हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 111–120
हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 111–120
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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १०१ द्भस्त्रावत् । पुनःपुनरेवं कृत्वा रेचकपूरकावृत्तिश्रमे जाते वामनासा- घुटेन पूरकं कृत्वानामिकाकनिष्ठिकाभ्यां धृत्वा कुंभकं कृत्वा पिंग- लया रेचयेदिति द्वितीया रीतिः । भस्त्रिकागुणानाह -वातपित्तेति ॥ वातश्च पित्तं च श्लेष्मा च वातपित्तश्लेष्माणस्तान्हरतीति तादृशं शरीरे देहे योऽग्निर्जठरानलस्तस्य विशेषेण वर्धनं दीपनम् ॥ ६५ ॥
भाषार्थ -विधिपूर्वक कुंभकको करके इडानामकी चंद्रनाडीसे वायुका रेचन करे इस भस्त्राकुंभककी यह परिपाटी ( कम ) है कि वाम नासिकाके पुटको दक्षिणभुजाकी अनामिका कनिष्ठिकाओंसे रोककर दक्षिण नासिकाके पुटसे भस्त्राके समान वेगपूर्वक रेचक पूरक करने -फिर श्रम होनेपर उसी नासिकाके पुटसे पूरक करके अँगूठेसे दक्षिण नासिकाके पुटको रोककर यथाशक्ति कुंभक प्राणायामसे वायुको धारण करे फिर इडासे रेचन करै फिर दक्षिण नासिकाके पुटको अँगूठेसे रोककर वामनासा पुढसे भस्त्राके समान शीघ्र २ रेचक पूरक करने श्रम होनेपर तिसी नासिकाके पुटसे पूरक करके अनामिका कनिष्ठिकासे नासिकाके बामपुटको रोककर यथाशक्ति कुंभकको कर पिंगला नाडीसे प्राणका रेचन करै एक तो यह रीति है -और नासिकाके वामपुटको अनामिका कनिष्ठिकासे रोक-कर नासिकाके दक्षिण पुढसे पूरक करके शीघ्र अंगूठेसे रोककर नासिकाके घामपुटसे रेचन करै इसप्रकार शत १०० वार करके श्रम होनेपर उससे ही पूरण करै -और बंधपूर्वक करके इडानाडीसे रेचन करे-फिर नासिकाके दक्षिण पुटको अँगूठेसे रोककर नासिकाके वामपुटसे पूरक करके शीघ्रही नासिकाके वामपुटको अनामिका कनिष्ठिकासे रोककर पिंगलासे भस्त्राके समान रेचन करै-बारंबार इसप्रकार करके रेचक पूरककी आवृत्तिमें जब श्रम होजाय अर्थात् थकावट होजाय तब वामनासिका पुटसे पूरक करके अनामिका और कनिष्टि-कासे धारण करनेके अनंतर कुंभक प्राणायामको करके पिंगलासे रेचन करे यह दूसरी रीतिहै - अब भस्त्रिका कुंभकके गुणोंको कहते हैं कि बात पित्त श्लेष्मा ( कफ ) इनको हरतीहै और शरीरकी अग्नि ( जठराग्नि ) को बढातीहै ॥ ६५ ॥
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( ) | [ १०२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः कुंडलीबोधकं क्षिप्रं पवनं सुखदं हितम् ॥ ब्रह्मनाडीमुखे संस्थकफाद्यर्गलनाशनम् ॥ ६६ ॥
