गर्ग संहिता — पृष्ठ 81–90

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90

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अध्याय २ ] गिरिराज गोवर्धनकी उत्पत्ति तथा उसका व्रजमण्डलमें आगमन ७५ विराजमान हैं । मैं वहीं तुम्हारे पुत्रको स्थापित करूँगा, जहाँ दूसरा कोई पर्वत नहीं है । लता - बेलों और वृक्षोंसे व्याप्त जो तुम्हारा पुत्र गोवर्धन है, उसके ऊपर रहकर मैं तपस्या करूँगा - ऐसी अभिलाषा मेरे मनमें जाग्रत हुई है ॥ २२–२६ ॥ सन्नन्दजी कहते हैं— पुलस्त्यजीकी यह बात सुनकर पुत्र - स्नेहसे विह्वल हुए द्रोणाचलके नेत्रोंमें आँसू भर आये । उसने पुलस्त्य मुनिसे कहा ॥ २७ ॥

द्रोणाचल बोला – महामुने! मैं पुत्र - स्नेहसे आकुल हूँ । यह पुत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, तथापि आपके शापके भयसे भीत होकर मैं इसे आपके हाथोंमें देता हूँ । ( फिर वह पुत्रसे बोला - ) बेटा! तुम मुनिके साथ कल्याणमय कर्मक्षेत्र भारतवर्षमें जाओ । वहाँ मनुष्य सत्कर्मोंद्वारा धर्म, अर्थ और काम - त्रिवर्ग सुख प्राप्त करते हैं तथा ( निष्काम कर्म एवं ज्ञानयोगद्वारा ) क्षणभरमें मोक्ष भी पा लेते हैं ॥ २८-२९ ॥ गोवर्धनने कहा - मुने! मेरा शरीर आठ योजन लंबा, दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा है । ऐसी दशामें आप किस प्रकार मुझे ले चलेंगे ॥ ३० ॥

पुलस्त्यजी बोले – बेटा! तुम मेरे हाथपर बैठकर सुखपूर्वक चले चलो । जबतक काशी नहीं आ जाती, तबतक मैं तुम्हें हाथपर ही ढोये चलूँगा ॥ ३१ ॥

गोवर्धनने कहा – मुने! मेरी एक प्रतिज्ञा है । आप जहाँ - कहीं भी भूमिपर मुझे एक बार रख देंगे, वहाँकी भूमिसे मैं पुनः उत्थान नहीं करूँगा ॥ ३२ ॥

पुलस्त्यजी बोले- मैं इस शाल्मलीद्वीपसे लेकर भारतवर्षके कोसलदेशतक तुम्हें कहीं भी रास्तेमें नहीं रखूँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है ॥ ३३ ॥

सन्नन्दजी कहते हैं —– नन्दराज! तदनन्तर वह महान् पर्वत पिताको प्रणाम करके मुनिकी हथेली पर आरूढ़ हुआ । उस समय उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये । उसे दाहिने हाथपर रखकर पुलस्त्य मुनि लोगोंको अपना तेज दिखाते हुए धीरे - धीरे चले और व्रज- मण्डलमें आ पहुँचे । गोवर्धनपर्वतको अपने पूर्व-जन्मकी बातोंका स्मरण था । व्रजमें आनेपर उसने मार्ग में मन - ही - मन सोचा - ' यहाँ व्रजमें असंख्य ब्रह्माण्डनायक साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण अवतार लेंगे और ग्वालबालोंके साथ बाललीला तथा कैशोरलीला करेंगे । इतना ही नहीं, वे श्रीहरि यहाँ दानलीला और मानलीला भी करेंगे । अतः मुझे यहाँसे अन्यत्र नहीं जाना चाहिये । यह व्रजभूमि और यह यमुना नदी गोलोकसे यहाँ आयी है । श्रीराधाके साथ भगवान् श्रीकृष्णका भी यहाँ शुभागमन होगा । उनका उत्तम दर्शन पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा । ' मन - ही-मन ऐसा विचार करके गोवर्धनने मुनिकी हथेलीपर अपने शरीरका भार बहुत अधिक बढ़ा लिया । उस समय मुनि अत्यन्त थक गये । उन्हें पहलेकी कही हुई बातकी याद नहीं रही । उन्होंने पर्वतको हाथसे उतारकर व्रजमण्डलमें रख दिया । भारसे पीड़ित तो वे थे ही, लघुशङ्कासे निवृत्त होनेके लिये चले गये । शौच - क्रिया करके जलमें स्नान करनेके पश्चात् मुनिवर पुलस्त्यने उत्तम पर्वत गोवर्धनसे कहा - ' अब उठो । ' अधिक भारसे सम्पन्न होनेके कारण जब वह दोनों हाथोंसे नहीं उठा, तब महामुनि पुलस्त्यने उसे अपने तेज और बलसे उठा लेनेका उपक्रम किया । मुनिने स्नेहसे भीगी वाणीद्वारा द्रोणनन्दन गिरिराजको ग्रहण करनेका सम्पूर्ण शक्तिसे प्रयास किया, किंतु वह एक अंगुल भी टस से मस न हुआ ॥३४–४४ ॥ तब पुलस्त्यजी बोले - गिरिश्रेष्ठ! चलो, चलो! भार अधिक न बढ़ाओ, न बढ़ाओ । मैं जान गया, तुम रूठे हुए हो । शीघ्र बताओ, तुम्हारा क्या अभिप्राय है? ॥ ४५ ॥

गोवर्धन बोला - मुने! इसमें मेरा दोष नहीं है । आपने ही मुझे यहाँ स्थापित किया है । अब मैं यहाँसे नहीं उहूँगा । अपनी यह प्रतिज्ञा मैंने पहले ही प्रकट कर दी थी ॥ ४६ ॥

सन्नन्दजी कहते हैं - यह उत्तर सुनकर मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यकी सारी इन्द्रियाँ क्रोधसे चञ्चल हो उठीं । उनके ओष्ठ फड़कने लगे । अपना सारा उद्यम व्यर्थ हो जानेके कारण उन्होंने द्रोणपुत्रको शाप दे दिया ॥ ४७ ॥

पुलस्त्यजी बोले- पर्वत! तू बड़ा ढीठ है । तूने मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं किया । इसलिये तू प्रतिदिन तिल - तिलभर क्षीण होता चला जा ॥ ४८ ॥

