कठोपनिषद — पृष्ठ 101–110

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् पानी फिर जाता है एवं संगत भी नष्ट हो जाता है । संगत से यहां मैत्रीभाव अभिप्र ेत है । इस मनुष्य से प्रेम करने वाले सारे मित्रवर्ग इसकी मित्रता छोड देते हैं एवं सब इसके शत्रु बन जाते हैं । मित्रवर्ग की तो कथा दूर रही कोई इससे मीठा बोलना भी पसन्द नहीं करता । इसके लिए मधुर वाणी का सम्बन्ध भी बन्द हो जाता है । इससे जो भी बोलता है लट्ठ मारता हुमा ही बोलता है एवं इष्ट और भापूर्त के सारे फल नष्ट हो जाते हैं । यागज फल इष्ट है, आराम - कूप - तड़ागादि फल यापूर्त हैं । प्रतिथिधम्मं की उपेक्षा करने वाले की इष्ट- आपूर्त से सम्बन्ध रखने वाली ऐहलौकिक कीसि शोर पारलौकिक पितृस्वर्गादि फल दोनों नष्ट हो जाते हैं एवं पुत्र- पशु प्रादि - यादि और भी सारी सम्पतियाँ सदा के लिए नष्टप्राय हो जाती हैं । इसका वंश ही नष्ट हो जाता है । क्योंकि सृष्टिबिया के धनुसार संहारशक्ति के अधिष्ठाता रुद्र ( वैश्वानर अग्नि ) हैं । आाज प्रतिथिरूप में वही इस गृहपति के घर में घुस रहे हैं, अतएव जो पाद्यार्घ द्वारा इस रुद्रभाव को शान्त नहीं करता वह सचमुच कुछ नहीं रहता, ग्रतः हे यमराज! इन सब प्रकल्याणों से बचने के लिए प्राप नचिकेता का प्रतिथिसत्कार कीजिए जो कि तीन दिन से भूखा प्यासा आपके द्वार पड़ा हुआ है । इस प्रकार मूच्छित नचिकेता ने मूर्द्धावस्था में अपने धापको यमराज के घर पर पाया एवं उसने देखा कि मैं तीन दिन से भूखा हूँ । इस पर यमराज के दूतों को दया आई एवं उन्होंने यमराज को अतिथिधम्मं का ममं समझाते हुए मेरे स्वागत के लिए निवेदन किया । उसी समय मानों यमराज मेरे पास भाए और कहने लगे-" तिस्रो रात्रीर्यववात्सीगृहे मेऽनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व " ॥६ ॥

हे ब्रह्मन्! मे गृहे, अनश्नन्, तिस्रः, रात्रीः यत् - प्रवात्सीः - प्रतिथि-सन्नमस्यः- ( तस्मात् ) हे ब्रह्मन्! ते नमः अस्तु । मे स्वस्ति, मस्तु । तस्थात्-प्रति ( एकैकां रात्रि प्रति ) त्रीन् वरान् वृणीष्व ” ॥ " हे ब्रह्मन्! आप मेरे घर में तीन रात्रि तक बिना खाए रहे हैं । आप अतिथिरूप से मेरे घर में रहने के कारण प्रणम्य है, प्रतएव हे ब्रह्मन्! आपके लिए नमस्कार है । है ब्रह्मन्! आपकी कृपा से मेरा कल्याण है । ( यद्यपि आपकी कृपा से मेरा कोई अनिष्ट नहीं हो सकता तथापि बाप मेरे घर में तीन दिन तक विना खाए रहे हो, श्रतएव ) भाप उसके बदले प्रतिरात्रि के हिसाब से तीन बरवाम माँगिए " । मन्त्रगत ' रात्री ' शब्द श्रौर किसी खास लक्ष्य को सामने रखता है । वैदिक मतानुसार श्रमान्त मास को प्रधानता दी जाती है । इस क्रम में कृष्णपक्ष पहला पक्ष है, शुक्लपक्ष उत्तरपक्ष है । रात्रि पहले है- दिन बाद में है, प्रतएव गोपथश्रुति में रात्रि से ही सारी सृष्टि मानी गई है । यबन लोग भी इसी मत के अनुयायी हैं । उनके यहाँ भी रात्रि पहले है, दिन बाद में है । इसलिए हम [ ६२ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् जिसे बृहस्पति को रात्रि कहते हैं वही उनके शुक्र ( जुमा ) की रात्रि है । कहना यही है कि वैदिककाल में रात्रि प्रथमा है - अहः द्वितीय है, अतएव जहाँ हम किसी काय्यं के लिए ' इसमें तीन दिन लगे हैं ' -यह कहते हैं - वेदवाले उसके स्थान में ' तीन रात्रि लगी है - यह कहते हैं । बस, उसी व्यवस्था के अनुसार यहाँ - ' तिखो रात्री: ' - भाग हैं । - कहा है । अपि च- दक्षिणायन और उत्तरायण भेद से खगोल के दो उत्तरायण भाग देवतानों का दिन है, दक्षिणायन का माग रात्रि है । यज्ञ - तप - दान करने वाले उत्तरायण-रूप महः भाग में जाते हैं एवं इष्ट - मापूर्त - दत्त करने वाले दक्षिणायनमागरूप रात्रिभाग में जाते हैं । माग में ही शनि है । यम और धम्मं का इसी शनि के