हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 161–170

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १५१ सीविनी, लिंग, नाभि, हृदय, ग्रीवा, कंठदेश, लंबिका, नासिका, नुकटियोंका मध्य, मस्तक, मूर्द्धा, ब्रह्मरंध्र योगियोंमें श्रेष्ठोंने ये शोलह आधार कहे हैं इन आधा-रोंमें धारणाका फल विशेष तो गोरक्षसिद्धांत ग्रंथसे जानना ॥ ७३ ॥

मूलस्थानं समाकुंच्य उड्डियानं तु कारयेत् ॥ ss च पिंगला बद्धा वाहयेत्पश्चिमे पथि ॥७४ ॥

उक्तस्य बंधत्रयस्योपयोगमाह-मूलस्थानमिति ॥ मूलस्थान-साधारभूतमाधारस्थानं समाकुंच्य सम्यगाकुंच्य उड्डियानं नाभेः पश्चिमतानरूपं बंधं कारयेत्कुर्यात् । णिजर्थोऽविवक्षितः । इडां पिंगलां गंगां यमुनां च बद्धा । जालंधरबंधेनेत्यर्थः । 'कंठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यौ स्तंभयेत्' इत्युक्तेः । पश्चिमे पथि सुषुम्नामार्गे वाहयेद्गमये-त्प्राणमिति शेषः ॥ ७४ ॥

भाषार्थ- अब पूर्वोक्त तीनों बंधोंके उपयोगका वर्णन करते हैं कि मूलस्थानको अर्थात् आधारभूत आधारस्थानका भलीप्रकार संकोच करके नाभिके पश्चिमता-नरूप उड्डीयानबंधको करे और जालधरबंधसे अर्थात् कंटके संकोचसेही इडा और पिंगलारूप दोनों नाडियोंको स्तंभन करें फिर प्राणको पश्चिममार्गमें ( सुष्षु- म्नामें ) प्राप्त करें ॥ ७४ ॥

अनेनैव विधानेन प्रयाति पवनालयम् ॥ ततो न जायते मृत्युर्जरारोगादिकं तथा ॥ ७५ ॥

अनेनेति ॥ अनेनैवोक्तेनैव विधानेन पवनः प्राणो लयं स्थैर्य प्रयाति । गत्यभावपूर्वकं रंध्रे स्थितिः प्राणस्य लयः । ततः प्राणस्य लयान्मृत्युर्जरारोगादिकम् । तथा चायें । न जायते नोद्भवति । आदिपदेन वलीपलिततंद्रालस्यादि ग्राह्यम् ॥ ७५ ॥

भाषार्थ--इस पूर्वोक्त विधानसेही प्राण लय ( स्थिरता ) को प्राप्त हो जाता है, गमनकी निवृत्ति होनेपर ब्रह्मरंध्रमें स्थितिही प्राणका लय होताहै उस प्राण लयसे मृत्यु, जरा, रोग और आदिपदसे वलीपलित, तंद्रा, आलस्य आदि नहीं होतेहै ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 162

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( ) | [ १५२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः बंधत्रयमिदं श्रेष्ठं महासिद्धैश्च सेवितम् ॥ सर्वेषां हठतंत्राणां साधनं योगिनो विदुः ॥ ७६॥

बंधत्रयमिति ॥ इदं पूर्वोक्तं बंधत्रयं श्रेष्ठं षोडशाधारबंधेऽतिप्र-शस्तं महासिद्धैर्मत्स्येंद्रादिभिश्चकाराद्वसिष्ठादिमुनिभिः सेवितं सर्वेषां हठतंत्राणां हठोपायानां साधनं सिद्धिजनकं योगिनो गोरक्षाद्या विदुजनांत ॥ ७६ ॥

भाषार्थ -ये पूर्वोक्त तीनों बंध श्रेष्ठ हैं अर्थात् षोडशाधार बंधमें अत्यंत उत्तम हैं और मत्स्येंद्र आदि योगिजन और वसिष्ठ आदि मुनियोंके सेवित हैं और संपूर्ण जो हठयोगके उपाय हैं उनका साधन हैं यह बात गोरक्ष आदि योगीजन जानतेर्हे ॥ ७६ ॥

