कठोपनिषद — पृष्ठ 121–130
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
पृष्ठ 121
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा बल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् लेने पर सचमुच सारी सम्पत्ति प्राप्त हो सकती है । बस, इसीलिए- ' सर्वान् कामरथम्यतः प्रार्थयस्थ'-यह कहा है । इस प्रकार यमराज ने नचिकेता को बहुत सा प्रलोभन दिया, परन्तु वाह रे नचिकेता! तेरी कहाँ तक प्रशंसा की जाए! जिस सम्पत्ति के लिए मनुष्य तरसा करते हैं- जीवनभर उसकी आशा में बिता देते हैं- उस सम्पत्ति को नचिकेता लात मारकर अलग कर देता है । श्रुति कहती है कि है मनुष्यो! तुमने समझ रखा होगा कि सांसारिक पदार्थ सुखकर हैं । परन्तु तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि आत्मज्ञान के सामने त्रैलोक्य का सुख पासंग मी नहीं है, अतएव इस भूल भूलय्या से बचकर तुम्हें बालक नचिकेता की तरह प्रात्मजिज्ञासा में ही अपना जीवन लगा देना चाहिए । यमराज के दिए गए प्रलोभनों के उत्तर में बालक नचिकेता क्या कहता है? जरा हृदय पर हाथ रखकर सुनिए—
" श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्त के तत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
श्रपि सर्व जीवितमल्पमेव तथैव वाहास्तव नृत्यगीते " ॥२६ ॥
यमराज ने जिन सांसारिक भोगसामग्रियों को नचिकेता के सामने रखा था उनके लिए धीर नचिकेता ' श्वोमाषाः ' - प्रयोग करता है जो कि सवा सौलह आना यथार्थ है । नचिकेता कहते हैं कि हे यमराज! जिन पुत्र, पौत्र, हिरण्य, भूमि, साम्राज्य प्रादि का मापने मुझे प्रलोभन दिया है- वे सारे भाव शाश्वत नहीं हैं - मपि तु ' श्वोभाव ' हैं । कल भी वे पदार्थ रहेंगे या नहीं इसमें सन्देह है । कल तो दूर है - दूसरे ही क्षण में न मालूम क्या का क्या हो जाता है? - जैसा कि हम संसार में भाए दिन देखते हैं । आपके भावों का तत्त्व ' श्व ' है । अर्थात् उनकी सत्ता कल तक भी रहेगी या नहीं इसमें सन्देह है । मला ऐम क्षणिक पदार्थों की कोन बुद्धिमान् इच्छा करेगा? अपि च - हे अन्तक! जिन अप्सराओं को भांप रमण का साधन बतलाते हैं वे इस मरणधर्म्मा मनुष्य की इन्द्रियों के तेज को दिन - दिन नष्ट हीं करती हैं । प्राप कहते हैं- अप्सराएं रामा हैं- मैं कहता हूँ - प्रप्सराएं ( त्रिएं हो ) मनुष्य की युवावस्था को नष्ट कर उन्हें जरावस्था में डाल देती हैं । अपि च - हे यमराज! ( आपने कहा है कि तू जितने दिन जीना चाह जी ले मैं तुझे इच्छानुसार प्रायु देने के लिए तय्यार हूँ- इसके उत्तर में मुझे यही कहना है कि ) पूर्णा भी मनुष्य के लिए बिलकुल थोड़ी हैं । यदि ब्रह्म की प्रायु का विचार किया जाए तो भी वह कुछ नहीं । यों तो १० वर्ष जीवित रहने वाले की अपेक्षा १०० वर्ष जीने वाला अधिक जीता है, परन्तु उस मृत्युतत्त्व के सामने ब्रह्मायुर्भोगपर्य्यन्त जीने से भी तृप्ति नहीं होती । फिर भी ' अधिक जीते तो अच्छा था यह कामना बनी ही रहती है । मला जो प्रायु सदा अल्पभाव से माक्रान्त रहती है उससे भूमा भाव की प्राशा कोन बुद्धिमान् रख सकता है? अतः ( मैं तो मापसे यही प्रार्थना करूँगा ) - जिन रथों को जिन नृत्यगीतों को प्राप मुझे देना चाहते हैं वे आपके ही पास रहें । वे आप ही को मुबारक हों । अपि च- इसका तात्पर्य दूसरा यह भी है कि जिन भोगों को आपने मेरे सामने रखा है - वे सब आपके वाहन हैं - अर्थात् सत्र पर ग्राप सत्रार हैं । सब मृत्यु -विनाश से आक्रान्त हैं । सारे नृत्य - गीत प्रापके नौकर हैं । आपकी [ ८२ ]