साथ सम्बन्ध है - जैसा कि प्रारम्भ में ही बतलाया जा चुका है । उत्तरमाग में यमादि का अभाव है । आज नचिकेता यम के पास गया है । यम विभाग में है, दक्षिणभाग रात्रि है । बस, इस विज्ञान को बतलाने के लिए मी ' तिस्रो रात्रो: ' -कहा है । मन्त्र में– ब्रह्मन् ’ - शब्द की पुनरुक्ति की है । इसका कारण यही है कि यमराज आज नचिकेता के ब्रह्मवेज से डर रहा है । आज वह डर रहा है कि कहीं ऐसा न हो कि तीन दिन से भूखा - प्यासा af ता प्रभिशाप दे डालें । जब भादमी किसी से डरकर उससे क्षमा प्रार्थना करता है तो डर के मारे उसके मुंह से क्षमा करो - क्षमा करो -त्राहि मां त्राहि मां इस प्रकार पुनरुक्तियुक्त वाक्य निकल पड़ते हैं । आज यमराज की वही दशा है - बस, यही भाव बतलाने के लिए ' ब्रह्मन् ब्रह्मन् ' कहा है । साथ ही में शिक्षा भी दी जाती है कि यदि किसी कारण विशेष से या भूल से तुम प्रतिथि का सत्कार करना भूल जाबो तो बाद में बार - बार उसकी खुशामद करके क्षमा गांगो - इसी में तुम्हारा कल्याण है । इस प्रकार afehar ने देखा कि यमराज अपने सेवकों की बेतावनी पर ध्यान देकर मेरा पायाएं करके मेरे से तीन वर माँगने के लिए प्रार्थना कर रहा है । यमराज के - ' तस्मात् प्रति श्रीम् वरान् बृणीष्व - सुनकर fear मन ही मन प्रसन्न हो जाता है और सबसे पहले उसके मुख से निम्नलिखित अक्षर

निकलते हैं-"." शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युगौतमो माभि मृत्यो ।

वत्सृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१० ॥

“ हे यमराज! यदि बाप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं एवं प्रसन्न होकर तीन वरदान देना चाहते हैं तो उनमें से मैं आप से पहला यही वरदान माँगता हूँ कि जो मेरे पिता गौतम हैं - वे जिस प्रकार से शान्त-संकल्प हो जाएँ एवं उनका मन जिस प्रकार से सर्वधा प्रफुल्लित हो जाए एवं मेरे प्रति वे वोतमन्यु हो जाएँ र्षात् मेरे प्रति होने वाला उनका सारा क्रोध हट जाए ऐसा वरदान दीजिए । अपि च - हे मृत्यो! धापसे मुक्त हुम्रा हुम्रा मैं जब उनके सामने जाऊँ तो उस समय वे मेरे ऊपर विश्वास करते हुए - यह वही मेरा प्रिय पुत्र है - यह समझते हुए मेरे से प्यार से बोलें - बस, उन तीनों वरों का पहला यही वर बापसे माँगता हूँ " ॥ [ ६३ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विनिरूपणोपनिषत् हमने बतला दिया है कि नचिकेता के - " मुझे आप किस प्रयोजन के लिए किसको सौंप रहे हैं "? बार - बार यह पूछने पर पिता गौतम ने दुःखी होकर " मौत के लिए तुझे सोप रहा हूँ " - यह कहा था । नचिकेता बच्चा ही था उसने पिता के इन अक्षरों को क्रोधमय समझा । उसने समझा कि मेरी धृष्टता से मुझ पर पिता अप्रसन्न हो रहे हैं । श्राज वही बातें मूच्छित नचिकेता के मस्तिष्क में घूम रही हैं । साथ ही में उसे डर लगता है कि जब मैं पिता के सामने जाऊँगा तो वे मेरे प्रति- " मैंने तुझे मृत्यु के लिए ( यमराज के लिए ) दे दिया था फिर बिना उनकी प्राशा के तू वापस कैसे लौट बाया "? -ऐसे - ऐसे भत्संनायुक्त वचन बोलते हुए और भी अधिक प्रसन्न हो जाएंगे । पिता की अप्रसन्नता कल्याण को नष्ट कर देती है, अतएव मैं आपसे पहले यही प्रार्थना करूंगा कि यद्यपि में पिता से - " मैं मृत्युदेवता की आज्ञा से ही आया हूँ " यह कह दूंगा, परन्तु मुझे बालक समझकर संभव है - मेरे कथन पर बे विश्वास न करें, अतः आप उनके हृदय में ऐसे भाव भर दीजिए कि जिससे उनके संकल्प - विकल्प, विस की वृत्ति प्रादि मेरे अनुकूल हो जाएं । मैं धापके लोक से तीन दिन में जा रहा हूं - संभव है - ये मुझे न पहचाने, भत: साथ में आपसे यह भी प्रार्थना करूंगा कि वे मुझे पहचान भी जाएं । " पिता मुझ पर रुष्ट न हों ” - यही इस वरदान का निष्कर्षाचं है । नचिकेता बडा चतुर है - उसने