हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 191–200

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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3. ] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १८१ -जो कोई मुद्रा योगीजनोंको अणिमा आदि महासिद्धियोंकी प्रदायिनी ( देने--जाली ) है ॥ १२८ ॥

उपदेशं हि मुद्राणां यो दत्ते सांप्रदायिकम् ॥ स एव श्रीगुरुः स्वामी साक्षादीश्वर एव सः॥ १२ ९॥ मुद्रोपदेष्टारं गुरुं प्रशंसति-उपदेशमिति ॥ यः पुमान्मुद्राणां -महामुद्रादीनां संप्रदायाद्योगिनां गुरुपरंपरारूपादागतं सांप्रदायिक- मुपदेशं दत्ते ददाति । स एव स पुमानेव श्रीगुरुः श्रीमान् गुरुः सर्व- गुरुभ्यः श्रेष्ठ इत्यर्थः । स्वामी प्रभुः स एव साक्षात्प्रत्यक्ष ईश्वर एव सः । ईश्वराभिन्न एव स इत्यर्थः ॥ १२ ९ ॥ भाषार्थ -सांप्रदायिक ( योगिया गुरुपरम्परासे चले आये ) महामुद्रा भादिके उपदेशको जो पुरुष देताहै वही श्रीमान् गुरु अर्थात् सब गुरुओंमें श्रेष्ठहै और वही स्वामी अर्थात् प्रभु और घही साक्षात् परमेश्वरस्वरूप है ॥ १२ ९ ॥ तस्य वाक्यपरो भूत्वा मुद्राभ्यासे समाहितः ॥ अणिमादिगुणैः सार्धं लभते कालवचनम् ॥ १३० ॥

इति श्रीस्वात्मारामयोगींद्रविरचितायां हठप्रदीपिका- य मुद्राविधानं नाम तृतीयोपदेशः ॥ ३ ॥

तस्येति ॥ तस्य मुद्राणामुपदेष्टुर्गुरोर्वाक्यपरो वाक्यमासनकुंभका- द्यनुष्ठानविषयकं युक्ताहारविहारचेष्टादिविषयकं च तस्मिन् परस्तत्परः तत्पश्चादवान् । आदरश्च विहिततपःकरणं भूत्वा संभूय मुद्राणां महामुद्रादीनामभ्यासः पौनःपुन्येनावर्तनं तस्मिन् मुद्राभ्यासे समा- हितः सावधानः पुरुषोऽणिमादिगुणैरणिमादिसिद्धिभिः सार्धं साकं कालस्य मृत्योर्वचनं प्रतारणं लभते प्राप्नोति ॥ १३० ॥

इति श्रीहठप्रदीपिकाव्याख्यायां ब्रह्मानंदकृतायां ज्योत्स्ना- भिधायां मुद्राकथनं नाम तृतीयोपदेशः ॥ ३ ॥

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( ) | [ १८२ ठयोगमदीपिका उपदेशः भाषार्थ -तिन मुद्राओंके उपदेशकर्ता गुरुके वाक्यमें अर्थात् आसन कुंभक आदि अनुष्ठान विषयकी और युक्ताहार विहारकी चेष्टा आदि विषयोंकी आज्ञामें तत्पर ( आदरवान् ) और शास्त्रोक्त तप करनेरूप उस आदरके अनंतर बारंबार महामुद्रा आदिके अभ्यासमें सावधान होकर मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियों, सहित कालके वंचनको प्राप्त होता है अर्थात् उसको सिद्धि और कालसे निर्भयता ये दोनों प्राप्त होते हैं ॥ १३० ॥

इति श्रीस्वात्मारामयोगींद्रविरचितायां हठयोगप्रदीपिकायां पं० मिहरचंद्रकृत- भाषाविवृतिसहितायां मुद्राविधानं नाम तृतीयोपदेशः समाप्तः ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोपदेशः ४. नमः शिवाय गुरुवे नादबिंदुकलात्मने ॥ निरंजनपदं याति नित्यं यत्र परायणः ॥ १ ॥

