हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 261–270

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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] ( ) ४॰ संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । २५१ भाषार्थ--अभ्यास कियाहुआ अर्थात् अनुसंधान किया यह नाद बाहिरका जोशब्द है उसका आवरण करताहै अर्थात् बाह्यके शब्दकोभी योगी सुनले- ताहै और वह नादका अभ्यासी योगी एक पक्षभरसेही चित्तकी चंचलता रूप संपूर्ण विक्षेपको जीतकर सुखी होताहै अर्थात् आत्मानंदरूप सुखको प्राप्त होताहै ॥ ८३ ॥

श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो महान् ॥ ततोऽभ्यासे वर्धमाने श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मकः ॥ ८४ ॥

श्रूयत इति ॥ प्रथमाभ्यासे पूर्वाभ्यासे नानाविधोऽनेकविध महान् जलधिजीमूतभेर्यादिसदृशो नादोऽनाहतस्वनः श्रूयते आकर्ण्यते । ततोऽनंतरमभ्यासे नादानुसंधानाभ्यासे वर्धमाने सति सूक्ष्मसूक्ष्मक:- सूक्ष्मः सूक्ष्म एव श्रूयते श्रवणविषयो भवति ॥ ८४ ॥

भाषार्थ-प्रथम २ के अभ्यासमें अनेक प्रकारका अर्थात् समुद्र मेत्र मेरीके शब्दकी तुल्य महान् ( भारी ) नाद सुना जाताहै और उसके अनंतर अभ्यासके. होनेपर सूक्ष्म २ शब्द सुना जाताहै ॥ ८४ ॥

आदौ जलधिजीमूतभेरीझर्झरसंभवाः ॥ मध्ये मर्दलशंखोत्था घंटाकाहलजास्तथा ॥ ८५ ॥

नानाविधं नादमाह द्वाभ्याम् आदाविति ॥ आदौ वायोर्ब्रहारं- श्रगमनसमये जलधिः समुद्रो जीमूतो मेघो मेरी वाद्यविशेषः । 'भेरी स्त्री दुंदुभिः पुमान्' इत्यमरः । झर्झरो वाद्यविशेषः । 'वाद्यप्रभेदा डमरुमड्डुडिंडिमझर्झराः । मर्दलः पणवोऽन्येऽपि' इत्यमरः । जलधि- प्रमुखेभ्यः संभव इव संभवो येषां ते तथा मध्ये ब्रह्मरंध्रे वायोः स्थैर्यानंतरं मर्दलो वाद्यविशेषः शंखो जलजस्ताभ्यामुत्था इव मर्दल- शंखथाः । घौ वाद्यविशेषौ ताभ्यां जाता इव घंटाका- हलजाः ॥ ८५ ॥

पृष्ठ 262

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-(( )) || [ २५२२५२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः भाषार्थ - अब दो श्लोकोंसे नाना प्रकारके नादका घर्णन करतेहैं कि प्रथम २ प्राणवायुके ब्रह्मरंध्रमें गमनसमयमें समुद्र, मेघ, भेरी ( धोंस ) जो बाजे हैं और झर्झरी ( झांझ ) जो वाद्यविशेष हैं उनके शब्दके समान शब्द ब्रह्मरंध्रमें सुने जातेहैं और मध्यमें अर्थात् सुषुम्नामें प्राणवायुकी स्थिरताके अनंतर मर्दल, शंख, इनके शब्दक तुल्य शब्द सुने जातेहैं और तिसप्रकार घंटा और काहलनामके जो बाजे हैं उनके शब्दकी सदृश शब्दभी प्रतीत होते हैं ॥ ८५ ॥

अंते तु किंकिणीवंशवीणाभ्रमरनिःस्वनाः ॥ इति नानाविधा नादाः श्रूयंते देहमध्यगाः ॥८६॥

अंते त्विति ॥ अंते तु प्राणस्य ब्रह्मरंध्रे बहुस्थैर्यानंतरं तु किंकिणी क्षुद्रघंटिका वंशो वेणुः वीणा तंत्री भ्रमरो मधुपः तेषां निःस्वना इति पूर्वोक्ताः नानाविधा अनेकप्रकारका देहस्य मध्ये गताः प्राप्ताः श्रूयं ॥ ८६ ॥