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७६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड सन्नन्दजी कहते हैं – नन्द! यों कहकर पुलस्त्य नहीं बढ़ेगा । गोवर्धनका यह प्रकट चरित्र परम पवित्र मुनि काशी चले गये । उसी दिनसे यह गोवर्धन पर्वत और मनुष्योंके बड़े - बड़े पापोंका नाश करनेवाला है । प्रतिदिन तिल - तिल करके क्षीण होता चला जा रहा है । यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हारे सामने कहा है, जो भूमण्डलमें जबतक भागीरथी गङ्गा और गोवर्धन पर्वत इस रुचिर और अद्भुत है । यह उत्तम मोक्ष प्रदान करनेवाला भूतलपर विद्यमान हैं, तबतक कलिका प्रभाव कदापि है, इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ४ ९ –५१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' गिरिराजकी उत्पत्तिका वर्णन ' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

तीसरा अध्याय श्रीयमुनाजीका गोलोकसे अवतरण और पुनः गोलोकधाममें प्रवेश सन्नन्दजी कहते हैं- नन्दराज! गोलोकमें श्रीहरिने जब यमुनाजीको भूतलपर जानेकी आज्ञा दी और सरिताओंमें श्रेष्ठ यमुना जब श्रीकृष्णकी परिक्रमा करके जानेको उद्यत हुईं, उसी समय विरजा तथा ब्रह्मद्रवसे उत्पन्न साक्षात् गङ्गा- ये दोनों नदियाँ आकर यमुनाजीमें लीन हो गयीं । इसीलिये परिपूर्णतमा कृष्णा ( यमुना ) को परिपूर्णतम श्रीकृष्णकी पटरानीके रूपमें लोग जानते हैं । तदनन्तर सरिताओंमें श्रेष्ठ कालिन्दी अपने महान् वेगसे विरजाके वेगका भेदन करके निकुञ्ज -द्वारसे निकलीं और असंख्य ब्रह्माण्ड-समूहोंका स्पर्श करती हुई ब्रह्मद्रवमें गयीं । फिर उसकी दीर्घ जलराशिका अपने महान् वेगसे भेदन करती हुई वे महानदी श्रीवामनके बायें चरणके अँगूठेके नखसे विदीर्ण हुए ब्रह्माण्डके शिरोभागमें विद्यमान ब्रह्मद्रवयुक्त विवरमें श्रीगङ्गाके साथ ही प्रविष्ट हुईं और वहाँसे वे सरिद्वरा यमुना ध्रुवमण्डलमें स्थित भगवान् अजित विष्णुके धाम वैकुण्ठलोकमें होती हुई ब्रह्मलोकको लाँघकर जब ब्रह्ममण्डलसे नीचे गिरीं, तब देवताओंके सैकड़ों लोकोंमें एक से दूसरेके क्रमसे विचरती हुई आगे बढ़ीं । तदनन्तर वे सुमेरुगिरिके शिखरपर बड़े वेगसे गिरीं और अनेक शैल - शृङ्गोंको लाँघकर बड़ी - बड़ी चट्टानोंके तटोंका भेदन करती हुई जब मेरुपर्वतसे दक्षिण दिशाकी ओर जानेको उद्यत हुईं, तब यमुनाजी गङ्गासे अलग हो गयीं । महानदी गङ्गा तो हिमवान् पर्वतपर चली गयीं, किंतु कृष्णा ( श्यामसलिला यमुना ) कलिन्द - शिखर-पर जा पहुँचीं । वहाँ जाकर उस पर्वतसे प्रकट होनेके कारण उनका नाम ' कालिन्दी ' हो गया । कलिन्दगिरिके शिखरोंसे टूटकर जो बड़ी - बड़ी चट्टानें पड़ी थीं, उनके सुदृढ़ तटोंको तोड़ती - फोड़ती और भूखण्डपर लोटती हुई वेगवती कृष्णा कालिन्दी अनेक देशोंको पवित्र करती हुई खाण्डववनमें ( इन्द्रप्रस्थ या दिल्लीके पास ) जा पहुँचीं । यमुनाजी साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णको अपना पति बनाना चाहती थीं, इसलिये वे परम दिव्य देह धारण करके खाण्डववनमें तपस्या करने लगीं । यमुनाके पिता भगवान् सूर्यने जलके भीतर ही एक दिव्य गेहका निर्माण कर दिया था, जिसमें आज भी वे रहा करती हैं । खाण्डववनसे वेगपूर्वक चलकर कालिन्दी व्रजमण्डलमें श्रीवृन्दावन और मथुराके निकट आ पहुँचीं । महावनके पास सिकतामय रमण-स्थलमें भी प्रवाहित हुईं । श्रीगोकुलमें आनेपर परम सुन्दरी यमुनाने ( विशाखा सखीके नामसे ) अपने नेतृत्वमें गोप- किशोरियोंका एक यूथ बनाया और श्रीकृष्णचन्द्रके रासमें सम्मिलित होनेके लिये उन्होंने वहीं अपना निवासस्थान निश्चित कर लिया । तदनन्तर वे जब व्रजसे आगे जाने लगीं, तब व्रजभूमिके वियोगसे विह्वल हो, प्रेमानन्दके आँसू बहाती हुई पश्चिम दिशाकी ओर प्रवाहित हुईं ॥ १-१८ ॥ तदनन्तर व्रजमण्डलकी भूमिको अपने वारि - वेगसे तीन बार प्रणाम करके यमुना अनेक देशोंको पवित्र

