हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 251–260

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २४१ श्रीआदिनाथेनेति ॥ श्रीआदिनाथेन शिवेन कथिताः प्रोक्ताः पादेन चतुर्थांशेन सह वर्तमानाः कोटिसंख्याका लयप्रकाराश्चित्तल-यसाधनभेदा जयंत्युत्कर्षेण वर्तते । वयं तु नादानुचिंतनमेव एकं केवलं लयानां लयसाधनानां मध्ये मुख्यतममतिशयेन मुख्यं मन्या- हे जानीमहे उत्कृष्टानां लयसाधनानां मध्ये उत्कृष्टतमत्वाद्गोरक्षा-भिमतत्वाच्च नादानुसंधानमेव अवश्यं विधेयमिति भावः ॥ ६६ ॥

भाषार्थ-श्रीआदिनाथ ( शिवजी ) ने सवाकरोड चित्तके लयके प्रकार कहे हैं और वे सर्वोत्तम रूपसे वर्तते हैं हम तो एक नादानुसंधान ( नादका-सेवन ) कोही केवल अत्यंत मुख्य लयके साधनोंमें मानते हैं क्योंकि, वह सबसे उत्तम है और गोरक्षनाथको अभिमत है इससे अवश्य करने योग्यहै । ६६ ॥ मुक्तासने स्थितो योगी मुद्रां संधाय शांभवीम् ॥ शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमंतःस्थमेकधीः ॥ ६७ ॥

शांभवीमुद्राया नादानुसंधानमाह-मुक्तासन इति ॥ मुक्तासने सिद्धासने स्थितो योगी शांभवीं मुद्राम् 'अंतर्लक्ष्यं बहिर्दृष्टि: ' इत्या-दिनोक्तां संधाय कृत्वा । एकधीरेकाग्रचित्तः सन् दक्षिणे कर्णेऽन्तस्थ-सुषुम्नानाड्यां संतमेव नादं शृणुयात् । तदुक्तं त्रिपुरसारसमुच्चये-'आदौ मत्तालिमालाजनितरवसमस्तारसंस्कारकारी नादोऽसौ वांशि-कस्यानिलभरितलसद्वंशनिःस्वानतुल्यः । घंटानादानुकारी तदनु च जलधिध्वान धीरो गभीरो गर्जपर्जन्यघोषः पर इह कुहरे वर्तते ब्रह्मनाड्या' इति ॥ ६७ ॥

भाषार्थ- अब शांभवी मुद्रासे नादानुसंधानका वर्णन करते हैं कि, मुक्ता-सन सिद्धासनमें स्थित योगी भीतर लक्ष्य और बाहिर दृष्टि इत्यादि ग्रंथसे कही हुई शांभवीमुद्राको करके और एकाग्रचित्त होकर दक्षिणकर्णके विषे सुषुम्ना-नाडीमें वर्तमान जो देहके भीतरका शब्द है उसको सुनै सोई त्रिपुरसारसमुच्चय-.. यमें कहाहै कि, तारके संस्कारका कर्ता नाद प्रथमतो उन्मत्त भ्रमरोंके समूहका शब्द उसके समान और फिर पवनसे भरेहुये शोभित वंशके शब्दकी तुल्य १६

पृष्ठ 252

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( ) | [ २४२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः और फिर घंटाके शब्द समान और समुद्रके शब्दकी तुल्य धीर और फिर गर्ज-तेहुये मेघका जो शब्द उसके समान गंभीर ऐसा पूर्वोक्त नाद इस देहमें सुषुम्ना-नाडीके छिद्रमें वर्तताहै ॥ ६७ ॥

श्रवणपुटनयनयुगलत्राणमुखानां निरोधनं कार्यम्॥ शुद्धसुषुम्नासरणौ स्फुटममलः श्रूयते नादः ॥ ६८ ॥

