हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 81–90

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ७१ धौतिकर्माह-चतुरंगुलामति ॥ चतुर्णामंगुलानां समाहारश्चतुरं गुलं चतुरंगुलं विस्तारो यस्य तादृशं हस्तानां पंचदशैरायतं दीर्घं सिक्तं जलाई किंचिदुष्णं वस्त्रं पटं तच्च सूक्ष्मं नूतनोष्णीषादेः खंड ग्राह्यम् । गुरुणोपदिष्टो यो मार्गों वस्त्रग्रसनप्रकारस्तेन शनैर्मदमंद किंचिकि-चिद्रसेत् । द्वितीये दिने हस्तइयं तृतीये दिने हस्तत्रयम् । एवं दिन- वृद्ध्या हस्तमात्रमधिकं ग्रसेत् ॥ २४ ॥

भाषार्थ--अअब छःमें धौति कर्मको कहते हैं कि चार अंगुल-जिसका विस्तार हो और १५ पंद्रह हाथ जो आयत ( दीर्घ ) हो - अर्थात् चार अंगुल चौडा और पंद्रह हाथ लंबा जो वस्त्र उसको उष्ण जलसे सींचकर -गुरुके उपदेश किये मार्गसे शनैः २ यसै अर्थात् प्रथम दिन एक हाथ, दूसरे दिन दो हाथ, तीसरे दिन तीन हाथ, इसप्रकार एक २ हाथकी वृद्धिसे उसके ग्रसनेका अभ्यास करे और वह वस्त्र भी सूक्ष्म लेना उचित है उस वस्त्रके प्रान्त ( छोर ) को अपनी डाढोंमें भलीप्रकार दाबकर नौली कर्मसे उदरमें टिकै उस वस्त्रको भलीप्रकार चलाकर उस वस्त्रका शनैः २ प्रत्याहरण करै जर्थात् निकाले । यह सिद्धोंने धौतीकर्म कहा है ॥ २४ ॥

कासश्वासीहकुष्टं कफरोगाश्च विंशतिः ॥ धौतिकर्मप्रभावेन प्रयत्येव न संशयः ॥ २५ ॥

नाभिन्नजले पायौ न्यस्तनालोत्कटासनः आधाराकुञ्चनं कुर्य्यात्क्षालनं वस्तिकर्म तत्॥ २६ ॥

पुनरिति ॥ तस्य प्रांतं राजदंतमध्ये हठे संलग्नं कृत्वा नौली - कर्मणोदरस्थवस्त्रं सम्यक् चालयित्वा । पुनः शनैः प्रत्याहरेच्च तद्वस्त्र- मुनिरेन्निष्कासयेच्च । तद्धौतिकमोदितं कथितं सिद्धैः । धौतिकर्मणः फलमाह-कासश्वासेति ॥ कासश्च श्वासश्च प्लीहश्च कुष्ठं च । समाहारद्वंद्व: । कासादयो रोगविशेषाः विंशतिसंख्याकाः कफरो- गाश्च ॥ २५ ॥ धौतीति ॥ धौतिकर्मणः प्रभावेन गच्छंत्येव न

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( ) | [: ७२ हठयोगप्रदीपिका उपदेश

संशयः । निश्चितमेतदित्यर्थः । अथ वस्तिकमाह । नाभिनेति ॥

नाभिपरिमाणं नाभिदघ्नम् । परिमाणे दघ्नच् प्रत्ययः । तस्मिन्नाभि- दघ्ने नाभिपरिमाणे जले नयादितोये पायुर्गुदं तस्मिन्यस्तो नालो वंशनालो येन कनिष्ठिकाप्रवेशयोग्यरंध्रयुक्तं पडगुलदीर्घ वंशनाल गृहीत्वा चतुरंगुलं पायौ प्रवेशयेत् अंगुलिद्वयमितं बहिः स्थापयेत् । उत्कटमासनं यस्य स उत्कटासनः । पाष्णिद्वये स्फिचौ विन्यस्य पादांगुलिभिः स्थितिरुत्कटासनम् । आधारस्याकुंचनं यथा जलमंतः प्रविशेत्तथा संकोचनं कुर्यात् । अंतः प्रविष्टं जलं नौलिककर्मणा चालयित्वा त्यजेत् । क्षालनं वस्तिकर्मोच्यते । धौतिवस्तिकर्मद्वयं भोजनात्प्रागेव कर्तव्यम् । तदनंतरं भोजने विलंबोऽपि न कार्यः केचित्तु । पूर्व मूलाधारेण वायोराकर्षणमभ्यस्य जले स्थित्वा पायौ नालप्रवेशनमंतरेणैव वस्तिकर्माभ्यसंति । तथा करणे सर्व जलं बहिर्नायाति । अतो नानारोगधातुक्षयादिसंभवाच्च तथा वस्तिकर्म नैव विधेयम् । किमन्यथा स्वात्मारामः पायौ न्यस्तनाल इति ब्रूयात् ॥ २६ ॥

