हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 141–150

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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] ( ) ३. संस्कृतटीका -भाषाटीकासमेता । १३१ मुखी कृत्वा तिसृणां नाडीनां पंथाः त्रिपथस्तस्मित्रिपथे कपाल-कुहरे परियोजयेत्संयोजयेत् । सा त्रिपथे परियोजनरूपा खेचरी

मुद्रा तद्वयोमचक्रमित्युच्यते । व्योमचक्रशब्देनोच्यते ॥ ३७ ॥

भाषार्थ - अब छेदन आदिसे जिह्वाको वृद्धि होनेपर करने योग्य कर्मको कहते हैं कि, जिहाको पराङ्मुख करके अर्थात् पश्चिमको लौटकर तीनों नाडि-योंका मार्ग जो कपालका छिद्र है उसमें संयुक्त करदे वही खेचरी मुद्रा होतीहै । और उसको ही व्योमचक्र कहतेहैं ॥ ३७ ॥

रसनामूर्ध्वग कृत्वा क्षणार्धमपि तिष्ठति ॥ विषैर्विमुच्यते योगी व्याधिमृत्युजरादिभिः ॥ ३८॥

अथ खेचरीगुणाः ॥ रसनामिति ॥ ऊर्ध्वं तालुपरि विवरं गच्छतीति तां तादृशीं रसनां जिह्वां कृत्वा क्षणार्थं क्षणस्य मुहूर्तस्य अर्ध क्षणार्ध घटिकामात्रमपि खेचरी मुद्रा तिष्ठति चेत्तर्हि योगी विषैः सर्ववृश्चिकादिविषैर्विमुच्यते विशेषेण मुच्यते । व्याधितु-वैषम्यं मृत्युश्चरमः प्राणदेहवियोगो जरा वृद्धावस्था ता आदयो येषां वल्यादीनां तैश्च विमुच्यते । ' उत्सवे च प्रकोष्ठे च मुहूर्त नियमे तथा । क्षणशब्दो व्यवस्थायां समयेऽपि निगद्यते ' इति नानार्थः ॥ ३८ ॥

भाषार्थ-अत्र खेचरीके गुणोंका वर्णन करतेहैं कि, जिल्लाको तालुके ऊपरले छिद्रमें करके जो योगी क्षणार्धभी टिकताहै अर्थात् एक घट भी स्थित रहताहै यहां क्षण पदसे इसवचनके अनुसार मुहूर्तका प्रहण है। वह योगी धातुओंकी विषमतारूप व्याधि और मृत्यु अर्थात् प्राण और देहका वियोग और वृद्ध अवस्था आदिकोंसे और सर्प बिच्छू आदिके विषसे विशेषकर छूट जाताहै ॥ ३८ ॥

न रोगो मरणं तंद्रा न निद्रा न क्षुधा तृषा ॥ न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्तिखेचरीम् ॥ ३ ९॥

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( ) [: १३२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश न रोग इति ॥ यः खेचरी मुद्रां वेत्ति तस्य रोगो न मरणं न तंद्रा तामसांतःकरणवृत्तिविशेषः न निद्रा न क्षुधा न तृषा पिपासा न मूर्च्छा चित्तस्य तमसाभिभूतावस्थाविषेषश्च न भवेत् ॥ ३ ९ ॥ भाषार्थ-जो योगी खेचरीमुद्राको जानताहै उसको रोग, मरण और अंत: करणकी तमोगुणी वृत्तिरूप तंद्रा और निद्रा क्षुधा तृषा और चित्तकी तमोगुणीअवस्थारूप मूर्च्छा ये सब नहीं होते हैं ॥ ३९ ॥

पीड्यते न स रोगेण लिप्यते न च कर्मणा ॥ बाध्यते न स कालेन यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् ॥४० ॥

पीडयत इति ॥ यः खेचरी मुद्रां वेत्ति स रोगेण ज्वरादिना न पीड्यते ॥ ४० ॥

भाषार्थ -जो खेचरीको जानताहै वह रोगसे पीडित नहीं होताहै और न कर्मसे लिप्त होताहै और न कालसे बाधा जाताहै ॥ ४० ॥

