कठोपनिषद — पृष्ठ 21–30

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय १२ - प्रग्यय के मनःप्राणवाङ्मय आत्मभाग का व्यक्तिभाग १३ - महान् के प्राकृति प्रकृति प्रकृति खण्ड १४- महान् का बाकृतियां बनाना १५ - महान् ही सबका ढांचा है १६- प्रणोरणीयान्महतो महीयान् परात्पर और महान् १७- शुक्र का बनना १८- जीव को योनि महानात्मा १६- महदविनाभूत मक्षर २० - प्रात्मा के प्रभव प्रतिष्ठा प्राशय धर्म २१ गुहात्मक अव्यक्त स्वयम्भू २२ - ' जायते ' और जन्तु २३- गुहा - निहित महानात्मा २४- पोडशोरूप प्रक्षरात्मा की महान्पर्य्यन्त व्याप्ति २५ - विज्ञान और प्रज्ञान २६- प्रान के प्रज्ञा और प्राण भाग २७- प्रशात्मक प्राण और प्राज्ञ आत्मा २८- प्रज्ञात्मक प्राणरूप प्राश के १७ पदार्थ २ ९ - परमात्मा और मन्तरात्मा ३० - अमृतरूप महानात्मा ३१ - निश्चयात्मक ज्ञान ३२- धातारूप विज्ञान- प्रज्ञान ३३- प्रवृत्ति निवृत्ति कर्म ३४ - ऋतु कामना, प्रासक्ति ३५ - मलिनसत्ता और मन का चाञ्चल्य ३६ - वासना भावना की जननी श्रासक्ति ३७ - विज्ञानस परिष्वक्त कम्मरमा की मलिनता ३८ - निष्काम कर्म पर जोर ३ ९ - जीवेश्वर का देवसत्य ४०-३३ देवता ४१- कर्म्मात्मा का बोधक श्रुतिगत ' देवम् ' शब्द ४२ - ईश्वरगत देवसत्य ४३ वैश्वानर - तेजस का सहकारी भाव [ २० । ( विषय - सूची ) पृष्ठ - संख्या १६८ १६८ १६८ १६६ .१७० १७१ १७१ १७१ १७१ १७१ १७१ १७२ १७२ १७२ १७२ - १७२ १७२ १७२ १७४ १७४ १७५ १७५ १७५ १७५ १७७ १७७ १७७ १७७ १७७ १७७ १७८ १७८

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कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विषय ४४- असली देवसत्यरूप प्रज्ञान ४५ - प्रज्ञानात्मा की ६ अवस्थाएँ ४६ - जीवगत देवसत्य की अवस्थात्रय ४७ - प्राज्ञ विद्युत् ४८ - ज्योतियों का भी ज्योति मन ४६ - जाग्रदवस्था में मन का गमन ५० - ' आसीनो दूरं व्रजति ' ५१ - स्वप्न और सुषुप्ति प्रवस्थाएं ५२ - स्वप्नरूप सुषुप्ति ५३ - पुराण - शरीर हृदय और दहराकाश ५४ - स्वपिति अवस्था ५५- पुण्य और पाप कम्मं ५६ - मातरिश्वा से परिच्छिन्न शुक्र महान् वायु ५७ द्रष्टा विज्ञान ज्ञाता महान् और मन्ता प्रज्ञान ५८ महान् के तम रज सत्व रूप ५६ - चिदात्मा अव्यय और चेतनात्मा अक्षर ६१- मन का सुपुप्ति में प्रात्मकाम होना ६२ - ईश्वरगत देवसत्य ६३ - सर्वज्ञ हिरण्यगर्भ और वैश्वानर नामक देवसत्य ६४ - स्वयम्भू - परमष्ठी - सूय्य चन्द्र पृथिवी नामक ब्रह्मसत्य ६५ - देवसत्यरूप श्रात्मा को जाग्रदवस्था ६६ - मूय्यं का विनाश विश्व का प्रलय ६७ - ईश्वर का विश्वमद ६८ - अग्नि की तीन अवस्थाएँ ६६ - पार्थिव प्राणाग्नि के दो विभाग ७० - सौर प्राणाग्नि के दो विभाग ७१ - व्यष्टिरूप पार्थिवाग्नि ७२ - समष्टिरूप पार्थिवघनाग्नि ७३ - समष्टिरूप सौरघनाग्नि ७४ व्यष्टिरूप सौर अग्नि ७५ कम्र्मात्मा का कम्मतिमापना [ २१ ] ( विषय - सू पृष्ठ संख्या १७८ १७८ १७८ १७८ १७६ १७६ १७६ १७६ १८० १५० १८० १८१ १८१ १८१ १८१ १८१ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८३ १८३ १८३ १८३ १५३ १८४ १८४ १८४ १५४ १८५ ६०- चित्र चेतनायुक्त आत्मतत्त्व का महान् से सम्बन्ध होना