एक ठेले में दो शिकार की है एवं बडी चतुरता से की है । पहले वाक्य में नचिकेता ने- " गौतम मेरे प्रति वीतमन्यु हो जाएँ " -यह कहा है एवं बाद में ' मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ' कहा है । मृत्युमुख से छूटे विना नचिकेता का गौतम के पास पहुँचना संभव नहीं, प्रतएव वह पहले ही वाक्य से परोक्षरूप से मृत्युपाक्ष से अपनी मुक्ति चाह लेता है । इसलिए- ' बीतमन्युगौतभो मामि मृत्यों से जब उसे निश्चय हो जाता है तो बाबे जाकर स्पष्टरूप से - ' मृत्युमुखात् ंप्रमुकम् ' यह कह देता है । साथ हो में महष्टि यह भी सिखलाते हैं कि मुर्च्छा-वस्था में प्राण निकलते नहीं हैं - केवल बह्यरन्ध्र में चढ जाते हैं । यदि एक बार प्राण निकल जाते हैं तो फिर तो उसका जीवित होना असंभव ही है । ' मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ' - यह सूचित करता है कि नचि-har मरा नहीं है - प्रपि तु मूच्छित है - जैसा कि भूमिका में बतला दिया गया है । हमारा यह ' मणि-har पाख्यान ' पौराणिक सावित्री सत्यवान् के आल्यान से बिलकुल मिलता - जुलता है । पतिपरायणा प्रातः स्मरणीया सावित्री का सत्यवान् से विवाह होता है । नारद के कथनानुसार विवाह के एक वर्ष बाद ही भ्रमावस की घोर रात्रि में लकड़ी काटता हम्रा सत्यवान् सर्प से काटा आकर मूच्छित हो जाता है । सास - ससुर से बड़ी कठिनता से प्राज्ञा लेकर इस कालरात्रि में अपने पति के साथ धाई हुई भगवती सावित्री यह दृश्य देखकर घबड़ा जाती है । वह जान जाती है कि नारद ने उसके पिता के सामने एक वर्ष बाद होने वाले जिस अमंगल की सूचना दी वह घटना मा पहुंची है । उसी समय उसका सतीत्वबल जागृत हो पड़ता है एवं वह मन ही मन प्रतिज्ञा कर बैठती है कि एक हो यमराज क्या सहस्रयमराज भी मेरे से मेरे मात्मा को ( मेरे प्राणाधार को ) पृथक् नहीं कर सकते । बस, यह भीष्म प्रतिज्ञा कर मुच्छित पति के मस्तक को अपनी गोद में लेकर पालक मारकर ध्यान में मग्न हो यमराज से युद्ध करने के लिए तय्यार हो जाती है । जैसे समाधि में बैठे हुए योगिराज अपने सूक्ष्मशरीर से लोकान्तर में बाया - बाया करते हैं - प्राज वही दशा इस सती की है । इसे बहिर्जगत् का कुछ भी पता नहीं है । इसको दक्षा मी आज मूच्छिन मनुष्य जैसी है । उसी अवस्था में सती देखती है कि मानो यमराज मेरे पति के प्राणों [ ६४ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् को ले जा रहा है । यह देखते हो सती भी उसके साथ - साथ चल पड़ती है । इस सती प्रभाव से प्रभावान्वित होकर ३-४ वरदानों के बाद यमराज को परास्त होना पड़ता है । प्रस्तु, इस आख्यान को लिखना व्यर्थ है । भारत का बच्चा - बच्चा इस सती की इस पवित्र गाथा से परिचित है । यहाँ इससे यही बतलाना है कि सत्यवान् को सर्प ने काटा था । सर्प का काटा हुआ प्राणी तत्काल ही नहीं मरता-तु, दो- दो - तीन तीन दिन तक वह मूच्छित रहता है । इसीलिए अभियुक्तों का प्रदेश है कि सर्प के काटेहुए को मृताकृतियुक्त देखकर ही तुम उसे जला मत दिया करो । क्योंकि वह मरा नहीं है- मूच्छित मात्र है । यही दशा सत्यवान् की थी वही दशा नचिकेता की है । मन्तर दोनों में केवल इतना है कि afer की मृत्यु का समय नहीं आया था सत्यवान् का समय मा पहुँचा था । इसी भेद के लिए इस नचिकेतोपाख्यान में - ' तिलो रात्री ' पद दिया है । तीन रात्रि तक यमराज को पता न लगा- इससे यही बतलाना था कि नचिकेता का मृत्यु से सम्बन्ध होने का समय अभी न था । इषर यदि सती प्रपने बात्मबल से काम न लेती तो सत्यवान् की मृत्यु निश्चित थी । बस, दोनों उपायानों में अन्तर है तो इतना ही है- बाकी सब समानता है । यमराज नचिकेता को भी बर माँगने के लिए कहता है - इधर सावित्री को भी वर मांगने के लिए कहता है । दोनों ही बर मांगते हैं । इधर नचिकेता भी जीवित