हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 211–220
हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 211–220
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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २०१ और मेरेमें एक रस चित्त रखनेको योग कहते हैं । स्कंदपुराणमें लिखा है कि, आत्मज्ञानसे मुक्ति होती है वह आत्मज्ञान योगके विना नहीं हो सकता और वह योग चिरकालके अभ्याससेही सिद्ध होताहै-कूर्मपुराणमें शिवजीका वाक्य है कि, इससे आगे परमदुर्लभ योगको कहताहूँ जिससे सूर्यके समान ईश्वर आत्माको योगी देखते हैं योगरूप अनि शीघ्रही संपूर्ण पापके पंजरको दग्ध करती है और प्रसन्न ज्ञान होताहै और ज्ञानसे मोक्ष होजाताहै- गरुडपुराण में कहा है कि, बुद्धिमान् मनुष्य तिसप्रकार यत्नकरै जैसे परमसुखहो और वह सुख योगसे मिल--ताहै अन्य किसीसे नहीं -संसारके तापसे तपायमान मनुष्योंके लिये योग परम औषध है जिसकी निर्वेद ( वैराग्य ) से उत्पन्न हुई बुद्धि परअवरमें प्रसक्त हैं योगरूप अभिसे दग्धहुये हैं समस्त क्लेशसंचय जिसके ऐसा वह परमनिर्वाणपद को सदैव प्राप्त होताहै इसमें संशय नहीं है -प्राप्त हुईही है योगसिद्धि जिसको उसको और आत्माके दर्शनसे पूर्ण जो है उसको कुछभी कर्तव्य नहीं देखते उसने सब- कर लिया -आत्माराम और सदा पूर्णरूप और आत्यंतिक सुखको प्राप्त है इससे परमानंदरूप उसको निर्वेद ( सुख ) होजाताहै-तपसे जानाहै आत्मा जिन्होंने और वशमें हैं इन्द्रियें जिनके ऐसे महात्मा योगीजन योगसेही महासमुद्र ( जगत्) को तर जातेहैं-और विष्णुधमोंमें लिखाहै कि, जो सब भूतोंका श्रेय है और स्त्रियोंका और कीट पतंगोंका भी उपकार है उस परमश्रेयको हमारे प्रति कहो. इसप्रकार देव और देवर्षियोंने कहाहै जिनको ऐसे कपिलमुनि पहिले समयमें योगकोही श्रेय कहते भये -वासिष्ठमें लिखा है कि, हे राम! संसारके विषका जो वेग उसकी विसूचिका दुःसह है वह योगरूप और पवित्र गारुडमंत्रसेही शांत होती है कदाचित कोई शंकाकरे कि तत्त्वमसि आदि महावाक्योंसे भी अपरोक्ष प्रमाण ( ज्ञान ) होताहै तो किसलिये अत्यंतश्रमसे साध्ययोगमें प्रयास करते हो-कदाचित् कहो कि वाक्यसे जन्य ज्ञानके अपरोक्ष होनेमें प्रमाणका असंभव है सो नहीं -क्योंकि, तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे उत्पन्न हुआ ज्ञान-अपरोक्ष है— अपरोक्ष विषयक होनेसे-चक्षुसे हुये घट आदिके प्रत्यक्षकी तुल्य यह अनुमान प्रमाण है । कदाचित् कहो कि, विषयकी अपरोक्षताके नीरूप ( रूपहीन ) होनेस हेतुकी असिद्धि है सो ठीक नहीं. क्योंकि अज्ञानका विषय चित्त, और चित्तके संग