यत्किचित्स्रवते चंद्रादमृतं दिव्यरूपिणः ॥ तत्सर्वं ग्रसते सूर्यस्तेन पिंडो जरायुतः ॥ ७७ ॥

विपरीतकरणीं विवक्षुस्तदुपोद्वातत्वेन पिंडस्य जराकरणं तावदाह- यत्किंचिदिति ॥ दिव्यमुत्कृष्टं सुधामयं रूपं यस्य स तथा तस्मा- द्दिव्यरूपिणश्चंद्रात्सोमात्तालुमूलस्थाद्यत्किचिद्यत्किमप्यमृतं पीयूषं स्र- वते पतति तत्सर्वं सर्वं तत्पीयूषं सूर्यो नाभिस्थोऽनलात्मकः ग्रसते ग्रासीकरोति । तदुक्तं गोरक्षनाथेन-'नाभिदेशे स्थितो नित्यं भास्करो दहनात्मकः । अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चंद्रमाः ॥ वर्षत्यधोमुखश्चंद्रो ग्रसत्यूर्ध्वमुखो रविः । करणं तच्च कर्तव्यं येन पीयूषमाप्यते ॥ ' इति । तेन सूर्यकर्तृकामृतग्रसनेन पिंडो देहो जरा- युतः जरसा युक्तो भवति ॥ ७७ ॥

भाषार्थ- अब विपरीत करणीके कथनका अभिलाषी आचार्य प्रथम उसके उपोद्घातरूप होनेसे पिंडके जराकरणका घर्णन करतेहैं कि, दिव्य ( सर्वोत्तम ) सुधामय हैं रूप जिसमें ऐसे तालुके मूलमें स्थित चंद्रमासे जो कुछ अमृत झरताहै । उस संपूर्ण अमृतको नाभिमें स्थित अग्निरूप सूर्य प्रस लेताहै सोई गोरक्षनाथने

पृष्ठ 163

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] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १५३ कहा है कि, नाभिके देशमें अग्निरूप सूर्य स्थित है और तालुके मूलमें अमृतरूप चंद्रमा स्थित है अधोमुख होकर चंद्रमा जिस अमृतको वर्षताहै और ऊर्ध्वमुख होकर सूर्य उस अमृतको ग्रस लेताहै उसमें वह करण ( मुद्रा ) करना चाहिये जिससे अमृतकी नष्टता न हो अर्थात् पुष्टि रहे फिर सूर्यके किये उस अमृतके प्रसनेसे बिंदु ( देह ) वृद्ध अवस्थासे युक्त होजाताहै ॥ ७७ ॥

तत्रास्ति करणं दिव्यं सूर्यस्य मुखवंचनम् ॥ गुरूपदेशतो ज्ञेयं न तु शास्त्रार्थकोटिभिः ॥ ७८ ॥

तत्रेति ॥ तत्र तद्विषये सूर्यस्य नाभिस्थानलस्य मुखं वच्यतेऽ- नेनेति तादृशं दिव्यमुत्तमं करणं वक्ष्यमाणमुद्राख्यमस्ति तद्गुरूपदेशतः गुरूपदेशाज्ज्ञेयं ज्ञातुं शक्यम् । शास्त्रार्थानां कोटिभिः न तु नैव ज्ञातुं शक्यम् ॥ ७८ ॥

भाषार्थ-उस अमृतकी रक्षा करनेमें जिसे सूर्यके मुखकी वंचना होय ऐसा आगे कहनेयोग्य मुद्रारूप करण है और वह करण गुरुके उपदेशसे जान योग्य है और कोटियों शास्त्रोंके अर्थसे जाननेको शक्य नहीं है ॥ ७८ ॥

