कठोपनिषद — पृष्ठ 141–150
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् उसी श्रविद्या को इन मूढों ने अपना रखा है । एक अन्धे ने आगे बढने के लिए धन्धे का सहारा ले रखा है । फलतः अन्ध विज्ञान ( अविद्या ) के सहारे संसार में अपने आपको सब कुछ समझते हुए ये ठोकरें खाते फिरते हैं । प्रजी! हम भी मनुष्य हैं, शास्त्र बनाने वाले भी मनुष्य थे । हम भी क रखते हैं । ईश्वर ने हमें भी ' माइन्ड ' दिया है । ऐसे - ऐसे कुतर्कों का सहारा लेकर ये मूर्ख मूर्खमण्डली के नेता बनकर स्वयं मनमाना उत्पात मचाते हुए इन मूर्खों को भी उत्पथगामी बनाते हैं । अपने धापको शास्त्रज्ञान का वेदज्ञान का प्रेमी घोषित करते हैं । निरक्षरमण्डली इनको ही वेदधुरीण मानकर इनके चंगुल में फँस कर मारी - मारी फिरती है । न यह इषर की रहती है - न उधर की रहती है । यमराज की यह उक्ति एक प्रकार से उनके प्रति है जो कि विद्यारूप प्रात्मा की ( शरीर से प्रतिरिक्त ) सता स्वीकार न करके केवल नास्ति को ही प्रधान मानता है । अनात्मवादी ही संसार को धोखा देते हैं । इस पर कदाचित् कोई प्रश्न करे कि आत्मसत्ता पर विश्वास कैसे हट जाता है तो इसका उत्तर यमराज पहले के चार श्लोकों से दे चुके हैं । वित्तमयी सृङ्का ने ही इन मूढों को अविद्यारूप सांसारिक विषयों में बो रखा है । बस, आगे के मन्त्र से उसी का और भी स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं ---" न सांपराय: प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् 1 श्रयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ” ॥६ ॥
के गर्व से गर्वित श्रतएव प्रमाद के वशीभूत बालधी ( मनुष्य ) को सांपराय प्रतिभासित नहीं होती है । यही लोक है- ' परलोक कोई वस्तु नहीं है - इस प्रकार के मद में चूर होने वाला यह-मानी पुरुष बारम्बार मेरे वश में आया करता है । शरीरस्थ आत्मा की नित्य, संप्रसाद, यज्ञ, सांपराय - भेद से चार प्रकार की गति होती है । हमारे आत्मा का प्रभव सूय्यं है । ' महरहः ० ' - इत्यादि श्रुतिप्रमाण के अनुसार वह भाग प्रतिक्षण सूभ्यं में जाया करता है । एक निमेष में वह श्रात्मविद्युत् तीन बार सूर्य्यलोक जाता है और भाता है । जिस मार्ग से जाता है - यह सुषुम्णा पथ है । इसी सड़क से वह सदा जाया माया करता है । यदि इसके गतिमार्ग का विच्छेद हो जाता है तो उसी क्षण यह शरीर से उत्क्रान्त हो जाता है । चूंकि यह गति सदा होती रहती है, प्रतएव इस परलोकगति को हम ' नित्यगति ' कहने के लिए तय्यार हैं । दूसरी है - संप्रसाद | यह गति सुषुप्ति में होती है । इस समय यह प्रात्मा अपने उस प्रात्मलोक में अपीत रहता है, प्रतएव इस अवस्था को ' स्वपिति ' कहते हैं । इससे आत्मा की सारी थकान मिट जाती है, अतः आत्मा थोड़ी देर के लिए सारे कष्टों से वियुक्त होकर अपने आनन्द में डूब जाता है, अतएव इस गति को संप्रसादगति कहते हैं । यह भी आयुर्भोगपर्यन्त रहती है, अतएव इसका भी नित्य-गति में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है । तीसरी है - यज्ञगति । ज्योतिष्टोम चयनादि यज्ञ से एक नया देवात्मा बनता है । वह १७-२१-२५ वें तीनों में से किसी अन्यतम स्थान में बद्ध रहता है - इसके जरिये भोक्तात्मा शरीरत्यागानन्तर इन्हीं लोकों में जाया करता है । यज्ञ से सम्बन्ध रखने के कारण ही इसे ' यज्ञगति ' कहा जाता है । [ १०४ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् चोषी है - सांपरायगति । यजन करने वाले सामान्य प्राणिमात्र के मात्मा की जो शरीरत्यागान-तर लोकान्तर में गति होती है उसी का नाम ' सपिरायगति ' है । इस गति पर भारूड होने वाले आत्मा का नाम ' सुपर ' है । सुपर्ण ही गरुड है । गरुड बनकर ही यह आत्मा परलोक में जाता है । कैसे जाता है? किन किन मार्गों से जाता है? उसकी मार्ग में कैसी - कैसी अवस्थाएं होती हैं? इन सब fernt or frever ' re डपुराण ' में देखना चाहिए । शरीर से निकलने पर इसका ' अंगुष्ठमात्र ' स्वरूप हो जाता है - जैसाकि मागे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । प्रकृत