कठोपनिषद — पृष्ठ 91–100

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

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Ventre ( प्रथम वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " दक्षिणासु नीयमानासु ( दक्षिणात्येन नीयमानासु ) तं ह कुमारं सन्तं श्रद्धा

प्राविवेश । सोऽमन्यत " ॥

दक्षिणारूप में परिणत हुए उस कुमार नचिकेता की ओर श्रद्धाभाव प्रविष्ट हो गया । उसने

विचारा कि-" पोतोका बग्घतृरणा दुग्धबोहा निरिब्रियाः ।

अनन्या नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता वदत् " ॥३ ॥

जिन्होंने जल पी लिया है, घास खा लिया है एवं जिनसे दुग्ध निकाल लिया गया है एवं जो नोरोग हैं- ऐसी गौबों को दक्षिणारूप से देता हुधा यजमान सुखप्रद लोकों में जाता है । यह कहने का भिप्राय यही है कि गोदान से स्वर्गसुख मिलता है । जबकि मैं गाय नहीं तो फिर ऐसी अवस्था में मेरी दक्षिणा देने में न मालूम पिता ने कौनसा स्वार्थ समझ लिया है? नचिकेता ने देखा कि तुझे यह ब्राह्मण दक्षिणा के रूप में लिए जा रहे हैं । इसीलिए वह विस्मय में पड़ जाता है और कहने लगता है कि दक्षिणा का प्रयोजन स्वर्गादि सत् लोकों की प्राप्तिमात्र है । ' एवं फल हृष्ट - पुष्ट - सृप्त गौ के दान से मिलता है । ऐसी अवस्था में समझ में नहीं पाता कि पिता मुझे क्यों दान कर रहे हैं जबकि गौ न होने के कारण मैं स्वर्गफल का साधक नहीं हूँ । हम प्रसंगागत यहाँ पर दो चार धप्राकृत शब्द कहना चाहते हैं जो कि जाय श्रद्धा के उपासकों को कहुवे लगेंगे । परन्तु प्रौषधि कड़वी ही होती है - इस सिद्धान्त को सामने रखकर इसके फल की बोर ध्यान रखना चाहिए । लोग कहते हैं - वेद का घर्थ समझना बडा हो कठिन है । इम कहते हैं कि संसार के साहित्य में यदि कोई सीधा और सच्चा साहित्य है तो केवल वेद हो । कठिनता कुत्रिमता से सम्बन्ध रखती है । बेद तो सरलहृदय महर्षियों की स्वाभाविक सरल वाणी है । वेद सत्य है । सत्य सवा ऋष्णु होता है । बेद प्रासमान की चिड़िया नहीं है । वेद तो स्वाभाविक ज्ञान है । पण्डित जी उसमें बपनी पण्डिताई घुसा देते हैं, प्रतएव वेद का वास्तविक अर्थ प्रावृत हो जाता है । वेद को देखने में दृष्टिकोणमात्र का अन्तर है । जो मनुष्यों की स्वाभाविक बोली है - स्वाभाविक भाव है - नित्यप्रति के व्यबहार हैं - बेदार्थ उसी प्रकार के ऋजुभाव से सम्बन्ध रखता है । वेदमन्त्र को आप सामने रख लीजिए और उसका सीधा अर्थ करते जाइए - व्याकरणबल के द्वारा अपनी पण्डिताई मत बांटिए- बस, बड़ी सरल धबं वेद का वास्तविक अर्थ होगा । हम अपने पाठकों से निवेदन कर देना चाहते हैं कि यदि वे उपनिषत् का अर्थ समझना चाहते हैं तो उन्हें पण्डिताऊ भाषा में रंगे हुए भाष्यों के चक में न पड़कर प्राकृतिक व्यावहारिक प्रर्थप्रणाली को सामने रखकर भागे बढना चाहिए । हमारा विश्वास १-१६० प्रा ० ४१३४१४ [ ५२ ]