चित्तं चरति खे यस्माजिह्वा चरति खे गता ॥ तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ॥ ४१ ॥

चित्तमिति ॥ यस्माद्धेतोश्चित्तमंतः करणं खे भ्रुवोरंतरवकाशे चरति जिह्वां खे तत्रैव गता सती चरति । तेन हेतुना एषा कथिता मुद्रा खेचरी नाम खेचरीति प्रसिद्धा । नामेति प्रसिद्धावव्ययम् । सिद्धैः कपिलादिभिर्निरूपिता । खे भ्रुवोरंतव्योंनि चरति गच्छति चित्तं जिह्वा च यस्यां सा खेचरीत्यवयवशः सा व्युत्पादिता । उक्तेषु त्रिषु लोकेषु व्याध्यादीनां पुनरुक्तिस्तु तेषां श्लोकानां संगृही- तत्वान्न दोषाय ॥ ४१ ॥

भाषार्थ - जिससे चित्त ( अंतःकरण ) भ्रुकुटियोंके मध्यरूप आकाशमें विचरताहै और जिह्वाभी भ्रुकुटियोंके मध्यमेंही जाकर विचरती है तिसीसे सिद्धों ( कपिल आदि ) की निरूपण कीहुई यह मुद्रा खेचरी इस नामसे

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] - ( ). ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १३३ प्रसिद्ध है कुटियोंके मध्यरूप आकाशमें जिसमुद्राके करनेसे चित्त और जिह्वा विचरै उसे खेचरी कहतेहैं इस व्युत्पत्तिसे सिद्धोंने यह अन्वर्थमुद्रा वर्णन कीहै. इन पूर्वोक्त तीनों श्लोकोंमें व्याधिआदिको जो पुनरुक्ति है वह इसलिये दूषित नहीं है कि, ये तीनों श्लोक संगृहीत ( किसीके रचेहुये ) हैं अर्थात् मूलके नहीं हैं ॥ ४१ ॥

खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लंबिकोर्ध्वतः ॥ न तस्य क्षरते बिंदुः कामिन्याः श्लेषितस्य च॥४२ ॥

खेचर्येति ॥ येन योगिना खेचर्या मुद्रया लंविकाया ऊर्ध्वमिति लंबिकोर्ध्वतः । सार्वविभक्तिकस्तसिः । लंबिका तालु तस्या ऊर्ध्वत उपरिभागे स्थितं विवरं छिद्रं मुद्रितं पिहितम् । कामिन्या युवत्याश्लेषितस्यालिंगितस्यापिं । च शब्दोऽप्यर्थे । तस्य विदुवर्य न क्षरते न स्खलति ॥ ४२ ॥

भाषार्थ -जिस योगीने खेचरीमुद्रासे लंबिका ( तालु ) के ऊपरका छिद्र ढकलिया है कामिनींके स्पर्श करनेपरभी उस योगीका बिंदु ( वीर्य ) क्षरित ( पडता ) नहीं होता अर्थात् अपने मस्तकरूप स्थानसे नहीं गिरता है ॥ ४२ ॥

चलितोऽपि यदा बिंदुः संप्राप्तो योनिमंडलम् ॥ व्रजत्यूर्द्ध हृतः शक्तया निबद्धो योनिमुद्रया ॥४३ ॥

चलित इति ॥ चलितोऽपि स्खलितोऽपि विदुर्यदा यस्मिन् काले योनिमंडल योनिस्थानं संप्राप्तः संगतस्तदैव योनिमुद्रया मेद्राकुंचन- रूपया । एतेन वज्रोलीमुद्रा सूचिता । निबद्धो नितरां वद्धः शक्त्याकर्षणशक्त्याहृतः प्रकृष्ट ऊर्ध्वं व्रजति । सुषुम्नामार्गेण बिंदु- स्थानं गच्छति ॥। ४३ ॥ भाषार्थ -और चलायमान भाभी बिंदु जिससमय योनिके मंडलमें प्राप्त होजाताहै तोभी लिंग संकोचनरूप योनिमुद्रासे अर्थात् वज्रोलीसे निरंतर बँधा--