भाषार्थ -फिर प्राणकी ब्रह्मरंध्रमें स्थिरताके अंतमें किंकिणी -वंश-वीणा- भ्रमर इनके शब्दकी तुल्य शब्द सुनेजातेहैं- इस प्रकार देहके मध्यमें नाना प्रकारके शब्द सुनेजातेहैं ॥ ८६ ॥

महति श्रूयमाणेऽपि मेघभेर्यादिके ध्वनौ ॥ तत्र सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ॥ ८७ ॥

महतीति ॥ मेघश्च भेरी च ते आदी यस्य स मेघभेर्यादिकस्त- स्मिन् । मेघभेरीशब्दौ तज्जन्यनिर्घोषूपरौ । महति बहुले ध्वनी निदे श्रयमाणे आकर्ण्यमाने सत्यपि तत्र तेषु नादेषु सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरमति-सूक्ष्मं नादमेव परामृशेच्चिन्तयेत् । सूक्ष्मस्य नादस्य चिरस्थायित्वा-तत्रासक्तचित्तश्चिरं स्थिरमतिर्भवेदिति भावः ॥ ८७ ॥

भाषार्थ -मेव, भेरी, आदिका जो महान् शब्द है उसकी तुल्य शब्दके सुननेपरभी उन शब्दोंमें सूक्ष्मसेभी सूक्ष्म जो नाद है उसका चिंतन करे क्योंकि सूक्ष्मनाद चिरकालतक रहताहै उसमें आसक्त हुआहै चित्त जिसका ऐसा मनुष्य भी चिरकालतक स्थिरमति होजाताहै ॥ ८७ ॥

पृष्ठ 263

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २५३

वनमुत्सृज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममुत्सृज्य वा घने ॥

रममाणमपि क्षिप्तं मनो नान्यत्र चालयेत् ॥ ८८ ॥

घनमिति ॥ घनं महांतं नादं मेघभेर्यादिकमुत्सृज्य घने वा नादे रममाणं घनसूक्ष्मान्यतरनादग्रहणपरित्यागाभ्यां क्रीडतमपि

क्षिप्तं रजसात्यंतचंचलं मनोऽन्यत्र विषयांतरे न चालयेन्न प्रेरयेत् ।

क्षिप्तं मनो विषयांतरासक्तं न समाधीयते नादेषु रममाणं तु समाधी-यत इति भावः ॥ ८८ ॥

भाषार्थ-मेव, भेरी आदिके महान् नादको त्यागकर सूक्ष्ममें वा सूक्ष्म- नादको त्यागकर महान्नादमें रमण करतेहुये रजोगुणसे अत्यंत चंचल चित्तको अर्थात् महान्, सूक्ष्म शब्दके ग्रहण वा परित्यागसे क्रीडा करतेहुये मनको चलायमान न करै-क्योंकि, विषयांतरोंमें आसक्त मन समाधान नहीं होसकताहै और नादमें रमताहुआ जो मन उसका समाधान होसकताहै ॥ ८८ ॥

यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः ॥ तत्रैव सुस्थिरीभूय तेन सार्धं विलीयते ॥ ८ ९ ॥ यत्रेति ॥ वा अथवा यत्रकुत्रापि नादे यस्मिन्कस्मिश्चिद्धने सूक्ष्मे वा नादे प्रथमं पूर्व मनो लगति लग्नं भवति तत्रैव तस्मिन्नेव नादे सुस्थिरीभूय सम्यक् स्थिरं भूत्वा तेन नादेन सार्धं साकं विलीयते लीनं भवतीत्यर्थः । अत्र पूर्ववाक्येन प्रत्याहारा द्वितीयेन धारणा तृतीयेन ध्यानद्वारा समाधिरुक्तः ॥ ८९ ॥

भाषार्थ -अथवा जिस किसी घन वा सूक्ष्म नादमें प्रथम मन लगे उसी नादमें भलीप्रकार स्थिर होकर उसी नादके संग लय होजाताहै —यहां पूर्व वाक्यसे प्रत्याहार दूसरेसे धारणा और तीसरेसे ध्यानके द्वारा समाधि कही है ॥ ८ ९ ॥ मकरंद पिबन्भृंगो गंधं नापेक्षते यथा ॥ नादासक्तं तथा चित्तं विषयान्न हि कांक्षते ॥ ९० ॥

