हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 121–130

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 121 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १११ हठसिद्धिज्ञापकमाह -वपुःकृशत्वमिति ॥ वपुषो देहस्य कृशत्वं कार्य वदने मुखे प्रसन्नता प्रसादो नादस्य ध्वनेः स्फुटत्वं प्राकटचं नयने नेत्रे सुष्ठु निर्मले अरोगस्य भावोऽरोगता आरोग्यं विदोर्धा- तोर्जयः क्षयाभावरूपः अरौदर्यस्य दीपनं दीप्तिर्नाडीनां विशेषेण शुद्धिर्मलापगमः एतद्धठस्य हठाभ्याससिद्धेर्भाविन्या लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणम् ॥ ७८ ॥

इति श्रीहठप्रदीपिकाव्याख्यायां ज्योत्स्नाभिधायां ब्रह्मा- नंदकृतायां द्वितीयोपदेशः ॥ २ ॥

भाषार्थ--अअब हठयोगसिद्धिके लक्षणोंको कहते हैं कि देहकी कृशता मुखमें प्रसन्नता नादकी प्रकटता और दोनों नेत्रोंकी निर्मलता रोगका अभाव बिन्दुका जय अर्थात् नाडियोंमें मलका अभाव ये हठयोगसिद्धिके लक्षण हैं अर्थात् चिह्न होयँ तो यह जानना कि, इसको हठयोगकी सिद्धि होजायगी ॥ ७८ ॥

इति श्रीहठयोगप्रदीपिकायां पण्डितमिहिरचन्द्रकृतभाषाविवृत्ति- सहितायां द्वितीयोपदेशः ॥ २ ॥

अथ तृतीयोपदेशः ३. सशैलवनधात्रीणां यथाधारोऽहिनायकः ॥ सर्वेषां योगतंत्राणां तथाधारो हि कुंडली ॥ १ ॥

अथ कुंडल्याः सर्वयोगाश्रयत्वमाह -सशैलेति ॥ शैलाश्च वनानि च शैलवनानि तैः सह वर्तमानाः सशैलवनास्ताश्च ता धात्र्यश्च भूमयस्तासाम् । धात्र्या एकत्वेऽपि देशभेदाद्भेदमादाय बहुवचनम् । अहीनां सर्पाणां नायको नेताहिनायकः शेषो यथा यद्वदाधार आश्रयस्तथा तद्वत् । सर्वेषां योगस्य तंत्राणि योगतंत्राणि योगो-पायास्तेषां कुंडल्याधारशक्तिराश्रयः । कुंडलीबोधं विना सर्वयोगो-पायानां वैयर्थ्यादिति भावः ॥ १९ ॥

पृष्ठ 122

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 122 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ) [: ११२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश भाषार्थ -अब इसके अनंतर कुण्डली सर्व योगोंका आश्रय है इसका वर्णन करतेहैं कि, जैसे संपूर्ण पर्वत वनसहित जितनी भूमि हैं उनका आश्रय ( आधार ) जैसे सपका नायक शेष है तिसी प्रकार योगके समस्त उपायोंका आधार भी कुण्डली है क्योंकि कुंडलीके बोध विना योगके संपूर्ण उपाय व्यर्थ हैं यद्यपि भूमि एकहै -तथापि देशेदसे भूमिके भेदको मानकर बहुवचन ( धात्री-णाम्) यहां दियाहै | सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुंडली ॥ तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यंते ग्रंथयोऽपि च ॥ २ ॥

कुंडलीबोधस्य फलमाह द्वाभ्याम् सुप्तेति ॥ सुप्ता कुंडली गुरोः प्रसादेन यदा जागर्ति बुध्यते तदा सर्वाणि पद्मानि षट्चक्राणि भिद्यंते भिन्नानि भवति । ग्रंथयोsपि च ब्रह्मग्रंथिविष्णुग्रंथिरुद्रयं- थयो भिद्यते भेदं प्राप्नुवंतीत्यन्वयः ॥ २ ॥

