कठोपनिषद — पृष्ठ 111–120

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् निधेयानि प्राणरूप है, प्रतएव इसके लिए ' गुहायां निहितम् ' कहा है । इसका प्रत्यक्ष विज्ञान-दृष्टि से ही हो सकता है । पृथिवी - पन्तरिक्ष - यो तीन लोक हैं । त्रिवृत्स्तोमपर्य्यन्त पृथिवी है, पञ्चदशपय्र्यन्स बन्तरिक्ष है | एकविशपत है । तीनों लोकों के भग्नि वायु- इन्द्र तीन लोकाधिपति हैं । तीनों चिविधेय हैं । चिनिय की घनन्तरल- विरल अवस्था का नाम ही श्रग्नि वायु - इन्द्र है । इन्हीं के आधार पर अवियत के तीनों लोक प्रतिष्ठित हैं । यदि यह अमृतभाग ' निकल जाए तो इन भूतमयमर्त्यलोकों का पता मी न लगे । प्रध्यात्म में ये ही तीनों - वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ नाम से प्रसिद्ध हैं । शारीरत्रिलोकी की प्रतिष्ठा ये ही हैं । वैश्वानर पार्थिव है - यही मूलाधारस्य मूलात्मा है । तेजस वायुरूप होने से धान्त-रिक्य है - यही हृदयस्य हंमात्मा है । प्राज्ञ दिव्य है । यही मस्तिष्क में प्रतिष्ठित शिवात्मा है । तीनों का विशद विवेचन श्रीगुरुप्रणीत ' अहोरात्रवाद ' में देखना चाहिए । इन्हीं तीनों से क्षर - लोक प्रतिष्ठित हैं । इन तीनों का नाम हो कम्र्मात्मा है - यही मोक्तात्मा है । प्रकृतोपनिषत् में यही प्रधान है । यही असली जीवात्मा है जब तक यह चितेनिवेयाग्निरूप मोक्तात्मा ( कम्र्मात्मा ) शरीर में प्रतिष्ठित है - तमी तक शरीर के तीन लोक प्रतिष्ठित हैं । इस प्रकार अध्यात्म मौर प्रधिदेवत दोषों में यही अग्नि प्रतिष्ठित है, अतएव इसके लिए- ' अयो प्रतिष्ठाम् ' कहा है । चयन द्वारा अध्यात्म का केवल पषिदेव के साथ सम्बन्ध जोड़ दिया जाता है । इसमें ग्रायुर्भोगानन्तर यह शारीराग्नि १७-२१-२५ में से किसी में से ( यदि तीनों करे तो तीनो में ) एक स्वग्यग्नि में प्रतिष्ठित हो जाता है । प्रकृति-यज्ञ के अनुसार होने वाले चयनयज्ञ का दूसरे शब्दों में चयनाग्नि का क्या स्वरूप है? प्राकृतिक चयनाग्नि का क्या स्वरूप है? चयनयज्ञ में कितनी इष्टकाएं होती हैं? उनका किस विधि से उपधान होता है? बरा, यमराज ने नचिकेता को इन्हीं सारे विषय को समझाया अर्थात् उसे प्राकृतिक और बंध उभयविष चयनयज्ञ का स्वरूप बतला दिया जो कि चयनविद्याग्रन्थ ब्राह्मणग्रन्थों में ' अग्निपुत्य ' नाम से प्रसिद्ध है । जो प्रग्निप्रन्थ पढ गया वह विदितवेदितव्य बन गया । इसी के लिए ' अग्निग्रन्यपर्यन्तमषीते साग्नि ' ( साग्नि: - नचिकेता ) – यह कहा जाता है = उधर यमराज ने नचिकेता को चयनविद्या जंसी कठिन विद्या का स्वरूप बतलाया, इधर श्रुत-घर नचिकेता ने उसी समय यमराज के सामने सारी चयनविद्या का स्वरूप बतला दिया । जो कुछ यमराज ने कहा था- नचिकेता उसी समय अक्षरशः उसकी मावृत्ति कर गया । ऐसे सत्पात्र में अपने उपदेश को प्रतिष्ठित देखकर यमराज का हृदय उछल पड़ा । उसने उसी प्रसन्नता के उद्गार में प्रतिज्ञा से अधिक पुनः अपनी घोर से आगे बतलाया जाने वाला एक वरदान और दिया । एक बात और बतलाकर हम इस श्लोकार्थ को समाप्त करते हैं । इस अग्नि को - ' लोकादिम् ' कहा है । सचमुच बात ऐसी ही है । यह अग्नि प्रमुतरूप है । लोक मर्त्यस्वरूप है । अमृततत्त्व नित्य है । अमृत के आधार पर मर्त्य की सत्ता है, प्रतएव हम अवश्य ही इसे ' लोकादिम् ' - कह सकते हैं । इस प्रकार यमराज ने नचिकेता को स्वग्र्ग्याग्नि का स्वरूप बतला १ - प्राणरूप चितेनिषेयाग्नि २ - द्रष्टव्य ' द्यावापृथिव्यधिकारः ' - मूल, हंसः, शिव इति - वैशेषिकात्मतम्बम् | [ ७२ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् दिया । नचिकेता से उसी समय उसका प्रतिपादन सुनकर यमराज चकित हो गए एवं प्रसन्न होकर कहने लगे - क्या कहने लगे? बस, आगे का मन्त्र यही बतलाता है-" तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तथेहाद्य ददामि नमः । तव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्का चेमामनेकरूपां गृहाण " ॥१६ ॥