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अध्याय ३ ] श्रीयमुनाजीका गोलोकसे अवतरण करती हुई उत्तम तीर्थ प्रयागमें जा पहुँचीं । वहाँ गङ्गाजीके साथ उनका संगम हुआ और वे उन्हें साथ लेकर क्षीरसागरकी ओर गयीं । उस समय देवताओंने उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा की और दिग्विजयसूचक जयघोष किया । नदीशिरोमणि कलिन्दनन्दिनी कृष्ण-वर्णा श्रीयमुनाने समुद्रतक पहुँचकर गद्गद वाणीमें श्रीगङ्गासे कहा ॥ १ ९ –२१ ॥ यमुनाने कहा – समस्त ब्रह्माण्डको पवित्र करनेवाली गङ्गे! तुम धन्य हो । साक्षात् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है, अत: तुम समस्त लोकोंके लिये एकमात्र वन्दनीया हो । शुभे! अब मैं यहाँसे ऊपर उठकर श्रीहरिके लोकमें जा रही हूँ । तुम्हारी इच्छा हो तो तुम भी मेरे साथ चलो! तुम्हारे समान दिव्य तीर्थ न तो हुआ है और न आगे होगा ही । गङ्गा ( आप ) सर्वतीर्थमयी हैं, अतः सुमङ्गले गङ्गे! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ । यदि मैंने कभी कोई अनुचित बात कही हो तो उसके लिये मुझे क्षमा कर देना ॥ २२–२४ ॥ गङ्गा बोलीं – कृष्णे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको पावन बनानेवाली तो तुम हो, अतः तुम्हीं धन्य हो । श्रीकृष्णके वामाङ्गसे तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है । तुम परमानन्द -स्वरूपिणी हो । साक्षात् परिपूर्णतमा हो । समस्त लोकोंके द्वारा एकमात्र वन्दनीया हो । परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णकी भी पटरानी हो । अतः कृष्णे! तुम सब प्रकारसे उत्कृष्ट हो । तुम कृष्णाको मैं प्रणाम करती हूँ । तुम समस्त तीर्थों और देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो । गोलोकमें भी तुम्हारा दर्शन दुष्कर है । मैं तो भगवान् श्रीकृष्णकी ही आज्ञासे मङ्गलमय पाताललोकमें जाऊँगी । यद्यपि तुम्हारे वियोगके भयसे मैं बहुत व्याकुल हूँ, तो भी इस समय तुम्हारे साथ चलनेमें असमर्थ हूँ । व्रजके रासमण्डलमें मैं भी तुम्हारे यूथमें इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत और पुनः गोलोकधाममें प्रवेश ७७ सम्मिलित होकर रहूँगी । हरिप्रिये! मैंने भी यदि कोई अप्रिय बात कह दी हो तो उसके लिये मुझे क्षमा कर देना ॥ २५-२९ ॥ सन्नन्दजी कहते हैं— इस प्रकार एक- दूसरेको प्रणाम करके दोनों नदियाँ तुरंत अपने - अपने गन्तव्य पथपर चली गयीं । सुरधुनी गङ्गाजी अनेक लोकोंको पवित्र करती हुई पातालमें चली गयीं और वहाँ भोगवती - वनमें जाकर ' भोगवती गङ्गा'के नामसे प्रसिद्ध हुईं । उन्हींका जल भगवान् शंकर और शेषनाग अपने मस्तकपर धारण करते हैं॥३०-३१ ॥ इधर कृष्णा अपने वेगसे सप्तसागर - मण्डलका भेदन करके सातों द्वीपोंके भूभागपर लोटती हुई और भी प्रखर वेगसे आगे बढ़ीं । सुवर्णमयी भूमिपर पहुँचकर लोकालोक पर्वतपर गयीं । उसके शिखरों तथा गण्डशैलों ( टूटी चट्टानों ) के तटका भेदन करके कालिन्दी फुहारेकी - सी जलधाराके साथ उछलकर लोकालोक पर्वतके शिखरपर जा पहुँचीं । फिर वहाँसे ऊर्ध्वगमन करती हुई स्वर्गवासियोंके स्वर्गलोकतक जा पहुँचीं । फिर ब्रह्मलोकतकके समस्त लोकोंको लाँघकर श्रीहरिके पदचिह्नसे लाञ्छित श्रीब्रह्मद्रवसे युक्त ब्रह्माण्डविवरसे होती हुई आगे बढ़ गयीं । उस समय समस्त देवता प्रणाम करते हुए उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा कर रहे थे । इस तरह सरिताओंमें श्रेष्ठ यमुना पुन: श्रीकृष्णके गोलोकधाममें आरूढ़ हो गयीं । कलिन्दगिरिनन्दिनी यमुनाके इस मङ्गलमय नूतन चरित्रका भूतलपर यदि श्रवण या पठन किया जाय तो वह उत्तम मङ्गलका विस्तार करता है । यदि कोई भी मनुष्य इस चरित्रको मनमें धारण करे और प्रतिदिन पढ़े तो वह भगवान्‌की निकुञ्जलीलाके द्वारा वरण किये गये उनके परमपद - गोलोकधाममें पहुँच जाता है ॥ ३२ – ३७ ॥ नन्द - सन्नन्द - संवादमें ' कालिन्दीके आगमनका वर्णन ' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

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चौथा अध्याय श्रीबलराम और श्रीकृष्णके द्वारा बछड़ोंका चराया जाना तथा वत्सासुरका उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! सन्नन्दकी बात सुनकर महामना नन्दराज समस्त गोपगणोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए और वृन्दावनमें जानेको तैयार हो गये । यशोदा, रोहिणी तथा समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ घोड़ों, रथों, वीर पुरुषों तथा विप्रमण्डलीसे मण्डित हो, परम बुद्धिमान् नन्दराज दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्णसहित रथपर आरूढ़ हो वृन्दावनकी ओर चल दिये । उनके साथ गौओंका समुदाय भी था । बूढ़े, बालक और सेवकसहित अनेक छकड़े चल रहे थे । यात्राके समय शङ्ख बजे और नगारोंकी ध्वनियाँ हुईं । बहुत - से गायक नन्दराजका यशोगान कर रहे थे ॥ १-४ ॥ गोप वृषभानुवर अपनी पत्नीके साथ हाथीपर बैठकर, पुत्री राधाको अङ्कमें लिये, गायकोंसे यशोगान सुनते हुए, मृदङ्ग, ताल, वीणा और वेणुओंकी मधुर ध्वनिके साथ वृन्दावनको गये । उनके साथ भी बहुतसे गोप और गौओंका समुदाय था । नन्द, उपनन्द और छहों वृषभानु भी अपने समस्त परिकरोंके साथ वृन्दावनमें गये । समस्त गोपोंने अपने सेवकसहित वृन्दावनमें प्रवेश करके अलग - अलग गोष्ठ बनाये और इधर - उधर निवास आरम्भ किया । वृषभानुने अपने लिये वृषभानुपुर ( बरसाना ) नामक नगरका निर्माण कराया, जो चार योजन विस्तृत दुर्गके आकारमें था । उसके चारों ओर खाइयाँ बनी थीं । उस दुर्गके सात दरवाजे थे । दुर्गके भीतर विशाल सभामण्डप था । अनेक सरोवर उस दुर्गकी शोभा बढ़ा रहे थे । बीच - बीचमें मनोहर राजमार्गका निर्माण कराया गया था । एक सहस्र कुझें उस पुरकी शोभा बढ़ाती थीं ॥५- १० ॥ श्रीकृष्ण नन्दनगर ( नन्दगाँव ) तथा वृषभानुपुर ( बरसाने ) में बालकोंके साथ क्रीड़ा करते हुए घूमते और गोपाङ्गनाओंकी प्रीति बढ़ाते थे । राजन्! कुछ दिनों बाद सम्पूर्ण गोपोंके समादर - भाजन मनोहर रूपवाले बलराम और श्रीकृष्ण वृन्दावनमें बछड़े चराने लगे । वे दोनों भाई ग्वाल - बालोंके साथ गाँवकी सीमातक जाकर बछड़े चराते थे । कालिन्दीके निकट उसके पावन पुलिनपर सुशोभित निकुञ्जों और कुञ्जोंमें बलराम और श्रीकृष्ण इधर - उधर लुकाछिपीके खेल खेलते और कहीं - कहीं रेंगते हुए चलकर वनमें सानन्द विचरते थे । उन दोनोंके कटिप्रदेशमें करधनीकी लड़ियाँ शोभा देती थीं । खेलते समय उनके पैरोंके मञ्जीर और नूपुर मधुर झंकार फैलाते थे । बलरामके अङ्गोंपर नीलाम्बर शोभा पाता था और श्रीकृष्णके अङ्गोंपर पीतपट । वे दोनों भाई हार और भुजबंदोंसे भूषित थे । कभी बालकोंके साथ क्षेपणों ( ढेलवासों ) द्वारा ढेले फेंकते और कभी बाँसुरी बजाते थे । कुछ ग्वाल - बाल अपने मुखसे करधनीके घुँघुरुओंकी - सी ध्वनि करते हुए दौड़ते और उनके साथ वे दोनों बन्धु - राम और श्याम भी पक्षियोंकी छायाका अनुसरण करते भागते हुए सुशोभित होते थे । सिरपर मयूरपिच्छ लगाकर फूलों और पल्लवोंके शृङ्गार धारण करते थे ॥ ११–१७ ॥ नरेश्वर! एक दिन उनके बछड़ोंके झुंडमें कंसका भेजा हुआ वत्सासुर आकर मिल गया । श्रीकृष्णको यह बात विदित हो गयी और वे उसके पास गये । वह दैत्य गोप - बालकोंके बीचमें सब ओर पूँछ उठाकर बार - बार दौड़ता हुआ दिखायी देता था । उसने अचानक आकर अपने पिछले पैरोंसे श्रीकृष्णके कंधोंपर प्रहार किया । अन्य गोप - बालक तो भाग चले, किंतु श्रीकृष्णने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे घुमाकर धरतीपर पटक दिया । इसके बाद श्रीहरि-ने फिर उसे हाथोंसे उठाकर कपित्थ वृक्षपर दे मारा । फिर तो वह दैत्य तत्काल मर गया । उसके धक्के महान् कपित्थ वृक्षने स्वयं गिरकर दूसरे - दूसरे वृक्षोंको भी धराशायी कर दिया । यह एक अद्भुत - सी बात हुई । समस्त ग्वालबाल आश्चर्यसे चकित हो कन्हैया-को वहाँ साधुवाद देने लगे । देवतालोग आकाशमें