में केवल यही कहना कि पूर्वोक्त चार गतियों में से- नित्यगति ' - संप्रसादगति - दो गतियाँ et terrific फिर भी मानी जा सकती हैं, परन्तु यज्ञगति और सांपरायगति तो सर्वथा ही परोक्ष हैं । इसीलिए यहाँ उन दोनों गतियों का ही उल्लेख है । त्रिणाचिकेतस्वर्ग का यशगति से सम्बन्ध है-frent fe पूर्व में निरूपण किया जा चुका है एवं अब सांपराय की ओर ध्यान दिलाया जाता है । इस लोक से अन्य परलोक है एवं शरीरत्यागानन्तर प्रात्मा उसमें जाता है एवं कम्र्मानुसार उसे फल भोगना पड़ता है - यह परोक्ष विषय है । इसका ज्ञान शास्त्र के मार्मिक ज्ञान पर अवलम्बित है । परलोक और उसके प्राप्ति का प्रयोजनभूत शास्त्रीय ज्ञान दोनों की समष्टि परोक्षविषयक है । शास्त्रीय ज्ञान से ही परलोकसत्ता प्रतीत होती है । प्रर्थात् विना वेदविज्ञान जाने हर एक मनुष्य तर्फमात्र का सहारा लेकर इस परोक्षभाव को नहीं जान सकता । बस, इसी भाव का द्योतन करने के लिए यहाँ ' सांपराय ' का प्रयोग किया है । प्रायः सभी मनुष्य शास्त्रज्ञान से अपरिचित हैं । साथ ही में अविद्यारूप सांसारिक विम सृखा ने उन्हें मुग्धकर रखा है । इसी अन्धकार ने उनके आत्मसूर्य को ढक रखा है, अतएव प्रकाश होते हुए भी वे गहरे अन्धेरे में मारे - मारे फिरते हैं । भगवान् कलिकाल के वर्तमान शासनकाल में तो मन्त्र के अक्षरों का भलीभांति समन्वय हो जाता है । अपने आपको घनिक समझने वाले अधिक जनसमूह का एवं शास्त्रानमिज्ञ केवल पश्चिमी वातावरण में पड़कर अपने प्रापके सभ्यतम समझने वाले सभ्य समाज का तो यह सिद्धान्त सा बन गया है कि ' मरे बाद आत्मा परलोक में जाता है एवं उसे सुख - दुःख भोगना पड़ता है एवं गौदानादि से उसे सहायता पहुंचाई जा सकती है ' - यह सब ब्राह्मणों की पोपलीला है - निकम्मे ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए यह ढोंग रच रखा है । परलोक कोई वस्तु नहीं है । स्वर्ग - नरक जो कुछ कहो यही है । इसी पृथिवी पर स्वर्ग है- इसी पर नरक है । यहाँ का प्रबन्ध कर लेना मात्र पर्याप्त है । श्रुति कहती है कि परलोकसत्ता पर विश्वास न करने वाले सांपराय की हँसी उड़ाने वाले ऐसे ही मूढधी- ' वायस्थ farea ' - ' ज rata fa यस्थ ' - के अनुसार सदा मृत्यु के ( जन्म - मरण के चक्र में फंसे रहते हैं । मे वशमा-पथ ' से केवल मृत्यु का नाम लिया गया है । इसमें एक रहस्य है । जन्म और मृत्यु का जोड़ा है । परन्तु अनात्मवादी के लिए तो ' क्षणिक क्षणिकम् - इस सिद्धान्त के अनुसार सभी मृत्यु है । जिसने मा १- आदानविसर्गरूप क्रिया सभी स्वीकार करते हैं एवं नित्यगति का इसमें अन्तर्भाव हो सकता है; अतएव इस गति को मानने वाले सभी कहला सकते हैं । [ १०५
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् का स्वरूप नहीं पहचाना, जो परलोक विद्या को ' पोपलीला ' समझता है उसका जन्म भी मेरे ( मृत्यु के ) ही वश में है एवं मरण तो मेरे वश में है ही । अर्थात् ऐसे का जन्म - मृत्युभावापत्र होने से मृत्यु ही है । इसी आधार पर - ' स्वर्गलोक क्यों नहीं भरता '? - यह पूछने पर इसी पूर्वकथन को दोहराते हुए उपनिषदों मैं- ' मास शोको न सम्पूर्णते- पर उपसंहार करते हुए यही पूर्वोक्त निर्णय किया है । वित्तमोह से मुग्ध रहने के कारण एवं शास्त्रीय ज्ञान से शून्य होने के कारण मूढ विश्वास मनुष्य अविद्या नहीं में डूबे रहते हैं, अतएब उन्हें विद्यामय मात्मा, उसकी गति और गम्यस्थान- तीनों पर होता । ऐसे ही पापी - नरकी- विषयी, अनात्मवादी, मदर्गावत मनुष्य पुनः पुनः प्रतिदुःखद यामी यातनाएँ होने के मोगा करते हैं । परन्तु विद्याभाग का उपासक तीनों के स्वरूप को जानकर कम्र्म्मबन्धन से मुक्त fer freferei ( संन्यास ) करता हुमा मृत्युपाश से ( प्रावागमन से ) विमुक्त हो जाता है । यदि शास्त्रीय ज्ञान का अभाव ही इस दुःख का कारण है एवं सभी ये कारण जानते हैं कि अज्ञान जाते? हाँ से दुःख होता है - यदि यह सिद्धान्त सार्वजनीन है तो फिर सभी शास्त्र को जान क्यों नहीं में लीन हो प्रश्न बडा