नचिकेता की प्रत्युक्ति से प्रत्यन्त प्रसन्न होते हुए उस महात्मा यमराज ने नचिकेता से कहा हे नचिकेता! ( मैं तेरी बुद्धि को देखकर प्रत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ एवं प्रसन्न होकर तीन बरों से ) अधिक थर देता हूँ । पधिक वरों में से पहला वर यही है कि आज से यह अग्नि तेरे नाम से ही प्रसिद्ध होगा । धर्षात् - यह स्वर्ग्य अग्नि ( १७ वें स्वर्ग का प्रग्नि ) ' नाचिकेताग्नि ' कहलाएगा एवं १७, २१, २५ तीनों का समुचय ' त्रिभावित ' नाम से पुकारा जाएगा । प्रपि च - हे नचिकेता! अनेक रूपयुक्ता जो यह विनोद सामग्री है ( वह भी मैं तुझे प्रसन्न होकर देता हूँ ), प्रतएव तू इसको भी स्वीकार कर । इस प्रकार प्रसन्न होकर यमराज ने नचिकेता को ये दो वरदान भोर दिए । जो क्षुद्रालय होते हैं- दूसरे के गुणविशेष को देखकर कुठते हैं । मन ही मन जल जाते हैं । परन्तु जिनका हृदय विशाल है - मे लोग दूसरे के गुणों के ऊपर लट्टू हो जाते हैं एवं उसे अपना सर्वस्व दे डालना चाहते हैं । ऐसे ही पुरुष महात्मा कहलाते हैं एवं क्षुद्राशय मनुष्य क्षुद्रात्मा कहलाते हैं । यदि यमराज के स्थान में कोई हात्मा होता तो नचिकेता का श्रुतवरपना देखकर जल मरता, परन्तु यमराज महात्मा थे । उनका हृदय • विशाल था, अतएव कुढने की अपेक्षा ये अत्यन्त प्रसन्न हुए एवं प्रसन्न होकर बालक नचिकेता को बहुमूल्य प्रनेकरूप की ' सजा ' ( विनोद - सामग्री ) प्रदान की एवं उस अग्नि को इसी नाम से प्रसिद्ध किया । इससे श्रुति शिक्षा देती है कि यदि तुम अपने श्रात्मा को उन्नत बनाना चाहते हो - यदि अपने शापको ' महात्मा ' कहलाना चाहते हो तो दूसरे के गुणो को अपनाना सोखो । संसार में जिन मनुष्यों में गुणविशेष हैं - उन्हें अपनाम्रो । उनका गुण देखकर ' द्यात्मवेवं सर्वम् ' - इस श्रौत - सिद्धान्त को सामने रख कर अपने प्रापको गुणी समझो । जो दूसरे की विभूतियों पर डाह करता है - वह अपने पापके पैरों पर कुल्हाडी मारता है । तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि महात्मा होने के कारण ही ईश्वरप्रजापति ने यमराज को प्राणियों के भाग्य का निर्णेता बना रखा है । यदि तुमने भी इसी नीति का अनुकरण किया तो एक दिन महात्मा बनते हुए तुम स्वयं यमराज बन जानोगे अर्थात् - मृत्यु का हर बाता रहेगा । बस, मन्त्रगत ' महात्मा ' शब्द हमें यही सिखलाता है । यमराज पुनः उसी नाचिकेताग्नि की प्रशंसा करते

हुए कहते हैं-“ त्रिरणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धि त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।

ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ” ॥१७ ॥

जिसने तीन बार नाचिकेत कर लिया है अर्थात् तीन बार चयनयश कर लिया है - यही पुरुष त्रिणाचिकेत कहलाता है । यमराज कहता है कि हे नचिकेता! ( इन तीन चयनों के कारण ) १७, २१, [ ७३ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् २५ इन तीनों से सम्बन्ध प्राप्तकर यथाविधि - यश - तप - दान करने वाला यह त्रिणाचिकेत पुरुष जन्म और मृत्यु दोनों का तरण कर जाता है एवं स्वयम्भूरूप जो ब्रह्मयज्ञ है जो कि देवस्वरूप एवं स्तुत्य है-उसे जानकर उसे छाँटकर यह धात्यन्तिक शान्ति को प्राप्त हो जाता है । प्रकरण के प्रारम्भ में पाँच प्राकृतात्माद्यों का निरूपण करते समय स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी - इन पांचों का वर्णन आया है । ये हो पांचों पांच प्राकृतात्मा है । ये ही पांचों यज्ञक्षरों से उत्पन्न होने के कारण क्रमश: १ - ब्रह्मयज्ञ ( स्वयम्भू ), २ - विष्णुयज्ञ ( परमेष्ठी ), ३ - इन्द्रयज्ञ ( सूपं ), ४ - सोमयज्ञ ( चन्द्रमा ), ५ - अग्नियश ( पृथिवी ) - इन नामों से व्यवहृत होते हैं । मध्यात्म में ये ही पाँचों शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा, शरीरात्मा नाम से प्रसिद्ध हैं । हमने बतला दिया है कि इन पाँचों में शान्त महान् एक बस्तु है - इन दोनों को केवल महानात्मा के नाम से ही पुकारा जाता है । यही प्राकृत परमात्मा है एवं विज्ञान, प्रज्ञान पोर स्तोमत्रिलोकी से निम्मित प्राणात्पा ( जिसे कि कम्र्मात्मा भी कहा जाता है ) तीनों प्राकृत प्रन्तराना है । शरीर प्राकृत बाह्यात्मा है । इसी का नाम बेकारिकात्मा भी है । इन पांचों प्राकृतात्माओं से परे प्रक्षर ( गूढोत्मा ) है । वही भारमा है उस मात्मा को शान्तादि पाँच प्रकृतियाँ हैं । इन प्रकृतियों में और मात्मा में आत्मा, प्राकृतपरमात्मा, विज्ञानात्मा - ये तीनों गन्तव्य स्थान हैं एवं प्रज्ञामनो gs प्राणात्मा जाने वाला है । सत्कर्म्म करता हुमा यह विज्ञानरूप सूम्यं में जा सकता है एवं और भी उत्कृष्ट कर्म करता हुआ यह सूर्य ' ऊपर रहने वाले स्वयम्भू - परमेष्ठियुक्त परमात्मा में जा सकता है | विज्ञानरूप सूय्यं स्वर्गलोक कहलाता है - इसी में १७-२१-२५ - ये तीन श्रेणियाँ हैं । इन तीनों में जाना भिणाचिकेत स्वर्ग में जाना है एवं इसके ऊपर प्राकृत परमात्मा में जाना प्रकृतिलय कहलाता है । इस प्रकृति के द्वारा अक्षरात्मा में जाना प्रात्मलय कहलाता है । यद्यपि प्रात्यन्तिक शान्ति श्रात्मलय में ही है, परन्तु चूंकि प्राकृत परमात्मा नाम से सुप्रसिद्ध महान् अक्षर एक वस्तु है, ' महबूब कमकारम् ' - के धनुसार प्रविनाभूत है, अतएव इस प्राकृत परमात्मलयभाव से वह अक्षर प्राप्त हो जाता है, अतएव हम अवश्य ही इस महान् नाम के प्राकृतलय को प्रात्यन्तिक शान्ति का कारण बतलाने के लिए तय्यार हैं । स्वयम्भू और महान् एक हैं । इसी उपनिषत् के मतानुसार स्वयम्भू का नाम शान्त आत्मा है । यों तो मृत्युलोक की भपेक्षा स्वर्गादि में शान्ति है ही, परन्तु वहाँ आत्य -ति शान्ति नहीं है । प्रभय का नाम शान्ति है । स्वयम्भू को छोडकर इतर छहों रज होने से सभय हैं । स्वयम्भू सत्यमात्र विरजा है । इसी अभयशान्त स्वयम्भू पर वे छहों रज प्रतिष्ठित हैं । " इसीलिए उसे शान्तात्मा कहा जाता है । प्राण- आपः -बागादि में प्राण वेदमय है । यही स्वयम्भू का स्वरूप है । इसी का नाम ब्रह्म है, प्रतएव वेदधन इस ब्रह्म ( स्वयम्भू ) के यज्ञ को हम ' ब्रह्मयज्ञ ' कहने के लिए तय्यार हैं । जैसा कि आयं सर्वस्व कहता है-" ब्रह्मयज्ञेन ये नित्यं यजन्ते द्विजसत्तम । ते ब्रह्माणं प्रीणयन्ति वेदो ब्रह्मा प्रकीर्तितः ” ॥१ १- वेद मं ० १११६४।६ । २- वायुपुराण १० ७३।१२ । [ ४ ]