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suntantr ( प्रथमा वल्ली ) ही नहीं बटल सिद्धान्त है कि जो उपनिषत् बिलकुल सरल रीति से औपनिषद ज्ञान का स्वरूप बतला रहे हैं - वही भाष्यकारों की पण्डिताई की कृपा से अतिदुरूह बन गया है । साधारण मनुष्य धर्षसंगति के लिए भाष्य देखना चाहते हैं - वहाँ जाकर बेचारे उलटे भूल मुल्लेय्या में पड़ जाते हैं । प्रकृत में हम यह उद्गार नहीं निकालते, परन्तु विवशता से ऐसा कहना पड़ा है । माख्यान के स्वरूप को ध्यान में लाए बाद यह मलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि उशन् ऋषि के पास दक्षिणा देने के लिए भौर कुछ न था । यदि उनके पास धौर कुछ होता तो ये कदापि अपने प्रिय पुत्र को दक्षिणा में न देते । जब कुछ न रहा तो नचिकेता को ही दक्षिणा के स्थान में दिया । दक्षिणा चूँकि ऋत्विग्भेद से बहुत होती है एवं उसी बहुदक्षिणा के एवज में नचिकेता दिया गया था, द्यतएव मन्त्र में - ' कुमारं सम्मं बसिरासु नीयमानासु - यह कहा है । इसका अर्थ है- ' दक्षिणात्येन गीयमा-मासु – सं कुमारं ' । आज कुमार स्वयं बहुदक्षिणास्थानापन्न है । परन्तु माष्यकार लोग इसका भयं और ही करते हैं । उनका कहना है कि- ' जब ऋत्विजों के लिए दक्षिणार्थं गो लाई गई उस समय उनको देखकर कुमार में श्रद्धा प्रविष्ट हुई । हम कह चुके हैं कि यदि उनके पास दक्षिणा देने को गोएँ ही होती तो यह अपने पुत्र को ही क्यों देता? सुतरां माष्यार्थ की निस्सारता सिद्ध हो जाती है । पूर्वमन्त्र के भ्रम ने ही धागे के - ' पीतोदका ० ' मन्त्रार्थ का भी सर्वनाश किया है । बापने देखा होगा कि गृहस्थी जब गोदान करता है तो उसके पहले वह उसे खिला - पिलाकर तृप्त कर देता है एवं ' यह गौ दूध देने वाली है - प्रतिग्रहीता को यह विश्वास दिलाने के लिए ( क्योंकि बिना इस विश्वास के उसका आत्मा पूर्णरूप से सन्तुष्ट नहीं होता एवं पूर्णरूप से सन्तुष्ट हुए बिना दक्षिणाफल नहीं मिल सकता ) उसके सामने ही उसका दूध निकाला जाता है । जब तक दुग्ध वनों में भरा रहता है - गो को यह मलबद भारी प्रतीत होता है । जैसे मलत्याग से मनुष्य अधिकले न्द्रिय हो जाता है- एबमेद दुग्ध दुही हुई गौऐ- अविकलेन्द्रिय हो जाती हैं । ऐसी गाय का दान करने से स्वर्गलोक प्राप्त होता है । भाष्य-कार ठीक इससे विपरीत अर्थ करते हैं । प्राएवढं तो हमें तब होता है जब - ' दक्षिणार्या वायो बिशेष्यते ' - इस उपक्रम का- ' अप्रजननसमर्था. खोर्चा निव्डला बाथ: - इस पर उपसंहार देखते हैं । यदि इसी वर्ष को मान लिया जाता है तो प्रकरणसंगति ही नहीं लगती है । न पिछले मन्त्र का समन्वय होता है-न भ्रमले मन्त्र का समन्वय होता है । क्योंकि भागे नचिकेता पूछता है कि पिता! मुझे किस प्रयोजन के लिए दे रहे हो? अथवा किसे दे रहे हो? क्यों दे रहे हो? यह प्रश्न तभी संगत हो सकता है जबकि माष्यार्थं की उपेक्षा कर पूर्वोक्त अर्थ को अपनाया जाए । दानयोग्य गौ के दान से स्वर्ग मिलता है-यह नचिकेता जानता है । इसीलिए वह पिता को स्मरण दिलाता हुआ कहता है कि जब मैं गो नहीं तो मेरे से स्वर्ग नहीं मिल सकता एवं यश दक्षिणा का फल स्वर्गप्राप्ति हैं । ऐसी अवस्था में मुझ rete को आप किस प्रयोजन के लिए दे रहे हैं? यह मेरी समझ में नहीं भाता । भाज इस नचिकेता की और साथ ही में गोतम महाराज की दोनों की ही बढी शोचनीय अवस्था हो रही है, उधर नचिकेता का पिता की ओर स्नेह, उमड़ रहा है । बालक नचिकेता कातरवृष्टि से [ ५३ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् पिता की बोर देख रहा है । उधर पिता प्रिय प्रबोध पुत्र को बिछुड़वा देख - देखकर पानी - पानी हो रहे हैं । परन्तु धम्मंबन्धन में बद्ध रहने के कारण विवश हैं । ऐसी अवस्था में नचिकेता पूछता है कि जब मैंगो नहीं तो मेरी समझ में नहीं प्राता कि आप मुझे सदा के लिए प्रपने से पृथक् क्यों कर रहे हैं? बस, इसी प्र का निरूपण करता हुमा निम्नलिखित मन्त्र हमारे सामने आता है-" स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा दवामीति ” ॥४ ॥

