कठोपनिषद — पृष्ठ 131–140

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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प्रवाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् साथ प्रवृत होते हैं, परन्तु जिनका परिणाम बडा भयङ्कर होता है - वे ही प्रेयस्कर कहलाते हैं एवं जिनमें मनुष्य मानन्द से प्रवृत्त भी होता है एवं जिनका परिणाम मी अच्छा होता है ऐसे पदार्थ उभयविध कहलाते हैं । निम्बादि क्वाथ, कुनैन मिक्चर, चिरायता आदि आदि अनेक औषधियां ऐसी हैं जिनका नाम सुनते ही शरीर कम्पित हो जाता है । शय्यावस्थित रोगी को हमारे खयाल से इन कटुत भौषधियों का यमराज से कम डर नहीं लगता होगा । बडी कठिनता से रोगी के मना करने पर भी वैद्य उन महौषषियों को उसके गले में डाल देते हैं । परन्तु परिणाम इनका वडा ही अच्छा होता है, area हम ऐसी जाति के यच्चयावत् पदार्थों को श्रेयस्कर कहने के लिए तय्यार हैं । सारे मादक पदार्थ, ( वायाषिवाले पुरुष के लिए ) इमली आदि वातज पदार्थ, प्रारम्भ में बडे मच्छे लगते हैं । रोगी के लिए रोटी घातक है, परन्तु वह उसके लिए मर रहा है । एवमेव स्त्री - प्रसंग आदि - आदि और भी जितने विषय जिनमें कि मनुष्य स्वभावतः प्रवृत्त होता है - सब प्रेयस्कर हैं, क्योंकि इनका परिणाम बडा भयङ्कर है एवं कितने ही पदार्थ ऐसे हैं जो श्रेयस्कर भी हैं एवं प्रेयस्कर भी हैं । दुग्ध, घृत, मीठी औषधियाँ आदि अनन्त पदार्थ उभयविष हैं । श्रेयस्कर को लोकभाषा में ( संस्कृतभाषा में ) हितकर कहा जाता है, प्रेयस्कर को रुचिकर कहा जाता है । कितने ही पदार्थ हितकर ही हैं । कितने हो दचिकर ही हैं एवं कितने ही समयविध हैं । इन तीन विभागों के अलावा सांसारिक पदार्थों में और कोई चोथा विभाग हो ही नहीं सकता । इन तीनों में हितकर एवं उभयविध से भ्रात्मा और शरीर दोनों का कल्याण है, अतएब इस उभयविध विभाग का श्रेय में ही अन्तर्भाव कर लिया जाता है एवं केवल रुचिकर से म्रात्मा का सर्वथा अकल्याण एवं शरीर का पंणतः प्रकल्याण होता है । वस्तुतस्तु रुचिकर से सर्वात्मना दोनों का ही ( शरीर और धारमा का ) अकल्याण है । ये दोनों ही सांसारिक पदार्थ हैं, प्रतएव संसार में रहने वाले मनुष्य पर दोनों का प्राक्रमण होता है । जो विवेक श्रेय का ग्रहण करता है वह ऐहलौकिक सुख प्राप्त करता हुआ परलोक में निःश्रेयस सुख प्राप्त करता है एवं जो अविवेकी प्रेय की तरफ झुकता है-वह खड्डे में गिरता है । इस विषय में प्रसंगागत हम दो अक्षर और कहना चाहते हैं । कितने ही माचाय्यं श्रेय का मुक्ति से सम्बन्ध समझते हैं एवं प्रेय का बन्धन से सम्बन्ध समझते | परन्तु ऐसा नहीं है । यहाँ श्रेय - प्रेय दोनों का संसार के पदार्थों से सम्बन्ध है । यद्यपि फल की दौड़ मुक्ति प्रर बन्धन तक है, तथापि प्रयोग-काल में दोनों का सांसारिक पदार्थों से ही सम्बन्ध है । जिन सांसारिक पदार्थों के लिए मनुष्य - ' दुनिया में धच्छी भी खोज है- बुरी मी चीज हैं - यह कहा करते हैं- उन्हीं के लिए यहाँ श्रेय और प्रेय शब्द दिया है । सी चीज श्रेय है- बुरी वस्तु प्रेय है । अच्छा करने वाला सुख पाता है - बुरा करने वाला, बुरी बातों को अपनाने वाला दुःख पाता है । इसी के लिए यहाँ ' साघु मवति होयते ' कहा है । यदि यहाँ मोक्ष अभिप्रेत होती तो - ' साधु मवत ' के स्थान में - ' अमृतत्वं च विन्दति ' - प्रादि वाक्य होते । मच्छे के लिए ' साधु ' कहा जाता है । बुरे के लिए ' होन ' कहा जाता है । यह साधारण व्यावहारिक बोली है । इसका मुक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है । कोई महानुभाव इस श्रुति को मुक्तिपरक न समझ बैठे, अतएव श्रुति ने ' साधु ' है और ' हीयते ' कहा है । हितकर पदार्थों को अपनाने वाला सुखी रहता है । एवं रुचिकर पदार्थों को अपनाने वाला दुःखी रहता है- मन्त्र का यही सीधा और सच्चा श्रयं है । अपि च-इसका निम्नलिखित दूसरा अर्थ भी किया जा सकता है: -[ ६४ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् पूर्व के अर्थ में हमने सांसारिक पदार्थों को तीन विभागों में बांटा था - अब उन सबका एक ही विभाग समझते हैं । संसार के यच्चयावत् पदार्थ समानधर्म्मा हैं । सभी श्रेय हैं और सभी प्रेय हैं । प्रत्येक पदार्थ में दोनों हैं । दोनों एक - दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं, एवं दोनों अविनाभूत हैं । पूर्व के अर्थ में जिन निम्बादि क्वाथादि को श्रेयस्कर बतलाया था वे ही प्रेयस्कर भी बन सकते हैं एवं जिन मादक द्रव्यादि को प्रेयस्कर बतलाया था वे समय पर श्रेयस्कर बन सकते हैं, अतएव हम सभी को हितकर और after कहने के लिए तय्यार हैं । जो संखिया नीरोगावस्था में अहितकर है - वही रुग्णावस्था में हितकर है । जो प्रासव ब्राह्मणत्व का विनाशक है - वही आपत्तिकाल में ब्राह्मणत्व का रक्षक है । जो स्त्रीप्रसंग बुरा है - वही संसार के स्वरूप का कारण होने से हितकर है । ग्रीष्मऋतु में जो ऊनी वस्त्र सर्वधा महितकर हैं-शीतऋऋतु में वे ही प्रत्यन्त हितकर हैं । इस प्रकार समय भेद से सभी श्रेय हैं, सभी प्रेय हैं । दोनों बिलकुल विरुद्ध है, परन्तु दोनों साथ रहते हैं क्यों? उत्तर स्पष्ट है । सृष्टिकर्त्ता प्रभ्ययेश्वर विद्याकर्म्मात्मिक है । श्रेय का विद्या से सम्बन्ध है - प्रेय का कम्मं से सम्बन्ध है । दोनों में दोनों हैं । श्रेयोदृष्टि से ली गई घौषधि का रस भाग श्रेय है, माकसभाग प्रेय है । रस में भी प्राण भाग श्रेय है- रसभाग प्रेय है । इस प्रकार प्राप प्रन्तस्तल तक खोजते जाइए - आपको ये ही दो वस्तु अनुस्यूत मिलेंगी । इसी आधार पर-' गुणदोषमय सवं स्रष्टा सृजति कौतुको - कहा जाता है । जो सभ्यता उस देश के जलवायु के अनुकूल होने से उस देश के लिए श्रेय है - वही अन्य देश के लिए प्रेय है । बस, निदर्शनमात्र है । आप सर्वत्र प्रत्येक में इन दोनों भावों को ओत - प्रोत पाएँगे । मनुष्य के सामने जो भी पदार्थ प्राता है उसमें दोनों हैं । दोनों इसे अपने बन्धन में लाते हैं । परन्तु यह उसी समय देख लेता है कि इस दृष्टि से यह श्रेय है-इस दृष्टि से प्रेय है । बस वह विवेकी श्रेयो दृष्टि को अपना कर कल्याण का मागी बन जाता है । वही डाक्टर निमूनिए के रोगी को ब्राण्डी पिला कर उसके जीवन की रक्षा कर लेता है एवं उसी से एक मूर्ख मनुष्य अपना जीवन खो बैठता है । इसीलिए महर्षि शिक्षा देते हैं कि तुम्हारे उपयोग में आने वाले पदार्थों में श्रेय और प्रेय दोनों हैं । तुम्हें चाहिए कि तुम श्रेय को ले लो, प्रेय को छोड दो - इसी तुम्हारा कल्याण है- धन्यथा पतन है । भब सवाल रह जाता है यह कि श्रेयभाग कोनसा मोर प्रेयभाग कौन सा? इसका यदि " जो श्रात्मा प्रौर शरीर का हित करता वह श्रेय है एवं जो इन दोनों का अहित करता हो - वह प्रेय है " -यह उत्तर दे दिया जाता है तो फिर कौन आत्मा शरीर के लिए हितकर है एवं कौन महितकर है? इसका उत्तर है - धर्मशास्त्र और आयुर्वेदशास्त्र | महर्षियों ने हजारों लाखों वर्षों के परिश्रम से अपनी योग- दृष्टियों से प्रत्यक्ष करके दोनों के हिताहित का मलीमति निर्णय कर दिया । उनके निर्णय को तब तक कोई दूषित बतलाने का अधिकार नहीं रख सकता जब तक कि उस अन्तिम सीढी पर नहीं पहुंचता श्रतएव हमारा कर्तव्य है कि महर्षियों ने जो श्रेय प्रेय की व्यवस्था की है उसे मानें एवं उसके अनुसार आचरण करें- इसी में हमारा कल्याण है । शरीर के लिए कौन हितकर है? कौन अहितकर है? - इसके लिए आयुर्वेदशास्त्र की शरण लेनी चाहिए एवं आत्मा के लिए कौन हितकर है? एवं कौन अहितकर है? - इसके लिए धर्मशास्त्र की शरण में जाना चाहिए । दोनों शास्त्र हेयोपादान का उपदेश देते हैं । सारे हिन्दुशास्त्र श्रेय के ग्रहण का एवं प्रेय के परित्याग का इन दो बातों का उपदेश [ ६५ ]