ऊर्द्ध नाभेरधस्तालोरूद्धं भानुरधः शशी ॥ करणी विपरीताख्या गुरुवाक्येन लभ्यते ॥ ७९ ॥

विपरीतकरणीमाह-ऊर्ध्वं नाभेरिति ॥ ऊर्ध्वमुपरिभागे नाभि- र्यस्य स ऊर्ध्वनाभिस्तस्योर्ध्वनाभेरधः अधोभागे तालु तालुस्थानं यस्य सोऽधस्तादस्तस्याधस्तालोयगिन ऊर्ध्वमुपरिभागे भानुर्दहनात्मकः सूर्यो भवति । अधः अधोभागे शश्यमृतात्मा चंद्रो भवति । प्रथमांत- पाठे तु यदा ऊर्ध्वनाभिरधस्तालुयोगी भवति तदोर्ध्वं भानुरधः शशी भवति । यदातदापदयोरध्याहारेणान्वयः । इयं विपरीताख्या विपरी- नामिका करणी । ऊर्द्धाधःस्थितयोश्चंद्रसूर्ययोरधऊर्ध्वकरणेनान्वर्था गुरुवाक्येन भाषार्थ गुरोर्वाक्येनैव- विपरीतकरणीमुद्राकेलभ्यते प्राप्यतेस्वरूपकानान्यथावर्णन ॥ करते७९हैं ॥कि ऊपरके भाग है नाभि जिसके और अधोभागमें है तालु जिसके ऐसा जो योगी

पृष्ठ 164

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( ) | [ १५४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः उसके ऊपरके भागमें तो अग्निरूप सूर्य होजाय और अधोभागमें अमृतरूप चंद्रमा होजाय और जब ' ऊर्ध्वनाभिरधस्तालुः, यह प्रथमांत पाठ है तब यदा तदा पदोंके अध्याहारसे इसप्रकार अन्वय करना कि, जब ऊपर भागमें नाभि और नीचेके भागमें तालु जिसके ऐसा योगी होजाय तब ऊपर सूर्य और नीचे चंद्रमा होजातेहैं यह विपरीत ( उलटी ) नामकी करणी ऊपर और नीचे स्थित जो चंद्रमा सूर्य हैं उनके नीचे ऊपर क्रमसे करनेसे अन्वर्थ है अर्थात् विपरीतकरणीका अर्थ तभी घटसकताहै जब पूर्वोक्त मुद्रा कीजाय और यह विरीतकरणी गुरुके वाक्यसे मिल सक्तीहै अन्यथा नहीं ॥ ७९ ॥

नित्यमभ्यासयुक्तस्य जठराग्निविवर्धिनी ॥ आहारो बहुलस्तस्य संपाद्यः साधकस्य च॥ ८० ॥

नित्यमिति ॥ नित्यं प्रतिदिनमभ्यासोऽभ्यसनं तस्मिन् युक्तस्याव- 'हितस्य जठराग्निरुद्राग्निस्तस्य विवर्धिनी विशेषेण वर्धिनीति विपरी- तकरणीविशेषणम् । तस्य साधकस्य विपरीतकरण्यभ्यासिन आहारो

भोजनं बहुलो यथेच्छः संपाद्यः संपादनीयः । च पादपूरणे ॥ ८० ॥

भाषार्थ -प्रतिदिनके अभ्यासमें युक्त जो योगी है उसकी जठराशिको यह विपरीतकरणी बढातीहै और इसीसे उस विपरीतकरणीके अभ्यासी योगीको यथेच्छ अधिक भोजन संपादन करनेयोग्य है अर्थात् अल्पभोजन न करै ॥ ८० ॥

अल्पाहारो यदि भवेदग्निर्दहति तत्क्षणात् ॥ अधःशिराश्वोर्द्धपादः क्षणं स्यात्प्रथमे दिने ॥ ८१ ॥