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कठोपनिषविज्ञान माध्य विषय ७६- शिव तनू की आराधना ७७ - सुख - दुःख भोक्ता वैश्वानरात्मा और जाग्रत् सुषुप्ति भवस्थाएँ ७८ श्रग्नि की दो अवस्थाएँ ७६ - मर्त्यत्मा का अतिमुक्त होना ८० - सत्य और ऋत पदार्थ ८१- महानुरूप दमक ८२ - प्राकृति - प्रकृति - अकृत्यात्मक ऋत महान् ८३- शरीरी महान् ८४- महान् की व्यापकता ८५ - चिद्रूप महान् ६६ - सत्यरूप विज्ञान और प्रज्ञान ८७- तेजसात्मा का स्वरूप दयान की सर्वाङ्गशरीर व्याप्ति ८- महान्, प्रज्ञान, विज्ञान भेदेन ज्ञान ६० श्रवण - मनन और निदिध्यासन ६१ - आत्मदर्शन का प्रधान कारण आत्मानुग्रह ६५ कायिक, वाचिक, मानसिक दोष ६३ प्रजानमन की प्रशान्ति १४- प्रज्ञानमन का क्षुब्ध होता ६५- प्रात्मसाक्षात् के उपाय ६६ - पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्यबशा ६७ - चारों वर्णों का पांचों मण्डलों स सम्बन्ध Ex- सूय्यं के अर्वाक् - पराक् मण्डल ६६- बदन और उपसेचन तथा भात - दाल १०० - स्वयम्भू क वस्तु घृत १०१ षोडशी प्रजापति का प्रक्षर शब्द से ग्रहण १०२ - महान् में सत्व रज - तम गुणों का जन्म १०३ - ओम् की सर्वव्यापकता १०४ - ब्रह्म के शब्द तथा अर्थ प्रपञ्च और प्रोम् ॥ इति प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥ [ २२ }

पृष्ठ 24

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय अथ तृतीया वल्ली-संस्कृतपाठ । हिम्दीविज्ञान माध्य । १ - महतः सेतोः परपारसंस्थानम् ( १ से २ मन्त्रपय्र्यन्त ) १ - हमारा कर्तव्य २ - सेतुस्वरूप महानात्मा ३ - परपारसंस्थ महानात्मा ४- परमपराध्यं का सेतु - महानात्मा ५- मन्त्रगत सात पदार्थ ६- ततत्व का स्वरूप ७- सच्चिदानन्दघन परात्पर ८- सच्चिदानन्द की सर्वव्यापकता - अमृतस्वरूप रस और मृत्युस्वरूप बल १० - रस बल की उन्मुग्ध और उदबुद्धावस्था ११- मानन्द विज्ञान- मन - प्राण वाक् कलाएँ १२- सच्चिदानन्द का पुरुष नाम धारण करना १३ – सत्यनारायण सत्यसूर्य्य १४- अर्द्धमात्रारूप परात्पर १५ - पञ्चकलात्मक अव्यय पुरुष १६- अव्यक्त स्वयम्भू १७- सुकृत लोक १८- गुहा तत्त्व १६ - परम परार्ध्य २०- छाया तप २१- पञ्चाग्नयः २२- त्रिणाचिकेताग्नि २३ - ऋतान्तर्गत महानात्मा तथा छायातपरूप महानात्मा २४ - मुगु - अंगिरा समष्टिरूप सुब्रह्म २५- प्राणरूप द्विब्रह्म २६- ब्रह्म और द्विब्रह्म [ २३ ]

