कठोपनिषद — पृष्ठ 151–160

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् समझता हूँ कि मेरे उपदेश से अवश्य ही नचिकेता का घर खुल गया होगा । उसका जो आत्मद्वार भब तक बन्द था- वह इस ज्ञान - प्रकाश से खुल गया होगा । " आपके उपदेश से मेरे हृदय के कपाट खुल गए " - जैसे लोक में यह कहा जाता है उसी के स्थान में यहाँ विवृतं सद्य नचिकेतसं मन्ये ' - यह कहा जाता है । जो श्रुति के इस उपदेश को सुनेगा और समझेगा उसका अज्ञानान्धकार श्रवश्यमेव दूर होगा । नचिकेता द्वारा किए गए तीन प्रश्नों में से पहले दो प्रश्नों का समाधान हो चुका - अब क्रमप्राप्त तीसरा प्रश्नोत्तर - प्रकरण प्रारम्भ होता है । नचिकेता था बच्चा ही, परन्तु था अत्यन्त बुद्धिमान्, भतएव आत्मतत्त्व का जिज्ञासु । इसीलिए यमराज के बहुत प्रलोभन देने पर भी उसका मन न डिगा - अपितु, उसकी जिज्ञासा इन प्रलोभनों से अधिकाधिक बढती ही गई । जैसा कि पूर्व प्रकरण में स्पष्ट कर दिया गया है । प्राज नचिकेता भागे के मन्त्र से उसी का स्वरूप पूछता है । ' म सांपरायः प्रतिभाति बालं०-' न तत्र त्वं न जरया बिभेति ० ' - इत्यादि मन्त्रों से नचिकेता को इस बात का विश्वास दिला दिया गया है कि यह मात्मा शरीर को छोडे बाद लोकान्तर में जाता है । आज उसी सांपरायगति को सामने रखकर यमराज पर कटाक्ष करता हुआ नचिकेता पूछता है-" श्रन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र मृताच्च भव्याच्च यतत्पश्यसि तदृद " ॥१४ ॥

" जो ( तत्त्व ) धर्म और भ्रषम्मं से पृथक् है - कृत और अकृत से भिन्न है एवं भूत पौर भव्य से पृथक् है - हे यमराज! ऐसे धर्माधिम्मं कृताकृत, भूतभव्य से शून्य उस तत्त्व को यदि आप देखते हो ( जानते हो ) तो उसका स्वरूप कृपाकर मुझे भी बताइए " । इस प्रकार यमराज से आत्मतत्त्व का प्रश्न पूछा जाता है । इस मन्त्र के तीन अर्थ हैं । तीनों में से - एक अर्थ के साथ कटाक्ष है । दो में वास्तविकता है । इस मन्त्र के तीनों अर्थों का निरूपण किया जाय – इसके पहले तत्सम्बन्धी कुछ परिभाषाएं जान लेना आवश्यक होगा— इस उपनिषत् में मोक्तात्मा का प्रधानरूप से वर्णन करते हुए अन्त में अक्षर पर विश्राम किया गया है - यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । आज हम उसी मोक्तात्मा और अक्षर की भोर प्रापका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । जिस अक्षर की उपनिषत् के प्रारम्भ से ही हम गाथा गाते मा रहे हैं - उस अक्षर के भन्तर्य्यामी और सूत्रात्मा दो भाग हैं । भागद्रय की समष्टि का नाम प्रक्षर है । प्रत्येक वस्तुमें आत्मा - पद - पुनः पद- ये तीन विभाग होते हैं । केन्द्र में रहने वाली शक्ति का नाम ' आत्मा ' है । केन्द्र के आधार पर प्रतिष्ठित वह वस्तु ' पद ' है - जिस लोकभाषा में ' पिण्ड ' कहते हैं - उसे ही वेद-भाषा में पद कहते हैं एवं पिण्ड से बाहर ३३ तक वितत रहने वाला प्राणमण्डल ' पुनःपद ' है एवं केन्द्र शक्ति ही श्रात्मा है । इन तीन विभागों में जो आत्मा है - वह एक तरफ है, पद और पुनःपद एक तरफ है । आत्मा को ही अन्तर्य्यामी कहते हैं एवं पिण्डको और महिमा को सुत्रात्मा कहते हैं । प्रन्तर्यामी भोर [ ११४ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सुवास्था का क्या स्वरूप है? इसके लिए हम अपने पाठकों का ध्यान ' ईशोपनिषत् ' में बतलाए गए यजुर्ब्रह्म की भोर दिलाना चाहते हैं । यजुर्ब्रह्म में षड्ब्रह्म की आहुति होने से जो एक नया स्वरूप बनता है उसी का नाम महान् है । यजुः औौर षड्ब्रह्म दोनों में यजुर्ब्रह्म प्रधान है । यह यजुर्ब्रह्म यद्यपि क्षर पदार्थ है, परन्तु अक्षरमय है, क्योंकि क्षर अक्षर से अविनाभूत है । इस प्रक्षरमय यजुर्ब्रह्म में हमने स्थिति टौर गति दो भाग बतलाए हैं । वस्तुतः गति ही प्रधान है । यह गति प्रागति - गति - भेद से दो प्रकार की है । प्रागति प्रधि से केन्द्र की ओर है - गति केन्द्र से प्रधि की ओर है । यदि इन दोनों गतियों का रुख एक ओर कर दिया जाता है तो दोनों गति परस्पर माहत होती हुई स्थितिरूप में परिणत हो जाती है । एक गति पूर्व से पश्चिम की ओर अपना रुख रखती, एक गति पश्चिम से पूर्व की ओर घरमा रुख रखती है । दोनों स्वतन्त्र हैं । यदि दोनां विरुद्ध दिग्द्वयगतियों को एक स्थान में मिला दिया जाता है तो दोनों का व्यापार रुक जाता है एवं के दोनों