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अध्याय ५ ] वकासुरका उद्धार ७ ९ खड़े हो जय - जयकार करते हुए फूल बरसाने लगे । उस दैत्यकी विशाल ज्योति श्रीकृष्णमें लीन हो गयी ॥ १८ - २३ ॥ बहुलाश्वने पूछा – मुने! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है । बताइये तो, इस वत्सासुरके रूपमें पहलेका कौन - सा पुण्यात्मा पुरुष प्रकट हो गया था, जो परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णमें विलीन हुआ? ॥ २४ ॥

श्रीनारदजी बोले - राजन्! मुरके एक पुत्र था, जो महादैत्य ' प्रमील ' के नामसे विख्यात था । उसने देवताओंको भी युद्धमें जीत लिया था । एक दिन वह वसिष्ठ मुनिके आश्रमपर गया । वहाँ उसने मुनिकी होमधेनु नन्दिनीको देखा । उसे पानेकी इच्छासे वह ब्राह्मणका रूप धारण करके मुनिके पास गया और उस मनोहर गौके लिये याचना करने लगा । महर्षि दिव्यदर्शी थे; अतः सब कुछ जानकर भी चुप रह

गये, कुछ बोले नहीं । तब गौने स्वयं कहा ॥ २५ - २६ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत श्रीनन्दिनी बोली - – दुर्मते! तू मुरका पुत्र दैत्य है, तो भी मुनियोंकी गौका अपहरण करनेके लिये ब्राह्मण बनकर आया है; अतः गायका बछड़ा हो जा ॥ २७ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! नन्दिनीके इतना कहते ही वह मुरपुत्र महान् गोवत्स बन गया । तब उसने मुनिवर वसिष्ठ तथा उस गौकी परिक्रमा एवं प्रणाम करके कहा - ' मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ' ॥ २८ ॥

गौ बोली- महादैत्य! द्वापरके अन्तमें जब तू श्रीकृष्णके बछड़ोंमें घुस जायगा, उस समय तेरी मुक्ति होगी ॥ २ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— उसी शाप और वरदानके कारण परिपूर्णतम पतितपावन साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णमें दैत्य वत्सासुर विलीन हुआ । इसमें विस्मयकी कोई बात नहीं है ॥ ३० ॥

' वत्सासुरका मोक्ष ' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पाँचवाँ अध्याय वकासुरका उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं - एक दिन बलराम तथा ग्वाल - बालोंके साथ बछड़े चराते हुए श्रीहरिने यमुनाके निकट आये हुए वकासुरको देखा । वह श्वेत पर्वतके समान ऊँचा दिखायी देता था । बड़ी - बड़ी टाँगें और मेघ गर्जनके समान ध्वनि! उसे देखते ही ग्वाल - बाल डरके मारे भागने लगे । उसकी चोंच वज्रके समान तीखी थी । उसने आते ही श्रीहरिको अपना ग्रास बना लिया । यह देख सब ग्वाल - बाल रोने लगे । रोते - रोते वे निष्प्राण - से हो गये । उस समय हाहाकार करते हुए सब देवता वहाँ आ पहुँचे । इन्द्रने तत्काल वज्र चलाकर उस महान् वकपर प्रहार किया । वज्रकी चोटसे वकासुर धरतीपर गिर पड़ा, किंतु मरा नहीं । वह फिर उठकर खड़ा हो गया । तब ब्रह्माजीने भी कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्डसे मारा । उस आघातसे गिरकर वह असुर दो घड़ीतक मूच्छित पड़ा रहा । फिर अपने शरीरको कँपाता हुआ जँभाई लेकर वह बड़े वेगसे उठ खड़ा हुआ । उसकी मृत्यु नहीं हुई । वह बलवान् दैत्य मेघके समान गर्जना करने लगा । इसी समय त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने उस महान् असुरपर त्रिशूलसे प्रहार किया । उस प्रहारसे दैत्यकी एक पाँख कट गयी, तो भी वह महाभयंकर असुर मर न सका । तदनन्तर वायुदेवने वकासुरपर वायव्यास्त्र चलाया; उससे वह कुछ ऊपरकी ओर उठ गया, परंतु पुनः अपने स्थानपर आकर खड़ा हो गया । इसके बाद यमने सामने आकर उसपर यमदण्डसे प्रहार किया, परंतु प्रचण्ड - पराक्रमी वकासुरकी उस दण्डसे भी मृत्यु नहीं हुई । यमराजका वह दण्ड भी टूट गया, किंतु वकासुरको कोई क्षति नहीं पहुँची । इतनेमें ही प्रचण्ड किरणोंवाले चण्डपराक्रमी सूर्यदेव उसके सामने आये । उन्होंने धनुष हाथमें लेकर वकासुरको सौ

