हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 231–240
हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 231–240
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8. ] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २२१ चक्षुःसंबंधः । कीदृशी दृष्टिः निमेषोन्मेषवर्जिता निमेषः पक्ष्मसंयोगः उन्मेषः पक्ष्मसंयोगविश्लेषः ताभ्यां वर्जिता रहिता चित्तस्य ध्येया- कारावेशे निमेषोन्मेषवर्जिता दृष्टिर्भवति । सोतैषा मुद्रा शांभवी शंभोरियं शांभवी शिवप्रिया शिवाविर्भावजनिका वा भवति । कीदृशी वेदशास्त्रेषु गोपिता वेदेषु ऋगादिषु शास्त्रेषु सांख्यपातंजलादिषु गोपिता रक्षिता ॥ ३६ ॥
भाषार्थ-चित्तके लार्थ प्राणलयका साधन जो शांभवीमुद्रा उसके कथ- नके अभिलाषी आचार्य - प्रथम शांभवीमुद्राका वर्णन करतेहैं कि, भीतरके जो आधार आदि चक्र हैं उनके मध्य में अपनेको अभीष्ट जो चक्रहो उसमें लक्ष्य ( अंतःकरणकी वृत्ति ) हो और बाहिरके विषयोंमें जो दृष्टि हो वह निमेष और उन्मेषसे वर्जित हो अर्थात् पक्षम ( पलक ) के संयोग और वियोगसे हीन हो, क्योंकि चित्तमें ध्यान करनेके योग्य जो वस्तु उसके आकारके आवेश होनेसे निमेष उन्मेष रहित प्रकाशितही नेत्र बने रहते हों- वेद और शास्त्रोंमें गुप्त यह मुद्रा अर्थात् ऋग्वेद आदि वेद और सांख्य पातंजल आदिशास्त्रोंमें भी छिपीहुई यह मुद्रा शांभवी कहतीहै कि, इससे शंभुका आविर्भाव ( प्रकटता ) होताहै वा यह मुद्रा शंभु भगवान्ने कहीहै ॥ ३६ ॥
अंतर्लक्ष्यविलीनचित्तपवनो योगी यदा वर्तते दृष्ट्या निश्चलतारया बहिरधः पश्यन्नपश्यन्नपि ॥ मुद्रेयं खलु शांभवी भवति सालब्धा प्रसादाद्वरो: शून्याशून्यविलक्षणं स्फुरति तत्तत्वं परं शांभवम्३७॥ शांभवी मुद्रामभिनीय दर्शयति-अंतर्लक्ष्यमिति ॥ यदा यस्या-मवस्थायामतः अनाहतपद्मादौ यल्लक्ष्यं सगुणेश्वरमूर्त्यादिकं तत्त्वम-स्यादिवाक्यलक्ष्यं जीवेश्वराभिन्नमहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थभूतं ब्रह्म वा तस्मिन्विलीनौ विशेषेण लीनौ चित्तपवनौ मनोमारुतौ यस्य स तथा योगी वर्तते निश्चलतारया निश्चला स्थिरा तारा कनीनिका यस्य
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( ) | | [ २२२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः दृश्य दृष्ट्या वहिर्देहाद्वहिःप्रदेशे पश्यन्नपि चक्षुः संबंधं कुर्वन्नपि अपश्यन् वाह्यविषयग्रहणमकुर्वन् वर्तते आस्ते । खल्विति वाक्या-लंकारे । इयमुक्ता शांभवी मुद्रा शांभवीनामिका मुद्रयति क्लेशानिति मुद्रा गुरोर्देशिकस्य