हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 221–230

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २११ शांभवी चिभिव्यक्तिस्थानत्वाद्ध्यानेनात्मसाक्षात्कारहेतुत्वाच्च । शेषा इडापिंगलादयस्तु निरर्थका एव निर्गतोऽर्थः प्रयोजनं यासां ता निर- काः । पूर्वोक्तप्रयोजनाभावात् ॥ १८ ॥

भाषार्थ -इस मनुष्यके पंजरमें अर्थात् पंजरके समान शिरा अस्थियोंसे बँधे- हुये शरीरमें बहत्तर सहस्र नाडियोंके द्वार हैं अर्थात् वायुप्रवेश होनेके मार्ग हैं उनमें सुषुम्ना जो मध्यनाडी है वह शांभवीं शक्ति है अर्थात् तिससे भक्तोंको सुखहो ऐसे शंभु ( शिवजी ) की शक्ति है क्योंकि वह नाडी ध्यानसे शंभुको प्राप्त करती है वा शंभुकी प्रकटताको पैदा करती है इसीसे शांभवी कहाती है अथवा शं ( सुख ) रूप जो टिकै उस आत्माको शंभु कहतेहैं उसकी जो शक्ति वह शांभवी कहाती है क्योंकि वह चैतन्यकी अभिव्यक्ति ( प्रकटता ) का स्थान है और ध्यानसे आत्माके साक्षात्कारका हेतु भी सुषुम्ना है और शेष जो इडा पिंगला आदि नाडी हैं वे सब निष्प्रयोजन हैं अर्थात् उनसे पूर्वोक्त प्रयोजन सिद्ध नहीं होताहै ॥ १८ ॥

वायुः परिचितो यस्मादग्निना सह कुंडलीम् ॥ बोधयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥ १ ९ ॥ वायुरिति ॥ यस्मात्परिचितोऽभ्यस्तो वायुस्तस्मादग्निना जठ- राग्निना सह कुण्डलीं शक्तिं बोधयित्वा अनिरोधतोऽप्रतिबंधा- त्सुषुम्नायां सरस्वत्यां प्रविशेत् वायोः सुषुम्नाप्रवेशार्थमभ्यासः कर्तव्य इत्यर्थः ॥ १ ९ ॥ भाषार्थ -जिससे परिचित अर्थात् अभ्यास किया वायु जठराग्निके संग कुडलीशक्तिको बोधन ( जगा ) करके निरोध ( रोक ) के अभावले सरस्वतीरूप सुषुम्नामें प्रविष्ट होजाताहै इससे वायुका सुषुम्नामें प्रवेशके लिये अभ्यास करना उचित है ॥ १ ९ ॥ प्राणे सिद्धयत्येव मनोन्मनी ॥ सुषुम्नावहिनि अन्यथात्वितराभ्यासाः प्रयासायैव योगिनाम् २०

पृष्ठ 222

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( ) | [ २१२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः सुषुम्नेति ॥ प्राणे सुषुम्नावाहिनि सति मनोन्मनी उन्मन्य- वस्था सिद्धयत्येव । अन्यथा प्राणे सुषुम्नावाहिन्यसति तु इतरा- भ्यासाः सुषुम्नेतराभ्यासा योगिनां योगाभ्यासिनां प्रयासायैव श्रमा- यैव भवतीत्यर्थः ॥ २० ॥

भाषार्थ--जब प्राण सुषुम्नामें बहने लगताहै तब मनोन्मनी अवश्य सिद्ध होजातीहै और प्राणके सुषुम्नावाही न होनेपर तो सुषुम्नाके अभ्याससे भिन्न जितने अभ्यास योगियोंके हैं वे सब वृथा हैं अर्थात् परिश्रमके ही जनक होनेसे उनसे कोई अर्थ सिद्ध नहीं होताहै ॥ २० ॥

