपने तो मुझे ‘ तीर्थराज ' बनाया और समस्त तीर्थोंने मुझे भेंट दी, किंतु मथुरामण्डल तीर्थ मेरे पास नहीं आये; उन प्रमादी व्रजतीर्थोंने मेरा तिरस्कार किया है । अतः यह बात आपसे कहनेके लिये मैं आपके मन्दिरमें आया हूँ॥३८-३९ ॥ श्रीभगवान् बोले- मैंने तुम्हें धरतीके सब
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अध्याय २ ] गिरिराज गोवर्धनकी उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डलमें आगमन ७३ तीर्थोंका राजा - ' तीर्थराज ' अवश्य बनाया है; किंतु अपने घरका भी राजा तुम्हें ही बना दिया हो, ऐसी बात तो नहीं हुई है! फिर तुम तो मेरे गृहपर भी अधिकार जमानेकी इच्छा लेकर प्रमत्त पुरुषके समान बात कैसे कर रहे हो? तीर्थराज! तुम अपने घर जाओ और मेरा यह शुभ वचन सुन लो । मथुरामण्डल मेरा साक्षात् परात्पर धाम है, त्रिलोकीसे परे है । उस दिव्यधामका प्रलयकालमें भी संहार नहीं होता ॥ ४०–४२ ॥ सन्नन्द कहते हैं - यह सुनकर तीर्थराज बड़े विस्मित हुए । उनका सारा अभिमान गल गया । फिर वहाँसे आकर उन्होंने मथुराके व्रजमण्डलका पूजन और उसकी परिक्रमा करके अपने स्थानको पदार्पण किया । पृथ्वीका मानभङ्ग करनेके लिये यह व्रजमण्डल पहले दिखाया गया था । मैंने ये सारी बातें तुम्हारे सामने कहीं, अब और क्या सुनना चाहते हो॥४३-४४ ॥ नन्दजीने पूछा- गोपेश्वर! किसने पहले पृथ्वीका मानभङ्ग करनेके लिये इस व्रजमण्डलको दिखलाया था, यह मुझे बताइये ॥ ४५ ॥
सन्नन्दने कहा – इसी वाराहकल्पमें पहले श्रीहरिने वराहरूप धारण करके अपनी दाढ़पर उठाकर रसातलसे पृथ्वीका उद्धार किया था । उस समय उन प्रभुकी बड़ी शोभा हुई थी । जलमें जाते हुए उन वराहरूपधारी भगवान् रमानाथ जनार्दनसे उनकी दंष्ट्राके अग्रभागपर शोभित हुई पृथ्वी बोली ॥ ४६-४७ ॥ पृथ्वीने पूछा – प्रभो! सारा विश्व पानीसे भरा दिखायी देता है । अतः बताइये, आप किस स्थलपर मेरी स्थापना करेंगे? ॥ ४८ ॥
भगवान् वराह बोले- जब वृक्ष दिखायी देने लगें और जलमें उद्वेगका भाव प्रकट हो, तब उसी स्थानपर तुम्हारी स्थापना होगी । तुम वृक्षोंको देखती चलो ॥४ ९ ॥ पृथ्वीने कहा - भगवन्! स्थावर वस्तुओंकी रचना तो मेरे ही ऊपर हुई है । क्या कोई दूसरी भी धरणी है? धारणामयी धरणी तो केवल मैं ही हूँ ॥ ५० ॥
सन्नन्दजी कहते हैं - यों कहती हुई पृथ्वीने अपने सामने जलमें मनोहर वृक्ष देखे । उन्हें देखकर पृथ्वीका अभिमान दूर हो गया और वह भगवान्से बोली - ' देव! किस स्थलपर ये पल्लवसहित वृक्ष विद्यमान
हैं? यह दृश्य मेरे मनमें बड़ा आश्चर्य पैदा कर रहा है ।
यज्ञपते! प्रभो! इसका रहस्य बताइये ' ॥ ५१-५२ ॥
भगवान् वराह बोले- नितम्बिनि! यह सामने दिव्य ' माथुर - मण्डल ' दिखायी देता है, जो गोलोककी धरतीसे जुड़ा हुआ है । प्रलयकालमें भी इसका संहार नहीं होता ॥ ५३ ॥
सन्नन्द बोले- यह सुनकर हुआ । वह अभिमानशून्य हो गयी यह व्रजमण्डल समस्त लोकोंसे है । व्रजका यह माहात्म्य सुनकर जाता है । तुम • माथुर व्रजमण्डल ' भी उत्कृष्ट समझो ॥ ५४-५५ ॥ पृथ्वीको बड़ा विस्मय । अतः महाबाहु नन्द! अधिक महत्त्वशाली मनुष्य जीवन्मुक्त हो को तीर्थराज प्रयागसे इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत नन्द - सन्नन्द - संवादमें ' वृन्दावनमें आगमनके उद्योगका वर्णन ' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय गिरिराज गोवर्धनकी उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डलमें आगमन नन्दजीने पूछा- महाप्राज्ञ सन्नन्दजी! आप सर्वज्ञ बताइये । इस गिरिश्रेष्ठ गोवर्धनको लोग ' गिरिराज ' और बहुश्रुत हैं, मैंने आपके मुखसे व्रजमण्डल - क्यों कहते हैं? यह साक्षात् यमुना नदी किस लोकसे के माहात्म्यका वर्णन सुना । अब ' गोवर्धन ' नामसे यहाँ आयी है? उसका माहात्म्य भी मुझसे कहिये; प्रसिद्ध जो पर्वत है, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई - यह मुझे क्योंकि आप ज्ञानियोंके शिरोमणि हैं ॥ १-३ ॥