प्रसादात्प्रीतिपूर्वकादनुग्रहालया प्राप्ता चेत्तदिद-मिति वक्तुमशक्यं शांभवं शांभवीमुद्रायां भासमानं पदं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदमात्मस्वरूपं शून्याशून्यविलक्षणं ध्येयाकारवृत्तेः सद्भावाच्छून्यविलक्षणं तस्या अपि भानाभावादशून्यविलक्षणं तत्त्वं वास्तविकं वस्तु स्फुरति प्रतीयते । तथाचोक्तम्-'अन्तर्लक्ष्यमनन्यधी- रविरतं पश्यन्मुदा संयमी दृष्टयुन्मेषनिमेषवर्जितमियं मुद्रा भवेच्छा- म्भवी ॥ गुप्तेयं गिरिशेन तंत्रविदुषा तंत्रेषु तत्त्वार्थिनामेषा स्याद्यमिनां मनोलयकरी मुक्तिप्रदा दुर्लभा ॥ १॥ ऊर्ध्वदृष्टिरधोदृष्टिरूर्ध्ववेधो ह्यधः- शिराः । राधायंत्रविधानेन जीवन्मुक्तो भवेत्क्षितौ । २ । ॥ ३७ ॥
भाषार्थ--अब शांभवीमुद्राके स्वरूपको घटाकर दिखातेहैं कि, जिस कालमें योगी इसप्रकार व अर्थात् स्थित रहें कि भीतर अनाहत ( निश्चल ) पद्म आदिमें जो सगुण मूर्ति आदि लक्ष्य है वा तत्त्वमसि आदि महावाक्योंसे लक्ष्य जो जीव ईश्वरके अभेदरूप में ब्रह्म हूं इस वाक्यका अर्थरूप ब्रह्म है उसमेंही विशेषकर जिसके चित्त और पवन ( प्राण ) ये दोनों लीनहों और निश्चल हैं तारेजिसमें ऐसी दृष्टि ( नेत्र ) से देहसे बाहिरके देशमें देखताहुआभी अद्रष्टाके समान हो अर्थात् बाहिरके विषयको न जानताहुआ अधोदृष्टि रहताहै- यह 'पूर्वोक्त शांभवी नामकी मुद्रा है और जो क्लेशोंको छिपाले उसे मुद्रा कहते हैं -यदि यह मुद्रा गुरुके प्रसादसे प्राप्त होजाय तो वह शांभव शंभुभगवान्का तत्त्व जिसको इसप्रकार नहीं बतासकते कि, यहहै शांभवीमुद्रामें भासमान वह योगियोंको प्राप्त होने योग्य आत्मारूप तत्त्व अर्थात् ध्येयाकार वृत्तिके होनेसे शून्यसे विलक्षण और अंतमें ध्येयाकार वृत्तिकेभी अभावसे अशून्यसे विलक्षण चास्तविक वस्तु योगीजनोंके मनमें स्फुरती है अर्थात् प्रतीत होती है - सोई कहा है कि अनन्यबुद्धि होकर अर्थात् अन्यविषयमें बुद्धिको न लगाकर भीतरके लक्ष्य
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J - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २२३ ( ब्रह्म ) को दृष्टि उन्मेष निमेषसे वर्जित नेत्रोंसे निरंतर आनंदसे देखताहुआ संमी ( योगी ) होतो यह शांभवी मुद्रा होती है और तंत्रके ज्ञाता गिरीश ( शिव ) ने यह गुप्त रक्खी है और यह दुर्लभमुद्रा तत्त्वके अभिलाषी योगि- जनोंके मनको लय करती है और मुक्तिको भलीप्रकार देती है और ऊर्ध्व और अधोदृष्टि होकर और ऊर्ध्ववेध और अधः–शिर होकर स्थित योगी इस राधायंत्रके विधानसे भूमिमें रहताहुआभी जीवन्मुक्त होता है--भावार्थ यह है कि, भीतरके लक्ष्यमें लयहुये हैं चित्त पवन जिसके और निश्चल हैं तारा जिसके ऐसी दृष्टिले बाहिरके विषयको देखताहुआभी न देखनेके समान हो ऐसे योगीकी यह शांभवीमुद्रा होती है यदि यह गुरुके प्रसादसे प्राप्त हो जाय तो योगीको शून्य अशून्यसे विलक्षण जो शंभुका पदरूप परम तत्त्व है वह प्रतीत होताहै ॥ ३७ ॥
