हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 91–100

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 91–100

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ८१ प्राणायामोऽवश्यमभ्यसनीयः सर्वोत्तमैरभ्यस्तत्वान्महाफलत्वा- वो सूचयन्नाह चतुर्भिः ॥ ब्रह्मादय इति ॥ ब्रह्मा आदिर्येषां तें ब्रह्मादयस्तेऽपि । किमुतान्य इत्यर्थः । त्रिदशाः देवाः अंतयतीत्यं- तकः कालस्तस्माद्भयमंतकभयं तस्मात्पवनस्य प्राणवायोरभ्यासो रेचकपूरककुंभकभेदभिन्नप्राणायामानुष्ठानरूपस्तस्मिंस्तत्परा अवहिता अभूवन्नासन् । तस्मात्पवनमभ्यसेत्प्राणमभ्यसेत् ॥ ३ ९ ॥ भाषार्थ -अब प्राणायामके अवश्य अभ्यास और सर्वोत्तमोंके कर्तव्य और फलका वर्णन करते हैं कि, ब्रह्मा आदि देवताभी अंतकके भयसे अर्थात् काल जीतनेके लिये प्राणवायुके अभ्यासमें तत्पर हुये अर्थात् रेचक कुंभक पूरक भेदोंसे भिन्न २ जो प्राणायाम उनके करनेमें सावधान रहे तिससे प्राणायाम अभ्यासको अवश्य करै ॥ ३ ९ ॥ यावद्वद्धो मरुदेहे यावञ्चित्तं निराकुलम् ॥ यावदृष्टिर्भुवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुतः ॥ ४० ॥

यावदिति ॥ यावद्यावत्कालपर्यंत मरुत्प्राणानिलो देहे शरीरे बद्धः श्वासोच्छ्वासक्रियाशून्यः । यावच्चित्तमंतः करणं निराकुलमवि- क्षिप्तं समाहितम् । यावद्भ्रुवोर्मध्ये दृष्टिरंतः करणवृत्तिः । दृशिरत्र ज्ञानसामान्यार्थः । तावत्तावत्कालपर्यंतं कलयतीति कालों कस्त-स्माद्भयं कुतः । न कुतोऽपीत्यर्थः । तथा च वक्ष्यति-'खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा । साध्यते न स केनापि योगी युक्तः

समाधिना ॥ ' इति । स्वाधीनो भवतीत्यर्थः ॥ ४० ॥

भाषार्थ-यावत्कालपर्यंत प्राणवायु शरीरमें बद्ध है अर्थात् श्वास और उच्छास क्रियासे शून्य है और इतने अंतःकरण निराकुल अर्थात् विक्षेपरहित वा सावधान है और इतने भ्रुकुटियोंके मध्यमें अंतःकरणकी वृत्ति है तावत्कालपर्यंत कालसे भय किसीप्रकार नहीं होसकताहै अर्थात योगी स्वाधीन होजाताहै सोई आगे कहेंगे कि, उस योगीको कोई खा नहीं सकता न कोई कर्म बांध सकता न कोई उसे साधसकता जो योगी समाधिसे युक्त है ॥ ४० ॥

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( ) | [: ८२ हठयोगप्रदीपिका उपदेश विधिवत्प्राणसंयामैनाडीच विशोधिते ॥ सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ ४१ ॥

विधिवदिति ॥ विधिवत्प्राणसंयामैरासनजालंधरबंधादिविधि-युक्तप्राणायामैनडीचक्रे नाडीनां चक्रं समूहस्तस्मिन्विशोधिते निर्मले सति मारुतो वायुः सुषुम्ना इडापिंगलयोर्मध्यस्था नाडी: तस्या वदनं

मुखं भिवा सुखादनायासाद्विशति । सुषुम्नांतरिति शेषः ॥ ४१ ॥

भाषार्थ-विधिपूर्वक अर्थात् आसन जालंधरबंध आदि पूर्वक किये हुए प्राणायामोंसे नाडियोंके समूहके भलीप्रकार शोधन हुयेवर प्राणवायु इडा और पिंगलाके मध्यमें वर्तमान सुषुम्ना नाडीके मुखको भलीप्रकार भेदन करके सुषुम्नाके मुखमें सुखसे प्रविष्ट होजाताहै ॥ ४१ ॥