हो उठता है - सुधर सती के प्रताप से सत्यवान् जीवित हो उठता है । इस वाक्यान की ओर ध्यान दिलाने का हमारा एकमात्र प्रयोजन यही है कि आज दिन पौराणिक क्यानोपाख्यानादि को कपोल - कल्पना बतलाया जाता है । परन्तु पुराण को पोपलीला समझने वाले उन वेदाभिमानियों को अपनी प्रोखों पर से पाश्चास्य शिक्षा का चश्मा उतार कर देखना चाहिए कि ऐसे - ऐसे आख्यानोपाख्यान वेद में मरे पड़े हैं । यदि पुराण पोपलीला है तो बेब भी पोपलीला ही है । बस्तु, प्रकृत में यही कहना है कि नचिकेता पहला यही वरदान मांगता है कि भाप मुझे अपने पाल से मुक्त कर दीजिए । यदि केवल यही कहता है तो दोनों काम नहीं बनते, पतएव वह कहता है कि " आपसे मुक्त हुए मुझ पर पिता अप्रसन्न न हों " । इसके दो मतलब मिकल आते हैं - जैसा कि अनुपद में बतलाया जा चुका है । यमराज उत्तर देता है-" यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत प्रौद्दालकिरारुणि मंत्प्रसृष्टः । सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां दरशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ” ॥११ ॥

नचिकेता के वर के उत्तर में - ' तथास्तु ' कहते हुए यमराज कहते हैं - है नचिकेता | मृत्युलोक में थाने से पहले तुम्हारा पिता तुम से जैसा स्नेह रखता था, अर्थात् मरने के पहले तुम्हारे ऊपर पिता का जैसा प्रेम था जब तुम मेरे से ( मेरे पाश से ) मुक्त होकर वापस लौटकर जाओगे तो तुम्हें पहले की तरह पहचान कर अरुण के पुत्र ( अतएव आरुणि नाम से प्रसिद्ध ) उद्दालक ( उशन् ) तुम्हारे से वैसा ही स्नेह करेंगे । अर्थात् तुम्हारे ऊपर पिता का पहले जैसा स्नेह था - जब तुम वापस लौट के जाभोगे तो भाणि - " अरे । यह तो वही मेरा प्यारा पुत्र नचिकेता है " - इस प्रकार पहचानते हुए तुम से बेसा [ ६५ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ही स्नेह करने लगेंगे | मन्त्रगत ' प्रतोत ' का ( स एवायमिति परिचययुक्त ) - यही प्रथं है । अपि बन्हे नचिकेता! मेरे अनुग्रह ' से युक्त तुझे मृत्युमुख से निकला देखकर तेरा पिता धागे की रात्रियों को मानन्द से शयन करता हुआ निकालेगा एवं मेरे ही अनुग्रह से यह मेरी दान - सम्बन्धी मर्यादा को तोड़कर नहीं भाया है- ' अपि तु यमराज से आज्ञा लेकर प्राया है - यह विश्वास करता हुआ तुझे देखकर सर्वथा क्रोधरहित हो जाएगा । ि roni यही हुआ कि तुझे पिता मे नहीं डरना चाहिए । मेरे अनुग्रह से यह इस सारे गुप्त रहस्य को जान जाएगा । ऐसी अवस्था में अप्रसन्नता का कोई कारण न रहेगा । मन्त्रगत - ' सुखं रात्रीः शयिता - यह वाक्य व्यवहारभाषा से सम्बन्ध रखता है । जब कोई मनुष्य सारी चिन्तायों से मुक्त हो जाता है तो उसके मिलने - जुलने वाले उसे कहा करते हैं कि भाई! अब तुम्हें किस बात की चिन्ता है? अब तो तुम सुख की नींद सोओ । बस, यहाँ इसी साधारण भाषा का उपयोग है | यमराज नचिकेता से कहता है कि नचिकेता! तेरा पिता तुझे देखकर सारी चिन्ताबों से अलग हो जाएगा एवं खूब लम्बी तानकर सोयेगा । एक वरदान समाप्त हुआ । अब बालक नचिकेता आगे बतलाया जाने वाला दूसरा वरदान मांगता है-नचिकेता कहता है -" स्वर्गे लोके न भयं किचनास्ति न तत्र त्थं न जरया बिभेति । उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके " ॥१२ ॥ "