दूसरे मन्त्र में श्रद्धा शब्द का प्रयोग है । स्नेह, वात्सल्य, काम, रति, श्रद्धा बादि प्रेम के कई भेद हैं । प्रकृत में सबका स्वरूप नहीं बतलाया जा सकता, केवल श्रद्धा का स्वरूप ही बतला देना पर्याप्त होगा । बडे का छोटे की घोर होने वाला प्रेम जैसे वात्सल्य कहलाता है - एवमेव छोटे का बड़े के प्रति होने बाला प्रेम श्रद्धा कहलाता है । प्राज नचिकेता में उसी श्रद्धाभाव का उदय हुआ । उसने करुणापूर्ण राष्टि से पिता की ओर देखते हुए पिता से कहा कि पिता! भाप मुझे किसके लिए दे रहे हैं? अर्थात् बाप मुझे किस अपरिचित के साथ एवं किस प्रयोजन के लिए भेज रहे हैं? नचिकेता का भाव यही था कि मैं भ्रमी बालक हूं एवं जिस प्रयोजन के लिए दक्षिणा दी जाती है वह प्रयोजन भी मेरे से सिद्ध न होगा । मैं आपसे अलग कैसे रहूँगा? नचिकेता ने पूछा, परन्तु पिता ने उत्तर न दिया । क्योंकि ये बिचारे घर्मसंकट में पड़े हुए थे । वे स्वयं भी दुःखी थे, परन्तु विवश थे । उधर नचिकेता बहुत ही अबोध था । उसने जब एक बार के कथन से उत्तर न पाया तो दुबारा वही बात कही । दुबारा भी उत्तर नहीं मिला तो नचिकेता ने तिबारा फिर वही प्रश्न किया । पुत्रदान से पहले ही से क्षुरुष एवं पुत्र की करुणामय वाणी से और भी क्षुब्ध होते हुए गोतम अधिक धेय्यं न रख सके । उनके मुंह से निकल पढ़, कि बेटा नचिकेता! मैं तुझे मौत के लिए सौंप रहा हूँ । विवणता में पड़कर अपने पुत्र को जैसे पिता शूली पर जाते देखकर दुःखी होता हुआ प्रबोध पुत्र बार - बार पूछने पर - बेटा! मौत के लिए तू जा रहा है यह कह देता है । ठीक ग्राज वही हालत इस महर्षि की हुई । इन्होंने चूंकि प्रावेश में प्राकर बड़े जोर से- ' मौत के लिए तुझे दे रहा हूं -यह कहा था, अतएव इस घुड़की से बालक नचिकेता का कलेजा हिल गया । परन्तु अभी वह सबंधा निराश नहीं हुआ । इस अन्धकार में भी उसे एक प्रकाश की दिलाई दी । वह झलक थी - ' यमराज का प्रयोजन ' । पिता से नचिकेता ने अपने दान का प्रयोजन पूछा । एक बार पूछा, दो बार पूछा, तीन बार पूछा । भ्रन्त में उत्तर मिला- मृत्यु! पिता ने कह दिया कि मैं अपने प्रयोजन के लिए अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए तुझे नहीं सौंप रहा - प्रपि तु, मौत के लिए सौंप रहा हूं । पिता ने तो दुःखी होकर मैं तुझे मौत के मुंह में डाल रहा हूँ - यह कहा था - इधर अबोव नचिकेता ने इस उत्तर को सच समझा । उसने समाधान कर लिया कि पिता मुझे यमराज के हवाले कर रहे हैं । अब इसे दूसरा प्रश्न खड़ा हुआ । उसी प्रश्न का स्वरूप बतलाती हुई मन्त्रश्रुति कहती है--[ ५४ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत्

" बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।

fe स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ” ॥५ ॥

मन्त्रगत ' एमि ' का ' गमिष्यामि ' प्रयं समझना चाहिए । ' वर्तमानसामीप्ये वर्तमानबद्वा ० ' - इससे भविष्यदर्थ में ' लुट् ' हो गया है । नचिकेता अपने पिता की ओर दृष्टि करके कहता है कि पिता! श्रापने कहा कि मैं बुझे यमराज के लिए सौंपता हूँ । परन्तु मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि जबकि मैं बहुतों के प्रति बहुले जाऊंगा एवं बहुतों के प्रति बीच में जाऊँगा । प्राज यमराज का वह कौनसा कर्तव्य ( शेष रह गया ) है कि जिसे वे मुझसे करावेंगे? तात्पय्यं यही है कि नचिकेता से आगे लाखों मरने वाले हैं । उन मरने वालों की अपेक्षा से तो नचिकेता पहला है एवं लाखों ही इससे पहले मर चुके हैं । उनकी अपेक्षा से यह मध्यम है । नचिकेता मरे हुए और मरने वालों के बीच में मरने वाला अबोष बालक है, अतएव वह अपने पिता से कहता है कि पिताजी! यमराज के पास मेरे मरने से पहले अच्छे-अच्छे विद्वान् एवं मच्छे - अच्छे वीर उनकी सेवा में पहुँच चुके एवं आगे भी इसी प्रकार पहुँचेंगे तो ऐसी अवस्था में यमराज का जो काम उन लाखों से नहीं हुमा - वह भला में बालक क्या कर सकता हूँ? मेरे लिए ही ऐसा कौनसा काम बच गया है कि जिसके लिए निठुर यमराज मुझे पिता से अलग करके घपने लोक में ले जाएगा । मन्त्र का अभिप्रायार्थ यही है कि ' जायस्व प्रियस्व ' - ' जायस्व स्त्रियस्व ' - यह तो संसार का अनादि चक्र है | यमराज अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए इन अनन्त प्राणियों का संहार करता हो - यह बात नहीं है । जन्म - मरण तो स्वभावमात्र है । इसलिए प्रापका ' मौत के लिए तुझे दे रहा हूँ ' - यह उत्तर मेरा सन्तोष नहीं करता । जिस यमराज के पास लाखों प्राणी चले गए उनसे जो यमराज का काम न बना - वह मेरे से होगा इसलिए प्राप मुझे भेज रहे हैं - इस उत्तर पर विश्वास करना कठिन है । इसी भाव का स्पष्टीकरण करता हुआ नचिकेता कहता है-" श्रनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ” ॥६ ॥