श्रीशांभव्याश्च खेचर्या अवस्थाधामभेदतः ॥ भवेच्चित्तलयानंदः शून्ये चित्सुखरूपिणि ॥ ३८ ॥
श्रीशांभव्या इति ॥ श्रीशांभव्याः श्रीमत्याः शांभवी मुद्रायाः खेचरीमुद्रायाश्वावस्थाधामभेदतः अवस्थावस्थितिर्धाम स्थानं तयो- भेदाच्छांभव्यां वहिर्दृष्ट्या बहिःस्थितिः खेचर्या भ्रूमध्यदृष्ट्याव- स्थितिः । शांभव्यां हृदयभावनादेशः खेचर्यां भ्रूमध्य एव देशः । तयोर्भेदाभ्यां शून्ये देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्ये सजातीयविजातीय- स्वगतभेदशून्ये या चित्सुखरूपिणि चिदानंदस्वरूपिण्यात्मनि चित्त-लयानंदो भवेत्स्यात् । श्रीशांभवीखेचर्योरवस्थाधामरूपसाधनांशे भेदः, नतु चित्तलयानंदरूपफलांश इति भावः ॥ ३८ ॥
भाषार्थ-इस पूर्वोक्त श्रीमती शांभवीमुद्राके और खेचरीमुद्राके द्वारा अवस्था और धाम ( स्थान ) के भेदसे अर्थात् शांभवीमुद्रामें बाहिर दृष्टि बहिःस्थिति और खेचरीमुद्रामें भ्रुकुटीके मध्यमें दृष्टिसे स्थिति होती है और शांभवीमें हृदय भावनाका देश है और खेचरीमें भ्रुकुटीका मध्यही देश है इन दोनों भेदोंसे देश काल वस्तुके परिच्छेदसे और सजातीय विजातीय
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( ) [ २२४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः स्वगतरूप भेदसे शून्य ( रहित ) चिदानंद स्वरूप आत्मामें चित्तके लयका आनंद होता है अर्थात् दोनों शांभवी खेचरीमुद्राओंका अवस्था और धाम-रूप साधन अंशमें तो भेद है और चित्तलयके आनंदरूप फलके अंशमें भेद नहीं है ॥ ३८ ॥
तारे ज्योतिषि संयोज्य किंचिदुन्नमयेद्ध्रुवौ ॥ पूर्वयोगं मनो युंजन्तुन्मनीकारकः क्षणात् ॥ ३ ९ ॥ उन्मनीमुद्रामाह-तारे इति ॥ तारे नेत्रयोः कनीनिके ज्योतिषी तारयोर्नासाग्रे योजनात्प्रकाशमाने तेजसि संयोज्य संयुक्त कृत्वा व किंचित्स्वल्पमुन्नयेदूर्ध्वं नयेत् । पूर्वः पूर्वोक्तोंऽतर्लक्ष्यबहिर्दृष्टिरि त्याकारको योगो युक्तिर्यस्मिन् तत्तादृशं मनोंतःकरणं युंजन् युक्तं कुर्वन् योगी क्षणान्मुहूर्तादुन्मनीकारण उन्मन्यवस्थाकारको भवति ॥ ३ ९ ॥ भाषार्थ - अब उन्मनीमुद्राका वर्णन करते हैं कि, नेत्रोंकी कनीनिकारूप तारोंको ज्योतिमें अर्थात् तारोंको नासिकाके अग्रभागमें संयोग करनेसे प्रकाश- मान जो तेज उसमें संयुक्त करके भ्रुकुटियोंको किंचित् ( कुछेक ) ऊपरको करदे और पूर्वोक्त जो अंत:लक्ष्य बहि: दृष्टि ( भीतर लक्ष्य बाहिर दृष्टि ) रूप योग है जिसमें ऐसा अंत: -करण ( मन ) उसको युक्त करता हुआ योगी क्षणमात्रमें उन्मनी अवस्थाका कारक होताहै अर्थात् पूर्वोक्त अवस्थासे स्थित योगी उन्मनीमुद्रा होती है ॥ ३९ ॥