मारुते मध्यसंचारे मनःस्थैर्यं प्रजायते ॥ यो मनः सुस्थिरीभावः सैवावस्था मनोन्मनी॥४२ ॥

मारुत इति ॥ मारुते प्राणवायौ मध्ये सुषुम्नामध्ये संचारः सम्यक्चरणं गमनं मूर्धपर्यंतं यस्य स मध्यसंचारस्तस्मिन् सति मनसः स्थैर्य ध्येयाकारवृत्तिप्रवाहो जायते प्रादुर्भवति । यो मनसः सुस्थिरी- भावः सुस्थिरीभवनं सैव मनोन्मन्यवस्था । मनोन्मनीशब्द उन्मनी- पर्यायः । तथाग्रे वक्ष्यति-' राजयोगः समाधिश्च' इत्यादिना ॥ ४२॥

भाषार्थ-[-जब प्राणवायुका सुषुम्नाके मध्यमें संचार होनेपर मनकी स्थिरता होजातीहै अर्थात् ध्यान करने योग्य वस्तुके आकारकी वृत्तियोंका प्रवाह होजाताहै वह जो मनका भलीप्रकार स्थिर होजानाहै उसकोही मनोमनी अवस्था कहतेहैं यहाँ मनोम्मनी शब्द उन्मनीका पर्याय है यही बात राजयोग और समाधियोगसे आगे कहेंगे ॥ ४२ ॥

तत्सिद्धये विधानज्ञाश्वित्रान्कुर्वति कुंभकान् ॥ विचित्रकुंभकाभ्यासाद्विचित्रां सिद्धिमाप्नुयात् ॥४३ ॥

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ८३ विचित्रेषु कुंभकेषु प्रवृत्तिं जनयितुं तेषां मुख्यफलमवांतरफलं चाह - तत्सिद्धय इति ॥ विधानं कुंभकानुष्ठानप्रकारस्तज्जानतीति विधानज्ञास्तत्सिद्धये उन्मन्यवस्थासिद्धये चित्रान्सूर्यभेदनादिभेदेन -नानाविधान्कुंभकान्कुर्वति । विचित्राश्च ते कुंभकाश्च विचित्रकुंभका- • स्तेषामभ्यासादनुष्ठानाद्विचित्रामणिमादिभेदेन नानाविध विल- क्षणां वा जन्मौषधिमंत्रतपोजाताम् । तदुक्तं भागवते- ' जन्मौषधित- पोमंत्रैर्यावतीरिह सिद्धयः । योगेनामोति ताः सर्वा नान्यैयाँगगतिं प्रजेत् ॥ ' इति । आप्नुयात्प्रत्याहारादिपरंपरयेति भावः ॥ ४३ ॥

भाषार्थ -विचित्र कुंभकप्राणायामोंमें प्रवृत्ति होनेके लिये उनके मुख्य फल और अवान्तरफलको कहते हैं-कुंभक प्राणायामकी विधिके ज्ञाता योगी- जन उन्मनी अवस्थाकी सिद्धिके लिये अनेक प्रकारके अर्थात् सूर्यभेदन आदिसे भिन्न २ प्राणायामोंको करते हैं, क्योंकि विचित्र कुंभकप्राणायामोंके अभ्याससे विचित्रही सिद्धिको प्राप्त होजाता है अर्थात् जन्म, औषधी, मंत्र, तप इनसे उत्पन्न हुई विलक्षण सिद्धि कुंभक प्राणायामोंसे होतीहै । सोई भागवतमें कहाहै । कि, उत्तम जन्म औषधी तप और मंत्र इनसे जितनी सिद्धि होतीहै उन सबको योगी योगसे प्राप्त होताहै और अन्य कमोंसे योगकी गति प्राप्त नहीं होती और उस गतिकी प्राप्ति प्रत्याहार आदिकी परम्परासे समझनी ॥ ४३ ॥