हे पिता! जैसे प्राज से पहले के मनुष्य जिस स्थिति को प्राप्त हुए हैं उन्हें देखें और भागे होने वाले मनुष्य जिस गति को प्राप्त हुए हैं उस घोर दृष्टि डालें । आपको दोनों मोर दृष्टि डालने से मान लेना पड़ेगा कि प्राणी पके धान की तरह वृद्ध होकर मर जाता है एवं मरकर फिर धान की तरह पुनः उत्पन्न हो जाता है । जिस प्रकार साल में दो - दो बार लाखों मन धान उगता है - पकता है-नष्ट होता है - फिर नया - नया पैदा होता है फिर नष्ट होता है - फिर पैदा होता है । बस, ठीक वही हालत हमारी है । प्राणिमात्र का मरना जीना घानवत् स्वाभाविक धर्म है । जैसे धान के पैदा होने, नष्ट होने से यमराज का कोई प्रातिस्विक कार्य नहीं बनता एवमेव हम प्राणियों से भी यमराज को कोई [ ५५ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् स्वार्थसिद्धि नहीं होती । मन्त्रगत ' अनुपश्य ' और ' प्रतिपाय - यह मुहावरे के शब्द हैं । अपने पीछे फिर कर देखो, भागे देखो । पीछे की दशा निहारो आगे की दशा निहारो - इस व्यावहारिक भाषा के लिए यहाँ ' अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे यह कहा है । ' प्रतिपक्ष्य ' का अर्थ है - उमटकर देखो धर्षाद-पीछे की घोर दृष्टि डालो, ' ' अनुपश्य ' का अर्थ है - सामने की भोर दृष्टि डालो । भूत - भविष्यद दोनों कालों की स्थिति सामने रखकर यदि भाप जन्म - मरण के प्रश्न को हल करना चाहेंगे तो यहाँ थापको धान की खेती की तरह प्रनादि प्रवाह चलता दिखलाई देगा । ऐसे नित्यधम्मं से यमराज के प्रातिविक स्वार्थ से कथमपि सम्बन्ध नहीं माना जा सकता । मन्त्रगत ' पस्यते ' शब्द किसी खास प्रविप्राय को प्रकट कर रहा है । नचिकेता कहता है कि परिपाक होने पर समय आने पर धान जैसे अपने बाप नष्ट हो जाता हैं, एवमेव समय माने पर मनुष्य को भी मरना पड़ता है । अपने समय पर एक दिन सभी को मरना है । परन्तु मैं ग्रमी बालक हूँ । नया धान जैसे नष्ट नहीं होता, अपि तु, पकने पर मष्ट होता है, एवमेव मनुष्य ) वृद्धावस्था के आस - पास मरता है । जब मैं अभी मरने लायक नहीं तो फिर बाप मेरे से -'मूस्यवे स्वादयामि ' - यह कैसे कहते हैं? महर्षि गौतम प्रिय पुत्र की ऐसी - ऐसी मोली बातें सुनकर और भी अधिक दुःखी हो जाते हैं एवं नचिकेता की घोर से दृष्टि फेर लेते हैं । उधर ऐसी अवस्था देखकर नचिकेता सर्वधाद्वेनिराश हो जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि सबमुख पिता मे बिना किसी उद्देश्य के समय में ही मुझे यमराज के हवाले कर दिया है । बस, इस मौत की विभीषिका के सामने आते हो नचिकेता प्रत्यन्त भयभीत हो जाता है एवं मयाधिक्य के कारण गौतम के सामने हो मूर्च्छित होकर बड़ाम से जमीन पर गिर पड़ता है । कितने ही प्राचार्य ' मनुपश्य ० ' - इत्यादि का निम्नलिखित संगति लगाते हुए निम्नलिखित वर्ष मानते हैं-जत्र नचिकेता ने पूछा कि - " यमराज का ऐसा कौन सा काम है जिसके लिए मुझे आप भेज रहे हैं? " -- तो यह सुनकर गौतम घोर मी अधिक दुःखी हो जाते हैं । नचिकेता अपने प्रश्न से पिता को अधिक दुःखी देखकर पछताता है कि मैंने ऐसा प्रश्न कर पिता को व्यर्थ ही कष्ट दिया, प्रतएव पिता को अपनी ओर से ढाढस बधाता हुमा नचिकेता कहता है कि पिताजी! मापने चाहे मुझे मौत के लिए किसी प्रयोजन के लिए दिया है - इससे प्रापको दुःखी नहीं होना चाहिए । प्राप तो ब्रह्मज्ञानी हैं । आप अपने पूर्वजों पर दृष्टि डालिए और आगे होने वाले अपने वंशजों की स्वाभाविक जन्म - मरणप्रक्रिया की ओर दृष्टि डालिए । प्राप देखेंगे कि धान की तरह मरना और पैदा होना यह चक्र चलता ही रहता है । नचिकेता पिता से अपना यही अभिप्राय प्रकट करना चाहता है कि मरना जीना तो अपने - अपने प्रारब्ध पर निर्भर है । आप इसके लिए व्यर्थ ही शोक क्यों करते हैं? व्यर्थ के स्नेह से आत्मशक्ति का ह्रास होता है, अतएव आपको यह मोह छोड देना चाहिए । यह कहकर नचिकेता यमलोक में चला जाता है । कितने ही विद्वान् इसका और ही अर्थ समझते हैं । पूर्व के दोनों भयों में तो नचिकेता की हो उक्ति है, किन्तु इस तोसरे पक्ष में गौतम की उक्ति है । जब नचिकेता पिता से पूछता है कि वयराज का [ ५६ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ऐसा कौन सा कर्त्तव्य है जिसके लिए आप मुझे उसके हवाले कर रहे हैं? तो गौतम उसे ढाढस बंधाते हुए कहते हैं कि पुत्र! तुझे मौत से नहीं डरना चाहिए । ' अथ वाय्वशतान्यानि मृत्पूर्वे प्राणिनां धुकं - इस सिद्धान्त के अनुसार तुझे एक दिन अवश्य मरना है, मपि च - पुत्र में अपनी इच्छा से तुझे यमराज को नहीं सौंप रहा - पि सु, यह तो स्वाभाविक चक्र है । विना उसकी इच्छा के कौन किसको मारता है और कौन किसको जिलाता है? अतएब उस ईश्वरगतिरहस्य को ध्यान में रखकर तुझे सन्तोष करना चाहिए । पिता से यह उत्तर पाकर नचिकेता यमलोक में चला जाता है । इन तीनों अर्थों में सबसे पहला धर्म ही प्रधान एवं मान्य है । आगे के दोनों भ्रयं तभी ठीक हो सकते थे जबकि - ' मृत्यवे स्था - इसका प्रमुख यमराज के लिए देना होता । गौतम वास्तव में यमराज के लिए नचिकेता का संकल्प नहीं कर रहे हैं अपितु, दुःखी होकर विवशता से - ' माई में तुझे जान बूझकर खड्डे में डाल रहा हूँ - इस व्यावहारिक भाषा के अनुसार- ' मृत्यवे त्या बयामि ' - यह कह रहे हैं । नचिकेता मरता नहीं है अपितु, मूति हो जाता है - जैसा कि आगे के प्रकरण से स्पष्ट हो जाता है । नचिकेता को यह मूर्च्छा तीन घण्टे रही है । यदि नचिकेता सचमुच मर जाता तो वैज्ञानिक दाहक्रिया के अनुसार इतने समय तक नचिकेता का शरीर रखना असम्भव था । तब मर जाने पर उसके शरीर को जताना प्रावश्यक था । जब शरीर जला दिया जाता तो फिर नचिकेता की सत्ता असम्भव थी । परन्तु बागे जाकर यह स्पष्ट कर दिया जाता है कि नचिकेता पुनः जीवित हो जाता है । यह तभी संगत हो सकता है जबकि मूर्च्छा ही मानी जाए । प्रपि च धागे जाकर नचिकेता- ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति बंके " - इस प्रकार भगति गति के विषय में सन्देह प्रकट करता है । नचिकेता पूछता है कि हे यमराज! शरीर रथवत् है अथवा सरवट्? बारमा शरीर से अतिरिक्त है अथवा नहीं? मला, यदि नचिकेता सचमुच बरकर यमलोक में जाता सो उसे ऐसा सन्देह ही क्यों होता? क्योंकि ऐसी अवस्था में तो वह अपने मात्मरूप से ही ( शरीर को छोडकर ) परलोक जाता । उस समय अपने भाप उसे ' आत्मा शरीर से रिक्त है ' - इसका ज्ञान रहता । ऐसी अवस्था में वह ' ग्रस्तीरयेके नायमस्तीति शंके ' - यह प्रश्न कम-मपि नहीं कर सकता था । परन्तु करता है, अतएव उसका प्राणवियोग नहीं माना जा सकता । प्रकृत मी ही बा रहा है । गौतम ऋत्विजों को दक्षिणा के स्थान में नचिकेता को दे रहे हैं । ऐसी हालत में- ' मृत्यवे स्थानका यम के लिए देना- यह प्रयं कथमपि नहीं हो सकता । परन्तु - ' मृत्युमुखात् प्रमुक्तम्'- से यमराज का सम्बन्ध ही नहीं है - यह भी नहीं कहा जा सकता । इन सारी आपत्तियों को हटाने के लिए मृत्यु से यहाँ मूर्च्छावस्था की सत्ता स्वीकार करना ही उचित होता है । मूर्च्छा सम्पति है, अतएव वहाँ - ' नायमस्ति अस्ति'- इस सन्देह को भी उपपत्ति बन सकती है एवं पूर्वकथनानुसार मूर्द्धा में अभिमानी यमराज की मी सत्ता उपपन्न सकती है । ' अमिमाभिव्यपदेशस्तु विशेषानुगति-भ्याम् ' के अनुसार मतिरूप यमराज का एक प्रभिमानी देवता है । उसकी रश्मिएँ उसके दूत हैं । उसकी शक्ति उसकी स्त्री यमी है । इन सबका विज्ञानचक्र में आकर सत्यभाव की सूचना देना - ' सुख-१ - कठोप ० ११११२० । [ ५७ ]