भाषार्थ--अअब कुण्डलीके बोधका दो श्लोकोंसे फल कहते हैं जब गुरुकी प्रस- न्नतासे सोती हुई कुण्डली जागती है तब संपूर्ण पद्म अर्थात् हृदयके षट्चक्र भिन्न होजाते हैं अर्थात्खिल जाते हैं और ब्रह्मग्रंथि विष्णुग्रंथि रुद्रग्रंथिरूप तीनों ग्रंथि भी खुल जाती हैं ॥ २ ॥

प्राणस्य शून्यपदवी तथा राजपथायते ॥ तदा चित्तं निरालंबं तदा कालस्य वचनम् ॥ ३ ॥

प्राणस्येति ॥ तदा शून्यपदवी सुषुम्ना प्राणस्य वायोराज्ञां पंथा राजपथं राजपथमिवाचरति राजपथायते राजमार्गायते । सुखेन गमनसंभवात् । तदा चित्तमालंबनमाश्रयस्तस्मान्निर्गतं निरालंबं निर्विषयं भवति । तदा कालस्य मृत्योर्वचनं प्रतारणं भवति ॥ ३ ॥

भाषार्थ -और तिसीप्रकार प्राणकी शून्यपदवी ( सुषुम्ना ) राजपथ ( सडक ) के समान होजाती है अर्थात् प्राण उसमेंको सुखसे गमन करने लगताहै-और उसीसमय चित्तभी निरालंब होजाताहै अर्थात् विषयोंका अनुरागी नहीं रहता और उसीसमय कालका वंचन होताहै अर्थात् मृत्युका भय दूर होजाताहै ॥ ३ ॥

पृष्ठ 123

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 123 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] -! ( ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता ११३ सुषुम्ना शून्यपदवी ब्रह्मरंधं महापथः ॥ श्मशानं शांभवी मध्यमार्गश्वेत्येकवाचकाः ॥ ४ ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्वरीम् ॥ ब्रह्मद्वारमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं समाचरेत् ॥ ५ ॥

सुषुम्नापर्यायानाह-सुषुम्नेति ॥ इत्युक्ताः शब्दा एकस्य एका- र्थस्य वाचकाः एकवाचकाः । पर्याया इत्यर्थः । स्पष्टः श्लोकार्थः ॥ तस्मादिति ॥ यस्मात्कुंडलीबोधेनैव षट्चक्रभेदादिकं भवति तस्मा- सर्वप्रयत्नेन सर्वेण प्रयत्नेन ब्रह्म सच्चिदानंदलक्षणं तस्य द्वारं प्राप्त्यु-पायः सुषुम्ना तस्या मुखेऽग्रभागे मुखेन सुषुम्नाद्वारं पिधाय सुप्ता- मीश्वरी कुंडली प्रबोधयितुं प्रकर्षेण बोधयितुं मुद्राणां महामुद्रादी-नामभ्यासमावृत्ति समाचरेत्सम्यगाचरेत् ॥ ४ ॥ ५ ॥

भाषार्थ - अब सुषुम्नानाडीके पर्यायोंको कहते हैं कि, सुषुम्ना, शून्यपदवी, ब्रह्मरंध्र, महापथ, श्मशान, शांभवी, मध्यमार्ग ये संपूर्ण शब्द एक अर्थके वाचक हैं अर्थात् इन सत्रका सुषुम्ना नाडी अर्थ है जिससे कुण्डलीके बोधसेही षट्चक्र भेद आदि होते हैं इससे संपूर्ण प्रयत्नसे सच्चिदानंदरूप ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय जो सुषुम्ना उसके अग्रभागमें सुषुम्नाके द्वारको ढककर सोतीहुई जो ईश्वरी ( कुण्डली ) है उसका प्रबोध ( जगाना ) करने के लिये मुद्राओंका अभ्यास करै अर्थात् महा-मुद्रा आदिको करें ॥ ४ ॥ ५ ॥