गतियाँ स्थितिस्वरूप में परिणत हो जाती हैं । विष्णु गति केन्द्र की तरफ भाने वाली है ही यदि केन्द्र से बाहर जाने वाली इन्द्रगति को ही बाबति बना डाला जाता है तो दोनों गतिएं मर जाती हैं । दो रस्सिएँ अलग - अलग हैं । एक को एक मनुष्य पूर्व से पश्चिम ले जा रहा है, एक को पश्चिम से पूर्व ले जा रहा है । दोनों विभिन्न गतिएं हैं । यदि दोनों रस्से बांध दिए जाते हैं एवं बाँधे बाद उन्हें खेचा जाता है तो दोनों गतियों से - समुच्चय से - बहु दोनों गतिएं स्थितिरूप में परिणत हो जाती हैं । न रस्सा पूर्व जाता है - न पश्चिम जाता है । बस, ठीक यही बात यहाँ है । जब तक प्रागति - गति स्वतन्त्र है तब तक गति है । दोनों का समुच्चय स्थिति है कब इससे हमें यही है कि स्थिति कोई वस्तु नहीं है । गति ही पसली पदार्थ है । यजुः व है । पक्षर फुबंदरूप है । यही कुवंरूप अक्षर मध्य में बैठा हुआ क्षर को पकड़कर सारा संसार दबाबा करता है एवं अध्यय की भोर झुककर ज्ञानमूर्ति बनता हुमा प्रतिसञ्चर किया करता है । यही कुर्बदरूप चतएव गतिरूप अक्षर जिसे कि वेदाविनाभूत रहने के कारण वेद नाम से पुकारेंगे - धन्तर्यामी बौर सुत्रात्मा वो स्वरूपों में परिणत हो जाता है । जिस अक्षर को गतिरूप बतलाया है - वह गति बागति-मति वो प्रकार की है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । यदि इन दोनों विरुद्ध गतियों का विशेष हट जाता है तो यही ' स्थिति ' हो जाती एक ही गतितत्त्व ' गति - आगति स्थिति ' भेद से तीन । इस प्रकार रूप धारण कर लेता है । इन्हीं तीनों को इन्द्र - विष्णु- ब्रह्मा कहते हैं । गतिसमष्टि ब्रह्मा है । शुद्ध आगति विष्णु है । सुद्ध गति इन्द्र है । ब्रह्मतत्त्व प्रालम्बन है । हन्द्वतत्त्व विक्षेपणधम्र्मा है । विष्णुतत्त्व भावान हा बधिष्ठाता है । ब्रह्मा ' य ' है । इन्द्र ' द ' है । विष्णु ' हृ ' है । तीनों के समुन्वय का नाम ' हृष्य ' है । हृदय में ' हृदय ' रहते हैं । हृदय प्रन्तर्मण्डल है - इसी में चूंकि ये तीनों अक्षर - दूसरे शब्दों में अक्षर के तीनों दिबस रहते हैं, अतएव इस त्रिमूत्ति को हम - ' अन्तर्यामी ' कहने के लिए तय्यार हैं । शुद्ध गतिरूप इन्द्र यदि उस स्थितिमय ब्रह्म में लीन हो जाता है तो वही गतिगर्भित ( इन्द्रगर्भित ) ब्रह्मतत्त्व अग्निस्वरूप में परिणत हो जाता है एवं प्रागतितत्त्व यदि उसमें लीन हो जाता है तो वही ब्रह्मतत्त्व सोम बन जाता है । इस प्रकार इन्द्र - विष्णु के संयोग से उसी प्रक्षर के अग्नि - सोम दो विवर्त प्रौर हो जाते हैं । अग्नि-सोम एक युग्म है । इन्द्र विष्णु एक युग्म है । ब्रह्मा एकाकी है । अग्निसोम इन्द्रविष्णु पर प्रतिष्ठित हैं । इन्द्र - विष्णु ब्रह्मतत्त्व पर प्रतिष्ठित हैं । ब्रह्मा सबकी प्रतिष्ठा है, अतएव - ' ब्रह्म व सर्वस्य प्रतिष्ठा'- -यह [ ११५ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कहा जाता है । इस प्रकार एक ही अक्षर के निम्नलिखित पाँच विवत्तं हो जाते हैं । इन्हीं पांच अक्षरों से सारे विश्व का निर्माण होता है-१- ब्रह्मा = गतिसमष्टि: = यम् २- विष्णुः = आगतिः ह् 3-372: * गतिः → द ४- अग्निः - गति विशिष्टा स्थितिः > अ ( आलम्बन ) → हृदयम् - क्ष ( क्षि- निवासे इत्यनेन वस्तुस्वरूपस्य स्वरूपे स्थितिः ) रम् ( रादाने इत्यनेन विक्षेपणम् ) → सूत्रात्मा ५- सोमः = आगतिविशिष्टा स्थितिः वही यक्षर अग्नि - सोम द्वारा सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । हृदयसत्य से चारों मोर रश्मिरूप से व्याप्त रहने के कारण ही अग्नि- सोमसमष्टि को ' सूत्रात्मा ' कहा जाता है । प्राणवायु का नाम ही ' सूरमा ' है । यह प्राणवायु प्राग्नेय सौम्य भेद से दो प्रकार का है । आग्नेय वायुसूत्र को सत्य सूत्र कहा जाता है, क्योंकि अग्नि सत्य है एवं सौम्य वायुसूत्र को ऋतसूत्र कहा जाता है, क्योंकि सोम ऋत है । बस, इसी ऋत और सत्य दो सूत्रों से वह अन्तर्यामी ध्यक्षर प्रजापति सारे संसार में व्याप्त हो रहा । संसार के सारे पदार्थं अग्नीषोमात्मक हैं - सूत्रात्ममय हैं । वह हृत् शक्ति ही इन सूत्रों के सहारे सारे संसार मेंव्याप्त रही है । इन सूत्रात्मा और अन्तर्यामी दोनों में पहले कौन है मोर बाद में कौन है? इसका उत्तर कठिन है । इस कठिनता का कारण यही है कि सूत्रात्मा पिण्ड का निम्मति है । पिण्ड के केन्द्र में अन्तर्य्यामी हृदयसत्य रहता है । पिण्ड हो तब अन्तर्य्यामी हो, प्रन्तर्यामी हो - तब पिण्ड बने । दोनो अन्योऽन्याश्रित हैं, प्रतएव इनके पूर्व भावित्वा परभावित्व वा निर्णय करना कठिन है । कुछ भी हो अन्तर्यामी पहले हो अथवा सूत्रात्मा पहले हो इस झगड़े से हमारा कोई प्रयोजन नहीं । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि यजुर्ब्रह्म अक्षरमय होने से अक्षर है, अतएव यजुः के क्षर होने पर भी वेदों को नित्य बतलाया जाता है । यही अक्षरस्वरूप वेदब्रह्मा श्रवस्थाविशेष के कारण ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, श्रग्नि, सोम - इन पाँच स्वरूपों में परिणत हो जाते हैं । चूंकि पांचों ब्रह्मा के ही विवर्त हैं, प्रतएव पांचों को ' ब्रह्मा ' कहा जाता है । ब्रह्मा तो ब्रह्मा है ही, विष्णु भी ब्रह्मा है, इन्द्र भी ब्रह्मा है, अग्नि मी ब्रह्मा है, सोम भी ब्रह्मा है । बस, ये ही पाँच ब्रह्मा ससार के कर्ता - धर्त्ता हैं । ये पाँचों अक्षर हैं, प्रतएव इन्हें विरजा कहा जाता है । मूर्त पदार्थ को ' रज ' कहते हैं । प्रमूर्त मौलिक पदार्थ ' विरण ' कहलाते हैं । अव्यय - अक्षर प्रात्मक्षर सभी विरज हैं । विकारक्षर की पाँच कला रज हैं एवं आत्मक्षर एवं अक्षर की पाँचों कलाएँ विरजा हैं । इन विरजा पाँच ब्रह्माओं में से त्रिब्रह्म केन्द्र में निगूढ रहने से ग्रन्तर्यामी हैं एवं शेष दोनों ' सूत्रात्मा ' हैं । ये ही दोनों सूत्रात्मा मनु भगवान् के- ' अर्धेन नारी तस्थां स विराजमसृजत् प्रभु ' - इस श्लोक के पुरुष और स्त्री हैं । वृषारूप होने से अग्निरूपसत्य सूत्रात्मा पुरुष है एवं योषारूप होने से सोमरूपत सूत्रात्मा स्त्री है । इन्हीं दोनों के समन्वय से दशा-[ ११६ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् वयव ( १० ) विराट् पुरुष की उत्पत्ति होती है । इन्हीं के पांच प्राकृतस्वरूप एवं पाँच वैकारिकस्वरूप होते हैं । स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा पृथिवी - ये पाँच तो प्राकृतात्मा हैं एव पांचों के वेद, लोक, देव, भूत, पशु - ये पाँच वैकारिकात्मा हैं । इन दसों को पैदा करने वाले वे ही पाँच अक्षर हैं । असल में पाँच अक्षरों में पैदा करने वाले तो अग्नीषोम ही हैं । हृद्य व्यक्षर तो नियामकमात्र है, अतएव ' तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः - कहा है । अस्तु, इस विराट् का स्पष्टीकरण हम धनुपद में ही विस्तार के साथ करने वाले हैं, अतः इसे यहीं छोड थोड़ी देर के लिए उसी अन्तर्य्यामी और त्रात्मा पर आते हैं । अक्षर से अव्यय और मात्मक्षर का ( षोडशी का ) ग्रहण होता है - यह प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतलाया जा चुका है, अतएव उस विषय को बार - बार दोहराना उचित नहीं समझते । केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि प्रक्षर से ( षोडशी से ) ब्रह्मादि पाँच अक्षर निकलते हैं । एक पचरूप धारण करता है । इसमें पांचो मे प्राणादि पांच विकार उत्पन्न होते हैं । यही उस प्रक्षरब्रह्मा के पाँच मुख हैं । पाँचों से वेदलोकादि पाँच सृष्टि होती हैं । अक्षरभाग अमृतभाग है - प्राणादि पाँच भाग मत्यं-माग हैं । दोनों अविनाभूत हैं । बह्मा - विष्णु - इन्द्र- प्रग्नि - सोम एव प्राण- आपः वाक् प्रन्नाद - अन्न दसों अमृत- मर्त्यभागों के सम्बन्ध से - स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी इनका जन्म होता है । ये ही पाँचों उस अक्षर नाम से प्रसिद्ध गूढोत्मा की प्रकृतिएं कहलाती हैं । अक्षर पुरुष है - इसमें षोडशी है । स्वयम्भू आदि पांच प्रकृतिएँ हैं एवं वेद, लोक, देव, भूत, पशु - में पाँच विकृतिएँ हैं । पुरुष आत्मा है-प्रकृति प्राण है - विकृति पशु हैं । इन तीनों का वह विश्वातीत परात्पर भालम्बन है । बस, यही सारे ईश्वर का स्वरूप है । ' चतुष्टयं वा इवं सर्वम् ' के अनुसार उसमें १ - प्रखण्ड, २- पुरुष, ३ - प्रकृति, ४ - विकृति - ये चार भाग हैं । चारों का जो समुदाय है उसी का नाम ' सत्य ' है । इसे हो ' ओम् ' कहते हैं । आगे जाकर ' ओमित्येतत् ' से यमराज इसी सत्य का स्वरूप बतलाने वाले हैं । यह सत्य ससार का एक सत्य है । संसार में यह एक प्रोंकार खड़ा है । इस प्रोंकार में चार भाग हैं । इस एक व्यापक झोंकार के पेट में असंख्य ओंकार रहते हैं । यहाँ तक कि भाप संसार