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( ) | [ १३४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः हुआ बिंदु आकर्षणशक्तिसे खिचा हुआ सुषुम्ना नाडीके मार्गसे ऊर्ध्वं ( बिंदुके स्थानमें ) को चलाजाता है ॥ ४३ ॥

ऊर्ध्वजिह्नः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः ॥ मासार्धेन न संदेहो मृत्युं जयति योगवित् ॥ ४४ ॥

ऊर्ध्वजिह्न इति ॥ ऊर्ध्वालंविकोर्ध्वविवरोन्मुखा जिह्वा यस्य स ऊर्ध्वजिह्नः स्थिरो निश्चलो भूत्वा । सोमस्य लंबिकोर्ध्वविवरगलित- चंद्रामृतस्य पानं सोमपानं यः पुमान् करोति । योगं वेत्तीति योगवित् समासस्यार्धं मासार्धं तेन मासार्धेन पक्षेण मृत्युं मरणं जयति

अभिभवति । न संदेहः । निश्चितमेतदित्यर्थः ॥ ४४ ॥

भाषार्थ-तालुके ऊपरके छिद्रके उन्मुख है जिह्वा जिसकी ऐसा जो योगी वह सोमपान करताहै अर्थात् ऊ छिद्रमेंसे गिरतेहुये चंद्रामृतको पीताहै योगका ज्ञाता वह एकही मासार्द्धसे अर्थात् पक्षभरसे मृत्युको जीतताहै इसमें संदेह नहीं हैं अर्थात् यह निश्चित है ॥ ४४ ॥

नित्यं सोमकलापूर्णं शरीरं यस्य योगिनः ॥ तक्षकेणापि दृष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ॥ ४५ ॥

नित्यमिति ॥ यस्य योगिनः शरीरं नित्यं प्रतिदिनं सोमकलापूर्ण चंद्रकलामृतपूर्ण तस्य तक्षकेण सर्पविशेषेणापि दष्टस्य दंशितस्य योगिनः शरीरे विषं गरलं तज्जन्यं दुःखं न सर्पति न प्रसरति ॥ ४५ ॥

भाषार्थ-जिस योगका शरीर नित्य ( सदैव ) चंद्रकलारूप अमृतसे पूर्ण रहताहै तक्षक सर्पसे डसेहुयेभी उसके शरीरमें विष नहीं फैलता अर्थात् सर्पक वित्र नहीं चढता ॥ ४ ९ ॥ इंधनानि यथा वह्निस्तै वत्तिं च दीपकः ॥ तथा सोमकलापूर्ण देही देहं न मुंचति ॥ ४६ ॥

इंधनानीति ॥ यथा वह्निः इंधनानि काष्ठादीनि न मुंचति दीपको दीपः तैलवति च तैलयुक्तां वति न मुंचति । तथा

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, ] - ( ) ३ संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १३५ सोमकलापूर्ण चन्द्रकलामृतपूर्ण देहं शरीरं देही जीवो न मुंचति न त्यजति ॥ ४६ ॥

भाषार्थ -जैसे अभि काष्ठभादि इंधनोंको और दीपक तेल और बत्तीको नहीं त्यागतेहै अर्थात् उनके विना नहीं रहतेहैं तैसेही देही ( जीवात्मा ) सोमकलासे पूर्ण देहको नहीं त्यागताहै अर्थात् सोमकलासे पूर्ण देह सदैव बना रहताहै ॥ ४६ ॥

गोमांसं भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम् ॥ कुलीनं तमहं मन्ये चेतरे कुलघातकाः ॥ ४७ ॥