अथ कुंभकभेदाः ।

सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतली तथा ॥

भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुंभकाः ॥४४ ॥

अथाष्टकुंभकान्नामभिर्निर्दिशति सूर्यभेदनमिति ॥ स्पष्टम्॥ ४४॥

भाषार्थ-- अब आठ कुंभक प्राणायामोंको नाम लेलेकर दिखातेहैं कि, सूर्य-""मदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, सूर्च्छा, प्लाविनी ये आठप्रकारके कुंभकप्राणायाम जानने ॥ ४४ ॥

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( ) [ ८४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः पूरकांते तु कर्तव्यो बंधो जालंधराभिधः ॥ कुंभकांते रेचकादौ कर्तव्यस्तडिनायकः ॥ ४५ ॥

अथ हठसिद्धावनन्यसिद्धां पारमहंसीं सर्वकुंभकसाधारणयुक्ति-माह त्रिभिः ॥ पूरकांत इति ॥ जालंधर इत्यभिधा नाम यस्या स जालंधराभिधो बंधों बध्नाति प्राणवायुमिति बंधः कंठाकुंचन-पूर्वकं चिबुकस्य हृदि स्थापनं जालंधरबंधः पूरकांते पूरकस्यांत पूरकानंतरं झटिति कर्तव्यः । तुशब्दात्कुंभकादावुड्डियानकस्तु कुंभ-कांते कुंभकस्यांते किंचित्कुंभकशेषे रेचकस्यादौ रेचकादो रेचका- त्पूर्वं कर्तव्यः । प्रयत्नविशेषेण नाभिप्रदेशस्य पृष्ठत आकर्षणमुडि-यानबंधः ॥ ४५ ॥

भाषार्थ- अब हठसिद्धिकेविषे परमहंसोंकी उस सर्वकुंभक साधारण युक्तिको तीन श्लोकोंसे कहतेहैं जो अन्यसे सिद्ध न होसकै कि, पूरक प्राणायामके अंतमें जालंधरहै नाम जिसका वह बंध करना अर्थात् कंठके आकुंचनको करके चिव- कको हृदयमें स्थापनरूप जालंधरबंधसे प्राणवायुका बंधन करे और तुशब्दसे कुंभकफी आदिमें भी जालंधर बंध करे और कुंभकके अंतमें अर्थात् कुंभकके किंचित् शेष रहनेपर और रेचकप्राणायामकी आदिमें उड्डियान बंधको करे प्रयत्न विशेषसे नाभिप्रदेशका पीठसे जो आकर्षण उसे उड्डियान बंध कहतेहैं ॥ ४ ९ ॥ अधस्तात्कुचनेनाशु कंटसंकोचने कृते ॥ मध्ये पश्चिमतानेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः॥४६॥

अधस्तादिति ॥ कंठस्य संकोचनं कंठसंकोचनं तस्मिन्कृते सात जालंधरबंधे कृते सतीत्यर्थः । आश्वव्यवहितोत्तरमेवाधस्तादधः प्रदेशादाकुंचनेनाधाराकुंचनेन मुलबंधेनेत्यर्थः । मध्ये नाभिप्रदेशे पश्चिमतः पृष्ठतस्तानं ताननमाकर्षणं तेनोड्डियान बंधेनेत्यर्थः । उक्त-रीत्या कृतेन बंधत्रयेण माणो वायुर्ब्रह्मनाडीं सुषुम्नां गच्छतीति ब्रह्मनाडिगः सुषुम्नानाडिगामी स्यादित्यर्थः । अत्र रहस्यम् ॥