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नाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विश्वानिरूपणोपनिषत् देते हैं । वे कहते हैं कि हमारे में दोनों हैं । तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उसमें से श्रेय को छाँट लो - प्रेय को खोड दो । ' यान्यस्माक सुचरितानि तानि स्वयोपास्यानि, नो इतराणि ' ' - के अनुसार ही चलने में हमारा कल्याण है | श्रुतिगत ' अस्माकम् ' को पदार्थमात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । प्राज जो संसार में मशान्ति बढ रही है उसका एकमात्र कारण है - पूर्वोपदेश की उपेक्षा । शास्त्रों पर गाली-प्रहार कर आधुनिक जगत् मनमाने मार्ग निकाल कर अशान्ति को सहायता पहुंचा रहा है । उसका कहना है कि शास्त्र बनाने वाले भी तो हमारे जैसे मनुष्य ही थे । हम कहते हैं - अवश्य । श्रायुर्वेदशास्त्र को बनाने वाले भी तो मनुष्य ही थे । भला, उन पर आप कैसे विश्वास कर लेते हैं? अमुक रोग में प्रमुक औषधि प्रयोग से शान्ति मिलेगी - इस आदेश को सत्य मानने का द्वार सिवाय शब्दप्रमाण के आपके पास कौनसी कसौटी है? संसार के लाखों काम - लाखों ही नहीं सभी कार्य्यं शास्त्र के प्राधार पर