पृष्ठ 25

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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय २७- महान् द्वारा चिदात्मारूप ऋतात्मा का पान २८ - ज्ञान कम्मं - उपासना ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या २१४ २१४ २६ - ज्ञान क्रिया- अर्थ २१५ ३० ब्रह्मविद्या तथा यज्ञविद्या २१५ ३१ - चयनयज्ञ से सेतु प्राप्ति २१५ ३२- अक्षर की पांच कलाएँ २१६ ३३ - अक्षर की कलाओ के अन्तर्यामी और सूत्र भेद २१६ ३४ - अन्तर्यामी ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र २१६ ३५ - अग्नीषोम सूत्र २१६ ३६ - अपरामुक्ति और परामुक्ति २१६ २ - महतः सेतोः पारेयात्रिको भोक्तात्मा ( ३ से ४ मन्त्रपय्र्यन्त ) १- महानात्मा और चिदात्मा का स्वरूप २१७ २- चित्य - चितेनिधेयाग्नि ३- पार्थिव चितेनिधेयाग्नि की तीन अवस्थाएं ४ - वैश्वानर - हिरण्यगर्भ एवं सर्वज ५- विज्ञानसूर्य की पांच प्राणमात्राएँ २१८ २१८ २१८ २१८ ६- प्रज्ञान चन्द्रमा की पांच प्रज्ञामात्राएँ २१८ ७- पिण्डपृथिवी की पाँच भूतमात्राएँ २१८ ८- सप्तदशराशि युक्त भोक्तात्मा का कर्मभोगार्थ गमन २१८ स्थूलशरीर सूक्ष्मशरीर कारणशरीररूप स्थ २१८ १०- सारथि विज्ञानात्मा २१६ ११ - इन्द्रियरूप अश्व २१६ १२ - प्रग्रह ( लगाम ) प्रज्ञानमन २१६ १३- मन का चाञ्चल्य २२० १४ - श्रात्मा का कर्म्मभोग में प्रवृत्त होना २२० १५ - मुक्ति का कारण- विज्ञान २२० १६ - विज्ञान का मन के अधीन रहना २२० १७ - शुद्ध एवं मलिन विज्ञान २२० ३ -ह्म विविन्द्राधिकृतेषु श्रभयाव्ययाक्षरपदेषु विष्णुपदावच्छेदेन पारयात्रा निमित्तम् ( ५ से ६ मन्त्रपर्यन्त ) १ - आत्मा का आनन्द एवं दुःख भाव १२१ [ २४ ]