भाषार्थ- अब धौतीकर्मके फलको कहते हैं-कास- श्वास प्लीहा कुष्ठ -और बीस प्रकारके कफरोग धौतीकर्मके प्रभावसे नष्ट होते हैं इसमें संशय नहीं । अर्थात् यह निश्चित हैं । अत्र वस्तीकर्मको कहते हैं कि, नाभिप्रमाणका जो नदी आदिका जल उसमें स्थित गुदाके मध्यमें ऐसे बाँसके नालको रक्खै जिसका छिद्र कनिष्ठिका अंगुलिके प्रवेश योग्य हो और छः अंगुल उस बाँसके नालको लेकर चार अंगुल उसको गुदामें प्रवेश करें और दो अंगुल बाहिर रक्खे और उत्कट आसन रक्खे अर्थात् दोपाणियोंसे ऊपर अपने स्फिच ( चूतड ) पार्दोकी अङ्गुलियोंसे बैठनेको उत्कट आसन कहते हैं । उक्त आसनसे बैठाहुआ मनुष्य आधाराकुंचन करै अर्थात्जैसे वंशनालके द्वारा वंशनालमें जल प्रविष्ट हो तैसे आकुंचन करै । भीतर प्रविष्ट हुए जलको नौली कर्मसे चलाकर त्याग दे -इस उदरके क्षालन ( धोना ) को बस्तिकर्म कहते हैं -ये धौति बस्ति दोनों कर्म भोजनसे पूर्वही करने और इनके करनेके अन्तर भोजनमें विलंबभी न करना । कोई

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ७३ तो पहिले मूलाधारसे प्राणवायुके आकर्षण ( खींचना ) का अभ्यास करके और जलमें स्थित होकर गुदामें नाल प्रवेशके विनाही बस्तिकर्मका अभ्यास करते हैं —उस प्रकार बस्तिकर्म करनेसे उदरमें प्रविष्टहुआ संपूर्ण जल बाहर नहीं आसक्ता और उसके न आनेसे धातुक्षय आदि नानारोग होते हैं -इससे उसप्रकार बस्तिकर्म न करना क्योंकि अपनी गुदामें रक्खा है नाल जिसने ऐसे स्त्रात्माराम अन्यथा क्यों कहते? ॥ २ ९ ॥ २६ ॥

गुल्मप्लीहोदरं चापि वातपित्तकफोद्भवाः ॥ बस्तिकर्मप्रभावेन श्रीयंते सकलामयाः ॥ २७ ॥

वस्तिकर्मगुणानाह द्वाभ्याम्-गुल्मप्लीहोदरमिति ॥ गुल्मश्च प्लीहश्व रोगविशेषावुदरं जलोदरं च तेषां समाहारद्वंद्वः । वातश्च पित्तं च कफश्च तेभ्य उद्भवा एकैकस्माद्दाभ्यां सर्वेभ्यो वा जाताः सकलाः सर्व आमया रोगा वस्तिकर्मणः प्रभावः सामर्थ्य तेन श्रीयंते नश्यति ॥ २७ ॥

भाषार्थ--:अब बस्तिकर्मके गुणों को दो श्लोकोंसे वर्णन करते हैं- कि बस्ति-कर्मके प्रभावसे गुल्म ( गुम ) प्लीहा -उदर-( जलोदर ) और वात- पित्त-कफ इनके द्वन्द्व वा एकसे उत्पन्न हुए संपूर्ण रोग नष्ट होते हैं ॥ २७ ॥