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७४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड सन्नन्दजी बोले – एक समयकी बात है, हस्तिनापुरमें महाराज पाण्डुने धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीभीष्मजी से ऐसा ही प्रश्न किया था । उनके उस प्रश्नको और भीष्मजीद्वारा दिये गये उत्तरको अन्य बहुत - से लोग भी सुन रहे थे । ( उस समय भीष्मजीने जो उत्तर दिया, वही मैं यहाँ सुना रहा हूँ — ) साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण, जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकके नाथ और सब कुछ करनेमें समर्थ हैं, जब पृथ्वीका भार उतारनेके लिये स्वयं इस भूतलपर पधारने लगे, तब उन जनार्दन देवने अपनी प्राणवल्लभा राधासे कहा – प्रिये! तुम मेरे वियोगसे भयभीत रहती हो, अतः भीरु! तुम भी भूतलपर चलो ' ॥४-६ ॥ श्रीराधाजी बोलीं- प्राणनाथ! जहाँ वृन्दावन नहीं है, जहाँ यह यमुना नदी नहीं है तथा जहाँ गोवर्धन पर्वत नहीं है, वहाँ मेरे मनको सुख नहीं मिल सकता ॥ ७ ॥
सन्नन्दजी कहते हैं— नन्दराज! श्रीराधाकी यह बात सुनकर स्वयं श्रीहरिने अपने धामसे चौरासी कोस विस्तृत भूमि, गोवर्धन पर्वत और यमुना नदीको भूतलपर भेजा । उस समय चौरासी कोस विस्तारवाली गोलोककी सर्वलोकवन्दिता भूमि चौबीस वनोंके साथ यहाँ आयी । गोवर्धन पर्वतने भारतवर्षसे पश्चिम दिशामें शाल्मलीद्वीपके भीतर द्रोणाचलकी पत्नीके गर्भसे जन्म ग्रहण किया । उस अवसरपर देवताओंने गोवर्धनके ऊपर फूल बरसाये । हिमालय और सुमेरु आदि समस्त पर्वतोंने वहाँ आकर प्रणाम और परिक्रमा करके गोवर्धनका विधिवत् पूजन किया । पूजनके पश्चात् उन महान् पर्वतोंने उसकी स्तुति प्रारम्भ की ॥ ८ - १२ ॥ पर्वत बोले- तुम साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके गोलोकधाममें, जहाँ दिव्य गौओंका समुदाय निवास करता है तथा गोपाल एवं गोप-सुन्दरियाँ शोभा पाती हैं, सुशोभित होते हो । तुम्हीं ' गोवर्धन ' नामसे वृन्दावनमें विराजते हो, इस समय तुम्हीं हम समस्त पर्वतोंमें ' गिरिराज ' हो । तुम वृन्दावनकी गोदमें समोद निवास करनेवाले, गोलोकके मुकुटमणि हो तथा पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके हाथोंमें किसी विशिष्ट अवसरपर छत्रके समान शोभा पाते हो । तुम गोवर्धनको हमारा सादर नमस्कार है ॥ १३-१५ ॥ सन्नन्दजी कहते हैं - नन्दराज! जब इस प्रकार स्तुति करके सब पर्वत अपने - अपने स्थानपर चले गये, तभी से यह गिरिश्रेष्ठ गोवर्धन साक्षात् ' गिरिराज ' कहलाने लगा है । एक समय मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यजी तीर्थयात्राके लिये भूतलपर भ्रमण करने लगे । उन महामुनिने द्रोणाचलके पुत्र श्यामवर्णवाले श्रेष्ठ पर्वत गोवर्धनको देखा, जिसके ऊपर माधवी लताके सुमन सुशोभित हो रहे थे । वहाँके वृक्ष फलोंके भारसे लदे हुए थे । निर्झरोंके झर - झर शब्द वहाँ गूँज रहे थे । उस पर्वतपर बड़ी शान्ति विराज रही थी । अपनी कन्दराओंके कारण वह मङ्गलका धाम जान पड़ता था । सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित वह रत्नमय मनोहर शैल तपस्या करनेके लिये उपयुक्त स्थान था । विविध रंगकी चित्र - विचित्र धातुएँ उस पर्वतके अवयवोंमें विचित्र शोभाका आधान करती थीं । उसकी भूमि ढालू ( चढ़ाव - उतारसे युक्त ) थी और वहाँ नाना प्रकारके पक्षी सब ओर व्याप्त थे । मृग और बंदर आदि पशु चारों ओर फैले हुए थे । मयूरोंकी केकाध्वनिसे मण्डित गोवर्धन पर्वत मुमुक्षुओंके लिये मोक्षप्रद प्रतीत होता था ॥ १६ - २० ॥ मुनिवर पुलस्त्यके मनमें उस पर्वतको प्राप्त करनेकी इच्छा हुई । इसके लिये वे द्रोणाचलके समीप
गये । द्रोणगिरिने उनका पूजन - स्वागत - सत्कार किया ।
इसके बाद पुलस्त्यजी उस पर्वतसे बोले ॥ २१ ॥
पुलस्त्यने कहा- द्रोण! तुम पर्वतोंके स्वामी हो । समस्त देवता तुम्हारा समादर करते हैं । तुम दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न और मनुष्योंको सदा जीवन देनेवाले हो । मैं काशीका निवासी मुनि हूँ और तुम्हारे निकट याचक होकर आया हूँ । तुम अपने पुत्र गोवर्धनको मुझे दे दो । यहाँ अन्य वस्तुओंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है । भगवान् विश्वेश्वरकी महानगरी ' काशी ' नामसे प्रसिद्ध है, जहाँ मरणको प्राप्त हुआ पापी पुरुष भी तत्काल परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है, जहाँ गङ्गा नदी प्राप्त होती हैं और जहाँ साक्षात् विश्वनाथ भी