पृष्ठ 26

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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय २ - आत्मा की ऊष्वंयति घोर बघोनति ३- प्रविद्याप्रधान जीवात्मा का पघोगति का आश्रय लेना ४ - पारयात्रा में निमित्त - बुद्धियुक्त मन ५ गीताशास्त्र में बुद्धियोग का उपदेश ६ - सोममय मन और मग्निमय विज्ञान ७- प्रयुक्त मन ८- विज्ञानयुक्तावस्था E- विज्ञानवान् मोक्तात्मा १० - विज्ञानयोग से मन का शान्त होना ११ - मोकात्मा का रुख पारस्थान की प्रोर होना १२ चन्द्रमारूप प्रज्ञान में दो प्रकार से विज्ञान का सम्बन्ध १३ विज्ञानयुक्त मन १४ - आत्मा का स्वच्छ होना १५ - अव्ययस्थान की महिमा १६- प्रबुद्धियोगी ज्ञानयोगी - योगी १७- विद्या कर्म और समत्व योग १८ - विष्णु का परम पद १६ - ध्यक्षर समष्टिस्वरूप महदक्षर ४ - भो क्तात्मनः पारायणीयः पन्थाः ( १० से १२ मन्त्रपन्त ) १ - गूढोमा का स्वरूप २ - पारायणीय मार्ग ३ - प्रजापति के ईश्वर और जीवभेद ४ - देवसत्यात्मक ईश्वर और जीव ५- ब्रह्मसत्य ब्रह्माश्वत्थ ६- प्रजापति के सृष्ट - प्रविष्ट प्रविविक्त स्वरूप ७- प्रजापति के प्रजा और पति दो माग ८- प्राण नामक सूत्र ६- प्रजापति सूत्र- प्रजा और आत्मा - प्राण- पशु १०- पशुरूप विकारक्षर ११- पार्थिव अमृताग्नि १२ - सोम वायु एवं मत्वामिन् [ २५ ]

पृष्ठ 27

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कठोपनिविज्ञान माध्य विषय १३- श्वामर - हिरण्यगर्भ एवं सर्वश १४- परात्पर ब्रह्म १५ - प्रस्ति संज्ञायते समृष्यते १३- सचिदानन्द ब्रह्म के दो दिव १७- पुरुष को परिभाषा १८- पुरुष घोर प्रकृति १६ - प्रकृतिरूप पुरुष के अमृत - मस्य भेद २०- पराप्रकृति बोर अपरा प्रकृति २१ - धमूततस्व २२- अक्षर पुरुष की पञ्च कलाएं २३ सररूप अन्तर्यामी २४- मूर्ति और क्षरकूट २५- मूर्तिरूप क्षरपिण्ड पर त्र्यक्षररूप प्रमृताक्षर का अनुग्रह २६ – सत्यस्वरूप क्षरमूर्ति २७- नामक वस्तुपिया २८ - अक्षर के अमृत एवं ब्रह्म भेट २६ - द्विब्रह्म और बड़ा ३० - शुक्रमूर्ति ३१ - प्रतिष्ठा तस्य प्रोर बा ३२ - ' सत् ' अक्षर पोर ' शुक्र ' त्यम् ३३- मूर्ति निर्माण में अक्षर की प्रधानता ३४- अग्नि एवं सोम प्रधान मूर्तियां ३५ - वषट्कार का स्वरूप ३६ वषट्सत्यरूप प्रोंकार ३७- देवसत्यगभित ब्रह्यसत्य ३८ - भोक्ता जीवसत्य एवं साक्षी ईश्वर ३६- ब्रह्म सत्य की पाँचकाएं एवं देवसत्य की बीन कलाएं ४० - यजुः के वाक् - प्राण दो भाग ४१ - सूय्यं में धिषणा और प्राण दो पदार्थ ४२ - चन्द्रमा में प्रज्ञा प्रौर प्राण दो पदार्थ ४३ - पृथिवी में प्राण और भूत वो पदार्थ असूयं चन्द्रमा पृथिवी के पदाथों की बम्यात्म में बता [ २६ ।