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८० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड बाण मारे । वे तीखे बाण उसकी पाँखमें धँस गये, फिर भी वह मर न सका । तब कुबेरने तीखी तलवारसे उसके ऊपर चोट की । इससे उसकी दूसरी पाँख भी कट गयी, किंतु वह दैत्यपुंगव मृत्युको नहीं प्राप्त हुआ । तदनन्तर सोमदेवताने उस महावकपर नीहारास्त्रका प्रयोग किया । उसके प्रहारसे शीतपीड़ित हो वकासुर मूच्छित तो हो गया, किंतु मरा नहीं; फिर उठकर खड़ा हो गया । अब अग्निदेवताने उस महावकपर आग्नेयास्त्रसे प्रहार किया; इससे उसके रोएँ जल गये, परंतु उस महादुष्ट दैत्यकी मृत्यु नहीं हुई । तत्पश्चात् जलके स्वामी वरुणने उसको पाशसे बाँधकर धरतीपर घसीटा । घसीटनेसे वह महापापी असुर क्षत - विक्षत हो गया; किंतु मरा नहीं ॥ १-१५ ॥ तदनन्तर वेगशालिनी भद्रकालीने आकर उसपर गदासे प्रहार किया । गदाके प्रहारसे मूच्छित हो वकासुर अत्यन्त वेदनाके कारण सुध - बुध खो बैठा । उसके मस्तकपर चोट पहुँची थी, तथापि वह अपने शरीरको कँपाता और फड़फड़ाता हुआ फिर उठकर खड़ा हो गया और वह महादुष्ट दैत्य धीरतापूर्वक समराङ्गणमें स्थित हो मेघोंकी भाँति गर्जना करने लगा । उस समय शक्तिधारी स्कन्दने बड़ी उतावलीके साथ उसके ऊपर अपनी शक्ति चलायी । उसके प्रहारसे उस पक्षिप्रवर असुरकी एक टाँग टूट गयी, किंतु वह मर न सका । तदनन्तर विद्युत्की गड़गड़ाहटके समान गर्जना करते हुए उस दैत्यने सहसा क्रोधपूर्वक धावा किया और अपनी तीखी चोंचसे मार - मारकर सब देवताओंको खदेड़ दिया । आकाशमें आगे - आगे देवता भाग रहे थे और पीछेसे वकासुर उन्हें खदेड़ रहा था । इसके बाद वह दैत्य पुनः वहीं लौट आया और समस्त दिङ्मण्डलको अपने सिंहनादसे निनादित करने लगा ॥ १६–२० ॥ उस समय समस्त देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों तथा द्विजोंने श्रीनन्दनन्दनको शीघ्र ही सफल आशीर्वाद प्रदान किया । उसी समय श्रीकृष्णने वकासुरके शरीरके भीतर अपने ज्योतिर्मय दिव्य देहको बढ़ाकर विस्तृत कर लिया । फिर तो उस महावकका कण्ठ फटने लगा और उसने सहसा श्रीकृष्णको उगल दिया । फिर तीखी चोंचसे श्रीकृष्णको पकड़नेके लिये जब वह पास आया, तब श्रीकृष्णने झपटकर उसकी पूँछ पकड़ ली और उसे पृथ्वीपर दे मारा; किंतु वह पुनः उठकर चोंच फैलाये उनके सामने खड़ा हो गया । तब श्रीकृष्णने दोनों हाथोंसे उसकी दोनों चोंचें पकड़ लीं और जैसे हाथी किसी वृक्षकी शाखाको चीर डाले, उसी तरह उसे विदीर्ण कर दिया ॥२१-२४ ॥ उस समय मृत्युको प्राप्त हुए दैत्यकी देहसे एक ज्योति निकली और श्रीकृष्णमें समा गयी । फिर तो देवता जय - जयकार करते हुए दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे । तब समस्त ग्वाल - बाल आश्चर्यचकित हो, सब ओरसे आकर श्रीकृष्णसे लिपट गये और बोले-' सखे! आज तो तुम मौतके मुखसे कुशलपूर्वक निकल आये'॥२५-२६ ॥ इस प्रकार वकासुरको मारनेके पश्चात् बछड़ोंको आगे करके श्रीकृष्ण बलराम और ग्वाल - बालोंके साथ गीत गाते हुए सहर्ष राजभवनमें लौट आये । परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णके इस पराक्रमपूर्ण चरित्रका घर लौटे हुए ग्वाल - बालोंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया । उसे सुनकर समस्त गोप अत्यन्त विस्मित हुए ॥ २७-२८ ॥ बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! यह वकासुर पूर्वकालमें कौन था और किस कारणसे उसको बगुलेका शरीर प्राप्त हुआ था? वह पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीकृष्णमें लीन हुआ, यह कितने सौभाग्यकी बात है! ॥२ ९ ॥ श्रीनारदजीने कहा— नरेश्वर! ' हयग्रीव ' नामक दैत्यके एक पुत्र था, जो ' उत्कल ' नामसे प्रसिद्ध हुआ । उसने समराङ्गणमें देवताओंको परास्त करके देवराज इन्द्रके छत्रको छीन लिया था । उस महाबली दैत्यने और भी बहुत - से मनुष्यों तथा नरेशोंकी राज्य - सम्पत्तिका अपहरण करके सौ वर्षों-तक सर्ववैभवसम्पन्न राज्यका उपभोग किया । एक दिन इधर - उधर विचरता हुआ दैत्य उत्कल गङ्गा-सागरसंगमपर सिद्ध मुनि जाजलिकी पर्णशालाके समीप गया और पानीमें बंसी डालकर बारंबार मछलियोंको पकड़ने लगा । यद्यपि मुनिने मना