ही होते हैं - इसीलिए तो भगवान् --" यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि " ॥ ' कह कह कर शास्त्रोपदेश को ही एकमात्र कल्याण का कारण समझते हैं । बस इन्हीं सारे afort start लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है कि यदि तुम प्रपना कल्याण चाहते हो तो शास्त्रा-नुसार श्रेय प्रेय दोनों में से श्रेय का ग्रहण करो, प्रेय का परित्याग करो । यमराज का यहाँ यह कहने का अभिप्राय यही है कि हे नचिकेता! मैंने तुझे प्रेय में डालने का बहुत प्रयास किया, परन्तु तूने श्रेय को ही अपनाया, अतएव तेरा कल्याण प्रवश्यंभावी है -सामान्यरूप से श्रेय प्रेय का स्वरूप बतला कर दोनों के अधिकारियों का स्वरूप बतलाते हुए

यमराज कहते हैं-" श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तो संपरीत्य विविनक्ति धीरः ।

श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते " ॥२ ॥

श्रेय और प्रेय दोनों मनुष्य पर आक्रमण करते हैं । दोनों में एक अच्छा है एक बुरा है । पुरुष दोनों के ग्रहणाग्रहण में स्वतन्त्र है । वह चाहे जिसे ले सकता है चाहे जिसे छोड सकता है । अपने प्रापके लिए कोई बुरा नहीं चाहता - फिर क्या कारण है कि संसार की स्वभावतः रुचिकर पदार्थों की मोर प्रवृत्ति होती है? ' हमें अच्छा लगेगा सो करेंगे'- प्राजकल तो यही मूलमन्त्र बन रहा है । पहले - पीछे को १- तंत्ति उप ० १।११।१-२ । २ - गीता १६२३-२४ । [ ६६ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कौन देखे? वर्तमान को सामने रखकर हमें समाज की उन्नति के उपाय सोचने हैं- वर्तमान में विषया विवाह होना अच्छा है । छूत छात का भूत भगा देना आवश्यक है । नई व्यवस्थाएं बनाना परम आव श्यक है - ऐसे - ऐसे शङ्खनाद भाज भारतवर्ष में गूंज रहे हैं । इनका परिणाम क्या होगा? सो भी स्पष्ट है । रोगी की पूर्वावस्था और उत्तरावस्था का विना विचार किए जो वैद्य केवल वर्त्तमान परिस्थिति पर ही मनमानी श्रौषधियों का प्रयोग कर डालते हैं वे उस रोगी का सारा भविष्य नष्ट कर डालते हैं । उस समय थोड़े समय के लिए अवश्य हो रोगी की अवस्था सुघरी मालूम होती है, परन्तु वही दवा परिणाम में बडी भयंकर सिद्ध हो जाती है । आज दयालुओं का दयार्द्र हृदय पसीज रहा है - इसके लिए उनकी दृष्टि में प्रेय प्रौषधि जंचती है । उसी का वे प्रयोग भी कहते हैं । इसका परिणाम क्या होगा? सो भगवान् जानें । महर्षि इनसे अधिक दयालु थे परन्तु वे श्रेय को उत्तम समझकर तदनुसार व्यवस्था करते थे । यही कारण है कि उनकी व्यवस्थाएं प्रारम्भ में कटु होने पर भी परिणाम में मधुर हैं । श्रेय बोर प्रेय का सामान्य लक्षण बतलाते हुए गीताचार्य कहते हैं--“ यसवग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसावजम् ॥ बिषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तवग्रेऽमृतोपमम् परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ यव चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । मित्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ” ॥ ' इसलिए- ' हमें पसन्द आवेगा सो करेंगे - इस घातक सिद्धान्त को छोडकर हितकर को हो बपनाना चाहिए । तुम्हारी दृष्टि १० कदम तक है । महर्षियों की दृष्टि सातवें लोक तक है । तुम उनके तत्व को नहीं समझते । तुमने मात मेट दी - विधवा का विवाह कर दिया । तुमने समय की दुहाई देकर अपने जान में बडा अच्छा काम किया । परन्तु महर्षियों की दृष्टि के अनुसार तुमने उनका स्वरूप नष्ट कर डाला । उनकी हत्या कर डाली । जिस जरासी कठिनता भोगने से उनका उद्धार हो सकता था - तुम्हारे जरासी मूर्खता से उनका जीवन ही नष्ट हो गया । बतलाना इस प्रपञ्च से हमें यही था कि जबकि श्रेय हितकर है तो फिर संसार जान - बूझकर क्यों प्रेय की तरफ झुकता है? संभव है - पूर्व मन्त्र से नचिकेता के हृदय में ऐसा प्रश्न खड़ा हो जाए । बस, उसी का समाधान करते हुए यमराज कहते हैं— १ - गीता १६ ३७ ३८ ३६ । [ ९ ७ ]