पृष्ठ 264

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( ) | [ २५४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः मकरंदमिति ॥ मकरंदं पुष्परसं पिबन् धयन् भृंगो भ्रमरो गंधं यथा नापेक्षते नेच्छति । तथा नादासक्तं नाद आसक्तं चित्तमंतःकरणं विषयान् विषिण्वंत्यवबध्नति प्रमातारं स्वसंगेनेति विषयाः स्रक्चंदनवनितादयस्तान् न कांक्षते नेच्छति । हीति निश्चये ॥ ९ ० ॥ भाषार्थ -जैसे मकरंद ( पुष्पका रस ) का पान करताहुआ भ्रमर पुष्पके गंधकी अपेक्षा नहीं करताहै तिसीप्रकार नादमें आसक्त हुआ चित्त भी अपने बंधनके कर्ता जो स्रक् चंदन आदि विषय हैं उनकी आकांक्षा नहीं करताहै यह निश्चित है ॥ ९० ॥

मनो मत्तगजेंद्रस्य विषयोद्यानचारिणः ॥ नियन्त्रणे समर्थोऽयं निनादनिशितांकुशः ॥९ १ ॥ मन इति ॥ विषयः शब्दादिरेवोद्यानं वनं तत्र चरतीति विषयो- धानचारी तस्य मन एव मत्तगजेंद्र: । दुर्निवारत्वात् । तस्य निनाद एवानाहतध्वनिरेव निशितांकुशः तीक्ष्णांकुशः नियंत्रणे परावर्तने समर्थः शक्तः । एतैः श्लोकः । 'चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । यत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ॥ ' इंद्रियाणां विषयेभ्यः प्रत्याहरणं प्रत्याहार इत्युक्तलक्षणः प्रत्याहारः प्रोक्तः ॥ ९ १ ॥ भाषार्थ-शब्द आदि विषयरूप जो उद्यान उसमें विचरता हुआ जो मनरूप उन्मत्तं गजेंद्र है उसके परावर्तन ( लौटाना ) में यह-नादरूप जो तीक्ष्ण अंकुश है वही समर्थ है-इन श्लोकोंसे इंद्रियोंका विषयोंसे वह प्रत्याहार कहाहै जो इस श्लोकमें कहाहै कि विषयोंमें क्रमसे चरते हुये जो नेत्र आदि इंद्रिय हैं उनकी जो विषयोंसे निवृत्ति उसको प्रत्याहार कहतेहैं ॥ ९ १ ॥ बद्धं तु नादबंधेन मनः संत्यक्तचापलम् ॥ प्रयाति सुतरां स्थैर्य छिन्नपक्षः खगो यथा ॥ ९ २ ॥