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थमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् श्च हि आचलते च तद्विदः - के अनुसार सम्भव हो सकता है । ऐसी अवस्था में मूर्च्छा मान लेने से सारी विप्रतिपत्तियाँ दूर हो जाती हैं । जब प्राणवियोग नहीं है तो फिर आगे के दोनों प्रयों की निस्सारता एवं पहले अर्थ की प्रधानता भवने भाप सिद्ध हो जाती है । बालक नचिकेता पिता से वियुक्त होने के दुःख से दुःखी होकर आज वहीं उसके सामने मूच्छित पड़ा है । जैसे काप्य ऋषि के सामने एवं अरुण के पुत्र उद्दालकादि बन्यान्य शिष्यों के सामने उनकी गुरु-पत्नी ( काप्य की स्त्री ) में गन्धर्व घुसा हुआ था अर्थात् भूतावेज हो रहा था एवं वह मूच्छित थी - वही दशा आज इस नचिकेता की है । नचिकेता मूच्छित हो रहा है एवं इसके विज्ञानचक्र में अभिमानी यमराज उसके दूत और उसका लोक घूम रहा है । जैसे शास्त्रीय ज्ञान से सबंधा अपरिचित काव्य पत्नी में प्रविष्ट आथर्वण कबन्घ द्वारा उसी काप्य पत्नी के मुख से अन्तर्यामी सूत्रात्मा जैसे निगूढ स्वायम्भुव प्रात्मतत्व का प्रतिपादन हुआ था एवं काप्य धौर उद्दालक जैसे परमवैज्ञानिक जिस प्रयुतपूर्वं विषय को सुनकर चकित हो गए थे एवमेव मूर्द्धावस्थापन ५ वर्ष के बालक नचिकेता ने यमराज द्वारा धारमा के गतितत्त्व को प्राप्त कर अन्त में सबको उसका स्वरूप बतलाया था । जैसे मायारूप होने पर भी उसमें होने वाला ( स्वप्न में होने वाला ) प्राणव्यापार सच्चा है - एवमेव मूर्च्छा के मायामय होने पर भी उसमें होने वाला व्यापार सर्वथा सत्य है । यही नहीं हम तो यहाँ तक कहने के लिए तय्यार हैं कि मनुष्य अपने विज्ञान के जरिए जिस सत्यतत्त्व का धन्वेषण करता है - वह प्रमादवश कभी भ्रमपूर्ण भी सकता है, परन्तु स्वप्न एवं मूच्छित दशा में होने वाला ज्ञान सर्वथा निःसंदिग्ध है । क्योंकि यहाँ ईश्वरका हाथ । इतिमात्र से विद्याराशि प्रदान करने वाले महषियों ने इस विद्यास्व की प्रमाणिकता बतलाने के लिए ही उपनिषद् पुरुष का स्वरूप बतलाने वाले उपनिषत् में नचिकेतोपाख्यान बतलाया है - ऐसा हमारा अपना विश्वास है । नहीं तो इसकी कोई भावश्यकता ही न थी । अस्तु, भब हम अपने पाठकों का ध्यान पुनः उपनिषदर्थं की ओर प्राकर्षित करना चाहते हैं- ' बहूनामेमि प्रथमो०-' अनुपश्ययथा पूर्वे ० ' ' - यह बोलता हुधा नचिकेता मूच्छित हो जाता है । मूच्छित दशा में नचिकेता क्या-क्या दृश्य देखता है? - बस, बागे से यही विषय चलता है । नचिकेता देखता है कि मानो मैं यमराज के पास पहुंच गया एवं वहाँ पर बिना मल - पानी के मुझे ३ दिन हो गए । मुझे मूखा - प्यासा देखकर यमराज के दूतों को दया आई एवं धम्मंष्टि से उन्होंने यमराज को आतिथ्यधम्मं बतलाते हुए निम्नलिखित धम्र्म्मवचन कहे-१ ५ 3 . I " वैश्वानरः प्रविशत्य तिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । I ८ १० ११ तस्यैता ँ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥७ ॥

" वैश्वानर ब्राह्मण अतिथि ( वैश्वानररूप होने से ) घरों के प्रति ( उनको जलाता हुधा ही मानो ) प्रविष्ट होता है । इस अग्निरूप अतिथि की ( बे गृहपति ) पाद्यासनरूप प्रसिद्ध शान्ति किया करते हैं, प्रतएव हे बेबस्थल! प्राप इस नविता के बाद्य के लिए जल का आहरण कीजिए " । [ ५८ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् मास्तवर्ष का अतिथिधम्मं सुप्रसिद्ध है, अतएव उसके विषय में हम विशेष कहना नहीं चाहते । ब्राह्मण - क्षत्रिय - वंश्य - शूद्र चारों ही अतिथि बन सकते हैं । जिनका प्रागमन अनियत समय में होता है-यही विष कहलाते हैं । इन चारों अतिथियों में सर्वश्रेष्ठ अतिथि ब्राह्मण है । ब्राह्मण साक्षात् वैश्वा-मराग्नि है । क्षत्रिय मध्याह्न का सूपं है । वैश्य सायंकाल का सारस्वत तेज है । शूद्र रात्रि का तामस प्राथ है । बारों में प्रातः कालीन वैश्वानराग्निमय ब्राह्मण सर्वमूलभूत होने से सर्वप्रधान है । चाहे चारों वर्षों में से कोई भी प्रतिषि हो, गृहपति को उसका प्रादर - सत्कार करना चाहिए, परन्तु इन चारों में चैश्वानरास्तिमय ब्राह्मण सबसे प्रधान है । यदि इसका तिरस्कार कर दिया जाता है तो इसके कोपानल से इस गृहपति की सारी विभूति नष्ट जाती है । इसके घर में ब्राह्मण क्या प्रविष्ट होता है - प्रज्व-लित अग्नि प्रविष्ट होता है । अग्नि की शान्ति का उपाय पानी है । श्रुति के अक्षर हमें परोक्षभाव से विज्ञान एवं नीति का उपदेश देते हुए कहते हैं कि यदि तुम प्रज्वलित अग्नि को शान्त करना चाहते हो तो उस पर पानी डालो । पानी अग्नि का प्रबल शत्रु है । पानी में वरुणदेवता रहते हैं । प्रज्वलित प्रकाश धन्ति में इन्द्र रहते हैं । वरुण और इन्द्र में परस्पर घोर शत्रुता है । वरुण के ( पानी के ) आते ही इन्द्र ( अग्नि ) मग जाते हैं । यही अग्नि की शान्ति है । यदि तुम्हारे शरीर का प्रवयव अग्नि से जल गया है तो उस पर पानी का वस्त्र बाँध दो, उसी समय शान्ति मा जाएगी, क्योंकि भग्नि के लिए पानी यथार्थ में शान्तिस्वरूप है । इसी आधार पर पानी को भेषज बतलाया जाता है । आग पानी बादि सभी मेषण हैं । केवल पानी से केवल अग्निकम्मं से सारी बीमारियाँ दूर की जा सकती हैं । पानी शान्तिस्वरूप है - इसका विवेचन हमारे लिखे हुए शतपथ के अनुवाद में देखना चाहिए । यह तो हुआ । बिज्ञानपक्ष । नीतिपक्ष को सामने रखकर श्रुति शिक्षा देती है कि यदि तुम्हारे सामने कोई रुद्ररूप धारण करके आता है तो तुम उसके सामने शिव बन जाओ । रुद्र के सामने यदि कोई टिक सकता है तो शिव ही तुम उसके सामने पानी - पानी हो जाओ । ऐसे नम्र बनों, ऐसे नम्र बनों - जैसे पानी एकदम नीचे की ओर झुक जाता है । ऐसा करने से उपमूर्ति तुम्हारा शत्रु भी पानी - पानी हो जाएगा । शत्रु को परास्त करने का सबसे सरल, प्रतएव सबसे पहला उपाय ' साम ' है । यह शस्त्र अव्यर्थ है । दुर्भाग्य से इसके व्यर्थ हो जाने पर दाम दण्ड भेद का मौका आता है । असल में साम धौर भेद शत्रु को परास्त करने के दो प्रमोष शस्त्र हैं । पहले तुम उसके मित्र बन जाभो - बाद में उसके दल में भेद-नीति का प्रयोग कर डालो - बस, तुम्हारी विजय है । साथ ही साथ श्रुति पम्मेनोति को घोर भी आपका लक्ष्य दिलवाती है । अतिथिधम्मं की शिक्षा तो स्पष्ट है हो । साथ ही साथ इससे शान्तिधम्मं का भी उपदेश दिया जाता है । संसार में शान्ति शान्तिघ्रम्मं से ही हो सकती है । खासकर ब्राह्मण का तो यह प्रधानकर्म है- ' कुर्यादन्यं न वा कुर्य्यान्मंत्रो ब्राह्यरण उच्यते ' के अनुसार ब्राह्मण को तो सदा शान्त ही रहना चाहिए । इस प्रकार धर्मनीति - राजनीति - विज्ञाननीति तीनों पर लक्ष्य रखता हुआ मन्त्र यमराज के नौकरों से यमराज के प्रति कहलाता है । कि हे एमराज! आज आपके घर में वैश्वानर ब्राह्मण अतिथि भाया हुमा है । इसे प्राए तीन दिन हो गए हैं । परन्तु धभी तक धापको पता नहीं है । है यमराज! यदि भाप अपनी शान्ति चाहते हैं तो पानी से उसका अतिथिसत्कार कीजिए । बात यथार्थ है । अतिथि आश्रय की अपेक्षा तभी करता [ ५६ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है जबकि वह किसी कष्ट में होता है । किसी बात की कमी होती है तब वह अन्य के बाबय की खोज करता है । कष्ट रुढभाव है । ' वरुण रुद्र- निऋति यम ' पीड़ा के प्रषिष्ठाता ये ही चार देवता हैं । इसमें पानी मोर मन को न मिलने देने वाला प्राण वह है । मूख - प्यास के कष्ट का प से सम्बन्ध है । धन-पानी से शारीरयश स्थिर रहता है । जब तक ' शिवसता ' रहती है तब तक यह यश रहता है । यह के प्राक्रमण से दोनों का आगमन रुक जाता है । यही कारण है भूखे - प्यासे बादमी का गला, मला ही क्यों सारा शरीर सूख जाता है, प्रतएव ऐसी अवस्थाबारे अतिथि को हम प्रभावोपेत कहने के लिए तय्यार है । यह रुद्रप्राण यदि आवश्यकता से अधिक मात्रा में पा जाता है तो शणोत्क्रमण का कारण बन जाता है । गृहपति के घर में जब कोई अतिथि आता है तो इसी रुद्रभाव को लेकर माता है । यदि मूसंताक्श गृहपति उपेक्षा कर डालता है तो वह संहारकर्ता वद्रभाव इसके घर में प्रविष्ट होकर इसका सर्वनाश कर डालता है । जैसा कि धागे के मन्त्र से स्पष्ट हो जाएगा । इसलिए गृहपति का फसव्य है कि अपने द्वार पर अतिथि को माया सुनते ही सबसे पहले पानी का पात्र लेकर उसके सामने जाए । बिजली साक्षात् प्रग्नि है । बिजली पानी से पैदा होती है । " आज रुद्र बिजली उस अतिथि के सर्वाङ्ग शरीर से निकल रही है, मतएव पानी के सामने घाते ही उसकी वह विद्युत् इस पानी में कूद पड़ती है । उस विद्युत् के निकल जाने से मतिथि शान्त हो जाता है । इसकी शान्ति से ग्रहपति की भी शान्ति हो जाती है । अनन्तर उसे भीतर ले जाकर घासन पर बिठलाता है । पश्चाद अतिथि-मर्यादानुसार सारे कृत्य ( भोजनादि ) करवाता है । बस, हमारा यह अयाँ मन्त्र इसी अतिथिविज्ञान को समझा रहा है । मन्त्रगत ' बैश्वानर ' शब्द यहाँ किसी खास लक्ष्य को लेकर प्रयुक्त हुआ है । यह अतिथि ब्राह्मण है एवं ब्राह्मण वैश्वानराग्निमय होता है इस बात को बतलाने के लिए भी ' श्वानर का प्रयोग किया गया है एवं वैश्वानर- तेजस प्राज्ञ तीनों में मूल भ्रात्मा वैश्वानर है - जैसा कि श्री गुरु-प्रणीत ' अहोरात्रवाद ' के ' प्रत्युत्पचारमतन्त्र ' में विस्तार के साथ बतलाया गया है । * वैश्वानर पार्थिवात्मा है - इसके आधार पर तेजस और प्राज्ञ की सत्ता रहती है । तीनों की समष्टि कम्र्मात्मा है । यद्यपि लोकान्तर में ( यमलोकादि में ) केवल वैश्वानर का गमन नहीं होता अपितु, वैश्वानर - तेजस प्राश की समष्टिरूप कम्र्मात्मा का गमन होता है तथापि हम पार्थिव प्राणियों में चूंकि वैश्वानर मूलात्मा है, प्रतएव उसका नाम लिया गया है । वंश्वानर लोकान्तर में जाता है-उसके सहारे तंज- प्राज्ञ भाग जाता है । एक बात और बतलाकर इस प्रकरण को समाप्त करते हैं-आज नचिकेता को आए तीन दिन हो गए और यमराज को पता भी नहीं यमराज के घर में इतनी पोल । देवव्यवस्थाओं में भी ऐसी गड़बड? नहीं गडबड़ नहीं है - प्रपि तु ऐसा कहने में कुछ रहस्य है । श्रुति इशारा करती है कि नचिकेता सचमुच मरा नहीं है । धभी वह मूच्छितमात्र है । मरने पर पारमा यमराज का अतिथि बनता है । मूच्छित दशा में तो यमराज के दूत ही उसे सूचना देते हैं । शनिरूप १- द्रष्टव्य- शत ० प्रा ० ७।५।२।४६ । २ - इष्टव्य - गुरुवर श्री मधुसूदनजी मोझा प्रणीत ' बहोरात्रवाद ' प्रथमावृत्ति १ ९ २६ के ' बावापृविश्य-षिकार: ' में ' प्रत्युत्पनात्मतन्त्रम् ' नामक प्रकरण | ( ६० ]