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मध्य ( द्वितीया वल्ली ) " श्रेय और प्रेय कर धीर मनुष्य दोनों की त्रिला ) में श्रेष्ठ को अपना लेता है " । १- कठोप ० १।३।१३ । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य [ ६८ ] " श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यं एतः - [ श्रा इतः ( प्राप्नुतः ) ] । तो संपरीत्य ( सम्यक् पर्यालोच्य ) धीर: - विविनक्ति- ( विविच्य सः ) धीरः - प्रेयसोऽभि श्रेयः वृणीते । मन्दः- योगक्षेमात् प्रेयः वृणीते " ॥ दोनों मनुष्य को सब घोर से प्राप्त होते हैं । उन दोनों को खूब सोच - विचार छाँट कर डालता है । छाँट करके वह घोर मनुष्य प्रेय की प्रतिस्पर्द्धा ( मुका-लेता है एवं मन्दबुद्धि मनुष्य योगक्षेमस्वरूप श्रेय की उपेक्षा कर प्रेय को ले हमने बतला दिया है कि मनुष्य के सामने जो पदार्थ आता है उसमें श्रेय और प्रेय दोनों आते हैं । मूढ मनुष्य के लिए तो उस वस्तु का प्रेयभाग सामने भाता है एवं घीर के लिए ही प्रेय श्रेय बन जाता है | श्रेय है - वही प्रेय है । प्रेय है- वही श्रेय है । जो अहिंसा धम्मं निरपराध व्यक्ति के सम्बन्ध में धर्म है - वही प्राततायी के लिए प्रधम्मं है एवमेव हितकर ही समय पाकर रुचिकर बन जाता है एवं रुचिकर हितकर बन जाता है । दोनों दोनों हैं । परन्तु इन दोनों की देश - काल - पात्र के अनुसार छोट करना चीर का काम है । श्रुतिगत ' धीर ' शब्द शिक्षा देता है कि यदि तुम श्रेय प्रेय का स्वरूप समझना चाहते हो तो ' घीर ' बनो । प्रत्येक वस्तु पर सहसा हाथ मत डाल दो । पहले खूब सोचो खूब विचारो | दीर्घकाल के विचार से वस्तु के गुण - दोष दोनों तुम्हारे सामने भा जाएंगे । गुण श्रय है- दोष प्रेग है । जब धीरभाव से विचार करने पर तुम श्रेय प्रेयरूप गुण - दोष की छाँट कर डालोगे तो उस समय तुम्हारी प्रेमरूप दोष की ओर कभी प्रवृत्ति न होगी । प्राज जो तुम अधिकांश में प्रेय की आर ज्यादा झुकते हो इसका कारण यही है कि तुम्हारा मन अभी तक चञ्चल है । वह किसी विषय में स्थिर नहीं होता । उसे जब तक स्थिर नहीं बनाया जाता तब तक धीरभाव पैदा नहीं हो मना । जब तक धीरता नहीं होती- विचार शक्ति का उदय नहीं होता । जब तक विचार नहीं, जब तक विवेक नहीं । जब तक विवेक नहीं, तब तक श्रेय - प्रेय का विवेक नहीं । बस, इन सारे दोषों को हटाने के लिए इसी उपनिषत् में बतलाए जाने वाले - ' यच्छेद् वाङ्मनसी प्रातस्तराप्रेज्ज्ञान प्रात्ममि ' ' – इस योगाभ्यास के द्वारा, विद्याबल के द्वारा मन की चञ्चलता दूर कर ' घीर ' बनना चाहिए । श्रेय - प्रेय के विवेक का अधिष्ठाता केवल ' धीरभाव ' ही है । जल्दबाजी ने ही संसार को प्रेय का उपासक बना रखा है । बस, नचिकेता के पूर्व प्रश्न का समाधान करते हुए यमराज कहते हैं कि भाई! संसार में अधिकांशतः लोग अधीर हैं- क्षिप्रकारी हैं, अतएव वे श्रेय प्रेय की छांट करने में असमर्थ हैं, अतएव वे योगक्षेमरूप की अपेक्षा से प्रेय के ही चक्र में पड़ जाते हैं । परन्तु धीर मनुष्य दोनों की छांट कर प्रेय के मुकाबले में श्रेय को ले लेता है । ' धीर ' शब्द सूचित करता है कि नचिकेता बडा धीर था । यमराज ने