पृष्ठ 265

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २५५ बद्धं त्विति ॥ नाद एव बंधः बध्यतेऽनेनेति बंधः बंधनसाधनं तेन स्वशक्त्या स्वाधीनकरणेन बद्धं बंधनमिव प्राप्तम् । नादधारणा- दावासक्तमित्यर्थः । अत एव सम्यक् त्यक्तं चापलं क्षणेक्षणे विषय- ग्रहणपरित्यागरूपं येन तत्तथा मनः सुतरां स्थैर्य प्रयाति नितरां धारणमेति । तत्र दृष्टांतमाह -छिन्नौ पक्षौ यस्य तादृशः खे गच्छतीति खगः पक्षी यथा । एतेन-'प्राणायामेन पवनं प्रत्याहारेण चेंद्रियम् । वशीकृत्य ततः कुर्याच्चित्तस्थैर्य शुभाश्रये ॥ शुभाश्रये चित्तस्थापनं धारणेत्युक्तलक्षणा धारणा प्रोक्ता ॥ ९ २ ॥ भाषार्थ -नादरूप जो बंधनका साधन है उससे अपनी शक्तिके अनुसार बंधनको प्राप्त हुआ मन अर्थात् नादकी धारणा आदिमें आसक्त हुआ चित्त और इसीसे भलीप्रकार त्यागदीहै क्षण २ में विषयोंका ग्रहणरूप चपलता जिसने ऐसा मन निरंतर स्थिरताको प्राप्त होताहै अर्थात् धारणाको प्राप्त इस प्रकार होताहै जैसे छेदन किये हैं पक्ष जिसके ऐसा पक्षी होजाताहै इस श्लोकसे शुभ आश्रयमें चित्तका स्थापनरूप उस धारणाको कहाहै जो इस वचनमें कहीहै कि प्राणाया- मसे पवनको और प्रत्याहारसे इंद्रियोंको वशमें करके शुभाश्रय ( ब्रह्मरंध्र ) में चित्तकी स्थिरताको करै ॥ ९ २ ॥ सर्वचिंतां परित्यज्य सावधानेन चेतसा ॥ नाद एवानुसंधेयो योगसाम्राज्यमिच्छता ॥ ९ ३ ॥ सर्वचिंतामिति ॥ सर्वेषां बाह्याभ्यंतरविषयाणां या चिंता . चिंतनं तां परित्यज्य त्यक्त्वा सावधानेनैकाग्रेण चेतसा योगानां साम्राज्यं सम्राजो भावः । योगशब्दोऽशद्यिजंतः । राजयोगित्वमिति यावत् । इच्छता वांछता पुंसा नाद एवानाहतध्वनिरेवानुसंधेयोऽनु- चिंतनीयः । नादाकारवृत्तिप्रवाहः कर्तव्य इत्यर्थः । एतेन तद्रूपप्र- त्ययैकाय्यसंततिश्चान्यनिस्पृहा । तद्ध्यानं प्रथमैरंगैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप । तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानमित्युक्तलक्षणं ध्यानमुक्तम् ॥ ९ ३ ॥

पृष्ठ 266

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( ) [: २५६ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश भाषार्थ -बाह्य और भीतरके जो संपूर्ण विषय हैं उनकी चिंताको त्यागकर सावधान ( एका ) चित्तसे राजयोगका अभिलाषी योगी नादकाही अनुसंधान करै अर्थात् नादाकार वृत्तिका प्रवाह करे इससे वह चित्तकी प्रत्ययैकतानतारूप ध्यान कहा जो इस वचनमें कहाहै कि ब्रह्मरूप प्रत्ययकी जो एकाग्र ( एकरस ) संतति और अन्य विषयोंकी निःस्पृहा वह ध्यान हे नृप! छः प्रथम अंगोंसे प्राप्त होताहै अर्थात् उसकी प्राप्तिके छः अंग-कारण हैं ॥ ९ ३ ॥ नादोंतरंगसारंगबंधने वागुरायते ॥ अंतरंगकुरंगस्य वधे व्याधायतेऽपि च ॥ ९ ४ ॥ नादोंऽतरंगेति ॥ नादः अंतरंग मन एव सारंगी मृगस्तस्य बंधने चांचल्यहरणे वागुरायते वागुरेवाचरति वागुरा जालम् । यथा वागुरा बंधनेन सारंगस्य चांचल्यं हरति तथा नादोंऽतरंगस्य स्वशक्त्या चांचल्यं हरतीत्यर्थः । अंतरंगं मन एव सारंगी हरिणस्तस्य बंधने नानावृत्त्युत्पादनापनयनमेव मनसो बंधस्तस्मिन् व्याधायते व्याध इवाचरति । यथा व्याधो वागुराबद्धं मृगं हंति एवं नादोऽपि स्वासक्तं मनो हंतीत्यर्थः ॥ ९४ ॥

भाषार्थ-नाद अंतरंग ( मन ) जो सारंग मृग उसके बंधन ( चंचलताका हरण ) में वागुरा ( मृगबंधनमें जाल ) के समान है अर्थात् जैसे वागुराके बंधनसे मृगकी चंचलता हरी जाती है इसीप्रकार नादभी मनकी चंचलताको अपनी शक्तिसे. हरताहै और नादही अंतरंग ( मन ) हरिणके बंधनमें व्याधके समान है अर्थात् जैसे व्याध वागुरामें बंधेहुये मृगको हरताहै इसीप्रकार अपनेमें आसक्तहुये मनको नादभी हरताहै अर्थात् नानावृत्ति जो मनमें उत्पन्न होतीहैं उनको दूर करताहै ॥ ९ ४ ॥ अंतरंगस्य यमिनो वाजिनः परिघायते ॥ नादोपास्तिरतो नित्यमवधार्या हि योगिना ॥१५ ॥