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geetaara ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् उक्थ यम के अर्क ही पृथिवीलोकस्थ प्राणियों में मू छत दशा में भाते हैं । अभी नचिकेता की मृत्यु का समय नहीं है । केवल मूर्च्छामात्र है । बस, ' यमराज को पता भी नहीं है - इसका यही अर्थ है । सेवक इतना करते हैं साथ ही में स्वामी को अतिथिधम्मं का स्मरण करवाते हैं । इससे श्रुति सेवकों को उपदेश देती है कि यदि तुम अपने स्वामी का स्वामी के साथ ही अपना दोनों का कल्याण चाहते हो तो तुम्हारा कर्तव्य है कि यदि स्वामी कभी अपनी मर्य्यादा से बाहर जाने लगे तो उसे रोको । उसको बचने उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाओ । प्राज उसी कर्तव्य का स्मरण दिलाते हुए यमराज के सेवक यमराज से कहते हैं कि धापके घर में तीन दिन से भूखा प्यासा बालक ब्राह्मण मतिथि पड़ा हुआ है । यदि धाप अपना कल्याण चाहते हैं तो उसका व्यतिथि सत्कार कीजिए । हे यमराज! अतिथिधम्मं की उपेक्षा करने वाले की क्या हानि होती है? सो सुनिए—