केचिदागमजालेन केचिन्निगमसंकुलैः ॥ केचित्तर्केण मुति नैव जानंति तारकम् ॥ ४० ॥
उन्मनीमंतराऽन्यस्तरणोपायो नास्तीत्याह -केचिदिति ॥ केचि- च्छास्त्रतंत्रादिविदः आगच्छंति बुद्धिमारोहंत्यर्था एभ्य इत्यागमाः शास्त्रतंत्रादयस्तेषां जालैर्जालवबंधनसाधनैस्तदुक्तैः फलैर्मुह्यंति मोहं प्राप्नुवंति । तत्रासक्ता बध्यंत इति भावः । केचिद्वैदिका निगमसंकुलै-
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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २२५ निगमानां निगमोक्तानां संकुलैः फलबाहुल्यैर्मुह्यति । केचिद्वैशेषिका- दयस्तर्केण स्वकल्पितयुक्तिविशेषेण मुह्यंति । तारयतीति तारकस्तं
तारकं तरणोपायं नैव जानंति । उक्तोन्मन्येव तरणोपायस्तं न जानं-तीत्यर्थः ॥ ४० ॥
भाषार्थ - अत्र इसका वर्णन करते हैं कि, उन्मनीके विना अन्य तरनेका उपाय नहीं है कि, कोई शास्त्र और तंत्र आदिके ज्ञाता आगमके जालसे अर्थात् जिससे बुद्धिमें पदार्थ आजाय उन्हें आगम कहते हैं वे शास्त्र और तंत्र- रूपोंके समूहसे मोहको प्राप्त होजाते हैं अर्थात् जालके समान बंधनके कर्ता जो शास्त्रतंत्रमें कहुये फल उनमेंही मोहित रहते हैं उनमें आसक्त हुये बंध जाते हैं- और कोई निगम ( वेद ) में कहे जो फलोंके समुदाय उससेही मोहित रहते हैं--और कोई वैशेषिक आदि अपनी कल्पना कियेहुये जो युक्तिरूप विशे- तर्क उनसेही मोहित रहते हैं-परंतु तारकको नहीं जानते हैं अर्थात् संसार- समुद्रके तरनेका उपाय जो पूर्वोक्त उन्मनी उसको नहीं जानते हैं-भावार्थ यह है कि, कोई शास्त्र और तंत्रके जालसे कोई वेदोक्त फलोंसे--कोई तर्कसे--मोहित रहते हैं परंतु उन्मनीरूप तारकको नहीं जानते हैं ॥ ४० ॥
अर्धोन्मीलितलोचनः स्थिरमना नासाग्रदत्तेक्षण- चंद्रावपि लीनतामुपनयन्त्रिष्पदभावेन यः ॥ ज्योतीरूपमशेषबीजमखिलं देदीप्यमानं परं तत्त्वं तत्पदमेति वस्तु परमं वाच्यं किमत्राधिकम् ॥ ४१ ॥
अर्धोन्मीलितेति ॥ अर्धम् उन्मीलिते अर्धोन्मीलिते अर्धोन्मी- लिते लोचने येन स अर्धोन्मीलितलोचनः अर्धोद्घाटितलोचन इत्यर्थः । स्थिरं निश्चलं मनो यस्य स स्थिरमना नासाया नासिकाया अग्रभागे नासिकायां द्वादशांगुलपर्यंते वा दत्ते प्रहिते ईक्षणे येन स नासाग्रदत्ते- क्षणः । तथाह वसिष्ठ: -'द्वादशांगुलपर्यंते नासाग्रे विमलें बरे । संवि-दशोः प्रशाम्यंत्योः प्राणस्पंदो निरुध्यते ॥ ' इति । निस्पंदस्य निश्व- १५