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कठोपविषविज्ञान माध्य विषय ४५ - पशु का स्वरूप ४७- प्रणवात्मक ईश्वरप्रजापतिसम्बन्धी ताखिका ४- जीवस्वरूपनिरूपण ४६- ३२३ जीवकलाओं की गणना ५० - जीव- प्रजित स्वतन्त्र कलाएँ ५१ - जीव में बुद्धि और मन के अतिरिक्त ३६ वस्तुएँ ५२ - जीव की सप्तविभूति का निरूपण ५३ - बिद्या एवं कम्मं विभूति का स्वरूप ५५ - वायव्य प्राण - काम - शुक्र नामक विभूतियों का स्वरूप ५८ - जीव की ३५ विभूतियाँ- सम्बन्धी तालिका ५६ - जीव की ८ प्रकार की पाप्माओं का निरूपण ६० - ऊम्म अवस्थापन पाप्मानों का स्वरूप ६१- अविद्या नामक पाप्मा का स्वरूप ६२ - गीता की अविद्या बुद्धि चतुष्टयी ६३ - बन्धत्रय - कर्म विपाक नामक पाप्माओं का स्वरूप ६४ - भोगहेतु प्रपूर्णत्व - संसार नामक पाप्माद्यों का स्वरूप ६५ - जीव की ईश्वरता के प्रतिबन्धक ८ पाप्माएँ ६७ - जीवप्रजापति - ओम् एवं अहम् का उल्लेख ७० - जीव प्रजापति परिलेख ७२ - मन्त्र संख्या १० एवं ११ का तात्पय्यर्थि [ २७ ] पृष्ठ संख्या २०५ २३६ श्री ७ २३८ १३८ १३ ९ १३ ९ RAE १४० २४१ २४२ २४२ २४३ २४३ २४३ III २४५ २४५ २४६ ** २४७ २४७ २४७ २४७ २४८ २४६-२५४ @ I I ३५६ २६६ ४६- घर्द्धमात्रिक प्रमृतभाग एवं ३२४ ईश्वरकलाओं की गणना ५४ - सप्तप्राण - शानेन्द्रियां कर्मेन्द्रियां नामक विभूतियों पर स्वराष्ट ५६ - पृथिवी चन्द्रमा एवं सूय्यं से मिलने वाली पृथक पृथक - विभूतियां ५७ - विज्ञानात्मारूपा बुद्धि और प्रज्ञानात्मारूप मन मोकात्मा की यात्रा में निमित ६६-३९ ४ कलात्मक देवसत्यगभित जीवब्रह्मसत्यात्मक वहं प्रजापति ६८ - ' स सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते पुनः ' कथन का साहस ६६ - अष्टपुरी शब्द का प्रयोग मोक्तात्मा के सन्दर्भ में ७१ - ' भोक्तात्मन: पारायणीयः पन्थाः ' का संस्कृत में सार संक्षेष ७३ - मन्त्रगत ' पर ' शब्द के विभिन्न प्रथों में से प्रथमार्थ पर विचार ७४- चेतनारूपबुद्धि - मन एवं अन का पारस्परिक सम्बन्ध ७५- ' अन्नाधीनं जगत् सर्वम् ' सिद्धान्त की व्यापकता ७६ – ' बुद्धेरात्मा मड्वाय् परः ' मन्त्र की मनुस्मृतिमलोक से अंति