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] ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ८५ यदि श्रीगुरुमुखाज्जिह्नाथः सम्यक परिज्ञातस्तर्हि जिह्वावंधपूर्वकेन जालंधरवंधेनैव प्राणायामः सिध्यति । वायुप्रकोपेनैवम धातुवपुः- कृशत्वं वदने प्रसन्नतेत्यादीनि सर्वाणि लक्षणानि जायंत इति मूल- बंधोड्डियानबंधौ नोपयुक्तौ । तयोजिह्वाबंधपूर्वकेण जालंधरबंधे-नान्यथा सिद्धत्वात् । जिह्वाबंधो न विदितश्चेदधस्तात्कंचनेनेति

श्लोकोक्तरीत्या प्राणायामाः कर्तव्याः । त्रयोऽपि बंधा गुरुमुखा- ज्ज्ञातव्याः । मूलबंधस्तु सम्यगज्ञातो नानारोगोत्पादकः । तथा हि ।

यदि मूलबंधे कृते धातुक्षयो विष्टभोऽग्निमांद्यं नादमांद्यं गुटिकास- मृहाकारमजस्येव पुरीषं स्यात्तदा मूलबंधः सम्यक् न ज्ञात इति बोध्यम् । यदि तु धातुपुष्टिः सम्यक् मलशुद्धिरग्निदीप्तिः सम्यक् नादाभिव्यक्तिश्च स्यात्तदा ज्ञेयं मूलबंधः सम्यक् जातः इति ॥ ४६ ॥

भाषार्थ-कंठका संकोचन करनेपर अर्थात् जालंधर बंध किये पीछे शीघ्रही नीचे के प्रदेशसे व्याकुंचन होनेसे अर्थात् आकुंचनसे मूलबंध होनेसे हुआ जो मध्यपश्चिमतान अर्थात् पृष्ठते नाभिप्रदेशमें प्राणका आकर्षण रूप उड्डियान अंधसे प्राण ब्रह्मनाडीगत होजाता है । सुषुम्ना नाडीमें पहुँच जाताहै. यहां यह रहस्य अर्थात् गोप्य वस्तु है कि, यदि गुरुमुखसे जिह्वाबंध भलीप्रकार जानलिया होय तो जिह्नाबंध करनेके अनंतरही जालंधर बंधसे प्राणायाम सिद्ध होताहै अर्थात् वायु प्रकोपनही धातुओंकी प्रसन्नता देहमें कृशता और मुखकी प्रसन्नता आदि संपूर्ण लक्षण होजाताहै इससे मूलबंध उड्डियान बंध करनेका कुछ उपयोग नहीं और जिह्वावंत्र न जाना होय तो इस श्लोकमें उक्त रीतिसे प्राणा- याम करने और ये तीनों बंध गुरुमुखसे जानने योग्य है, क्योंकि सलीप्रकारं न जाना हुआ मूलबंध नानारोगोंको पैदा करताहै सोई दिखाते हैं कि, यदि -बंध कियेपर धातुका क्षय विष्टंभ मंदाग्नि नादकी मंदता और गुटिकाके समूहकेसा है आकार जिसका ऐसा बरुरीके समान पुरीष ( मल ) होय तो यह जानना कि, मूलबंध भलीप्रकार नहीं हुआ और यदि धातुओंकी पुष्टि भलीप्रकार -शुद्धि और अमिका दीपन और भजीप्रकार नादकी प्रकटता होय तो यह

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( ) [:" ८६ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश जानना कि, मूलबंध भलीप्रकार हुआहै. भावार्थ यह है कण्ठके संकोच कियेपर नीचे प्रदेशसे प्राणके आकुंचनसे पश्चिमतान करनेपर नाभिप्रदेशमें पृष्ठसे प्राणके आकर्षणसे प्राण सुषुम्नामें पहुँच जाताहै ॥ ४६ ॥

अपानमूर्ध्वमुत्थाप्य प्राणं कंठादधो नयेत् ॥ योगी जराविमुक्तः सन्पोडशाब्दवयो भवेत् ॥४७॥