सुन्दर है । यदि जान जाते तो सचमुच अविद्या के कुचक्र से निकलकर विद्यामृत जाते । परन्तु जाने कैसे? जानने की ओर प्रवृत्ति कैसे हो? क्योंकि यह तस्व बढा ही अणु है - सूक्ष्मतम विरले ही हैं, अतः-है । मामूली मनुष्य उस गहराई तक नहीं पहुँच सकता । इसके जानने वाले तो विद्वानों के आदेश ' महाजनो येन गतः स पन्था: - इस स्मृति सिद्धान्त को सामने रखते हुए शास्त्राभिज्ञ पर चलने में ही कल्याण है । बस, इसी भाव का प्रतिपादन करते हुए यमराज कहते हैं-" श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । arren वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः " ॥ ७ ॥
" हे नचिकेता! जो विद्यामय मात्मतत्व बहुत से ( मूढतम ) मनुष्यों के द्वारा तो सुनने के लिए दुर्लभ भी लभ्य नहीं है एवं बहुत से सुनते हुए भी जिसे नहीं जानते हैं ऐसे उस आत्मतत्व हुआ का आत्मज्ञाता प्रतिपादक शिष्य है एवं उसके स्वरूप को पहचानने वाला दुर्लभ है एवं ऐसे कुशल गुरु से सिखाया श्री दुर्लभ है " । वे क्षुब्ध संसार में कितने ही मनुष्य तो ऐसे हैं कि यदि उनके सामने आत्म चर्चा की जाती है तो ऐसे हैं जो खूब ध्यान से हो पड़ते हैं वे उस तत्त्व को सुनने के लिए मी राजी नहीं है एवं ऐसा कितने सूक्ष्म ही है । यदि सौभाग्य से सुनते हैं, परन्तु समझते एक प्रक्षर भी नहीं, क्योंकि यह तत्व ही वाले विद्वान् का मिलना दुर्लभ है । जिज्ञासु मिल जाए तो शब्दप्रपञ्च द्वारा उसको प्रतिपादन करने स्वरूप को साक्षात्कार जब शाब्दिक विद्वान् का मिलना ही कठिन हैं तो आत्मा को पहुँचा हुधा - उसके ज्ञाता गुरु से करके पहुँचवान् कहलाने वाला तो उससे भी दुर्लभ है । जब ऐसे ज्ञाता गुरु ही दुर्लभ हैं तो पहा हुवा ज्ञाता शिष्य तो और भी दुर्लभ है । [ १०६ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् अथवा कितने ही बिचारे तो अर्थसंकट के कारण उस तत्त्व के निरूपण को सुनने के लिए भी समय नहीं निकाल सकते । कितने ही थोड़ा - बहुत समय निकालकर सुनते हैं तो समझते नहीं । परि समझने वाले हैं तो समझाने वाले गुरु नहीं । गुरु हैं तो उनकी विद्या को यथार्थरूप से सबके हुए शिष्य नहीं । आत्मतत्त्व के निरूपण को न सुनने वाले, न सुनाने वाले तो बहुत हैं । ऐसे बशों का होना तो स्वाभाविक है । परन्तु ऐसे तत्त्ववेत्ताओं का होना स्वाभाविक है । ऐसों का होना धाश्चर्य है । तात्पय्यं यही है कि जिस श्रात्मतत्त्व को न जानने से मनुष्य दुःखसागर में निमग्न रहते हैं - उसका स्वरूप जानने को जिज्ञासु और जिज्ञासुओं का समाधान करने वाले दोनों की ही कमी है । गुरु है तो शिष्य नहीं । उपयुक्त शिष्य है तो गुरु नहीं । क्यों? उत्तर स्पष्ट है । जब तक सारे जीवन को इस तत्त्व के अन्वेषण में न लगा दिया जाए तब तक वहाँ तक पहुँचना असम्भव है । ' सुगंधपचस्तत् कथयो बति ' के अनुसार वहाँ तो वही पहुँच सकता है जो कि सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रत्र ' - इस भगवदादेश को सामने रखकर मनसा वाचा कर्मणा उसके पीछे पड़ जाता है । यह लड्डू -कलाकन्द की तरह राजस - तामस मानन्द नहीं है - जिसका तत्क्षण ही अनुभव हो जाए । यह तो कुनेन की गोली है-प्रारम्भ में अति कटु है । यदि साहस करके तुम कुनेन खा गये तो समझ लो तुम स्वयं उबर के लिए ज्वर बन गए । इससे यमराज यही ध्वनित कर रहे हैं कि न तो सभी इसके जानने का प्रयास करते हैं एवं न प्रयास करने वाले सभी इसे जान पाते हैं एवं न इसे जानने वाले शाब्दिक विद्वान् है, न पार-मार्थिक विद्वान् है । हैं भी तो दुर्लभ, इने गिने । अतः ' जब तक हम पूरी तरह उसके सारे स्वरूप को नहीं समझ लेंगे तब तक उस पर विश्वास नहीं कर सकते - यह मूर्खतापूर्ण तर्क उपस्थित करके तुम अपना अनिष्ट मत करो । तुम्हारा कल्याण केवल इसी में है कि जो इस परोक्ष तत्वों के बेता देवमहषि हैं-उनके वचनों पर विश्वास कर उनके बतलाए हुए मार्ग का अनुसरण करो । ' यः शास्त्रविधिमुत्सृज्यठ ' ' — इत्यादि स्मृतिवचन भी इसी प्रादेश की पुष्टि करते हैं । प्रश्न होता है कि जिन वेदमहर्षियों ने परचोका दि की सत्ता बताई है - वे भी तो हमारे जैसे मनुष्य ही थे । फिर उनकी बात का आदर क्यों किया बाथ? आज यही तर्क सर्वत्र काम में लिया जाता है - इसी कुतर्क का प्रत्युत्तर देते हुए यमराज कहते हैं-" न नरेगावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाखात् " ॥८ ॥