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अध्याय ६ ] अघासुरका उद्धार और उसके पूर्वजन्मका परिचय ८१ किया, तथापि उस दुर्बुद्धिने उनकी बात नहीं मानी । मुनिश्रेष्ठ जाजलि सिद्ध महात्मा थे, उन्होंने उत्कलको शाप देते हुए कहा – ' दुर्मते! तू बगुलेकी भाँति मछली पकड़ता और खाता है, इसलिये बगुला ही हो जा । ' फिर क्या था? उत्कल उसी क्षण बगुलेके रूपमें परिणत हो गया । तेजोभ्रष्ट हो जानेके कारण उसका सारा गर्व गल गया । उसने हाथ जोड़कर मुनिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणोंमें पड़कर कहा ॥ ३०–३५ ॥ उत्कल बोला – मुने! मैं आपके प्रचण्ड तपोबलको नहीं जानता था । जाजलिजी! मेरी रक्षा कीजिये | आप जैसे साधु - महात्माओंका सङ्ग तो उत्तम मोक्षका द्वार माना गया है । जो शत्रु और मित्रमें, मान और अपमानमें, सुवर्ण और मिट्टीके ढेलेमें तथा सुख और दुःखमें भी समभाव रखते हैं, वे आप जैसे महात्मा ही सच्चे साधु हैं । मुने! इस भूतलपर महात्माओंके दर्शनसे मनुष्योंका कौन - कौन मनोरथ नहीं पूरा हुआ? ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सम्राट्का पद तथा योगसिद्धि – सब कुछ संतोंकी कृपासे सुलभ हो सकते हैं । मुनिश्रेष्ठ जाजले! आप जैसे महात्माओंसे इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' लोगोंको धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति हुई तो क्या हुई? साधुपुरुषोंकी कृपासे तो साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा भी मिल जाता है ॥ ३६-३९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- नरेश्वर! उस समय उत्कलकी विनययुक्त बात सुनकर वे जाजलि मुनि प्रसन्न हो गये । इन्होंने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी । उन्होंने उत्कलसे कहा ॥ ४० ॥

जाजलि बोले – वैवस्वत मन्वन्तर प्राप्त होनेपर जब अट्ठाईसवें द्वापरका अन्तिम समय बीतता होगा, उस समय भारतवर्षके माथुर - जनपदमें स्थित व्रजमण्डलके भीतर साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावनमें गोवत्स चराते हुए विचरेंगे । उन्हीं दिनों तुम भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है । हिरण्याक्ष आदि दैत्य भगवान्‌के प्रति वैरभाव रखनेपर भी उनके परमपदको प्राप्त हो गये हैं॥४१–४३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- इस प्रकार वकासुरके रूपमें परिणत हुआ उत्कल दैत्य जाजलिके वरदानसे भगवान् श्रीकृष्णमें लयको प्राप्त हुआ । संतोंके सङ्गसे क्या नहीं सुलभ हो सकता? ॥ ४४ ॥

वकासुरका मोक्ष ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

छठा अध्याय अघासुरका उद्धार और उसके पूर्वजन्मका परिचय श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! एक दिन ग्वाल - बालोंके साथ बछड़े चराते हुए श्रीहरि कालिन्दीके निकट किसी रमणीय स्थानपर बालोचित खेल खेलने लगे । उसी समय अघासुर नामक महान् दैत्य एक कोस लंबा शरीर धारण करके भीषण मुखको फैलाये वहाँ मार्गमें स्थित हो गया । दूरसे ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई पर्वत खड़ा हो । वृन्दावनमें उसे देखकर सब ग्वाल - बाल ताली बजाते हुए बछड़ोंके साथ उसके मुँहमें घुस गये । उन सबकी रक्षाके लिये बलरामसहित श्रीकृष्ण भी अघासुरके मुखमें प्रविष्ट हो गये । उस सर्परूपधारी असुरने जब बछड़ों और ग्वाल - बालोंको निगल लिया, तब देवताओं में मच गया; किंतु दैत्योंके मनमें हर्ष ही हुआ । उस समय श्रीकृष्णने अघासुरके उदरमें अपने विराट् स्वरूपको बढ़ाना आरम्भ किया । इससे अवरुद्ध हुए अघासुरके प्राण उसका मस्तक फोड़कर बाहर निकल गये । मिथिलेश्वर! फिर बालकों और बछड़ोंके साथ श्रीकृष्ण अघासुरके मुखसे बाहर निकले । जो बछड़े और बालक मर गये थे, उन्हें माधवने अपनी कृपा-दृष्टिसे देखकर जीवित कर दिया । अघासुरकी जीवन-ज्योति श्यामघनमें विद्युत्की भाँति श्रीघनश्याममें

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८२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं विलीन हो गयी । राजन्! उसी समय देवताओंने पुष्पवर्षा की । देवर्षि नारदके मुखसे यह वृत्तान्त सुनकर मिथिलेश्वर बहुलाश्वने कहा ॥१-८ ॥ राजा बोले- देवर्षे! यह दैत्य पूर्वकालमें कौन था, जो इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णमें विलीन हुआ? अहो! कितने आश्चर्यकी बात है कि वह दैत्य वैर बाँधनेके कारण शीघ्र ही श्रीहरिको प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! शङ्खासुरके एक पुत्र था, जो ' अघ ' नामसे विख्यात था । महाबली अघ युवावस्थामें अत्यन्त सुन्दर होनेके कारण साक्षात् दूसरे कामदेव - सा जान पड़ता था । एक दिन मलयाचलपर जाते हुए अष्टावक्र मुनिको देखकर अघासुर जोर-इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके अन्तर्गत परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड जोरसे हँसने लगा और बोला- ' यह कैसा कुरूप है! ' उस महादुष्टको शाप देते हुए मुनिने कहा - ' दुर्मते! तू सर्प हो जा; क्योंकि भूमण्डलपर सर्पोंकी ही जाति कुरूप एवं कुटिल गतिसे चलनेवाली होती है । ' ज्यों-ही उसने यह सुना, उस दैत्यका सारा अभिमान गल गया और वह दीनभावसे मुनिके चरणोंमें गिर पड़ा । उसे इस अवस्थामें देखकर मुनि प्रसन्न हो गये और पुनः उसे वर देते हुए बोले – ॥ १०–१३ ॥ अष्टावक्रने कहा— करोड़ों कंदर्पोंसे भी अधिक लावण्यशाली भगवान् श्रीकृष्ण जब तुम्हारे उदरमें प्रवेश करेंगे, तब इस सर्परूपसे तुम्हें छुटकारा मिल जायगा ॥ १४ ॥