पृष्ठ 114

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषद् स्वयम्भू भाकाश है, परमेष्ठी वायु है, सूर्य्य तेज है, चन्द्रमा पानी है, पृथिवी मिट्टी है । इन पांचों के ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - सोम - अग्नि- ये पाँच देवता हैं । इन पाँचों में सबका मूल बह्यदेव है । ' ' -वास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा " - इस श्रुति के अनुसार ब्रह्म ही पहला बेब है, प्रतएव यह इतर सारे देवताओं से स्तुत्य है । यदि ब्रह्मदेव न होते तो इतर देवताओं का प्रभाव ही रहता, अतएव हम अबश्य ही इस कामथ के लिए ' देवम् ( आदिदेवं ) ईधम् ' - कह सकते हैं । पृथिवी शादि कोई भी लोक ऐसा नहीं है-जहाँ स्वयम्भू की सत्ता न हो । सर्वत्र वह स्वयम्भू व्यापक है । क्या वह हमें इस पृथिवीलोक में प्राप्त नहीं है? है मोर भवश्य है । हम सर्वत्र उसे पाते हैं मोर जानते हैं । फिर हमें प्रात्यन्तिक शान्ति क्यों नहीं होती? इसका समाधान करने के लिए ही ' निवाम्प ' कहा है । ' निवाय्य ' का प्रयं है- ज्ञानष्टपा विभज्य । हम जानते हैं, परन्तु उसका स्वतन्त्ररूप से सबसे अलग घंटा हुआ रूप नहीं जानते । ममाग से संपरिष्वक्त ही उस शान्त का हम प्रत्यक्ष करते हैं, प्रतएव हमें उसमें शान्ति नहीं मिलती । जब हम मर्त्यभाग से छाँटकर उसे जानेंगे तभी हमें प्रात्यन्तिक शान्ति मिलेगी । हमें जो सांसारिक पदार्थों में शान्ति मिलती है - वह उसी शान्त स्वयम्भू का भाग | परन्तु क्षणिक मर्त्यभाग से संश्लिष्ट रहने के कारण यह क्षणिक है । जब इसे मत्यंभाग से छाँट लिया जाता है तो वही स्वयम्भू ब्रह्मयश बास्यन्तिक शान्ति का कारण बन जाता है । यज्ञ तप - दान से जन्म - मरण का चक्रमात्र लूट सकता है, परन्तु इससे प्रात्यन्तिक शान्ति नहीं मिल सकती । प्रात्यन्तिक शान्ति ब्रह्मयज्ञ के ज्ञान पर ही निर्भर है । सूम्यं से ऊपर ब्रह्मयज्ञ है - यही अमृतभाग है । सूम्यं से नीचे मृत्यु है । सूय्यं अमृत - मृत्यु का विभाबक है - सा कि पूर्व में कई बार बतलाया जा चुका है । अमृतमाग ज्ञानस्वरूप है - मत्यंभाग कम्र्मस्वरूप है । मर्त्य-माग का वरण कम्मं से ही हो सकता है एवं अमृतभाग की प्राप्ति ज्ञान से ही हो सकती है । मर्त्यभाग के परित्याग से ( अर्थात् प्रवृत्तिकम्मं के परित्याग से ) ही प्रमृततत्त्व प्राप्त हो सकता है, प्रतएव - ' स्यानेनेचे-अमृतरवमानशुः - यह कहा जा सकता है । श्रुति कहती है कि त्रिकम्मंकृत् त्रिणाचिकेत सूर्यलोक में पहुँचने के कारण जन्म - मृत्यु से तो अवश्य छूट जाता है, परन्तु जब तक वह बह्य को ( शान्त - प्राहृतात्या को ) नहीं पहचान लेता तब तक उसे प्रात्यन्तिक शान्ति नहीं मिल सकती । वह शान्ति तो प्रात्मज्ञान से ही हो सकती है । आत्मा के पास बिना परमात्मा ( महान् ) का सहारा लिए नहीं पहुँच सकता, अतएव उसके ग्रहण के लिए श्रुति को ' ब्रह्मयज्ञ ' शब्द कहना पड़ा है । मन्त्र का पूर्वाद्धं सूय्यं तक पहुँचाता है, उत्तरार्द्ध सूम्यं से ऊपर अमृतलोक में ले जाता है । दूसरे शब्दों में पूर्वाद्धं भाग कम्र्म्मयोग का प्रतिपादन करता है, उत्तरार्द्धभाग ज्ञानयोग का स्वरूप बतलाता । पूर्वार्द्ध में कम्मंयोग है - उतराखं में ज्ञानयोग है- दोनों मिलाकर एक मन्त्र है । एक के विन्स दूसरा भाग मन्त्रसंपत्ति से रहित है । इससे बुद्धि शिक्षा देती है कि पहले कम्मं है - बाद में ज्ञान । दोनों अविनाभूत हैं । दोनों के विना भ्रात्मस्वरूप पकड़ में नहीं घा सकता, क्योंकि प्रात्मा स्वयं ज्ञान -कम्र्ममय है । इसी प्राधार पर यह कहा जाता है-" ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत नाज्ञात्वा कर्म्म श्राचरेत् । प्रज्ञानेन प्रवृत्तस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे ॥ १- शत • ब्रा ० ६।१।१।७ । [ ७५ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् सारे कथन का निष्कर्ष यही हुबा कि तीन बार चयन करने वाला पुरुष १७-२१-२५- इन तीनों को प्राप्त कर यश - सप - दान नाम से प्रसिद्ध विद्यासमुचित त्रिकम्मं करता हुआ जन्म - मृत्यु से भलग हो जाता है एवं वही पुरुष यदि प्रवृत्तिभाग को छोडकर शानभाग का सम्बन्ध जोड़ देता है अर्थात् निवृति कर्म करने लगता है तो ज्ञानसम्बन्ध से वह धात्यन्तिक शान्ति को प्राप्त हो जाता है । अर्थात् कोरे चयनकर्म्म से तब तक पराक्षान्ति नहीं मिल सकती जब तक कि जानकर न किया जाए । विद्या से ही कम् बलवत्तर हो जाता है । कहीं - कहीं ' ' के स्थान में - ' बहाव ' - पाठ है । इस पक्ष में इस मन्त्र का निम्नलिखित वर्ष होता है । इस पक्ष में ब्रह्म नाम है - वेद का । त्रयीब्रह्मजन्य जो ज्ञान है - उसे ' ब्रह्म ' कहते हैं । ' ब्रह्मणो बातम् यत् ज्ञानम् ' - ' बह्मबकम् ' को यही व्युत्पत्ति है । वेदजन्य विज्ञान ही ' ब्रह्मजज्ञ ' है । ऐसा है- सूर्य्यं । यही अध्यात्म में विज्ञानात्मा कहलाता है । सूय्यं वेदधन । स्वयम्भू के ब्रह्मनिःश्वसित श्रीब्रह्म ही इस सूयं का जनक है । जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है, बतएव सूयं के लिए- ' त्रयी बा एवा बिखा तपतोति ' - यह कहा जाता है । ऐसी भवस्था में हम प्रवश्य ही सूर्य्यं को ' ब्रह्मज्जन्म ' ( वेदजन्यज्ञानमूति ) कहने के लिए तय्यार | । सूम्यं देवषन है, भतएव - ' चित्रं teriya गानीकम् ' - कहा जाता है । इस देबघन सूय्यं को हम अवश्य ही ' देव ' कहने के लिए तम्यार हैं । प्रातः मध्याह्न - सायं तीनों कालों में द्विजातिवर्ग इस ब्रह्मणश देव का उपस्थान किया करता है, अतएव हम इसे स्तुत्य कहने के लिए तय्यार हैं । चयनयज्ञ का इसी सूय्यं से सम्बन्ध है, अतएब जो इसको भली प्रकार समझ लेता है - वही आत्यन्तिक शान्ति प्राप्त कर लेता है । जैसे प्राकृतपरमात्मा शान्ति का प्रापक है, एवमेव - ' तद् बिज्ञानेन परिपश्यसि बोरा: ' - के अनुसार विज्ञान ज्ञान भी शान्ति का कारण बन जाता है - इसी को बुद्धियोग कहते हैं । भगवान् के मतानुसार प्रत्येक कम्मं में यदि बुद्धियोग का सम्बन्ध कर दिया जाता है तो वह शान्ति का कारण बन जाता है । इस प्रकार मन्त्र के दो अर्थ हो जाते हैं- दोनों का निष्कर्ष - ' जानकर कर्म करो तभी शान्ति मिल सकती है । विना उपपत्ति के जाने किया हुआ कर्म्म श्रद्धा रहित होता है, अतएव उसका दृढ फल नहीं मिल सकता ' - यही निष्कर्ष है । मन्त्रगत - ' त्रिभिरस्य सन्धिम् ' का हमने १७-२१-२५ वें स्थान से सम्बन्ध करके - यह अर्थ किया है । यह वाक्य- ' चतुष्टयं था इयं सर्वम् ' के अनुसार धनुगम है, भतएव इसके निम्नलिखित प्रर्थ भी हो सकते हैं-१ - १ - गार्हपत्य, २ - दक्षिणाग्नि, ३ - माहवनीय- तीनों से सम्बन्ध करके त्रिकम्मैकृत् मनुष्य जन्म-मृत्यु का वरण कर जाता है । यश में तीनों अग्नियों का सम्बन्ध बावश्यक है - इसमें प्रमाण बतलाने की अवश्यकता ही नहीं है । २ – १ – पृथिवी, २- अन्तरिक्ष, ३ - यो - इन तीनों से सम्बन्ध प्राप्त कर त्रिकम्मकर्त्ता मनुष्य जन्म - मृत्यु से अलग हो जाता है । चयनयज्ञकर्ता को क्रमशः त्रिवृत् - पञ्चदश- एकबिश - इन तीनों से सम्बन्ध करके अनन्तर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होना पड़ता है । १- प्रष्टव्य - शत ० प्रा ० ६।१।१।१० । [ t ]

