हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 241–250

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २३१

अभ्यसेत्खेचरीं तावद्यावत्स्याद्योगनिद्वितः ॥

संप्राप्तयोगनिद्रस्य कालो नास्ति कदाचन ॥ ४ ९ ॥

अभ्यसेदिति ॥ तावत्खेचरी मुद्रामभ्यसेत् । यावद्योगनिद्रितः । योगः सर्ववृत्तिनिरोधः सैव निद्रा योगनिद्राऽस्य संजाता इति योग-निद्रितः तादृशः स्यात् । संप्राप्ता योगनिद्रा येन स संप्राप्तयोगनिद्र-स्तस्य कदाचन कस्मिंश्चिदपि समये कालो मृत्युर्नास्ति ॥ ४ ९ ॥ भाषार्थ -योगी जबतक योगनिद्रित हो अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंका निरोध-रूप जो योग वह निद्रारूप जिसको हो वह योगनिद्रित कहाताहै तबतक खेचरी- मुद्राका अभ्यास करें और जिस योगीको योगनिद्रा भलीप्रकार प्राप्त होगई हो उसकी किसी कालमें भी मृत्यु नहीं होती ॥ ४ ९ ॥ निरालंबं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिंतयेत् ॥ स बाह्याभ्यंतरे व्योम्नि घटवत्तिष्ठति ध्रुवम् ॥५० ॥

निरालंबमिति ॥ यो निरालंबमालंबशून्यं मनः कृत्वा किंचि- दपि न चितयेत् खेचरीमुद्रायां जायमानायां ब्रह्माकारमपि वृत्ति -परवैराग्येण परित्यजेदित्यर्थः । स योगी बाह्याभ्यंतरे बाह्ये बहिर्भवे आभ्यंतरेऽभ्यंतर्भवे च व्योम्न्याकाशे घटवत्तिष्ठति ध्रुवम् । निश्चित- मेतत् । यथाकाशे घटो बहिरंतश्चाकाशपूर्णो भवति तथा खेचर्यामालं- बनपरित्यागेन योगी ब्रह्मणा पूर्णस्तिष्ठतीत्यर्थः ॥ ५० ॥

भाषार्थ -जो योगी निरालंब ( निराश्रय ) मनको करके किंचित् भी चिता नहीं करताहै अर्थात् खेचरीमुद्राके सिद्ध होनेपर ब्रह्माकार वृत्तिकाभी परमवैराग्यसे त्याग करताहै वह योगी बाहिर और भीतरके आकाशमें घटके समान निश्चयकर टिकताहै अर्थात् जैसे घट आकाशके विषय बाहिर और भीतर आकाशसे पूर्ण होताहै तिसीप्रकार खेचरी मुद्राके होनेपर आलंबनके परित्यागसे योगीभी ब्रह्मसे पूर्ण टिकताहै ॥ ५० ॥

पृष्ठ 242

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( ) | [ २३२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः बाह्यवायुर्यथा लीनस्तथा मध्ये न संशयः ॥ स्वस्थाने स्थिरतामेति पवनो मनसा सह ॥ ५१ ॥

बाह्येति ॥ बाह्यो देहाद्वहिर्भवो वायुर्यथा लीनो भवति खेच- र्याम् । तस्यांतःप्रवृत्त्यभावात् । तथा मध्यो देहमध्यवर्ती वायुलींनो भवति तस्य वहिःप्रवृत्त्यभावात् । न संशयः । अस्मिन्नर्थे संदेहो नास्तीत्यर्थः । स्थीयते स्थिरीभूयतेऽस्मिन्निति स्थानं स्वस्य प्राणस्य स्थानं स्थैर्याधिष्ठानं ब्रह्मरंध्रं तत्र मनसा चित्तेन सह पवनः प्राणः स्थिरतां निश्चलतामेति प्राप्नोति ॥ ५१ ॥

भाषार्थ-खेचरीमुद्राके विषय देहसे बाहिरका पवन जिसप्रकार लीन होताहै, क्योंकि, उसकी भीतर प्रवृत्ति नहीं होती, तिसीप्रकार देहके मध्यका वायुभी लीन होजाताहै क्योंकि, उसकी बाहिर प्रवृत्ति नहीं होती इसमें संशय नहीं है किंतु मनसहित पवन प्राणकी स्थिरताका स्थान जो ब्रह्मरंध्र है उसमें निश्चलताको प्राप्त होजाताहै ॥ ५१ ॥