प्रथमद्वितीयतृतीयोपदेशोक्तानामासनकुंभकमुद्राणां फलभूतं राज- योगं विवक्षुः स्वात्मारामः श्रेयांसि बहुविनानीति तत्र विघ्नबाहु- ल्यस्य संभवात्तन्निवृत्तये शिवाभिन्नगुरुनमस्कारात्मकं मंगलमाचरति॥ नम इति ॥ शिवाय सुखरूपायेश्वराभिन्नाय वा । तदुक्तम् । 'नमस्ते नाथ भगवन् शिवाय गुरुरूपिणे ' इति । गुखे देशिकाय यद्वा गुरवे सर्वांतर्यामितया निखिलोपदेष्ट्रे शिवायेश्वराय । तथा च पातंजल- सूत्रम्- स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्' । नमः प्रह्वीभावोs-स्तु । कीदृशाय शिवाय गुरखे नादविदुकलात्मने कांस्यधंदानि-दवदनुरणनं नादः । बिंदुरनुस्वारोत्तरभावी ध्वनिः । कला नांदेकदे- शस्ता आत्मा स्वरूपं यस्य स तथा तस्मै । नादबिंदुकलात्मनावर्त- मानायेत्यर्थः । तत्र नादबिंदुकलात्मनि शिवे गुरौ नित्यं प्रतिदिनं परायणोऽवहितः पुमान् । एतेन नादानुसंधानपरायण इत्युक्तं पूर्वपा-देन गुरुशिवयोरभेदश्च सूचितः । अंजनं मायोपाधिस्तद्रहितं निरंजन

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] - ( ) ४. संस्कृत टीका भाषाटीकासमेता । १८३ शुद्धं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदं ब्रह्म याति प्राप्नोति । तथा च वक्ष्यति -'नादानुसंधानसमाधिभाजम्' इत्यादिना ॥ १ ॥

भाषार्थ -प्रथम, द्वितीय, तृतीय उपदेशोंमें कहे जो आसन कुंभक मुद्रा हैं उनका फलरूप जो राजयोग है उसके कथनका अभिलाषी स्वात्माराम ग्रंथ-कार ' श्रेयकमोंमें बहुत विघ्न हुआ करतेहैं ' इस न्यायसे अनेक विघ्नोंका संभव होसकताहै उन विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये शिवरूप गुरुके नमस्कारात्मक मंगलको करतेहैं कि, शिवरूप अर्थात् सुखरूप वा ईश्वररूप सोई कहाहै कि, हे नाथ! हे भगवन्! शिवरूप गुरु जो आप हैं उनको नमस्कार है गुरुको अथवा सबके उपदेशक अंतर्यामिरूपसे शिवरूपसे ईश्वरको । सोई पातंजलसूत्रमें कहाहै कि, कालसे अवच्छेदके न होनेसे वह ईश्वर पहिले सब आचायकाभी गुरु है उस गुरु वा ईश्वरको नमस्कार है, जो गुरु नादबिंदुकलारूप है कांसीके घंटा समान जो अनुरणन अर्थात् शब्द उसको नाद कहतेहैं और अनुस्वारके अनंतर जो ध्वनि होतीहै उसको बिंदु कहते हैं और नादके एकदेशको कला कहते हैं ये तीनों जिस गुरु वा ईश्वरके रूप हैं अर्थात् जो नाद बिंदु कलारूपसे वर्तमान है और 'जिस जिस नाद बिंदु कलारूप शिवरूप गुरुमें प्रतिदिन परायण ( सावधान ) मनुष्य' इस कथनसे नादके अनुसंधानमें परायण और पूर्व पादसे शिव और गुरुका भेद सूचित किया उस मायोपाधिरूप अंजनसे रहित शुद्ध ब्रह्मपदको प्राप्त होताहै जिसको योगीजन प्राप्त होते हैं उसको पद कहते हैं सोई कहेंगे नादका जो अनुसंधानी और जो समाधिका ज्ञाता है वह योगी है- भाषार्थ यह है कि, शिवरूप और नाद बिंदुकला जिसकी आत्मा है ऐसे उस गुरुको नमस्कार है जिसमें प्रतिदिन तत्पर मनुष्य शुद्धरूप ब्रह्मपदको प्राप्त होताहै ॥ १ ॥

अथेदानीं प्रवक्ष्यामि समाधिक्रममुत्तमम् ॥ मृत्युनं च सुखोपायं ब्रह्मानंदकरं परम् ॥ २ ॥