अंतरंगस्येति ॥ यमिनो योगिनोंऽतरंग मनस्तस्य चपलत्वाद्वा-जिनोऽश्वस्य परिघायते वाजिशालाद्वारपरिघ इवाचरति नाद इति

पृष्ठ 267

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २५७ शेषः । यथा वाजिशालापरिघो वाजिनोऽन्यत्र गतिं रुणद्धि तथा नादोंऽतरंगस्येत्यर्थः । अतःकारणाद्योगिना नादस्योपास्तिरूपासना.

नित्यं प्रत्यहमवधार्यावधारणीया । हीति निश्चयेऽव्ययम् ॥ ९ ५ ॥

भाषार्थ -और योगीजनका जो अंतरंग ( मन ) रूप वाजी है उसके परिच अर्थात् घुडशालाके द्वारमें अवरोधक लोहदंडके समान नाद है निदान जैसे वाजिशालाका परिघ वाजीकी अन्यत्र गतिको रोकताहै इसीप्रकार नादभी मनकी । अन्यत्र विषयादिकोंमें जो गति है उसको रोकेहै इस कारणसे योगीजन निश्चय: करके नादकी उपासनाका निश्चय करै ॥ ९ ५ ॥ बद्धं विमुक्तचांचल्यं नादगंधकजारणात् ॥ मनः पारदमा प्रोति निरालंबाख्यखेऽटनम् ॥ ९ ६ ॥ बद्धमिति ॥ नाद एव गंधक उपधातुविशेषस्तेन जारणं जार-- णीकरणं नादगंधक संबंधेन चांचल्यहरणं तस्माद्वद्धं नादैकासक्तम् । पक्षे गुटिकाकृति प्राप्तम् अत एव विमुक्तं त्यक्तं चांचल्यमनेकविष-- याकारपरिणामरूपं येन । पक्षे विमुक्तलौल्यं मनः पारदं मन एव पारदं चंचलं निरालंबं ब्रह्म तदेवाख्या यस्य तन्निरालंबाख्यं तदेव खमपरिच्छिन्नत्वात्तस्मिन्नटनं गमनं तदाकारवृत्तिप्रवाहम् । पक्षे ॥ आकाशगमनं प्राप्नोति । यथा बद्धं पारदमाकाशगमनं करोति । एवं. बद्धं मनो ब्रह्माकारवृत्तिप्रवाहमविच्छिन्नं करोतीत्यर्थः ॥ ९६ ॥

भाषार्थ-नादरूप जो गंधक उससे जारण ( भस्म ) करनेसे अर्थात् नाद गंधकके संयोगसे चंचलताके हरनेसे बद्ध ( एकनादमेंही आसक्त ) और पाराके पक्षमें गुटिकारूप हुआ समझना और जारणसेही त्यागदिया है विषयाकार परि--नामरूप चांचल्य जिसने और पाराके पक्षमें त्यागदी है स्वाभाविक चंचलता जिसने वह समझना ऐसा मनरूप पारद ( चंचलरूप ) निरालंब नामके आकाश-रूप अपरिच्छिन्न ब्रह्ममें गमनको अर्थात् ब्रह्माकार वृत्तिके प्रवाहको प्राप्तः होताहै और पा rके पक्षमें आकाशगमनको प्राप्त होना समझना तात्पर्य्य १७