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( ) || [ २०२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः तादात्म्यरूपको प्राप्तत्व, ये दोनों रूप जिसके ऐसी जो विषय की अपरोक्षता वह भलीप्रकार निरूपण करने योग्य है जैसे घट आदिमें जब चक्षुकी संनिकर्ष -दशामें उसके अधिष्ठानरूप चैतन्यकी अज्ञाननिवृत्तिके होनेपर उसका चैतन्य अज्ञानका विषय होना, और उस घटका अज्ञान विषय चैतन्यके संग तादा- त्म्यकी प्राप्ति होना, ये दोनों अपरोक्ष है-तिसीप्रकार तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे शुद्ध चैतन्याकार वृत्तिके होनेपर उसके अज्ञानकी निवृत्ति होनेसेही तत्त्व अज्ञा-नका विषय नहीं रहा इससे चैतन्य अपरोक्ष है इससे हेतुकी असिद्धि नहीं है- कदाचित् कहो कि, हेतु अप्रयोजक है अर्थात् अपने साध्यको सिद्ध नहीं कर- सकता, अपरोक्षता ज्ञानसे होती है इससे प्रत्यक्ष जो परोक्ष उसका विषयक होनेसे हेतु प्रयोजक है कुछ इंद्रियजन्यही अपरोक्ष नहीं होता, क्योंकि मन इंद्रिय नहीं है उसकोभी सुख आदिकी विषयकता होनेसे व्यभिचार होजायगा अथवा अभिव्यक्त ( प्रकट ) चैतन्यके अभिन्नरूपसे जो भासमान होना वही विषयकी अपरोक्षताहै और आवरणकी निवृत्ति होनेकोभी अभिव्यक्त कहतेहैं- और परोक्ष वृत्तिके स्थलमें आवरण निवृत्तिका अभाव है इससे वहां अतिव्याप्ति- रूप दोष नहीं है -जो मनुष्य रज्जु आदिमें सर्प आदि भ्रमके उत्पादक दोष- वाला है उसको जो यह सर्प नहीं किंतु रज्जु है इस वाक्यसे उत्पन्न हुई जो वृत्ति वह आवरणको निवृत्त नहीं करती है इससे वहां परोक्षही विषय है और वेदांतके वाक्योंसे जो ज्ञान उत्पन्न होताहै आवरणका निवर्तक होनेसे वह अप- रोक्षही है, क्योंकि वह मनन आदिसे पूर्व उत्पन्न हुआहै और ज्ञाननिवर्तक प्रमा- णकी असंभावना आदि संपूर्ण दोषोंके अभाव विशिष्टही उस वेदांतवाक्योंसे जन्यज्ञानको अज्ञानकी निवर्तकताहै और उस उपनिषदोंसे प्रतिपादन किये पुरु- को पूछताहूं इस श्रुतिसे प्रतिपन्न ( सिद्ध ) उपनिषद मात्रसे जो जाना जाताहै वह योगसेही जानाजायगा तिससे तत्त्वमसि आदि वाक्यसेही अपरोक्षज्ञान होताहै -सो ठीक नहीं है, क्योंकि अनुमान अप्रयोजक है. क्योंकि प्रत्यक्षके प्रति और पूर्वोक्त अक्ष ( इन्द्रिय ) सामान्यके प्रति इंद्रियरूपसे कारणताहै इससे इंद्रियसे जन्यत्वही प्रयोजक है और नित्य अनित्य साधारण प्रत्यक्षमें तो कुछ प्रयोजक नहीं होताहै और उनके मतमें तो किसी प्रत्यक्षमें इंद्रिय कारण हैं
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8., ] - ( ) ४ संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता ॥ २०३ और किसी प्रत्यक्षमें शब्दविशेष कारण है इसप्रकार दो कार्य कारणभाव होजायँगे अर्थात् एक कार्यके दो कारण मानने पडेंगे -कदाचित् कहो कि मन इंद्रिय नहीं है सो भी नहीं क्योंकि, मन इंद्रियोंका नाथ है यह वचन मनुष्यके समान उद्देश करके मनुष्यों का यह राजाहै इसके समान मनुष्योंमें ही कुछ उत्कर्षको कहताहै कुछ मनको इंद्रियभिन्न नहीं कहताहै और तत्त्व तो यह है कि, मन इन्द्रियोंमें एक अखंडोंपाधिरूपही है इसीसे पायु ( गुदा ) आदि कर्मेंद्रिय और मन नेत्र आदि ज्ञानेंद्रिय हैं और जो प्रत्यक्षहो वह ऐंद्रियक और जो अप्रत्यक्ष हो वह अतींद्रिय कहताहै इन शक्तिके