अल्पाहार इति ॥ यद्यल्पाहार: अल्पो भोक्तुमिष्टान्नस्याहारो -भोजनं यस्य तादृशो भवेत्स्यात्तदाऽग्निर्जठरानलो देहं क्षणमात्राद्दहेत् । शीघ्रं दहेदित्यर्थः । ऊर्ध्वाधः स्थितयोश्चंद्रसूर्ययोरधऊर्ध्वकरणक्रिया- माह -अधःशिरा इति । अधः अधोभागे भूमौ शिरो यस्य सोऽधः- शिराः कराभ्यां कटिप्रदेशमवलंब्य बाहुमूलादारभ्य कूर्परपर्यंताभ्यां बाहुभ्यां स्कंधाभ्यां गलपृष्ठभागशिरःपृष्ठभागाभ्यां च भूमिमवष्ट-

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] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १५५ भ्याधःशिरा भवेत् । ऊर्ध्वमुपर्यंतरिक्षे पादौ यस्य स ऊर्ध्वपादः प्रथमदिने आरंभदिने क्षणं क्षणमात्रं स्यात् ॥ ८१ ॥

भाषार्थ-क्योंकि, यदि विपरीतकरणीका अभ्यासी योगी अल्पाहारी हो अर्थात् अल्पभोजन कियाजाताहै तो जठराग्नि उसी क्षणमात्रमें देहको भस्म करदेताहै । अब ऊपर नीचे स्थित चंद्रमा सूर्यके नीचे ऊपर करनेकी क्रियाको कहतेहैं कि, प्रथम दिनमें क्षणभर नीचेको शिर करै अर्थात् भुजा दोनों स्कंध गल और शिर पृष्ठभाग ( पीठ ) से भूमिका स्पर्श करके नीचे शिर किये स्थित हो और ऊपरको पाद करै अर्थात् प्रारंभके दिन क्षणमात्र इसप्रकार स्थित रहै॥ ८१ ॥

क्षणाच्च किंचिदधिकमभ्यसेच्च दिने दिने ॥ वलितं पलितं चैव षण्मासोर्द्ध न दृश्यते ॥ याममात्रं तु यो नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित्८२॥ क्षणादिति ॥ दिनेदिने प्रतिदिनं क्षणात्किंचिदधिकं द्विक्षणं त्रिक्षणम् एकदिनवृद्धयाऽभ्यसेदभ्यासं कुर्यात् ॥ विपरीतकरणीगुणा-नाह–वलितमिति ॥ वलितं चर्मसंकोचः पलितं केशेषु शौक्ल्यं च, षण्णां मासानां समाहारः षण्मासं तस्मादूर्ध्वमुपरि नैव दृश्यते नैवा- ' लोक्यते । साधकस्य देह इति वाक्याध्याहारः ॥ यस्तु साधको - याममात्रं प्रहरमात्रं नित्यमभ्यसेत्स तु कालजित्कालं मृत्युं जयतीति कालजिन्मृत्युंजेता भवेत् । एतेन योगस्य प्रारब्धकर्मप्रतिबंधकत्व- मपि सूचितम् । तदुक्तं विष्णुधमें-'स्वदेहारंभकस्यापि कर्मणः संक्षयावहः । यो योगः पृथिवीपाल शृणु तस्यापि लक्षणम्' ॥ इति । विद्यारण्यैरपि जीवन्मुक्तायुक्तम्-"यथा प्रारब्धकर्म तत्त्वज्ञानात्प्रबलं तथा तस्मादपि कर्मणो योगाभ्यासः प्रबलः । अत एव योगिना- मुद्दालकवीतहव्यादीनां स्वेच्छया देहत्याग उपपद्यत" इति । भागवते - प्युक्तम्- 'देहं जह्यात्समाधिना' इति ॥ ८२ ॥

भाषार्थ -फिर प्रतिदिन क्षणसे कुछ २ अधिक अभ्यास करै अर्थात् दो क्षण, तीन क्षण, काल एक २ दिनकी वृद्धिसे अभ्यासको बढाता रहै. अब्ब