गोमांसमिति । गोमांसं पारिभाषिकं वक्ष्यमाणं यो भक्षयेन्नित्यं प्रतिदिनममरवारुणीमपि वक्ष्यमाणां पिवेत्तं योगिनम् । अहमिति ग्रंथकारोक्तिः । कुले जातः कुलीनः तं सत्कुलोत्पन्नं मन्ये । तदुक्तं ' ब्रह्मवैवर्ते- कृतार्थौ पितरौ तेन धन्यो देशः कुलं च तत् । जायतें योगवान्यत्र दत्तमक्षय्यतां व्रजेत् ॥ दृष्टः संभाषितः स्पृष्टः पुंप्रकृत्यो- विवेकवान् । भवकोटिशतापातं पुनाति वृजिनं नृणाम् ॥ ' ब्रह्मांड- पुराणे । ' गृहस्थानां सहस्रेण वानप्रस्थशतेन च । ब्रह्मचारिसहस्रेण योगाभ्यासी विशिष्यते ॥ ' राजयोगे वामदेवं प्रति शिववाक्यम्-' राज- योगस्य माहात्म्यं को विजानाति तत्त्वतः । तज्ज्ञानी वसते यत्र स देशः पुण्यभाजनम् । दर्शनादर्चनादस्य त्रिसप्तकुलसंयुताः । अज्ञा मुक्तिप यांति किं पुनस्तत्परायणाः ॥ अंतर्योगंबर्हियोगं यो जानाति विशे षतः । त्वया मयाप्यसौ बंद्यः शेषैर्वैद्यस्तु किं पुनः ॥ ' इति । कूर्मपुराणे 6 एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा । ये युंजते महायोगं विज्ञेयास्ते महेश्वराः ॥ ' इति । इतरे वक्ष्यमाणगोमांसभक्षणामर- वारुणीपानरहिता अयोगिनस्ते कुलघातकाः कुलनाशकाः सत्कुले जातस्य जन्मनो वैयर्थ्यात् ॥ ४७ ॥

भाषार्थ-जो योगी प्रतिदिन गोमांस ( जो आगे कहेंगे ) को भक्षण करताहै और प्रतिदिन अमरवारुणी ( जो आगे कहेंगे ) को पीताहै उसकोही

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( ) | [: १३६ हठयोगप्रदीपिका उपदेश हम श्रेष्ठकुलमें उत्पन्न मानतेहैं अन्य सब मनुष्य कुलघातक ( नाशक ) हैं क्योंकि श्रेष्ठकुलमें उनका जन्म निरर्थक है सोई ब्रह्मवैर्त्तमें कहाहै कि, योगीके माता पिता कृतार्थ हैं और उसके देश और कुलको धन्य है जहां योगवान् पैदा होताहै और योगीको दिया दान अक्षय होताहै पुरुष और प्रकृतिका विवेकी योगीजन दर्शन, भाषण, स्पर्श करनेसे मनुष्योंके कोटियों जन्मोंके पापोंसे पवित्र करतेहैं । ब्रह्माण्डपुराणमें लिखाहै कि, सहस्र गृहस्थी और सौ वानप्रस्थ और सहस्र ब्रह्मचारि- योंसे योगाभ्यासी अधिक होताहै और राजयोगके विषय में वामदेवके प्रति शिवजीका चाक्य है कि, राजयोगके यथार्थ माहात्म्यको कौन जान सकताहै? राजयोगका ज्ञानी जहां वसताहै वह देश पुण्यात्मा है इसके दर्शन और पूजनसे इक्कीस कुल सहित मूर्ख भी मुक्ति पदको प्राप्त होतेहैं. योगमें तत्पर तो क्यों न होंगे-जो अंतयोंग और बहिर्योगको विशेषकर जानताहै वह मुझे और तुझेभी नमस्कार करने योग्य है और शेषमनुष्योंको वंदना करने योग्य तो क्यों न होगा । कूर्मपु- राणमें लिखाहै कि, एकसमय वा द्विकालमें वा त्रिकालमें वा नित्य जो महायोगका

अभ्यास करते हैं वे महेश्वर ( शिव ) जानने । इन वचनोंसे योग सर्वोत्तम है॥ ४७॥

गाशब्देनोदिताजिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि ॥

गोमांसभक्षणं तत्तु महापातकनाशनम् ॥ ४८ ॥

गोमांसशब्दार्थमाह-गोशब्देनेति ॥ गोशब्देन गोइत्याकारकेण शब्देन गोपदेनेत्यर्थः । जिह्वा रसनोदिता कथिता । तालुनीति सामी- पिकाधारे सप्तमी । तालुसमीपोर्ध्वविवरे तस्या जिह्वायाः प्रवेशो गोमांसभक्षणं गोमांसभक्षणशब्दवाच्यं ततु तादृशं गोमांसभक्षणं तु महापातकानां स्वर्णस्तेयादीनां नाशनम् ॥ ४८ ॥