निर्णायक कोशमें इंद्रियाप्रमाणक ज्ञानको अप्रत्यक्ष कहते हुये मनको इंद्रिय होना प्रतीत कराते हैं और दश और एक इंद्रिय है यह गीता वचनभी मनके इंद्रिय होनेमें प्रमाण है -और तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे पैदा हुआ ज्ञान-शब्दसे उत्पन्न है, शब्दसे उत्पन्न होनेसे,,--यज्ञ करे इत्यादि वाक्योंसे उत्पन्न ज्ञानके समान –इस अप्रत्यक्ष विरोधि शब्दजन्यके साधक अनुमानसे सत्प्रतिपक्षभी है विरोधि पदा- के साधक हेतुको सत्प्रतिपक्ष कहतेहैं-कदाचित् कहो कि, यह अनुमान अप्रयोजक है सोभी नहीं क्योंकि शब्दजन्य ज्ञानकाही शब्द जनक होताहै । यह लाघवमूलक अनुकूल तर्क इस अनुमानमेंहै-तेरे मतमें तो शब्दसेभी प्रत्यक्षके स्वीकार करनेसे दो कार्य कारण भाव होजायेंगे इससे गौरवहै- और मनन, निदि- ध्यासनसे पहिले भी उत्पन्न है और तेरे मतमें परोक्षभी, उक्तज्ञान अज्ञानका निव-तक नहीं होगा इससे अज्ञाननिवृत्तिके प्रति बाधज्ञानरूपसेही हेतु मानना पडेगा यह भी गौरव है, मेरे मतमें तो समाधिका जो अभ्यास उसके परिपाकसे असं- भावना आदि संपूर्ण मर्लोसे रहित अर्थात् अंतःकरणसे आत्माके देखनेपर और दर्शनमात्रसेही अज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है इससे कोई भी गौरवका अवकाश नहीं है--और संपूर्ण भूतोंमें यह गुप्त आत्मा प्रकाशित नहीं होता है, परंतु सूक्ष्म-. दर्शी मनुष्य इस आत्माको सूक्ष्म और मुख्य जो बुद्धि उससे देखते हैं - धीर मनुष्य वाणी और मनको रोकै इन वचनोंसे लेकर अज्ञानकी निवृत्ति अर्थ जिसका ऐसे इस कठवल्लीके मृत्युके मुखसे छुटताहै मृत्युके उपदेशकोभी यह बात संमत है इससे इसमें कोई विवाद नहीं है -और यदि मनन आदिसे पूर्व
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( ) [ २०४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः उत्पन्न हुआ ज्ञान परोक्षही है इससे प्रतिबंधका किया गौरव नहीं है इस मतको मानोंगे तो तब भी श्रवण आदिसे मनका संस्कार सिद्ध होनेपर उसके अनंतर कालहीमें आत्माका दर्शन संभव है इससे उसके अनंतर वाक्योंके स्मरण आदिको कल्पना करनेमें भी महान् गौरवहै -कदाचित् शंका करो कि हम केवल तर्कसे शब्दजन्य ज्ञानको अपरोक्ष नहीं कहते हैं किंतु श्रुति भी कहती है सोई दिखातेहैं कि, उस उपनिषदोंसे कहे हुये पुरुषको मैं पूछता हूँ इस श्रुतिसे जो पुरुषको औप- निषदरूप कहाहै वह कुछ उपनिषदोंसे उत्पन्न जो बुद्धि उसकी विषयमात्र नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष आदिते जानने योग्यमें औपनिषद् यह व्यवहार होजायगा जैसे बारह कपालोंमें आठ कपालोंके होनेपरभी द्वादश कपालोंमें संस्कार किये पदार्थमें आठ कपालोंमें संस्कृत यह व्यवहार नहीं होताहै और जैसे द्विपुत्र मनुष्यमें एक- पुत्र व्यवहार नहीं होताहै तैसेही यहां भी समझना और अन्यत्र तैसा व्यवहार नहीं होताहै इससे उपनिषद्मात्रसे जानने योग्यही यहां प्रत्ययका अर्थ है और मनसे जानने योग्य आत्माको