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( ) | [ १५६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः विपरीतकरणीके गुणोंको कहते हैं कि, पूर्वोक्त प्रकारके करनेसे वलीपलित छ: मासके अनंतर नहीं दीखतेहैं अर्थात् यौवन अवस्था होजाती है और जो साधक प्रतिदिन प्रहरमात्र अभ्यास करताहै वह मृत्युको जीतताहै. इससे यहभी सूचित किया कि, योग प्रारब्धमर्ककाभी प्रतिबंधक है सोई विष्णुधर्ममें कहा है कि, अपने देहके आरंभककर्मकाभी नाशक जो योग है है पृथ्वीपाल! उस योगको तू सुन और विद्यारण्यने जीवन्मुक्तिग्रंथमें यह कहा है कि, तत्त्वज्ञानसे प्रारब्धकर्म जैसे प्रबल है ऐसेही प्रारब्धकर्मसे योगाभ्यास प्रबल है इसीसे उद्दालक, वीतहव्य आदि थोंगियोंने अपनी इच्छासे देहका त्याग किया. भागवतमेंभी लिखा है कि, समा- धिसे देहको त्यागै ॥ ८२ ॥

अथ वज्रोली ।

स्वेच्छया वर्तमानोऽपि योगोकैर्नियमैर्विना ॥

वज्रोलि यो विजानाति स योगी सिद्धिभाजनम् ८३॥

वज्रोल्यां प्रवृत्तिं जनयितुमादौ तत्फलमाह-स्वेच्छयेति ॥ योऽ- भ्यासी वज्रोलीं वज्रोलीमुद्रां विजानाति विशेषेण स्वानुभवेन जानावि स योगी योगे योगशास्त्रे उक्ता योगोक्तास्तैर्योगोक्तनियमैर्ब्रह्मचर्या- दिभिर्विना ऋते स्वेच्छया निजेच्छया वर्तमानोऽपि व्यवहरन्नपि सिद्धि- भाजनं सिद्धीनामणिमादीनां भाजनं पात्रं भवति ॥ ८३ ॥

भाषार्थ-चोलीमुद्राकी प्रवृत्तिको उत्पन्न करनेके लिये प्रथम वज्रोली फलका वर्णन करते हैं कि, जो योगाभ्यासी वज्रोलीमुद्राको अपने अनुभवसे जानता है वह योगी योगशास्त्रमें कहेहुये नियमोंके विना अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करताहुआभी अणिमा आदि सिद्धियोंका भोक्ता है अर्थात् ब्रह्मचर्य आदि नियमोंके विनाभी उसको सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ८३ ॥

तत्र वस्तुद्रयं वक्ष्ये दुर्लभं यस्य कस्यचित् ॥ क्षीरं चैकं द्वितीयं तु नारी च वशवर्तिनी ॥ ८४ ॥

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] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १५७ तत्साधनोपयोगि वस्तुद्वयमाह-तत्रेति ॥ तत्र वज्रोल्यभ्यासे वस्तुनोर्द्वयं वस्तुयं वक्ष्ये कथयिष्ये । कीदृशं वस्तुद्वयं यस्यकस्यचित् यस्यकस्यापि धनहीनस्य दुर्लभं दुःखेन लब्धुं शक्यं दुःखेनापि लब्धु-मशक्यमिति वा । 'दुःस्यात्कष्टनिषेधयोः ' इति कोशात् ॥ किं तद-स्तुद्वयमित्यपेक्षायामाह-क्षीरमिति । एकं वस्तु क्षीरं पानार्थ मेहनानं-तरमिंद्रियनैर्बल्यात्तद्बलार्थं क्षीरपानं युक्तम् । केचित्तु अभ्यासकाले आकर्षणार्थमित्याहुः । तस्यांतर्गतस्य घनीभावे निर्गमनासंभवात्तद-युक्तम् । द्वितीयं तु वस्तु वशवर्तिनी स्वाधीना नारी वनिता ॥ ८४ ॥