अपानमिति ॥ अपानमपानवायुमूर्ध्वमुत्थाप्याधाराकुंचनेन प्राणं प्राणवायुं कंठादधः अधोभागे नयेत्प्रापयेद्यः स योगी योगोड- स्यास्ति अभ्यस्यत्वेनेति योगी योगाभ्यासी जरा व विमुक्तो विशेषेण मुक्तः सन् । षोडशानामन्दानां समाहारः षोड- शाब्दं षोडशाब्दं वयो यस्य स तादृशो भवेत् । यद्यपि ' पूरकांते तु कर्तव्यः ' इत्यादिना त्रयाणां श्लोकानामेक एवार्थः पर्यवस्यति तथापि ' पूरकांते तु कर्तव्यः ' इत्यनेन बंधानां काल उक्तः । 6 अधस्तात्कुंचनेन ' इत्यनेन बंधानां स्वरूपमुक्तम् । ' अपानमूर्ध्व- मुत्थाप्य ' इत्यनेन बंधानां फलमुक्तमिति विशेषः । जालंधरबंधे मूलबंध च कृते नाभेरधोभाग आकर्षणाख्यो बंध उड्डियानबंधो भवत्येवेत्यस्मिलोके नोक्तः । तथाचोक्तं ज्ञानेश्वरेण गीताषष्ठाध्या- यव्याख्यायाम् । 'मूलबंध जालंधरबंधे च कृते नाभेरधोभाग आक- fणाख्यो बंधः स्वयमेव भवति ' इति ॥ ४७ ॥

भाषार्थ - अपानवायुको ऊर्ध्व ( ऊपर ) को उठाकर आधाराकुंचनसे प्राण- वायुको जो कंठके अधोभागमें स्थापन करें वह योगी जरासे विमुक्त होताहै और षोडश वर्षकाहै देह जिसका ऐसा होताहै. यद्यपि पूर्वोक्त तीनों लोकोंका अंत एकही अर्थ होताहै तथापि ( पूरकान्ते ) इस प्रथम श्लोकसे बंधोंका समय कहाहै और ( अधस्तात्कुंचनेन ) इस दूसरे श्लोकसे बंधोंका स्वरूप कहा ( अपानमूर्च्च- मुत्याव्य) इस तीसरे श्लोकसे बंधोंका फल कहाहै यह विशेष जानना और जालं-. धरबंध और मूलबंध करनेपर नाभिके भागमें आकर्षण नामका बंध जो उड्डि-- यान बंधहै वह स्वयंही होजाताहै इससे इस श्लोक में नहीं कहा, सोई ज्ञानेश्वरने

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ८७ गीतामें छठे अध्यायको व्याख्यामें कहाहै मूलबंध जालंबरकिये पीछे आकर्षण नामका बंध स्वयंही होजाताहै ॥ ४७ ॥

अथ सूर्यभेदनम् ।

आसने सुखदे योगी बद्धा चैवासनं ततः ॥

दक्षनाड्या समाकृष्य बहिःस्थं पवनं शनैः ॥४८॥

LL योगाभ्यासक्रमं वक्ष्ये योगिनां योगसिद्धये । उषःकाले समुत्थाय प्रातःकालेऽथवा बुधः ॥ १ ॥ गुरुं संस्मृत्य शिरासे हृदये स्वेष्टदेव-ताम् । शौचं कृत्वा दंतशुद्धिं विदध्याद्भस्मधारणम् ॥ २ ॥ शुचौ देशे

मंठे रम्ये प्रतिष्ठाप्यासनं मृदु । तत्रोपविश्य संस्मृत्य मनसा गुरुमी-श्वरम् ॥ ३ ॥ देशकालौ च संकीर्त्य संकल्प्य विधिपूर्वकम् । अद्ये-त्यादि श्रीपरमेश्वरप्रसादपूर्वकं समाधितत्फलसिद्ध्यर्थमासनपूर्वकान्