मानोंगे तो वह सिद्ध नहीं होगा यह शंका भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रत्ययसे, उपनिषदसे भिन्न जो सबकारण हैं उनकी निवृत्ति ( निषेध ) नहीं होतीं है, क्योंकि शब्दके अपरोक्षवादी अपने भी आत्माके परोक्षज्ञानमें मन आदि करण माने हैं किंतु प्रत्ययसे पुराण आदि जो अन्य शब्द हैं उनकीही व्यावृत्ति होती है, क्योंकि श्रुतिके वाक्योंसे आत्मा सुनने योग्य है यह कहाहै और वह अर्थ मुझे भी संमत हैं इससे आपका कथन तुच्छ है और प्रमाणांतरकी व्यावृत्तिमें श्रुतिके तात्पर्यकी कल्पना तभी कहनी योग्य है जब शब्दरूप प्रमाण सिद्ध होजाय और पुराण आदि शब्दांतरकी व्या- वृत्ति तात्पर्य तो श्रुति आदिका संमत होनेसे कल्पना करनेको उचितही है ऐसा सिद्ध होनेपर यह आत्मा मनसेही देखने योग्य है इत्यादि श्रुतिभी अनायाससे लगसकती है जो किसीने यह कहा है कि, दर्शनवृत्तिके प्रति जो मनमात्रकोही कहती हैं उन श्रुतियोंके संग कुछ विरोध नहीं है । यह उनका कहना तो अत्यंतही विचारमें नहीं आसकता क्योंकि, प्राणकी आकांक्षामें प्रवृत्त हुई थे श्रुति उपादानमें तत्पर कैसे होसकती हैं क्योंकि काम, संकल्प, विचिकित्सा ( संदेह ) ये सब मनहीसे हैं इत्यादि श्रुतिसे निश्चयपूर्वक सब वृत्तियका मनकोही
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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २०५ उपादान कारण बोधन करदिया तब आकांक्षाके अभावसे उपादानमें तात्पर्यको श्रुति कैसे घर्णन करसकती हैं । पहिले दूसरी बल्लीमें ओंकारको ब्रह्मबोधक कहा है इससे ओंकारभी अपरोक्षज्ञानका हेतु होजायगा, इस शंकाके निवारण करनेके लिये मनसे ही आत्मा देखने योग्य है. इत्यादि निश्चायक वचन हैं इसरीतिसे संपूर्ण श्रुति वर्णन करने ( लगाने ) को शक्य हैं इसप्रकार वाकूजालसे अलं हैं अर्थात् घाणीके जालको समाप्त करते हैं सिद्धांत तो यहहै कि, योगियोंको समा-धिविषे दूर और विप्रकृष्टपदार्थोंका जो ज्ञानहै संपूर्ण शास्त्रोंमें प्रसिद्ध वह ज्ञान परोक्ष नही है, क्योंकि उससमय कोई परोक्षकी सामग्री नहीं है और स्मरण भी नहीं है क्योंकि उनका पहिले पृथकू २ अनुभव नहीं है और सुखआदिके ज्ञान समान वह साक्षिस्वरूपभी नहीं है क्योंकि इसमें सिद्धांतका विघात है और प्रमाण-रहितभी नहीं है क्योंकि संपूर्ण प्रमाणोंमें कारणका नियम है और चक्षुआदि उत्पन्न भी वह ज्ञान नहीं है क्योंकि चक्षुआदिका उस समय संनिकर्ष नहीं है तिससे वह मानसिक प्रमाही कहनी चाहिये इससे मन प्रमाणरूप और इंद्रिय है यह निर्दोषहै-और भी जो योग और श्रुतिके समुच्चयकी कल्पना करते हैं उनके भी मतमें पूर्वोक्त दूषणोंका गण तदवस्थही है तिससे यह सिद्धभया कि, योगजन्य संस्कारहै सहायक जिसका ऐसे मनसेही आत्मा जानने योग्यहै कदाचित् कोई कह कि, कामिनीकी भावना करनेवाले पुरुषको जैसे व्यवहित ( दूरस्थित ) कामि-नीका साक्षात्कार अप्रमा होताहै इसीप्रकार भावनासे उत्पन्न आत्मसाक्ष अप्रमा होजायगा