पृष्ठ 268

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( ) | [ २५८ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः यह है कि, इसप्रकार बंधाहुआ मन निरवच्छिन्न ( एकरस ) ब्रह्माकार वृत्तिके प्रवाहको करताहै ॥ ९ ६ ॥ नादश्रवणतः क्षिप्रमंतरंगभुजंगमः ॥ विस्मृत्य सर्वमेकाग्रः कुत्रचित्र हि धावति ॥ ९ ७ ॥ नादेति ॥ नादस्यानाहतस्वनस्य श्रवणतः श्रवणात क्षिप्रं द्रुत- मंतरंगं मन एव भुजंगमः सर्पश्चपलत्वान्नादप्रियत्वाच्च भुजंगमरूपत्वं मनसः । सर्वं विश्वं विस्मृत्य विस्मृतिविषयं कृत्वैकायो नादाकारवृ-त्तिप्रवाहवान् सन्कुत्रापि विषयांतरे नहि धावति नैव धावनं करोति । ध्यानोत्तरैः श्लोकैः । 'तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यः समाधिः सोऽभिधीयते ॥ ' इति विष्णुपुराणो- क्तलक्षणेन 'तदेवार्थमात्रनिर्मासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ' इति पातं-'जलसूत्रोक्तलक्षणेन च संप्रज्ञातलक्षणः समाधिरुक्तः ॥ ९७ ॥

भाषार्थ--अनाहत शब्दरूप नादके श्रवणसे शीघ्रही मनरूप भुजंगम ( सर्प ) यहां चपल और नादनिय होनेसे मनको भुजंगम समझना संपूर्ण विश्वका विस्म-रण करके एकाग्र हुआ अर्थात् नादाकारवृत्तिप्रवाही होकर किसी विषयमें नहीं दौडताहै ध्यानसे पीछे कहेहुये श्लोकोंसे इस विष्णुपुराणके वचन और इस पातंजल सूत्रमें क्रमसे कहीहुई समाधि और संप्रज्ञात समाधि कही है कि, उसकाही कल्पनाहीन जो स्वरूपका ग्रहण मनसे है वही ध्यानसे उत्पन्न होताहै और उसकोही समाधि कहतेहैं उस आत्माकाही जो अर्थमात्र निर्मास स्वरूप शून्यके समान है उसको संप्रज्ञात समाधि कहतेहैं ॥ ९७ ॥

काष्ठे प्रवर्तितो वह्निः काष्ठेन सह शाम्यति ॥ नादे प्रवर्तितं चित्तं नादेन सह लीयते ॥ ९ ८ ॥ काष्ठ इति ॥ काष्ठे दारुणि प्रवर्तितः प्रज्वालितो वह्निः काष्ठेन सह शाम्यति ज्वालारूपं परित्यज्य तन्मात्ररूपेणावतिष्ठते यथा तथा ।

पृष्ठ 269

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २५ ९ नादे प्रवर्तितं चित्तं नादेन सह लीयते । राजसतामसवृत्तिनाशात्सत्त्व- मात्रावशेषं संस्कारशेषं च भवति । तत्र च मैत्रायणीयमंत्रः । 'यथा निरिंधनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोना- वुपशाम्यति' इति ॥ ९८ ॥

भाषार्थ -काष्ठमें प्रवृत्त की अर्थात् जलाईहुई अनि ज्वालारूपको त्यागकर जैसे काष्टके संग शांत होजातीहै अर्थात् काष्ठरूप रहजाती है तिसीप्रकार नादमें प्रवृत्त किया चित्त नादके संग लीन होजाताहै अर्थात् रजोगुणी और तमोगुणी वृत्तियोंके नाशसे सत्तामात्र वा संस्कारमात्र शेष रहजाताहै इसमें मैत्रायणीय शाखाका यह मंत्र प्रमाण है कि जैसे इंधनरहित अग्नि अपने योनिरूप काष्ठमें शांत होता है इसीप्रकार वृत्तियोंके क्षयसे चित्तभी अपनी योनि ( ब्रह्म ) में शांत होजाताहै ॥ ९८ ॥

घंटादिनाद सक्तस्तब्धांतःकरणहरिणस्य ॥ प्रहरणमपि सुकरं शरसंधानप्रवीणश्चेत् ॥ ९९ ॥

घंटादीति ॥ घंटा आदिर्येषां शंखमर्दलझर्झरदुंदुभिजीमूतादीनां ते घंटादयस्तेषां नादस्तेषु सक्तः । अत एव स्तब्धो निश्चलो योऽतः- करणमेव हरिणो मृगस्तस्य प्रहरणं नानावृत्तिप्रतिबंधनमंतःकरण- पक्षे । हरिणपक्षे तु प्रहरणं हननमपि शरवद्द्रुतगामिनो वायोः संधा- नसुषुम्नामार्गेण ब्रह्मरंध्रे निरोधनपक्षे शरस्य बाणस्य संधानं धनुषि योजनं तस्मिन् प्रवीणः कुशलश्चेत्सुकरं सुखेन कर्तुं शक्यम् ॥ ९९ ॥