यमराज! मैंने सुन रखा है कि स्वर्गलोक में मय का लेशमात्र भी नहीं है । न वहीं पर तुम हो अर्थात् न वहाँ मौत का डर है एवं न वहीं पर जाने वाला बुढापे से ही डरता है । प्रपि तु, भूख और प्यास दोनों बन्धनों को तोड़कर दोनों सीढियों को उलांघकर वीतशोक ( शोकरहित ) होकर वह पुण्यात्मा उस स्वर्गलोक में आनन्द का उपभोग करता है । जीवात्मा में क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा, मृत्यु - ये ६ ऊम्मिएँ होती हैं । पितृस्वर्ग और यमपथ दोनों में एवं पृथिवीलोक में स्थूलशरीरावस्था में इन तीनों अवस्थामों में जीवात्मा इन छम ऊम्मियों से प्राक्रान्त रहता है । परन्तु यज्ञ - तप - दान द्वारा हृदय से ऊपरभाग से निकलता हुआ जीवात्मा स्वर्गद्वारभूत चन्द्रमा द्वारा उत्तरभाग में जाकर स्वर्गलोक में पहुँचता हुमा इन छमों से विमुक्त हो जाता है । प्रर्थात् वह जीवात्मा अविजिधित्स, पपिवास, वीत-१- ' मत्प्रसृष्टः ' का अर्थ है- ' मयानुज्ञात - अनुग्रहसम्पन्न: ' । ' मेरे से छोडा हुआ ' - इसका मावार्थ यही कि मेरी आज्ञा लेकर मेरे लोक से वापस पृथिवीलोक में जाने वाला तुझे जानकर पिता कुछ नहीं कहेगा । २- १ - भयम्, २ - त्वम् ३ - जरया, ४ - श्रशनाया, ५ - पिपासे, ६- शोकातिग - इन छहों से क्षुधापिपासादि छहों उम्मिएँ ही अभिप्रेत हैं । भय मोह है । त्वं मृत्यु है । जरया जरा है । प्रशनाया क्षुधा है । पिपासा प्यास है । शोक शोक है । [ ६६ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषद् चोक, श्वभय, ममृत्यु एवं अरमान को प्राप्त होता हुआ छो कम्नियों से सर्पककीवत् अलग निकलकर सत्मसंकल्प एवं सत्यकाम बनकर स्वर्गानन्द में प्रतिष्ठित हो जाता है । शनि का नाम यम है - उसकी सत्ता मागस्य पितृस्वर्ग और यमपय दो में ही है । स्वर्ग उत्तरभाग में है, अतएव - ' न तत्र त्वम् ' - यह कहा है । इस प्रकार नचिकेता स्वर्गात का वर्णन करके अपना स्वार्थ प्रकट करता हुआ कहता है कि-" सत्वमग्नि स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं भद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्वितीयेन वृणे वरेण ” ॥१३ ॥

" हे यमराज! मेरा यह दृढ विश्वास है कि जिस स्वर्गलोक में ऊम्मियों का प्रभाव है उसको प्राप्ति के साधमभूत स्वयं भग्नि को आप भलीभांति जानते हो अर्थात् जिस प्रग्नि ( दिव्याग्नि ) के द्वारा पूर्वोक्तविशिष्ट स्वर्ग मिलता है उस दिव्याग्नि के स्वरूप को भाप मली - मांति जानते हैं, मत: - " हे मृत्यो! स्वर्गसत्ता पर श्रद्धा रखने वाले मेरे लिए आप उस अग्निरहस्य को प्रकट करो - जिसे कि जानकर स्वर्गलोक नाम से प्रसिद्ध होने वाले यजमान ( अग्निविद्या से स्वर्ग यजमान का लोक बन जाता है, अतएव ' अग्निचयनेन स्वर्ग लोको येषां ते ' - इस व्युत्पत्ति से वे लोक ' स्वर्गलोक ' नाम से पुकारे जाते हैं । स्वर्ग की विभूतिएं इनमें प्रतिष्ठित रहती हैं, मतएव इन्हें अवश्य ही स्वर्गलोक कहा जा सकता है ) देवभाव को प्राप्त हो जाते हैं । बस, दूसरे वरदान से मैं आपसे इस अग्निरहस्य को ही जानना चाहता हूँ " । महषियों की प्राज्ञा है कि जब तक शिष्य पूर्णरूप से श्रद्धा न रखे तब तक तुम उसे हर्गिज उपदेश मत दो, क्योंकि विना श्रद्धा के विद्योपदेश करना ऊसर भूमि में बीजवपन करना है । श्रद्धा चन्द्रमा का रस है । यह सोम है । सोम में स्नेहगुण है । मात्मा पर पाने वाले विषयों का आत्मा के साथ सम्बन्ध कराने वाला यही श्रद्धाभाव है । भिन्न - भिन्न विषयों के लिए भित्र भित्र भद्धा होती है । जिसकी डा होती है - उसका बात्मा से सम्बन्ध है - जिस की श्रद्धा नहीं है उस विषय का आत्मा के साथ सम्बन्ध होना असंभव है । पुरुष श्रद्धामय है । वह जैसी श्रद्धा करता है वैसा हो बन जाता है । श्रद्धा ही उसका मसली स्वरूप है । श्रद्धावान् मनुष्य— " धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ” ॥ ' -के अनुसार ( कम्म बन्धन से ) मुक्त हो जाता है, अतएव -" यदेव श्रद्धया करोति तदेव वीर्यवत्तरं भवति " ॥ " -यह कहा जाता है । नचिकेता अपनी पात्रता प्रकट करता हुआ कहता है कि मैं स्वर्गसत्ता पर बडा रखता हूँ, यतएव बापका उपदेश सुनने योग्य हैं, अतएव आप कृपा करके अवश्य ही इस गुप्त-रहस्य को प्रकट कीजिए । १- मीबा ३।३१ । २ - छान्दोग्योप ० १।१।२० । [ ६७ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिपद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् वनाग्नि से यजमान का ' मात्मा ' स्वर्ग में चला जाता है - जैसा कि आगे जाकर सूक्ष्मरूप से बतलाया जाएगा । आज यह नचिकेता यमराज से स्वर्गप्राप्ति के साधनभूत उसी स्वग्यं प्रग्नि का स्वरूप पूछ रहा है । उसी का सूत्ररूप से समाधान करते हुए यमराज नचिकेता से कहते हैं-" प्र ते ब्रवोभितदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकात प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् " ॥१४ ॥