सोभी ठीक नहीं क्योंकि आत्मसाक्षात्कारका विषय ( आत्मा ) बाधित नहीं है और न दोषसे जन्य है कामिनीका साक्षात्कार तो विषयक है और दोषजन्यभी है इससे अप्रमाणहै तिससे भावनासेजन्य आत्मसाक्षात्कार अप्रमाण नहीं है कदाचित् कहो कि, भावनाको समा-धिका ज्ञापक मानोगे तो यह भी एक प्रमाण होजायगा सो ठीक नहीं क्योंकि, भावना मनकी सहकारिणीहै इससे प्रमाणके निरूपणमें अनिपुण नैयायिक आदि-कोंने भी योगजप्रत्यक्षका अलौलिक प्रत्यक्षमें अंतर्भाव किया है और योगसे उत्पन्न हुये अलौलिक संनिकर्षसे योगीजन व्यवहित विप्रकृष्ट और सूक्ष्म पदार्थरूप भी आत्माको यथार्थरीतिसे देखते हैं-सोई इस पातंजलसूत्रमें कहाहै कि, उक्त समा-
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( ) | [ २०६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः विमें जो सत्यप्रज्ञा ( बुद्धि ) है उसके शाब्दबोध और अनुमानसे अर्थात् युक्ति- सिद्धज्ञान है उनसे वह प्रज्ञा अन्यविषयक होजाती है अर्थात् भिन्न अर्थकोभी विषय करलेती है क्योंकि उसका विषय निर्विकल्प अर्थ है - तिससे शब्द पदार्थ वृत्तिधर्म ( घटत्व आदि ) पुरस्कारके विनाही और अनुमानव्यापकमें वर्तमान धर्मके पुरस्कार ( ज्ञान ) सेही बोधके जनक नियमसे है इससे अर्थके ग्रहणमें योग्य विशेष्यमेंही तत्पर है अर्थात् योगविषयकोही ग्रहण करते हैं — यहां व्यासजीका रचा यह भाष्यहै कि, श्रुतनाम आगमविज्ञान है -वह आगमविज्ञान सामान्य विषय हैं क्योंकि आगम विशेषको नहीं कहसकता, क्योंकि विशेषरूपसे शब्दका संकेत नहीं होताहै-इससे आरंभ करके समाधि प्रज्ञासे भलीप्रकार ग्रहण करने योग्य वह विशेष है और वह पुरु- बगत है वा भूतसूक्ष्मगत है-योगबीज में कहाहै कि, ज्ञाननिष्ठहो वा विरक्तहो धर्मज्ञहो वा जितेंद्रियहो योगके विना देव भी हे प्रिये! मोक्षको प्राप्त नहीं होता है और यह श्रुति भी है कि, कर्मके संग उसीबातके करनेमें यह मनुष्य असक्त हैं जिसमें इसका मनरूप लिंग प्रविष्ट है और स्मृति भी है कि सत् असत् योनि- योंके जन्मोंमें इसको गुणोंका संगही कारण है -देहके मरणसमयमें जिसविषयमें राग आदिसे उद्बुद्ध होताहै उसीयोनिको जीव प्राप्त होताहै इससे योगही का अन्य जन्म होताद्दी है, क्योंकि मरणके समयमें हुई जो विक्लवता उसको अयोगी नहीं हटा सकता है सोई योगबीजमें कहाहै कि, देहके अंतसमयमें जिस २ को विचारता है वही वह जीव होजाता है यही जन्मका कारण है देहके अंतमें कौन जन्म होगा यह मनुष्य नहीं जानते हैं-तिससे ज्ञान, वैराग्य, जप ये केवल श्रम हैं -जब पिपीलिका ( चेटी ) देहमें लगजाती है और ज्ञानसे छुटजाती है वृश्चिकोंसे डसा हुआ यह जीव देहके अंतमें कैसे सुखी हो सकताहै-योगियोंको तो योगके बलसे अंतकालमें भी आत्मविचारसे मोक्षही होताहै जन्मांतर नहीं, होता है सोई भगवान्ने कहा है कि मरण समयमें अचल मनसे भक्तिसे युक्त चा योगके बलसे मोक्ष होताहैं और यह श्रुतिभी है कि एकसौ एक हृदयकी नाडी हैं कदाचित् कहो कि, तत्त्वमसि आदि वाक्यको अपरोक्षज्ञानका जनक मानोगे तो उसका विचार करना व्यर्थ है, सो ठीक नहीं क्योंकि वाक्यके