कुंडलीति ॥ क्षिप्रं शीघ्रं कुंडल्याः सुप्ताया बोधकं बोधकर्तृ पुनातीति पवनं पवित्रकारकं सुखं ददातीति सुखदं हितं त्रिदोषहर-त्वात्सर्वेषां हितं सर्वदा च हितं सर्वेषां कुंभकानां सर्वदा हितत्वेऽपि सूर्यभेदनोज्जायिनावुष्णौ प्रायेण हितौ । सीत्कारीशीतल्यौ शीतले प्रायेणोष्णे हिते । भस्त्राकुंभकः समशीतोष्णः सर्वदा हितः सर्वेषां कुंभकानां सर्वरोगहरत्वेऽपि सूर्यभेदनं प्रायेण वातहरम् । उज्जायी प्रायेण श्लेष्महरः । सीत्कारीशीतल्यौ प्रायेण पित्तहरे । भस्त्राख्यः कुंभकः त्रिदोषहर इति बोध्यम् । ब्रह्मनाडी सुषुम्ना ब्रह्मप्रापक- त्वात् । तथा च श्रुतिः-' शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैकामणे भवति ॥ इति। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति। तस्या मुखेऽग्रभागेविष्वगन्यासंस्थः सम्यक्उत्क स्थितोयः कफादिरूपोऽर्गलः प्राणगतिप्रतिबंधकस्तस्य नाशनं नाशकर्तृ ॥ ६६ ॥
भाषार्थ -और शीघ्रही सोती हुई कुंडलीका बोधकहै और पवित्र करताहै और सुखका दाताहै और हित है यद्यपि संपूर्ण कुंभक सब कालमें हित होतेहैं तथापि सूर्यभेदन और उज्जायी ये दोनों उष्ण हैं इससे शीतके समय हितकारी हैं और शीत्कारी शीतली ये दोनों शीतल हैं इससे उष्णकालमें हितहैं-और भस्त्रा कुंभक न शीतलहै न उष्णहै इससे सब कालमें हितहै । यद्यपि संपूर्ण कुंभक सब रोगोंको हरतेहैं तथापि सूर्यभेदन प्रायसे वातको हरताहै और उज्जायी प्रायसे कफको हरता है और शीत्कारी शीतली ये दोनों प्रायसे पित्तको हरतेहैं और भवानामका कुंभक त्रिदोष ( संनिपात ) को हरताहै यह और ब्रह्मलोक प्राप्त करनेवाली जो सुषुम्ना नामकी ब्रह्मन डीहै सोई इस श्रुतिमें लिखा है कि एकसौ एक १०१ हृदयकी नाडी हैं उनमेसे एक नाडी मूर्द्धा और ( मस्तक के सम्मुख गयी है उस नाडीके द्वारा जो उर्ध्व लोकमें जाता है वह मोक्षको
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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १०३ प्राप्त होताहै और अन्य सब नाडी जहां तहां क्रमको छोडकर गयींहैं उस ब्रह्मनाडीके मुख ( अग्रभाग ) में भलीप्रकार स्थित जो कफ आदि अर्गल अर्थात् प्राणकी गतिका प्रतिबंधक उसका नाशकहै ॥ ६६ ॥
सम्यग्गात्रसमुद्भूतं ग्रंथित्रयविभेदकम् ॥ विशेषेणैव कर्तव्यं भस्त्राख्यं कुंभकं त्विदम् ॥ ६७॥
सम्यगिति ॥ सम्यग्दृढीभूतं गात्रे गात्रमध्ये सुषुम्नायामेव सम्यगुद्भूतं समुद्भूतं जातं यग्रंथीनां त्रयं ग्रंथित्रयं ब्रह्मग्रंथिविष्णुग्रंथि- रुद्रग्रंथिरूपं तस्य विशेषेण भेदजनकम् । अत एव इदं भस्त्रा इत्याख्या
यस्यति भस्त्राख्यं कुंभकं तु विशेषेणैव कर्तव्यमवश्यकर्तव्यमित्यर्यः ।
सूर्यभेदनादयस्तु यथासंभवं कर्तव्याः ॥ ६७ ॥
भाषार्थ - भलीप्रकार ( दृढ ) जो गात्र ( सुषुम्ना ) नाडीके मध्यमें भली- प्रकार उत्पन्न हुई जो तीन ग्रंथि अर्थात् ब्रह्मग्रंथि विष्णुग्रंथि रुद्रग्रंथिरूप जो तीन गाँठ हैं उनका विशेषकर भेदजनकहै इसीसे यह भत्त्रा नामका कुंभक प्राणा- याम विशेषकर करने योग्यहै और सूर्य भेदन आदि यथासंभव ( जब तब ) करने योग्य हैं अर्थात् आवश्यक नहीं हैं ॥ ६७ ॥