" प्राशाप्रती सङ्गत सुनुतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूश्च सर्वान् ।

एतद्बुङ्क्ते - पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ” ॥६ ॥

' यस्य, अल्पमेधसः, पुरुषस्य, गृहे ( प्रतिथिः ) ब्राह्मणः, अनश्नन् वसति, ( तस्य ) भाशाप्रतीक्षे, संगतं, सूनृतां, इष्टापूर्ते, पुत्रपशूश्च सर्वान्-वृङ्क्ते ” –इति ॥ " जिस पक्ष के पुरुष के घर में अतिथिब्राह्मण बिना खाए निवास करता है - उस मनुष्य के बाबा, प्रतीक्षा, संगत, सूतृत, इष्टापूर्त आदि सभी वह अतिथिब्राह्मण नष्ट कर डालता है " । हमें जो सम्पत्ति मिलती है उसका नाम है- ' भागधेय ' । भागधेय ही मकसूम कहलाता है । परमेश्वर के घर से इस प्राणी के लिए जो मागधेय नियत रहता है - वह छप्पर फाड़कर भी मिल जाता है । जैसा कि ईशोपनिषद में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इस भागधेय के दो विभाग हैं । वे ही दोनों विभाग यहां बाधा बोर प्रतीक्षा नाम से व्यवहृत किये गये हैं । भागधेय का एकभाग तो ऐसा है जो हमें मालूम है एवं एक भाग ऐसा है जो सर्वथा अज्ञात है । वेतन, ग्राम की प्राय आदि बादि ज्ञात मागधेय हैं । हम जानते हैं कि इतना हमें अवश्य मिलेगा । बस, इस निश्चित भागधेय की प्राप्ति की जो प्राकांक्षा है - उसे ही ' प्रतीला ' कहते हैं एवं जो सम्पत्ति अनिश्चितरूपेण हमारे लिए निथत है — उसकी जो जीवनपर्यन्त हमें माकांक्षा रहती है- वही आशा है । वृष्टि होगी ऐसी श्राशा है । यहाँ निश्चय नहीं है । धाशा है यह काम हो जाएगा । भाशा है - युवावस्था में मेरे पास एक लाख रुपये हो जाएंगे -आदि व्यवहारों का अनिश्चित मागधेय से सम्बन्ध है एवं ३० तारीख को मिलने वाले बेतन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ - अभी वे आ जाते हैं - मैं उनकी प्रतीक्षा में बैठा हूँ- इत्यादि व्यवहारों का निश्चित मागधेय से सम्बन्ध है । जो मनुष्य अतिथिधर्म की उपेक्षा कर देता है उसकी प्राशा और प्रतीक्षा दोनों नष्ट हो जाते हैं । मर्थात् निश्चित उमयविध ( मनुष्य धन ) सम्पत्ति एवं अनिश्चित Tarfe सम्पति दोनों के द्वार नष्ट हो जाते हैं । उसकी सारी भाशाओं पर सारी प्रतीक्षामों पर [ ६१ ]