पवनो बध्यते येन मनस्तेनैव बध्यते ॥ मनश्च बध्यते येन पवनस्तेन बध्यते ॥ २१ ॥

पवन इति ॥ येन योगिना पवनः प्राणवायुर्बध्यते बद्धः क्रियते

तेनैव योगिना मनो बध्यते । येन मनो बध्यते तेन पवतो बध्यते ।

मनः पवनयोरेकतरे बद्धे उभयं बद्धं भवतीत्यर्थः ॥ २१ ॥

भाषार्थ -योगी जिससे पवनका बंधन करलेताहै उसीसे मनको भी बंधन करता है और जिस कारणसे मनका बंधन करसकता है उसी रीतिसे प्राण- कोभी बांध सकता है अर्थात् मन और पवन इन दोनोंमेंसे एकके बंधनसे दोनोंका बंधन हो सकता है ॥ २१ ॥

हेतुद्रयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः ॥ तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तौ द्वावपि विनश्यतः ॥ २२ ॥

हेतुद्रयं तु चित्तस्येति ॥ चित्तस्य प्रवृत्तौ हेतुद्रयं कारणद्वय-मस्ति किं तदित्याह-वासना भावनाख्यः संस्कारः समीरणः प्राणवा-युश्च तयोर्वासनासमीरणयोरेकस्मिन्विनष्टे सति क्षीणे सति तौ द्वावपि विनश्यतः । अयमाशयः । वासनाक्षये समीरणचित्ते क्षीणे भवतः । समीरणे क्षीणे चित्तवासने क्षीणे भवतः । चित्ते क्षीणे समीरणवासने क्षीणे भवतः । तदुक्तं वासिष्ठे -'दे बीजे राम चित्तस्य प्राणस्यंदनवा-सने । एकस्मिश्च तयोर्नष्टे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः ॥ ' तत्रैव व्यतिरे-

पृष्ठ 223

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २१३ केणोक्तम्-'यावद्विलीनं न मनो न तावद्वासनाक्षयः । न क्षीणा वासना यावच्चित्तं तावन्न शाम्यति ॥ न यावद्याति विज्ञानं न तावच्चित्तसंक्षयः । यावन्न चित्तोपशमो न तावत्तत्त्ववेदनम् ॥ यावन्न वासनाना-शस्तावत्तत्त्वागमः कुतः । यावन्न तत्त्वसंप्राप्तिर्न तावद्वासनाक्षयः ॥ तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासनाक्षय एव च । मिथः कारणतां गत्वा-दुःसाध्यानि स्थितान्यतः ॥ त्रय एते समं यावन्न स्वभ्यस्ता मुहुर्मुहुः । तावन्न तत्त्वसंप्राप्तिर्भवत्यपि समाश्रितैः ॥ ' इति ॥ २२ ॥

भाषार्थ -चित्तकी प्रवृत्तिमें दो हेतु हैं एक तो वासना अर्थात् भावना नामका संस्कार और प्राणवायु, वासना और प्राणवायु इन दोनोंमेंसे एकके नष्ट होनेपर वे दोनोंभी नष्ट हो जाते हैं -यहां यह आशय है कि, वासनाके क्षय होनेपर -पवन और चित्त नष्ट होजातेहैं और पवनके क्षीण होनेपर चित्त और वासना नष्ट होजातेहैं --और चित्तके क्षीण होनेपर पवन और वासना क्षीण होजातेहैं -सोई वासिष्टमें कहाहै कि, हे राम! प्राणकी क्रिया और वासना ये दोनों चित्तके बीज हैं उन दोनोंके मध्यमें एकके नष्ट होनेपर वे दोनोंभी नष्ट होजातेहैं —और वासिष्ठमें ही व्यतिरेक ( निषेध ) के द्वारा कहा है कि जबतक मनका लय नहीं होता तबतक वासनाका क्षय नहीं होताहै और इतने वास- नाका क्षय नहीं होता तब तक चित्त शांत नहीं होताहै और जबतक विज्ञान नहीं होता तबतक चित्तका संक्षय नहीं होता है -और जबतक चित्त शांत नहीं होता तबतक तत्त्वज्ञान नहीं होता है और जबतक वासनाका नाश न हो तबतक तत्त्वका आगमन कहां-और जबतक तत्त्वका आगम ( प्राप्ति ) न हो तबतक वासनाका क्षय नहीं होता-इससे तत्त्वज्ञान मनका नाश और वासनाका क्षय ये तीनों परस्पर कारण होकर दुःखसे साध्यरूप होकर स्थित हैं इससे जबतक इन तीनोंका समरीतिसे वारंवार अभ्यास न किया जाय तबतक अन्य कारणोंसे तत्त्व ( ब्रह्मज्ञान ) की संप्राप्ति नहीं होती है ॥ २२ ॥