समाधिक्रमं प्रतिजानीते -अथेति ॥ अथासनकुंभकमुद्राकथना- नंतरमिदानीमस्मिन्नवसरे समाधिक्रमं प्रत्याहारादिरूपं प्रवक्ष्यामि

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( ) [: १८४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश प्रकर्षेण विविच्य वक्ष्मामीत्यन्वयः । कीदृशं समाधिक्रमम् । उत्तमं श्रीआदिनाथोक्तसंपादनकोटिसमाधिप्रकारेषूत्कृष्टम् । पुनः कीदृशं मृत्युं कालं हंति निवारयतीति मृत्युम्नं स्वेच्छया देह- त्यागजनकं तत्त्वज्ञानोदयमनोनाशवासनाक्षयैः सुखस्य जीवन्मु-क्तिसुखस्योपायं । प्राप्तिसाधनं पुनः कीदृशं परं ब्रह्मानंदकरं मारब्धकर्मक्षये सति जीवब्रह्मणोरभेदे नात्यंतिक ब्रह्मानंदप्राप्तिरूपवि- देहमुक्तिकरम् । तत्र निरोधः समाधिना चित्तस्य ससंस्काराशे - षवृत्तिनिरोधे शांतघोरमूढावस्थानिवृत्तौ ' जीवन्नेवेह विद्वान् हर्ष- शोकाभ्यां विमुच्यते ' इत्यादिश्रुत्युक्तनिर्विकारस्वरूपावस्थितिरूपा जीवन्मुक्तिर्भवति । परममुक्तिस्तु प्राप्तभोगांतेंतः करणगुणानां प्रति- प्रसवेनोपाधिकरूपात्यंतिकनिवृत्तावात्यंतिकं स्वरूपावस्थानं प्रतिप्रस वसिद्धम् । व्युत्थाननिरोधसमाधिसंस्कारा मनसि लीयते । मनोऽ- स्मितायामस्मिता महति महान् प्रधान इति चित्तगुणानां प्रतिप्रसवः प्रतिसर्गः स्वकारणे लयः । ननु जीवन्मुक्तस्य व्युत्थाने ब्राह्मणोऽहं मनुष्योऽहमित्यादिव्यवहारदर्शनाश्चित्तादिभिरौपाधिकभावजननादम्ले- न दुग्धस्येव स्वरूपच्युतिः स्यादिति चेन्न । संप्रज्ञातसमाधावनुभूता- त्मसंस्कारस्य तात्त्विकत्वनिश्चयात् । अतात्त्विकान्यथाभावस्याविका- रित्वाप्रयोजकत्वात् । अम्लेन दुग्धस्य दधिभावस्तु तात्त्विक इति । दृष्टांतवैषम्याच्च पुरुषस्य त्वंतःकरणोपाधिकोऽहं ब्राह्मण इत्यादिव्य-बहारः स्फटिकस्य जपाकुसुमसन्निधानोपाधिरूपक एव न तात्त्विकः । जपाकुसुमापगमे स्फटिकस्य स्वस्वरूपस्थितिवदंतःकरणस्य सकल- वृत्तिनिरोधे स्वरूपावस्थितिरच्युतैव पुरुषस्य ॥ २ ॥

भाषार्थ - अब आचार्य समाधिका जो क्रम उसके वर्णनको प्रतिज्ञा करते हैं कि, इसके अनंतर अर्थात् आसन कुंभकमुद्रा वर्णन करनेके अनंतर इदानीं ( इस अवसरमें ) प्रत्याहार भादिरूप उस समाधिके क्रमको प्रकर्षतासे ( पृथकु ) कहता हूं जो समाधिका क्रम आदिनाथकी कहीहुई संपादन कोटिरूप समा-