एवमभ्यसमानस्य वायुमार्गे दिवानिशम् ॥ अभ्यासाज्जीयते वायुर्मनस्तत्रैव लीयते ॥ ५२ ॥

एवमिति ॥ एवमुक्तप्रकारेण वायुमार्गे प्राणमार्गे सुषुम्नाया- मित्यर्थः । दिवानिशं रात्रिंदिवमभ्यसमानस्याभ्यासं कुर्वतो योगिनोऽ- भ्यासाद्यत्र वस्मिन्नाधारे वायुः प्राणो जीर्यते क्षीयते लीयत इत्यर्थः । तत्रैव वायोर्लयाधिष्ठाने मनश्चित्तं लीयते जीर्यत इत्यर्थः ॥ ५२ ॥

भाषार्थ -इसपूर्वोक्त प्रकारसे प्राणरूप वायुका मार्ग जो सुषुम्ना उसमें रात्रिदिन अभ्यास करतेहुए योगीके अभ्याससे जिस आधारमें प्राणवायु जीर्ण होजाताहै अर्थात् लय होजाताहै उसीवायुके लयाधिष्ठान ( स्थान ) में मनभी लीन होजाताहै ॥ ५२ ॥

अमृतैः प्रावयेद्देहमापादतलमस्तकम् ॥ सिद्धयत्येव महाकायो महाबलपराक्रमः ॥ ५३ ॥

इति खेचरी ।

पृष्ठ 243

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३३३ अमृतैरिति ॥ अमृतैः सुपिरनिर्गतैः पादतलं च मस्तकं च पादतल-मस्तकम् | 'द्वंद्वश्च प्राणितूर्यसेनांगानाम्' इत्येकवद्भावः । पादतल-मस्तकमभिव्याप्येत्यापादतलमस्तकं देहमाप्लावयेदाप्लावितं कुर्यात् । महानुत्कृष्टः कायो यस्य स महाकायः महांतौ बलपराक्रमौ यस्ये-त्येतादृशी योगी सिद्धयत्येव । अमृतप्लावनेन सिद्धो भवत्येव ॥५३ ॥

भाषार्थ -योगी पादतल और मस्तक पर्यंत देहको सुषिर ( चंद्रमा ) से निकसे जो अमृत उनसे सेचन करे तो उत्तम है काया जिसकी और अधिक बल पराक्रम जिसके ऐसा योगी पूर्वोक्त अमृतके स्नानसे शुद्ध होजाताहै ॥१३ ॥

शक्तिमध्ये मनः कृत्वा शक्तिं मानसमध्यगाम् ॥ मनसा मन आलोक्य धारयेत्परमं पदम् ॥ ५४ ॥

शक्तिमध्य इति ॥ शक्तिः कुण्डलिनी तस्या मध्ये मनः कृत्वा तस्यां मनो धृत्वा तदाकारं मनः कृत्वेत्यर्थः । शक्ति मानसमध्यगां कृत्वा । शक्तिध्यानावेशाच्छक्तिं मनस्येकीकृत्य तेन कुण्डलीं बोध- यित्वेति यावत् । ' प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह' इति गोर- क्षोक्तेः मनसांतःकरणेन मन आलोक्य बुद्धिं मनसाऽवलोकनेन स्थिरी- कृत्वेत्यर्थः । परमं पदं सर्वोत्कृष्टं स्वरूपं धारयेद्धारणाविषयं कुर्या- दित्यर्थः ॥ ५४ ॥

भाषार्थ- शक्ति ( कुण्डलिनी ) के मध्यमें मनको धरकर अर्थात् कुंडलीके आकारका मनको करके और शक्तिको मनके मध्यमें करके अर्थात् शक्ति ध्यानके आवेशसे शक्तिको मनमें एककरके और उससे कुंडलीका बोधन करके सोई गोरक्षने कहा है कि, मन और पवन सहित कुंडली वह्निके योगसे प्रबुद्ध होती है और अंत:करणरूप मनसे मनको देखकर अर्थात् मनसे देखनेके द्वारा बुद्धिको स्थिर करके सर्वोत्तम स्वरूप जो परमपद है उसकी धारणा करै अर्थात् ब्रह्म मनको लगावै ॥ ५४ ॥