धात्विंद्रियांतःकरणप्रसादं दद्याच्च कांतिं दहनप्र- दीप्तिम् ॥ अशेषदोषोपचयं निहन्यादभ्यस्यमानं जलवस्तिकर्म ॥ २८ ॥

धात्विति ॥ अभ्यस्यमानमनुष्ठीयमानं जले वस्तिकर्म जलवस्ति- कर्म ॥ कर्तृ । दद्यादनुष्ठातुरिति शेषः । धातवो 'रसासृङ्मांसमेदोऽ स्थिमज्जाशुकाणि धातवः' इत्युक्ता इंद्रियाणि वाक्पाणिपादपायूप- स्थानि पंच कर्मेद्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्राघ्राणानि पंच ज्ञानेंद्रि-याणि च अंतःकरणानि मनोबुद्धिचित्ताहंकाररूपाणि तेषां परिताप-'वक्षेपशोकमोहगौरवावरणंदैन्यादिराजसतामस धर्मविनिवर्तनेन सुख-

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( ) । [: ७४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश प्रकाशलाघवादिसात्त्विकधर्माविर्भावः प्रसादस्तं कांतिं द्युतिं दहनस्य जठराग्नेः प्रदीप्तिं प्रकृष्टां दीप्तिं च तथा । अशेषाः समस्ता ये दोषा वातपित्तकफास्तेषामुपचयम् । एतदपचयस्याप्युपलक्षणम् । उप-चयापचयौ निहन्यान्नितरां हन्यात् । दोषसाम्यरूपमारोग्यं कुर्या-दित्यर्थः ॥ २८ ॥

भाषार्थ--अभ्यास कियाहुआ यह बस्तिकर्म करनेवाले पुरुषके धातु अर्थात् रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, शुक्र, और वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, ये पांच कर्मेन्द्रिय श्रोत्र-त्वक् -जिह्वा -प्राण- चक्षुः ये पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन बुद्धि चित्त अहंकार रूप अंतःकरण इनकी प्रसन्नताको करताहै अर्थात् इनके परिताप विक्षेप शोक मोह गौरव आवरण दैन्य आदि रजोगुण तमोगुण धर्मोंको दूर करके मुखका प्रकाश लाघव आदि सात्विक धर्मोको प्रकट करताहै और देहकी कांति और जठराग्निकी दीप्तिको देताहै -और संपूर्ण -जो वात- पित्त कफ आदि दोष हैं उनकी वृद्धिको नष्ट करताहै -और इन दोषोंके अपचय ( न्यून- ता ) को भी नष्ट करताहै - अर्थात् दोषोंकी साम्यरूप आरोग्यताको करताहै ॥२८ ॥

अथ नेतिः ।

सूत्रं वितस्ति सुस्निग्धं नासानाले प्रवेशयेत् ॥

मुखान्निर्गमयेचैषा नेतिः सिद्धैर्निगद्यते ॥ २ ९ ॥

अथ नेतिकर्माह -सूत्रमिति ॥ वितस्ति वितस्तिमितं वितस्ति रित्युपलक्षणमधिकस्यापि । यावता सूत्रेण सम्यक् नेतिकर्म भवेत्ता-- वद् ग्राह्यम् । सुस्निग्धं सुष्ठु स्निग्धं ग्रंथ्यादिरहितं सूत्रं तच्च नवधा दशधा पंचदशधा वा गुणितं सुदृढं ग्राह्यम् । नासा नासिका सैव नालः सच्छिद्रत्वात्तस्मिन्प्रवेशयेत् । मुखान्निर्गमयेन्निष्कासयेत् । तत्प्रकारस्त्वेवम्- सूत्रप्रांतं नासानाले प्रवेश्येतरनासापुटमंगुल्या निरुध्य पूरकं कुर्यात् । पुनश्च मुखेन रेचयेत् । पुनःपुनरेवं कुर्वतोमुखे सूत्रप्रां तमायाति । तत्सूत्रप्रतिं नासावहिःस्थसूत्रप्रांतं च गृहीत्वा शनै चालयेदिति । चकारादेकस्मिन्नासानाले प्रवेश्येतरस्मिन्निर्गमयेदि-