महामुद्रा महाबंध महावेधश्च खेचरी ॥ उडयानं मूलबंधश्च बंधो जालंधराभिधः ॥ ६ ॥

करणी विपरीताख्या वज्रोली शक्तिचालनम् ॥ इदं हि मुद्रादशकं जरामरणनाशनम् ॥ ७ ॥

मुद्रा उद्दिशति- महामुद्रेत्या दिना सार्धेन ॥ सार्थार्थः स्पष्टः ॥ मुद्राफलमाह सार्द्धद्वाभ्याम् इदमिति ॥ इदमुक्तं मुद्राणां दशर्क जरा च मरणं च जरामरणे तयोर्नाशनं निवारकम् ॥ ६ ॥ ७ ॥

पृष्ठ 124

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 124 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ) | [: ११४ हठयोगप्रदीपिका उपदेश भाषार्थ -महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डयान, मूलबंध, जालंध रबंब, विपरीतकरणी, वज्रोली, शक्तिचालन ये पूर्वोक्त दशमुद्रा जरा और मरणको नष्ट करती हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥

आदिनाथोदितं दिव्यमष्टैश्वर्यप्रदायकम् ॥ वल्लभं सर्वसिद्धानां दुर्लभं मरुतामपि ॥ ८ ॥

आदिनाथेति ॥ आदिनाथेन शंभुनोदितं कथितम् । दिवि भवं दिव्यमुत्तमम् । अष्टौ च तान्यैश्वर्याणि चाष्टैश्वर्याणि अणिमा- महिमागरिमालघिमाप्राप्तिप्राकाम्येशतावशिताख्यानि । तत्राणिमा संकल्पमात्रेण प्रकृत्यपगमे परमाणुवद्देहस्य सूक्ष्मता? | महिमा प्रकृत्यापूरेणाकाशादिवन्महद्भावः २ । गरिमा लघुतरस्यापि तूलादे: पर्वतादिवगुरुभावः ३ । लघिमा गुरुत्तरस्यापि पर्वतादेस्तूलादिवल्लघु- भावः ४ | प्राप्तिः सर्वभावसान्निध्यम् । यथा भूमिस्थ एवांगुल्ययेण स्पृशति चंद्रमसम् ५ । प्राकाम्यमिच्छानभिघातः । यथा उदक इव भूमौ निमज्जत्युन्मज्जति च ६ । ईशता भूतभौतिकानां प्रभवाप्यय- संस्थानविशेषसामर्थ्यम् ७ । वशित्वं भूतभौतिकानां स्वाधीनकर- णम् ८ । तेषां प्रदायकं प्रकर्षेण ददातीति तथा तं सर्वे च ते सिद्धाश्च कपिलादयस्तेषां वल्लभं प्रियं मरुतां देवानामपि दुर्लभं दुष्प्रापं किमुतान्येषामित्यर्थः ॥ ८ ॥

भाषार्थ -और आदिनाथने कहे जो उत्तम आठ ऐश्वर्य उनको भलीप्रकार देती है और संपूर्ण जो कपिल आदि सिद्ध हैं उनको प्रिय हैं और देवता- ओंकोभी दुर्लभ हैं वे आठ ऐश्वर्य ये हैं कि-अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशता, वशिता उनमें अणिमा वह सिद्धि होतीहै कि, योगीके संकल्पमात्रसे प्रकृतिके दूर होनेपर परमाणु के समान सूक्ष्म देह होजाय उसे भणिमा १ कहते हैं और प्रकृतिके आपूरको करके अर्थात् अपने देहमें भरके आकाशके समान महान् स्थूल होजानेको महिमा २ सिद्धि कहते हैं । और तूल ( रुई ) आदि

पृष्ठ 125

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 125 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ११५ लघुपदार्थकोभी पर्वत आदिके समान जो गुरु ( भारी ) होजाना है उसे गरिमा ३ कहते हैं और अत्यंत गुरु ( पर्वत आदि ) का जो तूल आदिके समान लघु ( हलका ) होना है उसे लघिमा ४ कहते हैं और संपूर्ण पदार्थोंके जो समीप पहुँचना जैसे कि भूमिपर स्थित योगी अंगुलिके अग्रसे चंद्रमाका स्पर्श करले इसे प्राप्ति ५ कहते हैं और इच्छाका अनभिघात अर्थात् जळके समान भूमिमें प्रविष्ट होजाय और निकस आधै इसको प्राकाम्य हूँ कहते हैं । पांचों महाभूत और उनसे उत्पन्न भौतिकपदार्थ इनकी उत्पत्ति और प्रलय और पाल- नके सामर्थ्यको ईशता सिद्धि ७ कहते हैं और भूत भौतिक पदार्थोंको अपने आधीन करनेको वशिता ८ सिद्धि कहते हैं ये आंठों सिद्धि पूर्वोक्त दशों मुद्राओंके करनेसे होती हैं ॥ ८ ॥