खमध्ये कुरु चात्मानमात्ममध्ये च खं कुरु ॥ सर्वं च खमयं कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥५५॥

पृष्ठ 244

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( ) [: २३४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश खमध्य इति ॥ खमिव पूर्ण ब्रह्म खं तन्मध्ये आत्मानं स्वस्व- रूपं कुरु । ब्रह्माहमिति भावयेत्यर्थः । आत्ममध्ये स्वस्वरूपे च खं पूर्ण ब्रह्म कुरु । अहं ब्रह्मेति च भावयेत्यर्थः । सर्व च खमयं कृत्वा ब्रह्ममयं विभाव्य किमपि न चितयेत् । अहं ब्रह्मेतिध्यानमपि परि- त्यजेदित्यर्थः ॥ ५५ ॥

भाषार्थ-आकाशके समान पूर्ण जो ब्रह्म उसके विषे अपने आत्माको करके अर्थात् ब्रह्म मैं हूं, ऐसी भावना करके अपने रूप स्वरूप आत्मामें पूर्ण ब्रह्मको करो-- मैं ब्रह्महूं ऐसी भावना कर, और संपूर्ण प्रपंचको ब्रह्ममय करके अर्थात् ब्रह्मरूप विचारकर किसीकीभी चिंता न करै अर्थात् मैं ब्रह्महूं इस ध्यानकाभी परित्याग करदे ॥ ५५ ॥

अंतःशून्यो बहिःशून्यः शून्यः कुंभ इवांबरे ॥ अंतःपूर्णो बहिः पूर्णः पूर्णः कुंभ इवार्णवे ॥ ५६ ॥

एवं समाहितस्य स्वरूपे स्थितिमाह-अंतःशून्य इति ॥ अंतः अंतःकरणे शून्यः । ब्रह्मातिरिक्तवृत्तेरभावाद्वितीयशून्यः शून्यः । द्वितीयादर्शनात् । अंबरे आकाशे कुम्भो: - करणाद्वाहरपि । बहिरंत घटो यथांतर्बहिःशून्यस्तद्वदंतः करणे हृदाकाशे वायुपूर्णः ब्रह्माकार- वृत्तेः सद्भावाद्ब्रह्मवासत्वाद्वा । बहिःपूर्णोऽतःकरणाद्वहिर्हृदवकाशाद्व- हिर्वा पूर्णः । सत्तया ब्रह्मातिरिक्तवृत्तेरभावाद्ब्रह्मपूर्णत्वाद्वा । अर्णवे •समुद्रे कुम्भो घटो यथा सर्वतो जलपूर्णो भवत्येवं समाधिनिष्ठो योगी ब्रह्मपूर्णो भवतीत्यर्थः ॥ ५६ ॥

भावार्थ-इसप्रकार समाधिमें स्थित योगीकी अपने स्वरूपमें स्थितिका वर्णन करते हैं कि, अंतकरणमें शून्यहो अर्थात् ब्रह्मसे अतिरिक्त वृत्तिके अभावसे दूसरेकी प्रतीति न होती हो और दूसरेके न देखनेसे अंतःकरणसे बाहिरभी इसप्रकार शून्य हो जैसे आकाशमें स्थित घट भीतर और बाहिर जलसे शून्य होता है--और तिसी प्रकार हृदयके आकाशरूप अंतःकरणमें ब्रह्माकार वृत्तिके

पृष्ठ 245

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २३५ होनेसे वा ब्रह्मकी वासनासे वायुसे पूर्ण हो और अंतःकरणसे वा हृदयाकाशसे बाहिरभी पूर्ण हो अर्थात् सत्तारूपसे वा ब्रह्मातिरिक्त वृत्तिके अभावसेवा ब्रह्मरूपसे इसप्रकार पूर्ण हो जैसे समुद्रके विषे डुबाहुआ कुंभ चारोंतरफसे जलपूर्ण होता है. इसीप्रकार समाधिमें स्थित पुरुषभी ब्रह्मसे पूर्ण होता है ॥ १६ ॥