पराङ्मुखीमुद्रया नादानुसंधानमाह-श्रवणेति ॥ श्रवणपुटे नय-नयोत्रयोर्युगलं युग्मं प्राणशब्देन घ्राणपुटे मुखमास्यमेषाम् । द्वंदे प्राण्यंगत्वादेकवद्भावे प्राप्तेऽपि सर्वस्यापि द्वंद्वैकवद्भावस्य वैकल्पिकत्वान्न भवति । तेषां निरोधनं करांगुलिभिः कार्यम् । निरोधनं चेत्थम्- 'अंगुष्ठाभ्यामुभौ कर्णौ तर्जनीभ्यां च चक्षुषी । नासापुटौ तथान्याभ्यां प्रच्छाद्य करणानि च' इति । चकारात्तदन्याभ्यां मुखं प्रच्छाद्येति समुचीयते । शुद्धा प्राणायामैर्मलरहिता या सुषुम्नासरणिः सुषु- स्नापद्धतिस्तस्याममलो नादः स्फुटं व्यक्तं श्रूयते ॥ ६८ ॥

भाषार्थ - अब पराङ्मुखीनाडीसे नादके अनुसंधानका वर्णन करते हैं कि, कर्ण और नेत्र और घ्राण इन तीनोंके युगल ( दोनों छिद्र ) और मुख इनका निरोध करै अर्थात् हाथकी अंगुलियोंसे इनको रोके और निरोध भी इस वचनके अनुसार करै कि, अंगुष्ठोंसे दोनों कानोंका और तर्जनियोंसे दोनों नेत्रोंका और मध्यमाओंसे नासापुटोंका और चकारके पढ़नेसे तर्जनियोंसे मुखका आच्छादन करै इसप्रकारका इंद्रियोंका निरोध करनेसे प्राणायामोंसे मलरहित जो सुषुम्नाका मार्ग है उसमें स्फुट ( प्रत्यक्ष ) अमल ( स्पष्ट ) नाद सुनताहै ॥ ६८ ॥

आरंभश्च घटश्चैव तथा परिचयोऽपि च ॥ निष्पत्तिः सर्वयोगेषु स्यादवस्थाचतुष्टयम् ॥ ६ ९ ॥ अथ नादस्य चतस्रोऽवस्थाः प्राह-आरंभश्चेति ॥ आरंभावस्था. घटावस्था परिचयावस्था निष्पत्त्यवस्था इति । सर्वयोगेषु सर्वेषु चित्तवृत्तिनिरोधोपायेषु शांभव्यादिषु व्यवस्थाचतुष्टयं स्यात् । चचैव- तथापिचाः पादपूरणार्थाः ॥ ६ ९ ॥

पृष्ठ 253

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8] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २४३ भाषार्थ--अब I नादकी चार अवस्थाओंका वर्णन करतेहैं कि, आरंभ अव-स्था- घटावस्था – परिचयावस्था और निष्पत्ति अवस्था ये चारअवस्था संपूर्ण चित्त- वृत्तिके निरोवरूपयोगोंमें होतीहैं अर्थात् शांभवीमुद्रादिकोंमें ये चारही अवस्था होती हैं ॥ ६ ९ ॥ अथारंभावस्था | ब्रह्मग्रंथेर्भवेद्भेदो ह्यानंदः शून्यसंभवः ॥ विचित्रः कणको देहेऽनाहृतः श्रूयते ध्वनिः ॥ ७० ॥

तत्रारंभावस्थामाह-ब्रह्मग्रंथेरिति ॥ ब्रह्मग्रंथेरनाहतचक्रे वर्तमा नाया भेदः प्राणयामाभ्यासेन भेदनं यदा भवेत्तदेति यत्तदोरध्या-हारः । आनंदयतीत्यानंद: आनंदजनकः शून्ये हृदाकाशे संभवतीति शून्यसंभवो हदाकाशोत्पन्नो विचित्रो नानाविधः क्वणो भूषण- निनदः स एव कणकः भूषणनिनदसदृश इत्यर्थः । ' भूषणानां तु शिजितम् । निक्काणो निक्कणः काणः कणः क्वणनमित्यपि' इत्यमरः । अनाहतो ध्वनिरनाहतो निर्ह्रादो देहे देहमध्ये श्रूयते श्रवणविषयो भवतीत्यर्थः ॥ ७० ॥