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) १ - गीता ६।४५ । ३ - पातञ्जलयोगसूत्र १।१४ । fear निरूपणोपनिषत् २ - भारविकृत ' किरातार्जुनीयम् ' - प्रथमः सगं । [ ee ] सांसारिक विभूतियों का खूब ही प्रलोभन दिया, परन्तु उस धीर नचिकेता ने अपने निष्चय के अनुसार एक पाँव भी भागे न बढाया । मरता क्या न करता सिद्धान्त को सामने रखने वाले नचिकेता की घोरता के सामने यमराज को परास्त होना पड़ा । श्रुति शिक्षा देती है कि धात्मज्ञान के उपायों में बम पायो । " क्या करें इतने दिन हो गए, कुछ भी तो आनन्द नहीं माया " - यह कह कर छोट मत बैठो । बिना सच्चे उपासक बने उस तत्त्व का मिलना कठिन है । बुद्ध ने इसी धीरभाव की उपेक्षा कर वैदिक ज्ञान पर अनास्था की थी । उस भाव का विरोध करने के लिए ही श्रुति ने ' वीर ' कहा है । यह वीरता कब तक? इसके उत्तर में ' अनेकजम्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् " - यह कहा जाता है । धाज तो दो - चार घंटों में ही मनुष्य व्याकुल हो जाते हैं । ऐसी अवस्था में बे इधर - उधर मारे - मारे मटकते फिरें तो इसमें भाश्वयं ही क्या है? इस प्रकार सुप्रसिद्ध मारवि के-" सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् । वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः ( श्रेयोलुग्धाः ) स्वयमेव संपदः ” ॥ ' इस नीति - तल का एवं स तु दीर्घकालने रस्सर्यसत्काराऽऽ सेवितो बुढसुमि: 3 - इस धम्मंतस्थ का उपदेश देते हुए यमराज श्रेय को योगक्षेम का साधन बतलाते हैं । संपत्ति के बागमन को योग कहते हैं, भागत संपत्ति के भोग ( रक्षण ) को क्षेम कहते हैं । धर्जन एवं भोष ( रक्षण ) के लिए योग - सेम का जाता है । श्रेय ही योगक्षेम का साधन है । प्रेय में भी बर्बन है, परन्तु वह बातक है, धराएब उसे योग सा साघन नहीं बतलाया जा सकता । प्रेय से तो भात्म विनाश ही है, बतएष- ' प्रेयो मन्दो योनसेचा जीते से उसकी निन्दा की गई है । afar अपनी बात पर डटा रहा - बीर बना रहा, प्रतएव वह श्रेय और प्रेय दोनों के विषेक करने में समर्थ हो सका । बस, इसी धीरभाव को दोहराते हुए यमराज कहते हैं-" स त्वं प्रियाप्रियरूपाश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैतां कां वित्तमयोमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ” ॥३ ॥

हे नचिकेता! उस धीर तने प्रियपुत्रादि, सुन्दर पदार्थादि - प्रप्सरादि सांसारिक भोगों को विवेक दृष्टि से विचारते हुए बिलकुल छोड दिया । जिस धनमयी विनोद - सामग्री में संसार के अधिक संख्या-युक्त मनुष्य डूबे रहते हैं - उस सांसारिक संपत्ति को तू प्राप्त नहीं हुमा । पृथिवीमण्डल का साम्राज्य, प्रप्सराओं द्वारा परिचर्य्या, पुत्र भृत्य आदि का समुच्चय प्रादि - आदि लोकोत्तर वैभवों का तिरस्कार करने वाले थोड़े ही हैं, इनमें फँसने वाले अधिक हैं । ये सम्पत्तिएं तो बहुत

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बडी हैं । मनुष्य तो अतिक्षुद्र, क्षुद्रातिक्षुद्र सम्पत्तियों के लिए भी प्राण देने में संकोच नहीं करता । एक आ को छोडकर सभी इस वित्तमयी गुड़िया से खेल रहे हैं । यदि बालक होता है तो माता उसके सामने एक मिट्टी का खिलौना रख देती है उससे बालक प्रसन्न हो जाता है परन्तु वास्तव में देखा जाय तो वह खिलौना ' खिलौना ' है न कि मसली वस्तु । बस, श्रानन्द के पिपासु मनुष्य ने दिखावटी आनन्द को पसन्द कर सम्पत्तिमय सांसारिक पदार्थरूप खिलौने को अपने सन्तोष की सामग्री मान रखा है । सारे संसार के मनुष्य बच्चे हैं । सांसारिक पदार्थ इन बच्चों के मन बहलाने के खिलौने हैं । इस प्रकार अपने आपको बुड्ढे मानने वाले - यथार्थ में बच्चे कहलाने लायक अविद्याग्रस्त सांसारिक प्राणी संपत्तिरूप खिलौने में लीन रहते हैं । परन्तु वाह रे नचिकेता! तू उन बच्चों में भी वास्तव में बच्चा है । फिर भी तूने इन सबका तिरस्कार कर दिया । यह सब तेरे घीरमाव का ही प्रताप है । श्रुतिगत ' अभिध्यायन् ' शब्द में भोर ' वित्तमयी सृां'- में बडा चमत्कार है । स्थूलदृष्टि से देखने पर अप्सरा, धन - दौलत, हूकूमत सभी प्रानन्दप्रद हैं । एक सुन्दर स्त्री को सामने खड़ी कर लीजिए आपको उसका बहिरंग भाग अत्यन्त ही सुन्दर प्रतीत होगा । परन्तु यदि माप उसके उन सुन्दर अंगों का मार्मिक भन्तरगदृष्टि से अवलोकन करेंगे तो सारी पोल खुल जाएगी । उसी समय उस सुन्दरता के स्थान में