प्राणायामादीन् करिष्ये । अनंतं प्रणमेद्देवं नागेशं पीठसिद्धये ॥४ ॥

मणिभ्राजत्फणासहस्रविधृतविश्वंभरामंडलायानंताय नागराजाय नमः । ततोऽभ्यसेदासनानि श्रमे जाते शवासनम् अन्ते समभ्यसेत्तत्तु श्रमाभावे तु नाभ्यसेत् ॥ ५ ॥ करणीं विपरीताख्यां कुंभकात्पूर्वम- भ्यसेत् । जालंधरप्रसादार्थ कुंभकात्पूर्वयोगतः ॥ ६ ॥ विधायाचमनं

कृत्वा कर्मागं प्राणसंयमम् । योगींद्रादीन्नमस्कृत्य कौर्माच्च शिववा- क्यतः ॥ ७ ॥ " कूर्मपुराणे शिववाक्यम्-" नमस्कृत्याथ योगींद्रान्स-शिष्यांश्च विनायकम् । गुरुं चैवाथ मां योगी युंजीत सुसमाहितः ॥

॥ ८ ॥ बद्धाभ्यासे सिद्धपीठं कुंभकाबंधपूर्वकम् । प्रथमे दश कर्त-व्याः पंचवृद्धया दिनेदिने ॥ ९ ॥ कार्या अशीतिपर्यतं कुंभकाः सुस-माहितैः । योगींद्रः प्रथमं कुर्यादभ्यासं चंद्रसूर्ययोः ॥ १० ॥ अनुलोम- विलोमाख्यमेतं प्राहुर्मनीषिणः । सूर्यभेदनमभ्यस्य बंधपूर्वकमेकधीः ॥

॥ ११ ॥ उज्जयिनं ततः कुर्यात्सीत्कारी शीतलीं ततः । भस्त्रिकां

समभ्यस्य कुर्यादन्यान्नवापरान् ॥ १२ ॥ मुद्राः समभ्यसेद्रद्ध

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( 66 ) | [: हठयोगप्रदीपिका उपदेश

गुरुवक्राद्यथाक्रमम् । ततः पद्मासनं बद्धा कुर्यान्नादानुचिंतनम् ॥

॥ १३ ॥ अभ्यासं सकलं कुर्यादीश्वरार्पणमादृतः । अभ्यासादुत्थितः

स्नानं कुर्यादुष्णेन वारिणा ॥ १४ ॥ स्नात्वा समापयेन्नित्यं कर्म

संक्षेपतः सुधीः । मध्याह्नेऽपि तथाभ्यस्य किंचिद्विश्रम्य भोजनम् ॥ ॥ १५ ॥ कुर्वीत योगिनां पथ्यमपथ्यं न कदाचन । एलां वापि लवंगं

वा भोजनांते च भक्षयेत् ॥ १६ ॥ केचित्कर्पूरमिच्छंति तांबूलं शो-भनं तथा । चूर्णेन रहितं शस्तं पवनाभ्यासयोगिनाम् ॥ १७ ॥ इति

चितामणेर्वाक्यं स्वारस्यं भजते नहि । केचित्पदेन यस्मात्तु तयोः शीतोष्णहेतुना ॥ १८ ॥ भोजनानंतरं कुर्यान्मोक्षशास्त्रावलोकनम् ।

पुराणश्रवणं वापि नामसंकीर्तनं विभोः ॥ १ ९ ॥ सायंसंध्याविधि कृत्वा योगं पूर्ववदभ्यसेत् ॥ यदा त्रिघटिकाशेषो दिवसोऽभ्यासमा- चरेत् ॥ २० ॥ अभ्यासानंतरं कार्या सायंसंध्या सदा बुधैः । अर्थ- रात्रे ठाभ्यासं विदध्यात्पूर्ववद्यमी ॥ २१ ॥ विपरीतां तु करणी

सायंकालार्धरात्रयोः । नाभ्यसेोजनादूर्ध्वं यतः सा न प्रशस्यते ॥

॥ २२ ॥ ” अथोद्देशानुक्रमणं कुंभकान्विवक्षुस्तत्र प्रथमोदितं सूर्यभे- दनं तद्गुणांश्चाह त्रिभिः-आसन इति ॥ सुखं ददातीति सुखद