पृष्ठ 122
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् कृपा जब तक रहती है तभी तक नृत्य - गीत हैं, प्रन्यया सर्वत्र अन्धेरा है । ऐसी अवस्था में इन शाश्वत भावों को कौन लेना पसन्द करेगा? मन्त्रगत ' अन्तक ' सम्बोधन बडा चमत्कार रखता है । नचिकेता कहता है कि आप ' अन्तक ' है । आपकी कृपा से संसार में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं जिसका अन्त न होता! हो । आप ही सबका मन्त करने वाले हैं । नचिकेता कटाक्ष करता है कि जब आप स्वयं सबका नाश करने वाले हैं - भापकी दृष्टि में संसार के यच्चयावत् वैभव जब विनाशोन्मुख हैं तो समझ में नहीं माता कि ऐसी वयस्था में बाप इन श्वोभावों से मेरा हितसाधन क्योंकर समझते हैं? aft - नचिकेता उसी दृढता पर दृढ रहता हुआ फिर कहता है कि हे यमराज! -" न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमान चेया । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७ ॥
यहाँ तो नचिकेता ने गजब ही कर दिया । सब ओर से यमराज के बोलने का मानं बंद कर दिया है । नचिकेता कहता है कि ( है यमराज! आपने जो यह कहा कि - तू मनचाहा बन खोर मन-चाही प्रायु मांग ले- इसके उत्तर में मैं प्रापसे यही कहना चाहता हूँ ) मनुष्य वित्तपम्न से कभी श्री तर्पणीय नहीं है ( अर्थात् धन से मनुष्य की तृष्णा माप कभी भी शान्त नहीं कर सकते ) शोक के वृषि देखते हैं कि जिसके पास भर्ब रुपया है वह उससे मी अधिक प्राप्त करना चाहता है । मुझे नहीं चाहिए - यह तृप्तिमय प्रक्षर किसी के मुंह से नहीं निकलते । जब जान यह बानते है कि बमध्ये मनुष्य की तृप्ति नहीं की जा सकती तो फिर उस तृष्णामयभाव को मानने के लिए मुझे क्यों प्रेरित करते है एवं आपने जो कहा कि तू! अधिक आयु मांग ले- इसका उत्तर में पहले ही दे चुका हूँ जो दवा छा की है वही घायु की है । दोनों ही सतृष्ण पदार्थ हैं । कदाचित् कहो कि पन और कुड़ी वो परमार्थ का साधन हैं - विना इनके परलोकार्थं विद्यार्जन भी तो नहीं किया जा सकता । अतः तुके दोनों की यात्रा करनी चाहिए । इसके उत्तर में मुझे यही कहना हैं कि हो वास्तव में दोनों की बुके वश्यकता है, परन्तु इसके लिए मुझे वरदान मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है । नयी पो प्राप्त करके मैं यथेच्छ वित्त प्राप्त कर लूंगा एवं जब तक आप याम्य पद पर प्रतिष्ठित रहेंगे तब तक मैं निःशंक होकर जीवित भी रह सकूंगा । नचिकेता का अभिप्राय यही है कि जैसे कोतवाल के बोस्ट को प्रथवा नौकर को कैद होने का डर नहीं रहता एवं ' सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का बॉली किवदन्ती के अनुसार. जैसे उसका नौकर निडर हो जाता है वैसे ही विना किसी प्रयास के ही नचिकेता को मृत्यु का डर नहीं है । मृत्यु के अविष्ठाता तो यमराज ही हैं एवं सारी सम्पत्ति भी पूर्व के मतानुसार उन्हीं के वाहन हैं । भला वे अपने प्रिय शिष्य को क्यों मारेंगे एवं क्यों उसे दरिद्री रखेंगे? विना मांगे सुसम्पन्न स्वामी का सेवक क्या भूखा प्यासा रहता है? कभी नहीं । तथैव प्राज नचिकेता कहता कि जब तक आप मौत के सिहासन पर विराजमान हैं तब तक मुझे न मोत का डर हैम बन की है - आपको प्राप्त करने वाले मनुष्य की दोनों आवश्यकताएँ अपने प्राप पूर्ण हैं | मला ऐसी अवस्था में [ ५३ ]