आपके सामने --“ गण्डाख्यां न रुजं जिघृक्षति करः किं स्थूलमांसं कुचम् ।

गर्ते चेन कफास्थिच मंनिचिते वक्त्रे कुतश्चुम्बनम् ॥

भस्त्रा न श्वसनोद्गमागमवती कायः किमालिङ्ग्यते । कुत्सा चेन्मलमूत्रभाजि नरके नाय न काया कुतः " । - यह सूक्ति खड़ी हो जाएगी । निदर्शनमात्र है । ' वित्तमयी सृङ्का ' ( विनोद सामग्री ) सभी ऐसी है । जरा ध्यान देने पर उनकी निस्सारता सामने आ जाती है । बस, सांसारिक सम्पत्ति की निस्सारता के लिए एकमात्र प्रादेश है- ' अभिध्यायन् ' । सोचो! खूब सोचो!! तब उसमें अपना हाथ डालो । ' विना विचारे जो करे सो पाछे पछताय ' के अनुसार विचार का तिरस्कार करके अपने भापको पश्चात्ताप की अग्नि में न डालो । इसी विचारशक्ति के कारण बालक नचिकेता ने श्रेय को प्राप्त किया है । ' सृक्का ' का नाम है - सुख - साधन का । जो सम्पत्ति प्रानन्द का कारण है- वही ' सृङ्का ' कहलाती है । यह ' सृड्डा ' ऐहलौकिक, पारलौकिक दो भागों में विभक्त है । भाषा में जिसे ' खिलौना ' कहते हैं-वेद में वही ' सृङ्का ' नाम से प्रसिद्ध है । बनावटी वस्तु का नाम ' खिलौना ' है । श्रानन्द शान्त - समृद्धभेद से दो प्रकार का है । शान्तानन्द आत्मानन्द है - समृद्धानन्द सांसारिक आनन्द है । दोनों के साधन दो प्रकार के खिलौने हैं । दोनों आनन्द हैं । दोनों जिससे प्राप्त होते हैं वही ' सृङ्का ' है । सांसारिक वित्त-मय जितने भी पदार्थ हैं - सब समृद्धानन्द की प्राप्ति के कारण हैं एव वित्तभावशून्य सांसारिक पदार्थ शान्तानन्द की प्राप्ति के कारण हैं । दोनों ही विनोदसामग्री हैं । वित्तभावशून्य सृङ्का भ्रात्मविनोद-सामग्री है - वित्तमयी सृङ्का क्षणिक विनोद की सामग्री है । जैसे लौकिकानन्द सांसारिक असत् पदार्थों से प्राप्त होता है - तथैव ---[ १०० ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीय वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " उपायाः शिक्षमाणानां ' बालानामपलापनाः ' सत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते " ॥ " - के अनुसार उस शान्त सत्यतत्त्व की प्राप्ति के साधन भी यहीं असद्रूप सासारिक पदार्थ हैं । केवल वित्त वित्ताभाव में तारतम्य है । वित्तबुद्धि से वे ही पदार्थ लौकिकानन्द के साधक बन जाते हैं एवं प्रात्मदृष्टि से देखने पर वे ही शान्तानन्द के साधक हैं- दोनों साधन सृङ्का हैं - खिलौने हैं अर्थात् मिथ्या हैं -असत् हैं । साधन छोडने की वस्तु हैं । साध्य भ्रात्मग्राह्य है । पाटी पर लिखे हुए मिथ्या वर्णों के विना जैसे मुख से सम्बन्ध रखने वाली वर्णमातृका का ज्ञान असंभव है, विना मूर्तिपूजा के ईश्वरज्ञान कठिन है- विना मौगोलिक नक्शों के भूगोल का ज्ञान असंभव है वैसे ही विना सांसारिक पदार्थों का सहारे लिए परमार्थज्ञान असभव है । जिन सांसारिक पदार्थों को आप बन्धन का कारण समझते हैं - वे ही सासारिक पदार्थ मुक्ति के कारण हैं । अन्तर केवल साध्य साधक का है । सांसारिक पदार्थ परमार्थ तत्त्व की प्राप्ति के साधक प्रवश्य हैं, साध्य ( भोग्य - वित्त ) नहीं हैं । यदि इन्हें साधक समझा जाता है तब तक तो कुशल है परन्तु इन्हें यदि साध्य ( उपादेय प्राप ) समझ लिए जाते हैं-दूसरे शब्दों में इन्हीं पर विश्राम कर लिया जाता है तो यही बन्धन के कारण बन जाते हैं । इसी अवस्था में रहने वाले इन पदार्थों को ' विस ' कहा जाता है । श्रात्मा की भोग सामग्री का नाम ही वित्त है । आत्मा अपने भोग्य तक व्याप्त रहता है । जहाँ तक हमारी भोग्य सम्पत्ति है - हमारे भ्रात्मा की रश्मि एं वहाँ तक फैल रही हैं - इसीलिए - ' यावद्धित तावदात्मा ' कहा जाता हैं । इस प्रकार केवल दृष्टिकोणभेद से वही सृका वित्तमयी बन जाती है । ऐसी सृा में ही संसार डूबा हुआ है । संसार ने सांसारिक अर्थों को भात्मा की विनोद - सामग्री समझ रखी है । यदि वह इन पर से वित्तबुद्धि हटाले तो यही सृङ्का उसके कल्याण का कारण बन सकती है । ' ईशोपनिषद् ' के अनुसार पात्मा ज्ञानकम्मंमय है, अतएव कम्मं -बंधन को तोड़ने में कर्म्ममय संसार का सहारा लेना आवश्यक होता है । इसी कम्मं द्वारा ( जिसे कि हम वित्तभावाभावस्वरूपसाधनरूपा सृङ्का कहेंगे ) चञ्चल मन स्थिर होता है । तदनन्तर धीरता का उदय होता है । पश्चात् श्रेय प्रेय को अलग छाँटकर विवेक का उदय होता है । विवेक के लिए धीरता प्रपेक्षित है! धीरता के लिए मन का संयम अपेक्षित है । तदर्थ साधनरूपः सृता की उपासना करना आवश्यक है । आत्मा को पहचानना प्रात्मज्ञान है । यह ज्ञान उपासनापूर्वक है । पहले उपासना है - बाद में ज्ञान है । उपासना से भी पहले कम है । २५ वर्ष तक विद्याध्ययन करो, ५० वर्ष तक कम् करो, ७५ वर्ष तक उपासना करो । अनन्तर ज्ञान के अधिकारी कहलाओगे । कर्म्म यज्ञादि हैं । उपासना में आधिभौतिक पदार्थों का सहारा लेकर चित्तवृत्ति का निरोध है । ज्ञान में इसी निरोध द्वारा प्रमृतत्व प्राप्ति है | यमराज ने नचिकेता को उपदेश दे डाला है । ' लोकादिमग्न तमुवाच तस्मै ० ' - इत्यादि से तो कम्मरूप चयनयज्ञ का उपदेश दिया है एव ' सृङ्का चेमामनेकरूपां गृहाण ३ - से उपासना का उपदेश दिया * स्व ० शास्त्रीजी ने ' बालानामपलापना: ' पाठ के स्थान पर ' बालानामुपलालना: ' पाठ किया है । १- वाक्यपदीय२२४० । २ - कठोप ० १।१।१५ । ३ -कठोप ० १ | १ | १६ । [ १०१ ]