नचिकेता! जिस गुप्त रहस्य को जानने की तुमने इच्छा प्रकट की है वह तुमसे कहता हूँ । क्योंकि यह रहस्य वडा कठिन है, अतः मेरे इस कथन को एकाग्रचित्त होकर ध्यान से सुनो । हे नचिकेता! जिस स्वग्यं श्रग्नि का गुप्तस्वरूप मैं तुम्हें श्राज बतलाना चाहता हूँ - विश्वास करो - उसे पहले मैंने खूब सनम लिया है । इस प्रकार उस निगूढ ग्रग्नितत्त्व को भली प्रकार जानकर हो तुम्हें उसका स्वरूप बतलाता हूँ । तात्पर्य्यं यही है कि मैं तुम्हारी मिथ्या वञ्चना नहीं करता - अपि तु जिसे मैं यथार्थरूप से जानता हूँ - उस सत्य का मयार्थरूप से ही प्रतिपादन करता हूँ । हे नचिकेता! जिस अग्निरहस्य को मैं तुम्हें बतलाने वाला हूँ - वह अनन्तलोक के फल की प्राप्ति का साधन है । इसे जानकर ही मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त करने का अधिकारी बन सकता है । प्रपि च यह प्रग्नि ही सपूर्ण विश्व की प्रतिष्ठा है । बस, मैं तुम्हें इसी प्रतिष्ठारूप प्रति को जो कि अत्यन्त गहरी गुफा में छुपा हुआ है - बतलाता हूँ । तुम इसे पहचानो -मन्त्रगत ' प्रजानन् ' शब्द उपदेश देता है कि तुम्हें अपनी पडिताई प्रतिष्ठित रखने के लिए दूसरे को घं के में नहीं डालना चाहिए । यदि तुमसे काई जिज्ञासु श्रद्धापूर्वक प्रश्न करता है एवं यदि तुम्हें उसका ठक - ठीक उत्तर मालूम है तो बतला दो । यदि तुम उसका समाधान करने में असमर्थ हो तो तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उसे साफ मना कर दो । कह दो कि भाई! इसका उत्तर नहीं जानता । बाद तुम झूठ - मूठ का उत्तर देते हो तो दूसरे को घोका देते हुए अपने श्रापको घोका देते हो, अतः तुम जब कभी किसी प्रश्न का समावान करने उतरो तो पहले ' प्रजानन् ' को सामने रखो । इसी में तुम्हारे आत्मा का विकास है अन्यथा ह्रास है । आज यमराज नचिकेता को जो अग्निरहस्य बतलाना चाहता है वह सचमुच स्वर्ग प्राप्ति का साधक है एव सारे लोकों की प्रतिष्ठा है । जितने भी पिण्ड हैं - उनमें चित्य - चितेनिवेय भेद से दो प्रकार का अग्नि रहता है । इसमें प्रकृत में अग्नि से चितेनिधेय प्रग्नि अभिप्रेत है जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । यह चितेनिधेय अग्नि ही चित्यस्वरूप लोकों की प्रतिष्ठा है एवं चित्य प्रकट है, दृश्य है । चितेनियेय प्राणरूप होने से अन्तनिगूढ है । आगे के मन्त्र से यमराज इसी गुहा निहित स्वर्ग्याग्नि का स्वरूप बतलाते हैं-" लोकादिर्माग्नि तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ॥ स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः " ॥१५ ॥

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् “ यमराज ने नचिकेता के लिए उस लोकादि ( लोक के प्रादिभूत अर्थात् प्रथमज ) अग्नि को बतला दिया । साथ ही में इस अग्नि से सम्बन्ध रखने वाली जो इष्टकाएँ हैं एवं जितनी उनकी संख्या है एवं जिस विधि से उनका चिनाव करते हैं - यह सब कुछ बतला दिया । उस नचिकेता ने भी ( जैसा यमराज ने बतलाया था वैसा ही ) ठीक प्रकार से अनुवदन कर दिया । इस प्रकार इस नचिकेता के प्रत्युच्चारण से प्रसन्न होते हुए यमराज ( प्रतिज्ञा से एक वरदान अधिक देने के लिए ) पुनः नचिकेता से बोले " - यह है मन्त्र का अक्षरार्थं । इस