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( ) | [ २२६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः लस्य भावो निस्पंदभावः कायेंद्रियमनसां निश्चलत्वं तेन चंद्राक चंद्रसूर्यावपि लीनतां लीनस्य भावो लीनता लयस्तमुपनयन्प्रापय- न्कायेंद्रियमनसां निश्चलत्वेन प्राणसंचारमपि स्तंभयन्नित्यर्थः । तदुक्तं प्राकू-'मनो यत्र विलीयेत' इत्यादिपूर्वोक्तविशेषणसंपन्नो योगी ज्योतीरूपं ज्योतिरिवाखिलप्रकाशकं रूपं यस्य स तथा तमशेषबी- जमाकाशाद्युत्पत्तिद्वारा सर्वकारणमखिलं पूर्ण देदीप्यमानमतिशयेन दीप्यत इति देदीप्यमानं तत्तथा स्वप्रकाशकं परं कायेंद्रियमनसां साक्षिणं तत्त्वमनारोपितं वास्तविकमित्यर्थः । तदिदमिति वक्तुमशक्यं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदं परमं सर्वोत्कृष्टं वस्तु आत्मस्वरूपं एति प्राप्नोति । उन्मन्यवस्थायां स्वस्वरूपावस्थितो योगी भवतीत्यर्थः । अत्राधिकं किं वाच्यम् । अपरं वस्तु प्राप्नोतीत्यत्र किं वक्तव्य- मित्यर्थः ॥ ४१ ॥
भाषार्थ-आधे उन्मीलित किये ( खोले ) है नेत्र जिसने और निश्चल है। मन जिसका और नासिकाके बारह अंगुलपर्यंत अग्रभागमें लगाये हैं नेत्र जिसने— सोई वसिष्टने कहा कि, द्वादश अंगुल पर्यंत निर्मल जो नासिकाके अग्रभागमें आकाश उसमें यदि ज्ञान, दृष्टि दोनों भलीप्रकार शांत होजायँ तो प्राणोंका स्पंद ( गति ) रुक जाती हैं -ऐसा योगी और देह इंद्रिय मन इनके निस्पंदभाव ( निश्चलता ) से चंद्रमा और सूर्यर्की भी लीनताको करताहुआ अर्थात् देह, मन, इंद्रियोंकी निश्चलतासे प्राणके संचारको भी रोकताहुआ सोई कहभी आये हैं कि, जहां मनभीं विलय हो जाता है- इसपूर्वोक्त प्रकारका योगाभ्यासी ज्योतिके समान सबका प्रकाशक -और आकाश आदिकी उत्पत्तिके द्वारा सबका कारण और अखिल ( पूर्ण ) रूप और अत्यंत प्रकाशमान और देह इंद्रिय मन इनका साक्षी- रूप पर और वास्तविक तत्त्वरूप-जो वह पद है जिसको यह नहीं कह सकते कि, वह यह है-और योगीजन जिसमें जायँ उसे पर कहते हैं-- उस परम ( सबसे उत्तम ) आत्मस्वरूपको प्राप्त होताहै अर्थात् उन्मनी अवस्थामें योगी अपने स्वरूपमें स्थित होताहै--इसमें अधिक और क्या कहने योग्य है अन्यवस्तु- ओंकी तो अवश्यही प्राप्ति होती है--भावार्थ यह है कि, जिसके आधे नेत्र खुले