बाह्यचिंता न कर्तव्या तथैवांतरचिंतनम् ॥ सवाचतां परित्यज्य न किंचिदपि चिंतयेत्॥५७॥

बाह्यचिंतेति ॥ समाहितेन योगिनेत्यध्याहारः । बाह्यचिता बाह्य- विषया चिन्ता न कर्तव्या तथैव बाह्यचिंताकरणवदांतरचितनमांतराणां मनसा परिकल्पितानामाशामोदकसौधवाटिकादीनां चिंतनं न कर्त- व्यमिति लिंगविपरिणामेनान्वयः । सर्वचितां वाह्याभ्यंतरचिंतनं परित्यज्य किंचिदपि न चिंतयेत्परवैराग्येणात्माकारवृत्तिमपि परि-- त्यजेत् । तत्त्यागे स्वरूपावस्थितिरूपा जीवन्मुक्तिर्भवतीति भावः ॥५७॥

भाषार्थ -समाधिमें स्थित योगी बाहिरके माला चंदन आदि विषयोंकी चिंता न करै और तिसीप्रकार अंतःकरणमें मनसे कल्पना किये जो आशामोदक,. श्वेतमंदिर, वाटिका आदि हैं उनका भी चिन्तन न करें इसप्रकार बाहर भीतरकी सम्पूर्ण चिताओंका परित्याग करके किंचित्की भी चिंता न करे अर्थात् परमवैरा- ग्यसे ब्रह्माकारवृत्तिकाभी परित्याग करदे क्योंकि ब्रह्माकारवृत्तिका त्याग अपने स्वरूपमें स्थितिरूप मुक्ति जीवन समयमें ही हो जाती है ॥ १७ ॥

संकल्पमात्रकलनैव जगत्समयं संकल्पमात्रकलनैव मनोविलासः ॥ संकल्पमात्रमतिमुत्सृज निर्विकल्प- माश्रित्य निश्वयमवाप्नुहि राम शांतिम् ॥ ५८ ॥

बाह्याभ्यंतरचितापरित्यागे शांतिश्च भवतीत्यत्र वसिष्ठवाक्यं प्रमा-- णयति- संकल्पेति ॥ संकल्पो मानसिको व्यापारः स एव संकल्प...

पृष्ठ 246

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( ) | [ २३६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः मात्रं तस्य कलनैव रचनैवेदं दृश्यमानं समग्रं जगत् बाह्मप्रपंचो मनो- मात्रकल्पित इत्यर्थः । मनसो मानसस्य विलासो नानाविषयाकार- कल्पना आशामोदकसौधवाटिकादिकल्पनारूपो विलासः संकल्प- मात्रकलनैव । मानसः प्रपंचोऽपि संकल्पमात्ररचनैवेत्यर्थः । संकल्प मात्रे बाह्याभ्यंतरप्रपंचे या मतिः सत्यत्वबुद्धिस्तामुत्सृज । तर्हि किं कर्त- व्यमित्यत आह- निर्विकल्पमिति । विशिष्टकल्पना विकल्पः । आत्मनि कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखित्वसजातीयविजातीयस्वगतभेददेशकालवस्तु परिच्छे दकल्पनारूपः तस्मान्निष्क्रांतो निर्विकल्पस्तमात्मानमाश्रित्य धार- -णादिविषयं कृत्वा हे राम! निश्चयमसंदिग्धं शांतिं परमोपरतिमवा- हि । ततः सुखमपि प्राप्स्यसीति भावः । तदुक्तं भगवता व्यति- रेकेण-'न चाभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम्' इति ॥ ५८ ॥