" हे नचिकेता! यह सांपराय किसी मामूली मनुष्य से कहा हुआ नहीं है । अपि च- यह सहज ही में जानने योग्य भी नहीं है । अपि तु बहुत प्रकार से विचार्यमाण होकर ही यह सुशेय बनता है । हे नचिकेता! विना दूसरे के बतलाए इस आत्मा के विषय में गति नहीं है, क्योंकि यह प्रात्मतत्व प्रति सूक्ष्म है, अतएव भतयं है एवं प्रमाण से भी यह अणु है " । १- गीता १६।२३ । [ १०७ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) " १ - गीता ६२४५ । कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् [ १०५ 1 सचमुच यह सांपरायविद्या किसी मामूली मार्ग चलते मनुष्य द्वारा प्राविष्कृत नहीं है - प्रपि तु, लाखों वर्षों तक वंश - परम्परा से उसी में लीन रहने वाले संसार के सारे सुखों को तिलाञ्जलि देकर निःस्वार्थ भाव से विश्व के कल्याण की कामना के लिए सांसारिक सुखों का परित्याग कर निबिड जंगलों में निवास करने वाले प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद महर्षियों के परिश्रम का फल है - विज्ञान के अन्तस्तल पर पहुँचे हुए पहुँचवानों की पहुँच का फल है । श्राज हम कुतर्क का सहारा लेकर उन्हें हमारे जैसा बतलाकर यदि उनकी कृतियों का उपहास करते हैं तो हमारे समान भूमण्डल पर कोई मूर्ख नहीं है । ऐसा करते हुए हम अपने पैरों पर आप ही कुल्हाड़ी मारते हैं । जरा सोचना तो चाहिए कि उन पूज्यों को यं ही बात बनाने में अपयश के अलावा कौनसा फल मिलने की सम्भावना थी जिससे कि उन्होंने अपने जीवन को सदा के लिए भ्रात्मतस्व के लिए न्योछावर करने को बाध्य किया? अत: ऐसे पहुँच -वानों की कृतियों पर विश्वास न कर उनकी मजाक उडाना - अपने कूळ मस्तिष्क की उन पवित्रतम ज्ञानियों के साथ तुलना करना दुःसाहस है - मपराष है - अपराध ही नहीं प्रक्षम्य अपराध है । यह विश्वास करो कि जब तक तुम उन महर्षियों की तरह लाखों वर्षों तक, अनेक जन्मों तक सर्वात्मना इसके पीछे श्रात्मसमर्पण नहीं कर दोगे तब तक- ' अमेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ' के अनुसार तुम उसे प्राप्त नहीं कर सकते । हम समझ लेंगे, तब मानेंगे - यदि इसी दुराग्रह में रहे तो समझ लो तुमने अपना यह जीवन व्यर्थ खो दिया, अतएव सबसे सीधा भौर सच्चा मार्ग यही है कि शास्त्रीय आदेश पर विश्वास करते हुए जिज्ञासा - बुद्धि से धीरे - धीरे मागे बढते रहो । जिज्ञासु बनो -द्रष्टा मत बनो । अपने आप पोथी समझकर आत्मतत्त्व के समझने का साहस मत करो । इसका एक-मात्र उपाय सद्गुरु ही शरण है । परोक्षप्रिय महर्षि इस ढंग से बोलते हैं- इतना बारीक बोलते हैं कि न तो तुम विना! गुरु के उनके शब्द जाल को ही समझ सकते एवं न विना गुरु के शब्द द्वारा विज्ञेय सूक्ष्मतम बात्मतस्व को समझ सकते । ' हम भी प्रयं करना जानते हैं - हम स्वयं समझ लेंगे - इस ग में पड़कर तुम कुछ मी लाभ नहीं उठा सकते । क्योंकि जिसे तुम ढूंढने जा रहे हो वह और ढूंढने के उपायभूत शास्त्रीय प्रमाण दोनों ही बारीक हैं । लक्षण ', लक्ष्य दोनों सूक्ष्म हैं । प्रात्मतत्त्व प्रतिसूक्ष्म है । इसमें तो आश्चयं ही क्या है? जबकि सांसारिक पदार्थ भी सामान्यों के लिए सूक्ष्म हैं । " वे भी हमारे जैसे ही मनुष्य थे फिर हम उनके प्रादेश को ब्रह्मवाक्य क्यों माने? क्यों नहीं हम अपने आप ही सत्यासत्य का तर्क द्वारा निर्णय कर लें " का डिण्डिमघोष करने वालों से हम पूछते हैं कि सूंठ - मिर्च-पिप्पल - लौंग - इलायची - जौ - गेहूं - धान नारङ्गी - आदि - आदि पदार्थों के प्राचीनों ने जो गुण बतलाए हैं एवं उनके जो नाम रख दिए हैं- क्या आपने कभी इनके विषय में सन्देह किया है? आप अपने से कम अकल रखने वाले पंसारी के पास जाते हैं और जिनको वह लौंग- मिर्च बतलाकर आपको देता है - बिना नचनुच के आप सहर्षं उसे ले आते हैं । क्या आपने कभी वहाँ पर अपने तर्क का आश्रय लिया है? नहीं - कभी नहीं । आपके सारे व्यवहार परम्परागत व्यवहार के आधार पर ही अवलम्बित हैं । यदि आप ऐसे व्यवहार का तिरस्कार कर दें तो ससार में एक पैर भी आगे बढाना असम्भव हो जाए । भला स्थूलतम