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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २०७ विचारसे उत्पन्न जो ज्ञान है वह योगके द्वारा अपरोक्ष साधन है इसविषयमें योगबीजमें गौरी और महादेवका बहुत संवादहै उसमेंसे कुछ यहां लिखते हैं कि पार्वती बोली जो ज्ञानी मरते हैं उनकी कैसी गति होती है-हे देवेश! हे दयारूप अमृत समुद्र! इसको कहो. ईश्वर बोले कि, देहके अंतमें ज्ञानीको पुण्य पापसे जो फल प्राप्त होता है उसको भोगकर फिर ज्ञानी होजाताहैं फिर पुण्यसे सिद्धोंके संग संगतिको प्राप्त होता है फिर सिद्धोंकी कृपासे योगी होताहै अन्यथा नहीं होता, फिर संसार नष्ट होजाता है अन्यथा नहीं । यह शिवका कथनहै. पार्वती बोली ज्ञानी सदा ज्ञानसेही मोक्षको कहते हैं तो सिद्धयोगसे योग मोक्षका दाता कैसे होजाता है? ईश्वर बोले ज्ञानसे मोक्ष होताहै यह उनका वचन अन्यथा नहीं है -जैसे सब कहते हैं कि, खड्गसे जय होताहै तो युद्ध और वीर्यके विना जयकी प्राप्ति कैसे होगी-तैसेही योगरहित ज्ञानसे मोक्ष नहीं होताहै इत्यादि-कदाचित कोई शंका करें कि, जनक आदिकोंको योगके विनाही प्रतिबंध रहित ज्ञान और मोक्ष सुने जाते हैं तो कैसे योगसेही प्रतिबंधरहित ज्ञान और मोक्ष होंगे-इस शंकाका उत्तर देते हैं कि, उनको पूर्वजन्ममें किये योगसे उत्पन्न जो संस्कार उससे ज्ञानकी प्राप्ति पुराण आदिमें सुनी जाती हैं सोई दिखा- तेहैं कि जैसे जैगीषव्य ब्राह्मण और असित आदि ब्राह्मण और जनक आदि क्षत्रिय और तुलाधार आदि वैश्य ये पूर्वजन्ममें किये अभ्यासके योगसे परमसिद्धिको प्राप्त ये और धर्मव्याध आदि सात शूद्र पैलवकआदि -और मैत्रेयी सुलभा शार्ङ्ग-शांडिली ये तपस्विनी -ये और अन्य बहुतसे नीचयोनिमें गतभी पूर्वजन्ममें किये अभ्यासके योगसे परमज्ञाननिष्ठाको प्राप्त हुये और पूर्वजन्ममें किये योगके पुण्यके अनुसार कोई ब्रह्मा कोई ब्रह्माके पुत्र कोई देवर्षि कोई ब्रह्मर्षि कोई मुनि कोई भक्तरूपको प्राप्त हुये हैं-और उपदेशके विनाही आत्मसाक्षात्कारवाले हो जायँगे सोई दिखातेहैं कि हिरण्यगर्भ, वसिष्ठ, नारद, सनत्कुमार, वामदेव, शुक आदि ये पुराण आदिमें जन्मसेही सिद्ध सुनेहैं और जो पुराण आदिमें यह सुनाहै कि, ब्राह्मणही मोक्षका अधिकारी है - वह योगीसे भिन्नके विषयमें समझना सोई गरुडपुराणमें कहाहै कि, जन्मांतरमें किया योगाभ्यास जिन मनुष्योंको नहींहै उनको योगप्राप्तिके लिये शूद्र वैश्य आदिका क्रम है वे स्त्रीसे शूद्र होतेहैं और