' अघासुरका मोक्ष ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

सातवाँ अध्याय ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, गोवत्सों एवं गोप - बालकोंका हरण श्रीनारदजी कहते हैं - राजेन्द्र! अब भगवान् श्रीकृष्णकी अन्य लीला सुनिये । यह लीला उनके बाल्यकालकी है, तथापि उनके पौगण्डावस्थाकी प्राप्तिके बाद प्रकाशित हुई । श्रीकृष्ण गोवत्स एवं गोप - बालकोंकी मृत्युके समान ( भयंकर ) अघासुरके मुखसे रक्षा करनेके उपरान्त उनका आनन्द बढ़ानेकी इच्छासे यमुनातटपर जाकर बोले- ' प्रिय सखाओ! अहा, यह कोमल वालुकामय तट बहुत ही सुन्दर है! शरद् ऋतुमें खिले हुए कमलोंके परागसे पूर्ण है । शीतल, मन्द एवं सुगन्धित - त्रिविध वायुसे सौरभित है । यह तटभूमि भौरोंकी गुञ्जारसे युक्त एवं कुञ्ज और वृक्षलताओंसे सुशोभित है । गोपबालको! दिनका एक पहर बीत गया है । भोजनका समय भी हो गया है । अतएव इस स्थानपर बैठकर भोजन कर लो । कोमल वालुकावाली यह भूमि भोजन करनेके उपयुक्त दीख रही है । बछड़े भी यहाँ जल पीकर हरी - हरी घास चरते ' रहेंगे । ' गोप - बालकोंने श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर कहा - ' ऐसा ही हो ' और वे सब - के - सब भोजन करनेके लिये यमुनातटपर बैठ गये । इसके उपरान्त जिनके पास भोजन - सामग्री नहीं थी, उन बालकोंने श्रीकृष्णके कानमें दीन - वाणीसे कहा-' हमलोगोंके पास भोजनके लिये कुछ नहीं है, हम लोग क्या करें? नन्दगाँव यहाँसे बहुत दूर है, अतः हमलोग बछड़ोंको लेकर चले जाते हैं । ' यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले- ' प्रिय सखाओ! शोक मत करो । मैं सबको यत्नपूर्वक ( आग्रहके साथ ) भोजन कराऊँगा । इसलिये तुम सब मेरी बातपर भरोसा करके निश्चिन्त हो जाओ । ' श्रीकृष्णकी यह उक्ति सुनकर वे लोग उनके निकट ही बैठ गये । अन्य बालक ( अपने-अपने ) छीकोंको खोलकर श्रीकृष्णके साथ भोजन करने लगे ॥ १–११ ॥ श्रीकृष्णने गोप - बालकोंके साथ, जिनकी उनके सामने भीड़ लगी हुई थी, एक राजसभाका आयोजन किया । समस्त गोप - बालक उनको घेरकर बैठ गये । ये लोग अनेक रंगोंके वस्त्र पहने हुए थे और श्रीकृष्ण पीला वस्त्र धारण करके उनके बीचमें बैठ गये । विदेह! उस समय गोप - बालकोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णकी शोभा देवताओंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रके

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अध्याय ७ ] ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, गोवत्सों एवं गोप - बालकोंका हरण ८३ समान अथवा पँखुड़ियोंसे घिरी हुई स्वर्णिम कमलकी कर्णिका ( केसरयुक्त भीतरी भाग ) के समान हो रही थी । कोई बालक कुसुमों, कोई अङ्कुरों, कोई पल्लवों, कोई पत्तों, कोई फलों, कोई अपने हाथों, कोई पत्थरों और कोई छीकोंको ही पात्र बनाकर भोजन करने लगे । उनमें से एक बालकने शीघ्रतासे कौर उठाकर श्रीकृष्णके मुखमें दे दिया । श्रीकृष्णने भी उस ग्रासका भोग लगाकर सबकी ओर देखते हुए कहा - ' भैया! अन्य बालकोंको अपनी - अपनी स्वादिष्ट सामग्री चखाओ । मैं स्वादके बारेमें नहीं जानता । ' बालकोंने ' ऐसा ही हो ' कहकर अन्यान्य बालकोंको भोजनके ग्रास ले जाकर दिये । वे भी उन ग्रासोंको खाकर एक दूसरेकी हँसी करते हुए उसी प्रकार बोल उठे । सुबलने पुनः हरिके मुखमें ग्रास दिया, परंतु श्रीकृष्ण उस कौरमेंसे थोड़ा - सा खाकर हँसने लगे । इस प्रकार जिस - जिसने कौर खाया, वे सभी जोरसे हँसने लगे । बालक बोले-' नन्दनन्दन! सुनो! जिसके नाना मूढ़ ( मूर्ख ) हैं, उसको भोजनका ज्ञान नहीं रहता । इसलिये तुमको स्वाद प्राप्त नहीं हुआ ' ॥ १२–१९ ॥ इसके उपरान्त श्रीदामाने माधवको और अन्य बालकोंको भोजनके ग्रास दिये । व्रज - बालकोंने उसको उत्तम बताकर उसकी बहुत प्रशंसा की । इसके बाद वरूथप नामके एक बालकने पुनः श्रीकृष्णको एवं अन्य बालकोंको आग्रहपूर्वक कौर दिये । श्रीकृष्ण आदि वे सभी लोग थोड़ा - थोड़ा खाकर हँसने लगे । बालकोंने कहा — ' यह भी सुबलके ग्रास - जैसा ही है । हम सभी उसे खाकर उद्विग्न हुए हैं । ' इस प्रकार सभीने अपने - अपने ग्रास चखाये और सभी परस्पर हँसने - हँसाने और खेलने लगे । कटिवस्त्रमें वेणु, बगल में लकुटी एवं सींगा, बायें हाथमें भोजनका इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीवृन्दावनखण्डके और गोप - बालकोंका हरण ' नामक कौर, अंगुलियोंके बीचमें फल, माथेपर मुकुट, कंधेपर पीला दुपट्टा, गलेमें वनमाला, कमरमें करधनी, पैरोंमें नूपुर और हृदयपर श्रीवत्स तथा कौस्तुभमणि धारण किये हुए श्रीकृष्ण गोप - बालकोंके बीचमें बैठकर अपनी विनोदभरी बातोंसे बालकोंको हँसाने लगे । इस प्रकार यज्ञभोक्ता श्रीहरि भोजन करने लगे, जिसको देवता एवं मनुष्य आश्चर्यचकित होकर देखते रहे । इस प्रकार श्रीकृष्णके द्वारा रक्षित बालकोंका जिस समय भोजन हो रहा था, उसी समय बछड़े घासकी लालच में पड़कर दूरके एक गहन वनमें घुस गये । गोप - बालक भयसे व्याकुल हो गये । यह देखकर श्रीकृष्ण बोले-' तुमलोग मत जाओ । मैं बछड़ोंको यहाँ ले आऊँगा । ' यों कहकर श्रीकृष्ण उठे और भोजनका कौर हाथमें लिये ही गुफाओं एवं कुञ्जोंमें तथा गहन वनमें बछड़ोंको ढूँढ़ने लगे ॥ २० - ३० ॥ जिस समय व्रजवासी बालकोंके साथ श्रीकृष्ण यमुनातटपर रुचिपूर्वक भोजन कर रहे थे, उसी समय पद्मयोनि ब्रह्माजी अघासुरकी मुक्ति देखकर उसी स्थानपर पहुँच गये । इस दृश्यको देखकर ब्रह्माजी मन - ही - मन कहने लगे- ' ये तो देवाधिदेव श्रीहरि नहीं हैं, अपितु कोई गोपकुमार हैं । यदि ये श्रीहरि होते तो गोप- बालकोंके साथ इतने अपवित्र अन्नका भोजन कैसे करते? ' राजन्! ब्रह्माजी परमात्माकी मायासे मोहित होकर इस प्रकार बोल गये । उन्होंने उनकी ( भगवान्‌की ) मनोज्ञ महिमाको जाननेका निश्चय किया । ब्रह्माजी स्वयं आकाशमें अवस्थित थे । इसके उपरान्त अघासुर - उद्धारकी लीलाके दर्शनसे चकित होकर समस्त गायों - बछड़ों तथा गोप- बालकोंका हरण करके वे अन्तर्धान हो गये ॥ ३१ - ३४ ॥ अन्तर्गत ' ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, गोवत्सों सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