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सांसारिक पदार्थों के विषय में जब भाप - ' महाजनो येन गतः स पम्याः - इस न्याय का उल्लंघन नहीं कर सकते तो फिर सूक्ष्मतम आत्मतत्त्व के विषय में- ' महाजनो येन गतः स पन्थाः ' - का उपहास करना क्या साहस नहीं है श्रुतिगत- ' मनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति ० ' से श्रुति सांसारिक भाव को उदाहरण के रूप में आपके सामने रखती हुई कहती है कि हे मनुष्यो! तुम्हें याद रखना चाहिए कि सांसारिक व्यवहारवत् पार-मार्थिक अर्थ के ज्ञान का एकमात्र उपाय अभियुक्तादेश ही है । तुम सांसारिक पदार्थों में तर्क का समावेश कर भी सकते हो, परन्तु वहाँ तक की गति ही नहीं है । क्योंकि जिस भाव में तुम तक का समावेश करना चाहते हो- वह अतक्यं है । वहाँ तर्क की गति ही नहीं है । तर्क विना मनोव्यापार के असम्भव है । ' न तत्र मनो गच्छति ० ' - के अनुसार बहिर्मुख होने से मन का रुख उधर ( धारमा की ओर ) है ही नहीं । ऐसी अवस्था में उसके विषय में तर्क का प्रश्न करना हो गलत है । बाज सारा संसार तर्क - तर्क चिल्ला रहा है । फलतः सब उस ज्ञान से वञ्चित हैं । सबकी बुद्धिएँ तर्कचक्र में फँसकर उस आत्मविष-यिणी बुद्धि से पृथक् हो रही हैं । उस अत को तर्क द्वारा ढूंढने वाले मूढ आत्मज्ञान की बोर झुकने बाली मति का घात कर रहे हैं, प्रतएव --" नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वाङ् नो सूयान्नचिकेतः प्रष्टा " ॥६ ॥
यह आत्मविषयिणी बुद्धि तर्फ द्वारा कभी नष्ट नहीं करनी चाहिए । ( तुम्हें याद रखना चाहिए कि ) साक्षात्कृतधर्मा दूसरे प्राप्त मनुष्य से कही हुई ही यह सम्यग्ज्ञान के लिए उपयुक्त होती है । अर्थात् इसके ज्ञान के लिए पहुँचवानों का सहारा लेना ही उचित है । दूसरों ने तुम्हारे सुज्ञान के लिए इतना उपदेश देने का कष्ट उठाया है । वे तो स्वयं समझ गए थे । उन्हें क्या गरज थी कि वे उस तत्त्व का शब्दरूप से उपदेश देते । यह उनकी अनुकम्पा का फल है । दयावश वे हमारे लिए उसका उपदेश दे रहे हैं । ऐसी अवस्था में क्षुद्र तर्क - कुतर्कों द्वारा उस उपदेश को काटना क्या बुद्धिमानी है? एक मनुष्य घण्टों परिश्रम करके दूध में से मक्खन निकालकर तुम्हारे सामने रखता है एवं तुम मूर्खता-वश उसमें दोष निकालकर उसका तिरस्कार कर देते हो भला, तुमसा मूर्ख घोर कौन होगा? दयालु महर्षि तुम्हें संसार के बन्धनों से छुडाकर तुम्हें सत्यज्ञान प्रदान करने के लिए उपदेश देते हैं- एक सच्चा. और सीधा मार्ग दिखलाते हैं एवं तुम तर्क द्वारा उसका तिरस्कार करते हो । ऐसा करते हुए तुम उस उपदेश भौर उपदेष्टा का कुछ नहीं बिगाड़ते- हाँ अपना सर्वनाश अवश्य कर डालते हो, अतः यदि तुम श्रपना कल्याण चाहते हो तो तर्क का तिरस्कार कर अन्यप्रोक्तमार्ग के ऊपर चुपचाप चले चलो । सामान्यरूप से सभी को उचित उपदेश देकर यमराज नचिकेता से कहते हैं कि हे प्यारे बच्चे! नचिकेता! सत्यवृति तैने जिस आत्ममति को ( मेरे वरदान के प्रभाव से ) प्राप्त की है वही मति आत्मज्ञानोपयोगिनी है । इससे यमराज यही बतलाना चाहते हैं कि तर्क करो- परन्तु कुत्सित तर्क मत [ १०६ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् करो । समझने के लिए तर्क करो - विषय को काटने के उद्देश्य से - ' इसकी बात किसी तरह से कट जाएं ' - इस लक्ष्य से तर्क मत करो । इससे बतलाने वाले का कुछ नहीं बिगड़ेगा तुम जो कुछ प्राप्त करने वाले ये उसे और खो बैठोगे । कैसा तर्क करें? - उसके लिए श्रुति उदाहरणरूप से नचिकेता को सामने रखती है । नचिकेता भी सन्देह करता है- पूछता है, परन्तु उसका पूछना - ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्सी-येथे