गोपनीयं प्रयत्नेन यथा रत्नकरंडकम् ॥ कस्यचिन्नैव वक्तव्यं कुलस्त्रीसुरतं यथा ॥ ९ ॥

गोपनीयमिति ॥ प्रयत्नेन प्रकृष्टेन यत्नेन गोपनीयम् । गोप- नीयत्वे दृष्टांतमाह -यथेोते ॥ रत्नानां हीरकादीनां करंडकं रत्न- करंडकं यथा येन प्रकारेण गोप्यते तद्वत् । कस्यापि जनमात्रस्य यद्वा कस्यापि ब्रह्मणोऽपि नैव वक्तव्यं नैव वाच्यं किमुतान्यस्य । तत्र दृष्टांतः । कुलस्त्रियाः सुरतं कुलस्त्रीसुरतं संगमनं यथा तद्वत् ॥ ९ ॥

भाषार्थ -ये पूर्वोक्त दशों मुद्रा इसप्रकार प्रयत्नसे गुप्त करने योग्य हैं जैसे हीरा:आदिरत्नोंका करंड ( पेटारी ) गुप्त करने योग्य होतीहै और किसी मनुष्यको वा ब्रह्माको भी इसप्रकार नहीं कहनी. अन्यकी तो कौन कथा है जैसे कुलीनत्रीके सुरत ( संगम ) को किसीको नहीं कहते हैं ॥ ९ ॥

अथ महामुद्रा ।

पादमूलेन वामेन योनिं संपीड्य दक्षिणम् ॥

प्रसारितं पदं कृत्वा धराभ्यां धारयेद्दृढम् ॥ १० ॥

पृष्ठ 126

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 126 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ) [: ११६ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश दशविधमुद्रादिषु प्रथमोदिष्टत्वेन महामुद्रां तावदाह-पादमूले-नेति ॥ वामेन सव्येन पादस्य मूलं पादमूलं पाणिस्तेन पादमूलेन वामपादपाणिनेत्यर्थः । योनिं योनिस्थानं गुदमेयोर्मध्यभागं संपीड्याकुंचितवामपादपाणिना योनिस्थानं दृढं संयोज्येत्यर्थः । दक्षिणं सव्येतरं पदं चरणं प्रसारितं भूमिसंलग्नपाष्णिकमूर्ध्वगुलिकं दंडवत्कृत्वा कराभ्यां संप्रदायादाकुंचितकरतर्जनीभ्यां दृढं गाढं धारयेदप्रदेशे गृह्णीयात् ॥ १० ॥

भाषार्थ-अब दसमुद्राओंमें प्रथम जो महामुद्रा उसका वर्णन करते हैं कि, वामपादके मूल ( तल ) से अर्थात् पाणिसे योनिस्थानको अर्थात् गुदा और लिंगके मध्यभागको भलीप्रकार पीडित ( दबाना ) करके और दक्षिणपादको प्रसारित ( फैलाना ) करके अर्थात् दक्षिणपादकी पाणि ( ऐड ) को भूमिसे मिला- कर और उसकी अंगुलियोंको ऊपरको करके और उस दक्षिणपादको सुकडीहुई दोनों हाथोंकी तर्जनीओंसे दृढरी ति ( खूब ) अंगूठेके स्थानमें धारण करै अर्थात् जोरसे पकडले ॥ १० ॥

कंठे बंधं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः ॥ यथा दंडहतः सर्पो दंडाकारः प्रजायते ॥ ११ ॥