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8. ] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १८५ धियोंके प्रकारों ( भेद ) में उत्तम है और जो मृत्युका निवारणकर्ता है अर्थात् अपनी इच्छासे देहके त्यागका जनक है और जो उत्पत्ति, मनका नाश, ासनाका क्षय इन तीनोंके होनेपर जीवन्मुक्तिरूप सुखका उपाय ( साधन ) हैं और जो परमब्रह्मानंदका कर्ता है अर्थात् प्रारब्ध कर्मका क्षय होनेपर जीव ब्रह्मको अभेदका ज्ञान होनेसे आत्यंतिक ब्रह्मानंदकी प्राप्तिरूप जो मुक्ति उसको करताहै । वहां प्रथम समाधिसे चित्तका निरोध होताहै और संस्कारसहित संपूर्णवृत्तियका निरोध होनेपर शांत घोर मूढ अवस्थाओंकी निवृत्ति होतसंते इत्यादि श्रुतियोंमें कहीहुई कि, ' जीवताहुआही ज्ञानी हर्षशोकसे छूटजाता है' निर्विकार स्वरूपमें स्थितिरूप जीवन्मुक्ति होजातीहै और परममुक्ति तो यह है कि, प्राप्त हुये भोगके अंतमें अंतःकरणके गुणोंका प्रतिप्रसव होनेसे भौपाधिकरूपकी अत्यंत निवृत्ति होनेपर आत्यंतिक स्वरूपमें अवस्थान प्रतिप्रसवसे सिद्ध है और व्युत्थान निरोध समाधि संस्कार ये सब मनमें लीन होजाते हैं और मन अस्मि- अस्मिता महान् महान् प्रधानमें लीन होजाताहै. इसप्रकार चित्तके गुणोंका प्रतिप्रसव अर्थात् अपने २ कारणमें लयरूप प्रतिसर्ग होता है. कदाचित् कोई शंका करै कि, समाधिसे व्युत्थान ( उठना ) के समय मैं ब्राह्मण हूं मैं मनुष्य हूं इत्यादि व्यवहारके देखनेसे चित्त आदिसे औपाधिक भावके पैदाहोनेसे अम्लसे दूधके समान अपने ब्रह्मस्वरूपसे च्युति ( पतन ) होजायगा- सो ठीक नहीं है क्योंकि संप्रज्ञात समाधिमें अनुभूत ( ज्ञात ) जो आत्मसंस्कार उसके तात्त्विकत्व ( यथार्थता ) का निश्चय होजाताहै और अतात्त्विक जो अन्यथाभाष है वह अधि-कारका प्रयोजक नहीं होताहै- अम्लसे जो दूधका दधिभाव है वह तात्त्विक है इससे दृष्टांतभी विषम है - मनुष्यको तो अंतःकरणरूप उपाधिसे मैं ब्राह्मण हूं इत्यादि व्यवहार होताहै- और वह स्फटिकको जपाकुसुमकी संनिधानरूप उपाधिके समा-नहीहै ताकि नहीं है -जपाकुसुमके हटानेपर स्फटिककी अपने स्वरूपमें स्थितिके समान अंत:करणकी संपूर्ण वृत्तियोंके निरोध होनेपर अपने स्वरूपमें स्थिति नष्ट नहीं होतीहै अर्थात् जीवन्मुक्तिकी अवस्थामें मनुष्य ब्रह्मरूपमें स्थित रहताहै- भावार्थ यह है कि, इसके अनंतर उत्तम मृत्युके नाशक -सुखका उपाय और परम ब्रह्मानंदका जनक जो समाधिका क्रम उसको मैं अब वर्णन करताहूँ ॥ २ ॥

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(( ) । [ १८६ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी ॥ 2 अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम् ॥ ३ ॥

अमनस्कं तथाद्वैतं निरालंबं निरंजनम् ॥ जीवन्मुक्तिश्व सहजा तुर्या चेत्येकवाचकाः ॥ ४ ॥

समाधिपर्यायान् विशेषेणाह-राजयोग इत्यादिना श्लोक- द्वयेन ॥ स्पष्टम् ॥ ३ ॥ ४ ॥

भाषार्थ -अब समाधिके पर्यायोंका वर्णन करते हैं कि, राजयोग-समाधि- उन्मनी-मनोन्मनी- अमरत्व -लय- तत्त्व-शून्याशून्यपरंपद -- अमनस्क- अद्वैत -निरा- लंब— निरंजन – जीवन्मुक्ति- सहजा- तुर्या -ये सब एक समाधिकेही वाचक हैं -इन सब भेदोंका आगे वर्णन करेंगे ॥ ३ ॥ ४ ॥

सलिले सैन्धवं यद्वत्साम्यं भजति योगतः ॥ तथात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते ॥ ५ ॥

यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च प्रलीयते ॥ तदा समरसत्वं च समाधिरभिधीयते ॥ ६ ॥