में जो कुछ देखते हैं - सभी प्रकार हैं । चींटी से लेकर हाथी तक, राई से पर्वत तक मनुष्य से ऋषि तक सभी ओकार हैं । ओंकार हो प्रत्येक का स्वाभाविक रूप है । परन्तु साथ ही में हम ओंकार के ' एक पर तीन ' - इस सांकेतिक अर्थ पर भी ध्यान रखने के लिए चेतावनी दे देते हैं । प्रत्येक वस्तु में दो भाग हैं । एक माग एक है- अखण्ड है-प्रालम्बन है । दूसरा भाग त्रिखण्ड है - आलम्बित है, अतएव हम सभी को पूर्वपरिभाषानुसार ओम् कहने के लिए तय्यार हैं । प्रत्येक प्रकार में जिस श्रमात्र भाग पर रहने वाली जो त्रिमात्राएँ हैं वे श्रात्मा - प्राण - पशु नाम से व्यवहृत होती हैं । इन्हीं तीनों की समष्टि का नाम सत्य है । यह त्रिसत्य ' जिस उस प्रमात्र प्रखण्ड पर प्रतिष्ठित है वह इस त्रिसत्य का श्रालम्बन एवं प्रभव प्रतिष्ठा एवं परायण होने से -' सत्यस्य सस्यम्'- कहलाता है । ओंकार में चूंकि सत्यस्य सत्य और त्रिसत्य दो सत्य हैं, अतएव प्रकार सत्य शब्द से व्यवहृत होने लायक है । चूंकि सभी श्रोंकार हैं, अतएव हम सभी को ' सत्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । अभी हम नाना सत्यों का छोड़ते हैं । पहले नाना सत्यों को अपने पेट रखने वाला जो महासत्य है - परम ओंकार है उसी की ओर आपका ध्यान प्राकर्षित करते हैं । १ - श्रीमद्भागवतपुराण - १०।२।२६ । [ ११७ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् महामायावच्छिन्न पुरुष, उसकी पांच प्रकृतिएं और पांच विकृतिएँ एवं चौथा परात्पर- इन चारों की समष्टि ही परम ओंकार है । वैज्ञानिक परिभाषा में इसे ही ' सत्य ' कहते हैं । ब्रह्मसत्य एक है । इसी के लिए- ' ब्रह्मवेवं सवं नेह नानास्ति किञ्चन ' - यह कहा जाता है । ईशोपनिषत् में बतला दिया गया है कि जहाँ तक महामायावच्छिन्न षोडशी पुरुष की व्याप्ति है- वहीं तक वेदवह्या की व्याप्ति है । वेद ' वेद- सुवेद ' भेद से दो प्रकार का है । दोनों क्रमशः यजुर्ब्रह्म - सुब्रह्म नाम से प्रसिद्ध हैं । दोनों की समष्टि ही शुक्र है । यह वेदमय शुक्र अक्षराभिन्न है, प्रक्षर को ही अमृत कहते हैं, घतएब इस व्यापक शुक्रतत्त्व के लिए - ' सवेव शुक्रं तद् ब्रह्म तवेषामृतमुच्यते ' -- यह कहा जाता है । इसी वेद सुबेदमय ब्यापक शुक्र का नाम ' पश्वत्थ ' है । यह उस पुरुष से अविनाभूत है एवं शुक्र प्रकृति - विकृतियों से प्रविनाभूत है, अतएव परात्पर षोडशी - प्रकृति - विकृति चारों के समुच्चयरूप परम ओंकार को ही ' अस्वस्थ ' कह दिया जाता | आगे स्वयं महर्षि विस्तार के साथ इस अश्वत्थ का निरूपण करने वाले हैं, प्रतएव यहाँ हम उसके विषय में अधिक नहीं कहना चाहते । इस अश्वत्थवृक्ष का ही नाम ब्रह्मसत्य है । यही घसी वस्तु है । सारे उपनिषत् इसी अश्वत्थ विज्ञान पर प्रतिष्ठित प्रतएव इसे खूब ही ध्यान में रखना चाहिए --अश्वत्थ: --- मासस्यम् १- परात्परः--२- षोडशी -अमात्रः --- अखण्डः ---- - अर्द्धमात्रिकः ( सत्यस्य सत्यम् ) पुरुष: - -- ' अ ' आत्मा ३ - पञ्च प्रकृतयः -- ' उ'-, -प्राणाः ' → सत्यम् परमोंकार: ४- पञ्च विकृतयः -'म्'- पशवः इस ब्रह्मसत्य नाम को - अश्वत्थ को ही ' प्रजापति ' कहते हैं । इस वृक्ष की सहस्र शाखाएं हैं । शाखा को विज्ञानपरिभाषा में सहस्र महान् के कारण इसमें सहस्र ही शाखाएँ हो जाती हैं । इसी ' बल्शा ' कहते हैं । जिसे लोकभाषा में ' टहनी ' कहते हैं - वही वेदभाषा की ' बल्शा ' है । इस प्रत्येक डल्सा में महान् के भेद के कारण स्वयम्भू - परमेष्ठी सूय्यं पृथिवी चन्द्रमा - ये पांच - पांच प्राकृतभाग और वेद - लोक देव भूत- पशु- ये पांच - पांच विकृतिभाग सिद्ध हो जाते हैं । एक अश्वत्थ के ब्रह्म और कम्मं दो भाग हैं, क्योंकि प्रश्वत्थ का मूलभूत अव्ययपुरुष ब्रह्मकर्ममय है । ये ही दोनों भाग ब्रह्माश्वत्थ और कमश्वत्य नामों से प्रसिद्ध हैं । इसमें जो ब्रह्माभ्वत्थ है - उसी के स्वयम्भू आदि विभाग हैं । हमें कहना पड़ता है कि वेदान्त के प्राचार्यों ने केवल कम्मश्वित्थ का ही निरूपण किया है । उन्होंने ब्रह्माश्वत्थ को तो हुमा भी नहीं है । शुक्र - ब्रह्म - प्रमृत तीनों की समष्टि का नाम ही अश्वत्थ है । शुक्र से पञ्च प्रकृतिएँ अभिप्रेत हैं । ब्रह्म से आत्मक्षर अभिप्रेत है एवं अमृत से अभय प्रव्यय - भक्षर अभिप्रेत हैं । समय परात्पर है । अध्यय प्रसिद्ध ही है । यद्यपि अमृत अक्षर को ही कहते हैं, परन्तु ' उपनिषदों का अक्षर गूढोत्मा-परक हैं ' - इस नियम के अनुसार हम इससे अमय अव्यय - अक्षर तीनों का ग्रहण कर सकते हैं । इस [ ११८ ]