भाषार्थ--अब गोमांस शब्दके अथको कहते हैं कि,, गोपदसे जिह्वा कही जातीहै और तालुके समीप जो ऊर्द्धछिद्र उसमें जो जिह्वाका प्रवेश उसको गोमांसभक्षण कहतेहैं- त्रह गोमांसभक्षण महापातकोंका नाश करनेवाला है ॥ ४८ ॥

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] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १३७

जिह्वाप्रवेशसंभूतवह्निनोत्पादितः खलु ॥

चंद्रात्स्रवति यः सारः स स्यादमरवारुणी ॥ ४ ९ ॥

अमरवारुणीशब्दार्थमाह -जिह्वेति ॥ जिह्वायाः प्रवेशो लंविको- विवरे प्रवेशनं तस्मात्संभूतो यो वह्निरूपमा तेनोत्पादितो निष्पा-दितः । अत्र वह्निशब्देनौष्ण्यमुपलक्ष्यते । यः सारः चंद्राजुवोरंतर्वा- भागस्थात्सोमात्स्रवति गलति सा अमरवारुणी स्यादमरवारुणी-पदवाच्या भवेत् ॥ ४९ ॥

भाषार्थ - अत्र अमरवारुणी शब्दके अर्थको कहते हैं कि, तालुके ऊर्ध्व छिद्रमें जिह्वाके प्रवेशसे उत्पन्न हुई जो वह्नि ( ऊष्मा ) उससे उत्पन्न हुआ जो सार चंद्रमा झरताहै अर्थात् भ्रुकुटियोंके मध्यमें वामभागमें स्थित चंद्रमासे बिंदु-रूप सार गिरताहै उसको अमरवारुणी कहते हैं ॥ ४ ९ ॥ चुम्बती यदि लंबिकाग्रमनिशं जिह्वारसस्पंदिनी सक्षारा कटुकाम्लदुग्धसदृशी मध्वा ज्यतुल्या तथा ॥ व्याधीनां हरणं जरांतकरणं शस्त्रागमोदीरणं तस्यस्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धांगनाकर्षणम्॥५० ॥

चुंबतीति ॥ यदि लंविका लंविकोर्ध्वविवरं चुंबती स्पृशन्ती । अनिशं निरंतरम् । अत एव रसस्य सोमकलामृतस्य स्पंदः स्पंदनं प्रस्रवणमस्यामस्तीति रसस्पंदिनी यस्य जिह्वा । क्षारेण लवणरसेन सहिता सक्षारा कटुकं मरिचादि आम्लं चिचाफलादि दुग्धं पयस्तैः सदृशी समाना । मधु क्षौद्रमाज्यं घृतं ताभ्यां तुल्या समा तथा शब्दः समुच्चये । एतैर्विशेषणै रसस्यानेकरसत्वान्मधुरत्वात्स्निग्धत्वाच्च जिह्वाया अपि रसस्पंदने तथात्वमुक्तम् । तर्हि तस्य व्याधीनां रोगाणां हरणमपगमो जराया वृद्धावस्थाया अंतःकरणं नाशनं शस्त्राणामा- युधानामागमः स्वाभिमुखागमनं तस्योदीरणं निवारणम् । अष्टौ गुणा अणिमादयस्ते अस्य संजाता इत्यष्टगुणितममरत्वममरभावः ।

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( ) [ १३८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः सिद्धानामंगनाःसिद्धांगनाः सिद्धाश्चता अंगनाश्चेति वा तासामाकर्ष- णमाकर्षणशक्तिः स्यात् ॥ ५० ॥