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ७५ त्युक्तं तत्प्रकारस्त्वेकस्मिन्नासानाले सूत्रप्रांत प्रवेश्येतरनासापुटमंगुल्या निरुध्य पूरकं कुर्यात्पश्चादितरनासानालेन रेचयेत् । पुनःपुनरेवं कुर्वत इतरनासानाले सूत्रप्रांतमायाति तस्य पूर्ववच्चालनं कुर्यादिति । अयं प्रकारस्तु बहुवारं कुर्वतः कदाचिद्भवति । एषोक्ता सिद्धैरणिमा-दिगुणसंपन्नैः । तदुक्तम्- 'अवाप्ताष्टगुणैश्वर्याः सिद्धाः सद्भिर्निरूपिताः ” इति । नेतिर्निगद्यते नेतिरिति कथ्यते ॥ २ ९ ॥ भाषार्थ -अब नेतिकर्मका वर्णन करते हैं कि, वितस्ति ( विलायद ) परमित - भलीप्रकार स्निग्ध ( चिकने ) सूत्रको नासिकाके नालमें प्रविष्ट करके मुखमेंको निकाल दे यह सिद्धोंने नेति कही है । यहां जितने सूत्रसे नेतिकर्म होसके उतना सूत्र लेना कुछ वितस्तिका नियम नहीं । और वह सूप नव दश वा पंद्रह तारका लेना- उस नेति करनेका प्रकार तो इसप्रकार है कि, सूत्रके प्रान्तभागको नासाके नालमें प्रविष्ट करके और दूसरी नासाके पुटको अंगुलिसे रोककर-पूरकप्राणायाम करे- फिर मुखसे वायुका रेचन करै- वारंवार इसप्रकार करते हुए मनुष्यके मुखमें सूत्रका प्रान्त आजाता है-मुखमें आये सूत्रके प्रान्त ( छोर ) को और नासिकाके बाहर टिके सूत्रप्रान्तको शनैः २ चलावे इसको नेति कर्म कहते हैं- और चकारके पढनेसे एक नासिकाके नालमें प्रवेश करके दूसरी नासिकाके नालमें प्रवेश करले यह समझना उसका प्रकार यहहै कि, एक नासिकाके नालमें सूत्रके प्रांतको प्रवेश करके इतर नासिकाके पुटको अंगुलिसे दाकर पूरक प्राणायाम करे फिर इतर नासिकाके नालसे प्राणका रेचन करे । बारंबार इसप्रकार करते हुए मनुष्यकी दूसरी नासिकाके नालमें सूत्रका प्रांत आजाताहैहै-3-उसका पूर्वके समानही चालन करै परन्तु यह प्रकार बहुतबार करनेवाले पुरुषको कदाचितही होता है । अणिमा आदि गुणोंसे युक्त सिद्धोंने यह नेति कही है -सोई इस वचनसे कहा है कि, जिनको अणिमा आदि आठ प्रकारका ऐश्वर्य होवे वे सज्जनोंने सिद्ध कहे हें ॥ २९ ॥

कपालशोधनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी ॥ जनूर्ध्वजातरोगौघं नेतिराशु लिहंति च ॥ ३० ॥

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( ) | [ ७६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः नेतिगुणानाह-कपालशोधिनीति ॥ कपालं शोधयति शुद्धं अलरहितं करोतीति कपालशोधिनी । चकारान्नासानालादीनामपि । एवशब्दोऽवधारणे । दिव्यां सूक्ष्मपदार्थग्राहिणीं दृष्टि प्रकर्षेण ददा- तीति दिव्यदृष्टिप्रदायिनी नेतिक्रिया जत्रुणोः स्कंधसंध्योरूर्ध्वमुप- रिभागे जातो जत्रूर्ध्वजातः स चासौ रोगाणामोघश्च तमाशु झटिति निहांते । चकारः पादपूरणे । ' स्कंधो भुजशिरोऽसोऽस्त्री संधी तस्यैव

जत्रुणि । इत्यमरः ॥ ३० ॥

भाषार्थ-अत्र नैतिके गुगोंको कहते हैं कि, यह नेतिक्रिया कपालको शुद्ध करती है और चकारसे नासिका आदिके मलको दूर करती है और दिव्य दृष्टिको देती है और जनुके अर्थात् स्कंधकी संधिके ऊपरले भागके रोगोंका जो समूह उसको शीघ्र नष्ट करती है, क्योंकि इस अमरकोशमें स्कंध भुजा शिर इनकी संधिको जत्रु कहाहै ॥ ३० ॥