भाषार्थ -उन चारोंमें आरंभावस्था जो सबसे प्रथम है उसका वर्णन कर- तेहैं कि, अनाहतचक्रमें वर्तमान ब्रह्मग्रंथिका जब प्राणायामोंके अभ्याससे भेद होताहै तब आनंदका उत्पादक और हृदयाकाशरूप शून्यमें उत्पन्न -और अनेक- for और भूषणके शब्दकी तुल्य - अनाहत अर्थात् विना ताडनासे उत्पन्न ध्वनि ( शब्द ) देहके मध्यमें सुनता है-इस श्लोकमें कणकशब्दसे भूषणोंका शब्द–इस अमरके श्लोकसे लेना कि, भूषणोंके शब्दको शिजित निकाण- निकण -कण-कण कन कहतेहैं ॥ ७० ॥

दिव्यदेहश्व तेजस्वी दिव्यगंधस्त्वरोगवान् ॥ संपूर्णहृदयः शून्य आरंभो योगवान्भवेत् ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 254

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( ) | [ २४४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः दिव्यदेह इति ॥ शून्ये हृदाकाशे य आरंभो नादारंभस्तस्मिन सति हृदाकाशविशुद्धाकाश भ्रूमध्याकाशाः शून्यातिशून्यमहाशून्य- शब्दैर्व्यवहियंते योगिभिः । संपूर्णहृदयः प्राणवायुना सम्यक् पूर्ण हृदयं यस्य स तथा आनंदेन पूर्णे हृदये योगवान् योगी दिव्यों रूपलावण्यबलसंपन्नो देहो यस्य स दिव्यदेह: तेजस्वी प्रतापवान् दिव्यगंधः दिव्य उत्तमो गंधो यस्य स तथा अरोगवान् रोगरहितो भवेदिति संबंधः ॥ ७१ ॥

भाषार्थ-हृदाकाशरूप शून्यमें आरंभ ( नादका प्रारंभ ) होनेपर अर्थात् यदि हृदयमें नादकी प्रतीति होय तो प्राणवायुसे भलीप्रकार पूर्ण है हृदय जिसका और आनंदसे पूर्ण हृदयके होनेपर योगी-रूपलावण्यसे संपन्नरूप दिव्यदेह होताहै और तेजस्वी ( प्रतापी ) और उत्तम गंधवान् और रोगोंसे रहित होताहै यहां शून्यसे हृदयाकाश इसलिये कहाहै कि हृदाकाश विशुद्धाकाश भ्रुकुटिमध्यका आकाश इन तीनोंका क्रमसे शून्य अतिशून्य-महाशून्य शब्दोंसे व्यवहार योगी- जन करते हैं ॥ ७१ ॥

अथ घटावस्था ।

द्वितीयायां घटीकृत्य वायुर्भवति मध्यगः ॥

सो भवेद्योगी ज्ञानी देवसमस्तदा ॥ ७२ ॥

घटावस्थामाह-द्वितीयायामिति ॥ द्वितीयायां घटावस्थायां वायुः प्राणः घटीकृत्य आत्मना सहापानं नादबिंदू चैकीकृत्य मध्यगो मध्यचक्रगतः कण्ठस्थाने मध्यचक्रम् । तदुक्तमत्रैव जालंधरबंधे- 'मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबंधनम्' इति यदा भवेदित्यध्याहारः । तदास्यामवस्थायां योगी योगाभ्यासी दृढमासनं यस्य स दृढासनः स्थिरासनो ज्ञानी पूर्वापेक्षया कुशलबुद्धिर्देवसमो रूपलावण्याधिक्या- देवतुल्यो भवेत् । तदुक्तमीश्वरोक्ते राजयोगे-'प्राणापानौ नादबिंदू जीवात्मपरमात्मनोः । मिलित्वा घटते यस्मात्तस्मात्स घट:उच्यते ॥ ' इति ॥ ७२ ॥

पृष्ठ 255

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २४५ भाषार्थ- अब घटावस्थाको कहते हैं कि, दूसरी घटावस्थामें प्राण वायु अपने संग अपान और नाद बिंदु इनको एक करके कंठस्थानके विषे वर्तमान जो मध्यचक्र उसमें गत हो ( पहुंच ) जाता है सोई जालंधर बंधमें कह आये हैं कि, सोलह आधार हैं बंधन जिसका ऐसा यह मध्य चक्र जानना अर्थात् जब यह पूर्वोक्त अवस्था होजाय तो योगी उस अवस्थामें दृढ ( स्थिर ) आसन और ज्ञानी अर्थात पूर्वी अपेक्षासे कुशलबुद्धि और रूप लावण्यकी अधिकतासे देवतुल्य होजाताहै सोई ईश्वरोक्त राजयोगमें कहाहै कि, जिससे प्राण अपान नाद बिंदु जीवात्मा परमात्मा इनको मिलकर यह घटतीहै तिससे घटावस्था कहाती है ॥ ७२ ॥