पृष्ठ 116

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषद ३--१ -ऋक्, २ - यजुः, ३ - साम- तीनों से सम्बन्ध करके त्रिकम्मं करने वाला पुरुष जन्म - मृत्यु से अलग हो जाता है । यज्ञ का स्वरूप त्रयीवेद के सम्बन्ध पर ही निर्भर है । " ४ - १ - माता, २ - पिता, ३- आचार्य - तीनों से यथावत् शिक्षा प्राप्त कर त्रिकर्म्मा मनुष्य जन्म-मृत्यु से विमुक्त हो जाता है । यश - सर - दान शिक्षित विद्वान् ही कर सकता है एवं शिक्षा के प्रषिष्ठाता माता - पिता - माचार्य ये ही तीन हैं । बिना तीन के सम्बन्ध के यह कम्मं नहीं कर सकता । इस प्रकार त्रिकम्प के साथ सभी अर्थों का सम्बन्ध हो जाता है । इसीलिए किसी विशेष का नाम न लेकर ' fuf मरेत्य सम्धिम् ' - कह दिया गया है । ' त्रिकम्मंत् ' भी ऐसा ही वचन है । इज्या पध्ययन - धान - कर्म-उपासना - ज्ञान आदि भयं यहाँ होते हैं । कम्मं के साथ ज्ञान की परम धावश्यकता है - यह बतलाकर यमराज पुनः उस पर जोर देते हुए ज्ञान की परम आवश्यकता बतलाते हुए एवं उसी को शान्ति का अन्यतम कारण बतलाते हुए यमराज पुनः नचिकेता से कहते हैं कि ---" त्रिणाणिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं बिद्वाश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८ ॥

हे नचिकेता! इन त्रिणाचिकेतत्रय को ( १७-२१-२५ में अग्नि को ) इस पूर्वोक्त विधि के धनुसार जानता हुधा जो प्रग्निचयम करता है - वह अपने धागे से मृत्युपाक्ष को खिल - मिल करता हुआ शोक से बाहर निकल कर आनन्त्य का उपयोग करता है । इस मन्त्र का ' प्रथमेतद् विदित्वा ' - वाक्य भी अनुगम तुल्य ही है । ( १ ) या इष्टका, ( २ ) पावतीर्वा ( ३ ) यथा वा, चयनयज्ञ करने वाले को पन तीनों को जानना प्रावश्यक हो जाता है । इष्टकास्वरूप उनकी संख्या और उनके चयन का प्रकार तीनों बातें जानकर ही चयन करना सार्थक है, अन्यथा व्यर्थ है । वेदत्रयी, लोकत्रय बादि धर्षो का भी समन्वय हो सकता है । यह मन्त्र भी उपपत्तिज्ञान को ही फम का धन्यतम कारण बतलाता है । अन्त में इस दूसरे वर के समाधान का उपसंहार करते हुए यमराज कहते हैं-" एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृरगोया द्वितीयेन वरेण । एतमग्न तवैव प्रवक्ष्यति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व " ॥ १६ ॥

हे नचिकेता! जिस दूसरे वरदान से तंने स्वयं अग्नि का स्वरूप पूछा था वह अग्नि मैंने तुझे बतला दिया है । अर्थात् मैंने चयनविद्या बतला दी है एवं साथ ही तेरी धारण शक्ति से प्रसन्न होकर मैंने अपनी मोर से तुझे - ' इस पग्नि को मनुष्य तोरे नाम से ही पुकारा करेंगे ' - यह चौथा वरदान मी दे दिया । हे नचिकेता! अब तू तीसरा बर माँग । कहने की देर थी उसी समय नचिकेता कहता है— १- द्रष्टव्य - शत ० वा ० १ | १ | ४ | ३ | [ ७७ ]