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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २२७ हों मन स्थिरहो नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि हो और जिसने देह आदिकी निश्व- लतासे प्राणकोभी लीन करालियाहो ऐसा योगी, ज्योतिस्वरूप सबके कारण, पूर्ण, देदीप्यमान साक्षीरूप जो तत्त्व उस परमपदको प्राप्त होताहै इसमें अधिक -क्या कहने योग्यहै ॥ ४१ ॥
दिवा न पूजयेल्लिंगं रात्रौ चैव न पूजयेत् ॥ सर्वदा पूजयेल्लिंगं दिवारात्रिनिरोधतः ॥ ४२ ॥
उन्मनीभावनायाः कालनियमभावमाह-दिवा नेति ॥ दिवा सूर्यसंचारे लिंगं सर्वकारणमात्मानम् । 'एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' इत्यादिश्रुतेः । न पूजयेत् न भावयेत् । ध्यानमेवात्मपूजनम् । तदुक्तं वासिष्ठे-'ध्यानोपहार एवात्मा ध्यानमस्य महार्चनम् । विना तेनेतरेणायमात्मा लभ्यत एव नो' इति । रात्रौ चंद्रसंचारे च नैव पूजयेन्नैव भावयेत् । चंद्रसूर्यसंचारे चित्तस्थैर्याभावात् । 'चले वाते चलं चित्तम्' इत्युक्तत्वात् । दिवारात्रिनिरोधतः सूर्यचंद्रौ निरुध्य । ल्यलोपे पंचमी तस्यास्तसिल् । सर्वदा सर्वस्मिन् काले लिंग आत्मानं पूजयेद्भावयेत् । सूर्यचंद्रयोनिरोधे कृते सुषुम्नांतर्गत प्राणे मनःस्थैर्यात् । तदुक्तम्-' सुषुम्नांतर्गते वायौ मनःस्थैर्य प्रजा- यते' इति ॥ ४२ ॥
भाषार्थ- अब उन्मनीभावनामें कालके नियमका अभाव वर्णन करते हैं कि दिनमें अर्थात् सूर्यके संचारमें लिंगका पूजन न करै अर्थात् सबके कारण लिंग-रूप आत्माका ध्यान करे सोई कहा है कि, इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ और यहां ध्यानही पूजनशब्दसे लेना पुष्प आदिसे पूजन नहीं सोई वासिष्ठमें वसिष्ठजीने कहाहै कि, आत्माका उपहार ( भेंट ) ध्यानही है और ध्यानही इसका अर्चन ( पूजा ) है उसके विना यह आत्मा प्राप्त नहीं होता है और रात्रिमें अर्थात् चंद्रमाके वारमेंभी लिंगरूप आत्माका पूजन न करै क्योंकि, चंद्र और सूर्यके वारमें चित्तकी स्थिरता नहीं रहती है कहभी आये हैं कि प्राणवायुके चलायमान होनेसे चित्तभी चलायमान होजाताहै और दिवा और रात्रिके निशे-
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( ) | [ २२८ हठयोगप्रदीपिका उपदेश धको करके सबकालमें लिंगका पूजन करे क्योंकि सूर्य और चंद्रका निरोध होनेपर प्राण सुषुम्नाके अंतर्गत होजाताहै और उससे मनकी स्थिरता होजाती है उस समय लिंगरूप आत्माका ध्यान करे सोई कहा है कि, सुषुम्नाके अंतर्गत सूर्यके होनेपर मनकी स्थिरता होजाती है-भावार्थ यहहै कि, सूर्य और चंद्रमाके संचा- रमें आत्माका ध्यान करे और सूर्य और चंद्र संचारको रोककर सबकालमें आत्माका ध्यान करै ॥ ४२ ॥