नायमस्तीति चैके इस जिज्ञासा - भाव के लिए है । जिज्ञासा करो - बातकट्टू मत बनो । यह कब होगा जबकि तुम नचिकेता की तरह सत्यधृति बनोगे । सत्यतत्त्व को खोजने वाला धीरपुरुष ही जिज्ञासा-हुति रह सकता है । जिसे दुनिया में अपनी मिथ्या प्रशंसा करवाना है, मण्डली के मनुष्यों के सामने जिसे पने आपको विद्वान कहलवाने की लालसा है - वही कुत्सित तर्क का प्रयोग करता है । वह ऐसे-ऐसे कुतर्क करके पास में बैठने वालों के हृदय में यह विश्वास करवाना चाहता है कि मैं भी कोई हूँ । teri! मेरी बातों का यह जवाब ही नहीं दे सकते । सत्य के लिए हठ करना अच्छा है, परन्तु मिथ्या बात की पुष्टि के लिए हठ करना मूर्खता है । ' हम तो आपकी बात नहीं मान सकते - यह मिथ्या श्राग्रह arents are है । यदि तुमने मण्डली में वाहवाही सूट ली तो इससे तुम्हारा क्या मला या? were तुम्हें सत्यवृति ही बनना चाहिए । अन्त में यमराज कहते हैं कि नचिकेता | भला eerut तो सही तुम्हारे जैसा प्रश्न करने वाला संसार में क्या और कोई दूसरा होगा? कदापि नहीं । इससे उपदेश दिया जाता है कि सांसारिक दिखावा तुम्हारे सत्यभाव के ऊपर निरन्तर आक्रमण करेगा, परन्तु तुम सब के आक्रमणों को सहते हुए डटे रहो । कभी जिज्ञासुभाव से विचलित मत होमो - इसी में तुम्हारा कल्याण है । यमराज आज नचिकेता की सत्यधृति पर अत्यन्त प्रसत हैं, अतएब बिना पूछे ही वे उसे गूढातिगूढ रहस्य बतला रहे हैं । नचिकेता बच्चा है- श्रुति के सामने संसार के सभी मनुष्य नचिकेता ( बच्चे ) है, अतएव जैसे बच्चे को एक ही बात बार - बार समझाई जाती है- एवमेव दयालु श्रुति सम्यग्ज्ञान के लिए उसी fava का नाना प्रकार से प्रतिपादन करती | पूर्वोक्त का ही प्रकारान्तर से निरूपण करते हुए यमराज कहते हैं-" जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् " ॥१० ॥
हे नचिकेता! शेवधि नाम से प्रसिद्ध जो ( सांसारिक ) पदार्थ है - उसे मैं मनित्य करके जानता हूँ । है नचिकेता! अब पदार्थों से वह ध्रुव कथमपि प्राप्त नहीं हो सकता, भ्रतएव हे नचिकेता! मैं नाति नाम के प्रग्नि का चयन किया है । इस प्रकार ( चयनरूप ) अनित्यद्रव्यों में से नित्यभाव को प्राप्त करने में समर्थ हुआ हूँ । " पूर्व के मन्त्र में शिष्य की जिज्ञासा का वर्णन है एवं इस प्रकृत मन्त्र में जिज्ञासा से प्राप्त होने वाले फल के उपाय और उसके स्वरूप का वर्णन है । वित्तमयी सम्पत्ति के अभिप्राय से यहाँ -१ - कठोप ० ११११२० १ [ ११० ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वस्ती ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ' शेवधि ' शब्द दिया है । सांसारिक धन्यवित् पदार्थ क्षणिक होने से मृत्युरूप हैं - अनित्य है । परन्तु कब? ज्ञानानन्तर | जब तक अज्ञान है तब तक अमृत - मृत्यु का विवेक नहीं है । यह अमृतरूप नित्य-' भांग है एवं यह मृत्युरूप अनित्यभाग है - यह विभाग विद्याबुद्धि पर निर्भर है, इसीलिए ' जानामि कहा है । सांसारिक पदार्थ मृत्युरूप हैं- ये नाना हैं । इस नानामावमात्र की उपासना से कभी भी एकस्वरूप उस ध्रुवस्व की प्राप्ति नहीं हो सकती । " यदेवेह तदमुत्र यमुत्र तवन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ " " - के अनुसार सांसारिक ध्रुव पदार्थों से ध्रुव - प्राप्ति की भाशा करना व्यर्थ है । इसका यह अर्थ नहीं है कि भ्रमृतप्राप्ति का साधन मृत्युतस्य नहीं है । साधक और घातक दोनों सांसारिक पदार्थ ही हैं । केवल दृष्टिकोण का अन्तर है - जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया है । वित्तभाव से वे ही अध्रुव पदार्थ - अध्रुव के बन्धन के कारण बन जाते हैं एवं साधक-दृष्टि से वही अध्रुव ध्रुव की प्राप्ति के कारण बन जाते हैं । मन्त्र के पूर्वभाग में वित्तमय ध्रुब का वर्णन है एवं उत्तरमाग में साधकरूप मधुव अभिप्रेत है । इसीलिए जिन बभ्रुवों के लिए पूर्वभाग में - ' म यत्र षं प्राप्यते हि भुवं तत्- कहा है एवं उत्तरभाग में - ' अमित्येभ्यः प्राप्तवानस्मि नित्यम्'-कहा है । कितने ही विद्वान् पूर्वभाग