मनो यत्र विलीयेत पवनस्तत्र लीयते ॥ पवनो लीयते यत्र मनस्तत्र विलीयते ॥ २३ ॥

पृष्ठ 224

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( ) [: २१४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश मन इति ॥ यत्र यस्मिन्नाधारे मनो लीयते तत्र तस्मिन्नाधारे पवनो विलीयत इत्यन्वयः ॥ २३ ॥

भाषार्थ-जिसमें मनका लय होता है वहांही पवनका लय हो जाता है और जहां पवनका लय होता है वहां ही मनभी लीन हो जाता है ॥ २३ ॥

दुग्धबुवत्संमिलितावुभौ तौ तुल्यक्रियौ मानस- मारुतौ हि ॥ यतो महत्तत्र मनःप्रवृत्तिर्यतो मन- स्तत्र मरुत्प्रवृत्तिः ॥ २४ ॥

दुग्धबुवदिति ॥ दुग्धांबुवत्क्षीरनीरवत्संमिलितौ सम्यक मिलितौ night द्वावपि मानसमारुतौ मानसं च मारुतश्च मानसमारुतौ चित्तप्राणौ तुल्यक्रियौ तुल्या समा क्रिया प्रवृत्तिर्ययोस्तादृशौ भवतः तुल्यक्रियत्वमेवाह -यत इति । यतः यत्र सार्वविभक्तिकस्तसिः । यस्मिन् चक्रे मरुद्वायुः प्रवर्तते तत्र तस्मिन् चक्रे मनःप्रवृत्तिः मनसः प्रवृत्तिर्भवति । यतो यस्मिन् चक्रे मनः प्रर्वत्तते तत्र तस्मिञ्च मरुत्प्रवृत्तिः वायोः प्रवृत्तिर्भवतीत्यर्थः । तदुक्तं वासिष्ठे-'अविनाभा- विनी नित्यं जंतूनां प्राणचेतसी । कुसुमामोदवन्मिश्रे तिलतैले इवा- स्थिते ॥ कुरुतश्च विनाशेन कार्य मोक्षाख्यमुत्तमम्' इति ॥ २४ ॥

भाषार्थ - दूध और जलके समान मिलेहुये मन और पवनरूप जो चित्त और प्राण हैं वे दोनों तुल्यक्रिय हैं अर्थात् दोनोंकी प्रवृत्ति तुल्य होती है अर्थात् जिस नाडियोंके चक्रमें वायु प्रवृत्त होताहै उसी चक्रमें मनकी प्रवृत्ति होती है और जिस चक्रमें मन प्रवृत्त होता है उसी चक्रमें वायुकी प्रवृत्ति होती है सोई वासिष्ठमें कहा है कि, प्राणियोंके प्राण और चित्त दोनों अविनाभावी हैं अर्थात् एकके बिना एक नहीं होसकता है और पुष्प और सुगंधके समान मिलेहुए तिल और तेलके समान स्थित हैं और ये अपने विनाशसे मोक्षरूप उत्तम कार्यको करते हैं ॥ २४ ॥

पृष्ठ 225

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, ] - ( ) ४ संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २१५

तत्रैकनाशादपरस्य नाश एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्तिः ॥