॥ कंठ इति ॥ कंठे कंठदेशे बंधनं सम्यगारोप्य कृत्वा बंधं कृत्वेत्यर्थः । वायुं पवनमूर्ध्वत उपरि सुषुम्नायां । जालंधर- मूलबंधः सूचितः । स तु योनिसंपीडनेन जिह्वाबंधनेनधारयेत् । अनेन सांप्रदायिकाः । यथा दंडेन हतस्ताडितो दंडहतः चरितार्थ इति यस्य स तादृशः । दंडाकारं त्यक्त्वा कारः दंडस्याकार इवाकारो सर्पः कुंडली दंडा-सरल इत्यर्थः । प्रकर्षेण जायते भवति ॥ ११ ॥

भाषार्थ-और कंठके प्रदेशमें भलीप्रकार जालंधरनामके बंधको करके वायुको ऊर्ध्वदेश ( सुषुम्ना ) मेंही धारण करें अर्थात् मूलबंध करे और सांप्रदायिक अर्थात संप्रदायके ज्ञाता तो यह कहते हैं कि, वह मूलबंध तो

पृष्ठ 127

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 127 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ११७ योनिका संपीडन और जिह्वाके बंधनसे चरितार्थ है अर्थात् पृथक् मूलबंध कर-नेका कुछ प्रयोजन नहीं है ऐसा करनेसे जैसे दंडसे हताहुआ सर्प ( कुंडली ) दंडके समान आकारवाला होजाताहै अर्थात् वक्रताको त्यागकर भलीप्रकार सरल होजाताहै ॥ ११ ॥

ऋज्वीभूता तथा शक्तिः कुंडली सहसा भवेत् ॥ तदा सा मरणावस्था जायते द्विपुटाश्रया ॥ १२ । ऋज्वीभूतेति ॥ तथा कुंडल्यावारशक्तिः सहसा शीघ्रमेव ऋज्वी संपद्यते तथाभूता ऋज्वीभूता सरला भवेत् । तदा सेति । द्वे पुटे इडापिंगले आश्रयो यस्याः सा मरणावस्था जायते । कुंडलीबोधे सति सुषुम्नायां प्रविष्टे प्राणे द्वयोः प्राणवियोगात् ॥ १२ ॥

भाषार्थ - तिसीप्रकार आधार शक्ति रूप जो कुंडली हैं वह शीघ्रही ऋज्वी- भूता ( सरल ) होजाती है और उससमय इडा और पिंगलारूप जो दोनों पुट हैं वे आश्रय जिसके ऐसी वह मरणकी अवस्था होजाती है अर्थात् कुंडलीका बोध होनेपर सुषुम्नानाडीमें प्राणका प्रवेश होजता है इससे इडा और पिंगला दोनोंका प्राणवियोग ( मरण ) होजाताहै ॥ १२ ॥

ततः शनैःशनैरेव रेचयेनैव वेगतः ॥ महामुद्रां च तेनैव वदंति विबुधोत्तमाः ॥ १३ ॥

इयं खलु महामुद्रा महासिद्धैः प्रदर्शिता ॥ महाक्केशादयो दोषाः क्षीयंते मरणादयः ॥ महामुद्रां च तेनैव वदंति विबुधोत्तमाः ॥ १४ ॥

तत इति ॥ इयमिति ॥ ततस्तद्नंतरं शनैःशनैरेव रेचयेत् । वायुमिति संबध्यते वेगवस्तु वेगान्न रेचयेत् । वेगतो रेचने बलहानि- प्रसंगात् । खल्विति वाक्यालंकारे । इयं महामुद्रा महासिद्धैरादिना- थादिभिः प्रदर्शिता प्रकर्षेण दर्शिता । महामुद्राया अन्वर्थतामाह-

पृष्ठ 128

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 128 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ) | [ ११८ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः महांतश्च ते क्लेशाश्च महाक्केशा अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पंच वआदयो येषां ते शोकमोहादीनां ते दोषाः क्षीयते । मरणमादिर्येषां जरादीनां तेऽपि च क्षीयंते नश्यंति । यतस्तेनैव हेतुना विशिष्टा बुधा विबुधास्तेषूत्तमा विबुधोत्तमा महामुद्रां वदति । महाक्केशान्मरणादींश्च दोषान्मुद्रयति शमयतीति महामुद्रेति व्युत्पत्तेरित्यर्थः ॥ १३ ॥ १४॥