अथ आमरी ।
anali पूरकं भृंगनादं भृंगीनादं रेचकं मंदमंदम्॥
योगींद्राणामेवमभ्यासयोगाच्चित्ते जाता काचिदानं- दलीला ॥ ६८ ॥
भ्रामरी कुंभकमाह -वेगादिति ॥ वेगात्तरसा घोषं सशब्दं यथा स्यात्तथा भृंगस्य भ्रमरस्य नाद इव नादो यस्मिन्कर्मणि तत्तथा पूरक कृत्वा । भृंग्यो भ्रमर्यस्तासां नाद इव नादो यस्मिंस्तथा मंदमंद रेचकं कुर्यात् । पूरकानंतरं कुंभकस्तु भ्रामर्याः कुंभकत्वादेव सिद्धो विशे- षाच्च नोक्तः । पूरकरेचकयोस्तु विशेषोऽस्तीति तावेवोक्तौ । एवमुक्त
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( ) [ १०४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः रीत्याभ्यसनमभ्यासस्तस्य योगो युक्तिस्तस्माद्योगाद्राणां चित्ते काचिदनिर्वाच्या आनंदे लीला क्रीडा आनंदलीला जातोत्पन्न भवति ॥ ६८ ॥
भाषार्थ--अब भ्रामरी कुंभकका वर्णन करतेहैं कि, वेगसे शब्दसहित जैसे हो तैसे भ्रमरके समान है शब्द जिसमें उस प्रकारसे कुम्भक प्राणायामको करके फिर भ्रमरीके समान है शब्द जिसमें उसप्रकार मंद २ रेचक प्राणायामको करै यहां पूरकके अनंतर कुम्भकको भी करे कदाचित् कहो कि, वह कहा क्यों नहीं सो ठीक नहीं क्योंकि वह बिना कहे भी इससे सिद्ध हैं कि, भ्रमरी भी कुंभक ही है इससे विशेषकर कुंभक नहीं कहाहै और पूरक रेचक इन दोनोंमें तो विशेष है इससे वे दोनोंही कहे हैं इस पूर्वोक्त रीतिके द्वारा जो अभ्यास योग ( करने ) से योगींद्रोंको चित्तमें कोई ( अपूर्व ) आनंदमें लीला ( क्रीडा ) उत्पन्न होतीहै अर्थात् इस भ्रामरी कुंभकके अभ्याससे योगियोंके चित्तमें आनंद होताहै ॥ ६८ ॥
अथ मूर्च्छा ।
पूरकांते गाढतरं बद्ध। जालंधरं शनैः ॥
रेचयेन्मूर्च्छनाख्येयं मनोमूर्च्छा सुखप्रदा ॥ ६ ९ ॥
मूर्च्छाकुंभकमाह- पूरकांत इति ॥ पूरकस्यांतेऽवसानेऽतिशयेन गाढतरं जालंधराख्यं बंधं बद्धा शनैर्मदंमंदं रेचयेत् । इयं कुंभिका-.मूर्च्छनाख्या मूर्च्छना इत्याख्या यत इति मूर्च्छनाख्या कीदृशी मनो मूर्च्छयतीति मनोमूर्च्छा एतेन मूर्च्छनाया विग्रहदर्शनपूर्वकं फलमुक्तम् पुनः कीदृशी सुखप्रदा सुखं प्रददातीति सुखप्रदा ॥ ६ ९ ॥ । भाषार्थ-- अब मूर्च्छा नामके कुंभकको कहते हैं कि, पूरक प्राणायामके अन्तमें ( पीछे ) अत्यंत गाढरीतिसे पूर्वोक्त जालंधर बंधको बांधकर शनैः २ प्राणवायुका रेचन करै यह कुंभिका मूर्च्छना नाभकी कहाती है और मनकी मूर्च्छाको करतीहै और उत्तम सुखको देती है ॥ ६९ ॥
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] ( ) २. संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । १०५
अथ प्लाविनी ।
अन्तः प्रवर्तितोदारमारुतापूरितोदरः ॥
पयस्यगाधेऽपि सुखात्प्लवते पद्मपत्रवत् ॥ ७० ॥