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कठोपनिषद्विज्ञानमय विषय ७७ - महान् के अधीन अव्यक्त ७८- पुररूप प्रव्यक्त के अधीन पुरुष ७६ - महान् एवं पुरुष के साथ ' पर ' शब्द का प्रयोग ८०- परावं मौर अवराधं भेद से विश्व के दो भाग ८१- मन्त्रगत ' पर ' शब्द के द्वितीयाचं पर विचार ८३- से उत्कृष्ट मन ८४ - मन से उत्कृष्ट बुद्धि ८५ - बुद्धि से उत्कृष्ट महान् ८६ - महान् ही विज्ञान का प्रभवन्प्रतिष्ठा- परायण ८७- महान् से उत्कृष्ट बव्यक्त ८८ - अव्यक्त ही महान् का प्रभव - प्रतिष्ठा- परायण ८६ - अव्यक्त से उत्कृष्ट पुरुषतस्त्र ९१- मन्त्रगत ' पर ' शब्द का तृतीयार्थ ६४ - भोक्तात्मा के पारायणमार्ग का प्राधार एवं क्रम ६७ - ज्ञान - किया - वयं को व्यापकता १०० - मोक्तात्मा की कममति इम्यात्म में १०१ - श्रुति प्रमाण से सबोमुक्ति का उल्लेख १०२ - यमराज द्वारा गूढोत्मा की व्यापकता का निरूपण १०३ - ईश्व राष्यय १०४ - जीव प्रजापति १०५ - महामाया और योगमाया १०६ - चतुविष विद्याबुद्धि १०७ - बुद्धि की सूक्ष्मता से निगूढतस्य वर्शन [ २८ ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या : ५६ २५७ २५७ २५७ २५७ २५८ २५८ २५८ २५८ २५८ २५८ २५६ २५६ २५६ २५६ २६० २६० २६० २६१ २६१ २६१ २६२ २६३ २६८ २६५ २६५ २६५ २६६ २६६ २६६ २६६ ८२ - इन्द्रियप्राणचारकरूप अर्थों की इन्द्रियों की अपेक्षा श्रेष्ठता ६० - गीताश्लोक से पुरुषोतम ( उत्तमपुरुष ) की उत्कृष्टता की सिद्धता ६२ -- भोक्तात्मा में अर्थरूप भूतमात्राएं ही इन्द्रियों से आगे ( ऊपर ) प्रतिष्ठित ६३ - ' इन्द्रिय- प्रज्ञान - विज्ञान महान् अव्यक्त ' इनसे ऊपर पुरुष ९ ५ मन्त्र संख्या १० एवं ११ की गीताश्लोक ( ३ / ४२ ) से समन्वय ६६ - उपनिषत् श्रुति एवं मीताबचन में धाए भेद का परिहार ६८ - गीताश्लोक ( ३ / ४२ ) में प्रज्ञा - प्राण - भूत का समन्वय E- भोक्तात्मा की क्रमगति माघिदेविकमण्डल में

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय ५- भोक्तुः पारायणीयो योगक्रमः १३ से १५ मन्त्रपय्र्यन्त ) १ - योगदर्शन एवं योगविद्या २ - यमतत्व एवं भ्रात्मतत्त्व ३ - त्रिणाचिकेता एवं वैश्वानर श्रग्नि ४ - अमृत एवं मृत्युतस्व ५ - योग सिद्धि प्राप्ति में मुख्य उपाय ६ - मन - बुद्धिचित्त- महंकार का स्वरूप ७- योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ' सूत्र का स्पष्टीकरण ८- ' तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ' -सूत्र का अर्थ E - ' वृत्तिसारूप्यमितरत्र ' सूत्र का अर्थ १०- ' वृत्तयः पञ्चतय्यः विमष्टा क्लिष्टाः ' सूत्र का अर्थ ११- ' प्रमाण ' वृत्ति का लक्षण १२- ' विपय्यय ' वृत्ति का लक्षण १३ - ' विकल्प ' वृत्ति का लक्षण १४ - ' स्मृति ' इति का लक्षण १५- ' निद्रा ' वृति का लक्षण १६- पांचों वृत्तियों के स्वतन्त्र लक्षण १७- पांचों वृत्तियों के पात असयोगानुसार लक्षण १८ - अभ्यास एवं वैराग्य से चित्तवृत्तियों में स्थिरता १६- मन की चलता का निग्रह २०- ओकःसारी मन २१ - ' तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ' सूत्र का भयं २२- स तु दीर्घकालने रन्तय्यं सत्कारा ० ' इत्यादि सूत्र का वर्ष २३ - अभ्यास एवं वैराग्य के लक्षण २४ - ' दोषदर्शन ' की परिभाषा २५- ' तीव्र संवेगानामासन्नः ' सूत्र का स्पष्टीकरण २६ - ' ईश्वरप्रणिधानाद्वा ' सूत्र का अर्थ २७ - गीता का अन्तिम ' उद्धारोद्धार ' प्रकरण २८ - गीता प्रतिपादित ' सर्वगुह्यतमम् ' मार्ग २६ - ' ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ' सूत्र का अर्थ ३० - मोक्तात्मा का योग से सम्बन्ध [ २ ९ ]