अथ त्राटकम् | निरीक्षेन्निश्चलदृशा सूक्ष्मलक्ष्यं समाहितः ॥ अश्रुसंपातपर्यंतमाचार्यैनाटकं स्मृतम् ॥ ३१ ॥

त्राटकमाह-निरीक्षेदिति ॥ समाहितः एकाग्रचित्तः निश्चला चासौ हक च दृष्टिस्तया सूक्ष्मं च तलक्ष्यं च सूक्ष्मलक्ष्यमभ्रूणां सम्यक् पातः पतनं तत्पर्यंतम् । अनेन निरीक्षणस्यावधिरुक्तः । निररीक्षेत्प- श्येत् । आचार्यैर्मत्स्येंद्रादिभिरिदं त्राटकं त्राटककर्म स्मृतं कथितम् ॥ ३१ ॥

भाषार्थ - अब त्राटकका वर्णन करते हैं कि, समाहित अर्थात् एकाग्रचित हुआ मनुष्य निश्चल दृष्टिसे सूक्ष्म लक्ष्यको अर्थात् लघुपदार्थको तबतक देखे जबतक अश्रुपात न होत्रे यह मत्स्येन्द्र आदि आचार्योंने त्राटक कर्म कहा है ॥ ३१॥

मोचनं नेत्ररोगाणां तंद्रादीनां कपाटकम् ॥ यत्नतस्त्राटकं गोप्यं यथा हाटकपेटकम् ॥ ३२ ॥

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ७७ त्राटकगुणानाह-मोचनमिति ॥ नेत्रस्य रोगा नेत्ररोगास्तेषां मोचनं नाशकं तंद्रा आदिर्येषामालस्यादीनां तेषां कपाटकं कपाट- वदंतधयकमभिभावकमित्यर्थः । तंद्रा तामसश्चित्तवृत्तिविशेषः ॥ त्राटकं त्राटकाख्यं कर्म यत्नतः प्रयत्नतः प्रयत्नाद्गोप्यं गोपनीयम् । गोपने दृष्टांतमाह - यथेति ॥ हाटकस्य सुवर्णस्य पेटकं पेटी इति लोके. प्रसिद्धं यथा येन प्रकारेण गोप्यते तद्वत् ॥ ३२ ॥

भाषार्थ--अब त्राटकके गुण कहते हैं कि, यह त्राटक कर्म नेत्रके रोगोंका नाशक है और तंद्रा आलस्य आदिका कपाट है अर्थात् कपाटके समान तंद्रा आदिका अंतर्द्धान ( तिरस्कार ) करताहै तमोगुणी जो चित्तकी वृत्ति उसे तंद्रा कहते हैं । यह त्राटककर्म इसप्रकार यत्नसे गुप्त करने योग्य है जैसे सुवर्णकी पेटी जगत्में गुप्त करने योग्य होती है ॥ ३२ ॥

अथ नौलिः ।

अमंदावर्तवेगेन तुंदं सव्यापसव्यतः ॥

नतांसो भ्रामयेदेपा नौलिः सिद्धैः प्रचक्ष्यते ॥ ३३॥

अथ नौलिकर्माह - अमंदेति ॥ नतौ नम्रीभूतांवंसौ स्कंधौ यस्य सनतांसः पुमानमंदोऽतिशयितो य आवर्तस्तस्येव जलभ्रमस्यैव वेगों जवस्तेन तुंदमुदरम् । ' पिचंडकुक्षी जठरोदरं तुंदं स्तनौ कुचौ ' । इत्यमरः । सव्यं चापसव्यं च सव्यापसव्ये दक्षिणवामभागौ तयोः सव्यापसव्यतः । सप्तम्यर्थे तसिः । भ्रामयेद् भ्रमंतं प्रेरयेत् । सिद्धै-रेषा नौलिः प्रचक्ष्यते कथ्यते ॥ ३३ ॥

भाषार्थ - अब नौलिका वर्णन करते हैं कि, नवाये हैं कांधे जिसने ऐसा मनुष्य अत्यंत है वेग जिसका ऐसे आवर्त ( जलभ्रमर ) के समान वेगसे अपने तुंद ( उदर ) को सव्य और अपसव्य ( अर्थात् ) दक्षिणवामभागोंसे भ्रमा सिद्धोंने यह नौलिकर्म कहाहै ॥ ३३ ॥