भाषार्थ-घंटा आदि जिनके ऐसे जो शंख, मर्दल, झर्झर, दुंदुभी आदिके नाद हैं उनमें आसक्त और निश्चल जो अंतःकरणरूप मृग उसका प्रहार कर- नाभी सुर है यदि बाणके संधानमें मनुष्य प्रवीण हो यहां अंतःकरणका प्रहार नाना वृत्तियोंका प्रतिबंधरूप लेना और हरिणपक्षमें हनन लेना और बागका संधानमी बाणके समान शीघ्रगामी जो वायु उसका सुषुम्नामार्गसे ब्रह्मरंध्रमें प्रवेश करलेना और हरिणाक्षमें धनुषपर बाणका योजन ( लगाना ) लेना ॥ ९९ ॥

पृष्ठ 270

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{ ) | [ २६० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः अनाहतस्य शब्दस्य ध्वनिर्य उपलभ्यते ॥ ध्वरंतर्गतं ज्ञेयं ज्ञेयस्यांतर्गतं मनः ॥ मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥१०० ॥

अनाहतस्येति ॥ अनाहतस्य शब्दस्यानाहतस्वनस्य यो ध्वनि-निर्ह्राद उपलभ्यते श्रूयते तस्य ध्वनेरंतर्गतं ज्ञेयं ज्योतिः स्वप्रकाशचैतन्यं-ज्ञेयस्यांतर्गतं ज्ञेयाकारतामापन्नं मनोऽतःकरणं तत्र ज्ञेये मनो विलयं याति परवैराग्येण सकलवृत्तिशून्यं संस्कारशेषं भवति । तद्विष्णो- विभोरात्मनः परममंतः करणवृत्त्युपाधिराहित्यान्निरुपाधिकं पद्यते गम्यते योगिभिरिति पदं स्वरूपम् ॥ १०० ॥

भाषार्थ-अनाहत अर्थात् विनाताडनाके उत्पन्न जो शब्द उसकी जो ध्वनि प्रतीत होती है, उसध्वनिके अंतर्गतही ज्ञेयरूप प्रकाशमान चैतन्य है और उस ज्ञेयके अंतर्गत अंतःकरणरूप मन है और उस ज्ञेयमेंही मन विलयको प्राप्त होताहै अर्थात् परमवैराग्यसे संपूर्ण वृत्तियोंसे शून्य होकर संस्कारमात्र शेष रह- जाताहै और वही विष्णु ( व्यापक ) आत्माका परमपद है अर्थात् योगीजनोंकी प्राप्तिके योग्य अंतःकरणकी वृत्तिरूप उपाधिसे रहित आत्मारूप है ॥ १०० ॥

तावदाकाशसंकल्पो यावच्छन्दः प्रवर्तते ॥ निःशब्दं तत्परं ब्रह्म परमात्मेति गीयते ॥ १०१ ॥

तावदिति ॥ यावच्छन्दोऽनाहतध्वनिः प्रवर्तते श्रूयते ताव- दाकाशस्य सम्यक्कल्पनं भवति । शब्दस्याकाशगुणत्वाद्गुणगुणिनोरभे- दाद्वा मनसा सह शब्दस्य विलयान्निःशब्द शब्दरहितं यत्परं ब्रह्म परब्रह्मशब्दवाच्यं परमात्मेति गीयते परमात्मशब्देन स उच्यते । सर्ववृत्तिविलये यः स्वरूपेणावस्थितः स एव परब्रह्मपरमात्मशब्दा- भ्यामुच्यत इति भावः ॥ १०१ ॥

भाषार्थ - जितने अनाहत ध्वनिरूप शब्द सुनेजातेहैं उतनीही आकाशकी भळीप्रकार कल्पना होतीहै क्योंकि शब्द आकाशरूप है और गुणगुणीका अभेद