पृष्ठ 139

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है । इस मन्त्र के – ' खनेक रूपां गृहाण - इस वाक्य में बडा चमत्कार है । उपासना अधिकारी - भेद से अनेक मार्ग रखती है । सास्थिक - राजस - तामस इन प्रकृतियों के प्रवान्तर असंख्य भेदों के प्राघार पर -काली - विष्णु - शिव-- महादेब गुर्गा - तारा - बोडशी - त्रिपुरसुन्दरी- त्र्यम्बक, भैरव - हनुमान - गणपति - स्कन्द - वराह- कूम्मं आदि, आदि मि - मिल देवताओं की उपासनाएं व्यवस्थित हैं! उपासना के साघन पूर्वकथनानुसार सर्वथा मिथ्या हैं, मतएव उनके लिए ' हा ' शब्द का प्रयोग उचित है । साथ हो में प्रवृत्तिभेद से उपाय नाना प्रकार के हैं, अतएव ' रूपा गृहाण ' कहा गया है । यहां विसमयो ' न कहना ही इस बात का सूचक है कि यह सृवा प्रवश्यमेव उपादेय है । वित्तमयी सृड्डा को यमराज प्रकृत में बुरा बता रहे हैं । यहाँ इस धनेकपा सृता को दे डालते हैं । इसके बाद ' ब्रह्मबनं देवमोटर विवित्वा " - से ज्ञान का उपदेश दिया है । इस प्रकार यमराज ने १५, १६, १७ तीनों मन्त्रों से कम्मं- उपासना - ज्ञान तीनों मार्गों का प्रतिपादन किया है । असली मात्मा इन तीनों से मित्र है । उपासना में अर्थ ( आधिभौतिक पदार्थों ) का उपयोग होता है, बतएव इसे हम बर्थशक्ति में अन्तर्भत करने के लिए तय्यार हैं । ज्ञानशक्ति क्रिया-शक्ति - घर्षक्ति तीनों जिसकी शक्ति है - वह घसली भात्मा है । वह इन तीनों से अलग है । बस, उसी के स्वरूप को जानने के लिए आगे जाकर नचिकेता यमराज से - ' धन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मा-कृताकृतात् - प्रश्न करने वाला है । यही तत्व प्रक्षरतत्व है । इसी के लिए यमराज ने नचिकेता को तिमी सृखा का प्रलोभन दिया है, परन्तु यमराज के सारे प्रलोभन व्यर्थ हो जाते हैं । अन्त में वे संसार को परोक्षरूप से उपदेश देते हुए कहते हैं कि है नचिकेता । जिस वित्त के लिए संसार मरता है उसका मैंने तिरस्कार कर दिया । संसार के विषय तुझे अपनी ओर न खंच सके । सचमुच तेरी बढ़ता प्रशंसनीय है | आत्मज्ञानी को चाहिए कि संसार के प्रलोभनों का तृणव परित्याग कर उसी की खोज में लगा रहे, क्योंकि जिसे वह खोज रहा है उसके पेट में सारा संसार है । मला उसके सामने संसार के सब की क्या प्रतिष्ठा है? वह तो संसार के भी पेट में है । तीसरे दर्जे में है । एक राजा के थालय को छोड़कर जो मूढबी एक निर्धन का माश्रय लेना चाहता है ठीक वही दशा उसकी है जो पात्मज्ञान से मुख मोड़कर सांसारिक विषयों में महर्निंग लिप्त रहता है । श्रेय बोर प्रेय दोनों शब्द वस्तु से सम्बन्ध नहीं रखते, वस्तु से सम्बन्ध रखने वाले ज्ञान से सम्बन्ध रखते हैं । ख्याल हो वस्तु को श्रेय बना डालता है । खयाल ही वस्तु को प्रेय बना डालता है । सभी पदार्थ ज्ञानभेद से रुचिकर हैं - सभी हितकर हैं । जब इन पदार्थों का रुचिकर हितकरपना ज्ञान पर निर्भर है तो हम इन्हें ज्ञानाज्ञान नाम से ही पुकारेंगे । प्रत्येक में विद्या ( ज्ञान ) बोर घविद्या ( अज्ञान ) दोनों हैं । दोनों में से विद्या की ओर झुके हुए के आत्मा पर कामनाएं अपना असर नहीं डाल सकती । बस, इसी का निरूपण करते हुए यमराज कहते हैं-" दूरमेते विपरीते विषूची प्रविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त " ॥ ४ ॥