विष्णुर्यथेस्ततो भेदात्परमानंद सूचकः ॥ अतिशून्ये विमर्दश्च भेरीशब्दस्तथा भवेत् ॥ ७३ ॥

विष्णुप्रथेरिति ॥ ततो ब्रह्मग्रंथिभेदनानंतरं विष्णुग्रंथेः कण्ठे वर्तमानाया भेदात्कुंभ कैर्भेदनात्परमानंदस्य भाविनो ब्रह्मानंदस्य सूचको ज्ञापकः । अतिशून्ये कण्ठावकाशे विमर्दोऽनेकनादसंमर्दो भेर्याः शब्द इव शब्दो भेरीशब्दो भेरीनादश्च तदा तस्मिन्काले भवेत् ॥ ७३ ॥

भाषार्थ -फिर ब्रह्मग्रंथिभेदनके अनंतर कंठके विषे वर्तमान जो विष्णुग्रंथि है उसके भेदसे अर्थात् कुंभकप्राणायामोंसे विष्णुग्रंथिके खुलनेपर होनेवाला जो परमानंद ( ब्रह्मानंद ) है उसका सूचक ( ज्ञापक ) अतिशून्यरूप कंठाकाशमें विमर्द अर्थात् भेरीके शब्द समान अनेकनार्दोका संमर्द और भेरीका शब्द उस -समय होतेहैं ॥ ७३ ॥

अथ परिचयावस्था ।

तृतीयायां तु विज्ञेयो विहायोमर्दलध्वनिः ॥

महाशून्यं तदा याति सर्वसिद्धिसमाश्रयम् ॥७४ ॥

परिचयावस्थामा सार्धद्वाभ्याम् -तृतीयायामिति ॥ तृतीयायां परिचयावस्थायां विहायोमर्दलध्वनिर्विहायसि भ्रूमध्याकाशे मर्दलस्य वाद्यविशेषस्य ध्वनिरिव ध्वनिर्विज्ञेयो विशेषेण ज्ञानार्हो भवति । तदा

पृष्ठ 256

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( ) | [ २४६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः तस्यामवस्थायां सर्वसिद्धिसमाश्रयं सर्वासां सिद्धीनामणिमादीनां समाश्रयं स्थानम् । तत्र संयमादणिमादिप्राप्ते महाशून्यं भ्रूमध्याकाशं याति गच्छति प्राण इति शेषः ॥ ७४ ॥

भाषार्थ -अब अढाई श्लोकोंसे परिचयावस्थाका वर्णन करते हैं कि, तीसरी परिचयावस्थामें भ्रुकुटिके मध्यरूप आकाशमें मर्दलनाम वाद्यविशेष ( ढोल ) की ध्वनि विशेष करके जाननी और उस अवस्थामें प्राणवायु संपूर्ण अणिमा आदि सिद्धियोंका समाश्रय जो ( स्थान ) महाशून्य है, भ्रूमध्याकाशरूप उसमें पहुंच जाता है क्योंकि महाशून्यमें वायुका संयम करनेसे अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है ॥ ७४ ॥

चित्तानंदं तदाजित्वा सहजानंदसंभवः ॥ दोषदुःखजराव्याधिक्षुधानिद्राविवर्जितः ॥ ७५ ॥

चित्तानंदमिति ॥ चित्तानंद नादविषयांतःकरणवृत्तिजन्यं सुखं जित्वाभिभूय सहजानंदसंभवः सहजानंदः स्वाभाविकात्मसुखं तस्य संभव आविर्भावः स दोषा वातपित्तकफा दुःखं तज्जन्या वेदना आध्यात्मिकादि च जरा वृद्धावस्था व्याधिर्ज्वरादिः क्षुधा बुभुक्षा निद्रा स्वाप एतैर्विवर्जितो रहितस्तदा योगी भवतीति ॥ ७५ ॥