पृष्ठ 117

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प्रथमाध्याय ( प्रथना वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपगोपनिषत्

" येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।

एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः " ॥२० ॥

यमराज! मनुष्य के मरने के विषय में जो प्रारम्भ से निम्नलिखित सन्देह बना आ रहा है-भाप कृपा कर उसे धौर मिटाइए । कितने हो विद्वानों का कहना है कि शरीर से अतिरिक्त पात्मा अवश्य है | शरीरानन्तर वह पानी की तरह लोकान्तर में जाता है एवं कितने ही महानुभावों का कहना है कि शरीरातिरिक्त आत्मा नहीं है । ग्रात्मा रथवत् है, अतएव शरीर के नष्ट होते ही उसका बिनाश है । शरीर के नष्ट होते ही उसका विनाश क्या है? शरीर ही वह है, अतएव शरीरातिरिष्ठ बारमा एवं वह मरीरत्यागानन्तर लोकान्तर में जाता है - यह मानना सर्वथा प्रशुद्ध है । इस प्रकार ब्राह्मण लोग आत्मा की शरीर से पृथक् सत्ता मानते हैं एवं कर्म्ममोगार्थं उसका लोकान्तर में संचार मानते हैं एवं श्रमणक लोग शरीर को ही आत्मा मानने हैं एवं इनके मतानुसार इसकी लोकान्तर में मति नहीं होती । यही दोनों दल प्रस्ति नास्ति के उपासक होने से प्रास्तिक, नास्तिक नाम से प्रसिद्ध हैं । वास्तिकवाद सवाद है । नास्तिकवाद प्रसदवाद है । जब से दुनिया बनी है तभी से दोनों म प्रचलित हैं, अतएब यह विषय बाज संदिग्ध बना हुआ है । बस, आज में ग्रापसे वही संदेह दूर करना चाहता हूँ - हम क्षुद्र मनुष्य न इसको प्रत्यक्षप्रमाण से दूर कर सकते हैं, न अनुमान से ही । बस, ' तू तीसरा वर और माँग ' - भाप से इन शब्दों में अनुशिष्ट ( शापित ) होकर मैं भाज झापसे यही रहस्य जानना चाहता हूँ । बस, तीनों वरों में से यही तीसरा वर है । इस प्रकार नचिकेता यमराज से जम्म-मरणसम्बन्धी प्रश्न करता है । नचिकेता का- ' पस्तीत्येके नायमस्तीति शंके - यह संदेह ही इस बात को हठ करता है कि बिता बरा नहीं है अपितु, मुखित हुआ है । यदि सचमुच में नचिकेता का आत्मा विकलकर लोक में चला जाता तो उसे शरीरातिरिक्त भात्मा है या नहीं एवं उनका लोकान्तर में संचार होता है या नहीं - यह संदेह ही व रहता, अतएव हम अवश्य ही इस सारी घटना को मूच्छित दशा में ही होने वाली मानने के लिए तय्यार हैं । जिस प्रस्ति नास्ति प्रश्य पर बालों वर्षों से विवाद चला आ रहा है उसी प्रश्न को सुचकर यमराज चकित हो जाते हैं । ये सोचने बगते हैं कि नचिकेता कैसा बुद्धिमान् है! माज इसने जो मथ्य किया है - वह मामूली नहीं है । बडा ही गहन प्रश्न है । अवश्य हो नचिकेता में कोई दिव्य ज्योति विराजमान है, प्रतएव इसे अवश्य ही इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा । परन्तु उत्तर देने से पहले इसके जिज्ञासा भाव की परीक्षा कर लेना उचित होगा । जब इसे परीक्षा में उत्तीर्णं पाएंगे तो अवश्यमेव इसके इस संदेह को दूर करेंगे । बस इस प्रकार मन ही मन परीक्षा की ठान कर यमराज उत्तर में