तस्मिन्सुख । ' शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्यु- च्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ इत्युक्तलक्षणे विविक्तदेशे सुखासनस्थः शुचिः ' समग्रीवशिरःशरीरम् ' इति श्रुतेश्च चैलाजिन- कुशोत्तर आसने । आस्तेऽस्मिन्नित्यासनम् । आस्यतेऽनेनेति वा तस्मिन् योगी योगाभ्यासी । आसनं स्वस्तिकवीरसिद्ध पद्माद्यन्यतमं मुख्यत्वात्सिद्धासनमेव वा बद्धा बंधनेन संपाद्यैव कृत्वैवेत्यर्थः । तत आसनबंधानंतरं दक्षा दक्षिणभागस्था या नाडी पिंगला तया बहिःस्थं देहाद्वहिर्वर्तमानं पवनं वायुं शनैर्मदमंदमाकृष्य पिंगलया मंदमंदं पूरकं कृत्वेत्यर्थः ॥ ४८ ॥

भाषार्थ-- अब सूर्यभेदन आदि आठ कुंभकोंके वर्णन करनेके अभिलाषी आचार्य सबसे प्रथम जो सूर्यभेदन उसका वर्णन करते हैं और हम कुछ योगा-

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3.11 - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ८९ -भ्यासका क्रम यहांपर लिखते हैं कि योगियोंकों योगसिद्धिके लिये योगाभ्यासको कहते हैं उससे अर्थात् प्राप्तःकालमें उठकर और शिरपर अपने गुरुका और हृदयमें • अपने इष्टदेवका वर्णन करके दंतधावन और भस्मधारण करें शुद्धदेश और रमणीय -मठमें कोमल आसन बिछाकर उसपर बैठकर और ईश्वर और गुरुका मनसे स्मरण · करके देश और कालका कथन करके अर्थात् विधिपूर्वक संकल्प करके कि, अद्येत्यादि श्रीपरमेश्वरकी प्रसन्नतापूर्वक समाधि और उसके फलकी सिद्धिके लिये •आसनपूर्वक प्राणायामोंको करताहूं और आसनकी सिद्धिके लिये अनंत जो नागेश देवहैं उनको प्रणाम करें कि, मणियोंसे शोभायमान सहस्त्रों फणोंपर धारण कियाहै विश्वमंडल जिसने ऐसे अनंत नागराजको नमस्कारहै । फिर आसनोंका अभ्यासकरै और परिश्रम होय तो शवासन करें और उसका अन्तमें अभ्यास करें और श्रम न होय तो शवासनका अभ्यास न करे और विपरी-- तहै नाम जिसका ऐसी करणीका कुंभकसे पूर्व अभ्यास करें जालंधरकी प्रसन्नता सिद्धि ) के लिये कुंभकले पूर्व आचमन करके कर्मका अंग जो प्राणसंयम उसको करें । कूर्मपुराणमें शित्रके वचनानुसार योगींद्रोंको नमस्कार करके, -कूर्मपुराणमें शिवका घाक्य यह है कि, शिष्यों सहित योगींद्र और गणेश गुरु और मुझ शिवजीको नमस्कार करके भलीप्रकार सावधान हुआ योगी योगा-•भ्यासकरे और अभ्यासके समय कुंभकसे बंधपूर्वक सिद्ध पीठ ( आरून ) बांधकर पहिलेदिन दश प्राणायाम करै । फिर दिन दिनमें ( प्रतिदिन ) पांच २ की वृद्धि प्राणायामकरें इस प्रकार अस्सी प्राणायामोंको भलीप्रकार सावधान मनुष्य करें । प्रथम योगीन्द्र चंद्र और सूर्यका अभ्यास करें और बुद्धिमान् मनुष्योंने यह अनुलोम विलोमरूपसे दोप्रकारका कहाहै और एकाग्रबुद्धि होकर बंध पूर्वक सूर्यभेदनका अभ्यास करके फिर उज्जायांको करे फिर सीत्कारी और शीतलीको करे फिर भस्त्रिकाका अभ्यास करके अन्य प्राणायामको करै वा न करे और प्राणोंको बांधकर गुरुमुखसे कहे क्रमके अनुसार मुद्राओंका भलीप्रकार •अभ्यासकर फिर पशासनको बांधकर नादका अनुचितन ( स्मरण ) करे और - आदरपूर्वक ईश्वरार्पणबुद्धिसे संपूर्ण अभ्यासको करें और अभ्याससे उठकर उष्ण •जलसे स्नानकर और संक्षेपसे किये नित्यके कर्मको स्नान करके बुद्धिमान् मनुष्य