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) वल्ली द्वितीया ( प्रथमाध्याय माध्य कठोपनिषद्विज्ञान विद्यानिरूपणोपनिषत् अश्वत्थ ही वाला ठहरने में अश्व ॥ है प्रश्वत्थ असली त्रिलोकी रोदसी यही वस्तुतस्तु । हैं चन्द्रमा पृथिवी- सूय्यं में पेट इसके । है शुक्र नाम ही का महान् और अव्यक्त । है जाता कहा यह - ' किञ्चन नात्ये तदु प्रवश्यमेव लिए के प्रश्वत्थ प्रतिपादित से ' तदेवामृतमुच्यते ब्रह्म तद् शुक्रं तवेव ' - प्रकार । सकता जा किया नहीं निरूपण यहाँ से विस्तारभय कि जिनका - हैं अर्थ कई भी और के शब्द अश्वत्थ । हैं तय्यार लिए के कहने ' अश्वत्थ ' को जोकत्रयी इस ही अवश्य हम अतएव , हैं प्रतिष्ठित त्रिलोकी रोदसी पृथिवीरूप चन्द्र- सूय्यं में उसी । है बद्ध से महान् वह अतएव , है श्रश्व पशु का महानात्मा इस । है महान् परमेष्ठी । हैं वस्तु की परमेष्ठी पशु अश्व । है कहलाता किञ्चन- नात्येति । तदु सदें भिताः लोकाः तस्मिन् ' - ' तदेवामृतमुच्यते ब्रह्म तद् शुक्र तवेव ' से- अभिप्राय इसी , बस । बचता नहीं कुछ बाहर इसके । है जाता हो समावेश सबका में अश्वत्थ प्रकार इस । है ग्रहण से शुक्र का विकृतियों तदन्तर्गत और प्रकृति एवं है ग्रहण से ब्रह्मशब्द का आत्मक्षर । है ग्रहण से शब्द अमृत का तीनों इन प्रक्षर अव्यय परात्पर इसके । है प्रश्वत्थवृक्ष स्थिर ही ओंकार परम । है जाती आ चारो - विकृति , प्रकृति , पुरुष, परास्पर में पेट के अश्वत्थ में शब्दों दूसरे - है जाती पहुँच तक अमृतभाग इस व्याप्ति की अश्वत्थ इस प्रकार इस । सकता बन नहीं ही स्वरूप उसका तो विना उसके । है भाग आधा- का प्रजापति मत्यंभाग । सकता रह नहीं भाग सत्यं विना के अमृत इस । है सकता जा किया ग्रहण से शब्द ' प्रमृत ' का तीनों उन प्रतएव , हैं अमृत तीनों पूर्वोक्त । हैं मत्यं से होने विपरिणामी मात्मनरादि प्रलावा के तीनों इन । है परात्पर श्रव्यय- प्रक्षर आलम्बन इसका । है जाता माना में श्रेणी स्वतन्त्र से होने क्षर प्रात्मक्षर नामक ब्रह्म यह । है सकता जा कहा मी ब्रह्म को अश्वत्थ अतएव , हैं कहते ब्रह्म को इसी - है जाता आ में पकड़ भी आत्मक्षर साथ के अश्वत्थ शुक्ररूष अतएव, सकता रह नहीं के मात्मक्षर विना क्षर यह । है पदार्थ क्षर शुक्र । है सकता जा माना वाला करने ग्रहण का प्राकृतात्मानों पाँचों को शब्द ' शुक्र ' के यहाँ मतएव , है रखता सम्बन्ध से रोदसी अश्वत्थ । है निरूपण का अश्वत्थ यहाँ परन्तु , है होता ग्रहण ही का भव्यक्त और महान् केवल से शुक्र यद्यपि । है जाता हो ग्रहण का पाँचों प्रकार इस - का तीनों पृथिवी चन्द्रमा सूय्यं हुए बैठे में पेट के महान् और महान् , अव्यक्त से शब्द ' ' इस प्रकार इस । है जाता कहा ' शुक्र ' को समष्टि की महान् अव्यक्त इसी । है व्यक्ताविनाभूत यह - रहता नहीं अकेला महान् उधर । है आता में पकड़ वह साथ के महान् । रहता नहीं अकेला अश्वत्थ । हैं सकते कर ग्रहण का तीनों से महान् हम मतएव , हैं होते लीन वहीं । हैं रहते प्रतिष्ठित वहीं - हैं होते उत्पन्न चन्द्रमा पृथिवी सूपं ही में पेट के महान् । है ही महान् श्वत्थ तो पूछो सच । है जाता भा में पकड़ मी महान् से अश्वस्थ अतएव , हैं रहते तीनों में पेट के महान् । है अनुपपत रोदसी विना के महान् परन्तु , है होता सिद्ध अश्वत्थपना ही का रोपी पूर्वव्याख्यानुसार यद्यपि । है जाता कहा यह - ' तत् एतद्वै ) प्रात्मक्षरः ( ब्रह्म -- २ ) पञ्चविकृतयः पशु भूत- देव - लोक - वेद प्रकृतयः पञ्च इत्येताः चन्द्र पृथिवी - सूर्य्य - परमेष्ठी - स्वयम्भू ( शुक्रम् - १ ) परात्परः अव्ययः -: अक्षर ( अमृतम् ३-] ११६ [