अध्वस्तयोश्चैद्रियवर्गवृत्तिः प्रध्वस्तयोर्मोक्षपद- स्य सिद्धिः ॥ २५ ॥

तत्रेति ॥ तत्र तयोर्मानसमारुतयोर्मध्ये एकस्य मानसस्य मारुतस्य वा नाशाल्लयादपरस्यान्यस्य मारुतस्य मानसस्य वा नाशो लयो भव-ति । एकप्रवृत्तेरेकस्य मानसस्य मारुतस्य वा प्रवृत्तेर्व्यापारादपरप्रवृ-तिरपरस्य मारुतस्य मानसस्य वा प्रवृत्तिर्व्यापारो भवति । अध्वस्तयो- रलीनयोर्मानसमारुतयोः सतोरिंद्वियवर्गवृत्तिरिद्रियसमुदायस्य स्वस्व- विषये प्रवृत्तिर्भवति । प्रध्वस्तयोः प्रलीनयोस्तयोः सतोर्मोक्षपदस्य मोक्षाख्यपदस्यसिद्धिर्निष्पत्तिर्भवति । तयोर्लये पुरुषस्य स्वरूपेऽव- स्थानादित्यर्थः । 'तत्रापि साध्यः पवनस्य नाशः पडंगयोगादिनिषे- वणेन । मनोविनाशस्तु गुरोः प्रसादान्निमेषमात्रेण सुसाध्य एव ॥ " योगबीजे मूलश्लोकस्यायमुत्तरः श्लोकः ॥ २५ ॥

भाषार्थ उन दोनों पवन और मनके मध्यमें एक मन वा पवनके नाशसे दूसरे पवन वा मनका नाश होता है और एक मन वा पवनके व्यापारसे दूसरे मन वा पवनका व्यापार होता है और जबतक मन और पवन नष्ट नहीं होते तबतक संपूर्ण इन्द्रियोंका समुदाय अपने २ विषयमें प्रवृत्त होता है और जन मन और प्राणका भलीप्रकार लय हो जाता है तब मोक्षरूप पदकी सिद्धि होती है, क्योंकि इन दोनोंका लय होनेपर पुरुषकी अपने स्वरूपमें स्थिति होजाती है और इस मूलके श्लोकका उत्तरश्लोक योगबीजमें यह लिखाहै कि, षडंगयोग आदिके सेवनसे पवनका नाश साधन करने योग्य है और मनका विनाश तो गुरु प्रसादद्वारा निमेषमात्रसे सुसाध्य है ॥ २ ९ ॥ रसस्य मनसश्चैव चंचलत्वं स्वभावतः ॥ रसो बद्धो मनो बद्धं किं नसिद्ध्यति भूतले॥ २६॥

पृष्ठ 226

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( ) | [ २१६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः रसस्येति ॥ रसस्य पारदस्य मनसो मानसस्य स्वभावतः स्वभावा- चंचलत्वं चांचल्यमस्ति । रसः पारदो वद्धश्चेन्मनश्चित्तं बद्धं भवति । ततो भूतले पृथिवीतले किं न सिद्ध्यति सर्वं सिद्धयतीत्यर्थः ॥ २६ ॥

भाषार्थ-और रस ( पारा ) और मन ये दोनों स्वभावसे चंचल हैं यदि रस और मन ये दोनों बंधजायँ तो भूतलमें ऐसी वस्तु कौन है जो सिद्ध न हो सकै अर्थात् सब पदार्थ सिद्ध होसकते हैं ॥ २६ ॥

मूच्छितो हरते व्याधीन्मृतो जीवयति स्वयम् ॥ बद्धः खेचरतां धत्ते रसो वायुश्च पार्वति ॥ २७ ॥

तदेवाह- मूच्छित इति ॥ औषधिविशेषयोगेन गतचापलो रसो मूर्च्छितः कुम्भकांते रेचकनिवृत्तो वायुर्मूच्छित इत्युच्यते । हे पार्व- ती पार्वतीसुबोधायेश्वरवाक्यम् । मूच्छितो रसः पारदो वायुः प्राणश्च व्याधीन् रोगान् हरते नाशयति । भस्मीभूतो रसो ब्रह्मरंध्रे लीनो वायुश्च मृतः स्वयमात्मना स्वसामर्थ्येनेत्यर्थः । जीवयति दीर्घकालं जीवनं करोति | क्रियाविशेषेण गुटिकाकारकृतो रसः बद्धो भ्रूमध्यादौ धारणाविशेषेण धृतो वायुश्च बद्धः खेचरतामाकाशगति धत्ते विधत्ते करोतीत्यर्थः । तदुक्तं गोरक्षकशतके-' यद्भिन्नांजनपुंज- सन्निभमिदं वृत्तं भ्रुवोरंतरे तत्त्वं वायुमयं पकारसहितं तत्रेश्वरो देवता । प्राणं तत्र विलाप्य पंचघटिकं चित्तान्वितं धारयेदेषा खे गमनं करोति यमिनां स्याद्वायुना धारणा' इति ॥ २७ ॥