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( ) । [: ९० हठयोगप्रदीपिका । उपदेश समाप्त करे और मध्याह्नमें भी तिसीप्रकार अभ्यास करनेके अनंतर कुछ विश्राम करके भोजन करे । योगियोंको पथ्य भोजन करावे अपथ्य कदापि न करावे । इलायची वा लौंग भोजनके अंतमें भक्षण करे और कोई आचार्य कपूर और सुंदर तांबूलके भोजनको कहते हैं और प्राणायामके अभ्यासी योगियोंको चूनेसे रहित तांबूल श्रेष्ठ होताहै केचित्पदके पढने से यह चिंतामणिका वचन उत्तम नहीं है क्योंकि चंद्र और सूर्य शीत उष्णके हेतु हैं भोजनके अनंतर मोक्ष- शास्त्रको देखे ( विचारे ) और जब तीन घटी दिन शेष रहे तब फिर अभ्यास करे और अभ्यासके अनंतर बुद्धिमान् मनुष्य सायंसंध्याको करे फिर योगी अर्द्धरात्रके समय पूर्वके समान हठयोगका अभ्यास करे और सायंकाल और अर्द्धरात्रके समयमें विपरीत करणीका अभ्यास न करै, क्योंकि भोजनके अनंतर विपरीतकरणी श्रेष्ठ नहीं कही है । अत्र प्रासंगिकको समाप्त करके श्लोकार्थको कहते हैं कि, सुखदायी आसनपर योगी पूर्वोक्त अर्थात् शुद्ध देशमें न अत्यंत ऊंचा और न अत्यंत नीचा और जिसपर क्रमले वस्त्र मृगचर्म बिछेहों ऐसे आसनको बांधकर जिसमें "ग्रीवा शरीर शिर ये समान रहे" इस श्रुतिके अनुप्तार ऐसे आसनको बांधकर अर्थात् स्वस्तिक वीर सिद्ध पद्म कोईसे आसनसे बैठकर -फिर दक्षिण नाडी ( पिंगला ) से देहसे बाहर वर्तमान जो पवन उसको शनैः २ खींचकर अर्थात् पिंगला नाडीसे पूरकप्राणायामको करके ॥ ४८ ॥

आकेशादानखाग्राच्च निरोधावधि कुंभयेत् ॥ ततः शनैः सव्यनाड्या रेचयेत्पवनं शनैः ॥४ ९॥ आकेशादिति ॥ केशाना मर्यादीकृत्याकेशं तस्मान्नखायाना मर्यादीकृत्येत्यानखायं तस्माच्च निरोधस्य वायोरवरोधस्यावधिर्मर्यादा यस्मिन्कर्मणि तत्तथा कुंभयेत् । केशपर्यंतं नखाग्रपर्यंतं च वायोर्नि रोधो यथा भवेत्तथातिप्रयत्नेन कुंभकं कुर्यादित्यर्थः । ननु 'हठान्नि-रुद्धः प्राणोऽयं रोमकूपेषु निःसरेत् । देहं विदारयत्येष कुष्ठादि जनयत्यपि ॥ ततः प्रत्यापितव्योऽसौ क्रमेणारण्यहस्तिवत् । वन्यो गजी गजारिर्वा क्रमेण मृदुतामियात् ॥ करोति शास्त्रनिर्देशान्न च तं