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( ) | [ २०८ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः शूद्रसे वैश्य होतेहैं और दयासे रहित क्षत्रिय होजाते हैं फिर अनूचान ( विद्या-वान् ) –यज्ञका कर्ता -फिर कर्मसंन्यासी होते हैं फिर ज्ञानी योगी होकर क्रमसे मुक्तिको प्राप्त होजाते हैं अर्थात् शूद्र वैश्य आदि क्रमसे योगी होकर मुक्तिको प्राप्त होजातेहैं इसप्रकार सब जातियों का अधिकार सुननेसे योगसे उत्पन्न तत्त्व- ज्ञानके द्वारा सब मुक्त होते हैं यह सिद्ध भया -और भ्रष्टभी योगीको तो शूद्र आदिका क्रम नहीं है क्योंकि भगवान्का यह वचनहै कि, योगसे भ्रष्टमनुष्य, शुद्ध जो धनी उनके कुलमें पैदा होताहै अथवा बुद्धिमान् योगियोंके कुलमें पैदा होताहै-इतिअलम्-भावार्थ यहहै कि, जबतक प्राण जी और मन न मरै तबतक इसलोकमें ज्ञान कहांसे होसकता है और जो मनुष्य प्राण औ मनका लयकरदे वह मोक्षको प्राप्त होता है अन्यमनुष्य किसीप्रकार भी प्राप्त नहीं होताहै ॥ १५ ॥
ज्ञात्वा सुषुम्रासद्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ॥ स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरंध्रे निरोधयेत् ॥ १६ ॥
प्राणमनसोर्लयं विना मोक्षो न सिध्यतीत्युक्तम् । तत्र प्राणलयेन मनसोऽपि लयः सिध्यतीति तल्लयरीतिमाह-ज्ञात्वेति ॥ सदैव सर्वदैव सुस्थाने शोभने स्थाने 'सुराज्ये धार्मिके देशे' इत्याद्यक्तलक्षणे स्थित्वा स्थितिं कृत्वा वसतिं कृत्वेत्यर्थः । सुषुम्ना मध्यनाडी तस्याः सद्भेदं शोभनं भेदनप्रकारं ज्ञात्वा गुरुमुखाद्विदित्वा वायुं प्राणं मध्यगं मध्यनाडीसंचारिणं कृत्वा ब्रह्मरंध्रे मृर्धावकाशे निरोधयेन्नितरां रुद्धं कुर्यात् । प्राणस्य ब्रह्मरंध्रे निरोधो लयः प्राणलये जाते मनोऽपि लीयते । तदुक्तं वासिष्ठे-'अभ्यासेन परिस्पंदे प्राणानां क्षयमागते । मनः प्रशममायाति निर्वाणमवशिष्यते ॥ ' इति । प्राणमनसोर्लये सति भावनाविशेषरूपसमाधिसहकृतेनांतः करणेनावाधितात्मसाक्षा- त्कारो भवति तदा जीवन्नेव मुक्तः पुरुषो भवति ॥ १६ ॥
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, ] - ( ) ४ संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २० ९ भाषार्थ--प्राण> और मनके लयविना मोक्ष सिद्ध नहीं होता यह कहा उनमें प्राणके लयसे मनकाभी लय सिद्ध होताहै इससे प्राणके लयकी रीतिका वर्णन करतेहैं कि, सदैव उत्तमस्थानमें अर्थात् उत्तमराज्य और धार्मिकदेशमें स्थितः होकर सुषुम्ना नाडीके भेदनको भलीप्रकार गुरुमुखसे जानकर और प्राणवायुको मध्यनाडीमें गत ( संचारी ) करके ब्रह्मरंध्र ( मूर्द्धा के अवकाश ) में निरुद्ध करे ( रोकै ) प्राणका ब्रह्मरंधमें जो निरोध वही लय है और प्राणके लय होनेपर: मनका भी लय होजाताहै सोई वासिष्ठमें कहा है कि अभ्याससे जब प्राणोंकी क्रियाका क्षय होजाताहै तब मन शांत होजाता है और निर्वाणही शेष रहजाताहै और प्राण और मनका लय होनेपर भावना विशेषरूप समाधि है सहकारी जिसकी ऐसे अंतःकरणसे अबाधित आत्मसाक्षात्कार जब होजाताहै तब पुरुष जीवन्मुक्त होजाताहै ॥ १६ ॥
सूर्याचंद्रमसौ धत्तः कालं रात्रिंदिवात्मकम् ॥ भोकी सुषुम्ना कालस्य गुह्यमेतदुदाहृतम् ॥ १७ ॥