भाषार्थ--बाह्य और आभ्यंतर चिताओंके परित्यागसे शांति भी होती है इसमें वसिष्टके वाक्यका प्रमाण देते हैं कि, मानसिक व्यापाररूप जो संकल्प है उसकी रचनारूपही यह दृश्यमान संपूर्ण जगत्है अर्थात् बाह्य प्रपंच मन- सेही कल्पित है और आशामोदक श्वेतमंदिर वाटिका आदि नाना प्रकारके विष- योंकी कल्पनाका जो विलास है वहभी संकल्पकीही रचनाहै अर्थात् मानस- प्रपंचभी संकल्पकीही रचनारूप है इससे हे राम! संकल्प मात्रमें जो मति अर्थात् बाह्य और आभ्यंतरके प्रपंचमें सत्यत्व बुद्धि है उसको त्याग दे कदाचित् कहो कि, फिर क्या करूं इससे कहतेहैं कि, निर्विकल्पके आश्रय होकर अर्थात् आत्माके विषे जो कर्ता भोक्ता सुखी दुःखी-सजातीय-विजातीय-स्वगत भेद -देश-काल-प्रस्तु –परिच्छेदरूप विशिष्ट कल्पना हैं उनसे रहित जो निर्विकल्परूप अर्थात् पूर्वोक्त विशिष्ट कल्पनासे शून्य आत्मा है उसकोही धारणाका विषय करके हे राम! निश्चयसे तू शांतिको प्राप्त हो उस शांतिसे फिर सुखको भी प्राप्त हो जायगा -सोई भगवान्ने गीतामें कहा है कि विचारहीन पुरुषको शांति नहीं होती हैं और अशांत मनुष्यको सुख कहांसे होताहै ॥ १८ ॥

पृष्ठ 247

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीका समेता । २३७

कर्पूरमनले यद्वत्सैंधवं सलिले यथा ॥

तथा संघीयमानं च मनस्तत्त्वे विलीयते ॥ ५ ९ ॥

कर्पूरमिति ॥ यद्वद्यथाऽनलेग्नौ संधीयमानं संयोज्यमानं कर्पूरं विलीयते विशेषेण लीयते लीनं भवति । अग्न्याकारं भवति । यथा सलिले जले संधीयमानं सैंधवं लवणं विलीयते लवणाकारं परित्यज्य जलाकारं भवति तथा तद्वत्तत्त्वे आत्मनि संधीयमानं कार्यमानं मनो विलीयते आत्माकारं भवति ॥ ५९ ॥

भाषार्थ - जैसे कपूर अभिमें संयोग करनेसे विशेषकर लीन होता है अर्थात् अग्निके आकार हो जाताहै और जैसे जलमें संयुक्त किया सैंधव लवण विलीन होताहै अर्थात् लवण आकारको त्यागकर जलाकार होजाता है-तिसी प्रकार तत्त्वरूप आत्मामें संयुक्त किया मन विलीन होता है । अर्थात् आत्मा-कार हो जाता है ॥ १ ९ ॥ ज्ञेयं सर्वं प्रतीतं च ज्ञानं च मन उच्यते ॥ ज्ञानं ज्ञेयं समं नष्टं नान्यः पंथा द्वितीयकः ॥ ६०॥

मनसो विलये जाते हैतमपि लीयत इत्याह त्रिभिः -ज्ञेयमिति ॥ सर्व सकलं ज्ञेयं ज्ञानार्ह प्रतीतं च ज्ञातं च ज्ञानं च इदं सर्व मन उच्यते । सर्वस्य मनः कल्पनामात्रत्वान्मनः शब्देनोच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं च समं मनो विलीयते मनसा सार्धं नष्टं यदि तर्हि द्वितीयकः द्वितीय एव द्वितीयकः पंथा मनोविषयो नास्ति । द्वैतं नास्तीति फलितार्थः ॥ ६० ॥

भाषार्थ- अब मनके लय होनेपर द्वैतकाभी लय घर्णन करते हैं कि, संपूर्ण जो ज्ञेय ( ज्ञानके योग्य ) अर्थात् ज्ञात प्रतीयमान है और कहता है क्योंकि ये सब मनकी कल्पनामात्र हैं यदि ज्ञान और ज्ञेय मन-- सहित नष्ट हो जायँ तो दूसरा मार्ग नहीं है अर्थात् मनका विषय जो द्वैत है. वह नहीं रहता है ॥ ६० ॥

पृष्ठ 248

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( ) | [: २३८ हठयोगप्रदीपिका उपदेश मनोदृश्यमिदं सर्वं यत्किंचित्सचराचरम् ॥ मनसो द्युन्मनीभावाद्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ ६१ ॥