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मध्यय ( द्वितीया वल्ली ) १- परात्परः कठोपनिषद्विज्ञान माध्य ( अश्वत्थ: --- परम शोंकारः ) * श्रमात्रा मर्द्धमात्रा २- प्रव्ययः → तदेवामृतमुच्यते १ ३ - अक्षरः + पुरुष: ( षोडशी ) ' ख ' ४ -- आत्मक्षरः ] + तद्वह्म ५- स्वयम्भूः ( वेदाः ) ६- परमेष्ठी ( लोका: ) २ ७- सूर्य: ( देवाः ) -- → तदेव शुक्रम् पञ्च प्रकृतयः ----A. ३ -न्द्रमाः ( भूतानि ) पञ्च विकृतय:: ist - पृथिवी ( प्राण:) पूर्व में हम कह आए हैं कि इस अश्वस्थ की एक हजार बलशा । इनमें प्रत्येक में महान के कारण स्वयम्भू आदि पांच - पांच पुण्डोर हो जाते हैं । हजारों के नाम ये ही हैं, अतएव परम ओंकार के साथ उन सहस्रों को एकत्र कर उन्हीं नामों से उन्हें एक बार में गिना दिया जाता है । बस, इसी सहल दशायुक्त पश्वत्थ का नाम झात्मा - प्राण- पशु के कारण सत्य है I । यह सत्य उसी एक भारमब्रह्म का विव है, अतएव हम इसे ' ब्रह्मसस्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । इस ब्रह्मसत्य के जो स्वयम्भू पावि पाँच म हैं उनमें प्रमृत और मत्यं दोनों भाग हैं । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र सोम - अग्नि - ये पाँचों अक्षर की कलाएँ हैं । ffet का आलम्बन अव्यय है । अलग देखो तो पांचों के साथ पाँच ही भव्यय हैं- पाँच ही समय ( परात्पर ) है - समष्टि से पाँचों अक्षरों को एक प्रक्षर समझो तो एक अव्यय और एक परात्पर इसका बलम्बन है । अक्षर का नाम ही प्रकृति है । पूर्व में हमने भात्मक्षर को आत्मा बतलाया था । अब ये प्राण समझिए । ब्रह्मा प्रभूतभाग है - प्राण मर्त्यभाग है । ब्रह्म अक्षर है - प्रकृति है । प्राणाक्षर प्रकृति है । दोनों का समुच्चय स्वयम्भू है । यही ब्रह्मसत्य है । यही क्रमशेष चारों में समझना चाहिए एवं इनके साथ ही प्राणादि क्षरभागों से उत्पन्न होने वाले वेदादि पञ्च विकृतियाँ भी रहती हैं । बस, इन सबकी समष्टि का नाम ही ' ब्रह्मसत्य ' है । यही अश्वत्थ का असली स्वरूप है । इस ब्रह्माश्वत्य के स्वयम्भू-परमेष्ठी सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी ये पाँचों प्रकृतिएँ हैं । प्रकृतिएँ क्या है? अक्षर और क्षर ( ब्रह्मा - विष्णु-इन्द्र - सोम - अग्नि - प्राण - श्रापः वाक् प्रप्न- अन्नाद ) दोनों की समष्टिरूप सत्यपिण्ट हैं । सन्द्र सारीर वस्तु [ १२० ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् को ही सत्य कहते हैं । इस सत्यभाव का व्यक्तीभाव चूंकि इन्हीं पाँचों में ब्रह्मसत्य कहा जाता है । इस ब्रह्मसत्य के भीतर वेदादि विकारक्षर हैं होता है, अतएव इन्हें ही देवता भूत - प्राण क्रमशः ये पाँच विकारक्षर हैं । ये ही पाँचों पशु हैं । इनके । पांचों ब्रह्मसत्यों में वेद - लोक-हैं । इनके भीतर ब्रह्मादि पांच अक्षर हैं । उसके भीतर अव्यय भीतर प्राणादि पाँच ग्रामक्षर है । उसके भीतर सर्वालम्बन परात्पर अभयतस्त्व है । सबसे स्थूल पाँच ब्रह्मसत्य हैं । वेदादि पशु, प्राणादि मात्र प्रकृति, भव्ययाम्यपुरुषपरात्पर - सब उसी ब्रह्मसत्य में क्रमिकरूप से निगूढ क्षरप्रकृति, ब्रह्मादि पक्षर की समष्टि ' गूढोत्मा ' कहा जाता है । परन्तु हम इतना फिर स्मरण दिला हैं, प्रतएव उस सारे प्रप बक्षा के अभिप्रायपरक हैं । असल में उस अश्वत्थ में ऐसे पाँच देते हैं कि ये पांचों यह सहस्र चूंकि हमारा सम्बन्ध एक बल्शा से है, प्रतएव हम एक भाग का ही सत्य वर्णन एक करते हजार स्थान पर हैं परन्तु हैं । ब्रह्मसत्य कथा वस्तु है? पाठक इस प्रश्न का उत्तर भलोमति मारमा - प्राण पशुभाग को भी समझ गए होंगे । यद्यपि ब्रह्मसत्य समझ गए होंगे एवं इसके प्रधानता के कारण स्वयम्भू आदि पाँचों पिण्डों के समुदाय को में सब कुछ है, परन्तु हम स्थूलभाव की सत्य शब्द से दृष्टि परात्पर तक रखनी चाहिए । परन्तु हम ही ' ब्रह्मसत्य ' कहेंगे । पाठकों को ब्रह्म-व्यवहार में लायेंगे । तो बस, अब तक कहने का निष्कर्ष यही स्वयम्भू आदि नाम से ही ब्रह्यसत्य को पृथिवी - पांचों की समष्टि ब्रह्मसत्य है । इस ब्रह्मसत्य पर हुआ कि स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूर्य - चन्द्रमा-रहते हैं - दो देवसत्य घालम्बनरूप ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित देवसत्य हैं रहता है- देवसत्य रहता क्या है-। वे दोनों देवसत्य साक्षी और नाम से प्रसिद्ध हैं । दोनों में ही प्रात्मा - प्राण- पशु तीनों भाग भोका कहने के लिए तय्यार हैं । इन दोनों का निर्माण देवभाग से हैं होता , अतएव तीनों को हम अवश्य ही ' साथ ' है । इस प्रकार कुल तीन सत्य हो जाते हैं । तीनों अविनाभूत हैं । ब्रह्मसत्य है, अतएव इन्हें ' वेबसस्थ ' कहा जाता तीनों लाजिम मलजूम ( अविनाभूत ) हैं - इसी आधार पर, साक्षी देवसत्य, भोक्ता देवसस्य-तीनों में हम ब्रह्मसत्य का स्वरूप बतला चुके । अ क्रमप्राप्त ' त्रिः सत्या में देखा: ' - यह कहा जाता है । इन दोनों देवसत्यों में साक्षी देवसत्य प्रधान है, अतएव सबसे देवसत्य का स्वरूप बतलाना चाहिए । आकर्षित करना चाहते हैं । पहले हम अपने पाठकों का ध्यान उसी बोर ' देवसत्य'-जिस ब्रह्मसत्य का पूर्व में निरूपण किया जा चुका चार भागों को आप थोड़ी देर के लिए अलग है उसके स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूर्य - चन्द्रमा- हम डालिए । बस, पृथिवी के स्वरूप को समझना देवसत्य रख दीजिए के । बाकी बचे हुए पृथिवी भाग पर दृष्टि - इसका उत्तर है- प्रग्नि अक्षर और अनाद क्षरभाग की स्वरूप को समझना है । पृथिवी क्या है? एवं क्षर अन्नाद नामक मर्त्य प्रग्नि का समुच्चयमात्र है । समष्टि । पृथिवी - पिण्ड अक्षररूप अमृतान जैसे शेष चारों में क्रमश: प्रमृत अमृत विष्णु मर्त्य प्रापः, अमृतइन्द्र - मवाक्, अमृतसोम- ब्रह्मा - मत्प्राण, पिष्ट को आप देख रहे हैं उसमें मो अमृताग्नि- मर्त्यभूत- ये दो - दो भाग हैं - एकमेव जिस पृथिवी बित्य- चितेनिषेय नाम प्रसिद्ध हैं । पृथिवी का गोला मर्त्यप्राण चित्य ( मर्त्याग्नि ) दोनों हैं । यही दोनों अग्नि अग्नि से बना है, पतएव वह नाशबाद [ १२१ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् 1 एक न एक दिन पृथिवोपिष्ठ प्रवश्य ही नष्ट होगा । इस चित्य पिण्ड पृथिवी के विषय में तो कोई सन्देह ही नहीं है । दूसरा है - चितेनिघेयामृत नामक चितेनिषेयाग्नि । चित्याग्नि पिण्डमय है-वह पिण्डस्वरूप में परिणत होकर पिण्ड तक ही अभिव्याप्त रहता है । परन्तु जो अमृताग्नि है - वह पिण्ड तक ही नहीं रहता । अपि तु पिण्ड में सर्वत्र व्याप्त रहता हुमा वह मग्नि पिण्ड से बडी दूर तक अपना एक मण्डल बनाता है । इसी पार्थिव अग्निमण्डल को याज्ञिक परिभाषा में ' रथन्तर ' - साम कहते हैं । पृथिवीपिण्ड भूतमय है - यह दूसरा भाग प्राणमय है, अतएव इसे प्राणमण्डल भी कहा जाता है - चूंकि यह ( प्राण ) मण्डल पार्थिव अमृताग्निमय है, अतएव इस बहिर्मंण्डल को भी ' पृथिवी ' हो कहा जाता है । इस प्रकार चित्य - चितेनिषेय भेद से चित्य पृथिवी, चितेनिषेय पृथिवी दो पृथिवी हो जाती हैं । याज्ञिक परिभाषा में ये ही दोनों प्रषाढा - उख्या नाम से प्रसिद्ध है । उख्या पृथिवी का त्रिद्वत् पञ्चदश- एकविंश- इन स्तोमों से सम्बन्ध है, भतएव वैज्ञानिक परिभाषा में ये दोनों पिण्डपृथिवी, स्तोम्यपृथिवो इन नामों से ब्यवहृत होती है । इन दोनों में जो पिण्डपृथिवी है वह तो ब्रह्मसत्य का ही एकमाग है । इस प्रकार इस ब्रह्म-संस्परूप पिण्डपृथिवी और ब्रह्मसत्यरूप चन्द्रमा के बीच में ब्रह्मसत्यालम्बन पर ब्रह्यसत्य से अलग एक स्तोम्या चिते निघेया पृथिवी की सत्ता और सिद्ध हो जाती है । बस, हमारे देवसत्य का इसी स्तोम्य-पृथिवी से सम्बन्ध है । तो बस, अब आप उधर ब्रह्मसत्य के स्वयम्भू - परमेष्ठी सूर्य्य - चन्द्रमा - इन चार भागों को छोड दीजिए- इधर पिण्डपृथिवी को छोड दीजिए - एवं दोनों के मध्यपतित चितेनिधेय उख्या पृथिवी को ले लीजिए | इतना हम और कह देते हैं कि इस वितेनिधेया पृथिवी की सत्ता २१ तक है-अर्थात् है - इससे सौरभाग के भ्रम में नहीं पड़ जाना चाहिए । सूय्यं पृथिवी - अन्तरिक्ष से सम्बन्ध रखने बाले तीन लोक मित्र हैं । वह त्रिलोकी तो उदृढ त्रिलोकी नाम से प्रसिद्ध है । इधर इस नई त्रिलोकी का केवल पृथिवीलोक से सम्बन्ध है । पृथिवी पृष्ठ से २१ तक वितत पार्थिव - मग्नि के धन, तरस, विरल तीन माव हो जाते हैं, अतएव एक ही पार्थिवामृताग्नि के अग्नि, वायु, इन्द्र - तीन नाम हो जाते हैं । इन तीनों का विशद विवेचन ' केनोपनिषत् ' में किया जा चुका है ' अतएव हम इस विषय के निरूपण में पाठकों का अधिक समय नहीं लेना चाहते । यहाँ सूक्ष्मरूप से हमें इतना मात्र बतला देना है कि पृथिवी के त्रिवृत्स्तोम तक प्रग्नि रहता है, पञ्चदश तक वायु रहता है । ' हतुरीया पहा गृह्यन्ते ' के अनुसार प्रत्येक वायु में एक चौथाई इन्द्र रहता है एवं ' स्वाततपोवन्तरिक्षम् ' के अनुसार इसी अन्तरिक्ष में सोम भी भरा रहता । एक दया प्रापः और है । परन्तु उसका सोम में ही अन्तर्माव कर लिया जाता है । इस प्रकार त्रिवृत् के भागे वाले पञ्चदशस्तोममय अन्तरिक्ष में - प्रापः, वायु, इन्द्र, सोम - इन चार पदार्थों की सत्ता सिद्ध हो जाती है, अतएव पृथिवीपिण्ड के चारों भोर पहले पानी का स्तर माना जाता है? - ऊपर वायु का स्तर माना जाता है । इसी में इन्द्र रहता है । इसके ऊपर सोमव्याप्ति मानी जाती है । यहाँ का इन्द्र मरुत्वान् सम्बन्ध से मरुत्वानिन्द्र कहलाता है । इसके बाद है- एकविशस्तोम । इसमें जो इन्द्र है वह मघवा कहलाता है । यही तीनों पार्थिव स्थान इस चितेनिषेय पृथिवी के पृथिवी - बन्तरिक्ष- यो तीन लोक कहलाते हैं । ज्ञान १- द्रष्टव्य स्व ० शास्त्रीजी कृत ' केनोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' पृष्ठ सं ० २६० से २६२ । २- शत ० ग्रा ० ७।