भाषार्थ--अअब बज्रोलीमुद्राके साधक दो वस्तुओंका वर्णन करते हैं कि, उस वज्रोलीकी सिद्धिमें जिसकिसी निर्धन पुरुषको दुर्लभ जो दो वस्तु हैं उनको मैं कहताहूं उन दोनोंमें एक दूध है और दूसरी वशवर्तिनी नारी है अर्थात् मैथु नके अनंतर निर्बल हुई इंद्रियों की प्रबलताके लिये दूधका पान योग्य है और कोई यह कहते हैं कि, अभ्यासकालमें आकर्षणके लिये दूधका पान उत्तम है सो ठीक नहीं, क्योंकि अंतगर्त हुए दूधका आकर्षण नहीं हो सकता है ॥ ८४ ॥

मेहनेन शनैः सम्यगूर्ध्वाकुंचनमभ्यसेत् ॥ पुरुषोऽप्यथवा नारी वज्रोलीसिद्धिमाप्नुयात् ॥ ८५॥

वज्रोलीमुद्राप्रकारमाह-मेहनेनेति ॥ मेहनेन स्त्रीसंगानंतरं विंदोः क्षरणेन साधनभूतेन पुरुषः पुमानथवा नार्यपि योषिदपि शनैर्मेदं सम्यक् यत्नपूर्वकमूर्ध्वाकुंचनमूर्ध्वमुपर्याकुंचनं मेढाकुंचनेन बिंदोरुपर्या- कर्षणमभ्यसेद्वज्रोलीमुद्रासिद्धिमाप्नुयात्सिद्धिं गच्छेत् ॥ ८५ ॥

भाषार्थ - अब वज्रोलीमुद्राके प्रकारका वर्णन करते हैं कि, पुरुष अथवा स्त्री मेहन ( बिंदुका झरना ) से शनैः २ भलीप्रकार यत्नसे ऊपरको आकुंचन ( संकोच ) का अभ्यास करे अर्थात् लिंग इंद्रियके आकुंचनसे बिंदुके ऊपर खींचनेका अभ्यास करे तो वज्रोलीमुद्रा सिद्धिको प्राप्त होती है ॥ ८५ ॥

यत्नतः शस्तनालेन फूत्कारं वज्रकंदरे ॥ शनैः शनैः प्रकुर्वीत वायुसंचारकारणात् ॥ ८६ ॥

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( ) | [ १५८ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः अथ वज्रोल्याः पूर्वगप्रक्रियामाह -यत्नत इति ॥ शस्तः प्रशस्तो यो नालस्तेन शस्तनालेन सीसकादिनिर्मितेन नालेन शनैः शनैर्मंदमंद यथाग्नेर्धमनार्थं फूत्कारः क्रियते तादृशं फूत्कारं वज्रकंदरे मेद्रविवरे वायोः संचारः सम्यग्वज्रकंदरे चरणं गमनं तत्कारणात्तद्धेतोः प्रकुर्वीत प्रकर्षेण पुनः पुनः कुर्वीत ॥ अथ वज्रोलीसाधनप्रक्रिया । सीसक-निर्मितां स्निग्धां मेदूप्रवेशयोग्यां चतुर्दशांगुलमात्र शलाकां कार-यित्वा मेद्रे प्रवेशनमभ्यसेत् । प्रथमदिने एकांगुलमात्रां शलाकां प्रवेशयेत् । द्वितीयदिने इयंगुलमात्रां तृतीयदिने त्र्यंगुलमात्राम् । एवं क्रमेण वृद्धी द्वादशांगुलमात्रप्रवेशे मेद्रमार्गः शुद्धो भवति । पुनस्तादृशीं चतुर्दशांगुलमात्रां व्यंगुलमात्रवक्रामूर्ध्वमुखां कारयित्वा तां द्वादशां- गुलमात्रां प्रवेशयेत् । वक्रमूर्ध्वमुखं डांगुलमात्रं बहिः स्थापयेत् । ततः सुवर्णकारस्य अग्निधमनसाधनीभूतनालसदृशं नालं गृहीत्वा तदग्रं प्रवेशित द्वादशांगुलस्य नालस्य वक्रोर्ध्वमुखयंगुलमध्ये प्रवेश्य फूत्कारं कुर्यात् । तेन सम्यक् मार्गशुद्धिर्भवति । ततो जलस्य मेद्रे- णाकर्षणमभ्यसेत् जलाकर्षणे सिद्धे पूर्वोक्तश्लोकरीत्या बिंदोरूर्ध्वा- कर्षणमभ्यसेत् । विद्वाकर्षणे सिद्धे वज्रोली मुद्रासिद्धिः । इयं जितप्राण- स्येवसिध्यति नान्यस्य । खेचरीमुद्राप्राणजयोभयसिद्धौ तु सम्यक भवति ॥ ८६ ॥