प्लाविनीकुंभकमाह -अंतरिति ॥ अंतः शरीरांतः प्रवर्तितः पूरित उदारोऽतिशयितो यो मारुतः समीरस्तेनासमंतात्पूरितमुदरं येन स पुमानगाधेऽप्यतलस्पर्शेऽपि पयसि जले पद्मपत्रवत्पद्मपत्रेण तुल्यं सुखादनायासात् प्लवते तरति गच्छति ॥ ७० ॥
भाषार्थ - अब प्लाविनी नामके कुंभकका वर्णन करतेहैं कि, शरीरके मध्यमें प्रवृत्त किया ( भरा ) उदार ( अधिक ) जो पवन उससे चारों ओरसे पूर्ण है उदर जिसका ऐसा योगी अगाधजलमें भी इसप्रकार लवता ( तरता ) है जैसे कमलका पत्र अर्थात् बिना आश्रयकेही जलके ऊपर तरजाताहै ॥ ७० ॥
प्राणायामस्त्रिधा प्रोक्तो रेचपूरककुंभकैः ॥ सहितः केवलश्वेति कुंभको द्विविधो मतः ॥ ७१ ॥
अथ प्राणायामभेदानाह-प्राणायाम इति ॥ प्राणस्य शरीरांत:-संचारिवायोरायमनं निरोधनमायामः प्राणायामः । प्राणायामलक्षण- मुक्तं गोरक्षनाथेन-'प्राणःस्वदेहजीवायुरायामस्तन्निरोधनमिति' । रेच-कश्च पूरकश्च कुंभकश्च तैर्भेदैस्त्रिधा त्रिप्रकारकः रेचकप्राणायामः पूरकप्राणायामः कुंभकप्राणायामश्चेति । रेचकलक्षणमाह याज्ञ- वल्क्यः -' बहिर्यद्रेचनं वायोरुदराद्रेचकः स्मृतः ' इति । रेचकप्रा- णायामलक्षणम्-' निष्क्रम्य नासाविवरादशेषं प्राणं बहिः शून्य-मिवानिलेन । निरुध्य संतिष्ठति रुद्धवायुः स रेचको नाम महा-निरोधः ॥ पूरकलक्षणम्-' बाह्यादापूरणं वायोरुदरे पूरको हि सः । ' पूरकप्राणायामलक्षणम्-' बाह्ये स्थितं प्राणपुटेन वायुमा- कृष्य तेनैव शनैः समंतात् । नाडीश्च सर्वाः परिपूरयेद्यः स पूरको ! -'नाम महानिरोधः कुंभकलक्षणम् संपूर्य कुंभवद्वायोर्धारणं
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( ) | [ १०६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः कुंभको भवेत् । अयं कुंभकस्तु पूरकप्राणायामादभिन्नः । भि-न्नस्तु | ' न रेचको नैव च पूरकोऽत्र नासापुटे संस्थितमेव वायुम । सुनिश्चलं धारयते क्रमेण कुंभाख्यमेतत्प्रवदंति तज्ज्ञाः ॥ 9 अथ प्रकारांतरेण प्राणायामं विभजते ॥ सहित इति ॥ कुंभको द्विविधः सहितः केवलश्चेति । मतोऽभिमतो योगिनामिति शेषः । तत्र सहितो द्विविधः । रेचकपूर्वकः कुंभकपूर्वकश्च । तदुक्तम्-' आरेच्यापूर्य वा कुर्यात्स वै सहितकुंभकः । तत्र रेचकपूर्वको रेचकप्राणायामाद-भिन्नः । पूरकपूर्वकः कुम्भकः पूरकप्राणायामादभिन्नः केवलकुंभकः कुंभक प्राणायामादभिन्नः । प्रागुक्ताः सूर्यभेदनादयः पूरकपूर्वकस्य कुंभकस्य भेदा ज्ञातव्याः ॥ ७१ ॥
भाषार्थ-अब प्राणायामके भेदोंको कहते हैं कि, रेचक प्राणायाम पूरक प्राणायाम कुंभक प्राणायाम इन भेदोंसे प्राणायाम तीन प्रकारका योगियोंने कहाहै प्राणायामका लक्षण गोरक्षनाथने यह कहाहै कि, अपने देहकी जो जीवनकी अवस्था उसको प्राण कहते हैं और उस अवस्थाके अवरोधको आयाम कहते हैं अर्थात् अवस्थाके अवरोधका नाम प्राणायाम है और रेचकका लक्षण याज्ञवल्क्यने यह कहा है कि उदरसे बाहिर