तत्समं च द्वयोरेक्यं जीवात्मपरमात्मनोः ॥ प्रनष्टसर्वसंकल्पः समाधिः सोऽभिधीयते ॥ ७ ॥

त्रिभिः समाधिमाह- सलिल इति ॥ यदेति ॥ तत्सममिति यद्यथा सैंधवं सिंधुदेशोद्भवं लवणं सलिले जले योगतः संयोगा-॥ •त्साम्यं सलिलसाम्यं सलिलैक्यत्वं भजति प्राप्नोति तथा तदात्मा चमनश्वात्ममनसी तयोरात्ममनसोरैक्यमेकाकारता । आत्म धारितं मन आत्माकारं सदात्मसाम्यं भजति तादृशमात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते समाधिशब्देनोच्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥ ६ ॥ ७ ॥

भाषार्थ-जिसप्रकार सिंधुदेशमें उत्पन्न हुआ लवण जलकेविषे संयोगसे साम्यको भजता है अर्थात् जलका संयोग होनेसे जलके संग एकताको प्राप्त

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. - ( ) ४ संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १८७ होजाताहै तिसीप्रकारसे जो आत्मा और मनकी एकता है अर्थात् आत्मामें धारण किया हुआ मन आत्माकार होनेसे आत्मरूपको प्राप्त होजाताहै उसी आ मनकी एकताको समाधि कहतेहैं जब प्राण भलीप्रकार क्षीण होजाता है और मनकाभी लय होजाताहै उस समय में हुई जो समरसता उसकोभी समाधि कहते हैं और जीवात्मा और परमात्मा इन दोनोंकी एकतारूपकोही समता कहतेहैं और उससमय नष्ट हुये हैं संपूर्ण संकल्प जिसमें उसको समाधि कहतेहैं ॥ ९ ॥ ६॥ ७॥

राजयोगस्य माहात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः ॥ ज्ञानं मुक्तिः स्थितिः सिद्धिर्गुरुवाक्येन लभ्यते॥८ ॥

अथ राजयोगप्रशंसा- राजयोगस्येति ॥ राजयोगस्यानंतरमे- वोक्तस्य माहात्म्यं प्रभावं तत्त्वतो वस्तुतः को वा जानाति । न कोऽपि जानातीत्यर्थः । तत्त्वतो वक्तुमशक्यत्वेऽप्येकदेशेन राजयोगप्रभाव- माह -ज्ञानं स्वस्वरूपापरोक्षानुभवः मुक्तिर्विदेहमुक्तिः स्थितिर्निर्विकार- स्वरूपावस्थितिरूपा जीवन्मुक्तिः सिद्धिरणिमादिर्गुरुवाक्येन गुरुव- चसा लभ्यते । राजयोगादिति शेषः ॥ ८ ॥

भाषार्थ - अब राजयोगकी प्रशंसाका वर्णन करतेहैं कि, इसके अनंतर कहे हुये राजयोगके माहात्म्यको यथार्थरूपसे कौन जानता है अर्थात् कोई भी नहीं जानता है तत्त्वसे कहनेके अयोग्य भी एकदेशरूपसे राजयोगके प्रभावको वर्णन करतेहैं कि, ज्ञान अर्थात् अपने आत्मस्वरूपका अपरोक्ष अनुभव और विदेहमुक्ति और निर्विकारस्वरूपमें अवस्थितिरूप जीवन्मुक्ति और अणिमाआदि सिद्धि ये सब गुरुके वाक्यसे प्राप्त हुये राजयोगकेद्वारा प्राप्त होतेहैं ॥ ८ ॥

दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ॥ दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥ ९ ॥

दुर्लभ इति ॥ विशेषेण सिन्वंत्यववनंति प्रमातारं स्वसंगेनेति विषया ऐहिका दारादय आमुष्मिकाः सुधादयस्तेषां त्यागो भोगे-च्छाभावो दुर्लभः । तत्त्वदर्शनमात्मापरोक्षानुभवः दुर्लभं सहजा--