भाषार्थ-तिससे शनैः २ प्राणवायुका रेचन करै वेगसे न करै क्योंकि वेगसे रेचन करनेमें बलकी हानि होती है तिससेही देवताओंमें उत्तम इसको महामुद्रा कहते हैं और वह महामुद्रा आदिनाथ आदिमहासिद्धोंने भलीप्रकार दिखाई है । अब महामुद्राके अन्वर्थनामका वर्णन करते हैं कि, अविद्या, स्मित, राग, द्वेष, अभिनिवेश रूप पांचों महाक्नेश और मरण आदि दु:ख इस मुद्राके करनेसे क्षीण ( नष्ट ) होजातेहैं तिससेही देवताओंमें श्रेष्ठ इसको महामुद्रा कहते हैं अर्थात् महाक्नेशोंके नष्ट करनेसेही इसका देवताओंने महामुद्रा नाम रक्खा है ॥ १३ ॥ १४ ॥

चंद्रां समभ्यस्य सूर्यांगे पुनरभ्यसेत् ॥ यावत्तुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥ १५ ॥

महामुद्राभ्यासक्रममाह-चंद्रांग इति ॥ चंद्रेण चंद्रनाड्योपल- क्षितमंगं चंद्रागं तस्मिन् चंद्रांगे वामांगे । तुशब्दः पादपूरणे । सम्यगभ्यस्य सूर्येण पिंगलयोपलक्षितमंगं सूर्यागं तस्मिन् सूर्यागे दक्षांगे पुनर्वामांगाभ्यासानंतरं यावद्यावत्कालपर्यंत तुल्या वामांगे कुंभकाभ्याससंख्यासमा संख्या भवेत्तावदभ्यसेत् । ततः संख्यासा- स्यानंतरं मुद्रां महामुद्रां विसर्जयेत् । अत्रायं क्रमः । आकुंचितवाम-पादपाणि योनिस्थाने संयोज्य प्रसारितदक्षिणपादांगुष्माकुंचिततर्ज-नीभ्यां गृहीत्वाभ्यासो वामांगेऽभ्यासः । अस्मिन्नभ्यासे पूरितो वायुर्वामांगे तिष्ठति । आकुंचितदक्षपादपाणि योनिस्थाने संयोज् प्रसारितवामपादांगुष्ठमाकुंचिततर्जनीभ्यां गृहीत्वाभ्यासो दक्षांगे-भ्यासः अस्मिन्नभ्यासे पूरितो वायुर्दक्षांगे तिष्ठति ॥ १५ ॥

पृष्ठ 129

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 129 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ११ ९ भाषार्थ--अअब महामुद्राके अभ्यासका क्रम कहते हैं कि- चंद्रनाडी ( इडा ) से उपलक्षित ( ज्ञात ) जो अंग उसे चंद्रांग कहते हैं अर्थात् वाम अंगकेवित्रे भलीप्रकार अभ्यास करके सूर्य नाडी ( पिंगला ) से उपलक्षित जो दक्षिण अंग उसके विषे अभ्यास करे और जबतक कुंभक प्राणायामोंके अभ्यासकी संख्या समान ( तुल्य ) हो तबतक भलीप्रकार अभ्यास करे फिर संख्याओंकी समानताके अनंतर महामुद्राका विसर्जन करदे, यहां यह क्रम जानना कि, संकुचित किये ( मिला ) करके प्रसारित ( पसारे )वामपादकी पाष्णिको योनिस्थानमें युक्त दक्षिण पादके अंगूठेको आकुंचित ( सुकडी ) तर्जनीयोंसे ग्रहण करके जो इस अभ्यासमें पूरित किया ( भराहुआ )अभ्यास उसे वामांगमें अभ्यास कहते हैं वायु वामांगमें टिकता है और आकुंचित किये दक्षिणपादकी पाष्णिको योनि-स्थानमें संयुक्त करके और प्रसारित ( फैलाये ) किये वामपादके अँगूठेको आकुंचित कीहुई दोनों हाथोंकी तर्जनियोंसे ग्रहण करके जो अभ्यास उसे दक्षांगमें अभ्यास कहते हैं इस अभ्यासमें पूरित किया वायु दक्षिण अंगसे टिकताहै ॥ १५ ॥