भाषार्थ--अब वज्रोली मुद्राकी पूर्वाङ्ग क्रियाका वर्णन करतेहैं कि, सीसे आदिकी उत्तमनालीसे शनैः २ इसप्रकार लिंगके छिद्रमें वायुके संचार ( भली- प्रकार प्रवेश ) के लिये यत्नसे फूत्कारको करै. जैसे अभिके प्रज्वलनार्थ फूत्कारको करते हैं । अब बज्रोलीकी साधनमक्रियाको कहते हैं कि, सीसेसे बनीहुई लिंगमें प्रवेशके योग्य चौदह अंगुलकी शलाई बनवाकर उसके लिंगमें प्रवेशका अभ्यास करै 1। पहिले दिन एक अंगुलमात्र प्रवेश करै दूसरे दिन दो अंगुल मात्र और तीसरे दिन तीन अंगुलमात्र प्रवेश करे इसप्रकार क्रमसे वृद्धि करनेपर बारह अंगुल शला- काके प्रवेश होनेके अनंतर लिंगका मार्ग शुद्ध होजाताहै फिर उसीप्रकारकी

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] - ( ) ३. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १५ ९ और चौदह अंगुलकी ऐसी शलाई बनवावे जो दो अंगुल टेढी हो और उर्ध्व-मुखी हो उसकोभी बारह अंगुल भर लिंगके छिद्रमें प्रवेश करै, टेढा और उर्ध्वमुख जो दो अंगुल मात्र हैं उसको बाहर रक्खे फिर सुनारके अग्निधमनेके नालकी सदृश नालको लेकर उस नालके अग्रभागको लिंगमें प्रवेश किये बारह अंगुलके नालका टेढा और ऊर्ध्वमुख दो अंगुल है उसके मध्यमें प्रवेश करके फूत्कार करै तिससे भलीप्रकार लिंगके मार्गकी शुद्धि होतीहै फिर लिंगसे जलके आकर्षणका अभ्यास करै जलके आकर्षणकी सिद्धि होनेपर पूर्वोक्तश्लोकमें कही हुई रीतिके अनुसार बिंदुके ऊपरको आकर्षणका अभ्यास करै बिंदुके उर्ध्व आकर्षणकी सिद्धि होनेपर वज्रोलीमुद्राकी सिद्धि होतीहै यह मुद्रा उस योगीको ही सिद्ध होती-है जिसने प्राणवायुको जीत लियाहै अन्यको नहीं होती है और खेचरीमुद्रा और प्राणका जय होनेपर तो भलीप्रकार सिद्ध होतीहै । भावार्थ यह है कि, लिंग के छिद्रमें वायुके संचार करनेके लिये उत्तमनालसे शनैः २ यत्नपूर्वक फूत्का- रको करै ॥ ८६ ॥

नारीभगे पतद्विदुमभ्यासेनोर्ध्वमाहरेत् ॥ चलितं च निजं बिंदुमूर्ध्वमाकृष्य रक्षयेत् ॥ ८७ ॥