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( ) | [: १८८ हठयोगप्रदीपिका उपदेश -वस्था तुर्यावस्था सद्गुरोः 'दृष्टिः स्थिरा यस्य विनैव दृश्यम्' इति वक्ष्यमाणलक्षणस्य करुणां दयां विनेति सर्वत्र संबध्यते । दुर्लभा लब्धुमशक्या 'दुः स्यात्कष्टनिषेधयोः' इति कोशः । गुरुकृपया तु - सर्व सुलभमिति भावः ॥ ९ ॥

भाषार्थ -अपने प्रमाता ( भोक्ता ) को जो अपने संगसे विशेष करके बांधे उन्हें विषय कहते हैं और वे विषय इसलोकके स्त्री आदि और परलोकके अमृत -आदि होते हैं उन विषयोंका त्याग दुर्लभ है और आत्माके अपरोक्षानुभवरूप तत्त्वका दर्शन दुर्लभ है— और सहजावस्था ( तुरीया अवस्था ) दुर्लभ है अर्थात् ये पूर्वोक्त तीनों सद्गुरुकी दयाके विना दुर्लभ हैं और गुरुकी दयासे तो संपूर्ण सुलभ है और सद्गुरुका स्वरूप यह कहेंगे कि, 'देखनेयोग्य पदार्थके विनाही जिसकी दृष्टि स्थिर हो ' वह सद्गुरु होता है ॥ ९ ॥

विविधैरासनैः कुंभर्विचित्रैः करणैरपि ॥ प्रबुद्धायां महाशक्तौ प्राणः शून्ये प्रलीयते ॥ १० ॥

विविधैरिति ॥ विविधैरनेकविधैरासनैर्मत्स्येंद्रादिपीठेविचित्रैर्ना- नाविधैः कुम्भकैः । विचित्रैरिति काकाक्षिगोलकन्यायेनोभयत्र संब- ध्यते । विचित्रैरनेकप्रकारकैः करणैर्हठसिद्धौ प्रकृष्टोपकारकैर्महामुद्रा- दिभिर्महाशक्तौ कुंडलियां प्रबुद्धायां गतनिद्रायां सत्यां प्राणो वायुः शून्ये ब्रह्मरंध्रे प्रलीयते प्रलयं प्राप्नोति । व्यापाराभावः प्राणस्य प्रलयः ॥ १० ॥

भाषार्थ - अनेकप्रकारके मत्स्येंद्र आदि आसन और विचित्र २ कुंभक प्राणा- याम और विचित्र अर्थात् अनेक प्रकारके हठसिद्धिमें कहे हुये महामुद्रा आदि इनसे जब महाशक्ति ( कुंडलिनी ) प्रबुद्ध होजाती है अर्थात् निद्राको त्याग देती है तब प्राणवायु शून्य ( ब्रह्मरंध्र ) में लय होजाता है-और व्यापारके अभावकोही प्राणका लय कहते हैं ॥ १० ॥

उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ॥ योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ ११ ॥

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १८ ९ उत्पन्नेति ॥ उत्पन्नो जातः शक्तिबोधः कुण्डलीबोधो यस्य तस्य त्यक्तानि परिहृतानि निःशेषाणि समग्राणि कर्माणि येन तस्य योगिनः । आसनेन कायिकव्यापारे त्यक्ते प्राणेंद्रियेषु व्यापारस्ति-ष्ठति । प्रत्याहारधारणाध्यानसंप्रज्ञातसमाधिभिर्मानसिकव्यापारे त्यक्ते बुद्धौ व्यापारस्तिष्ठति 'असंगो ह्ययं पुरुषः ' इति श्रुतेरपरिणामी शुद्धः पुरुषः सत्त्वगुणात्मिका परिणामिनी बुद्धिरिति ॥ ११ ॥

भाषार्थ-उत्पन्न हुआ है कुंडलिनीरूप शक्तिका बोध जिसको और त्याग दिये हैं संपूर्ण कर्म जिसने ऐसे योगीको स्वयंही सहजावस्था होजाती है-क्योंकि आसन बांधनेसे देह व्यापारका त्याग होनेपर प्राण और इंद्रियोंमें व्यापार बना रहता है और प्रत्याहार -धारणा-ध्यान -संप्रज्ञातसमाधि इनसे मानसिक व्यापारके त्याग होनेपर बुद्धिमें व्यापार टिकता है, क्योंकि इस श्रुतिमें असंग यह पुरुष है यह कहा है इससे पुरुष अपरिणामी और शुद्ध है और सत्त्वगुणरूप बुद्धि परिणामवाली है और उत्तमवैराग्यसे वा दीर्घकालतक संप्रज्ञात समाधिके अम्या-ससे बुद्धिके व्यापार कभी त्याग होनेपर निर्विकारस्वरूपमें स्थिति होजाती है मही सहजावस्था, तुर्यावस्था, जीवन्मुक्ति अन्यप्रयत्नके विनाही होजाती है क्योंकि इस श्रुतिमें लिखा है कि, जिससे त्यागता है उसकोभी त्यागकर बुद्धिसे संगरहित होजाय ॥ ११ ॥