के अध्रुव से ' संसार के पदार्थों से उस मित्यतस्य को प्राप्त करना असम्भव है - यही अर्थ समझते हैं । यह अर्थ भी ठीक है, परन्तु यही अर्थ ठीक नहीं है । संसार से बाहर निकलने के लिए भी इन्हीं सांसारिक पदार्थों का सहारा लेना आवश्यक है । यदि मनुष्य इन्हीं में धनुरक्त रहता है- इन्हीं को सत्य समझता है तो बन्धन है । यदि इन्हीं को सत्यप्राप्ति का साधक समझ-कर इनमें प्रतुत होता है तो प्रबन्धन है । यमराज कहता है कि संसार के जितने भी प्राणी हैं - सबमें अमृत और मत्यंभाग है । विष्ठा आदि अपवित्रतम पदार्थों से लेकर ईश्वर जैसे पवित्रतम तत्व तक में दोनों हैं । सत्य भाग भात्मा है, मर्त्यतस्व शरीर है । शरीर और भात्मा दोनों प्रविना भूत हैं । सारा ब्रह्माण्ड उस ईश्वरात्मा का शरीर है एवं यह प्रस्थिमांसादिषातुमय भौतिक शरीर जीवात्मा का विस्थ है । कोई भी वस्तु उठा लीजिए, प्रत्येक में आपको आत्मा और विश्व दो भाग मिलेंगे । विश्वभाग को सभी देखते हैं । उसके भीतर प्रविष्ट प्रमृत को विरले ही पहचानते हैं । बुद्धिमान् मनुष्य इस म प्रनित्यभाग द्वारा मीतर बैठे हुए उस निस्यतत्त्व को प्राप्त कर लते हैं । जब तक मत्यंमात्र की उपासना है - तब तक वह मनुष्य मृत्युपाश से बद्ध है एवं मृत्यु द्वारा अमृत प्राप्त किए बाद वह स्वयं मृत्यु का भषिष्ठाता बन जाता है । जो स्वयं मृत्यु के चंगुल से निकलकर प्रमृत को प्राप्त कर लेता है — उसके वश में मृत्यु हो जाती है । वह स्वयं यमराज बन जाता है । कैसे बन जाता है? इसके लिए यमराज उदाहरणरूप से अपने प्रापको ओर लक्ष्य दिलवाते हैं । यमराज क्या करते हैं? शरीरभाग को भूमण्डल ] पर ही छोड जाते हैं एवं उसके भीतर रहने वाले अमृत भात्मतत्त्व को ले जाते हैं । शरीर अनित्य है-प्रात्मा नित्य है । इन प्रनित्य शरीरों से नित्य प्रात्मा को निकालकर ले जाना ही एकमात्र यमराज का १ - कठोप ० २।१।१० । [ १११ ]
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Sentre ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत कर्तव्य है । यमराज नचिकेता के बहाने संसार को उपदेश देते हैं कि हे संसार के मनुष्यो! मैं अनित्य शरीरों में निस्य आत्मा को लिया करता हूँ | तुम मुझे देखो । मैं इन्हीं सांसारिक प्रसत्यों से - ‘ असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते " - के अनुसार सत्य लिया करता हूँ । वैसे ही तुम भी इन्हीं पदार्थों से इन पदार्थों के प्रन्तः प्रविष्ट उस गह्वरेष्ठ तत्व को प्राप्त करो । यमराज कहते हैं कि चयन द्वारा मैं इन परियों से नित्य प्राप्त करने में समर्थ हुआ हूँ । इससे चयन को भी उपाय बतलाया जाता है । चयन यज्ञ में प्राधिभौतिक पदार्थमय है । इनसे भी वह प्राप्त हो जाता है । यज्ञों में एक चयनयश ही ऐसा है, जो नित्यतत्व की प्राप्ति का कारण है- जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । " भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति " | " --इस केनश्रुति के अनुसार इन्हीं सांसारिक पदार्थों में तुम्हें वह मिलेगा । यहीं ढूंढो । तर मत जाबो । प्रपने में ढूँढो यही निष्कर्ष है । सारे यज्ञ क्षणिक फल देने वाले हैं । चयनयज्ञ आनन्त्य का कारण है । उसी चयन का माहात्म्यातिशय बतलाते हुए यमराज कहते हैं--" कामस्याप्ति जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् । स्तोममायं प्रतिष्ठा उष्ट्वा धृत्या धोरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ” ॥११ ॥