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( ) | [: ७८ हठयोगप्रदीपिका उपदेश मंदाग्रिसंदीपनपाचनादिसंधापिकानंदकरी सदैव ॥ अशेषदोषामयशोषणी च हठक्रिया मौलिरियं च नौलिः ॥ ३४ ॥

नौलिगुणानाह-मंदाग्नीति || मंदश्चासावग्निर्जठराग्निस्तस्य दीपनं सम्यग्दीपनं च पाचनं च भुक्तान्नपरिपाकश्च मंदाग्निसंदीपनपाचने ते आदिनी यस्य तन्मंदाग्निसंदीपनपाचनादि तस्य संधापिका विधात्री । आदिशब्देन मलशुद्धयादि । सदैव सर्वदैवानंदकरी सुखकरी । अशेषाः समस्ताश्च ते दोषाश्च वाताद्य आमयाश्च रोगास्तेषां शोषणी शोषणकर्त्री । हठस्य क्रियाणां धौत्यादीनां मौलिमौलिरिवोत्तमा

धौतिवस्त्योनौलिसापेक्षत्वात् । इयमुक्ता नौलिः ॥ ३४ ॥

भाषार्थ -अब नौलिके गुणोंको कहते हैं कि, मंदाग्निका भलीप्रकार दीपन और अन्न आदिका पाचन और सर्वदा आनंद इनको यह नौलि करती हैं और अशेष ( समस्त ) जो वात आदि दोष और रोग इनका शोषण ( नाश ) करतीहै और यह नौलि धौति आदि जो हठयोगकी क्रिया हैं उन सबकी नौलि ( उत्तम ) रूप है ॥ ३४ ॥

भोकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ ॥ कपालभातिर्विख्याता कफदोषविशोषणी ॥ ३५ ॥

अथ कपालभाति तगुणं चाह-भस्त्रावदिति ॥ लोहकारस्य भस्त्राग्नेर्धमनसाधनीभूतं चर्म तद्वत्संभ्रमेण सह वर्तमानौ ससंभ्रमाव-मंदौ यौ रेचपूरी रेचकपूरकौ कपालभातिरिति विख्याता । कीदृशी कफदोषविशोषणी कफस्य दोषा विंशतिभेदभिन्नाः । तदुक्तं निदाने- 'कफरोगाश्च विंशतिः ' इति । तेषां विशोषणी विनाशिनी ॥ ३५ ॥

भाषार्थ - अब कपालभाति और उसके गुणोंको कहते हैं कि, लोहकारकी भस्त्राके समान संभ्रमसे अर्थात् एकवार अत्यंत शीघ्रतासे रेचक पूरक प्राणायामको करना वह योगशास्त्रमें कफदोषका नाशक कपालभाति विख्यात है ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 89

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] - ( ). २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ७९

षट्कर्मनिर्गतस्थौल्यकफदोषमलादिकः ॥

प्राणायामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्धयति ॥ ३६ ॥

षट्कर्मणां प्राणायामत्वोपकारकत्वमाह-षट्कर्मेति ॥ षट्कर्म-भिर्धोतिप्रभृतिभिर्निर्गताः । स्थौल्यं स्थूलस्य भावः स्थूलत्वम् । कफदोषा विंशतिसंख्याका मलादयश्च यस्य स तथा ' शेषाद्विभाषा ' इति कप्रत्ययः । आदिशब्देन पित्तादयः । प्राणायामं कुर्यात् ।

ततस्तस्मात्षट्कर्मपूर्वकात्माणायामादनायासेनाश्रमेण सिद्धयति ।

योग इति शेषः । षट्कमकिरणे तु प्राणायामे श्रमाधिक्यं स्या-दिति भावः ॥ ३६ ॥

भाषार्थ--अब इन छः पूर्वोक्त कमोंको प्राणायामकी उपकारकताका वर्णन करते हैं कि, धौति आदि छः कर्मोंसे दूर भये हैं स्थूलता बीस प्रकारके कफदोष और मल पित्त आदि जिसके ऐसा पुरुष षट्कर्म करनेके अनंतर प्राणायाम करे तो अनायाससे ( विनापरिश्रम ) प्राणायाम सिद्ध होताहै । यदि षट्कर्मोंको न करके प्राणायामोंको करै तो अधिक अधिक परिश्रम होताहै इससे षट्कर्मके अर्न-तरही प्राणायाम करना उचित है ॥ ३६ ॥