न हि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेऽपि नीरसाः ॥ अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमपि जीर्यति ॥ १६ ॥

महामुद्रागुणानाह त्रिभिः-न हीति ॥ हि यस्मान्महामुद्राभ्या- सिन इत्यध्याहारः । पथ्यमपथ्यं वा न । पथ्यापथ्यविचारो नास्ती- त्यर्थः । तस्मात्सर्वे भुक्ता रसाः कट्टुम्लादयो जीर्यते इति विभक्ति विपरिणामेनान्वयः । नीरसा निर्गतो रसो येभ्यस्ते यातयामाः पदार्था जीर्यन्ति । घोरमिति । दुर्जरं भुक्तमन्नं विषं क्ष्वेडमपि पीयूष- मिवामृतमिव जीर्यति जीर्ण भवति । किमुतान्यदिति भावः ॥ १६ ॥

भाषार्थ- अब तीन श्लोकोंसे महामुद्राके गुणोंको कहते हैं कि, जिससे महामुद्रा अभ्यास करनेवाले योगीको पथ्य और अपथ्यका विचार नहीं है तिससे नीरस ( बिडे हुये ) भी संपूर्ण भक्षण किये कटु अम्ल आदि रस

पृष्ठ 130

हठ योग प्रदीपिका, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( ) [ १२० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः जीर्ण हो ( पच ) जाते हैं और भक्षण किया विषके समान घोर अन्नभी अमृत समान जीर्ण होजाताहै अर्थात् पचनेके अयोग्यभी पचजाता है तो योग्य क्यों न पचेगा? ॥ १६ ॥

क्षयकुष्ठ गुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः ॥ तस्य दोषाः क्षयं यांति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत्॥ १७॥

क्षयेति ॥ यः पुमान् महामुद्रामभ्यसेत्तस्य क्षयो राजरोगः, कुष्ठ- गुदावर्तगुल्मा रोगविशेषाः । अजीर्ण भुक्तान्नापरिपाकस्तानि पुरो- गमान्यग्रेतराणि येषां महोदरज्वरादीनां तथा तादृशा दोषा दोषज- निता रोगाः क्षयं नाशं यांति प्राप्नुवंति ॥ १७ ॥

भाषार्थ-जो पुरुष महामुद्राका अभ्यास करताहै, क्षय, गुदावर्त गुल्मरूप रोग विशेष, अजीर्ण अर्थात् भोजन किये अन्नका अपरिपाक ये हैं मुख्य जिनमें ऐसे महोदर, ज्वर आदि दोष उसके क्षय हो जातेहैं अर्थात् नहीं रहते हैं ॥१७॥

कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरा नृणाम् ॥ गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित्॥ १८॥

महामुद्रामुपसंहरंस्तस्या गोष्यत्वमाह-कथितेति ॥ इयमेषा महामुद्रा कथितोक्ता । मयेति शेषः । कीदृशी नृणामभ्यसतां नराणां महत्यश्च ताः सिद्धयश्चाणिमाद्यास्तासां करी कर्त्रीयम् । प्रकृष्टो यत्नः प्रयत्नस्तेन प्रयत्नेन गोपनीया गोपनार्हा यस्यकस्यचिद्यस्य-योग्याकस्याप्यनधिकारिणोऽसंबंधस्यन भवतीत्यर्थः १८ ॥ । सामान्ये षष्ठी । न देया दातुं भाषार्थ -अत्र महामुद्राको समाप्त करते हुए उसको गुप्त करने योग्य वर्णन करते हैं कि, यह पूर्वोक्त जो महामुद्रा वर्णन की है वह मनुष्योंको महा-सिद्धिकी करनेवाली है और बडे यत्नसे गुप्त करने योग्य है और जिस किसी अनधिकारी पुरुषको न देनी ॥ १८ ॥