१: भाषार्थ - यदि रस ( सोमकलाका अमृत ) का स्पंदन ( झरना ) करने-वाली और लवणके रसके समान और मरीच आदि कटु और इमली आदि अम्ल और दूध इनके सदृश और मधु ( सहत ) और घृत इनकी तुल्य इन सब विशेष- णौसे रसमें अनेक रस और मधुरता और स्निग्धता ( चिकनाई ) कही उस रसके झरनेवाली जिद्दाकोभी वैसीही कही समझना अर्थात् पूर्वोक्तप्रकारकी जिह्वा तालुके ऊपर वर्तमानछिद्रका वारंवार चुंबन ( स्पर्श ) करे तो उस मनुष्यकी व्याधियोंका हरण और वृद्ध अवस्थाका अंत करना और सन्मुख आये शस्त्रका} निवारण और अणिमा आदि आठ सिद्धि हैं जिसमें ऐसा अमरत्व देवत्व और सिद्धोंकी अंगनाओंका वा सिद्धरूप अंगनाओंका आकर्षण ( बुलाना ) उसको ये फल होते हैं ॥ ५० ॥

मूर्भः षोडशपत्रपद्मगलितं प्राणादवाप्तं हठादूर्ध्वा- स्यो रसनां नियम्य विवरे शक्तिं परां चिंतयन् ॥ उत्कल्लोलकलाजलं च विमलं धारामयं यः पिबेन्नि- र्व्याधिः स मृणालकोमलवपुर्योगी चिरं जीवति ५१॥ मूर्ध्न इति ॥ रसनां जिह्वां विवरे कपालकुहरे नियम्य संयोज्य । ऊर्ध्वमुत्तानमास्यं यस्य सः । ऊर्ध्वास्य इत्यनेन विपरीतकरणी सूचिता । परां शक्तिं कुंडलिनीं चितयन्ध्यायन्सन् प्राणान्साधन- भूतान् । षोडश पत्राणि दलानि यस्य तत् षोडशपत्रं तच्च तत्पद्मं कंठस्थाने वर्तमानं तस्मिन्गलितं हठाद्धठयोगादवार्त प्राप्तं विमलं निर्मलं धारामयं धारारूपमुत्कलोलमुत्तरंगं च तत्कलाजलं सोम-कलारसं यः पुमान् पिबेत् धयेत्स योगी निर्गता व्याधयो ज्वरा-दयो यस्मात्स निर्व्याधिः सन् यद्वा निर्गता विविधा आधिर्मानसी व्यथा यस्मात्स तादृशः सन् मृणालं बिसमिव कोमलं मृदु वपुः

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] - | ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता १३ ९ शरीरं यस्य स मृणालकोमलवपुश्च सन् चिरं दीर्घकालं जीवति प्राणान् धारयति । हठाद्धठयोगात् । प्राणात्साधनभूतादवाप्तमिति वा योजना । प्राणैरिति क्वचित्पाठः ५१ ॥ भाषार्थ -जो योगी, जिह्वाको कपालके छिद्रमें लगाकर और ऊपरको मुख करके इससे विपरीत करणी सूचित की-और परमशक्ति जो कुंडलिनी उसका ध्यान करताहुआ प्राणवायुके साधन और हठयोगसे प्राप्त और षोडश हैं पत्र जिसके ऐसे में मस्तकसे पतित और निर्मल और धारारूप और ऊपरको है तरंग जिसकी ऐसे चंद्रकलाके जलको पीताहै व्याधिसे रहित और मृणाल ( भिस ) के समान कोमल है वपु ( देह ) जिसका ऐसा वह योगी चिरकालतक जीता है ॥ ५१ ॥

यत्प्रालेयं प्रहितसुषिरं मेरुमूर्धोतरस्थं तस्मि- स्तत्त्वं प्रवदति सुधीस्तन्मुखं निम्नगानाम् ॥ चंद्रात्सारः सवति वपुषस्तेन मृत्युर्नराणां तद्व- श्रीयात्सुकरणमथो नान्यथा कार्यसिद्धिः ॥ ५२ ॥