मनोदृश्यमिति ॥ इदमुपलभ्यमानं यकिंचिद्यत्किमपि चरं जंगममचरं स्थावरं चरं चाचरं च चराचरे ताभ्यां सह वर्तत इति सचराचरं यज्जगत्सर्वं मनोदृश्यं मनसा दृश्यम् । मनःसंकल्पमात्र- मित्यर्थः । मनःकल्पनासत्त्वे प्रतीतेस्तदभावे चाप्रतीतेर्भ्रम एव सर्व जगत् । भ्रमस्य प्रतीतकशरीरत्वात् । न च बौद्धमतप्रसंग: । भ्रमा- धिष्ठानस्य ब्रह्मणः सत्यत्वाभ्युपगमात् । मनस उन्मनीभावाद्विलया- हैतं भेदः नैवोपलभ्यते नैव प्रतीयते । द्वैतभ्रमहेतोर्मनःसंकल्पस्याभा- वात् । हि तद्धेतावव्ययम् ॥ ६१ ॥

भाषार्थ-यह दीखता हुआ जो स्थावर जंगम ( चराचर ) रूप सहित जगत् जो कुछ है वह सब मनसे देखने योग्य है अर्थात् मनसे कल्पित है अर्थात् मनकी कल्पना होनेपर प्रतीत होताहै और कल्पनाके अभावमें प्रतीत नहीं होताहै इससे भ्रमरूपही है और भ्रमका शरीर प्रतीतिमान होता है कदा- चित् कहो कि, ऐसे कहोगे तो बौद्धमतका प्रसंग होजायगा सो ठीक नहीं क्योंकि, भ्रमके अधिष्ठान ब्रह्मको सत्य मानतेहैं और उक्त मनके उन्मनीभाव ( विलय ) से द्वैत ( भेद ) प्रतीतही नहीं होताहै क्योंकि, द्वैत भ्रमका हेतु जो मनका संकल्प है उसका अभाव है ॥ ६१ ॥

यवस्तुपरित्यागाद्विलयं याति मानसम् ॥ मनसो विलये जाते कैवल्यमवशिष्यते ॥ ६२ ॥

ज्ञेयमिति ॥ ज्ञेयं ज्ञानविषयं यद्वस्तु सर्व चराचरं यदृश्यं तस्य परित्यागान्नामरूपात्मकस्य तस्य परिवर्जनाद्विलयं सच्चिदानंदरूपात्मा-कारं भवति । मनसो विलये जाते सति कैवल्यं केवलस्यात्मनो भावः कैवल्यमवशिष्यते । अद्वितीयात्मस्वरूपमवशिष्टं भवतीत्यर्थः ॥६२॥

पृष्ठ 249

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २३ ९ भाषार्थ -ज्ञानका विषय जो चराचररूप दृश्य है उसके परित्यागसे अर्थात् नामरूपात्मक जगत्के वर्जित करनेसे मन विलयको प्राप्त होजाता है अर्थात् सच्चिदानंदरूप आत्माकार होजाता है और मनका विलय होनेपर कैवल्य शेष रहजाता है अर्थात् अद्वितीय आत्मारूपही शेष रहता है ॥ ६२ ॥

एवं नानाविधोपायाः सम्यक्स्वानुभवान्विताः ॥ समाधिमार्गाः कथिताः पूर्वाचार्यैर्महात्मभिः॥ ६३॥

एवमिति ॥ एवमंतर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टिरित्याद्युक्तप्रकारेण महान् समाधिपरिशीलनशुद्ध आत्मांतःकरणं येषां ते महात्मानस्तैर्महात्मभिः पूर्वे च ते आचार्याश्र पूर्वाचार्या मत्स्येंद्रादयस्तैः समाधेश्चित्तवृत्ति- निरोधस्य मार्गाः प्राप्त्युपायाः कथिताः । कीदृशाः समाधिमार्गाः । नानाविधोपायाः नानाविधा उपायाः साधनानि येषां ते तथा सम्यक् समीचीनतया संशयविपर्ययराहित्येन यः स्वानुभव आत्मानु- भवस्तेनान्विता युक्ताः ॥ ६३ ॥