सव्यदक्षिणनाडिस्थो मध्ये चरति मारुतः ॥ तिष्ठते खेचरी मुद्रा तस्मिन्स्थाने न संशयः ॥४३ ॥
खेचरीमाह - सख्येति ॥ सव्यदक्षिणनाडिस्थो वामतदितरनाडिस्थो मारुतो वायुर्यत्र मध्ये चरति यस्मिन्मध्यप्रदेशे गच्छति तस्मिन्स्थाने तस्मिन्प्रदेशे खेचरी मुद्रा तिष्ठते स्थिरा भवति । 'प्रकाशनस्थेयाख्य- योश्च' इत्यात्मनेपदम् । न संशयः उक्तेऽथै संदेहो नास्तीत्यर्थः ॥ ४३ ॥
भाषार्थ - अब खेचरीमुद्राका वर्णन करते हैं कि, इडा पिंगला नामकी जो
सव्य दक्षिण नाडी हैं उनमें स्थित प्राणवायु जिस मध्य प्रदेशमें गमन करताहै ।
उसी स्थानमें खेचरीमुद्रा स्थिर होजाती है इसमें संशय नहींहै ॥ ४३ ॥।
इडापिंगलयोर्मध्ये शून्यं चैवानिलं ग्रसेत् ॥
तिष्ठते खेचरी मुद्रा तत्र सत्यं पुनःपुनः ॥ ४४ ॥
इडापिंगलयोरिति ॥ इडापिंगलयोः- सव्यदक्षिणनाड्योर्मध्ये यच्छून्यं खम् । कर्तृ । अनिलं प्राणवायुं यत्र ग्रसेत । शून्ये प्राणस्य स्थिरभाव एव ग्रासः । तत्र तस्मिञ्छून्ये खेचरी मुद्रा तिष्ठते । पुनः पुनः सत्यमिति योजना ॥ ४४ ॥
भाषार्थ -इडा पिंगला जो सव्य दक्षिण नाडी हैं उनके मध्यमें जो शून्य ( आकाश ) है वह शून्य जिसमें प्राणावायुको प्रस ले और शून्यमें प्राणकी जो स्थिरता उसकोही ग्रास कहते हैं उसशून्यमें खेचरीमुद्रा स्थिर होती है यह बात वारंवार सत्य है ॥ ४४ ॥
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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २२९
सूर्याचंद्रमसोर्मध्ये निरालंबांतरं पुनः ॥
संस्थिता व्योमचक्रे या सामुद्रा नाम खेचरी४५ ॥
सूर्याचंद्रमसोरिति ॥ सूर्याचंद्रमसोरिडापिंगलयोर्मध्ये निरालंब यदंतरमवकाशस्तत्र । पुनः पादपूरणे । व्योम्नां खानां चक्रे समुदाये । भ्रूमध्ये सर्वखानां समन्वयात् । तदुक्तम्-' पंचस्रोतः समन्विते' इति । या संस्थिता सा मुद्रा खेचरीनाम ॥ ४५ ॥
भाषार्थ- सूर्य और चंद्रमा अर्थात् इडा और पिंगलाके मध्यमें जो निरा-लंब अंतर ( अवकाश ) है उस आकाशोंके समुदायरूप चक्रमें क्योंकि, भ्रुकु-टीके मध्यमें सब आकाशोंका समन्वय ( मेल ) है सोई कहाहै कि, पांच स्रोतोंसे युक्त का मध्य है उस उक्त अवकाशमें जो भलीप्रकार स्थित हो वह खेचरी मी मुद्रा होती है ॥ ४५ ॥
सोमाद्यत्रोदिता धारा साक्षात्सा शिववल्लभा ॥ पूरयेदतुलां दिव्यां सुषुम्नां पश्चिमे मुखे ॥ ४६ ॥
सोमादिति ॥ सोमाचंद्राद्यत्र यस्यां खेचर्यां धारामृतधारा उदितोद्भूता सा खेचरी साक्षाच्छिववल्लभा शिवस्य प्रियेति पूर्वेणा- न्वयः | अतुलां निर्मलां निरुपमां दिव्यां सर्वनाड्युत्तमां सुषुम्नां पश्चिमे मुखे पूरयेत् जिह्वयेति शेषः ॥ ४६ ॥