कहते हैं--" तेरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।

अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥२१ ॥

[ ७८ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् हे नचिकेता! जिस प्रश्न को तुम आज मेरे से पूछ रहे हो - मनुष्यों की तो कौन कहे ( मोमस्वर्ग वासी ) देवताओं से भी इस आत्मस्वरूप में संदेह ही किया गया है । घर्थात् बाज से पहले बडे - बडे विद्वानों ने और तो और पृथिवीमण्डमभर में बुद्धिमानों में थेष्ठ कहलाने वाले भौम देवताबों ने भी इसमें अपना मस्तिष्क बहुत खपाया है । परन्तु वे भी इस प्रश्न को हल नहीं कर सके हैं । कारण इसका यही है कि यह आत्मतत्व अणु से अणु है, धतएव उन देवतानों से यह सुज्ञेय नहीं है । मला, जिस प्रश्न को देवता लोग भी भली - भाँति हल नहीं कर सके उसे तुम कैसे समझ सकते हो? भूतएव तुम्हारे हित की कामना के लिए मैं तुम्हें कहता हूँ कि तुम इसके अलावा अन्य ही वर मांगो । सुम मुझे इसके लिए विवश ( बाध्य ) मत करो । हे नचिकेता! इस प्रश्न को तुम मेरे लिए छोड दो प्रर्थात्-मेरे कहने से इस प्रश्न को भूल जाबो । ' येथे ' से यहाँ ममुष्य देवता, इन्द्रियवर्ग एवं प्रषिदेवत के प्राणदेवता तीनों ही अभिप्रेत हैं । इस मन्त्र को अध्यात्म, भषिभूत ( इतिहास ), अधिदेवत तीनों पक्षों में लगाया जा सकता है । मात्मा उक्थ है । देवता प्राणरूप हैं । ' पराचि सानि ० ' के अनुसार प्राणरूपदेवता पराङ्मुख हैं, अतएव ये उस भ्रात्मा को नहीं जान सकते । क्योंकि वह अन्सनिगूढ है । परन्तु बिलकुल नहीं जानते यह भी नहीं कहा जा सकता, अर्थात् यह तटस्थ लक्षण से विदित एवं स्वरूपलक्षण से अविदित होने विदिताविति से अन्य है -- जैसा कि ' केनोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतला दिया गया है । इस? विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' सुज्ञेयम् ' कहा है । ' न हि सुशेयम् ' का ' स्वरुपलक्षणतः संवितयम् ' - यही अर्थ है | यमराज नचिकेता को वरदान मांगने के लिए कह चुका है । जैसे - कर्जदार अपने कर्जदाता से विवश रहता है, तथैव आज यह प्रथमणं यमराज उत्तमर्ण नचिकेता के अधीन है, अतएव यमराज कहता है कि यद्यपि तुम्हें यथेच्छ वरदान मांगने का अधिकार है, परन्तु तुम उसे समझ न सकोगे, अतएव इसके लिए तुम मुझे विदश न करो । यमराज सती सावित्री को सत्यवान् के प्राणदान के प्रतिरिक्त जैसे और भोर वरदान मांगने के लिए कहता था एवं सती अपनी प्रतिज्ञां पर एढ थी बस, ठीक वही घटना यहाँ भी है । यमराज ज्यों - ज्यों मना करते हैं - त्यों - त्यों ही पतपतितमनुष्यवत् नचिकेता अपनी प्रतिज्ञा में इठ होता जाता है । अन्त में सावित्री की तरह प्रतिज्ञ नचिकेता की ही विजय होती हैं । यमराज के ' तुम और कोई दूसरा वरदान मांगो, क्योंकि यह प्रश्न बडा कठिन है, एक प्रकार से प्रविज्ञेय है ' यह वाक्य सुनकर जिज्ञासु नचिकेता कहता है-" देवंरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वागन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् " ॥२२ ॥

हे यमराज! जिस मामा - तत्त्व के विषय में देवता लोग ( उस उदय भ्रात्मा से पराङ्मुख होने के कारण ) संशय में पड़े हुए हैं एव हे मृत्यो! जिसे तुम स्वयं भी सुज्ञेय नहीं बतलाते हो - मला, उस निगूढ आत्मतत्व का तुम्हारे से अधिक वक्ता कौन होगा? मेरे अनुमान से तो तुम्हारे जैसा श्रात्म-[ ७६ ]

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प्रथमा यो ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् तस्यवेत्ता एवं उसका उपदेष्टा दूसरा नहीं मिल सकता । हे यमराज! मैंने खूब ही सोचा, परन्तु सोच-सायकर धन्स में मैं इसी निर्णय पर पहुंचा हूँ कि इस वरदान के समान और कोई दूसरा वर नहीं है । जिस तत्व को जो जानता है वही उसको कठिन बतलाया करता है । जानने वाले की दृष्टि में जो तस्य कठिन है - अनजान के लिए वही तमाशा है । आत्मतत्त्व सचमुच सुज्ञेय ही है । विदिताविदिव से अलग है । नचिकेता यमराज के मुख से ' न हि सुज्ञेयम् ' - सुनते ही समझ लेता है कि अवश्यमेव ये इसका समाधान कर सकते हैं, अतएव वह अपनी प्रतिज्ञा पर और भी दृढ हो जाता है । साथ ही बुति हम जन्तुओं को संसार के प्रतितुच्छ क्षणिक विषयों में फंसे हुए जीवों को उपदेश देती है कि यद्यपि धारणतत्व को जानना बडा कठिन है, साधारण मनुष्य की बुद्धि इस पर नहीं पहुँच सकती, इस प्रश्न की बोर सहसा कुकाव नहीं हो; परन्तु साथ ही यह भी विश्वास कर लेना चाहिए कि इस प्रश्न के धबाबा संसार में और कोई दूसरा प्रश्न ( कल्याणकारी ) है भी नहीं । म्रात्म जिज्ञासा ही सारी जिज्ञासाधों में श्रेष्ठ है । afebar का एढ उत्तर सुनकर यमराज मन ही मन पुलकित होते हैं एवं और भी कठिन परीक्षा करने के लिए उसे नाना प्रकार के प्रलोभन देते हैं । आगे के ३ मन्त्रों ( २३, २४, २५ में मन्त्र ) में उन्हीं प्रलोभनों का निर्देश है । यमराज कहते हैं-" शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् । सुमेमहदायतमं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावविष्यसि ॥२३ ॥