भाषार्थ- औषधिविशेषके योगसे नष्टहुईहै चपलता जिसकी ऐसा रस मूच्छित कहाताहै और कुंभकके अंतमें रेचकसे निवृत्त वायुको मूच्छित कहतेहैं. हे पार्वती! च्छित कियाहुआ पारद और प्राणवायु संपूर्ण रोगोंको नष्ट करता है और मारा-हुआ अर्थात् भस्म कियाहुवा पारा और ब्रह्मरंध्रमें लीन प्राणवायु, यह अपने सामर्थ्यसे मनुष्यको दीर्घकालतक जिवा सकता है और बद्ध किये हुए वे दोनों अर्थात् क्रियाविशेषसे गुटिकाकार किया हुआ पारा और भ्रुकुटिके धारणविशेषसे *धारण कियाहुआ प्राणवायु ये दोनों आकाशगतिको करते हैं अर्थात् वह योगी

पृष्ठ 227

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8. ] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २१७ पक्षियोंके समान आकाशमें उडसकताहै सोई गोरक्षकशतकमें कहाहै कि, भिन्नां-जन पुंजके समान अर्थात् पिसे हुए अंजनके समूहकी तुल्य गोलाकार वायुरूप और पकार सहित तत्त्व ( प्राण ) भ्रुकुटियोंके मध्यमें है उस तत्त्वका ईश्वर देवता है उस ईश्वरमें प्राणको चित्तसहित लय करके पांचघटी पर्यंत धारण करै, यह चायुके संग चित्तकी धारणा योगीजनोंका आकाशमें गमन करती है । २७ ॥ मनःस्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिंदुः स्थिरो भवेत् ॥ बिंदुस्थैर्यात्सदा सत्त्वं पिंडस्थैर्य प्रजायते ॥ २८ ॥

मनःस्थैर्य इति ॥ मनसः स्थैर्ये सति वायुः प्राणः स्थिरो भवेत् । ततो वायुस्थैर्याद्विदुर्वीर्य स्थिरो भवेत् । बिंदोः स्थैर्यात्सदा सर्वदा सत्त्वं बलं पिंडस्थैर्य देहस्थैर्य प्रजायते ॥ २८ ॥

भाषार्थ -मनकी स्थिरता होनेपर प्राणभी स्थिर होताहै और बायकी

स्थिरतासे वीर्यकी स्थिरता होती है और वीर्यकी स्थिरतासे सदैव बल होताहै ।

और उससेही देहकी स्थिरता होतीहै ॥ २८ ॥

इंद्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः॥ २९ ॥

इंद्रियाणामिति ॥ इंद्रियाणां श्रोत्रादीनां मनोऽतःकरण नाथः प्रवर्तकः । मनोनाथो मनसो नाथो मारुतः प्राणः । मारुतस्य प्राणस्य यो मनोविलय नाथः । स लयो मनोलयः नादमाश्रितो नादे मनो लीयत इत्यर्थः ॥ २ ९ ॥ भाषार्थ- श्रोत्र आदि इन्द्रियोंका नाथ ( प्रवर्त्तक ) अंतःकरण - मनहै और मनका नाथ प्राणहै और प्राणका नाथ मनका लयहै और वह मनका लय नादके आश्रित है अर्थात् नादमें मनका लय होताहै ॥ २९ ॥

सोऽयमेवास्तु मोक्षाख्यो मास्तु वापि मतांतरे ॥ मनःप्राणलये कश्चिदानंदः संप्रवर्तते ॥ ३० ॥

पृष्ठ 228

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( ) | [ २१८ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः सोऽयमिति ॥ सोऽयमेव चित्तलय एव मोक्षाख्यो मोक्षपद- वाच्यः । मतांतरेऽन्यमते मास्तु वा । चित्तलयस्य सुषुप्तावपि सत्त्वा- न्मनःप्राणयोर्लये सति कश्चिदनिर्वाच्य आनंदः संप्रवर्तते सम्यक प्रवृत्तो भवति । अनिर्वाच्यानंदाविर्भावे जीवन्मुक्तिसुखं भवत्येवेति भावः ॥ ३० ॥