एवं वज्रोल्यभ्यासे सिद्धे तदुत्तरं साधनमाह-नारीभग इति ॥ नारीभगे स्त्रीयोनौ पततीति पतन् पतंश्चासौ बिंदुश्च पतद्विदुस्तं पत- द्विदुरतिकाले तंतं बिंदुमभ्यासेन वज्रोलीमुद्राभ्यासेनोर्ध्वमुपर्या- हरेदाकर्षयेत् । पतनात्पूर्वमेव । यदि पतनात्पूर्वं विदोराकर्षणं न स्यात्तर्हि पतितमाकर्षयेदित्याह चलितं चेति । चलितं नारीभगे पतितं निजं स्वकीयं बिंदु चकारात्तद्रजः ऊर्ध्वमुपर्याकृष्याहृत्य रक्ष- येत् स्थापयेत् ॥ ८७ ॥

भाषार्थ -अब वज्रोलीमुद्राकी सिद्धिके अनंतरका जो साधन है उसका वर्णन करते हैं कि, नारीके भग ( योनि ) में पडते हुये बिंदु ( वीर्य ) का अभ्या- ससे ऊपरको आकर्षण करै अर्थात् पडनेसे पूर्वही ऊपरको खींचले यदि पतनसे पूर्व बिंदुका आकर्षण न होसके तो पतितहुये बिंदुका आकर्षण करे कि चलितहुआ

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( ) | [ १६० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः अपना बिंदु और चकारसे स्त्रीका रज इनकी ऊपरको आकर्षण करके रक्षा करै अर्थात् मस्तकरूप जो वीर्यका स्थान है उसमें स्थापन करें ॥ ८७ ॥

एवं संरक्षयेद्विदुं मृत्युंजयति योगवित् ॥ मरणं बिंदुपातेन जीवनं विंदुधारणात् ॥ ८८ ॥

वज्रोलीगुणानाह-एवमिति । एवमुक्तरीत्या बिंदु यः संरक्षयेत् सम्यक रक्षयेत् स योगविद्योगाभिज्ञो मृत्युं जयत्यभिभवति । यतो बिंदोः शुक्रस्य पातेन पतनेन मरणं भवति । बिंदोर्धारणं विदुधारणं

तस्माद्विदुधारणाज्जीवनं भवति । तस्माद्विदुं संरक्षयेदित्यर्थः ॥ ८८ ॥

भाषार्थ- अब वज्रोलीके गुणोंका वर्णन करते हैं कि, इसप्रकार जो योगी बिंदुकी भलीप्रकार रक्षा करताहै योगका ज्ञाता वह योगी मृत्युको जीतताहै । क्योंकि, बिंदुके पडनेसे मरण और बिंदुकी रक्षासे जीवन होताहै तिससे बिंदुकी रक्षा करै ॥ ८८ ॥

सुगंधो योगिनो देहे जायते बिंदुधारणात् ॥ यावद्विदुः स्थिरो देहे तावत्कालभयं कुतः ॥ ८ ९ ॥ ॥ सुगंध इति ॥ योगिनो वज्रोल्यभ्यासिनो देहे बिंदोः शुक्रस्य धारणं तस्मात्सुगंधः शोभनो गंधो जायते प्रादुर्भवति । देहे याव- द्विदुः स्थिरस्तावत्कालभयं मृत्युभयं कुतः । न कुतोऽपीत्यर्थः ॥ ८९ ॥

भाषार्थ - वज्रोलीके अभ्यासकर्ता योगीके देहमें बिंदुके धारण करनेसे सुगंध होजातीहै और देहमें जबतक बिंदु स्थिर हैं तबतक कालका भय कह अर्थात् कालका भय नहीं रहताहै ॥ ८९ ॥

चित्तायत्तं नृणां शुकं शुक्रायत्तं च जीवितम् ॥ तस्माच्छुक्रं मनश्चैव रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥ ९० ॥

चित्तायत्तमिति ॥ हि यस्मान्नृणां शुक्रं वीर्य चित्तायत्तं चित्ते चले चलत्वाचित्ते स्थिरे स्थिरत्वाचित्ताधीनं जीवितं जीवनं शुक्रायत्तं