भाषार्थ-इसप्रकार नानाप्रकारके उपाय ( साधन ) हैं - जिनके और भली- प्रकार जो स्वानुभव अर्थात् संशय और विपर्ययसे रहित आत्मानुभव उससे युक्त चित्तवृत्तिनिरोधरूप समाधिके मार्ग अर्थात् प्राप्तिके उपाय पहिले महात्मा आचार्योंने कहे हैं अर्थात् समाधिके अभ्याससे महान् ( शुद्ध ) है आत्मा ( अंत:करण ) जिनका ऐसे महात्मा मत्स्येंद्र आदि पूर्वाचार्योंने अपने अनुभवसे पूर्वोक्त समाधिके मार्ग वर्णन किये हैं ॥ ६३ ॥

सुषमा कुंडलिन्यै सुधायै चंद्रजन्मने ॥ मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥६४ ॥

सुषुम्नादिभ्यः कृतकृत्यस्ताः प्रणमति-सुषुम्नायै इति ॥ सुषुम्ना मध्यनाडी तस्यै कुंडलिन्यै आधारशक्त्यै चंद्रा भ्रूमध्यस्थाज्जन्म यस्याः तस्यै सुधायै पीयूषायै मनोन्मन्यै तुर्यावस्थायै चिचैतन्यमात्मा स्वरूपं यस्याः सा तथा तस्यै । महती जडानां कायेंद्रियमनसां चैत-

पृष्ठ 250

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( ) [ २४० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः

न्यसंपादकत्वात्सर्वोत्तमा या शक्तिश्चिच्छक्तिः पुरुषरूपा तस्यै ।

तुभ्यमिति प्रत्येकं संबध्यते । नमः प्रह्वीभावोऽस्तु ॥ ६४ ॥

भाषार्थ-सुषुम्ना आदि नाडियोंसे कृतकृत्य हुये आचार्य उनको प्रणाम करते हैं कि, मध्यनाडीरूप सुषुम्नाको और आधारशक्तिरूप कुंडलिनीको और चंद्रमासे है जन्म जिसका ऐसी सुवाको और तुर्यावस्थारूप उस मनोन्मनीको नमस्कार है जो मनोन्मनी देह इंद्रिय मनरूप जो जड पदार्थ हैं उनकोभी चेत- नताकी संपादक होनेसे सबसे बडी शक्ति ( चित् शक्ति पुरुष ) रूप है और जो चेतन आत्मा स्वरूप है-इस श्लोकमें तुमको नमस्कार है इस पदका सर्वत्र संबंध है ॥ ६४ ॥

अशक्यतत्त्वबोधानां मूढानामपि संगतम् ॥ प्रोक्तं गोरक्षनाथेन नादोपासनमुच्यते ॥ ६५ ॥

नानाविधान्समाभ्युपायानुक्त्वा नादानुसंधानरूपं मुख्योपायं प्रतिजानीते-अशक्येति ॥ अव्युत्पन्नत्वादशक्यस्तत्त्वबोधस्तत्त्वज्ञानं येषां ते तथा तेषां मूढानामनधीतानां संमतम् । अपिशब्दात्किमुता- धीतानामिति गम्यते । गोरक्षनाथेन प्रोक्तमित्यनेन महदुक्तत्वा- दुपादेयत्वं गम्यते । नादस्थानाहतध्वनेरुपासनेऽनुसंधानरूपं सेवन- मुच्यते कथ्यते ॥ ६५ ॥

भाषार्थ - अनेकप्रकारके समाधिके उपायोंको कहकर नादानुसंधान रूप मुख्य जो उपाय है उसके वर्णनकी प्रतिज्ञा करतेहैं कि, अव्युत्पन्न ( मूर्ख ) होनेसे जिनको तत्त्वज्ञान अशक्य है उन मूढोंको भी जो संमत है और अपि- शब्दसे पठित मनुष्योंको तो संमत क्यों न होगा ऐसे गोरक्षनाथके कहेहुये नादो-पासन अर्थात् अनाहतध्वनिका सेवन वर्णन करते हैं और यह नादका अनुसंधान गोरक्षनाथ महान् पुरुषने कहाहै इससे अवश्य करने योग्य है ॥ ६ ९ ॥ श्रीआदिनाथेन सपादको टिलयप्रकाराः कथिता जयंति ॥ नादानुसंधानकमेकमेव मन्यामहे मुख्यतमं लयानाम् ॥ ६६ ॥