भाषार्थ-और उस योगीका नादका विषय जो अंतःकरणकी वृत्ति है उससे उत्पन्नरूप जो चित्तका आनंद है उसका तिरस्कार करनेके अनंतर स्वाभाविक आत्मसुखरूप जो सहजानंद है उसका आविर्भाव ( प्रकटता ) होता है-फिर वह योगी वातपित्तकफरूप दोषोंका दुःख, वृद्ध अवस्था, और आध्यात्मिक दुःख, और FER आदि व्याधि क्षुधा ( भोजनकी इच्छा ) निद्रा-इनसे विवर्जित उस समय होता है ॥ ७५ ॥

रुद्रथं यदा भित्त्वा शर्वपीठगतोऽनिलः ॥ निष्पत्तौ वैष्णवः शब्दः कणद्वीणाकणो भवेत्॥७६ ॥

पृष्ठ 257

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- ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २४७ तदा कदेत्यपेक्षायामाह-रुद्रेति ॥ यदा रुद्रग्रंथिं भित्त्वा आज्ञा- चक्रे रुद्रग्रथिः शर्वस्येश्वरस्य पीठं स्थानं भ्रूमध्यं तत्र गतः प्राप्तोऽ-निलः प्राणो भवति तदा । निष्पत्त्यवस्थामाह-निष्पत्ताविति ॥ निष्पत्तौ निष्पन्त्यवस्थायाम् । ब्रह्मरंध्रे गते प्राणे निष्पत्त्यवस्था-भवति । वैणवः वेणोरयं वैणवो वंशसंबंधी शब्दो निनादः कणंती शब्दायमाना या वीणा तस्याः कणः शब्दो भवेत् ॥ ७६ ॥

भाषार्थ-जिस समय प्राण उस रुद्रग्रंथिका भेदन करके जो रुद्रग्रंथि आज्ञा- चक्रमें होती है शर्व ( ईश्वर ) का पीठ ( स्थान ) जो सुकुटीका मध्य है उसमें प्राप्त होजाताहै - अब निष्पत्तिअवस्थाका वर्णन करते हैं कि, निष्पत्तिअवस्थामें अर्थात् प्राणके ब्रह्मरंध्र में पहुंचने पर ऐसा वेणु ( घंश ) के शब्दकी तुल्य शब्द होता है जैसा शब्द करतीहुई वीणाका शब्द होता है ॥ ७६ ॥

एकीभूतं तदा चित्तं राजयोगाभिधानकम् ॥ सृष्टिसंहारकर्तासौ योगीश्वरसमो भवेत् ॥ ७७ ॥

एकीभूतमिति ॥ तदा तस्यामवस्थायां चित्तमंतःकरणमेकी- भूतमेकविषयीभूतम् । विषयविषयिणोरभेदोपचारात् । तद्राजयोगा- भिधानकं राजयोग इत्यभिधानं यस्य तद्राजयोगाभिधानकं चित्त- स्यैकतैव राजयोग इत्यर्थः ॥ सृष्टिसंहारेति । असौ नादानुसंधान- परो योगी सृष्टिसंहारकर्ता सृष्टिं संहारं च करोतीति तादृशः । अत- वेश्वरसम ईश्वरतुल्यो भवेत् ॥ ७७ ॥

भाषार्थ -उस निष्पत्ति अवस्थामें चित्त एकीभूत होजाता है अर्थात् विषय और विषयी ( ज्ञान ) इनका अभेद ( एकता ) होनेसे राज है नाम जिसका ऐसा यह चित्त होजाता है क्योंकि, चित्तकी एकाग्रताकोही राजयोग कहते हैं और वह योगी सृष्टि और संहारका कर्ता ईश्वरके समान होजाता है अर्थात् नादके अनुसंधानसे रचना और संहारका कर्ता ईश्वररूप होजाताहै ॥ ७७ ॥

अस्तु वा मास्तु वा मुक्तिरत्रैवाखंडितं सुखम् ॥ लयोद्भवमिदं सौख्यं राजयोगादवाप्यते ॥ ७८ ॥

पृष्ठ 258

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( ) | [ २४८ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः राजयोगमजानंतः केवलं हठकर्मिणः ॥ एतानभ्यासिनो मन्ये प्रयासफलवर्जितान् ॥ ७९ ॥