यत्प्रालेयमिति ॥ मेरुवत्सर्वोन्नता सुषुम्ना मेरुस्तस्य मूर्खोपरि भागस्तस्यांतरे मध्ये तिष्ठतीति मेरुमूर्धातरस्थं यत्मालेयं सोमकला-जलं प्रहित निहितं यस्मिंस्तत्तथा तच्च तत्सुषिरं विवरं तस्मिन्विवरें सुधीः शोभना रजस्तमोभ्यामनभिभूतसत्त्वा धीर्बुद्धिर्यस्य सः । तत्त्व-- मात्मतत्त्वं प्रवदति प्रकर्षेण वदति । 'तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा- व्यवस्थितः' इति श्रुतेः । आत्मनो विभुत्वे खेचरीमुद्रायां तत्राभिव्य- क्तिस्तरिंमस्तत्त्वमित्युक्तम्शब्दवाच्यानामिडापिंगलासुषुम्नागांधारीप्रभृतीनां। निम्नगानां गंगायमुनासस्वरतत्तस्मिन्विवरेतीनर्मदादि- तत्समीपे मुखमग्रमस्ति चंद्रात्सोमाद्वपुषः शरीरस्य सारः स्रवति क्षरति तेन चंद्रसारक्षरणेन नराणां मनुष्याणां मृत्युर्मरणं भवति ।- अती हेतोस्तत्पूर्वीदितं सुकरणं शोभनं करणं खेचरीमुद्राख्यं बध्नी- यात् । सुकरणे बद्धे चंद्रसारस्रवणाभावान्मृत्युर्न स्यादिति भाव::

पृष्ठ 150

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( ) [ १४० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः -अन्यथा सुकरणबंधनाभावे कायस्य देहस्य सिद्धी रूपलावण्यबलवन--संहननरूपा न स्यात् ॥ ५२ ॥

भाषार्थ - मेरुके समान सबसे ऊँची जो सुषुम्ना नाडी उसके मूर्द्धा ( ऊपरके भाग ) के मध्यमें टिकाहुआ जो प्रालेय अर्थात् सोमकलाका जल है और जिसमें वह जल स्थित है ऐसा विवर ( छिद्र ) है उस विवरमें रजोगुण तमोगुणसे - नहीं हुआ है तिरस्कार जिसका ऐसी बुद्धिवाले मनुष्य आत्मतत्त्वको कहते हैं क्योंकि श्रुतिमें लिखा है कि, सुषुम्नाकी शिखाके मध्यमें परमात्मा स्थित है-क्योंकि आत्मा विभु ( व्यापक ) है, और खेचरीमुद्रामें उस विवरमें आत्मा प्रगट होताहै - इससे उसमें तत्त्व है यह कहना ठीक है- और गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा आदि शब्दोंका अर्थ जो इडा पिंगला सुषुम्ना, गांधारी आदि नाडी हैं उनके मुस्वभी उसी छिद्रके समीपमें हैं और चंद्रमासे जो देहका सारांश झरताहै उससेही मनुष्योंकी मृत्यु होतीहै तिससे शोभन करणरूप खेचरीमुद्राको •बांधे (( करै ) क्योंकि खेचरीमुद्राके करनेसे चंद्रमासे सारके न झरनेसे मृत्यु न होगी और अन्यथा अर्थात् खेचरीमुद्राके न करनेसे देहका जो रूप, लावण्य, बल वज्रके समान संहनन ( दृढता ) रूपसिद्धि न होगी । भावार्थ यह है कि, जो सोमकलाका जल सुषुम्नाके मध्यमें स्थित है वह जल जिस छिद्रमें है उस छिद्रही बुद्धिमान् मनुष्य परमात्माको कहतेहैं और उसी छिद्रके समीप इडा पिंगला आदि नाडियोंका मुख है और चंद्रमासे जो देहका सारांश झरताहै उससे - मनुष्योंकी मृत्यु होतीहै तिससे खेचरी मुद्राको करै क्योंकि न करनेसे देहकी सिद्धि नहीं होसकती अर्थात् पुष्ट न होगा ॥ ९ २ ॥ सुषिरं ज्ञानजनकं पंचस्रोतःसमन्वितम् ॥ तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन्शून्ये निरंजने ॥ ५३॥

सुषिरमिति ॥ पंच यानि स्रोतांसीडादीनां प्रवाहास्तैः समन्वितं सम्यगनुगतम् ॥ "सप्तस्रोतःसमन्वितम्” इति क्वचित्पाठः । ज्ञानजन--कमलौकिकबोधितात्मसाक्षात्कारजनकं यत्सुषिरं विवरं तस्मिन्सु- पिरेऽजनमविद्या तत्कार्य शोकमोहादि च निर्गतं यस्मात्तन्निरंजनं