सुषुम्नावादिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे ॥ तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ॥१२ ॥

परवैराग्येण दीर्घकालसंप्रज्ञाताभ्यासेनैव वा बुद्धिव्यापारे परि- त्यक्ते निर्विकारस्वरूपावस्थितिर्भवति सैव सहजावस्था तुर्यावस्था

जीवन्मुक्तिः स्वयमेव प्रयत्नांतरं विनैव प्रजायते प्रादुर्भवति ।

'येन त्यजसि तच्यजेति निःसंगः प्रज्ञया भवेत्' इति च श्रुतेः ॥

सुषुम्नेति । प्राणे वायौ सुषुम्नावाहिनि मध्यनाडीमवाहिनि सति मानसेंतःकरणे शून्ये देशकालवस्तुपरिच्छेदहीने ब्रह्मणि विशति सात तदा तस्मिन् काले योगविश्चित्तवृत्तिनिरोधज्ञः सर्वाणि कर्माणि

पृष्ठ 200

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( ) [: १ ९ ० हठयोगप्रदीपिका । उपदेश सप्रारब्धानि निर्मूलानि करोति निर्मूलयति निर्मूलशब्दात् 'तत्करोति' इति णिच् ॥ १२ ॥

भाषार्थ -प्राणवायु जब सुषुम्नामें बहने लगता है और मन देश, काल, वस्तुके परिच्छेदसे शून्यब्रह्ममें प्रविष्ट होजाता है उस समय चित्तवृत्तिके निरोधका ज्ञाता योगी प्रारब्धसहित संपूर्णकमको निर्मूल ( नष्ट ) करदेता है ॥ १२ ॥

अमराय नमस्तुभ्यं सोऽपि कालस्त्वयाजितः ॥ पतितं वदने यस्य जगदेतच्चराचरम् ॥ १३ ॥

समाध्यभ्यासेन प्रारब्धकर्मणोऽप्यभिभवाज्जितकालं योगिनं नम- स्करोति-अमरायेति ॥ न म्रियत इत्यमरः । तस्मा अमराय चिरंजीविने तुभ्यं योगिने नमः । सोऽपि दुर्वारोऽपि कालो मृत्युस्त्वया योगिना जितोऽभिभूतः । इदं वाक्यं नमस्करणे हेतुः । स कः यस्य कालस्य वदने मुखे एतद्दृश्यमानं चराचरं स्थावरजंगमं जगत्संसार: पतितः । सोऽपि जगद्भक्षकोऽपीत्यर्थः ॥ १३ ॥

भाषार्थ -समाधिके अभ्याससे प्रारब्धकर्मकाभी तिरस्कार हो जाता है इससे जिसने कालकोभी जीत लिया है उस योगीको सब नमस्कार करते हैं कि, तिस अमर ( चिरजीवी ) आपको नमस्कार हैं. जिसने दुःखसे निवारण करने योग्यभी वह काल ( मृत्यु ) जीत लिया जिस कालके मुखमें यह स्थावर जंगमरूप चराचर जगत् पतित है ॥ १३ ॥

चित्ते समत्वमापत्रे वायो व्रजति मध्यमे ।

तदामरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते ॥ १४ ॥

पूर्वोक्तममरोत्यादिकं समाधिसिद्धावेव सिदयतीति समाधिनिरू-पणानंतरं समाधिसिद्धौ तत्सिद्धिरित्याह -चित्त इति ॥ चितेंऽतः करणे समत्वं ध्येयाकारवृत्तिप्रवाहत्वं आपने प्राप्ते सति वायौ प्राणे मध्यमे सुनायां व्रजति सतीति चित्तसमत्वे हेतुः । तदा तस्मिन्