१।१।२२ । [ १२२ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) २- मत्स्यपुराण प्र ० ३।१६ । ४- यास्क निरुक्त दैवतकाण्ड ७।२३ । कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् ३ - ऋग्वेद मं ० ११६८१ । ४- कठोप ० १।११७ । [ १२३ ] बिल्कुल सूक्ष्म है । क्रिया सूक्ष्मासूक्ष्म है । भयं स्थूल है । एक ही अग्नि इन्हीं तीन भावों में परिज I होकर प्रग्नि, वायु, इन्द्र नाम धारण कर क्रमशः प्रयं शक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति का प्रवर्तक बन खाता है । मग्नि विष्णु है; वायु क्रियामय होने से ब्रह्मा है । इन्द्र ज्ञान द्वारा संसारबन्धन को तोड़ने के कारण महादेव है । तीनों लोकों के तीन देवता हैं । तीनों अविनाभूत हैं । तीन देवता क्या है - ' एका मूर्तिस्थयो देवाः ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा: " -के अनुसार एक ही देवता के तीन रूप हैं । एकदेवता संसार को पैदा करता है - वही आन्तरिक्ष्य वायु नाम के ब्रह्मा हैं ये त्रिलोक के केन्द्र में उस ब्रह्मसत्य के हृत्पुण्डरीक में प्रति-ठित हैं । ( दूसरे ) एक संसार को अर्थरूप में प्रतिष्ठित रखते हैं- ये ही नाभिस्थानीय प्रतिष्ठामय पार्थिवा-ग्निस्वरूप विष्णु हैं । ( तीसरे ) एक संसार का विनाश करते हैं - ये ही ब्रह्मसस्य के ललाटस्थानीय बो-लोक में इन्द्र नाम से प्रसिद्ध महादेव हैं । इस प्रकार ब्रह्मसत्य से अलावा चन्द्रमा, चितेनिधेया, पृथिवी के बीच में अग्नि, वायु ( यहाँ के वायु को मरुत्वानिन्द्र ओर सोम का भी उपलक्षण समझना चाहिए ) एवं इन्द्र ( मघवा ) तीन देवता सिद्ध हो जाते हैं । तीनों का भ्रान्तरिक्ष्य वायु को माधार बनाकर पर्वण होता है । ये तीनों भग्नि तापरहित थे । इन तीनों के मेल से जो एक नया अग्नि उत्पन्न होता है-वह तापचर्मा होता है । उत्पन्न होकर यह त्रैलोक्य में व्याप्त हो जाता है । यदि इस अग्नि का भाषार पार्थिव धन - अग्नि रहता है तो यह त्रैलोक्याग्नि से उत्पन्न होने वाला प्रग्नि वैश्वानर नाम से प्रसिद्ध होता है एवं यदि इसका प्रान्तरिक्ष्य तरल अग्नि ( वायव्याग्नि ) प्राधार बनता है तो यही हिरण्यपर्व कहलाने लगता है एवं यदि इसका प्राधार वही दिव्य इन्द्र बन जाता है तो इसका नाम ' सर्व ' पड़ जाता है । इस प्रकार पार्थिव अपान, मान्तरिक्ष्य व्यान, दिव्य प्राण- इन तीनों की प्रधानता प्रधानता से उस वैश्वानर के ही वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ- ये तीन नाम हो जाते हैं । तीनों वैश्वामर हैं । केवल अवस्था में अन्तर है । पार्थिव वैश्वानर घन होने से प्रथशक्ति का प्रधिष्ठाता है । धान्तरिक्ष्य हिरण्यव तरल होने से क्रियाशक्ति का बधिष्ठाता है । दिव्य सर्वज्ञ विरल होने से ज्ञानशक्ति के अधिष्ठाता है । सारे विश्व में इन्हीं का साम्राज्य है । तीनों वैश्वानर ही हैं, प्रतएव - ' वंश्वानरो यतते सूर्येख " - ' मा पो af माथा वृथिवीम् ३ - यह कहा जाता है । ईश्वरात्मा में जो वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ कहलाते हैं - वही जीवात्मा में वैश्वानर -तेजस - प्रात कहलाते हैं । तीनों वानर हैं । इसीलिए कम्र्मात्मा के लिए प्रारम्भ में-- ' चैश्वानरः प्रविशत्यतिथि-रण गृहात् ' ' कहा गया है । वैश्वानर से तीनों पकड़ में भा जाते हैं । प्रस्तु, यहाँ हमें केवल साक्षी देवलत्य का स्वरूप बतलाना । यह साक्षी देवसत्य और कोई नहीं, यही पूर्वोक्त तीनों अग्नि हैं । पार्थिव त्रिवृत्स्थानीय ' वैश्वानर ', भान्तरिक्ष्य पञ्चदशस्थानीय ' हिरण्यगर्भ ', दिव्य एकविशस्थानीय ' सवंश ' तीनों की समष्टि ही साक्षी देवसत्य है । सारे त्रैलोक्य में ये तीनों एकरूप से व्याप्त हैं । साथ में एक बात और समझ लेनी चाहिए । वैश्वानर तीनों के मेल से उत्पन्न होता है, वही वैश्वानर पात्र