पृष्ठ 123
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कौन बुद्धिमान् अपने एक वर को व्यर्थ खोवेगा । प्राप से तो वही वर माँगना चाहिए जिसे भाप अपनी इन्द्रा में देना नहीं चाहते । वह है - मरणसम्बन्धी प्रश्न । अतएव मेरा वरणीय वर तो वही वर है । श्रायुवृद्धि और वित्तलाभ तो मुझे स्वतः ही प्राप्त हैं - इसके लिए वरदान माँगना व्ययं है । श्रपि च - हे यमराज! ---" श्रजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः षषषःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्ण रतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेस " ॥ २८ ॥
नचिकेता कहता है कि है यमराज! जरामरणरहित दिव्यदेवताबों का सान्निध्य प्राप्तकर के मनुष्य को चाहिए कि वह उससे वित्तादि क्षणिक वस्तुओं की अपेक्षा किसी उत्कृष्टतस्व की ( जिससे कि प्रात्मोद्धार होता हो ) याच्ञा करनी चाहिए । ( कदाचित् कहो कि यदि वित्त में दोष हो तो संसार के मनुष्य क्यों व्यर्थ ही उसके लिए प्रयास करते हैं? क्योंकि सारा संसार संपत्ति की भोर झुका हुआ है, प्रतएव मानना पड़ता है कि इसकी याच्ञा श्रावश्यक है । इसका उत्तर देती हुई भुति कहती है कि ) जरामरणधर्म से युक्त मत्यं प्राणी ( मनुष्य ) जानता हुआ इस पृथिवी लोक में रहता हुषा जरामरणभावापन्न पदार्थों को कैसे मांग सकता है? द्यो के नीचे अन्तरिक्ष है । अन्तरिक्ष के नीचे पृथिवी है, मतएव इन दोनों की अपेक्षा भूलोक ( पृथिवीलोक ) अध: है | मनुष्यमात्र यहीं रहते हैं एवं गारी विभूतियाँ भी इसी पर रहती हैं । विभूतियों का और इसका समान दर्जा है । ऐसी अवस्था में जरामरणशून्य देवता को प्राप्त करके ऐसा कौन विवेकी है जो उसी अधोलोक की - प्रथम वस्तुओं की अपेक्षा करेगा । अर्थात् विवेकशून्य मनुष्य ही संपत्ति पर मरा करते हैं । जो विदेकी हैं- ज्ञानी हैं - वे कभी ऐसी तुच्छ वस्तुओं की आकांक्षा नहीं करते । वे तो आप ( यमराज ) जैसे अमृत मावापन्न देवताओंों को प्राप्त कर अमृतत्व को ही प्राप्त करने का प्रयास करेंगे । अपि च - हे यमराज! ( रामाओं के जिन संगीत: रति तज्जन्यसुखादि का आप वर्णन कर मुझे लुभाना चाहते हैं ) जरा विचार करने वाला कीन विचारशील मनुष्य सूक्ष्मदृष्टि से वर्ण ( संगीत ), रति ( क्रीडा ), प्रमोदों ( तज्जन्यसुख ) का विचार करता हुग्रा इन प्रतिदीर्घ जीवन में रमण करेगा? अच्छे हैं । परन्तु ' अतिपरिचयादवज्ञा ' के अनुसार सभी का अवश्य ही जीव ऊब जाता है । प्रारम्भ में कुछ क्षणों के कालान्तर में यही सामग्री विषरूप में परिणत हो संगीत, क्रीड़ा, प्रमोद, जीवन सभी परिणाम दुःख है । इन सब ही से एक दिन लिए अवशर ही इनमें श्रानन्द आता है, परन्तु जाती है । तात्पर्य यही है कि जैसे एक राजा को पाकर दरिद्री मनुष्य एक कपड़ा पहनने के लिए मांगता है वैसी ही दशा उसकी है जो अमृतमावापन देवता को प्राप्त कर उससे मत्यं सांसारिक पदार्थ मांगता है उससे अधिक और कौन मूर्ख होगा? नचिकेता कहता है कि प्रापके पास भाकर भी यदि मैं सासारिक वैभवों की याच्या करूँ तो मेरे सिवाय अधिक मूर्ख भौर कौन होगा? अतः मुझे आपसे बही [ ८४ ]
पृष्ठ 124