मन्त्र के अर्थ का निरूपण करने वाले वेदभाग का नाम है-' श्चयनकाण्ड ' । जब तक सारे चयनयज्ञ का स्वरूप नहीं जान लिया जाए तब तक इस मन्त्र का अर्थ समझना कठिन ही नहीं अपितु, प्रसाध्य है । इसीलिए तो हमने कहा है कि केवल उपनिषत् को सामने रखने से तब तक उसका अर्थ समझ लेना असंभव है जब तक कि ब्राह्मणादि अन्य वेदभाग को न समझ लिया जाए । उपनिषत् से पहले ' आरण्यक ' है । आरण्यक से पहले ' ब्राह्मण ' है । ब्राह्मणग्रन्थ में कर्मकाण्ड का प्रतिपादन है । कम्मं का ही नाम - ' यज्ञ ' है । यज्ञ ' सोम और चिति ' भेद से दो प्रकार का है । अग्नि में सोम की प्राहुति डालने से सोम अग्नि ही बन जाता है, अतएव इसे ' यज्ञ ' कहा जाता है एवं भग्नि में जब अग्नि डाला जाता है तो वह अग्नि उस आहुत होने वाले अग्नि को हजम नहीं कर सकता अपि तु, उसे अपने ऊपर प्रतिष्ठित कर लेता है । इस प्रकार उत्तरोत्तर की आहुति से अग्नि का उस प्रथम अग्नि पर चिनाव हो जाता है, प्रतएव इसे ' चिति ' कहा जाता है । प्रकृति में दोनों यज्ञ हो रहे हैं । इन दोनों का जिस प्रग्नि के साथ सम्बन्ध है - उसी का नाम सवत्सराग्नि है । इसी का नाम प्रजापति है । जिस पारमेष्ठ्य सोम की उस प्रग्नि में आहुति होती है । वह - राजा, वाज, ग्रह, हवि भेद से चार प्रकार का है । इस लोग के भेद के कारण एक ही सोमयज्ञ चार प्रकार का हो जाता है । हविलोम से सम्बन्ध रखने वाला यज्ञ ' हविर्यज्ञ ' कहलाता है - इसी को ' दशपूर्णमासयज्ञ ' कहते हैं एवं ग्रहसोम से सम्बन्ध रखने वाला यज्ञ ' ग्रहह्नज्ञ ' कहलाता है - इसी का नाम ' ज्योतिष्टोम ' है । इस ज्योतिष्टोमापरपय्ययिक ब्रयाग की प्रग्निष्टोम अत्यग्निष्टोम, उक्थ्यस्तोम षोडशीस्तोम, प्रतिरात्रस्तोम, वाजपेयस्तोम, आप्तोर्यामस्तोम भेद से सात सस्थाएं हैं, प्रतएव ' सप्तसंस्थो वं ज्योतिष्टोमः - यह कहा जाता है एवं वाजसोम से सम्बन्ध रखने वाला यज्ञ वाजपेयस्तोम कहलाता है एवं राजसोम से सम्बन्ध रखने वाला यज्ञ राजसूय कहलाता है । इस प्रकार केवल सोम भेद से एक ही सोमयज्ञ ( १ ) हृवियंज्ञ, ( २ ) - ब्रहयज्ञ, ( ३ ) - वाजपेय, ( ४ ) - राजसूय - भेद से चार प्रकार का हो जाता है । बस, सोमयज्ञ चार ही प्रकार का है । इन चारों के अवान्तर सहस्रों भेद हो जाते हैं । चारों सोमरूप होने से सोमयज्ञ हैं । दूसरा है - चितियज्ञ । चिति का ही नाम अग्निचयन है । संबत्सरकेन्द्रस्थ प्रजापति पर एक संवत्सर की ७२० ( ३६० ग्रह का अग्नि, एवं ३६० रात्रि का अग्नि ) भग्नि की इष्टकाएँ होती हैं । ईंट का नाम ही वैदिकपरिभाषा में इष्टका है । चयनयज्ञ में चैत्रबुदि मावास्या में दीक्षा दिला दी जाती है । इसके बाद एक वर्ष बाद चैत्र की अमावास्या में सोमक्रय होता है । मनन्तर - यजुष्मती और लोकम्पृणा नाम की इष्टकात्रो का प्रकृति के अनुसार चिनाव होता है । इसमें सोमय मौर दीक्षा - दिन के बीच में वर्षभर तक विष्णुक्रम और वात्स नाम के दो कर्म होते हैं | ६ महिने तक पहले दिन विष्णुक्र होता है - दूसरे दिन वास होता है एव ६ महिने बाद ६ महिने [ ६६ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् तक पहले दिन वात्सप्र होता है एवं दूसरे दिन विष्णुक्रम होता है । इस प्रकार १५० दिन विष्णुक्रम होता है । यह अहः का स्वरूप है । इससे १५० ग्रह का अग्नि पकड़ में आ जाता है एवं १८० दिनवात्सप्र होता है - यह रात्रि का स्वरूप है । विष्णुक्रम प्राण है, वारसप्र खपान है । प्राण यह है, अपान रात्रि है । इस प्रकार इन दोनों कम्मों से ३६० महोरात्र पकड़ में आ जाते हैं । इससे स्वयं-प्राप्ति हो जाती है । ' अग्नि चित्य प्रौर चितेनिषेय भेट से दो प्रकार का है । चित्य अग्नि भूत है, चितेनिषैयाग्नि देवता है । चित्यग्निसाकार है, चितेनिवेयाग्नि निराकार है । चित्य की सत्ता इसी प्राणरूप