जो वायुका रेचन उसको रेचक कहते हैं और रेचक प्राणायामका यह लक्षण हैं कि संपूर्ण माणको नासि- काके छिद्रमेंसे बाहिर निकास और प्राणवायुको रोककर इसप्रकार टिकै कि मानो देह प्राणवायुसे शून्य है यह महान् निरोध रेचकनाम प्राणायाम कहाताहै और पूरकका लक्षण यह है कि बाहिरसे जो उदरमें वायुका पूरण वह पूरक होताहै और पूरक प्राणायामका लक्षण यहहै कि, बाहिर टिकीहुई पवनको नासिकाके पुटसे आकर्षण करके उसी नासिकाके,पुटसे शनैः २ संपूर्ण नाडि- योंको जो पूर्ण करदे उस महानिरोधको पूरकनाम प्राणायाम कहते हैं । कुंभ-कका लक्षण यह है कि कुंभ ( घट ) के समान वायुको पूर्ण करके जो धारण वह कुंभक होताहै यह कुंभक प्राणायाम तो पूरक प्राणायामसे अभिन्न अर्थात् दोनों एकही हैं भिन्नतो यह हैं कि रेचक करै न पूरक करै किंतु नासिकाके पुटमें टिके हुए वायुकोही भलीप्रकार निश्चल रीतिपूर्वक क्रमसे जो धारण करना प्राणा-
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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १०७ यामके ज्ञाता इसको कुंभक कहते हैं । अब अन्यप्रकारसे प्राणायामके विभाग करते हैं कि, कुंभक दो प्रकारका योगीजनोंने मानाहै एक सहित और दूसरा केवल अर्थात् रेचकपूरक और पूरकपूर्वक सोई कहाहै कि वायुका आसमंतात् रेचन वा पूरणकरके जो प्राणायाम करै वह सहितकुंभक होताहे उन तीनोंमें रेचकपूर्वक प्राणायाम रेचकप्राणायाम रूपहै और पूरकपूर्वक कुंभक पूरकप्राणायामसे अभिन्नरूपहै और केवल कुंभक कुंभकप्राणायामसे अभिन्नरूपहै पूर्वोक्त सूर्यभेदन आदि जो प्राणायामहैं वे पूरकपूर्वक कुंभकके भेद जानने । भावार्थ यह है कि, रेचकपूरक कुंभकके भेदसे प्राणायाम तीन प्रकारकाहै और सहित केवलके भेदसे कुंभक दो प्रकारकाहै ॥ ७१ ॥
यावत्केवल सिद्धिः स्यात्सहितं तावद्भ्यसेत् ॥ रेचकं पूरकं मुक्त्वा सुखं यद्वायुधारणम् ॥ ७२ ॥
सहितकुंभकाभ्यासस्यावधिमाह -यावदिति ॥ केवलस्य केवल- कुंभकस्य सिद्धिः केवलसिद्धिर्यावत्पर्यतं स्यात्तावत्पर्यतं रहितकुंभकं सूर्यभेदादिकमभ्यसेदनुतिष्ठेत् । सुषुम्नाभेदानंतरं यदा सुषुम्नांतर्घट- शब्दा भवति तदा केवलकुंभकः सिद्धयति तदनंतरं सहितकुंभका दश विंशातेर्वा कार्याः अशीतिसंख्यापूर्तिः केवलकुंभकैरेव कर्तव्या । सति सामर्थ्य केवलकुंभका अशीतेरधिकाः कार्याः । केवलकुंभकस्य लक्षणमाह-ह-रेचकमिति ॥ रेचक पूरकं मुक्त्वा त्यक्त्वा सुखमनायासं यथा स्यात्तथा वायोर्धारणं वायुधारणं यत् ॥ ७२ ॥
भाषार्थ - अब सहितकुंभकके अभ्यासकी अवधिको कहते है कि, केवल कुंभकप्राणायामकी सिद्धि जबतक होय तबतक सूर्यभेदन आदि सहित कुंभकका अभ्यास करें सुषुम्नानाडीके भेदके अनंतर सुषुम्नाके अनंतर जब जलपूरित घटके समान शब्द होय तब केवल कुंभक सिद्ध होता है उसके अनंतर दश वा बीश सहितकुंभक करने अस्सी संख्याका पूरण केवल कुंभकोंसेही करना सामर्थ्य होयतो अस्सीसे अधिकभी केवल कुंभक करने । अब केवलः