भाषार्थ-सो यही चित्तका लय मोक्षरूप है अर्थात् इसकोही मोक्ष कहते हैं अथवा मतांतरमें इसको मोक्ष मतमानों, क्योंकि चित्तका लय सुषुप्तिमें भी होता है तोभी मन और प्राणके लय होनेपर जो कुछ अकथनीय आनंद प्रकट होताहै उस अनिर्वचनीय आनंदके प्रकट होनेपर जीवन्मुक्ति रूप सुख 'अवश्य होताहै ॥ ३० ॥

प्रनष्टश्वासनिश्वासः प्रध्वस्तविषयग्रहः ॥ निश्चेष्टो निर्विकारश्च लयो जयति योगिनाम्॥ ३१ ॥

प्रनष्टेति ॥ श्वासश्च निश्वासश्च श्वासनिश्वासौ प्रनष्टौ लीनौ श्वास- निश्वासौ यस्मिन् स तथा बाह्यवायोरतः प्रवेशनं श्वासः अंतः स्थितस्य वायोर्वहिर्निःसरणं निश्वासः प्रध्वस्तः प्रकर्षेण ध्वस्तो नष्टो विषयाणां शब्दादीनां ग्रहो ग्रहणं यस्मिन् निर्गता चेष्टा कार्यक्रिया यस्मिन् निर्गतो विकारोंतःकरणक्रिया यस्मिन् एतादृशी योगिनां ल्योंऽतः- करणवृत्तेर्थ्येयाकारा वृत्तिर्जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते ॥ ३१ ॥

भाषार्थ -जिसमें श्वास और निःश्वास भलीप्रकार नष्ट होजाय अर्थात् बाह- की पवनका जो भीतर प्रवेश वह श्वास, और भीतरकी पवनका बाहर निका सना यह निःश्वास, यह दोनों जिसमें न रहें और इन्द्रियोंसे विषयोंका ग्रहण करनाभी जिससे भलीप्रकार नष्ट होजाय, और देहकी क्रियारूप चेष्टाभी जिसमें न रहै; और अंत: करणका क्रियारूप विकारभी जिसमें न हो, ऐसा जो योगि-योंका लय है अर्थात् ध्यान करने योग्य वस्तुके आकारकी जो अंतःकरणवृत्तिह वह सबसे उत्तमहै ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 229

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8] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २१ ९

उच्छिन्न सर्वसंकल्पो निःशेषाशेषचेष्टितः ॥

स्वावगम्यो लयः कोऽपिजायते वागगोचरः॥३२॥

उच्छिन्नेति ॥ उच्छिन्ना नष्टाः सर्वे संकल्पा मनःपरिणामा यस्मिन् स तथा निर्गतः शेषो येभ्यस्तानि निःशेषाण्यशेषाणि चेष्टि-तानि यस्मिन् स तथा स्वेनैवावगंतुं बोद्धुं शक्यः स्वावगम्यः वाचा--मगोचरो विषयः कोऽपि विलक्षणो लयः जायते योगिनां प्रादु-र्भवति ॥ ३२ ॥

भाषार्थ-जिसमें मनके परिणाम रूप संपूर्ण संकल्प नष्ट होगये हों और जिसमें संपूर्ण चेष्टित न रहे हों अर्थात् कर चरण आदिका व्यापार निवृत्त हो और जो अपने आपही जानने योग्य हो अर्थात् जिसको अन्य पुरुष न जानसके और जो वाणीकाभी अगोचर हो अर्थात् वाणीभी जिसको न कहसके ऐसा विलक्षण लय योगीजनोंको प्रगट ( उत्पन्न ) होताहै ॥ ३२ ॥

यत्र दृष्टियस्तत्र भूतद्वियसनातनी ॥ सा शक्तिर्जीवभूतानां द्वे अलक्ष्ये लयं गते ॥ ३३॥