प्राणलये कालजयो भवतीत्याह-सूर्याचंद्रमसाविति ॥ सूर्यश्च चंद्रमाश्च सूर्याचंद्रमसौ ॥ "देवताइंदे च" इत्यानङ् । रात्रिश्च दिवा च रात्रिंदिवम् । 'अचतुर' इत्यादिना निपातितः । रात्रिंदिवं आत्मा स्वरूपं यस्य स रात्रिंदिवात्मकस्तं रात्रिंदिवात्मकं कालं समयं: धत्तो विधत्तः कुरुत: । सुषुम्ना सरस्वती कालस्य सूर्याचंद्रमोभ्यः कृतस्य रात्रिदिवात्मकस्य समयस्य भोकी भक्षिका विनाशिका । एत- रहस्यमुदाहृतं कथितम् । अयं भावः । सार्धं घटिकाद्वयं सूर्यो वहति सार्धं घटिकाद्वयं चंद्रो वहति । यदा सूर्यो वहति तदा दिनमुच्यते । यदा चंद्रो वहति तदा रात्रिरुच्यते । पंचघटिकामध्ये रात्रिंदिवात्मकः कालो भवति । लौकिकाहोरात्रमध्ये योगिनां द्वाद- शाहोरात्रात्मकः कालव्यवहारो भवति । तादृशकालमानेन जीवाना- मायुर्मानमस्ति । यदा सुषुम्नामार्गेण वायुर्ब्रह्मरंध्रे लीनो भवति । तदा रात्रिदिवात्मकस्य कालस्याभावादुक्तम् 'भोत्री सुषुम्ना कालस्य" १४
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( ) | [ २१० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः इतेि । यावद्ब्रह्मरंध्रे वायुलियते तावद्योगिन आयुर्वर्धते । दीर्घकाला- भ्यस्तसमाधियोगी पूर्वमेव मरणकालं ज्ञात्वा ब्रह्मरंध्रे वायुं नीत्वा कालं निवारयति स्वेच्छया देहत्यागं च करोतीति ॥ १७ ॥
भावार्थ--अब प्राणका लय होनेपर कालका जय होताहै इसको वर्णन करतेहैं कि सूर्य और चंद्रमा, रात्रिदिन हैं स्वरूप जिसके ऐसे कालको करतेहैं और सुषुम्ना जो नाडी है वह सररवतीरूप नाडी सूर्य और चंद्रमाके किये -रात्रिदिनरूप कालको भक्षण करनेवाली है अर्थात् नाशिका है यह गुप्त वस्तु कही है तात्पर्य यह है कि, अढाई घडीतक सूर्य बहताहै और अढाई घडी- तक चंद्रमा बहताहै जब सूर्यस्वर बहताहै वह दिन कहाताहै और जब चंद्रमा बहताहै तत्र रात्रि कहातीहै. इसप्रकार पांच घडीके मध्यमेही रात्रिदिनरूप काल होजाताहै लौकिक अहोरात्रके मध्यमें योगियोंके बारह अहोरात्र होतेहैं और उसी लौकिक कालके मानसे जीवोंकी आयुका प्रमाण है जब सुषुम्नाके मार्गसे वायु रंध्रमें लीन होजाताहै तब रात्रिदिनरूप कालके अभावसे कहा है कि, सुषुम्ना कालकी भोकी है जितने कालतक वायु ब्रह्मरंध्रमें लीन रहता है उतनेही कालतक योगियोंकी आयु बढतीहै बहुत कालतक कियाहै समाधिका अभ्यास जिसने ऐसा योगी पहिलेही अपने मरणसमयको जानकर और ब्रह्मरंध्रमें प्राण- वायुको लेजाकर कालका निवारण करताहै और अपनी इच्छासे देहका त्याग करता है ॥ १७ ॥
द्वासप्ततिसहस्राणि नाडीद्वाराणि पंजरे ॥ सुषुम्ना शांभवी शक्तिः शेषास्त्येव निरर्थकाः ॥ १८॥
द्वासप्ततीति ॥ पंजरे पंजरखच्छिरास्थिभिर्बद्धे शरीरे द्वाभ्यामधि-का सप्ततिः द्वासप्ततिःद्वासप्ततिसंख्याकानि सहस्राणि द्वासप्ततिसहस्राणि नाडीनां शिराणां द्वाराणि वायुप्रवेशमार्गाः संति सुपुन्ना मध्यनाडी शांभवी शक्तिरस्ति शं सुखं भवत्यस्माद्भक्तानामिति शंभुरीश्वरस्तस्येयं शांभवी ध्यानेन शंभुप्रापकत्वात् । शंभोराविर्भावजनकत्वाद्वाशांभवी । यद्वाशं सुखरूपो भवति तिष्ठतीति शंभुरात्मा तस्येयं