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( ) [ १०८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः कुंभकके लक्षणोंको कहते हैं कि, रेचक और पूरकको छोडकर सुखसे जो चायुका धारण उसे केवलकुंभक कहते हैं ॥ ७२ ॥
प्राणायामोऽयमित्युक्तः स वै केवलकुंभकः ॥ कुंभके केवले सिद्धे रेचपूरकवर्जिते ॥ ७३ ॥
प्राणायाम इति ॥ स वै मिश्रितः केवलकुंभकः प्राणायाम इत्ययमुक्तः केवलं प्रशंसंति ॥ केवल इति ॥ रेचो रेचकः रेचश्च पूरकश्च रेचपूरकौ ताभ्यां वर्जिते रहिते केवले कुंभके सिद्धे सति॥७३ ॥
भाषार्थ- वह मिश्रितप्राणायाम और केवल कुंभकप्राणायाम इस पूर्वोक्त प्रकारसे कहा रेचक और पूरकसे वर्जित ( विना ) केवल कुंभकके सिद्ध होनेपर ॥ ७३ ॥
न तस्य दुर्लभं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ शक्तः केवलकुंभेन यथेष्टं वायुधारणात् ॥ ७४ ॥
नेति ॥ तस्य योगिनस्त्रिषु लोकेषु दुर्लभं दुष्प्रापं किंचित्किमपि
यथेष्टं यथेच्छं वायोर्धारणं वापि न विद्यते । तस्य सर्व सुलभमित्यर्थः ॥
शक्त इति ॥ केवलकुंभकेन कुंभकाभ्यासेन शक्तः समर्थो यथेष्टं यथेच्छं वायोर्धारणं तस्माद्वायुधारणात् ॥ ७४ ॥
भाषार्थ - उसके बल कुंभक प्राणायाम करनेवाले योगीको तीनों लोकोंमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है अर्थात् त्रिलोकीकी संपूर्ण वस्तु सुलभ हैं —और केवल कुंभकके अभ्यासमें जो समर्थ है वह अपनी इच्छाके अनुसार प्राण-चायुके धारणसे || ७४ ॥ राजयोगपदं चापि लभते नात्र संशयः ॥ कुंभकारकुंडलीबोधः कुंडलीबोधतो भवेत् ॥ ७५ ॥
राजेति ॥ राजयोगपदं राजयोगात्मकं पदं लभते । अत्र संशयो न । निश्चितमेतदित्यर्थः । कुंभकाभ्यासस्य परंपरया कैवल्यहेतुत्व-
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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १० ९ माह-कुंभकादिति ॥ कुंभकात्कुंभकाभ्यासात्कुंडल्याधारशक्तिस्तस्था बोधो निद्राभंगो भवेत् । कुंडल्या बोधः कुंडलीबोधस्तस्मात्कुंडली- बोधतः ॥ ७५ ॥
भाषार्थ-राजयोगपदको भी योगी प्राप्त होताहै इसमें संशय नहीं. अब कुंभकप्राणायामके अभ्यासको परम्परासे मोक्षका हेतु वर्णन करते हैं — कि कुंभक प्राणायामके अभ्याससे आधार शक्तिरूप कुण्डलीका बोध होताहै - अर्थात्निद्राका भंग होताहै और कुण्डलीके बोधसे ॥ ७५ ॥
अनर्गला सुषुम्ना च हठसिद्धिश्व जायते ॥ हठं विना राजयोगं राजयोगं विना हठः ॥ न सिध्यति ततो युग्ममानिष्पत्तेः समभ्यसेत् ॥७६ ॥