- यत्र दृष्टिरिति ॥ यत्र यस्मिन्विषये ब्रह्मणि दृष्टिरंतःकरणव-तिस्तत्रैव लयो भवति । भूतानि पृथिव्यादीनि इंद्रियाणि श्रोत्रादीनि सनातनानि शाश्वतानि यस्यां सा सत्कार्यवादेऽविद्यायां कार्यजातस्य सत्त्वात् । जीवभूतानां प्राणिनां शक्तिर्विद्या इमे हे अलक्ष्ये ब्रह्मणि लयं गते योगिनामिति शेषः ॥ ३३ ॥

भाषार्थ - जिस ब्रह्मरूप विषयमें अंतःकरणकी वृत्ति होतीहै उसीमें मन लय होताहै और पृथ्वी आदि पंच महाभूत और श्रोत्र आदि इन्द्रिय ये जिसमें न हों वह अविद्या, क्योंकि सत्कार्यवाद मतमें अविद्यामें संपूर्ण कार्यका समूह रहता है.. सत्कार्यवाद यहहै कि, घट आदिकार्य सतुरूप है -और प्राणियोंकी शक्तिरूप विद्या, ये अविद्या और विद्यारूप दोनों अलक्ष्य ब्रह्ममेंही योगियोंके लय हो जातेहैं ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 230

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( ) [: २२० हठयोगप्रदीपिका । उपदेश लयो लय इति प्राहुः कीदृशं लयलक्षणम् ॥ अपुनर्वासनोत्थानाल्लयो विषयविस्मृतिः ॥ ३४ ॥

लय इति ॥ लय इति प्राहुर्वदंति बहवः । लयस्य लक्षणं लय-•स्वरूपं कीदृशमिति प्रश्नपूर्वकं लयस्वरूपमाह-अपुनरिति । अपुनर्वा सनोत्थानात्पुनर्वासनास्थानाभावाद्विषयविस्मृतिर्विषयाणां शब्दादीनां ध्येयाकारस्य विषयस्य वा विस्मृतिर्लयो लयशब्दार्थ इत्यर्थः ॥ ३४ ॥

भाषार्थ–बहुतसे मनुष्य लय ऐसा कहते हैं परंतु लयका लक्षण ( स्वरूप ) - क्याहै ऐसा कोई पूछे तो शब्द आदि संपूर्ण विषयोंकी वा ध्यान करनेयोग्य विषयकी जो विस्मृति उसको लय कहते हैं क्योंकि उस मनमें फिर वासना नहीं उठती हैं वा वह मन फिर घासनाओंका स्थान नहीं रहता है ॥ ३४ ॥

वेदशास्त्रपुराणानि सामान्यगणिका इव ॥ एकैव शांभवी मुद्रा गुप्ता कुलवधूरिव ॥ ३५ ॥

वेदेति ॥ वेदाश्चत्वारः शास्त्राणि षट् पुराणान्यष्टादश सामान्या गणिका इव वेश्या इव । बहुपुरुषगम्यत्वात् । एका शांभवी मुद्रैव

कुलवधूरिव कुलस्त्रीव गुप्ता । पुरुषविशेषगम्यत्वात् ॥ ३५ ॥

भाषार्थ -चारों वेद और छहशास्त्र और अष्टादश १८ पुराण ये सब सामान्य गणिका ( वेश्या ) के समानहैं क्योंकि ये अनेक पुरुषोंके जानने योग्य हैं - और एक पूर्वोक्त शांभवीमुद्राही कुलवधूके समान गुप्त है क्योंकि उसको कोई बिरला मनुष्य ही जानसकताहै ॥ ३५ ॥

अंतर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जिता ॥ एषा सा शांभवी मुद्रा वेदशास्त्रेषु गोपिता ॥ ३६ ॥

चित्तलयाय प्राणलयसाधनीभूतां मुद्रां विवक्षुस्तत्र शांभवी मुद्रा- माह- अंतर्लक्ष्यमिति ॥ अंतः आधारादिब्रह्मरंध्रांतेषु चक्रेषु मध्ये -स्वाभिमते चक्रे लक्ष्यमंतःकरणवृत्तिः । बहिर्देहाद्बहिः प्रदेशे दृष्टि