भाषार्थ-जिस खेचरीमुद्रामें चंद्रमासे अमृतकी धारा उत्पन्न होती है वह खेचरीमुद्रा साक्षात् शिवजीको वल्लभ ( प्यारी ) है और अतुल अर्थात् जिसकी उपमा न हो और दिव्यरूप अर्थात् सब नाडियोंमें उत्तम जो सुषुम्ना है उसको पश्चिम मुखके विषे जिह्वासे पूर्ण करै ॥ ४६ ॥
पुरस्ताच्चैव पूर्येत निश्चिता खेचरी भवेत् ॥ अभ्यस्ता खेचरी मुद्राप्युन्मनी संप्रजायते ॥ ४७ ॥
पुरस्ताच्चैवेति ॥ पुरस्ताच्चैव पूर्वतोऽपि पूर्येत । सुषुम्नां प्राणे- नेति शेषः । यदि तर्हि निश्चिताऽसंदिग्धा खेचरी खेचर्याख्या मुद्रा
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( ) [ २३० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः भवेदिति । यदि तु पुरस्तात्प्राणेन न पूर्येत जिह्वामात्रेण पश्चिमतः पूर्येत तर्हि मूढावस्थाजनिका । न निश्चिता खेचरी स्यादिति भावः । खेचरीमुद्राप्यभ्यस्ता सती उन्मनी संप्रजायते चित्तस्य ध्येयाकारा-वेशातुर्यावस्था भवतीत्यर्थः ॥ ४७ ॥
भाषार्थ - और पूर्वमुखके विषेभी पूर्ण करें अर्थात् सुषुम्नाको प्राणसे पूर्ण करे तो निश्चयसे अर्थात् निःसंदेह खेचरी नामकी मुद्रा होती है और यदि पूर्वमुखमें प्राणसे पूर्ण न करे और पश्चिम मुखमें केवल जिह्वासेही पूर्ण करदे तो खेचरीमुद्रा मूढ अवस्थाको पैदा करती है इससे वह निश्चित नहीं है और ख्यभ्यास कीहुई खेचरीमुद्राभी उन्मनी होजाती है अर्थात् चित्तके ध्येयाकार होनेसे तुर्यावस्था होजाती हैं ॥ ४७ ॥
भ्रुवोर्मध्ये शिवस्थानं मनस्तत्र विलीयते ॥ ज्ञातव्यं तत्पदं तुर्यं तत्र कालो न विद्यते ॥ ४८ ॥
भुवोरिति ॥ भ्रुवोर्मध्ये भ्रुवोरंतराले शिवस्थानं शिवस्येश्वरस्य स्थानं शिवस्य सुखरूपस्यात्मनोऽवस्थानमिति शेषः । तत्र तस्मिन् शिवे मनो लीयते शिवाकारवृत्तिप्रवाहवद्भवति तच्चित्तलयरूपं तुर्य पदं जायत्स्वमसुषुप्तिभ्यश्चतुर्थाख्यं ज्ञातव्यम् । तत्र तस्मिन् पढ़े कालो मृत्युर्न विद्यते । यद्वा सूर्यचंद्रयोर्निरोधादायुःक्षयकारकः कालः समयो
न विद्यत इत्यर्थः ॥ तदुक्तम् । 'भोकी सुषुम्ना कालस्य' इति ॥४८॥
भाषार्थ -दोनों अकुटियोंके मध्यमें शिवरूप ईश्वरका वा सुखरूप आत्माका स्थान है उस शिव वा आत्मामें मन लीन होताहै अर्थात् मनकी वृत्तिका प्रवाह शिवकार होजाताहै और वह चित्तका लय तुर्यपद अर्थात् जाग्रत् स्वप्न सुषुप्तिसे चौथा पद जानना और उस पदमें काल ( मृत्यु ) नहीं है अथवा सूर्य और चंद्रके निरोधसे अवस्थाके क्षयका कारक समय नहीं है सोई कह आये हैं कि, सुषुम्ना कालके भोगनेवाली है ॥ ४८ ॥