प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यंति मला इति ॥ आचार्याणां तु केषांचिदन्यत्कर्म न संमतम्॥ ३७॥

मतभेदेन कर्मणामनुपयोगमाह-प्राणायामैरिति ॥ प्राणा- यामैरेव । एवशब्दः षट्कर्मव्यवच्छेदार्थः । सर्वे मला प्रशुष्यति । मला इत्युपलक्षणं स्थौल्यकफपित्तादीनाम् इति हेतोः केषांचिदा- चार्याणां याज्ञवल्क्यादीनामन्यत्कर्म षट्कर्म न संमतं नाभिमतम् । आचार्यलक्षणमुक्तं वायुपुराणे । ' आचिनोति च शास्त्रार्थमाचरे स्थाप- येदपि । स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन चोच्यते ॥ ' इति ॥ ३७ ॥

भाषार्थ - अब मतभेदसे छः कर्मके अनुपयोगको कहते हैं कि, प्राणायामके करनेसेही संपूर्ण मल शुष्क होते हैं और स्थौल्य कफ आदिकी निवृत्तिभी प्राणाया-

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( ) [: ८० हठयोगप्रदीपिका । उपदेश मौसेही होसकती है इससे किन्ही किन्ही आचार्योंको प्राणायामोंसे अन्य जो धौति आदि कर्म हैं वे सम्मत नहीं हैं । वायुपुराणमें आचार्यका लक्षण यह कहाहै कि, जो शास्त्रके अर्थका संग्रह करे और शास्त्रोक्तको स्वयं करे और अन्योंसे करावै वह आचार्य कहता है ॥ ३७ ॥

उदरगतपदार्थमुद्रमंतिपवनमपानमुदीर्य कंठनाले ॥ क्रमपरिचयवश्यनाडिवका गजकरणीति निगद्यते हठज्ञैः ॥ ३८ ॥

गजकरणीमाह-उदरगतमिति ॥ अपानं पवनमपानवायुं कंठ- नाले कंठो नाल इव कंठनालस्तस्मिन्नुदीयत्क्षिप्योदरे गतः प्राप्तः स चासौ पदार्थश्च भुक्तपीतान्नजलादिस्तं परयोद्वमंत्युद्भिरंति यया योगिन इत्यध्याहारः । क्रमेण यः परिचयोऽभ्यासस्तेनावश्यं स्वा- धनं नाडीनां चक्रं यस्यां सा तथा । सा किया हठज्ञैर्हठयोगाद्य- भिज्ञैर्गजकरणीत निगद्यते कथ्यते । क्रमपरिचयवश्यनाडिमार्ग इति क्वचित्पाठस्तस्यायमर्थः क्रमपरिचयेन वश्यो नाड्याः शंखिन्याः मार्गः कंठपर्यंतो यस्यां सा तथा ॥ ३८ ॥

भाषार्थ--अब गजकरणीका वर्णन करते हैं कि, अपान वायुको ऊपरको उठाकर अर्थात् कंठके नालमें पहुँचाकर उदरमें प्राप्त हुये अन्न जल आदि पदार्थको जिससे योगीजन उद्यमन करते हैं इसका क्रमसे जो अभ्यास तिससे वशीभूत ( स्वाधीन ) है नाडियोंका समूह जिसके ऐसी उसक्रियाका नाम हठयो गके ज्ञाता आचार्योंने गजकरणी कहा है और कहीं क्रमपरिचय नाडिमार्ग यहभी पाठहै । उसका यह अर्थ है कि, क्रमसे किये अभ्याससे वशीभूत है शखिनी नाडीका कंठपर्यंत मार्ग जिसमें ऐसी गजकरणी कहातीहै ॥ ३८ ॥

ब्रह्मादयोऽपि त्रिदशाः पवनाभ्यासतत्पराः ॥ अभूवन्नंतकभयात्तस्मात्पवनमभ्यसेत् ॥ ३९ ॥