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आठवाँ अध्याय ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णके सर्वव्यापी विश्वात्मा स्वरूपका दर्शन श्रीनारदजी कहते हैं— श्रीकृष्ण गोवत्सोंको न पाकर यमुना - किनारे आये, परंतु वहाँ गोप - बालक भी नहीं दिखायी दिये । बछड़ों और वत्सपालों- दोनोंको ढूँढ़ते समय उनके मनमें आया कि ' यह तो ब्रह्माजीका कार्य है । तदनन्तर अखिलविश्वविधायक श्रीकृष्णने गायों और गोपियोंको आनन्द देनेके लिये लीलासे ही अपने - आपको दो भागों में विभक्त कर लिया । वे स्वयं एक भागमें रहे तथा दूसरे भागसे समस्त बछड़े और गोप - बालकोंकी सृष्टि की । उन लोगोंके जैसे शरीर, हाथ, पैर आदि थे; जैसी लाठी, सींगा आदि थे; जैसे स्वभाव और गुण थे, जैसे आभूषण और वस्त्रादि थे; भगवान् श्रीहरिने अपने श्रीविग्रहसे ठीक वैसी ही सृष्टि उत्पन्न करके यह प्रत्यक्ष दिखला दिया कि यह अखिल विश्व विष्णुमय है । श्रीकृष्णने खेलमें ही आत्मस्वरूप गोप - बालकोंके द्वारा आत्मस्वरूप गो - वत्सोंको चराया और सूर्यास्त होनेपर उनके साथ नन्दालयमें पधारे । वे बछड़ोंको उनके अपने - अपने गोष्ठोंमें अलग - अलग ले गये और स्वयं उन - उन गोप - बालकोंके वेषमें अन्यान्य दिनोंकी भाँति उनके घरोंमें प्रवेश किया । गोपियाँ वंशीध्वनि सुनकर आदरके साथ शीघ्रतासे उठीं और अपने बालकोंको प्यारसे दूध पिलाने लगीं । गायें भी अपने - अपने बछड़ोंको निकट आया देखकर रँभाती हुई उनको चाटने और दूध पिलाने लगीं । अहा! गोपियाँ और गायें श्रीहरिकी माता बन गयीं । गोप - बालक एवं गोवत्स स्नेहाधिक्यके कारण पहलेकी अपेक्षा चौगुने अधिक बढ़ने लगे । गोपियाँ अपने बालकोंकी उबटन-स्नानादिके द्वारा स्नेहमयी सेवा करके तब श्रीकृष्णके दर्शनके लिये आयीं ॥१-१० ॥ इसके बाद अनेक बालकोंका विवाह हो गया । अब श्रीकृष्णस्वरूप अपने पति उन बालकोंके साथ करोड़ों गोपवधुएँ प्रीति करने लगीं । इस प्रकार वत्स- पालनके बहाने अपनी आत्माकी अपनी ही आत्माद्वारा रक्षा करते हुए श्रीहरिको एक वर्ष बीत गया । एक दिन बलरामजी गोचारण करते हुए वनमें पहुँचे । उस समयतक ब्रह्माजीद्वारा वत्सों एवं वत्सपालोंका हरण हुए एक वर्ष पूर्ण होनेमें केवल पाँच - छ: रात्रियाँ शेष रही थीं । उस वनमें स्थित पहाड़की चोटीपर गायें चर रही थीं । दूरसे बछड़ोंको घास चरते देखकर वे उनके निकट आ गयीं और उनको चाटने तथा अपना अमृत तुल्य दूध पिलाने लगीं । राजन्! गोपोंने देखा कि गायें बछड़ोंको दूध पिलाकर स्नेहके कारण गोवर्धनकी तलहटीमें ही रुक गयी हैं, तब वे अत्यन्त क्रोधमें भरकर पहाड़से नीचे उतरे और अपने बालकोंको दण्ड देनेके लिये शीघ्रता से वहाँ पहुँचे । परंतु निकट पहुँचते ही ( स्नेहके वशीभूत होकर ) गोपोंने अपने बालकोंको गोदमें उठा लिया । युवक अथवा वृद्ध – सभीके नेत्रोंमें स्नेहके आँसू आ गये और वे अपने पुत्र - पौत्रोंके साथ मिलकर वहाँ बैठ गये ॥ ११–१८ ॥ संकर्षण बलराम इस प्रकार जब गोपोंको प्रेम-परायण देखा, तब उनके मनमें अनेक प्रकारके संदेह उठने लगे । उन्होंने मन ही मन कहा - ' अहा! प्रायः एक वर्षसे व्रजमें क्या हो गया है, वह मेरी समझमें नहीं आ रहा है । दिन - प्रतिदिन सबके हृदयोंका स्नेह अधिकाधिक बढ़ता जा रहा है । क्या यह देवताओं, गन्धर्वों या राक्षसोंकी माया है? अब मैं समझता हूँ कि यह मुझे मोहित करनेवाली कृष्णकी मायासे भिन्न और कुछ नहीं है । इस प्रकार विचार करके बलरामजीने अपने नेत्र बंद कर लिये और दिव्यचक्षुसे भूत, भविष्य तथा वर्तमानको देखा । बलरामजीने समस्त गोवत्स एवं पहाड़की तलहटीमें खेलनेवाले गोप - बालकोंको वंशी - वेत्रविभूषित, मयूरपिच्छधारी, श्यामवर्ण, मणिसमूहों एवं गुञ्जाफलोंकी मालासे शोभित, कमल एवं कुमुदिनीकी मालाएँ, दिव्य पगड़ी एवं मुकुट धारण किये हुए, कुण्डलों एवं अलकावलीसे सुशोभित, शरत्कालीन कमलसदृश ं नेत्रों