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिष द्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् माँगना चाहिए जो मरणघमं से रहित हो । मन्त्रगत - ' जोयंन् ' - ' क्वषःस्थः ' - ' मर्त्यः ' - ' प्रजानन्'-' अभिध्यायन् ' - आदि शब्दों से यही भाव प्रकट होता है । यमराज प्रजीयं एव प्रमृत है - अर्थात् जरामरणरहित है । इधर नचिकेता जरामरणयुक्त होने से जीयं एवं मर्त्य है । इधर सांसारिक वैभव भी जीयं एवं मर्त्य है अर्थात् विनाशी है । जो दर्जा मनुष्य का है - वही वैभव का है दोनों ही क्वधःस्थः ( अधोलोक में पृथिवी ) हैं । ऐसे नचिकेता ने उस प्रजीर्यामृत के पास पहुँचकर यदि अपने समान दर्जे का वैभव मांगा तो क्या माँगा - कुछ नहीं माँगा । वहाँ जाकर यदि उसने अमृत मांगा तो उसका कल्याण है अन्यथा अकल्याण है । परन्तु ऐसी बुद्धि सभी को नहीं होती - जो ज्ञानवान् होता है- विवेकी होता है - वही सांसारिक वैभव के लात मारकर ममृतत्व की ओर झुकता है । बस, इसी बात को बतलाने के लिए ' प्रजानन् ' कहा है । परन्तु ' प्रजानन् ' वही हो सकता है जो कि ' प्रभिध्यायन् ' है । यों सामान्यदृष्टि से देखने पर सांसारिक वैभव सुखप्रद ही दिखलाई पड़ते हैं । परन्तु जब मनोयोगपूर्वक उनका प्रन्तस्तल ढूंढा जाता है तो उनकी निस्सारता भलीभाँति से सिद्ध हो जाती है । ऐसी अवस्था में वह इस प्रेय की अपेक्षा श्रेय को अपनाने में ही अपना श्रेय समझता है । श्रुति शिक्षा देती है कि तुम्हारे सामने एक तरफ तुम्हारे अन्तःकरण में ही बैठा हुआ प्रमृतस्वरूप प्रात्मतत्त्व है एवं एक तरफ चकाचौंध में डालने वाले क्षणिक सुखप्रद ससार के वैभव हैं- दोनों सामने हैं । तुम्हारा कर्तव्य है कि ऐसी अवस्था में तुम दोनों के परिणाम पर बिचार करो । खूब सोचो । खूब सोचो । तुम्हें स्वयं कौन हेय है - कौन उपादेय है? इसका पता लग जाएगा । इस प्रकार यमराज के दिखाए हुए प्रलोभनों का युक्तियुक्त उत्तर देकर अन्त में अपनी उसी प्रतिज्ञा पर ढ रहता हुधा नचिकेता कहता है-“ श्रजीर्यताम मृतानां ( सांनिध्यम् ) उपेत्य - ( वित्तादिभ्यः अन्यदेव - श्रात्मनः उत्कृष्टं ) प्राप्तव्यम् । क्वधःस्थः जीर्यन् मर्त्यः प्रजानन् ( वित्ताविक न वृणीते ) । वर्णरतिप्रमोदान् प्रभिध्यायन्- प्रतिदीर्घजीविते कः ( मतिमान् ) रमेत । न कोऽपीत्यर्थः ) " ॥ " यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्सांपराये महति ब्रूहि नस्तत् ॥ योऽयं बरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२६ ॥
नचिकेता कहता है कि हे यमराज! ( मैंने आपके बतलाए हुए वैभवों की निस्सारता भलीभाँति समझ ली है, अतएव भाप मुझे अधिक प्रलोभन में मत डालिए - अपि तु ) परलोक के विषय में - वह श्रात्मा है या नहीं? इस रूप से दार्शनिक लोग विचार योग्य जिस आत्मा का विचार करते हैं - उस बडे भारी प्रयोजन के निमित्त आप उसी आत्मनिर्णयसम्बन्धी विज्ञान का प्रतिपादन कीजिए । ( अधिक [ ८ ]
पृष्ठ 125
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कहना व्यर्थ है ) प्रापको यह विश्वास कर लेना चाहिए कि जो प्रतिगहन तीसरा वर आपसे नचिकेता ने मांगा है - स्वप्न में भी नचिकेता उससे अन्य वर मांगने के लिए तय्यार नहीं है । नचिकेता अपने उसी प्रतिज्ञा - बरातल पर प्रतिष्ठित है । दिशा में यमराज नचिकेता का स्वागत करता है । उसी दशा में नचिकेता तीन वर माता है । पहले बर से गौतम की कोष शान्ति मांगता है । दूसरे से चयनाग्निस्वरूप ज्ञान मांगता है । ate रे से परलोक जाने वाले बात्मा का स्वरूप जानना चाहता है । तीनों में से दो का उत्तर तो यमराज सहषं देते हैं । परन्तु तीसरे वरदान देने से पहले वे नचिकेता की परीक्षा करते हैं । नचिकेता डी खूबी के साथ परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है एवं अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ रहता है । बस, ' प्रथमा वल्ली '