अस्तु वेति॥ राजयोगमिति॥ उभौ प्राग्व्याख्यातौ ॥७८॥७९ ॥

भाषार्थ-यद्यपि इन दोनों श्लोकोंका अर्थ पहिले लिख आये हैं तथापि यहांमी किंचित् लिखते हैं कि, मुक्ति हो वा मत हो इस नादानुसंधान कर- नेमेंही अखंड सुख होता है और लयसे उत्पन्न हुआ यह सुख राजयोगसे प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ और जो योगी राजयोगको नहीं जानते हैं और हठयोगकी

क्रियाको करते हैं उन अभ्यासियोंको मैं परिश्रमके फलसे वर्जित मानताहूं अर्थात् उनको हठयोगका फल नहीं होता है ॥ ७९ ॥

उन्मन्यवाप्तये शीघ्रं भ्रूध्यानं मम संगतम् ॥ राजयोगपदं प्राप्तुं सुखोपायोऽल्पचेतसाम् ॥ सद्यः प्रत्ययसंधायी जायते नादजो लयः ॥ ८० ॥

उन्मन्यवाप्तय इति ॥ शीघ्रं त्वरितमुन्मन्या उन्मन्यवस्थाया अवाप्तये प्राप्त्यर्थं भ्रूध्यानं भ्रुवोर्ध्यानं भ्रूमध्ये ध्यानं मम स्वात्मारा- मस्य संगतम् । राजयोगो योगानां राजा तदेव पदं राजयोगपदं तुर्यावस्थाख्यं प्राप्तुं लब्धुं पूर्वोक्तभ्रूध्यानरूपः सुखोपायः सुख- साध्यः उपायः सुखोपायः अल्पचेतसामल्पबुद्धीनामपि । किमुता- न्येषामित्यभिप्रायः । नादजः नादाज्जातो लयश्चित्तविलयः सद्यः शीघ्रं प्रत्ययं प्रतीतं संदधातीति प्रत्ययसंधायी प्रतीतिकरो जायते प्रादुर्भवति ॥ ८० ॥

भाषार्थ-उन्मनीअवस्थाकी शीघ्र प्राप्तिके लिये मुझ स्वात्मारामयोगीको • कुटियोंके मध्यमें जो ध्यान है वह संमतहै और सब योगोंका राजारूप जो राजयोग है उस तुर्यअवस्थानामके राजयोगकी प्राप्तिके लिये पूर्वोक्त कुटियोंका ध्यानही अल्पबुद्धियों के लिये सुख ( सरल ) उपाय है- और नादसे उत्पन्नभया जो चित्तका विलय है वह शीघ्रही प्रतीतिको करनेवाला होता है ॥ ८० ॥

पृष्ठ 259

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] - ( ) ४. संस्कृत टीका भाषाटीकासमेता । २४९ नादानुसंधानसमाधिभाजां योगीश्वराणां हृदि वर्धमानम् ॥ आनंदमेकं वचसामगम्यं जानाति तं श्रीगुरुनाथ एकः ॥ ८१ ॥

नादानुसंधानेति ॥ नादस्यानाहतध्वनेरनुसंधानमनुचिंतनं तेन समाधिश्चित्तैकाय्यं तं भजतीति नादानुसंधानसमाधिभाजस्तेषां योगिषु योगयुक्तेष्वीश्वराः समर्थास्तेषां हृदि हृदये वर्धत इति वर्धमा- नस्तं वर्धमानं वचसां वाचामगम्यम् । इदमिति वक्तुमशक्यं तं योग-शास्त्रप्रसिद्धमेकं मुख्यमानंदमाह्लादमेकोऽनन्यः श्रीगुरुनाथः श्रीमान् गुरुरेव नाथो जानाति वेत्ति । एतेन नादानुसंधानानंदो गुरुगम्य एवेति सूचितम् ॥ ८१ ॥

भाषार्थ -अनाहतध्वनिरूप जो नाद है उसके अनुसंधान ( स्मरण ) से जो चित्तकी एकाग्रतारूप समाधि है उसके कर्ता जो योगीश्वर ( योगियोंमें जो उत्तम ) हैं उनके हृदयमें बढताहुआ और घाणी जिसको 'यह है' इसप्रकार नहीं कहसकती है - ऐसा जो योगशास्त्रमें प्रसिद्ध एक ( मुख्य ) आनंद होता है एक श्रीगुरुनाथ अर्थात् श्रीयुत गुरुस्वामीही जानते हैं -इससे यह सूचित किया कि नादके अनुसंधानका आनंद गुरुकी दयासेही प्रतीत हो सकता है अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता ॥ ८१ ॥