१ - कठोप ० १।१।१७ । २ - कठोप ० १।२।१४ । [ १०२ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिष द्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् नचिकेता! जानी हुई विद्या और अविद्या दोनों ( परस्पर एक दूसरे से ) बहुत दूर हैं एवं अत्यन्तविरुद्ध हैं । विद्या की चाह करने वाले हे नचिकेता! तुझको ( हस्ती, साम्राज्य आदि ) बहुत सी कामनाएँ न लुभा सकों ” । विद्या और अविद्या दोनों सचमुच श्रेयप्रेयवत् अविनाभूत हैं । दोनों घोर विरुद्ध । तम: -terred teen fa रुद्ध हैं । एक का रुख पश्चिम है तो एक का रुख पूर्व है, परन्तु हैं - प्रविनाभूत । सर्वथा विरुद्ध तमः प्रकाश जैसे अविनाभूत हैं-" न हि ध्वान्तमीदृङ् न यत्र प्रकाशः प्रकाशो न तादृङ् न यत्रान्धकारः " । वैज्ञानिकाचार्यों के इस विज्ञानसिद्धान्त के अनुसार जैसे दोनों विरुद्ध होते हुए भी अविनाभूत हैं, एवमेव विद्या अविद्या विरुद्ध होते हुए भी अविनाभूत हैं । सच पूछो तो अविद्या ही विद्या की प्रतिष्ठा है । विद्या ज्ञान है - यही आत्मा है । अविद्याभाग शरीर है । ज्ञानज्योतिम्र्म्मयविद्यारूप आत्मा तमोमय भूत भागस्वरूप शरीर में ही प्रतिष्ठित है । प्रविद्यामय शरीर ही विद्यामय आत्मा का आका है । दोनों ही व्यापक हैं । विद्या और अविद्या बिलकुल विरुद्ध हैं दोनों व्यापक हैं- दोनों विपरीत हैं - यह बात समझ में आ सकती है तब जबकि दोनों का स्वरूप समझ लिया जाय । मूर्ख मनुष्य के लिए तोटके सेर माजी टके सेर खाजा ' के मनुसार दोनों समान हैं, अतएव वह इन दोनों के परिणामों से अपरिचित है । इस अज्ञान का फल क्या होता है? इसका उत्तर आगे के मन्त्र में दिया जाएगा । इस मन्त्र में केवल विद्याभाग का निरूपण है । जो विद्या का उपासक है - उसे प्रात्मकामना को छोडकर संसार की कोई भी कामना उसी प्रकार नहीं लुभा सकती -जैसे कि ज्योतिर्भय हीरक की खान मिले बाद. मनुष्य को तमोमय कोयले की खान नहीं लुभा सकती । नानात्वभाव अविद्या से सम्बन्ध रखता है । एकत्व का विद्या से सम्बन्ध है । जब एकमावापन्न विद्या भाव प्राप्त हो गया तो नाना - भाव कैसा? कामनाओं की ' मूलभूता नानामावापन अविद्या ही नहीं रही तो तन्मूलक नाना कामनाएँ कैसी? यह तो विद्या के उपासकों का स्वरूप है । परन्तु जो अविवेकी शास्त्रतत्त्वानभिश मूढधी श्रविद्या में सांसारिक क्षणिक विषयों में लीन रहते हैं उनकी दशा का चित्रण करते हुए यमराज कहते हैं-" विद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः " ॥ ५ ॥ ।

अविद्या के अन्तस्तल में बैठे हुए, अपने आपको धीर और पण्डित समझते हुए, मुढ मनुष्य उसी प्रकार बहकते हुए मटकते फिरते हैं- जैसे कि एक अन्धे से दिखलाए गए मार्ग में अन्ध लोग घूमा करते हैं । एक अन्धा मनुष्य दूसरे श्रन्वे को ले जाता है एवं वही जैसी दशा अन्ध से ले गए इस प्रन्ये की होती है - वही दशा इनकी है । अविद्या अन्धकारस्वरूप है । [ १०३ ]