" सांसारिक सारी कामनाओं के समाप्तिरूप जगत् के प्रतिष्ठारूप यश का, प्रानन्त्यरूप बमय का पारस्वरूप जो उपगाय महत्स्तोम है - उस स्तोमरूप प्रतिष्ठा को देखकर धैर्यबल के सहारे हे नचिकेता! तेने सारी वित्तमयी सुंका को छोड़ दिया है । " जब परमसुख मिल जाता है तो सांसारिक कामनाथों की ' इति श्री हो जाती है । उस भ्रमृत आत्मसुख से बढकर भौर कोई भी सुख नहीं है । मला उसे प्राप्त किए बाद संसार की तु कामनामों का ठिकाना कहाँ रह सकता है? ' नामृतत्वस्याशास्ति हृते बनास के बनुसार चयन का फल धनन्तसुख है । शेष सबसे क्षणिक फल मिलता है एवं चयन से ही बानम्स्य मिलता है । सूय्यं के नीचे का भाग प्रवराय है- ऊपर का भाग परार्ध्यं है- जैसा कि -'ऋतं पिबन्तो ० ' - इत्यादि मन्त्र में स्पष्ट हो जाएगा । त्रिणाचिकेत से २५ वा स्थान मिल जाता है । सूर्य २१ पर ही रह जाता है । चूंकि चयन से इसके ऊपर चला जाता है, बतएव हम अवश्य ही इसे पारगामी कहने के लिए तय्यार हैं । स्वर्ग में पृथिवी की अपेक्षा मय का अभाव है, प्रतएव ' स्वर्गे लोके म किचन मयं म सनस्थं०'2- इत्यादि के अनुसार हम स्वर्ग को ' समय ' कहने के लिए तय्यार हैं । १७ से २५ तक स्वर्ग है । १७ व नाचिकेतस्वर्ग है- २५ वा श्रशोकमहिम नाम का कायप्रस्वर्ग है । मध्य के सात बहः सात स्वर्ग हैं । इस प्रकार अभय स्थान सिद्ध हो जाते हैं । इन श्रों में २१ वें सूय्यं से नीचे १७-१८-१९-२०- ये कार अभय हैं एवं ऊपर २२, २३, २४, २५ -- ये चार अभय हैं । नीचे के चारों सर्वाक् अभय हैं - ऊपर के चारों पराक् श्रभय हैं । त्रिणाचिकेत चयन के अतिरिक्त अन्य सारे यज्ञों से अमय का भक् १- वाक्यपदीय२।२४० । २ - केनोप ० २।१३ । ३ - कठोप ० १।१।१२ । ४- द्रष्टव्य- इसी ग्रन्थ के पृष्ठ ७१ पर दिया गया ' नाचिकेतादिस्वर्ग परिलेख ' । [ ११२ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् स्थान ही मिलता है । इनसे सूय्यं के ऊपर का स्थान नहीं मिल सकता जो कि प्रमय का पार कहलाता है । उसकी प्राप्ति का साधन तो यही त्रिणाचिकेत है । बस, इसी अभिप्राय से ' धमयस्य पारम् ' कहा है । कहना यही है कि यहाँ के ' समय ' शब्द से परात्पर अभिप्रेत नहीं है - अपि तु स्वगं श्रभिप्रेत है । धात्मा तो स्तोममय है । चयन से जो एक नया आत्मा बनता है वह स्तोममय है । त्रित् पञ्चदश-एक विश- इन तीनों में उसकी ( दिव्यात्मा की ) व्याप्ति रहती है । ईश्वर के शरीर में भी यही व्याप्त है । इसी बमृत प्रतिविस्तीर्णं श्रात्मा के प्राधार पर चित्यजगत् प्रतिष्ठित है । हमारे शरीर की प्रतिष्ठा भी यही चितेनिषेय है । चित्यभाग जरा दूर में रहता है- चिठेनिधेय २१ तक जाता है, मतएव चित्य की घपेक्षा हम इसे ' उपाय ' ( अतिविस्तीर्ण ) कहने के लिए तय्यार हैं । यमराज कहता है कि तुमने अभी तक इन सांसारिक चित्य क्षुद्रपदाचों को प्रपना रखा है जब तक कि तुम्हें इस विस्पजगत् के प्रतिष्ठारूप इसको अपनी महिमा मण्डल के एक कोने में रखने वाले चिविधेय धारमा की नहीं पह-चान है । उसको पहचानना धीर का काम है । धीरतापूर्वक उसे ढूंढो वह मिल जाएगा । जिस दिन तुम उसे देख लोगे उसी क्षण नचिकेता की तरह सपंकंचुकियत् तुम सारे मधुब- प्रनित्य - सांसारिक पदार्थो को छोड दोगे । बन्त में उपसंहार करते हुए उसके ज्ञान का चरम फल बतलाते हुए यमराज कहते हैं--" पूर्व गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा घोरो हर्षशोको जहाति ॥१२ ॥
" जो अति कठिनता से दीखने के कारण दुर्दर्श है सांसारिक पदार्थों में भ्रन्तः प्रविष्ट होने से गूढ है - जो गुहा में निहित है- जो गहरे अन्धकार में छुपे रहने से गह्वरेष्ठ है - धनादि होने से पुराणपुरुष नाम से प्रसिद्ध है - ऐसे उस गुहाहित देव को अध्यात्मयोगज्ञान से समझकर घीर मनुष्य हर्ष - शोक दोनों से विमुक्त हो जाता है " । बध्यात्म को देखो - अपने आपको पहचानो मुक्ति घरी पड़ी है- यही तात्पय्यं है । इस बात्मज्ञान का फल क्या है? एवं नचिकेता को वह फल मिला या नहीं? बस, बाकी बचे हुए इस एकमात्र प्रश्न का उत्तर देते हुए यमराज कहते हैं--" एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृद्ध धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोवते मोदनीय ँ हि लब्ध्वा विवृत ँ सद्म नचिकेतसं मन्ये " ॥१३ ॥
हे नचिकेता! जिस आत्मतत्त्व को मैं बतला रहा हूँ एवं भागे बतलाऊंगा - उसे सुनकर एवं समझकर मरणधर्म्मा मनुष्य इन मत्यों में से उसे अलग छौटकर उसे प्राप्तकर- इस मोदनीय को प्राप्तकर सदा के लिए आनन्द - सागर में डूब जाता है । इस प्रकार फल का स्वरूप बतलाकर कहते हैं कि मैं [ ११३ ]