अनर्गलेति ॥ सुषुम्नानाड्यनर्गला कफाद्यर्गलरहिता भवेत् । हठस्य हठाभ्यासस्य सिद्धिः प्रत्याहारादिपरंपरया कैवल्यरूपासिद्धि- र्जायते । हठयोगराजयोगसाधनयोः परस्परोपकार्योपकारकत्वमाह- हठं विनेति ॥ हठ हठयोगं विना राजयोगो न सिध्यति राजयोगं विना हठो न सिध्यति ततोऽन्यतरस्य सिद्धिर्नास्ति । तस्मान्निष्पत्ति राजयोगसिद्धिमामर्यादीकृत्य या निष्पत्तिस्तस्या राजयोगसिद्धिप- येतं युग्मं हठयोगराजयोगइयमभ्यसेदनुतिष्ठेत् । हठातिरिक्ते साक्षा- त्परंपरया वा राजयोगसाधनेऽत्र राजयोगशब्दः । जीवनसाधने लांगले जीवनशब्दप्रयोगवत् । राजयोगसाधनं चतुथोंपदेशे वक्ष्यमाणमुन्मनी-शांभवीमुद्रादिरूपमपरोक्षानुभूतावुक्तं पंचदशांगरूपं दशांगरूपं च । वाक्यसुधायामुक्तं दृश्यानुविद्धादिरूपं च ॥ ७६ ॥
भाषार्थ-सुषुम्नानाडी अनर्गल होजाती है अर्थात् कफ आदि बंधनसे रहित होजाती है और हठयोगके अभ्यासकी सिद्धि प्रत्याहार आदिकी परम्परासे होजातीहै अर्थात् मोक्षसिद्धि होजाती है । अब हठयोग और राजयोगके जो साधन हैं उनका परस्पर उपकार्य उपकारक भावका वर्णन करते हैं कि.
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( ) | [: ११० हठयोगप्रदीपिका उपदेश हठयोग विना राजयोग सिद्ध नहीं होता और राजयोगके विना हठयोग सिद्ध नहीं होता जिससे एकके विना एककी सिद्धि नहीं होती तिससे राजयोग-सिद्धि पर्यंत हठयोग और राजयोग दोनोंका अभ्यास करै अर्थात् राजयोग- सिद्धिका यत्न करै यहां राजयोगपर उस राजयोगके साधन ( हेतु ) का वाचक है जो हठयोगसे भिन्न हो और साक्षात् वा परम्परासे राजयोगका कारण हो जैसे जीवनके साधन लांगलमें जीवन शब्दका प्रयोग होताहै वह राजयोगका साधन उन्मनी और शाम्भवी मुद्रामें कहेंगे और अपरोक्षानुभूति में पंचदशांग और दशांग रूप कहाहै और वाक्यसुधामें दृश्यानुविद्ध आदिरूप कहाहै ॥ ७६ ॥
कुंभकप्राणरोधांते कुर्याच्चित्तं निराश्रयम् ॥ एवमभ्यासयोगेन राजयोगपदं व्रजेत् ॥ ७७ ॥
हठाभ्यासाद्राजयोगप्राप्तिप्रकारमाह-कुंभकेति ॥ कुंभकेन प्रा- णस्य यो रोधस्तस्यांते मध्ये चित्तमंतःकरणं निराश्रयं कुर्यात् । संप्रज्ञातसमाधौ जातायां ब्रह्माकारस्थितेः परं वैराग्येण विलयं कुर्यादित्यर्थः । एवमुक्तरीत्याभ्यासस्य योगो युक्तिस्तेन ' योगः संनहनोपायध्यानसंगतियुक्तिषु ' इति कोशः । राजयोगपदं राजयो- गात्मकं पदं व्रजेत्माप्नुयात् ॥ ७७ ॥
भाषार्थ--अब I हठयोगके अभ्याससे राजयोगप्राप्तिका प्रकार कहते हैं कि, कुंभकप्राणायामसे प्राणका रोध करनेके अंत ( मध्य ) में अन्तःकरणको निरा- श्रय करदे अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधिके होनेपर ब्रह्माकार स्थितिके अनन्तर चैराग्यसे चित्तका लय करदे इस पूर्वोक्त रीतिसे किये अभ्यासके योगसे राजयोग पदको प्राप्त होताहै यहां योगपद इस कोशके अनुसार युक्तिका बोधकहै ॥ ७७ ॥
वपुःकृशत्वं वदने प्रसन्नता नादस्फुटत्वं नयने सुनिर्मले । अरोगता बिंदुजयोऽग्निदीपनं नाडी- विशुद्धिर्हठयोगलक्षणम् ॥ ७८ ॥
इति हठयोगप्रदीपिकायां द्वितीयोपदेशः ॥ २ ॥