नचिकेता! सौ - सौ वर्ष की उमरवाले पुत्र - पौत्रादि को माँग । पुरुष - अश्व - गो अवि - प्रज - इन ffer बहुसंख्यक पशु को माँग । हाथी मांग, मन चाहा सोना मांग । राज्य के लिए भूमि का बहुत बडा हिस्सा मांग एवं जितनी शताब्दियों तक तू जीना चाहता है - वह माँग । मैं सब कुछ देने के लिए तम्यार हूँ - केवल मरने के विषय में तू मेरे से मत पूछ । मरणसम्बन्धी प्रश्न के अतिरिक्त तू जो कुछ ! afe सो देने के लिए तम्बार हूँ । तीनों श्लोकों में प्रलोभन ही प्रलोभन है, अतएब - ' इन्द्रान्ते भूयमाखं पर्व प्रत्येक मिसंवृद्ध्यते- -1 इस न्याय के अनुसार तीसरे श्लोक के अन्त के - ' मरणं मानुप्राक्षी: ' - का शेष पूर्व के दोनों मन्त्रों के साथ भी सम्बन्ध समझना चाहिए । संसार में जो कुछ सुख मिल सकता है - इस मन्त्र में उन सारों का निर्देश है । दीर्घजीवी पुत्र-पौत्रादि का विद्यमान रहना, पुरुषादि पाँचों पशुओं का बहुसंख्या में रहना । हाथी- यथेच्छ सुवर्ण भूमि एवं पायुवंश्यता रहना - बस, ये ही श्रेष्ठ सुख हैं । संसारी मनुष्य के लिए एक - एक भी दुर्लभ है । माज उन्हीं को यमराज देना चाहता है । यमराज फिर कहता है कि-" एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥२४ ॥

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है नचिकेता! जिन कामनाओं के माँगने के लिए मैंने तुझे कहा है- उन्हीं के सह प्रन्य भी जो तुम्हें माँ, माँग सकते हो । विपुल धनराशि, दीर्घजीवन मांग सकते हो । हे नचिकेता! महासाम्राज्य के तुम अधिपति बन जाओ - प्रर्थात् तुम चाहो तो तुम्हें चक्रवर्ती बना सकता हूँ । लो नचिकेता! इतना ही नहीं आज से मैं तुम्हें कामनाओं का कामभागी बनाता हूँ - अर्थात् तुम जो चाहोगे सो मिल जाएगा - ऐसा भाशीर्वाद देता हूँ । इस ' कामाना वा काममात्रं करोमि - वाक्य में बडा चमत्कार है । तुम चाहो सो ले सकते हो - इससे यमराज का आत्मप्रश्न की बोर लक्ष्य है । यमराज परोक्षभाव से हमारा कर देते हैं कि हे नचिकेता! तुम यह मत समझना कि: घात्मा का स्वरूप नहीं बतला सकता । केवल तेरी परीक्षा है । तेरे सामने विष और अमृत दोनों रहे हैं । देखना है कि तू किसे पसन्द करता है? प्रकरणागत विज्ञान का भी उपदेश देते हुए यमराज अन्त में कहते हैं कि-" ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामा छन्वतः प्रार्थयस्व । हमा रामाः सरथाः सतूर्या न होदृशा लम्भनीया मनुष्यः ॥ ग्राभिर्मत्ताभिः परिचाश्यस्व नचिकेतो मरणं मानुप्रासीः " ॥२५ ॥

हे नचिकेता! इस मर्त्यलोक में जो जो दुर्लम काम ( वस्तु ) हैं उन उनको तुम छन्द से मांगो । जो दिव्य अप्सराएं सुन्दर सजीले रथ पर सवार हैं एवं जिनके चारों पोर संगीत ध्यान हो रही है, मोठे - मीठे बाल बज रहे हैं एवं पुरुषों के रमण की साधनभूता होने से जो प्रप्सराएं ( ' रमयन्ति पुस्वान् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) ' रामा ' नाम से प्रसिद्ध हैं; जो ऐसी अप्सराएँ मामूली मनुष्यों से प्राप्त करने योग्य नहीं है - हे नचिकेता! ऐसी दुर्लम मुझे से दी गई अप्सराम्रों से तू अपनी परिचय करवा । अर्थात् जिन प्रप्सराम्रों के कृपा - कटाक्ष से मनुष्य अपने प्रापको धन्य समझते हैं - उन्हें दासीरूप में तुझे प्रदान करता हूँ । इस प्रकार संसार के सारे वैभव तुझे देने के लिए तय्यार हूँ " - तू इन सबको से मे, किन्तु मरणसम्बन्धी प्रश्न मत करे । ' धन्यतः प्रार्थयस्व ' - का सीधा सा प्रत्यक्षरूप से प्रतीत होने वाला ( मन चाहा मांगो - ' इच्छातः प्रार्थयस्थ ' ) - यही मर्थ है । तुम मन बाहा मांग सकते हो - यह सब कुछ तुम्हें मिलेगा । परन्तु इससे विज्ञान भी बतलाया जाता है । दुर्लभ या सुलभ संसार के यच्चयावत् पदार्थ नाम-रूपकमय हैं । यदि किसी उपाय से नामरूपकम्मं को पकड़ लिया जाय तो सचमुच सारी विभूति प्रपने आप घर बैठे प्राप्त हो जाती है । ऐसा उपाय है- केवल छन्द । वाक् - परिमाण का नाम ही बन्द है । छन्द से सारे पदार्थ अवच्छित्र रहते हैं । देवता - भूत दोनों छन्द से प्रवछिप्त हैं । इस छन्द ' को पहचान १ - छन्द का क्या स्वरूप है? वाक् - परिमाण को ही छन्द कैसे कहते हैं? छन्द से ही सारे पदार्थ अवच्छिन्न कैसे हैं? छन्द सारी कामनाएँ कैसे दे सकता है? छन्द के कितने भेद हैं? प्रादि विषयों का विस्तृत विवेचन हमारे लिखे ' शतपथ ब्राह्मण ' के प्रथम ब्राह्मण में देखना चाहिए । विस्तारभय से एवं अप्राकृत होने से यहाँ हम उसका निरूपण नहीं कर सकते । ( स्व ० शास्त्रीजी ) [ १ ]