कर्णौ पिधाय हस्ताभ्यां यं शृणोति ध्वनिं मुनिः ॥ तत्र चित्तं स्थिरीकुर्याद्यावत्स्थिरपदं व्रजेत् ॥ ८२॥

नादानुसंधानात्प्रत्याहारादिक्रमेण समाधिमाह-कर्णावित्या- दिभिः ॥ मुनिर्मननशीलो योगी हस्ताभ्यामित्यनेन हस्तांगुष्ठौ लक्ष्येते । ताभ्यां कर्णौ श्रोत्रे पिधाय । हस्तांगुष्ठौ श्रोत्रविवरयोः कृत्वेत्यर्थः । यं ध्वनिमनाहतनिःस्वनं शृणोत्याकर्णयति तत्र तस्मिन् ध्वनौ चित्तं स्थिरीकुर्यादस्थिरं स्थिरं संपद्यमानं कुर्यात् । यावत्स्थिरं पदं स्थिरपदं तुर्याख्यं गच्छेत् । तदुक्तम्-तुर्यावस्था चिदभिव्यंजक-

पृष्ठ 260

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( ) [ २५० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः नादस्य वेदनं प्रोक्तमिति नादानुसंधानेन वायुस्थैर्यमणिमादयोऽपि भवतीति । उक्तं च त्रिपुरसारसमुच्चये-'विजितो भवतीह तेन वायुः सहजो यस्य समुत्थितः प्रणादः । अणिमादिगुणा भवंति तस्यामित- पुण्यं च महागुणोदयस्य ॥ सुरराजतनूजवैरिरंध्रे विनिरुध्य स्वकरां लिद्वयेन । जलधेरिव धीरनादमंतः प्रसरतं सहसा शृणोति मर्त्यः ॥ ” इति । सुरराज इंद्रस्तस्य तनूजोऽर्जुनस्तस्य वैरी कर्णस्तद्र्ध्रे स्पष्ट- मन्यत् ॥ ८२ ॥

भाषार्थ- नादके अनुसंधानसे प्रत्याहार आदिके क्रमसे समाधिका वर्णन करतेहैं कि मननका कर्ता योगी हाथोंके अंगूठोंसे कर्णोको ढककर अर्थात् अंगू- ठोंको कर्णोंके छिद्रोंमें लगाकर जिस अनाहतध्वनिको सुनताहै उस अनाहत- ध्वनिमें अस्थिरभी चित्तको तबतक स्थिर करे जबतक तुर्यावस्थारूप स्थिरपदको प्राप्त न हो -सोई कहाहै कि, तुर्यावस्था, चेतनका अभिव्यंजक ( ज्ञापक ) जो नाद उसका ज्ञानरूप है और नादके अनुसंधानसे वायुकी स्थिरता और अणिमा आदि सिद्धिभी होतीहै -और त्रिपुरसारसमुच्चयमेंभी कहाहै कि जिस योगीके देहमें स्वाभाविक नाद भलीप्रकार उठताहै वह वायुको जीतलेताहै और उसको अणिमा आदिगुण, और उस महोदयको अतुल पुण्य होतेहैं, अपने हाथकी दो अंगुलियोंसे कर्णोंके छिद्रोंको रोककर-समुद्रके समान धीर जो नाद देहके भीतर फैलाताहै उसको मनुष्य ( योगी ) शीघ्रही सुनताहै ॥ ८२ ॥

अभ्यस्यमानो नादोऽयं बाह्यमावृणुते ध्वनिम् ॥ पक्षाद्विक्षेपमखिलं जित्वा योगी सुखी भवेत्॥ ८३॥

अभ्यस्यमान इति ॥ अभ्यस्यमानोऽनुसंधीयमानोऽयं नादोऽ-नाहताख्यो बाह्यं ध्वानं बहिर्भवं शब्दमावृणुते श्रुत्योर्विषयम् । योगी नादाभ्यासी पक्षान्मासार्थादखिलं सर्वं विक्षेपं चित्तचांचल्यं जित्वाs-भिभूय सुखी स्वानंदो भवेत् ॥ ८३ ॥