चितेनिधेयाग्नि पर निर्भर रहती है । इमे ही अमृताग्नि भी कहते हैं । वस्तुपिण्ड चित्यरूप है एवं महिमामण्डल चितेनिधेयमय है । यह चितेनिधेय अग्नि वस्तु पिण्ड से बडी दूर तक ( जहाँ तक वस्तुपिण्ड दीखा करता है वहाँ तक ) व्याप्त रहता है । इसी मण्डल को वषट्कारमण्डल कहते हैं । इस में ३३ ब्रह्मण होते हैं । इन ३३ में से २१ तक अग्नि रहता है - २१ से ऊपर ३३ तक सोम रहता है - यद्यपि प्रग्नि १७ अगं पर ही रहता है, परन्तु सोमाहुति से प्रज्वलित होकर वही २१ तक चला जाता है । उदाहरणार्थं पृथिवीपिण्ड को ही लीजिए | इसका चितेनिधेय १७ तक जाता है । इसी सप्तदश अहगंणस्थानीय व्यग्नि कहते हैं । यहाँ से सोमाहुति के चूँकि सोम की प्राहुति होती है, अतएव इस अग्नि को ' आहवनीय ' कारण यह श्रग्नि २१ वें अहमण पर चना जाता है । पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर ही सूर्य है । यहीं तक बल्कि इससे भी कुछ ऊपर २२ तक पार्थिव नि अतएव पार्थिवसामरथन्तरसान कहलाता है । इस प्रकार वही पार्थिवाग्नि चयनक्रम से सूय्यं तक व्याप्त हा रहा है । सूय्यं का ही नाम स्वयं है । पार्थिव प्रजापति इसी ७२० इष्टका रूप चयन से स्वर्ग में प्रतिष्ठित रहता है । चयनयज्ञ को छोडकर जितने यज्ञ हैं - उनसे मुक्ति नहीं होती, प्रतएव - ' नामृतत्वस्याशास्ति ऋते चयनात् ' - यह कहा बाबा है । यज्ञों में एक यज्ञ हो ऐसा है जो आवागमन का विरोध करता है । इसमें मी जो मनुष्य एक बार चयन करता है - उसे १७ वी स्वर्ग मिलता है । दो बार चयन करने से ब्रघ्नस्य विष्टर नाम से प्रसिद्ध २१ वाँ नाकस्वर्ग मिलता है एव जो मनुष्य ३ बार चयन कर लेता है वह २५ में उत्तमनाक में जिसे कि ऐन्द्रपद भी कहते हैं प्राप्त कर लेता है । यही सूर्य्यबेधी कहलाता है ॥ १७ से २५ तक बाल स्वर्ग हैं | १७ वाँ स्वर्ग नाचिकेतस्वर्ग कहलाता है । २५ व उत्तमस्वर्ग कहलाता है एवं मध्य के १८, ११, २०, २१, २२, २३, २४ - ये ७ ( सात ) ग्रहण - ' सप्त वे देवस्बर्गा: - वाले सात स्वर्ग हैं । इनमें २१ व केन्द्र में है । यही नाक ( कदम्ब ) हे एव १७ - २१ - २५ तीनों की समष्टि का नाम ' त्रिणाचिकेत स्व ' है । 3 पूर्वकथनानुसार जो तीन बार चयन कर लेता है - वह इन तीनों को प्राप्त कर तीसरे में प्रतिष्ठित हो जाता है । इसी के लिए न स पुनरावर्तते, न स पुनरावर्तते ' - यह कहा जाता है । २१ बी अग्निसोरविद्युत् कहलाता है, २५ वां श्रग्नि सोम्यविद्युत् कहलाता है, क्योंकि २१ के ऊपर ३३ तक सोम है । इस प्रकार चयनयज्ञ से अमृतलोक की प्राप्ति होती है - यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । यह १- द्रष्टव्य शत ० ब्रा ० ६ । ७ । ४ । ११ । ' वात्सप्रोपस्थान ब्राह्मण ' । २- द्रष्टव्य शत ० बा ० १२।६।२८ । " स्वर्गो व लोकः सूर्य्यः " ३ - सम्बन्धित परिलेख पृष्ठ ७१ पर देखें । [ ७० }

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य नचिकेतादिस्वर्ग परिलेख: --विद्यानिरूपणोपनिषत् २५ प्रत्वस्वर्गः विष्टम् - इन्द्र बाल स्वर्ग: -२१. विष्णु विष्टप ३४ २२ IIरोचन समुदय स्वर्ग → प्रयोः च्यु स्वर्ग: * अधियों बाका स्वर्गी ऐन्द्र: II 4 अपराजितः ऐन्द्र स्वर्ग: II G अपरोदक: | वायव्यस्वर्ग: नाचिकेत स्वग : ब्रह्मविष्ण १७ १८-ऋत सामा अग्नेश स्वर्ग: [ सौर सम्वत्सरमण्डल के जिस नियत ज्योतिर्म्मय प्रदेश से पार्थिव अग्निस्तम्भ समतुलित है, वह सौर सम्वत्सरमण्डल ' नबाहयश ' नाम से प्रसिद्ध है । इस नवाहयज्ञ में " १७ १८ १ ९ २० २१-२२-२३-२४-२५ " इन 8 अहर्गणों का भोग हो रहा है । इस नवाह यज्ञ के केन्द्र ( पृथिवी का २१ व अहर्गण ) में सूर्य प्रतिष्ठित है । इस सम्वत्सरात्मक ज्योतिर्मय ऐन्डाग्नस्कम्भ देवस्वर्ग में ३ ( १७ - २१ - २५ ) त्रिणाचिकेत स्वर्ग व ७ ( १८-१९ -२० -२१-२२-२३-२४ ) देवस्वर्ग हैं । सं ० ] [ ७१ ]