में यही बतलाया गया है ।
॥ इति प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली ॥
१ - * --[ ५६ ]
पृष्ठ 126
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अथ प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली २
पृष्ठ 127
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथ कठोपनिषद-प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली धन्योऽन्यदुतं प्रेयस्ते उमे नानार्थे पुरुष सिनीतः । तयोः श्रेय प्राददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥१ ॥
श्रेयश्व प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति घोरः ॥ श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणोते प्रेयो मन्दो योगक्षेमावृणीते ॥२ ॥
सत्वं प्रियाप्रियरूपाश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ नतो सङ्कां वित्तमयोमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
दूरमेते विपरीते विषूची श्रविद्या या च विद्येति ज्ञाता | विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्या कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ॥ इन्द्रम्य-मारणा: परियन्ति मूढा प्रन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः || ५ || न सांपरायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ॥ अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥६ ॥
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न बिधुः ॥ श्राश्वर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७ ॥
न नरेगाबरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ॥ अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यरणीयान्ह्य तयं मणुप्रमाणात् ॥ ६ ॥
नैषा तर्केर मतिरापनेया प्रोक्तान्येनॅब सुज्ञानाय प्रेष्ठ || यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वाङ् नो भूयानचिकेतः प्रष्टा ॥६ ॥
[ 5 ]
पृष्ठ 128
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् जानाम्यहँ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ॥ ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
कामस्याप्ति जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ॥ स्तोममहगुरु-गायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या घोरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥११ ॥
तं दुर्वां गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ॥ श्रध्यात्मयोगाधि-गमेन देवं मत्वा धोरो हर्षशोको जहाति ॥। १२ ॥ एतच्छ्र ुत्वा संपरिगृह्य सत्यंः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ॥ स मोदते मोहनीय ँ हि लब्ध्वा विवृत ँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥
प्रत्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ॥ अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपास सर्वाणि च यद्वदन्ति ॥ यविच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ॥ एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥१६ ॥
एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ॥ एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१७ ॥
न जायते म्रियते वा विपश्चिनायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ॥ प्रजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ॥ उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१ ९ ॥ अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् ॥ तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२० ॥
[. ]
पृष्ठ 129
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ॥ कस्तं मदामदं देवं मबन्यो ज्ञातुमर्हति ॥२१ ॥
अशरीर ँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥२२ ॥
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ॥ यमेबंध वृणुते तेन लभ्यस्तत्येष म्रात्मा विवृणुते तनू ँ स्वाम् ॥२३ ॥
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ॥ नाशान्तमानसो बापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥२४ ॥
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत श्रोवनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥२५ ॥
॥ इति मूलपाठः ॥ [ १ ]
पृष्ठ 130
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथ प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली [ विज्ञानभाष्य ] यमराज से नचिकेता ने प्रश्न पूछा- यमराज ने उत्तर देने से पहले पूर्णरूप से उसकी पात्रता की परीक्षा कर ली । उन्हें विश्वास हो गया कि नचिकेता सचमुच इस विद्या के लिए उर्वरा भूमि है, अतएव जो यमराज अब तक नचिकेता को प्रेयस्वरूप सांसारिक वैभवों का प्रलोभन देकर श्रम तक चक्कर में डाल रहे थे वे ही उसे परीक्षा में उत्तीर्ण देखकर उसी के भावों की पुष्टि करते हैं । नचिकेता ने सूत्ररूप से जिन सांसारिक वैभवों का तिरस्कार किया था एवं उनको पतन का कारण बतलाया था - भाज यमराज स्वयं उन्हीं बातों का विस्तार से निरूपण करते हैं । यमराज
कहते हैं-" अन्यच्छेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उमे नानार्थे पुरुष सिमीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति होयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते " ॥१ ॥
" श्रेयः श्रन्यत् उत - श्रन्यदेव प्रेयः । ले उमे ( प्रेयः श्रेयसी ) नानार्थे ( भिप्रयोजने सतो ) पुरुषं सिनीतः ( बध्नीतः ) । तयोः श्रेय नाबदानस्य ( पुरुषस्य ) साधु भवति । य उ ( पुनः ) प्रेयो वृणीते ( सः ) प्रर्थात् ( पारमार्थिकात् प्रयोजनात् ) होयते " - इति ॥ " श्रेय भिन्न वस्तु है एवं प्रेय पुरुष को चारों ओर से घेर लेते हैं । अन्य ही वस्तु है । यह श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्नार्थक होते हुए इन दोनों में से श्रेय लेने वाले पुरुष का कल्याण होता है एवं जो ( अविवेकी मूर्ख मनुष्य ) प्रेय का संवरण ( ग्रहण ) करता है - वह पारमार्थिक प्रमृततत्त्व से गिर ( होन हो ) जाता है " । संसार के यच्चयावत् पदार्थ श्रेय प्रेय - श्रेयप्रेय- इन तीन भागों में विभक्त हैं । कितने ही पदार्थ श्रेयस्कर हैं, कितने ही पदार्थ प्रेयस्कर हैं एवं कितने ही उमयविष हैं । जिन पदार्थों से मनुष्य घबराते हैं, किन्तु परिणाम जिनका उत्तम है - वे ही पदार्थ श्रेयस्कर कहलाते हैं एवं जिनमें मनुष्य बड़े आनन्द के [ ६३ ]